दुआ है कि गंगा-जमुनी तहज़ीब को कभी कोई बुरी नज़र न लगे और इसकी खूबसूरती बनी रहे • ताहिर अली यदि मंदिरों से घंटियों की मधुर आवाज़ और मस्जिदों से बुलंद अज़ान एक साथ गूंजे, तो समझ लीजिए आप उस शहर में हैं, जहाँ सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब ने अपने खूबसूरत रंग बिखेरे हैं। यह शहर है भोपाल – झीलों की नगरी, नवाबी संस्कृति की परछाईं, प्राकृतिक सौंदर्य की मिसाल और ऐतिहासिक धरोहरों का सजीव संग्रह। तहज़ीब और भाईचारा भोपाल की सबसे बड़ी खासियत इसकी साझा संस्कृति है। यहाँ तालाब के बीचों-बीच मंदिर, मस्जिद और मजारों का साथ-साथ दिखना आम बात है। यही वह शहर है, जहाँ सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक – ताजुल मस्जिद है, तो वहीं विश्व की सबसे छोटी मस्जिद मानी जाने वाली ‘ढाई सीढ़ी मस्जिद’ भी यहीं स्थित है। भोपाल में उर्दू भाषा का उपयोग लगभग सभी समुदाय के लोग करते हैं। भोपाल की सड़कों पर चलते हुए अगर कोई राहगीर किसी मोहल्ले का पता पूछ ले, तो भोपाली उसे दरवाजे तक छोड़कर आते हैं। यही इसकी तहज़ीब है, यही इसकी पहचान है। भोपाल की एक बात ओर मशहूर है कि जो भी भोपाल आता है यहां के लोग उसे सीने से लगा लेते हैं। हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से जो भोपाल आया जैसे नौकरीपेशा या कोई भी व्यवसाय के लिए यहीं का होकर रह गया। भेल कारखाना इसका जीता-जागता उदाहरण है। ज्यादातर नौकरी पेशा अधिकारी एवं कर्मचारी रिटायर होने के बाद भोपाल को ही अपना मानकर यहीं बस गए। काफी लोग कारोबार करने के उद्देश्य से यहीं आकर आबाद हो गये। भोपाल की मज़ेदार ‘उर्फ़ियत’ – नाम के पीछे नाम की दुनिया! भोपाल, भोपाली और भोपालियत की पहचान केवल ताल-तालैया और ऐतिहासिक इमारतों आबोहवा, तहजीब और संस्क़ति तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी अनोखी और मज़ेदार ‘उर्फ़ियतों’ के लिए भी मशहूर है। जब किसी मोहल्ले में एक ही नाम के कई लोग हों, तो पहचान बनाने के लिए नाम के पीछे कुछ जोड़ना लाज़मी हो जाता है, फिर चाहे वो पहनावे से जुड़ा हो, बोलचाल से, शौक से या किसी मज़ेदार किस्से से – हर भोपाली को मिल जाता है उसका ख़ास “उर्फ़ी टाइटल”। तो मिलिए भोपाल की इस अनोखी नामावली से – तारिक़ टाई, जो हमेशा टाई में दिखते थे, तारिक़ चपटे, जिनके गाल खुद गवाही देते हैं, तारिक़ होंठ कटे, जिनके होंठों की कहानी हर गली जानती है, और तारिक़ झबरे, जिनकी आंखें ही उनकी पहचान हैं। आरिफ़ अंडे का नाश्ता शहर भर में मशहूर है, तो आरिफ़ बुलबुल अपने गले से सबको दीवाना बना देते हैं। बाबूलाल 501 नाम की सिगरेट की तरह मशहूर हैं, और सेठ छगनलाल, जिनका “सेठपना” मोहल्ले में आज भी कायम है। रविंद्र सिंह लखरत, बाबूलाल लठमार, चांदमल हिटलर, मोहन पंचायती, लाला मुल्कराज, सरदारमल लालवानी, नाहर सिंह सूरमा भोपाली, कन्हैयालाल ‘बीड़ी’ और के. अमीनउद्दीन-301 तो अपनी शान और रसूख़ के लिए पहचाने जाते हैं। अखिलेश अग्रवाल गफूरे और वहीद अग्रवाल की उर्फ़ियतें उनकी दोस्ती और कारोबार की दास्तान सुनाती हैं। हफ़ीज़ पाजामे और चांद कटोरे का नाम सुनते ही भोपाल मुस्कुरा उठता है, वहीं चांद चुड़वे मोहल्ले की कहानियों के नायक हैं। सुरेश 501, अनिल अग्रवाल पटीये, और देवेश सिमहल वकील साहब अपने नाम से ही काफ़ी असरदार हैं। बाबू साहब घोड़े और बाबू साहब नाम की सादगी में गजब की शान है। आलू बड़े, ज़ायकों की दुनिया के हीरो हैं, और लोक सिंह ताल ठोंकू हर बहस में जीत की गारंटी हैं। रईस भूरा, मुन्ने मॉडल ग्राउंड, मुन्ने पेंटर, मुईन क़द्दे और माहिर मदीना – ये नाम जैसे ही कान में पड़ें, पूरा मोहल्ला मुस्करा उठता है। भोपाल की गलियों में लोग नाम से कम और उर्फ़ियत से ज़्यादा जाने जाते हैं। जावेद चपटे और जावेद चिराटे जैसे नामों में मज़ाकिया तंज है, तो बन्ने पहलवान और बन्ने लखेरा में मोहल्ले की दो अलग-अलग शख्सियतें झलकती हैं। कल्लू अट्ठे, बाबू भड़भुजे, मुन्ने फुक्की, ईरानी और डूंड जैसे नाम रोज़मर्रा की आदतों, मज़ाक या पेशे से जुड़े हैं। सईद बुल, छुटकटे, वहीद ढेलकी, आरिफ पिस्स, और अनफिट भोपाल की उस खास तासीर को दर्शाते हैं, जहां हर नाम के पीछे एक किस्सा है — हँसी, अपनापन और तंज से भरा। यही भोपाल की असली पहचान है — उर्फ़ियतों में बसी यारी और यादें। भोपाल की इन मज़ेदार उर्फ़ियतों में वो अपनापन है, जो किसी GPS में नहीं मिलता – सिर्फ मोहल्लों की यादों और बातों में ही जिंदा रहता है। भोपाल में हिंदू-मुस्लिम एकता : सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की मिसाल भोपाल की सांस्कृतिक विरासत की सबसे मजबूत कड़ी उसकी हिंदू-मुस्लिम एकता है, जो सिर्फ सामाजिक सौहार्द का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संघर्षों के बीच पनपी सहिष्णुता और साझेदारी की अनूठी मिसाल है। जब देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया, तब भी भोपाल ने अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को संजोए रखा। हर वर्ग के लोगों ने एक दूसरे से बहुत प्यार मोहब्बत के साथ दिली लगाव रखा। सन 1812 की लड़ाई में हिंदू योद्धाओं जैसे डांगर सिंह, जय सिंह, और अमन सिंह पटेल ने भोपाल की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां तक कि युद्ध में महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी की, यह दिखाते हुए कि भाईचारा केवल धार्मिक स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर भी जीवित था। भोपाल रियासत के प्रशासन में हर कालखंड में हिंदुओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। दीवान (प्रधानमंत्री) जैसे उच्च पदों पर लाला घानी राम, लाला फूलानाथ, राजा अवध नारायण जैसे हिंदू अधिकारी रहे। यह समावेशिता केवल औपचारिक नहीं थी — ये अधिकारी नवाबों के विश्वासपात्र भी थे। नवाब क़ुदसिया बेग़म के दरबार में एक हिंदू, एक मुसलमान और एक ईसाई मंत्री नियुक्त थे — यह उस समय की धार्मिक विविधता के प्रति सम्मान का प्रतीक था। रियासत के इंजिमाम (शामिल करने) के बाद शरीफ़ शरणार्थियों में (उच्च परिवार के शरणार्थी) सरदार गुरबख्श सिंह भी थे, जिनके बेटे अमरीक सिंह रंजीत होटल चलाते हैं। वे बहू मियाँ के साथ ईद पर नवाब साहब को सलाम करने जाते। एक बार नवाब साहब ने पूछा कि भोपाल कैसा लग रहा है, तो सरदार साहब ने हाथ जोड़कर कहा कि जहाँ गरीब परवर सरकार का साया हो, वहाँ कोई कैसे … Read more