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गाजा पर इजरायल का कदम, ट्रंप की मीटिंग में पाकिस्तान समेत 8 मुस्लिम देश रहेंगे मौजूद

गाजा  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चौंकाने वाले फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने गाजा के मसले पर बोर्ड ऑफ पीस का गठन किया है और इसकी पहली मीटिंग 19 फरवरी को होने वाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति का कहना है कि इस बैठक में चर्चा होगी कि कैसे गाजा में विकास के काम दोबारा शुरू किए जाएं और वहां जंग समाप्त हो। इस बोर्ड में इजरायल भी सदस्य है, लेकिन उसे ही इसमें झटका भी लगता दिख रहा है। मामला यह है कि वह पाकिस्तान को कभी भी तवज्जो नहीं देना चाहता, लेकिन इस बोर्ड में डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ भी शामिल होंगे। यही नहीं तुर्की भी इसमें शामिल रहेगा, जो फिलिस्तीन के मसले पर खुलकर इजरायल का विरोधी रहा है। ऐसी स्थिति में यदि गाजा के भविष्य को लेकर बन रहे किसी प्लान में यदि शहबाज शरीफ शामिल होंगे तो यह इजरायल के लिए चिंता की बात होगी। वह पहले भी कह चुका है कि हम पाकिस्तान को शामिल नहीं करना चाहते। फिर भी उसकी एंट्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए चिंता की बात है। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ 18 फरवरी को ही वॉशिंगटन पहुंच जाएंगे और 19 को होने वाले समिट में हिस्सा लेंगे। यह आयोजन यूएस इंस्टिट्यूट ऑफ पीस में होना है। इस बैठक में चर्चा होगी कि कैसे गाजा में जंग के बाद पुनर्निर्माण शुरू किया जाए। इस बैठक में कई देशों के नेता और कुछ अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट और हस्तियां भी इसमें रहेंगी। इस मीटिंग में पाकिस्तान और तुर्की समेत कुल 8 मुसलमान देश शामिल होंगे। इनमें सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, कतर और यूएई हैं। दरअसल इजरायल की चिंता यह है कि मीटिंग में शामिल सभी मुसलमान देश एकजुट होकर कोई स्टैंड ले सकते हैं। खासतौर पर सीजफायर के उल्लंघन को लेकर इजरायल पर कठिन शर्तें थोपे जाने का खतरा है। इसके अलावा कुछ गारंटी भी उससे ली जा सकती है। मुसलमान देशों का कहना है कि गाजा में पुनर्निर्माण और शांति तभी संभव है, जब इजरायल के ऐक्शन पर कुछ लगाम लग सके। 22 देशों को अमेरिका की ओर से मिला था न्योता अमेरिका की ओर से कुल 22 देशों को बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया गया है। इनमें से ज्यादातर ने सहमति जताई है, लेकिन फ्रांस जैसे उसके मित्र देश ही दूरी बना रहे हैं। इसके अलावा भारत ने भी फिलहाल देखो और इंतजार करो की नीति अपना ली है। अब तक भारत की ओर से इसमें हिस्सा लेने की पुष्टि नहीं की गई है। माना जा रहा है कि भारत नहीं चाहता कि वह ऐसे किसी प्रयास में आगे दिखे, जिसे भविष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

CJI सूर्यकांत ने कहा: “चुनाव आते ही परेशानी होती है…” हिमंत सरमा पर याचिका पर टिप्पणी

नई दिल्ली असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के भाषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई। इसपर भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि कई बार राजनीतिक जंग सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जाती है। उन्होंने इस याचिका पर विचार करने की बात कही है। विपक्ष ने सरमा के अल्पसंख्यकों पर निशाना लगाते वीडियो और भाषण पर आपत्ति जताई थी। शीर्ष न्यायालय याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। शीर्ष न्यायालय में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच सुनवाई कर रही थी। सीजेआई ने कहा, ‘परेशानी यह है कि जब चुनाव आते हैं, जो कई बार उन्हें यहां सुप्रीम कोर्ट में लड़ा जाता है। हम इसे देखेंगे।’ अदालत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया नेता एनी राजा की तरफ से याचिका दाखिल की गई थी। उन्होंने सीएम सरमा के 27 जनवरी को दिए भाषण पर आपत्ति जताई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत पहुंचे एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा, ‘मीलॉर्ड राजनीतिक दल के सदस्य की तरफ से हेट स्पीच के खिलाफ एक याचिका दाखिल हुई है। एक वीडियो भी है, जिसमें मुख्यमंत्री अल्पसंख्यकों पर निशाना लगाते नजर आ रहे हैं।’ पीठ ने वकील निजाम पाशा की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए कहा कि वह याचिका को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगी। पाशा वाम दलों के कुछ नेताओं की ओर से पेश हुए थे। उन्होंने पीठ के समक्ष कहा, ‘हम इस अदालत से असम के मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए चिंताजनक बयानों और हाल में पोस्ट किए एक वीडियो को लेकर तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध करते हैं। इस संबंध में शिकायतें दर्ज कराई गई हैं, लेकिन अब तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।’ जमीयत भी पहुंची थी सुप्रीम कोर्ट जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सरमा के भाषण के खिलाफ 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा कि विशेष रूप से उच्च संवैधानिक पद पर आसीन किसी व्यक्ति की तरफ से दिए गए इस तरह के बयानों को राजनीतिक बयानबाजी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाषण में क्या था सरमा ने 27 जनवरी को डिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि ‘मिया’ समुदाय के लोगों को राज्य में मतदान करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से ‘मिया’ मतदाताओं के नाम हटाना केवल एक प्रारंभिक कदम है, और जब बाद में राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) किया जाएगा, तो बांग्लादेश के मुसलमानों के चार से पांच लाख वोट रद्द कर दिए जाएंगे। उन्होंने कहा था, ‘हां, हम मिया समुदाय के वोट चुराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें हमारे देश में नहीं, बल्कि बांग्लादेश में वोट देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था कर रहे हैं कि वे असम में वोट न दे सकें।’ उन्होंने कहा था, ‘अगर मिया समुदाय को इस संबंध में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, तो हमें क्यों चिंतित होना चाहिए?’

नेपाल में महसूस किए गए भूकंप के झटके, प्रशासन मुस्तैद

ताप्लेजंग, नेपाल पूर्वी नेपाल के ताप्लेजंग जिले में मंगलवार तड़के चार तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। राष्ट्रीय भूकंप निगरानी एवं अनुसंधान केंद्र (NEMRC) के अनुसार, भूकंप मंगलवार सुबह 2 बजकर 47 मिनट पर आया।भूकंप का केंद्र ताप्लेजंग जिले के कंचनजंगा क्षेत्र में स्थित था। झटकों के बाद स्थानीय लोगों में कुछ देर के लिए दहशत फैल गई और कई लोग घरों से बाहर निकल आए। अधिकारियों के मुताबिक, भूकंप के झटके ताप्लेजंग के अलावा पूर्वी नेपाल के अन्य जिलों में भी महसूस किए गए। हालांकि, अब तक किसी भी तरह के जानमाल के नुकसान या संपत्ति क्षति की कोई सूचना नहीं मिली है। प्रशासन ने स्थिति पर नजर बनाए रखने की बात कही है और स्थानीय प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। नेपाल भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है, जहां समय-समय पर इस तरह की गतिविधियां दर्ज की जाती रही हैं।

एपस्टीन की पार्टी में मस्क और जकरबर्ग की उपस्थिति का खुलासा, वायरल हुई तस्वीर

वाशिंगटन  जेफरी एपस्टीन मामले में हर दिन कोई ना कोई नया खुलासा हो रहा है. एक नई फोटो सामने आई है, जिसमें जेफरी एपस्टीन की लैविश डिनर पार्टी में एलॉन मस्क और मार्क जकरबर्ग नजर आए हैं. ये तस्वीर उस वक्त की है, जब जेफरी एपस्टीन यौन अपराध में दोषी साबित हो चुका था. यानी मस्क और मार्क ये जानते हुए पार्टी में शामिल हुए थे कि जेफरी किस तरह के काम में शामिल था. एपस्टीन ने बाद में दावा किया था कि इस पार्टी में LinkedIn को-फाउंडर रीड हॉफमैन और PayPal को-फाउंडर पीटर थिएल भी शामिल हुए थे. एक अन्य मेल में इस पार्टी को ‘वाइल्ड’ बताया गया था.  सामने आई तस्वीर में मस्क और जकरबर्ग एक साथ टेबल पर बैठे दिख रहे हैं. टेस्ला और SpaceX के CEO एलॉन मस्क कैमरा पर्सन की ओर देख रहे हैं, जो संभवतः एपस्टीन ने ही क्लिक की हो. वहीं तस्वीर में जकरबर्ग भी हैं, जो थोड़े सीरियस दिख रहे हैं.  मस्क ने क्या किया था दावा? जेफरी ने ये तस्वीर खुद को ही 3 अगस्त 2015 को भेजी थी. इस तस्वीर के आने के बाद इसलिए भी हंगामा मचा है क्योंकि मस्क ने दावा किया था कि वो कभी-भी जेफरी एपस्टीन की पार्टियों का हिस्सा नहीं रहे हैं. इतना ही नहीं मस्क ने जेफरी के साथ क्राइम करने वालों पर भी मुकदमा चलाने की बात कही थी.  मस्क ने इस बारे में 31 जनवरी को ट्वीट किया था. एपस्टीन की पार्टियों में सिर्फ एलॉन मस्क या मार्क जकरबर्ग नहीं बल्कि कई दूसरे बड़े चेहरे भी दिख चुके हैं. यहां तक की माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स भी इन पार्टियों का हिस्सा थे और उन्होंने शादी से बाहर भी लड़कियों से संबंध बनाया था. बिल गेट्स का नाम भी आया है सामने एपस्टीन फाइल्स की मानें तो बिल गेट्स रूसी लड़कियों से मिले थे. इसमें STD का जिक्र भी मिलता है. एक नोट में लिखा है कि एपस्टीन ने गेट्स के लिए दवाओं का इंतजाम किया था, जिससे उन्हें संबंध बनाने के बाद होने किसी बीमारी का सामना ना करना पड़े.  गेट्स के अलावा गूगल के को-फाउंडर सर्गेई ब्रिन का नाम भी एपस्टीन फाइल्स में सामने आया है. डॉक्यूमेंट्स की मानें तो ब्रिन ने एपस्टीन के प्राइवेट आईलैंड का दौरा किया था, जहां उन्होंने घिसलेन मैक्सवेल से मुलाकात की थी. 2003 में भेजे एक ईमेल में मैक्सवेल ने डिनर को सामान्य और आरामदायक बताया था.

राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव पर साइन नहीं किया, कांग्रेस ने बताई वजह

 नई दिल्ली विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है. अब विपक्षी ने लोकसभा सेक्रेटरी जनरल को बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सौंप दिया है. इसमें कांग्रेस, DMK, समाजवादी पार्टी जैसे दलों के करीब 120 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने के नोटिस पर साइन किए हैं. लोकसभा के महासचिव को सौंपे गए नोटिस के बाद ओम बिरला ने खुद को सदन की कार्यवाही के संचालन से अलग कर लिया है और मंगलवार को वह सदन की कार्यवाही का संचालन करने आसन पर नहीं आए. अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किया है. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को देखते हुए विपक्ष के नेता के द्वारा स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर करना ठीक नहीं है. विपक्ष ने मंगलवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया. बिरला ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर सदन में राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं को बोलने से रोका था. विपक्ष ने नोटिस में कहा है कि सदन में स्पीकर की टिप्पणी से कांग्रेस सदस्यों पर साफ़ तौर पर झूठे आरोप लगे. अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर से TMC का इनकार संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में लगातार गतिरोध देखने को मिल रहा है. विपक्ष का आरोप है कि राहुल गांधी को लोकसभा में बोलने नहीं दिया जा रहा है. इसके चलते कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां लोकसभा स्‍पीकर ओम बिरला से बेहद नाराज हैं. यही कारण है कि विपक्षी पार्टियां उनके खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने जा रही है. हालांकि इस बार विपक्ष बंटा हुआ नजर आ रहा है. विपक्ष की सबसे प्रमुख पार्टियों में से एक तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा अध्‍यक्ष के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर हस्‍ताक्षर नहीं किए हैं. तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि ब्रह्मास्‍त्र का इस्‍तेमाल पहले क्‍यों किया जाए.  लोकसभा अध्‍यक्ष के खिलाफ जब पूरा विपक्ष एकजुट नजर आ रहा है, तृणमूल कांग्रेस ने अलग रुख अपनाया है. टीएमसी ने स्‍पीकर के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर हस्‍ताक्षर नहीं किए हैं. इसे लेकर टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने सफाई दी है. स्‍पीकर को साझा चिट्ठी लिखनी चाहिए थी: बनर्जी  उन्‍होंने एनडीटीवी से कहा कि हमारी राय में पहले विपक्ष को अपनी मांगों को लेकर स्पीकर को एक साझा चिट्ठी लिखनी चाहिए थी और तीन दिनों का समय देना चाहिए था.  पहले ही ब्रह्मास्‍त्र का इस्‍तेमाल क्‍यों करें: बनर्जी  उन्‍होंने कहा कि अगर कोई कार्रवाई नहीं होती तो फिर तीन दिन बाद अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देना चाहिए था, तब टीएमसी भी इसमें साथ देती. उन्‍होंने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव आखिरी कदम है, पहले ही ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल क्यों करें. अभिषेक बनर्जी चाहे कोई भी तर्क दें, लेकिन इससे संदेश ठीक नहीं है. जानकार कहते हैं कि विपक्षी एकता की बात करने वाले इंडिया गठबंधन के दलों के बीच इस तरह की स्थिति बताती है कि ऐसे मतभेद सामूहिक प्रयासों को ही कमजोर करते हैं.  विपक्ष क्यों लेकर आई अविश्वास प्रस्ताव विपक्षी नेताओं का आरोप है कि स्पीकर सदन में पक्षपाती रवैया अपनाते हैं। विपक्ष की आवाज को दबाया जाता है। प्रियंका गांधी ने कहा कि स्पीकर साहब का खुद निरादर किया गया है। स्पीकर साहब पर दबाव है कि उनको खुद बयान देना पड़ रहा है जो सही नहीं है। सवाल ही नहीं उठता कि पीएम पर कोई हमला करे। सरकार द्वारा उन पर दबाव डाला गया है इसलिए उन्होंने ये कहा है क्योंकि उस दिन पीएम मोदी की हिम्मत नहीं हुई सदन में आने की। इसलिए स्पीकर सफाई दे रहे हैं, ये गलत बात है। ‘बहुत ही जरूरी कदम…’ कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर बी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “विपक्ष ने संवैधानिक मर्यादा में अपना भरोसा रखा है. माननीय स्पीकर का पर्सनल सम्मान करते हुए भी, हम विपक्षी MPs को पब्लिक इंपॉर्टेंस के मुद्दे उठाने का मौका लगातार न देने से दुखी और परेशान हैं. कई सालों के बाद, स्पीकर के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस नोटिस दिया गया है. यह एक बहुत ही जरूरी कदम है.”

बांग्लादेश प्रधानमंत्री चुनाव से पहले सर्वे का खुलासा: भारत विरोधी जमात की हालत और भविष्य

ढाका  बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले माहौल काफी गर्म हैं। इस बार बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतें भी चुनाव में पूरा जोर लगा रही हैं। वहीं अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की आवामी लीग को बैन कर दिया गया है। अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस की अगुआई में अंतरिम सरकार चल रही है। वहीं अब उम्मीद है कि बांग्लादेश को पूर्णकालिक प्रधानमंत्री मिल जाएगा। किसके बीच है मुकाबला इस बार बांग्लादेश में मुख्य मुकाबला पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की अगुआई वाली बीएनपी और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच है। जमात-ए-इस्लामी का प्रमुख मुद्दा ही अल्पसंख्यकों और भारत के विरोध में रहता है। वहीं बीएनपी का अजेंडा भी भारत के समर्थन में कभी नहीं रहा है। क्या कहता है चुनाव पूर्व का सर्वे बांग्लादेश के अखबार प्रथोमोलो ने इस चुनाव को लेकर सर्वे करवाया है। इसके मुताबिक बीएनपी को 200 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं और तारिक रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री हो सकते हैं। तारिक रहमान लंबे समय के बाद ब्रिटेन से बांग्लादेश लौटे है। सर्वे के मुताबिक बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी (BNP) पूर्ण बहुतम मिल सकता है। वहीं भारत विरोधी जमात की हालत बहुत अच्छी नहीं है। हालांकि वह विपक्ष की भूमिका अदा कर सकता है। जमात-ए-इस्लामी शफीकुर्रहमान के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहा है। सर्वे में बताया गया है कि बीएनपी 200 से ज्यादा सीटें जीत सकती है वहीं, जमात-ए-इस्लामी 50 के आसपास सीटें जीत सकता है। बांग्लादेश की जातीय पार्टी के खाते में 3 सीटें जा सकती हैं। बाकी सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में जाने का अनुमान है। बता दें कि बांग्लादेश की संसद निर्वाचिन के लिए कुल सीटों की संख्या 350 है। 300 सदस्यों को जनता चुनती है और 50 सदस्यों का सीधा निर्वाचन होता है। भारत की तरह बांग्लादेश में भी सांसदों का कार्यकाल पांच साल का होता है। बांग्लादेश में बनेगी किसकी सरकार? सर्वे ने किया इशारा बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव के लिए चुनाव प्रचार थम चुका है. इसके बाद अब कोई भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार प्रचार नहीं कर सकेगा. मतदान संसद की कुल 300 में से 299 सीटों पर होगा. एक सीट पर चुनाव नहीं हो रहा है. इसके साथ ही मतदाता जुलाई चार्टर पर एक जनमत संग्रह में भी हिस्सा लेंगे. इस चुनाव के लिए भारत ने कोई चुनाव पर्यवेक्षक नहीं भेजा है. वहीं अवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई है, जिसका विरोध शेख हसीना कर रही हैं. बांग्लादेश में चुनाव प्रचार 22 जनवरी से शुरू हुआ था. इस दौरान 299 सीटों के लिए 1,981 उम्मीदवार मैदान में हैं और करीब 12.7 करोड़ पंजीकृत मतदाता वोट डालेंगे. चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से दो बड़े गठबंधनों के बीच माना जा रहा है. एक तरफ तारिक रहमान के नेतृत्व वाला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) गठबंधन है, जिसे 33 से 35 फीसदी समर्थन अकेले ही मिलने का अनुमान है. दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन है, जिसे 30 से 34 फीसदी समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है. सबसे बुरी खबर तो जमात-ए-इस्लामी के लिए है. निकल गई जमात-ए-इस्लामी की अकड़ अन्य सर्वे क्या कहते हैं? हालांकि एक अन्य सर्वे में मुकाबला काफी करीबी बताया गया है. इस सर्वे के मुताबिक बीएनपी गठबंधन को 44.1 फीसदी और जमात गठबंधन को 43.9 फीसदी वोट मिल सकते हैं. इसमें कहा गया है कि जमात गठबंधन 105 सीटों और बीएनपी गठबंधन 101 सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है. चुनाव के नतीजे 13 फरवरी को घोषित किए जाएंगे. चुनाव के साथ ही जनमत संग्रह भी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने अपने देश के लोगों से 12 फरवरी को आम चुनावों के साथ-साथ होने वाले जनमत संग्रह में ‘हां’ में वोट देने और उनके प्रस्तावित सुधार पैकेज का समर्थन करने की जोरदार अपील की। यूनुस ने सोमवार देर रात वरिष्ठ सचिवों और शीर्ष नौकरशाहों को संबोधित करते हुए कहा, ”यदि जनमत संग्रह के दौरान ‘हां’ में अधिक वोट मिलते हैं तो बांग्लादेश के भविष्य का निर्माण अधिक सकारात्मक तरीके से होगा।” यूनुस ने कहा कि जनमत संग्रह के दौरान यदि लोग ‘हां’ में वोट करते है तो इससे ”कुशासन” दूर करने में मदद मिलेगी। यूनुस का प्रशासन जटिल 84-सूत्रीय सुधार पैकेज को लेकर जनता का समर्थन हासिल करने के लिए पिछले कई हफ्तों से सक्रिय अभियान चला रहा है।

बड़ी डील: US ने बांग्लादेश से किया समझौता, ट्रंप ने घटाए टैरिफ और यूनुस को किया सलाम

ढाका  भारत के बाद अमेरिका ने बांग्लादेश से भी डील कर ली है। खबर है कि अमेरिका सरकार ने बांग्लादेश पर लगाए टैरिफ को कम किया है। साथ ही कुछ कपड़ा उत्पादों पर शुल्क शून्य करने का भी फैसला किया है। खास बात है कि यह डील ऐसे समय पर हुई है, जब खबरें थीं कि अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस डील जल्द ही अमेरिका के साथ सीक्रेट डील करने वाले हैं। अमेरिका ने बांग्लादेश पर लगाए 20 फीसदी टैरिफ को घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही कुछ ऐसे कपड़ों पर जवाबी टैरिफ शून्य कर दिया है, जिन्हें बनाने का सामान अमेरिका से आयात किया जाता है। सोमवार को दोनों देशों के बीच एक द्विपक्षीय समझौता हुआ। दोनों देशों की तरफ से औपचारिक अधिसूचना जारी किए जाने के बाद यह समझौता प्रभाव में आ जाएगा। खबर है कि बांग्लादेश की तरफ से कॉमर्स एडवाइजर शेख बशीरुद्दीन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलील उर रहमान की तरफ से दस्तखत किए गए। जबकि, अमेरिकी पक्ष की तरफ से राजदूत जेमीसन ग्रीर मौजूद रहे। ग्रीर ने इस समझौते के लिए यूनुस और उनकी वार्ताकार टीम की तारीफ भी की है। उन्होंने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी व्यापार नीति में बांग्लादेश की स्थिति को मजबूत करेगा। गारमेंट सेक्टर को बड़ी राहत दरअसल, गारमेंट सेक्टर बांग्लादेशी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। बांग्लादेश को निर्यात से करीब 80 प्रतिशत आय इसी से होती है। इसमें 40 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं और इनमें मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि कम टैरिफ रेट बांग्लादेशी निर्माताओं को अमेरिका बाजार में टिके रहने का मौका देंगे। पहले कितना था टैरिफ बीते साल अप्रैल में अमेरिका ने जवाबी शुल्क का ऐलान किया था। उस दौरान बांग्लादेश पर 37 फीसदी टैरिफ लगाया गया था। बाद में अगस्त में इसे घटाकर 20 प्रतिशत किया गया था। अब ताजा समझौते के बाद यह घटकर 19 फीसदी पर आ गया है।

CJI सूर्यकांत का गंभीर बयान, 54 हजार करोड़ रुपये के गबन पर इन बैंकों की स्थिति पर उठाया सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये 54 हजार करोड़ रुपये के गबन को पूरी तरह से लूट और डकैती करार दिया। सोमवार को केंद्र सरकार को ऐसे मामलों से निपटने के लिए आरबीआई, बैंकों और दूरसंचार विभाग जैसे हितधारकों के साथ चर्चा करके मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया। न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट मामलों से जुड़े ‘खतरे’ पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि साइबर धोखाधड़ी को रोकने में बैंकों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे उन खातों में असामान्य और बड़े पैमाने का लेनदेन होने पर ग्राहकों को सतर्क करें, जिनका आम तौर पर छोटे लेनदेन के लिए उपयोग किया जाता है। पीठ ने कहा कि यदि 10,000 या 20,000 रुपये की राशि निकालने वाला कोई सेवानिवृत्त व्यक्ति अचानक बहुत बड़ी रकम निकालता है, तो बैंक को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए। कई राज्यों के बजट से ज्यादा धोखाधड़ी की धनराशि पीठ ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये गबन की गई धनराशि कई छोटे राज्यों के बजट से अधिक है। अदालत ने कहा कि इस तरह के अपराध बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या उनकी लापरवाही के कारण हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने आरबीआई और बैंकों की ओर से समय पर कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। CBI को किया शामिल अदालत ने सीबीआई को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों की पहचान करने का निर्देश दिया और गुजरात तथा दिल्ली की सरकार से कहा कि वे इन मामलों में जांच के लिए सीबीआई को आवश्यक स्वीकृति प्रदान करें। शीर्ष अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के शिकार लोगों को मुआवजा देने के मामलों में एक व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। अदालत ने याचिका को चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। SOP तैयार सुनवाई की शुरुआत में, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने पीठ को बताया कि आरबीआई ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए बैंकों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का मसौदा तैयार किया है, जिसमें साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए खातों पर अस्थायी डेबिट होल्ड लगाए जाने जैसी कार्रवाई समेत कई प्रावधान हैं। अदालत ने कई नए निर्देश जारी करते हुए गृह मंत्रालय से कहा कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर विचार करे और देशभर में लागू करने के लिए निर्देश जारी करे। AI के इस्तेमाल की सिफारिश न्यायमित्र के तौर पर पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने कहा कि बैंकों को संदिग्ध लेनदेन के बारे में ग्राहकों के लिए अलर्ट जारी करने के निर्देश दिए जाने चाहिए और इसके लिए AI उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है। क्या बोला सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा, ‘यदि करोड़ों रुपये का लेनदेन करने वाली कोई कारोबारी संस्था है, तो उस पर संदेह नहीं हो सकता। लेकिन यदि आमतौर पर 15,000 से 20,000 रुपये निकालने वाले पेंशनभोगी के खाते से अचानक 50 लाख, 70 लाख या एक करोड़ रुपये निकाले जा रहे हैं, तो बैंक के एआई से चलने वाले उपकरणों ने इसे संदिग्ध मानकर उसे अलर्ट क्यों नहीं किया?’ अटॉर्नी जनरल ने कहा कि RBI इस मुद्दे पर विचार करेगा। बैंकों पर भड़की अदालत इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ‘समस्या यह है कि बैंक ज्यादातर व्यवसायिक मोड में काम कर रहे हैं, और यह स्वाभाविक भी है। लेकिन ऐसा करते हुए वे या तो अनजाने में या मिलीभगत से ऐसे मंच बनते जा रहे हैं, जिनके जरिये अपराध से अर्जित धन का तेज और निर्बाध लेनदेन हो रहा है।’ न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में ही यह दर्शाया गया है कि अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर धोखाधड़ी के जरिये 52,000 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की गई है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘ये बैंक अब एक बोझ बनते जा रहे हैं। बैंकों को यह समझना चाहिए कि वे धन के रखवाले हैं और उन्हें इसके प्रति अति-उत्साहित नहीं होना चाहिए। उस भरोसे को नहीं तोड़ा जाना चाहिए। समस्या यह है कि ये बैंक ऐसे धोखेबाज़ों को ऋण भी देते हैं और फिर एनसीएलटी, एनसीएलएटी जैसी संस्थाएं सामने आती हैं, जब धोखाधड़ी करने वाली कंपनियां दिवालिया कार्यवाहियों में उलझ जाती हैं।’ यह टिप्पणी उस समय की गई जब अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि आरबीआई द्वारा लागू किए गए उपायों के दौरान ‘म्यूल’ बैंक खातों का पता चला है। डिजिटल अरेस्ट पर पहले से अलर्ट सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 16 दिसंबर को केंद्र सरकार से कहा था कि वह डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करने के संबंध में न्यायमित्र के सुझावों पर विचार करे। साथ ही उसने साइबर अपराधियों द्वारा देश से बाहर ले जाई जा रही भारी धनराशि पर चिंता भी जताई थी। ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध का एक बढ़ता हुआ स्वरूप है, जिसमें ठग कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अदालतों या सरकारी विभागों के अधिकारियों के रूप में खुद को प्रस्तुत करके ऑडियो और वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं। वे पीड़ितों को उलझाकर रखते हैं और उन पर पैसे देने का दबाव डालते हैं। एक दिसंबर को शीर्ष अदालत ने सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट मामलों की एकीकृत, देशव्यापी जांच करने का निर्देश दिया था और आरबीआई से यह भी पूछा था कि वह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बैंक खातों का पता लगाने और उन्हें ‘फ्रीज़’ करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है।

बांग्लादेश चुनाव में विवाद: ‘प्रो-इंडिया’ BNP और ‘अमेरिकी’ जमात के बीच खिंची जंग

ढाका     बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होना है. इस बीच राजनीति का माहौल गरम है. लोग रोज नई बातें सुनते हैं. खासकर यह कि किस पर किस देश का असर है. काफी बार कहा जा रहा है कि BNP और जमात-ए-इस्लामी विदेशी ताकतों से जुड़े हैं. कुछ लोग इसे सच मानते हैं. कुछ इसे दुष्प्रचार कहते हैं. लेकिन असल बात क्या है, इसे समझना जरूरी है. बांग्लादेश में आम तौर पर लोकल मुद्दे जबकि चुनाव का मुख्य विषय होना चाहिए. जैसे रोजगार, महंगाई और नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियां. लेकिन इस बार चीजें थोड़ी अलग हैं. चुनाव भले लोकल है, लेकिन दूसरे देशों के नाम जमकर उछाले जा रहे हैं. खासकर भारत और अमेरिका. पता लगाया जा रहा है कि कौन किसके साथ है. भारत और अमेरिका का पहले भी बांग्लादेश के चुनाव से रिश्ता रहा है. लेकिन इस बार तो पाकिस्तान और तुर्की का नाम भी उठ रहा है. प्रो अमेरिका जमात सबसे पहले बात जमात-ए-इस्लामी की. जमात पर यह आरोप तब उठे जब वॉशिंगटन पोस्ट अखबार में यह खबर छपी कि अमेरिका के कुछ राजनयिक मानते हैं कि जमात इस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. यह रिपोर्ट कहती थी कि शायद अमेरिका जमात के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करना चाहता है. यह भी इशारा किया गया था कि अमेरिका जमात को दोस्त मान सकता है. बाद में इस रिपोर्ट को लेकर बहस शुरू हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि अमेरिका सीधे जमात को सपोर्ट कर रहा है. यह बात जल्दी ही आग की तरह फैल गई. सोशल मीडिया पर कई पोस्ट वायरल हुईं. लोगों ने इसी को आधार बनाकर कह दिया कि जमात अब अमेरिकी पार्टी बन चुकी है. जमात-ए-इस्लामी की तरफ से इसका जवाब भी आया. पार्टी के लोग कहते हैं कि किसी भी विदेशी देश से उनकी कोई सीधी दोस्ती या गठजोड़ नहीं है. उन्होंने कहा कि एक अखबार की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं. उनका कहना है कि उनके पास किसी भी तरह का आधिकारिक अमेरिकी समर्थन नहीं है. क्या हुआ था कि कुछ बयानों में यह भी सुनने को मिला कि अमेरिका और जमात के नेता कुछ बातचीत कर रहे थे. जमात ने ब्रिटिश और अमेरिकी राजदूतों से मुलाकात की. मुलाकात के दौरान राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर बातें हुईं. इन बैठकों को कुछ लोगों ने बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया. इससे और अफवाहें पनपीं. BNP का भारत से गुप्त समझौता दूसरी तरफ BNP पर यह आरोप उभरने लगे कि वह प्रो-इंडिया पार्ट‍ी है. इसका आधार क्या है? इसके पीछे की कहानी थोड़ी अलग है. चुनाव शुरू होने से पहले कुछ नेताओं और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने यह दावा किया कि BNP भारत के साथ किसी गुप्त समझौते के जरिये सत्ता में आना चाहती है. ऐसा कहा गया कि BNP के बड़े नेताओं ने भारत के प्रतिनिधियों से प्राइवेट बैठक की है. इन आरोपों को फैलाने वाले लोग यह भी कहते हैं कि BNP का नेतृत्व भारत के दबाव में काम कर रहा है. यह बात सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और कुछ भाषणों में सुनी गई. लोग इसे बार-बार दोहरा रहे हैं. धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि BNP प्रो-इंडिया है. BNP ने एक आधिकारिक बयान में इन बातों को गलत बताया. पार्टी ने कहा कि भारत के साथ कोई शर्तों वाला समझौता नहीं हुआ है. कोई गुप्त डील नहीं है. BNP की नीति के बारे में पार्टी नेता बार-बार कहते रहे कि बांग्लादेश पहले है. उन्होंने यह साफ कहा कि वह किसी भी देश का एजेंडा नहीं अपनाएंगे. BNP का अध्यक्ष तारिक रहमान कई सभाओं में यही कहते दिखे कि राजनीति विदेशों के बारे में नहीं है. उनका कहना है कि देश की जनता ही तय करेगी कि कौन किसे चुनता है. वह कहते हैं कि दिल्ली या पिंडी या कोई और देश चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए. लेकिन इन आरोपों का असर चुनावी राजनीति में दिख रहा है. दोनों पक्ष अपने विरोधियों को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. किसी पार्टी को विदेशी समर्थक बताना आसान होता है. इससे विरोधी वोटरों को डराया जा सकता है. यह तरीका पुराना है. राजनीति में अक्सर विपक्ष को विदेशी ताकतों से जोड़कर देखा जाता है. वे लोग जो यह आरोप लगा रहे हैं, वे यह भी कहते हैं कि चुनाव संचालन में विदेशी तत्वों की मौजूदगी महसूस की जा रही है. वे दावा करते हैं कि वीडियो, इमेज और सोशल मीडिया सामग्री इस काम में मदद कर रहे हैं. कई बार ऐसी चीजें फैलती हैं जो असली नहीं होतीं. इनसे धारणा जल्दी बन जाती है. भारत-अमेरिका का है बांग्लादेश से पुराना याराना बांग्लादेश मीडिया प्रोथोम आलो के लिए पत्रकार मनोज डे लिखते हैं कि भारत और अमेरिका दोनों की बांग्लादेश में दिलचस्पी है. यह कोई गोपनीय बात नहीं. दोनों देश देख रहे हैं कि बांग्लादेश की राजनीति किस दिशा में जाए. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अब किसी पार्टी ने उनके एजेंडे को अपनाया है. कूटनीतिक संबंध और राजनीतिक गठबंधन में फर्क होता है. असल में यह चुनाव नैरेटिव की लड़ाई बन गया है. पार्टियां मुद्दों की बजाय नैरेटिव पर जोर दे रही हैं. कौन सा नेता किस देश के साथ है, यह चर्चा से हटकर एक बड़ा विषय बन गया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आरोपों के पीछे सच्चाई है या सिर्फ प्रचार का हिस्सा? इसका जवाब अभी साफ नहीं है. अंत में यह भी याद रखना होगा कि इन आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस सार्वजनिक सबूत सामने नहीं आया है. जमात के मामले में अमेरिकी समर्थन की कोई ऑफ़िशियल घोषणा नहीं हुई. BNP के प्रो-इंडिया होने का कोई लिखित समझौता नहीं दिखा. हर तरफ बातें हैं, दस्तावेज कम हैं. बांग्लादेश के चुनाव में जब वोट पड़ेगा, तब पता चलेगा कि जनता इन आवाजों को किस नजर से देखती है. तब यह साफ होगा कि लोग विदेशी आरोपों के आधार पर फैसला करते हैं या देश के अपने मुद्दों को अहमियत देते हैं.  

20 लाख बैरल की ‘Oil Deal’: भारतीय कंपनियों ने वेनेजुएला से खरीदी तेल, ट्रंप के कब्जे के बाद नया मोड़

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप का तेल वाला गेम प्लान (Donald Trump Oil Game) अब काम करता दिखने लगा है. बीते दिनों वेनेजुएला पर स्ट्राइक और राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने वहां के तेल के खजाने पर अपने कंट्रोल का दावा किया था और ट्रंप के कब्जे में आने के बाद Venezuelan Oil का सौदा भी शुरू हो गया. भारतीय तेल कंपनियों ने 20 लाख बैरल Oil Deal की है. रिपोर्ट की मानें, तो ये खरीद सिर्फ दो भारतीय सरकारी रिफाइनरियों ने की है और इनके पास ये तेल अप्रैल तक आ सकता है.  IOCL-HPCL ने खरीदा वेनेजुएला का तेल! अमेरिका का वेनेजुएला के तेल रिजर्व (Venezuela Oil Reserve) पर कंट्रोल होने के बाद अब 20 लाख बैरल तेल का सौदा किया गया है और ये डील भारत की सरकारी ऑयल कंपनियों ने की है. रॉयटर्स की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि अब भारतीय रिफाइनरियां Crude Oil की नई आपूर्ति के लिए वेनेजुएला की ओर रुख कर रही हैं, क्योंकि वे अपनी सोर्स स्ट्रेटजी को फिर से सेट कर रही हैं. इंडियन ऑयल कॉर्प (IOCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प (HPCL) ने संयुक्त रूप से अप्रैल में डिलीवरी के लिए 20 लाख बैरल मेरेय क्रूड खरीदा है.  क्रूड ऑयल के आयात में विविधिता रिपोर्ट के मुताबिक, Venezuelan Oil की ये खेप एक ही बड़े कच्चे तेल वाहक पोत (VLCC) पर भेजी जाएगी. इसमें इंडियन ऑयल कॉर्प करीब 15 लाख बैरल तेल, जबकि हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प लगभग 5 लाख बैरल तेल लेगी. इस खेप के भारत के पूर्वी तट पर अप्रैल में पहुंचने का समय निर्धारित है. सूत्रों की मानें, तो इसका विक्रेता कमोडिटी व्यापारी ट्रैफिगुरा है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियां गोपनीयता समझौतों के कारण स्पॉट टेंडरों पर आमतौर पर टिप्पणी नहीं करती हैं और ट्रैफिगुरा ने भी इस Oil Deal को लेकर टिप्पणी करने से इनकार किया है.  HPCL ने पहली बार खरीदा ये तेल रॉयटर्स द्वारा जुटाए गए आंकड़ों को देखें, तो देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी IOC ने इससे पहले भी साल 2024 में वेनेजुएला के तेल का प्रसंस्करण किया था. लेकिन एचपीसीएल के लिए यह वेनेजुएला के कच्चे तेल की पहली खरीद है. यह तेल समझौता भारतीय रिफाइनरों द्वारा कच्चे तेल के आयात (Crude Oil Import) में विविधता लाने के व्यापक प्रयास का संकेत देता है, क्योंकि रूसी तेल आपूर्ति पर निर्भरता की कमी का प्रयास किया जा रहा है. इसके साथ ही इसे अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए (India-US Trade Deal) भारत के कदम के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है. Reliance ने इस भाव पर की थी खरीद सूत्रों में से एक ने बताया कि मेरेय कार्गो का मूल्य दुबई बेंचमार्क के आधार पर तय किया गया है और यह उन दरों के समान है, जिन पर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने व्यापारी विटोल से वेनेजुएला का तेल खरीदा था. सूत्रों के मुताबिक, Reliance दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स का संचालन करती है, उसने अप्रैल डिलीवरी के लिए 20 लाख बैरल वेनेजुएला का कच्चा तेल ICE ब्रेंट की तुलना में लगभग 6.50-7 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर खरीदा था. इधर ट्रेड डील, उधर खरीदारी शुरू  पिछले महीने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने और अमेरिकी सैन्य अभियान के बाद वेनेजुएला के तेल पर कब्जा करने के बाद ट्रंप प्रशासन ने विटोल और ट्रैफिगुरा को वेनेजुएला का तेल बेचने के लिए अमेरिकी लाइसेंस दिए थे. भारतीय सरकारी रिफाइनरियों द्वारा यह खरीदारी ऐसे समय में हुई है, जबकि हाल ही में India-US Trade Deal पर सहमति बनी है और इसका आधिकारिक ऐलान होने वाला है. भारत और अमेरिका दोनों ही पक्षों ने Tariff Cut और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से ट्रेड डील के तहत एक फ्रेमवर्क की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य मार्च तक समझौते को अंतिम रूप देना है. हालांकि, फ्रेमवर्क को लेकर जारी संयुक्त बयान में रूसी तेल (Russian Oil) का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया था, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल खरीद पर भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए एक्स्ट्रा 25 फीसदी टैरिफ को रद्द करने का ऐलान किया था और कहा था कि भारत ने रूसी तेल का आयात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बंद करने के लिए सहमति जताई है.

अमित शाह का आज ऐलान: OTP, लिंक और कॉल धोखाधड़ी पर लगेगा ब्रेक, जानिए क्या होगा नया

नई दिल्ली  साइबर स्कैम और ठगी के ईकोसिस्टम को खत्म करने को लेकर एक राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत होने जा रही है. आज यानी 10 फरवरी 2026 को केंद्रीय केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे.  दो दिवसीय चलने वाले इस नेशनल इवेंट का नाम साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से निपटना और इसके इकोसिस्टम को ध्वस्त करना है. इस अवसर पर गृह मंत्री CBI अधिकारियों के समारोह की अध्यक्षता करेंगे. साथ ही गृह मंत्री नई साइबर क्राइम ब्रांच का उद्घाटन करेंगे. वे होम मिनिस्ट्री के अंतर्गत I4C के S4C डैशबोर्ड की भी शुरुआत करेंगे.  नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 2 दिन चलेगा कार्यक्रम यह दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस 10–11 फरवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में किया जाएगा. इस कॉन्फ्रेंस का आयोजन सेंट्रल ब्यूरो इनवेस्टीगेशन (CBI) कर रही है, जिसमें गृह मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) का सहयोग भी है. S4C क्या है?  S4C को सिंपल शब्दों में समझें तो यह एक नेशनल डैशबोर्ड है, जिसका काम साइबर फ्रॉड को रोकने के लिए तुरंत उसको डिटेक्ट और ट्रैस करना है.  S4C, असल में एक शॉर्ट नाम है, जिसका पूरा नाम सस्पेक्ट रजिस्ट्री एंड साइबर क्राइम कॉर्डिनेशनल सिस्टम है. यह एक नेशनल साइबर इंटेलीजेंस एंड मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म, जिसको इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने डेवलप किया है. I4C एजेंसी गृह मंत्रालय के तहत काम करती है.   2022 में साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेशन डिविजन सीबीआई साल 2000 से साइबर क्राइम्स की जांच कर रही है और 2022 में साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेशन डिविजन की शुरुआत की थी. यह केंद्र सरकार और उसके ऑफिस को प्रभावित करने वाले साइबर अपराधों की जांच के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है. ये डिविजन साइबर क्रिमिनल्स और साइबर-सक्षम धोखाधड़ी दोनों से निपटती है.  भारत में कई सर्विस डिजिटल काम कर रही हैं ध्यान देने वाली बात यह है कि ये नेशनल कॉन्फ्रेंस ऐसे समय आयोजित होने जा रही है, जब भारत डिजिटल चेजेंस तेजी से हो रहे हैं. बैंकिंग से लेकर कम्युनिकेशन तक तक में बड़े स्तर पर विस्तार हुआ है. वहीं, संगठिग साइबर अपराधी नेटवर्क इस सिस्टम में मौजूद खामियों का मिसयूज कर रहे हैं. नेशनल कॉन्फ्रेंस का मकसद क्या है?       भारत में साइबर-सक्षम धोखाधड़ी बदलते स्वरूप पर समझ विकसित करना.      साइबर ठगी के इकोसिस्टम के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों का अध्ययन करना.      फाइनेंशियल पिलर्स (म्यूल खाते और धन शोधन).     टेलिकॉम पिलर (SIM/eSIM और डिजिटल का मिसयूज करना).     ह्यूमन पिलर (साइबर गुलामी और ठगी केंद्रों में तस्करी).      कानून प्रवर्तन एजेंसियों, बैंकों, दूरसंचार प्रदाताओं, नियामकों और प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्मों के बीच सहयोग को मजबूत करना है.      साइबर स्कैम और धोखाधड़ी की तुरंत रिपोर्टिंग, रियल-टाइम फंड ट्रेसिंग, समय पर साक्ष्य संरक्षण और पीड़ितों की बेहतर सुरक्षा के लिए सिस्टम को मजबूत बनाना है.  आज से शुरू होने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस का अंतिम उद्देश्य आम लोगों की सुरक्षा, आपराधिक नेटवर्कों को रोकना और भारत के डिजिटल इकोसिस्टम में विश्वास को बढ़ाना है. 

देहरादून में इस्लामिक इंस्टीट्यूट के लिए जमीन आवंटन पर IMA के पास विवाद, जानिए पूरा मामला

    देहरादून     देहरादून की राजधानी देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) के पास मौजूद करीब 20 एकड़ ज़मीन विवादों में आ गई है. असल में नया विवाद जमीन के ट्रांसफर को लेकर शुरू हुआ है. कथित तौर पर यह जमीन एक इस्लामिक एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बनाने के लिए आवंटित की गई थी, जो जांच के दायरे में आ गई है. यह भी आरोप लग रहे हैं कि यहां पर इंस्टीट्यूशन वाला प्लॉट काटकर लोगों को बसाया जा रहा है.  कथित तौर पर यह ज़मीन करीब दो दशक पहले उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने अलॉट की थी. एजेंसी के मुताबिक, विकासनगर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट विनोद कुमार की शुरुआती जांच के मुताबिक, IMA के पास धौलास इलाके में मौजूद ज़मीन के प्लॉट को अब रहने के मकसद से छोटे-छोटे प्लॉट में बेचा जा रहा है, जिससे मिलिट्री ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशन की सिक्योरिटी को खतरा है. सियासी बयानबाजी तेज… पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उनकी सरकार इस मामले में सख्त एक्शन लेगी. उन्होंने कहा, “इस मामले से यह साफ है कि ये लोग (कांग्रेस), जो मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने की बात करते थे, अगर सत्ता में आते तो उसी दिशा में आगे बढ़ते. हम सख्त एक्शन लेंगे.” मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यह मामला 2004 का है, जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे. उन्होंने कहा, “यह 2004 का पुराना केस है, जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे. उसके बाद, बीजेपी कई बार सत्ता में आई और वे इस अलॉटमेंट को कैंसल कर सकते थे.” बीजेपी विधायक और राज्य पार्टी प्रवक्ता विनोद चमोली ने कहा कि मामले से जुड़ी रिपोर्ट्स ने एक बार फिर कांग्रेस सरकारों की ‘खतरनाक साज़िशों’ को सामने ला दिया है. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या तिवारी सरकार के दौरान दी गई ज़मीन हरीश रावत की देख-रेख में इस्लामिक यूनिवर्सिटी बनाने के लिए थी? चमोली ने कहा, “बीजेपी के विरोध और 2022 में जनता के कांग्रेस को नकारने की वजह से यह इरादा पूरा नहीं हो सका और अब ज़मीन पर लैंड माफिया कब्ज़ा कर रहे हैं.”  

बांग्लादेश को नुकसान, भारत के साथ डील से 15 हजार करोड़ का कारोबार होगा भारत के पक्ष में, निर्यात बढ़ेगा दोगुना

नई दिल्‍ली  अमेरिका के साथ मुक्‍त व्‍यापार समझौता होने से भारत के कपड़ा निर्यात को सबसे ज्‍यादा लाभ मिलने की उम्‍मीद है. कपड़ा निर्यात संगठनों ने अनुमान लगाया है कि महज तीन साल में परिधान निर्यात बढ़कर दोगुना होने की पूरी उम्‍मीद है. अभी भारत से अमेरिका को होने वाला कपड़ा निर्यात करीब 15 हजार करोड़ रुपये सालाना का है, जो तीन साल के भीतर बढ़कर 30 हजार करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा पहुंच सकता है. देश में कपड़ा निर्यात का हब माने जाने वाले तिरुप्‍पुर के कपड़ा उद्योग निर्यातकों का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच हुए हालिया समझौते के बाद अगले तीन वर्षों में अमेरिका को कपड़ों का निर्यात दोगुना होकर 30,000 करोड़ रुपये तक पहुचने की उम्मीद है. तिरुप्पुर निर्यातक संघ के अध्यक्ष के एम सुब्रमणियन ने कहा कि चेन्नई से लगभग 450 किलोमीटर पश्चिम में स्थित तिरुप्पुर में भी इस अवधि के दौरान रोजगार सृजन में लगभग पांच लाख की वृद्धि होने की उम्मीद है. इसका मतलब है कि इस डील ने 5 लाख नौकरियों के भी अवसर बनाए हैं. 5 साल में जबरदस्‍त बढ़ोतरी भारत और अमेरिका ने शनिवार को घोषणा की कि उन्होंने द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के ढांचे को अंतिम रूप दे दिया है, जिसके तहत दोनों पक्ष दोतरफा व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई वस्तुओं पर आयात शुल्क कम करेंगे. इस समझौते पर टिप्पणी करते हुए सुब्रमणियन ने कहा कि हम इस कदम का स्वागत करते हैं. यह समझौता महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे तिरुप्पुर को अगले 5 वर्षों में जबरदस्त वृद्धि मिलेगी. अभी 15 हजार करोड़ का है निर्यात उन्होंने बताया कि वर्तमान में तमिलनाडु से कपड़ों का निर्यात 15,000 करोड़ रुपये का है और इस समझौते के बाद इसके अगले तीन वर्षों में 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है. सुब्रमणियन ने कहा कि भारत-अमेरिका समझौते के कारण पांच लाख और नए रोजगार पैदा होंगे. तिरुप्पुर के एक अन्य उद्यमी और स्टारलाइट एक्सपोर्टर्स के संस्थापक एम. रथिनसामी ने कहा कि इस सौदे से तमिलनाडु को अमेरिका से और अधिक ऑर्डर मिलेंगे. बांग्‍लादेश को पीछे छोड़ देंगे तिरुप्पुर निर्यातक संघ के कार्यकारी समिति सदस्य रथिनासामी ने कहा कि पहले कुछ ऑर्डर बांग्लादेश और अन्य देशों को जाते थे. इस समझौते के बाद हमें (अमेरिका से) और अधिक ऑर्डर मिलेंगे. यह समझौता सीधे तौर पर बांग्‍लादेश के लिए भी बड़ा झटका है. बांग्‍लादेश पर इससे पहले कम टैरिफ होने की वजह से अमेरिका के कई ऑर्डर वहां से जाते थे, जबकि अब भारत पर टैरिफ बांग्‍लादेश से भी कम हो गया है. लिहाजा आने वाले समय में अमेरिका से ज्‍यादा ऑर्डर मिलने का अनुमान है.

सावरकर को भारत रत्न देने पर सियासी घमासान, विपक्ष ने उठाए सवाल

नई दिल्ली  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत की ओर से वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग पर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। राजद सांसद मनोज झा ने कहा कि मोहन भागवत कैसे बयान देते हैं, समझ में नहीं आ रहा है। राजद सांसद मनोज झा ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “भारत रत्न का गौरव आज तक किसी के लिए प्रतीक्षा कर रहा है क्या? मुझे समझ नहीं आ रहा कि मोहन भागवत कैसे बयान देते हैं। विसंगतियों पर बात करिए, सरकार तो आप ही चला रहे हैं, बाकी सब तो कठपुतली हैं।” निर्दलीय सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर कहा, “अभिव्यक्ति की आजादी है। कोई किसी के लिए भी पुरस्कार की मांग कर सकता है। मोहन भागवत तो सरकार के मालिक हैं। उन्हें मांग करने की क्या जरूरत है? वे कह देंगे तो कौन मना करेगा?” उन्होंने कहा कि देश की आजादी में किसका कितना बड़ा योगदान है, यह किसी से छिपा नहीं है। हम लंबे समय से कांशीराम साहब को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर रहे हैं। 1857 क्रांति के नायक कोतवाल धन सिंह गुर्जर के लिए भी हमने भारत रत्न की मांग की है, लेकिन ऐसे महापुरुषों को भारत रत्न न देकर सरकार इन वर्गों का अपमान कर रही है। यह हमारे लोग होने नहीं देंगे और वोट से इसका बदला लेंगे।” समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर कहा, “बजट का जो हलवा बना था, वह ज्यादा किसे मिला? आज समय यह है कि 18 बड़ा है या शून्य? बजट पर चर्चा इसलिए होनी चाहिए क्योंकि अब किसान क्या करेगा? कभी भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोली थी और यह बताया गया था कि गरीब, किसान की तरक्की होगी, लेकिन जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो अमीर और अमीर और गरीब और गरीब हुआ है। उससे ज्यादा अर्थव्यवस्था आज खोल दी गई। ये सब बातें सिर्फ ध्यान भटकाने के लिए की जा रही हैं।” समाजवादी पार्टी सांसद डिंपल यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, “हमें लगातार देखने को मिला है कि जब से भाजपा आई है, सत्तापक्ष के कभी माइक ऑफ नहीं होते, लेकिन विपक्ष के नेताओं और सांसदों का माइक ऑफ किया जाता है। तो अगर अविश्वास प्रस्ताव लाना है तो इंडी गठबंधन मिलकर ही ये प्रस्ताव लाएगी।”

तमिलनाडु: 100 साल पुरानी दरगाह में बदलाव, रोज नमाज पर रोक और पशु बलि पर बैन

चेन्नई  सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के एक संवेदनशील में बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने इस मामले में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. शीर्ष अदालत ने थिरुप्परनकुंड्रम (Thirupparankundram) दरगाह में रोज़ाना नमाज़ पढ़ने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने साफ किया है कि इस दरगाह में हर दिन नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी, बल्कि केवल रमजान और बकरीद जैसे विशेष त्योहारों पर ही नमाज अदा करने की इजाजत रहेगी. यह अपील एक प्रैक्टिसिंग मुस्लिम, इमाम हुसैन द्वारा दायर की गई थी. इसमें उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी. जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने मामले की सुनवाई की. पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने न केवल रोजाना नमाज की मांग को ठुकराया, बल्कि दरगाह परिसर में पशु बलि (Animal Sacrifice) पर लगी रोक को भी सही ठहराया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों की गरिमा और वहां की स्थापित परंपराओं का पालन करना जरूरी है. क्या है पूरा विवाद और इसका इतिहास? यह पूरा मामला मदुरै के पास स्थित ऐतिहासिक थिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी से जुड़ा है. यह पहाड़ी भगवान मुरुगन के प्राचीन मंदिर (अरुपदाई वीदु में से एक) के लिए प्रसिद्ध है. इसी पहाड़ी की चोटी पर सिकंदर बादुशा की दरगाह भी स्थित है. विवाद की जड़ दरगाह के उपयोग को लेकर थी. याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि दरगाह को एक मस्जिद की तरह इस्तेमाल करने दिया जाए. यहां रोज़ाना पांच वक्त की नमाज पढ़ने की मांग की गई थी. इसके अलावा, उर्स और अन्य मौकों पर वहां पशु बलि की अनुमति भी मांगी गई थी. हालांकि, हिंदू संगठनों और मंदिर प्रशासन ने इसका विरोध किया था, क्योंकि यह स्थान भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से मुरुगन मंदिर परिसर का हिस्सा माना जाता है. नई प्रथा को इजाजत नहीं मद्रास हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया था कि दरगाह में रोज़ाना नमाज़ की परंपरा नहीं रही है और इसे नई प्रथा के रूप में शुरू नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट ने माना था कि यह स्थान सभी धर्मों के लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र हो सकता है, लेकिन इसे विशेष समुदाय के लिए दैनिक प्रार्थना स्थल (मस्जिद) में नहीं बदला जा सकता. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तर्क पर मुहर लगा दी है.

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