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धन के देवता कुबेर देव की 10 खास बातें

पुलस्त्य पुलस्ति ऋषि को ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माना जाता है। कर्दम प्रजापति की कन्या हविर्भुवा से इनका विवाह हुआ था। कहते हैं कि ये कनखनल के राजा दक्ष के दामाद और भगवान शंकर के साढू थे। इनकी दूसरी पत्नी इडविला थी। पुलस्त्य और इडविला के पुत्र विश्रवा थे और विश्रवा के पुत्र रावण और कुबेर थे। विश्रवा की पहली पत्नी भारद्वाज की पुत्री देवांगना थी जिसका पुत्र कुबेर था। विश्रवा की दूसरी पत्नी दैत्यराज सुमाली की पुत्री कैकसी थी जिसकी संतानें रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और सूर्पणखा थीं। खर, दूषण, कुम्भिनी, अहिरावण और कुबेर रावण के सगे भाई बहन नहीं थे। आओ जानते हैं धन के देवता कुबेर के बारे में 10 खास बातें। 1. हिन्दू धर्म में कुबेर को धन का देवता माना गया है। धनतेरस और दीपावली पर माता लक्ष्मी और श्रीगणेश के साथ इनकी भी पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को इनकी विशेष पूजा की जाती है। 2. कुबेरदेव को यक्षों का राजा माना जाता है और उनके राज्य की राजधानी अलकापुरी है। कैलाश के समीप इनकी अलकापुरी है। श्वेतवर्ण, तुन्दिल शरीर, अष्टदन्त एवं तीन चरणों वाले, गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन विस्तीर्ण वैश्रवणी सभा में विराजते हैं। 3. कुबेर को यक्ष के अतिरिक्त राक्षस भी कहा गया है, क्योंकि वे रावण के भाई हैं। यक्ष के रूप में वे खजानों के रक्षक है पुराने मंदिरों के वाह्य भागों में कुबेर की मूर्तियां पाए जाने का रहस्य भी यही है कि वे मंदिरों के धन के रक्षक हैं और राक्षस होने के नाते वे धन का भोग भी करते हैं। 4. दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में। 5. कुबेरे देवता देवताओं के कोषाध्यक्ष थे। सैन्य और राज्य खर्च वे ही संचालित करते थे। यक्षों के राजा कुबेर उत्तर के दिक्पाल तथा शिव के भक्त हैं। भगवान शंकर ने इन्हें अपना नित्य सखा स्वीकार किया है। देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को पूजने से भी पैसों से जुड़ी तमाम समस्याएं दूर रहती हैं। 6. कुबेर पहले श्रीलंका के राजा था परंतु रावण ने उनसे लंका को हथिया लिया। कुबेरदेव के पास एक महत्वपूर्ण पुष्पक विमान और चंद्रकांता मणि भी थी जिसे भी रावण ने हथिया लिया था। 7. कुबेर के संबंध में लोकमानस में एक जनश्रुति प्रचलित है। कहा जाता है कि पूर्वजन्म में कुबेर चोर थे-चोर भी ऐसे कि देव मंदिरों में चोरी करने से भी बाज न आते थे। एक बार चोरी करने के लिए एक शिव मंदिर में घुसे। तब मंदिरों में बहुत माल-खजाना रहता था। उसे ढूंढने-पाने के लिए कुबेर ने दीपक जलाया लेकिन हवा के झोंके से दीपक बुझ गया। कुबेर ने फिर दीपक जलाया, फिर वह बुझ गया। जब यह क्रम कई बार चला, तो भोले-भाले और औघड़दानी शंकर ने इसे अपनी दीपाराधना समझ लिया और प्रसन्न होकर अगले जन्म में कुबेर को धनपति होने का आशीष दे डाला। बाद में भगवान ब्रह्मा ने इन्हें समस्त सम्पत्ति का स्वामी बनाया। यह भी कहा जाता है कि यह कुबड़े और एक आंख वाले थे परतुं भगवती की अराधना से धनपति और निधियों के स्वामी बन गए थे। 8. कुबरे की शादी मूर दानव की पुत्री से हुई थी जिनके दो पुत्र नलकूबेर और मणिग्रीव थे। कुबेर की पुत्री का नाम मीनाक्षी था। अप्सरा रंभा नलकुबेर की पत्नी थी जिस पर रावण ने बुरी नजर डाली थी। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को शाप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श नहीं कर पाएगा और यदि करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा। नलकूबेर और मणिग्रीव भगवान श्री कृष्णचन्द्र द्वारा नारद जी के शाप से मुक्त होकर कुबेर के साथ रहते थे। 9. कुबेर मंत्र : ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥ कुबेर धन प्राप्ति मंत्र : ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः॥ कुबेर अष्टलक्ष्मी मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥ 10. घर की उत्‍तर दिशा को कुबेर देव की दिशा माना जाता है। अत: इस दिशा की दशा सही रखने से घर में सुख, शांति और धन धान्य बना रहता है।

राजा विक्रमादित्य को दिए थे दर्शन मां बगलामुखी देवी ने, पढ़ें कहां और कैसे

डोंगरगढ़ (छत्‍तीसगढ़) जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर पहाड़ों में विराजित है मां बम्लेश्वरी का मंदिर। यहां मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर है। पहला मंदिर ऊंची पहाड़ी पर और दूसरा मंदिर के प्रवेश द्वार से पश्चिम दिशा में स्थित है। पहाड़ वाली मां बम्लेश्र्वरी देवी के गर्भगृह के चारों ओर गुफाएं हैं। अंचल के लोग नीचे मंदिर में स्थापित माता को छोटी बम्लाई और पहाड़ावाली मां को बड़ी बम्लाई कहते है। लगभग 1 हजार से सीढ़ियां चढ़कर पहाड़ों वाली मां के दर्शन होते है। यहां तक पहुंचने के लिए रोप-वे भी बना हुआ है। मां बम्लेश्र्वरी मंदिर की स्थापना की एक रोचक कथा है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व कामाख्या नगरी जिसे आज डोंगरगढ़ के नाम से जाना जाता है, वहां पहले राजा वीरसेन का शासन था। राजा वीरसेन की कोई संतान नहीं थी। जिसके कारण उन्होंने शिवजी और मां दुर्गा की उपासना की। उपासना के एक वर्ष बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम मदनसेन रखा गया। मां दुर्गा और भगवान शिव का उपासक होने के कारण वीरसेन ने यहां कामाख्या नगरी में मां बम्लेश्वरी का मंदिर बनवाया। इसके बाद राजा मदनसेन के पुत्र कामसेन ने यहां शासन किया। कामसेन के दरबार में नृत्यकला में प्रवीण कामकंदला व अलौकिक संगीतज्ञ और मधुर गायक माधवनल थे। दोनों के बीच अथाह प्रेम था। परिस्थतिवश माधवनल को कामाख्या नगरी का त्याग करना पड़ा। माधवनल कामख्या नगरी से सीधे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचा और उन्हें अपनी करुण कथा सुनाई। कथा सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया। कामसेन और विक्रमादित्य के बीच भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में राजा विक्रमादित्य विजयी हुए। युद्ध में कामख्या नगरी पूरी तरह तबाह हो गई। नगर में सिर्फ डोंगर बचा और माता का मंदिर। युद्ध के बाद विक्रमादित्य ने माधवनल और कामकंदला की प्रेम की परीक्षा लेने के लिए यह अफवाह फैला दी कि युद्ध में माधवनल वीरगति को प्राप्त हो गया है। जैसे ही यह समाचार कामकंदला को मिला उसने एक तालाब में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। यह तालाब आज भी मंदिर के पास पहाड़ी के नीचे स्थित है। कामकंदला की मृत्यु का समाचार पाकर माधवनल ने भी अपना जीवन समाप्त कर लिया। राजा विक्रमादित्य को जब यह समाचार मिला तो उन्हें गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने मां बगलामुखी की आराधना शुरू कर दी। लेकिन माता ने दर्शन नहीं दिए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य भी अपने प्राण त्यागने के लिए तत्पर हो गए। इसी समय मां बगलामुखी ने राजा को दर्शन दिए। वरदान मांगने पर राजा ने कामकंदला और माधवनल का जीवन और मां बगलामुखी के कामाख्या में ही निवास करने का वर मांगा। तभी मां बगलामुखी साक्षात् रूप में यहां है। ऐसा कहा जाता है बगलामुखी का ही परिवर्तित नाम बम्लेश्वरी है।

जीवन में उन्नति चाहते हैं तो नियमित पढ़ें आदित्य हृदय स्तोत्र

आदित्य ह्रदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से अप्रत्याशित लाभ मिलता है। लंबी उम्र, नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास तथा सभी कार्यों में सफलता मिलती है तथा हर मनोकामना सिद्ध होती है। इतना ही नहीं यह पाठ हर तरह के शत्रु से मुक्ति भी दिलाता है। सरल शब्दों में कहें तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र हर क्षेत्र में चमत्कारी सफलता देता है। यहां पढ़ें आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ- आदित्य ह्रदय स्तोत्र ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥ राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥ सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥ पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥ आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥ हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥ हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥ आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥ नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥ जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥ नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥ ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥ तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥ तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥ नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥ देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥ पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥ अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥ अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

Shriram Sharma aachary : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के 8 प्रेरक विचार

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म तिथि के अनुसार आश्विन मास में उत्तरप्रदेश के आगरा जनपद के आंवलखेड़ा गांव में हुआ था। वर्तमान युग में हर व्यक्ति धर्म-कर्म की राह से भटक रहा है। ऐसे व्यक्तियों को सही रास्ता दिखलाने के लिए प्रस्तुत है शांतिकुंज गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य पं. श्रीराम शर्मा के 8 प्रेरक विचार- * जिस भी व्यक्ति ने अपने जीवन में स्नेह और सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया है, वह सचमुच ही सबसे बड़ा कलाकार है। * जीवन को प्रसन्न रखने के दो ही उपाय है- एक अपनी आवश्यकताएं कम करें और दूसरा विपरित परिस्थितियों में भी तालमेल बिठाकर कार्य करें। * संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना ही गृहस्थ का तपोवन है। * अपने आचरण से प्रस्तुत किया उपदेश ही सार्थक और प्रभावी होता है, अपने वाणी से किया गया नहीं। * दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नहीं है। * जिन्हें लंबी जिंदगी जीनी हो, वे बिना तगड़ी (ज्यादा, कड़ी) भूख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें। * किसी भी व्यक्ति के द्वारा किए गए पाप उसके साथ रोग, शोक, पतन और संकट साथ लेकर ही आते है। * हर व्यक्ति को अपना मूल्य समझना चाहिए और अपने आप पर यह विश्वास करना चाहिए कि वे संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है।

क्या भ्रष्टाचार का विरोध और जी-हुजूरी नहीं करना बगावत है?

— विशेष टिपण्णी : गोपाल स्वरूप वाजपेयी, पत्रकार व लेखक ईमानदारी तेरा किरदार है तो खुदकुशी कर ले, सियासी दौर को तो जी हुजूरी की जरूरत है। भ्रष्टाचार का विरोध करने पर एडीएम पद से हटाए गए मध्यप्रदेश के युवा आईएएस लोकेश कुमार जांगिड़ ने इस शायरी से अपना दर्द बयां किया। 2014 बैच का ये आईएएस अफसर एक सप्ताह तक देशभर में सुर्खियों में रहा और अब यह मुद्दा शांत हो गया है। बिना हल निकले इतने गंभीर मामले की इतनी जल्दी हवा निकलना वर्तमान माहौल में कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। ये मामला इसलिए और गंभीर और संवेदनशील है, क्योंकि मख्यमंत्री शिवराज सिंह के करीब 15 साल के कार्यकाल में पहली बार किसी आईएएस अफसर ने निशाने पर लिया और वह भी भ्रष्टाचार के मामले में। गजब यह है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले अपर कलेक्टर को 24 घंटे के अंदर पद से हटा दिया गया लेकिन जिस पर आरोप लगे, यानी जिले के कलेक्टर का बाल बांका नहीं हुआ। ये मुद्दा भले ही शांत हो गया हो, लेकिन कई सवाल भी खड़े कर गया। क्या भ्रष्टाचार का विरोध करना बगावत है? क्या भ्रष्टाचार का विरोध कर आईएएस लोकेश जांगिड़ ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की आचार संहिता का उल्लंघन किया? क्या जिले में तैनात कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक सूबे के मुख्यमंत्री के वसूली एजेंट होते हैं? आईएएस और आईपीएस को जिले में कलेक्टर व एसपी के रूप में तैनात करने के क्या मानक हैं? क्या इन दोनों अफसरों की तैनाती सियासी रसूख के दम पर होती है? क्या कलेक्टर व एसपी बनने के लिए सियासी गलियों में बोली लगती है? क्या कलेक्टर व एसपी का भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगाना मजबूरी है? कलेक्टर व एसपी को जिले से हटाने का क्या पैमाना है? सरकार को डायरेक्ट आईएएस की तुलना में प्रमोटी आईएएस क्यों प्रिय हैं? और सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार को लोगों ने रीति-नीति में गुप्त रूप से शिष्टाचार का दर्जा दे दिया है? क्या भ्रष्टाचार व अनैतिकता का विरोध करने वाले का बहिष्कार नहीं किया जा रहा? दरअसल, आईएएस अफसर लोकेश कुमार जांगिड़ को शिवराज सरकार हरियाणा के आईएएस अफसर खेमका की तर्ज पर फुटबाल बना रही है। 2014 बैच के मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अफसर लोकेश जांगिड़ की फील्ड पोस्टिंग के अभी साढ़े 4 साल हुए हैं, लेकिन उनके 8 बार ट्रांसफर हो चुके हैं। यानी औसतन हर 6 माह में उन्हें हटाया गया। 42 दिन पहले राज्य शिक्षा केंद्र के अपर संचालक से बड़वानी अपर कलेक्टर बनाया गया था, लेकिन अब उन्हें वापस राज्य शिक्षा केंद्र भेज दिया गया है। बड़वानी में पदस्थ होने के बाद उन्हें जिले का कोविड प्रभारी बनाया गया था। इस दौरान जांगिड़ ने पूरे जिले का तूफानी दौरा किया और कोरोना की रफ्तार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। बड़वानी कलेक्टोरेट के अधिकारी बताते हैं कि अप्रैल और मई में वह शायद ही अपने दफ्तर में बैठे। वे हमेशा फील्ड में रहते थे। इसी दौरान जांगिड़ ने आॅक्सीजन कंसट्रेटर की खरीदी में हुए भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया। बड़वानी में कोरोना महामारी में उपकरणों की खरीदी में भारी हेरफेर हुआ था। 39 हजार के आॅक्सीजन कंसंट्रेटर 60 हजार रुपए में खरीदे गए। भ्रष्टाचार के इस खेल में जांगिड़ शामिल नहीं हुए और उन्होंने इसका विरोध किया। यह खरीदी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा के माध्यम से हुई। इसके साथ ही अन्य उपकरणों की खरीदी में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ था। जांगिड़ ने चार्ज लेते ही भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगा दी थी। इसकी कीमत जांगिड़ को देनी पड़ी। जांगिड़ को अपर कलेक्टर के पद से हटा दिया गया। बड़वानी से तबादले के बाद लोकेश जांगिड़ ने बड़वानी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा पर गंभीर आरोप लगाते हुए आईएएस एसोसिएशन के सोशल मीडिया ग्रुप में लिखा कि कलेक्टर पैसा नहीं खा पा रहे हैं। इसलिए वर्मा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कान भर दिए। वे एक ही किरार समुदाय से हैं और कलेक्टर की पत्नी किरार महासभा की सचिव हैं, मुख्यमंत्री की पत्नी अध्यक्ष हैं। नैतिकता का तकाजा कहता है कि इतना गंभीर आरोप लगने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से इस बारे में स्पष्टीकरण जारी होना चाहिए था। लेकिन एक शब्द नहीं कहा गया। चूंकि, बड़वानी कलेक्टर पर सीधेतौर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे तो उन्हें भी पद से हटाया जाना चाहिए था और जांच होनी चाहिए थी। लेकिन ये सब तो बहुत दूर, कलेक्टर को एक नोटिस तक जारी नहीं किया गया। भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों के लिए यह हतप्रभ व हताश करने वाली घटना है। दरअसल, ऐसा माहौल बनता जा रहा है कि भ्रष्टाचार व अनैतिकता पर बहस करना अब समय की बर्बादी है। घोटालों व भ्रष्टाचार के आरोपों को शिवराज सरकार गंभीरता से नहीं लेती। कुछ माह पहले प्रदेश कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि शिवराज सरकार ने सात माह में 17 घोटाले किए। ग्वालियर में आटा घोटाले में गरीब-मजदूरों को 10 किलो आटे के पैकेट में महज छह किलो से लेकर आठ किलो आटा दिया गया। कोरोना काल में बांटे गए त्रिकूट चूर्ण में भी घोटाले का आरोप लगा। शिवराज सरकार ने इन आरोपों पर ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस विपक्षी दल है। इसलिए मान लेते हैं उनका काम ही आरोप लगाना है। लेकिन जब केंद्र की मोदी सरकार की एजेंसियां ही शिवराज सरकार को घोटाले को लेकर एलर्ट करें तो मामला बेहद संगीन हो जाता है। प्रदेश में उपचुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार ने बालाघाट व मंडला में हुए चावल घोटाले पर शिवराज सरकार को पत्र लिखकर जांच के निर्देश दिए थे। केंद्रीय एजेंसी ने माना था कि प्रदेश में बालाघाट और मंडला में पोल्ट्री ग्रेड का चावल गरीबों को बांटा गया है। केंद्र सरकार ने यूरिया घोटाले को लेकर भी शिवराज सरकार को पत्र लिखकर आगाह किया था। केंद्र सरकार ने यूरिया घोटाले में बड़े पैमाने पर कालाबाजारी की जानकारी भी शिवराज सरकार को दी। मध्यप्रदेश में सहकारी समितियों ने किसानों को यूरिया देने के नाम पर बड़ा फजीर्वाड़ा किया। इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार ने शिवराज सरकार को दी थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत शिवपुरी जिले में कटनी और रीवा से दो रैक में 51 हजार क्विंटल चावल पिछले साल जुलाई में आया था। घटिया चावल … Read more

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