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टमाटर खाने से दूर हो सकती हैं कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां, जानें फायदे

Eating tomatoes can cure dangerous diseases like cancer, know the benefits टमाटर में विटामिन C ही नहीं सोडियम, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम और सल्फर जैसे पावरफुल तत्व पाए जाते हैं. इसमें मौजूद ग्लूटाथियोन इम्यूनिटी बढ़ाकर कई तरह की बीमारियों से बचा सकता है. हेल्थ डेस्क सहारा समाचार, भोपाल ! टमाटर हर सब्जी की जान होता है. इसे सलाद, चटनी, सॉस और न जाने कितने सारे फूड्स को टेस्टी बनाने में उपयोग किया जाता है. यह सेहत के लिए जबरदस्त फायदेमंद है. इसमें (Tomatoes) ढेर सारे पौष्टिक तत्व और कई एंटीऑक्सिडेंट्स (Antioxidant) भी पाए जाते हैं, जो शरीर को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों से भी बचा सकते हैं. इसके अलावा कब्ज और कमजोरी जैसी समस्याएं भी दूर करने में टमाटर उपयोगी हो सकते हैं. आइए जानते हैं टमाटर के क्या-क्या फायदे हैं… टमाटर क्यों इतना फायदेमंदटमाटर में लाइकोपेन नाम का एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो हार्ट की बीमारी और कैंसर के खतरे को कम करता है. टमाटर में विटामिन C ही नहीं सोडियम, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम और सल्फर जैसे जरूरी और पावरफुल तत्व पाए जाते हैं. इसमें मौजूद ग्लूटाथियोन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को बढ़ा देता है और प्रोस्ट्रेट कैंसर से भी शरीर की रक्षा करता है. यह एक अच्छे एंटीऑक्सिडेंट का काम करता है, इसीलिए यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को सामान्‍य बनाने में मदद करता है. टमाटर के क्या-क्या फायदे हैं कैंसर का खतरा करें कमरिसर्च में पता चला है कि जब मोनोपॉज के बाद अगर महिलाएं टमाटर खाती हैं तो ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क काफी कम हो सकता है. इससे ग्लूटाथियोन नाम का एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो हार्मोन्स पर सकारात्मक असर डालकर कैंसर का रिस्क कम होता है. वजन कम करेंलो कैलोरी फूड होने के कारण यह टमाटर आपके वजन को कंट्रोल में रखता है. इसमें पानी के साथ ही फाइबर भी काफी ज्यादा मात्रा में होता है. इस वजह से वजन कम करने में ये काफी मदद कर सकता है. वेट कंट्रोल करने वाले गुण की वजह से ही इसे ‘फिलिंग फूड’ नाम से भी जाना जाता है. शरीर को दे मजबूतीटमाटर में विटामिन और कैल्शियम पाए जाते हैं, जो हड्डियों के टिशूज़ हेल्दी रखकर उन्हें मजबूत बनाते हैं. टमाटर खाने से ब्रेन हैमरेज की का खतरा भी कम किया जा सकता है. इससे शरीर को मजबूती मिलती है. पाचन शक्ति बढ़ाएटमाटर में मौजूद क्लोरीन और सल्फर के कारण पाचन शक्ति बढती है और गैस-कब्ज जैसी परेशानी दूर हो जाती हैं. टमाटर हमारे शरीर से खराब पदार्थों को बाहर निकालने में भी मददगार होता है.Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

हल्के में ना लें सिरदर्द, हो सकती हैं ये गंभीर बीमारियां

Do not take headache lightly, it can lead to serious diseases. जानें राहत पाने के उपाय सिरदर्द होने पर आमतौर पर दर्द की दवा खाकर ठीक हो जाते हैं लेकिन अगर दर्द लगातार बना हुआ है तो कोई गंभीर बीमारी भी हो सकती है. ऐसी कंडीशन में इसे सामान्य दर्द समझने की गलती नहीं करनी चाहिए. Headache Remedies: सिरदर्द एक आम समस्या मानी जाती है लेकिन अगर इससे ज्यादा दिन से परेशान हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि जब कई दिनों तक सिरदर्द (Headache) ठीक न हो तो वह गंभीर रूप भी ले सकती है. इसका कारण कई खतरनाक बीमारी भी हो सकती है. ऐसे में डॉक्टर के पास जाने की नौबत आ सकती है. इसलिए सिरदर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आइए जानते हैं सिरदर्द के क्या कारण हो सकते हैं और इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए… सिरदर्द का गंभीर कारण बुखार के साथ सिरदर्दकई बार बुखार के साथ सिरदर्द या गर्दन में अकड़न की वजह से भी होती है. यह इंसेफेलाइटिस या मेनिन्जाइटिस के संकेत भी हो सकते हैं. जिसे दिमागी बुखार या मस्तिष्क ज्वर भी कहा जाता है.यह एक संक्रामक बीमारी है, जिसमें मेनिन्जेस में सूजन आ जाती है. इस तरह का सिरदर्द खतरनाक भी हो सकता है. ऐसे लोग जिन्हें डायबिटीज या उनकी इम्यूनिटी कमजोर है, उनके लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. इसलिए समय रहते इसका इलाज करवाना चाहिए. माइग्रेन या क्लस्टर हेडेकक्लस्टर हेडेक या माइग्रेन से होने वाला सिरदर्द अलग होता है. माइग्रेन की वजह से सिर के किसी एक हिस्से में काफी तेज दर्द होता है. इसमें उल्टी या मिचली भी आती है. कई बार यह दर्द इतना ज्यादा होता है कि नींद खुल जाती है. यह समस्या 20 से 50 साल की उम्र वालों में ज्यादा देखने को मिलता है. कई बार ब्रेन ट्यूमर, स्लीप एपनिया और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की वजह से भी सिरदर्द होता है. स्ट्रेस की वजह से सिरदर्दस्ट्रेस यानी तनाव की वजह से भी सिरदर्द की समस्या होती है. इसमें सिरदर्द अचानक से होता है और फिर खुद से ही ठीक हो जाता है. हालांकि, तनाव से होने वाले दर्द में कोई दूसरा लक्षण नहीं दिखाई देता लेकिन इसे भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. थंडर क्लैप सिरदर्दथंडरक्लैप सिरदर्द काफी गंभीर बीमारी है. इसमें कुछ ही सेकेंडस में ही तेज दर्द होने लगता है. कई बार स्ट्रोक, आर्टरीज के डैमेज होने या सिर में चोट की वजह से भी दर्द हो सकता है. कई बार ये दर्द सिर से पीठ की तरफ बढ़ जाता है और कई-कई घंटों तक बना रहता है. थंडर क्लैप सिरदर्द की वजह से मिचली, बेहोशी और चक्कर आने की समस्याएं हो सकती हैं. हाई ब्लड प्रेशर वालों को यह दर्द ज्यादा परेशान कर सकता है. साइनस सिरदर्दसिर में साइनस या कैविटी में सूजन आने के कारण भी कई बार सिर में तेज दर्द होता है. यह दर्द लगातार होता रहता है. इसमें सिरदर्द के अलावा नाक के ऊपरी हिस्से या गाल की हड्डी पर भी दर्द हो सकता ह. इसकी वजह से चेहरे पर सूजन, कान बंद होना, बुखार और नाक बहने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. आंखों की बीमारी से सिरदर्दआंखों का धुंधलापन, रेटिना की प्रॉब्लम्स या आंखों की दूसरी समस्याओं की वजह से भी सिर दर्द बहुत तेज होता है. अगर आंखों की रोशनी कम है तो भी सिरदर्द की समस्या हो सकती है. ऐसे में डॉक्टर को दिखाना चाहिए. सिरदर्द के ये कारण भी50 साल या उससे ज्यादा उम्र वालों में शारीरिक बदलाव की वजह से कमजोरी होती है और इससे भी सिरदर्द हो सकता है.कुछ महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान सिरदर्द होता है.चाय-कॉफी पीने की आदत है तो कैफीन की लत पड़ जाती है, जब ये न मिले तो सिरदर्द होने लगता है.ज्यादा शराब पीने या डिहाइड्रेशन से भी सिरदर्द हो सकता है.नींद पूरी न होने से से भी सिर दर्द करता रहता है. सिरदर्द से राहत पाने के उपाय Disclaimer: इस आर्टिकल में बताई विधि, तरीक़ों और सुझाव पर अमल करने से पहले डॉक्टर या संबंधित एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें.

स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाह- सीजनल फ्लू से करें बचाव, जानिए इसके लिए क्या करें-क्या नहीं?

Health Ministry’s advice – Protect yourself from seasonal flu, know what to do and what not to do? फरवरी-मार्च के महीने में देश में मौसम में तेजी से बदलाव आने लगता है और बदलता मौसम कई प्रकार की बीमारियों और संक्रमण का कारक हो सकता है। विशेषतौर पर मौसम बदलने के कारण सीजनल फ्लू (इंफ्लूएंजा) के मामले सबसे ज्यादा देखे जाते रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है उनमें संक्रामक रोगों के विकसित होने का खतरा अधिक होता है। बच्चे और बुजुर्ग मौसमी फ्लू का अधिक शिकार होते हैं। मौसम में होने वाले परिवर्तन के साथ इस संक्रामक रोग से बचाव को लेकर सभी लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सीजनल फ्लू और इसके जोखिमों को लेकर लोगों को सावधान किया है। आइए जानते हैं इस संक्रमण से किस प्रकार से बचाव किया जा सकता है और सुरक्षात्मक तौर पर लोगों को क्या करना चाहिए-क्या नहीं? मौसमी फ्लू (इन्फ्लूएंजा) का खतरा स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया, मौसमी फ्लू को इन्फ्लूएंजा के नाम से भी जाना जाता है, ये वायरल संक्रमण श्वसन समस्याओं का कारण बनता है। इसके कारण सर्दी-जुकाम के साथ बुखार, शरीर-सिर में दर्द के साथ थकान की समस्या हो सकती है। इन्फ्लूएंजा वायरस, संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने पर आसानी से फैल सकता है। फ्लू का टीकाकरण इस बीमारी से बचाव का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। डॉक्टर कहते हैं, लाइफस्टाइल और आहार में कुछ प्रकार के बदलाव करके भी आप संक्रामक रोगों के खतरे से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। सीजनल फ्लू से बचाव के लिए क्या करें? स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक पोस्ट में सीजनल फ्लू से बचाव के लिए क्या करें और क्या न करें, इसको लेकर स्पष्ट जानकारी साझा की है। आइए जानते हैं कि इस बदलते मौसम में स्वस्थ और फिट रहने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?मास्क पहनें और भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचें।छींकते और खांसते समय मुंह और नाक को ढकें।आंखों और नाक को बार-बार छूने से बचें।तरल पदार्थों-पानी का खूब सेवन करें।बुखार और शरीर में कुछ समय से दर्द महसूस हो रहा है तो पैरासिटामॉल लें। संक्रामक रोग से बचाव के लिए क्या न करें? स्वास्थ्य मंत्रालय ने सीजनल फ्लू से बचाव के लिए कुछ बातों का ध्यान रखने और उसे न करने की सलाह दी है। क्या है डब्ल्यूएचओ की सलाह? विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कहता है, थोड़ी सी सावधानी आपको और परिवार के अन्य सदस्यों को इस संक्रामक रोग से सुरक्षित रख सकती है। मौसमी फ्लू आसानी से फैल सकता है, स्कूलों और नर्सिंग होम सहित भीड़-भाड़ वाली जगहों पर इसका प्रसार अधिक तेजी से होने का जोखिम रहता है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो इससे निकलने वाली ड्रॉपलेट (संक्रामक बूंदें) हवा में फैल जाती हैं और निकटतम व्यक्तियों को संक्रमित कर सकती हैं। संचरण को रोकने के लिए, खांसते समय अपने मुंह और नाक को रुमाल से ढकना और नियमित रूप से अपने हाथ धोना जरूरी है।

गणतंत्र दिवस पर शासकीय प्राथमिक स्कूल में मचा हड़कंप, पूड़ी-लड्डू खाने से 58 बच्चों की बिगड़ी तबीयत

There was a stir in the government primary school on Republic Day, health of 58 children deteriorated after eating puri-laddus. रीवा ! 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन शासकीय प्राथमिक स्कूल में उस वक्त हड़कंप मच गया जब खाना खाने के बाद बच्चे बीमार पड़ने लगे। तत्काल बच्चों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मेंरीवा: जिले में गणतंत्र दिवस के मौके पर परोसे गए मिड डे मील खाने से 50 से ज्यादा बच्चे फूड प्वाइजनिंग का शिकार हो गए। बच्चों को इलाज के लिए सिरमौर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है। सभी बच्चों की हालत ठीक बताई जा रही है। प्रशासन इस बात का पता लगाने का प्रयास कर रहा है कि बच्चों को किस चीज से फूड प्वाइजनिंग हुई है। ऐसा माना जा रहा है कि पूड़ी सब्जी ही बच्चों को नुकसान किया जिससे उनकी तबियत बिगड़ गई। दरअसल, मामला रीवा जिले के सिरमौर थाना क्षेत्र के पड़री गांव का है। जहां पर शासकीय प्राथमिक विद्यालय पड़री में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम आयोजित हुआ। आयोजन के बाद बच्चों को मिड डे मील परोसा गया। जिसको खाने के बाद अचानक बच्चों की तबियत बिगड़ने लगी और देखते ही देखते करीब 50 से अधिक बच्चे बीमार हो गए। जिसके बाद स्कूल में हड़कंप मच गया। तत्काल सभी बच्चों को इलाज के लिए सिरमौर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। जहां सभी बच्चों की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि स्वयं सहायता समूह द्वारा स्कूल में मध्यान्ह भोजन दिया जाता है। रसोइए द्वारा पूड़ी और आलू गोभी की सब्जी बनाई गई थी। लड्डू भी बैकुंठपुर के एक दुकान से लाया गया था। जिसको खाने के बाद अचानक बच्चों की तबियत बिगड़ने लगी 50 से अधिक बच्चे बीमार पड़ गए। जिसमे 45 छात्र स्कूल के है और करीब 16 बच्चे आस पास गांव के हैं।

एम्स: नि:संतान दंपती के लिए जल्द शुरू होगी आईवीएफ सुविधा

AIIMS: IVF facility for childless couples will start soon प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने मनाया अपना स्थापना दिवस आईवीएफ और ईटी पर सीएमई के साथ मनाया भोपाल। राजधानी के एम्स में नि:संतान दंपती के लिए जल्द ही आईवीएफ सुविधा शुरू होने जा रही है। एम्स डायरेक्टर डॉ अजय सिंह ने जल्द से जल्द आईवीएफ सुविधा स्थापित करने की दिशा में काम करने के लिए प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग को बधाई दी। दरअसल गुरूवार को एम्स के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग का स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) और भ्रूण स्थानांतरण (ईटी) पर एक सीएमई का भी आयोजन किया गया। जिसमें आईवीएफ-ईटी और हिस्टेरोस्कोपी तकनीक का प्रदर्शन भी किया गया। कार्यक्रम में एम्स डायरेक्टर डॉ अजय सिंह मुख्य अतिथि थे और सीएमएचओ डॉ. प्रभाकर तिवारी विशेष अतिथि थे। जो अपनी टीम के साथ शामिल हुए क्योंकि 25 जनवरी विस्तारित प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व (ई -पीएमएसएमए) अभियान का दिन भी है। उन्होंने इस बात की सराहना की कि स्थापना दिवस में आईवीएफ तकनीकों के प्रदर्शन के साथ आईवीएफ-ईटी जैसे प्रासंगिक विषय पर एक सीएमई भी शामिल की गई है। डॉ के पुष्पलता, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख और सीएमई की आयोजन अध्यक्ष ने वर्ष 2023 की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट और विभाग की भविष्य की योजनाएं प्रस्तुत की। एसओपी की एक पुस्तिका भी जारीडॉ. सिंह ने एम्स भोपाल में मातृ मृत्यु में क्लिनिकल ऑटोप्सी पर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) की एक पुस्तिका का भी विमोचन किया। पुस्तक में मातृ मृत्यु के मामलों में शव परीक्षण करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं की रूपरेखा तैयार करता है और इसे एम्स की एक विषयक टीम द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें प्रसूति एवं स्त्री रोग, फोरेंसिक मेडिसिन, पैथोलॉजी और लैब मेडिसिन विभाग शामिल हैं।एम्स शुरू हुई नर्स-लेड क्लिनिक एम्स डायरेक्टर डॉ अजय सिंह ने नर्स-लेड क्लिनिक का उद्घाटन किया, जो स्वास्थ्य देखभाल नवाचार में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पहल, देश में अपनी तरह की पहली है, इससे मरीज देखभाल और नर्सिंग पेशे में एक नई क्रांति होगी। सोमवार से शुक्रवार सुबह 9 से 10:30 बजे के बीच संचालित होने वाले क्लीनिक शुरू में तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों रेडियोथेरेपी और ऑन्कोलॉजी, न्यूरोसाइंसेज/न्यूरोसर्जरी/न्यूरोलॉजी और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर संचालित होंगे। क्लीनिक का लक्ष्य नैदानिक उत्कृष्टता और पैशनेट केयर पर जोर देते हुए नर्सिंग सेवाओं की भूमिका को फिर से परिभाषित करना है। इस अवसर पर डॉ सिंह ने कहा कि नर्स-लेड क्लीनिकों की स्थापना स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह न केवल नर्सों के नैदानिक प्रशिक्षण को बल्कि नर्सिंग के सभी मानकों को बढ़ाएगा। इससे नर्सिंग छात्रों के नैदानिक कौशल में सुधार होगा और रोगी की संतुष्टि को बढ़ाने के लिए पैशनेट केयर पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

उप स्वास्थ्य केंद्र में स्टाफ की कमी लोगों को नहीं मिल रहा सुविधा का लाभ

Due to lack of staff in sub health center, people are not getting the benefit of the facility. कटनी । स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर विभाग उदासीन रवैया अपना रहा है मिली जानकारी के अनुसार ग्रामीण अंचलों मैं ग्रामीणों को सरलता से प्राथमिक उपचार व स्वास्थ्य सेवाओं का मिल सके इसी उद्देश्य से शासन द्वारा उपस्वास्थ्य केंद्र खोले जा रहे है। लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ग्रामीणों को नही मिल पाता। ताजा मामला बहोरीबंद विकासखण्ड अंतर्गत नवीन उपस्वास्थ्य केंद्र नीमखेड़ा का सामने आया है। जहां 49 लाख रुपये की लागत राशि से उपस्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कराया गया। जिसका लोकार्पण 21 सितंबर 2023 को विधायक प्रणय पांडेय के द्वारा किया गया। लोकार्पण होने के बाद आसपास के 5 हजार ग्रामीणों को आस जागी थी कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लंबी दूरी तय नही करनी पड़ेगी। लेकिन तीन माह के समय बीत जाने के बाद भी अब तक नवीन उपस्वास्थ्य केंद्र शोपीस बना हुआ है। जहां उपचार के लिए आने वाले ग्रामीणों को बिना उपचार ही वापस लौट जाना पड़ता है। उप स्वास्थ्य केन्द्र पर आए दिन ताला लटकता नजर आता है। ग्रामीणों ने बताया कि यहां नियमित चिकित्सक की पदस्थापना नही है। जिस कारण किसी को अतिरिक्त जवाबदेही दी गई। जो सप्ताह मैं एक-दो दिन उपस्वास्थ्य केंद्र का ताला खुलता है। जिसके कारण लोगों को प्राथमिक उपचार की सुविधा नहीं मिल पाती है। उपचार के लिए लंबी दूरी तय कर बताया गया है कि ग्रामीणों को बहोरीबंद या स्लीमनाबाद जाना पड़ता या फिर झोलाछाप डॉक्टरों से उपचार करवाना पड़ता है। ग्रामीणों ने बताया कि उपस्वास्थ्य केंद्र न तो सीएचओ न ही एएनएम की पदस्थापना है। यहां तक कि ग्रामीणों द्वारा स्वास्थ्य विभाग को भी कई बार सूचना दी गई की उपस्वास्थ्य केंद्र बन गया है तो चिकित्सा स्टॉफ की भी पदस्थापना की जाए। जिससे मरीजो को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सके। इनका कहना है डॉ आंनद अहिरवार बीएमओ बहोरीबंद नीमखेड़ा नवीन उपस्वास्थ्य केंद्र मैं चिकित्सक स्टाफ की पदस्थापना को लेकर विभागीय स्तर पर पत्राचार किया गया है। राज्य स्तर से पदस्थापना की जानी है। जब तक स्वास्थ्य सुविधाये ग्रामीणों को बेहतर मिल सके। इसके लिए जो स्टाफ अन्य स्वास्थ्य केंद्रों मैं है। उन्ही की सहायता से स्वास्थ्य कामकाज संचालित किया जा रहा है।

बार-बार अलग-अलग एंटीबायोटिक दवाएं देने से मरीजों पर नहीं होता असर

Repeatedly giving different antibiotics has no effect on patients. भोपाल। लगातार उपयोग से एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम हो रहा है। एक मरीज को बार-बार अलग-अलग तरह की एंटीबायोटिक देने से उस पर ये दवाएं प्रभावी नहीं होती। ऐसे में विशेषज्ञ समय समय पर इन दवाओं की संवेदनशीलता को जांचने की सलाह देते हैं। एम्स भोपाल भी एंटीबायोटिक के प्रभाव को जांचने के लिए लगातार शोध हो रहे हैं। एम्स भोपाल देश का एकमात्र ऐसा संस्थान है जो दवाओं की संवेदनशीलता की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर रहा है। गुरुवार को भी एम्स भोपाल ने 2023 की दूसरी छहमाही की एंटीबायोटिक की रिपोर्ट (एंटीबायोग्राम) जारी की। सरल शब्दों में कहें तो एम्स अपने अस्पताल में बेअसर हो चुकी एंटीबायोटिक की रिपोर्ट (एंटीबायोग्राम) जारी करता है। मालूम हो कि इस रिपोर्ट को हर छह महीने में अपडेट किया जाता है। दरअसल इस रिपोर्ट का उद्देश्य एंटीबायोटिक के धड़ल्ले से उपयोग को रोकना है। डॉक्टरों को बताएगा किस दवा का असर कमएम्स के पीआरओ केडी शुक्ला बताते हैं कि एंटीबायोग्राम वह तकनीक है जिससे एंटीबायोटिक की संवेदनशीलता की जानकारी मिलती है। लगातार उपयोग से एंटीबायोटिक का असर कम हो जाता है। हर अस्पताल या क्षेत्र में अलग अलग एंटीबायोटिक का असर अलग अलग होता है। ऐसे में एम्स अस्पताल में उपयोग हो रहे एंटीबायोटिक की जांच कर रिपोर्ट को हर छह महीने में अपडेट किया जाता है। इससे चिकित्सकों को यह पता होता है कि उन्हें किस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करना है किसका नहीं। एंटीबायोटिक का ऐसा हो रहा यूजएनएचएम के पूर्व संचालक डॉ. पंकज शुक्ला ने बताया कि कई चिकित्सक एक मरीज को दिन भर में पांच एंटीबायोटिक दे देते हैं। डॉक्टर अक्सर मरीजों पर एंटीबायोटिक का टेस्ट करते हैं। एक दवा काम न आए तो दूसरी और तीसरी दवाएं तक दी जाती हैं। एंटीबायोटिक के ज्यादा उपयोग से कुछ समय बाद मरीज पर इसका असर होना खत्म हो जाता है। कई एंटीबायोटिक बेअसरकरीब चार पहले एम्स भोपाल ने एंटीबायोटिक के कम हो रहे असर को लेकर शोध किया था। शोध में पता चला था कि नए एंटीबायोटिक का असर खत्म हो रहा है। शोध के अनुसार सबसे ज्यादा उपयोग किए जाने वाले एंटीबायोटिक जैसे एंपिसिलीन, एमॉक्सीसिलीन, सिफजोलिन, सिफ्रिएक्सोन आदि की प्रभाविता 50 प्रतिशत के नीचे पहुंच गई है। वहीं सालों पहले एनेक्टिव होने से क्लोरेम्फेनिकूल का उपयोग बंद कर दिया गया था, उसकी प्रभाविता 63 प्रतिशत तक पाई गई।

आयुष विभाग जिला विदिशा के द्वारा अश्वगंधा, शतावर एवं तुलसी की कृषि तकनीक, संग्रहण एवं स्वेच्छिक प्रमाणन पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम

Two day training program on collection and voluntary certification सीताराम कुशवाहा सहारा समाचार विदिशा ! आयुष विभाग जिला विदिशा के द्वारा अश्वगंधा, शतावर एवं तुलसी की कृषि तकनीक, संग्रहण तकनीक स्वेच्छिक प्रमाणन आदि विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम दिनांक 12 जनवरी 2024 से 13 जनवरी 2023 का शुभारंभ हुआ।दिनांक 12 जनवरी 2024 को प्रातः 10 बजे से होटल राजावत, माधवगंज विदिशा में किया गया। उक्त प्रशिक्षण मे अश्वगंधा शतावर एवं तुलसी आदि कृषि उत्पादन संग्रहण आदि विषयो पर संबंधित विशेषज्ञो आयुष विभाग/कृषि विभाग/उधानिकी विभाग द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। उक्त प्रशिक्षण में आज दिनांक 12.01.2024 को जिला अंतर्गत विभिन्न विकासखण्डों के कृषकों के द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त किया साथ ही कृषकों के द्वारा उक्त प्रशिक्षण को औषधीय पौधों की कृषि में अत्यधिक लाभकारी बताया गया है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषकों को इन औषधीय पौधों के संरक्षण, तकनीक एवं प्रमाणन पर विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जायेगा।

लाखों की लागत से बने उप स्वास्थ्य केंद्र पर लगा रहता है ताला, लोगों को नहीं मिल रहा इलाज.

A lock is placed on the Sub health Center built at a cost of millions, depriving people of access to medical treatment. मलखान सिंह परमार मुरैना । ग्राम पंचायत आरोली मे बीच का पुरा गांव में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उप स्वास्थ्य केंद्र ताे खोले गए हैं। लेकिन इन स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में लोगों को इलाज के लिए लोगों को निजी चिकित्सालय क्लीनिकों पर या जिला स्तर पर अस्पताल में जाना पड़ता है। उप स्वास्थ्य केंद्रों पर कहने को तो यहां 24 घंटे एएनएम और इलाज की सुविधा मिलना है, लेकिन ताला नहीं खुलने से ग्रामीणों को विकासखंड के उप स्वास्थ्य केंद्रों पर इलाज की सुविधा नहीं मिल रही है। लाखों की लागत से बने बीच के पुरा पर स्थित उप स्वास्थ्य केंद्र बना जर्जर केंद्र जानकारी के अनुसार देखने में तो उप स्वास्थ्य केंद्र को बने अभी कुछ अधिक समय नहीं हुआ लेकिन उसकी दीवारें, प्लास्टर सभी खंडर हो गए है केंद्र को बनाने में घटिया सामग्री का उपयोग किए जाने से कम समय में ही उप स्वास्थ्य केंद्र खंडर हो गया है। ग्राम पंचायत अरोली में ग्राम बीच के पूरा को शासकीय उप स्वास्थ्य केंद्र में पिछले कई दिनों से ताला लटका हुआ हैं, वहीं जिले में बैठे जिम्मेदार जांच सहित अन्य के नाम पर वाहन द्वारा डीजल का भुगतान लेते है, लेकिन समझ से परे यह है कि आखिर इनके द्वारा किस चीज की जांच की जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को नि:शुल्क उपचार उपलब्ध कराना महज दिखावा बनकर रह गया है, क्योंकि कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर पिछले कई दिनों से उप स्वास्थ्य केंद्र में ताला लटक रहा है। मजे की बात तो यह है कि यहां पदस्थ जिम्मेदार से अगर कोई पूछ ले कि आप कहां हैं, तो इनके द्वारा मीटिंग के साथ भ्रमण बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। ग्रामीणों को स्वास्थ्य लाभ मुहैया करवाने के उद्देश्य से सरकार ने गांव में उप-स्वास्थ्य केन्द्र खोला था, लेकिन यह ग्रामीणों का दुर्भाग्य ही रहा कि लाखों रुपये की लागत से बने उप-स्वास्थ्य केन्द्र में आये दिन ताला लटका रहता है।

सर्दी के मौसम में तेजी से फैलता है इन्फ्लूएंजा वायरस.

 The influenza virus spreads rapidly during the cold weather. फ्लू इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है, जो नाक, गला और फेफड़ों को संक्रमित करता है। The flu is caused by the influenza virus, which infects the nose, throat, and lungs. Manish Trivedi, Sub-Editor, Sahara Samachaar. ठंड के मौसम में बीमारियों का खतरा अधिक होता है। इस मौसम में कई मौसमी बीमारियों जैसे सर्दी-खांसी और फ्लू का खतरा अधिक रहता है। फ्लू इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है, जो नाक, गला और फेफड़ों को संक्रमित करता है। ठंड के मौसम में बीमारियों का खतरा अधिक होता है। इस मौसम में इन्फ्लूएंजा वायरस अधिक सक्रिय रहता है। सर्दी में ठंडी हवाएं और गिरता तापमान सबसे ज्यादा परेशान करता है। इस मौसम में कई मौसमी बीमारियों जैसे सर्दी-खांसी और फ्लू का खतरा अधिक रहता है। इस मौसम में फ्लू लोगों को बेहद प्रभावित करता है। मेडिसिन विभाग के सह प्राध्यापक डा. अशोक ठाकुर ने बताया कि फ्लू इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है, जो नाक, गला और फेफड़ों को संक्रमित करता है। जब फ्लू से पीड़ित लोग खांसते, छींकते या आपस में बात करते हैं तो ये वायरस हवा के जरिए एक-दूसरे में फैलने लगता है। यह वायरस सबसे आसानी से फैल जाता है। कोविड के प्रोटोकाल का पालन करना चाहिए इससे बचाव के लिए हमें कोविड की तरह प्रोटोकाल का पालन करना चाहिए। जैसे मास्क लगाकर रखें, बार-बार हाथ धोएं, भीड़ वाली जगहों पर जाने से बचें। खासकर घर में यदि कोई व्यक्ति बीमार है, तो उससे दूरी बनाकर रखना चाहिए। इस मौसम में सबसे अधिक समस्या सांस के मरीज को होती है। उन्हें अपना विशेष तौर पर ध्यान रखने की आवश्यकता है। ऐसे में खानपान में ठंडी चीजों को नहीं खाना चाहिए। जिन लोगों की जिस भी तरह के खाने से एलर्जी है, उसे खाने से बचना चाहिए।सर्दी में मौसमी बीमारियों से बचाव करने के लिए टीका लगना जरूरी है। फ्लू से बचाव के लिए नियमित रूप से साबुन से अपने हाथ धोएं या फिर सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें। हाथों को अपनी आंखें, नाक, या मुंह को छूने से बचें।

सेहत के लिए फायदेमंद है कांटेदार सत्यानाशी पौधा, कई औषधीय गुणों से है भरपूर.

The thorny devil’s snare plant is beneficial for health, possessing numerous medicinal properties. हमारे आसपास कई तरह के पेड़ पौधे ऐसे होते हैं, जो कई सारे औषधीय गुना से भरपूर रहते हैं। There are many types of trees and plants around us that are abundant in various medicinal properties. हालांकि, कई बार अपने आसपास मौजूद चीजों को हम बेकार या फिर जंगली समझकर तोड़ देते हैं या उखाड़ कर फेंक देते हैं। ऐसा ही दिखने वाला एक कांटेदार पौधा सत्यानाशी फूल का होता है जो कई तरह की औषधीय गुणों से भरपूर है। हमारे आसपास मौजूद पार्क, गार्डन और सड़क के किनारे पर कई तरह के पेड़ पौधे और फूल उगे हुए दिखाई देते हैं। कई पेड़ पौधे ऐसे होते हैं, जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं होती है और वह इन्हें जंगली और बेकार समझ लेते हैं। ऐसा ही एक पौधा पीले रंग ला सत्यानाशी फूल है, जिस अक्सर ही बेकार समझ कर फेंक दिया जाता हैं। इस पौधे में बहुत सारे कांटे होते हैं, यही वजह है कि इसे बेकार समझा जाता है। आपको बता दें कि ये कांटेदार फूल का पौधा सेहत के लिहाज से बहुत फायदेमंद है। इसे खुसबसूरती के साथ अगर गमले में लगाया जाए तो ये देखने में भी सुंदर दिखेगा और इससे होने वाले फायदे का लाभ भी उठाया जा सकता है। चलिए आज आपको इस पौधे से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हैं। कैसा होता है सत्यानाशी पौधासत्यानाशी पौधा देखने में बहुत खूबसूरत होता है और अक्सर ही खाली जमीन पर उग जाता है। इस पौधे में कई तरह की औषधि गुण मौजूद है और यह आपको अक्सर सड़क किनारे या निर्जन स्थान पर देखने को मिल जाएगा। इस पौधे में फूल, पत्ते, डाली सभी जगह पर कांटेदार पौधे होते हैं और इसे बहुत ही सावधानी के साथ तोड़ना पड़ता है। पीले रंग के स्कूल के अंदर बैंगनी रंग के बीच दिखाई देते हैं। सबसे खास बात यह है कि जब भी आप किसी पौधे या फूल को तोड़ते हैं तो उसमें से सफेद रंग का दूध निकलता है। लेकिन जब आप सत्यानाशी पौधे को तोड़ेंगे तो इसमें से आपको पीले रंग का दूध निकलता हुआ दिखाई देगा। सत्यानाशी पौधे के फायदेकांटेदार और बेकार सा दिखने वाला यह पौधा कई गुणों से भरपूर है और इससे बहुत तरह के फायदे होते हैं। जिन लोगों को अक्सर खांसी चलने या फिर सांस चलने की शिकायत होती है, वह अगर इसकी जड़ को पानी में उबालकर काढ़े की तरह पिएंगे तो उन्हें बहुत फायदा होगा।सत्यानाशी के तेल में गिलोय का जूस मिलाकर पीने से पीलिया जैसे रोग से मुक्ति मिलती है।पेट दर्द की समस्या को दूर करने में भी यह पौधा काफी कारगर है बस आपको इसके दूध में घी मिलाकर पीना होगा और दर्द से आराम मिल जाएगा। कैसे लगाए पौधासत्यानाशी पौधे को आप अपने घर में कैक्टस प्लांट की तरह ही लगा सकते हैं। जब इसमें फूल खिलेंगे तो यह बहुत ही खूबसूरत दिखाई देगा। इसे लगाने के लिए बस आपको पके हुए बीज की आवश्यकता होगी। आप इन्हें मिट्टी में मिला दें और बस पौधा उगने लगेगा। इस पौधे को कुछ खास देखभाल की जरूरत नहीं होती है। लगाते वक्त ही थोड़ी ऑर्गेनिक खाद इसकी मिट्टी में मिला दें। बीज के जरिए पौधा उगाने के अलावा आप छोटा सा पौधा लाकर भी इसे लगा सकते हैं। दिन में दो-तीन बार इसे पानी देने के अलावा आप धूप या छांव में कहीं भी इसे रख सकते हैं। दाद-खाज-खुजली से छुटकारा (What stops itching fast)स्किन रोगों के लिए सत्यानाशी का प्रयोग (Prickly Poppy use to Treat Skin Disease)सत्यानाशी का पौधा आपको आसानी से पार्क या सड़क के किनारे लगा दिख जाएगा। यह एक कांटेदार पौधा होता है, जिस पर पीले रंग के फूल होते हैं। सत्यानाशी पंचांग के रस में हल्का नमक डालकर सेवन करने से स्किन संबंधी रोगों में लाभ होता है। इसके लिए आपको रोजाना सत्यानाशी पंचांग के रस का 1 या 2 चम्मच सेवन करना होगा। दाद का इलाज (ringworm treatment)एंटीफंगल गुणों से भरपूर सत्यानाशी का पौधा दाद के इलाज में भी फायदेमंद साबित होता है। सत्यानाशी की पत्तियों का रस या तेल को दाद वाली जगह पर लगाने से दाद के लक्षण धीरे धीरे हल्के होने लगते हैं और इसका इंफेक्शन फैलना भी बंद हो जाता है। खुजली के लिए सत्यानाशी का उपयोग (uses of Prickly Poppy for itching)खुजली की समस्या में इंसान परेशान हो जाता है, ज्यादा खुजली के कारण स्किन पर रैशेज भी आ जाते हैं और कई बार खून भी निकलने लगता है। फोड़े, फुंसी, खुजली और जलन के लिए सत्यानाशी फायदा करता है। इसके लिए आप सत्यानाशी पंचांग का रस या पीला दूध लगाएं। इसे लगाने से आपको खुजली से राहत मिलेगी।

युवाओं में अब इस बीमारी का खतरा, लगातार हो रहे शिकार.

The danger of this illness is now looming over the youth, becoming a continuous threat. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एकाकीपन को गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य खतरा घोषित किया है। जिसकी मृत्यु दर प्रतिदिन 15 सिगरेट पीने के बराबर है। आंकड़ों के अनुसार विश्व में 5 से 15 प्रतिशत किशोर अकेले हैं। बुजुर्गों में होने वाली एकाकीपन की समस्या ने अब युवाओं को भी अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। कोविड के बाद इन आंकड़ों में वृद्धि हुई है। बुजुर्गों में होने वाली एकाकीपन की समस्या ने अब युवाओं को भी अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। कोविड के बाद इन आंकड़ों में वृद्धि हुई है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनोचिकित्सक केंद्र में रोजाना टेलीमानस पर 20 से 40 युवाओं के कॉल आ रहे हैं, जो एकाकीपन का शिकार है। इसमें ज्यादातर आईआईटी, नीट और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले व घर से दूर रहने वाले युवा शामिल है। वहीं बुजुर्गों की ओपीडी में हर सप्ताह 30 मरीज आ रहे हैं। जिनमें 8 से 10 केस एकाकीपन से जुड़े हैं। एंग्जाइटी, डिप्रेशन और तनावमनोचिकित्सक डॉ. ललित बत्रा बताते हैं कि इंसान भावनाओं को शब्दों के जरिए अभिव्यक्त करता है। परिवार में उसकी यह जरूरतें पूरी हो जाती है। अकेलेपन से एंग्जाइटी, डिप्रेशन, तनाव जैसी समस्याएं पनपने लगती है। स्कूल-कॉलेज में बच्चों के बीच एक समूह बने, जिसमें वे अपने मन की बात साझा कर सकें। ये हैं दूर करने के उपायदिनचर्या को ठीक रखने का प्रयास करें।सोने और उठने का समय निर्धारित करें।मेडिटेशन और योगा करें।स्वयं को सामाजिक संवाद में शामिल करें।दोस्तों और परिजनों के साथ समय बिताए और मन की बात साझा करें।

हमारे पास डॉक्टरों की कमी है. भारत में प्रति 1000 जनसंख्या पर एक डॉक्टर है, विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना सबसे जरूरी – नीति आयोग के सदस्य विनोद के. पॉल.

We have a shortage of doctors. In India, there is one doctor per 1000 population, and it is crucial to increase the number of specialist doctors – says NITI Aayog member Vinod K. Paul. Manish Trivedi – Sahara Samachaar नई दिल्ली: नीति आयोग के सदस्य विनोद के. पॉल ने दिल्ली स्थित राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) के स्थापना दिवस समारोह को बीते गुरुवार (30 नवंबर) को संबोधित करते हुए कहा कि लोगों की पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल के लिए देश में एमबीबीएस और विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना सबसे जरूरी है. पॉल ने कहा, ‘हमारे पास डॉक्टरों की कमी है. भारत में प्रति 1000 जनसंख्या पर एक डॉक्टर है, अगर हम आयुष चिकित्सकों को जोड़ दें तो 1.3 डॉक्टर हैं, जबकि विकसित देशों में समान जनसंख्या के लिए तीन डॉक्टर हैं.’ ‘विशेषज्ञों की आवश्यकता और भी अधिक है.’ देश में विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने के लिए डीएनबी (डिप्लोमैट ऑफ नेशनल बोर्ड) पाठ्यक्रम और जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम (डीआरपी) का उपयोग किया जाना चाहिए. डीआरपी के तहत एक-चौथाई उम्मीदवारों को बेहतर शिक्षा और मरीजों की सेवा के लिए जिला अस्पतालों में तैनात किया जाता है. उत्तर प्रदेश में डीआरपी इस साल की शुरुआत में शुरू की गई है और सभी मेडिकल कॉलेजों के 768 उम्मीदवारों को तीन महीने की अवधि के लिए जिला अस्पतालों में तैनात किया गया है. एमबीबीएस छात्रों को पीजी पाठ्यक्रमों में सीट पाने के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पीजी सीटों की संख्या बढ़ गई है और अधिक सीटें जोड़ने पर काम चल रहा है. अगर डीपीआर ठीक से लागू किया गया तो प्रत्येक जिला अस्पताल में 5 से 10 पीजी छात्र होंगे.’ ‘देश में 68,000 से अधिक पीजी मेडिकल सीटें हैं और अगर एक-चौथाई अस्पतालों में हैं तो इससे मरीजों की सेवा में सुधार करने में मदद मिलेगी और उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ेगी, क्योंकि कॉलेज अतिरिक्त छात्रों को ले सकते हैं.’ ‘देश में पीजी सीटें 32,000 से बढ़कर 63,000 से अधिक हो गई हैं और यूजी मेडिकल सीटें 52,000 से बढ़कर 1.8 लाख हो गई हैं. चुनौती देश में विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने की है.’ कार्यक्रम में शामिल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक और भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा, ‘अनुसंधान केवल कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं होना चाहिए. सभी संस्थानों को इसमें भाग लेना चाहिए.’ डॉ. बहल ने कहा, ‘इस साल आईसीएमआर ने 203 विभिन्न संस्थानों को 600 अनुदान दिए और उनमें से कई को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के रूप में नहीं जाना जाता था.’ समारोह में प्रमुख सचिव, चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य, पार्थ सारथी सेन शर्मा और आरएमएलआईएमएस निदेशक प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद भी उपस्थित थे.

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