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चीन अब बच्चे पैदा करने के लिए महिलाएं खरीद रहा , इतने रुपए में हो रहा सौदा

बीजिंग चीन की मैरिज रेट में भारी गिरावट आई है और 2024 में देशभर में 61 लाख शादियां की रजिस्टर्ड हुईं जो पिछले साल 77 लाख से कम हैं. इस गिरावट ने की वजह से ही एक्सपर्ट शादी की कानूनी उम्र 22 से घटाकर 18 करने की सिफारिश कर रहे हैं. चीन में मैरिज रेट में गिरावट कई फैक्टर्स की वजह से आई है, इनमें बढ़ता आर्थिक दबाव, शादी के प्रति सोच में बदलाव और शिक्षा का बढ़ता स्तर शामिल है. शादी नहीं करना चाहते युवा खास तौर पर चीन की शहरी महिलाए खुद को ऐसी पारिवारिक जिम्मेदारियों में नहीं झोंकना चाहतीं, जो शादी और बच्चे पैदा करने जैसे जीवन के अहम पड़ावों को महत्व देती हैं. रहन-सहन के बढ़ते खर्च की वजह से भी कई युवा शादी का आर्थिक बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं हैं. साथ ही चीन लंबे समय से लैंगिक असंतुलन से जूझ रहा है, जिसकी वजह देश की ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ और लड़कों को वरीयता देने की विरासत को माना जाता है. साल 2000 के दशक की शुरुआत में जब यह असंतुलन अपने चरम पर था, तब चीन का जन्म के समय लिंग अनुपात हर 100 लड़कियों पर 121 लड़कों तक पहुंच गया था. कुछ प्रांतों में तो यह अनुपात 100 लड़कियों पर 130 लड़के का था. लैंगिक असंतुलन खास तौर पर 1980 के दशक में पैदा हुए लोगों ने साफ देखा है. यह 1980 के दशक के मध्य से अल्ट्रासाउंड तकनीक के इस्तेमाल के कारण हुआ, जिसने माता-पिता को यह सुविधा दी कि अगर उनका बच्चा लड़की है तो वे गर्भपात करा सकते हैं. बचे हुए पुरुषों का क्या होगा? चीन में अविवाहित पुरुष कथित तौर पर ‘बचे हुए पुरुषों का युग’ (चीनी में शेंगनान शिदाई) का हिस्सा बन गए हैं. यह एक इंटरनेट शब्द है जो मोटे तौर पर 2020 और 2050 के बीच के दौर के लिए इस्तेमाल होता है, जब अनुमान है कि 30 मिलियन से 50 मिलियन चीनी पुरुष शादी के लिए दुल्हन खोजने में असमर्थ होंगे. पहेली यह है कि इनमें से कई ‘बचे हुए’ पुरुष शादी करना चाहते हैं और पत्नी की तलाश में बेताब हैं, लेकिन जीवनसाथी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. घरेलू जीवनसाथी न मिलने पर कुछ चीनी पुरुष विदेशी दुल्हनों को खरीदने की ओर मुड़ गए हैं. इन दुल्हनों की बढ़ती मांग खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में गैरकानूनी शादियों को बढ़ावा दे रही है. इसमें बच्चों और महिलाओं की शादियां शामिल हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के पड़ोसी देशों से चीन में तस्करी करके लाया गया है. म्यांमार से चीन में दुल्हन की तस्करी पर 2019 में जारी ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों तरफ की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की नाकामी ने ऐसा माहौल तैयार कर दिया है, जिसमें तस्कर फल-फूल रहे हैं. चीनी सरकार ने अब इस कारोबार पर नकेल कसने की ठान ली है. मार्च 2024 में चीन के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय ने महिलाओं और बच्चों की अंतरराष्ट्रीय तस्करी के खिलाफ़ एक अभियान शुरू किया, जिसमें इन अपराधों को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की अपील की गई है. ‘खरीदी गई’ विदेशी दुल्हनें ऐसी शादियां अक्सर अनौपचारिक नेटवर्क या व्यवसायिक एजेंसियों के जरिए कराई जाती हैं जो कि चीन की स्टेट काउंसिल के हिसाब से गैरकानूनी हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि पड़ोसी देशों में महिलाओं और लड़कियों को आमतौर पर दलाल धोखा देते हैं और चीन में अच्छी सैलरी वाली नौकरी का वादा करके लाते हैं. चीन पहुंचने के बाद वे खुद को दलालों की दया पर छोड़ देती हैं और उन्हें चीनी पुरुषों को 3,000 अमेरिकी डॉलर (करीब 2.5 लाख रुपये) से 13,000 अमेरिकी डॉलर (करीब 11 लाख रुपये) के बीच बेचा जाता है. चीन में सीमा पार से आईं लड़कियों की शादी के आंकड़े जुटा पाना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ये गतिविधियां सीक्रेट तरीके से होती हैं. लेकिन ब्रिटेन के सरकारी विभाग के सबसे हालिया डेटा से पता चलता है कि वियतनामी मानव-तस्करी के 75 फीसदी पीड़ितों को चीन में तस्करी करके लाया गया था, जिनमें से 90 प्रतिशत मामले महिलाओं और बच्चों के थे. साल 2022 की अवॉर्ड विनिंग डॉक्यूमेंट्री द वूमन फ्रॉम म्यांमार, तस्करी की गई म्यांमार की एक महिला की कहानी है, जिसे चीन में शादी के लिए बेच दिया गया था. यह फिल्म तस्करी की गईं दुल्हनों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाती है. महिलाओं पर जुल्म की कहानी यह न सिर्फ उन महिलाओं के साथ होने वाली जबरदस्ती और बुरे बर्ताव को दिखाती है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था में अस्तित्व के लिए उनके संघर्ष को भी दर्शाती है जो उन्हें प्रोडक्ट की तरह देखती है. डॉक्यूमेंट्री में दिखाई गई तस्करी की शिकार महिला लैरी ने बताया कि बच्चे पैदा करने की उसकी क्षमता ही उसका अस्तित्व तय करती है. चीनी अधिकारी लगातार विदेश से खरीदी गई दुल्हनों से जुड़े घोटालों के बारे में चेतावनी देते रहते हैं. उदाहरण के लिए नवंबर 2024 में दो लोगों पर क्रॉस-बॉर्डर मैचमेकिंग प्लान में शामिल होने के आरोप में मुकदमा चलाया गया था. चीनी पुरुषों को ‘किफायती’ विदेशी पत्नियों के वादे के साथ विदेश में बेहद महंगे मैरिज टूरिज्म में फंसाया गया है. ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जहां शादी के पूरे इंतेजाम होने से पहले ही दुल्हनें बड़ी रकम लेकर फरार हो गईं. देश के आर्थिक विकास के मामले में लेबर फोर्स बेशक अहम है. लेकिन चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस के सदस्य जस्टिन लिन यिफू के अनुसार जो चीज अधिक मायने रखती है वह है इफेक्टिव लेबर. चीन ने अपनी बूढ़ी होती आबादी से जुड़ी भविष्य की चुनौतियों की आशंका में हाल के वर्षों में शिक्षा में अपने निवेश को लगातार बढ़ाया है. लेकिन इसके बावजूद इससे भी बड़ी चिंता बड़ी संख्या में बचे हुए पुरुषों की है, क्योंकि इससे सामाजिक स्थिरता को गंभीर खतरा हो सकता है. अब बच्चे पैदा करने के लिए महिलाएं खरीद रहा चीन, इतने रुपए में हो रहा सौदा चीन के लोगों में शादी न करवाने का चलन जोरो पर चल रहा है। वहां लोग अपना अधिकतर समय अपने कामकाज में ही लगा रहे है। जिसकों लेकर सरकार परेशान है। वहीं, दूसरी तरफ, शादी के लिए विदेशी दुल्हनों की … Read more

मिडिल ईस्ट के हथियार बाजार में चीन को बड़ा झटका, शी जिनपिंग की स्ट्रैटजी की क्राउन प्रिंस ने निकाली हवा

रियाद  चीन की मिडिल ईस्ट स्ट्रैटजी को तगड़ा झटका देते हुए सऊदी अरब ने J-35 स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने से इनकार कर दिया है। शी जिनपिंग के लिए ये बहुत बड़ा झटका है। क्योंकि शी जिनपिंग की स्ट्रैटजी के मुताबिक खाड़ी के ताकतवर देशों में चीनी हथियारों से अमेरिकी हथियारों को रिप्लेस करना था। शी जिनपिंग चाहते थे कि सऊदी अरब जैसे ताकतवर देश अगर J-35 स्टील्थ फाइटर खरीदते हैं, तो ना सिर्फ चीनी जेट्स की बिक्री बढ़ेगी, बल्कि रणनीतिक तौर पर मिडिल ईस्ट में अमेरिकी हथियारों के लिए भी वो दरवाजे बंद कर सकता है। लेकिन IDRW की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने चीन को उस वक्त झटका दिया है, जब पिछले साल नवंबर में जी-20 शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया था और चीनी अधिकारी झुहाई एयर शो के कामयाब होने का जश्न मना रहे थे। चीन ने बार बार दावा किया था कि सऊदी अरब चीनी स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने वाला है। लेकिन जी-20 शिखर सम्मेलन ने एक कहानी के एक नये अध्याय को ही खोलकर रख दिया है। नई रिपोर्ट में कहा गया है की सऊदी अरब अब छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए ब्रिटेन, इटली और जापान के साथ मिलकर काम करने वाला है और इन देशों के बीच प्रोजेक्ट को लेकर बातचीत एडवांस स्तर तक पहुंच चुकी है। माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक ये सौदा पक्का हो जाएगा। इस दौरान प्रोजेक्ट की रूपरेखा तय कर ली जाएगी। चीन को सऊदी ने दिया बहुत बड़ा झटका चीन के लिए ये पैरों तले जमीन खिसकाने वाला झटका है। मिडिल ईस्ट में उसकी रणनीति पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को कमजोर करने की थी। इसके अलावा वो J-35 स्टील्थ फाइटर के लिए बड़े बाजार की तलाश कर रहा है। अभी तक J-35 स्टील्थ फाइटर को खरीदने के लिए सिर्फ पाकिस्तान तैयार हुआ है। एक्सपर्ट्स लगातार J-35 स्टील्थ फाइटर की क्षमता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पाकिस्तान भी चीनी प्रेशर की वजह से इस फाइटर को खरीदने के लिए तैयार हुआ है। लेकिन सऊदी अरब के सामने ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी। सऊदी अरब के इनकार के बाद कई और देश, जिनके साथ चीन J-35 स्टील्थ फाइटर की बिक्री को लेकर बातचीत कर रहा था, वो सौदे से पीछे हट सकते हैं। इसकी टेक्नोलॉजी पर अब शक के बादल और गहरे हो गये हैं। IDRW की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने ये फैसला अचानक नहीं लिया है। बल्कि चीन की तरफ से करीबी संबंध बनाने के बावजूद बीजिंग की मानसिकता को लेकर सतर्क रहा है। उसने चीनी सैन्य हार्डवेयर को लेकर संतुलित रवैया अपनाया है। उसने कुछ चीनी हथियार जरूर खरीदे हैं, लेकिन स्ट्रैटजिक हथियार अभी तक नहीं खरीदे हैं। लिहाजा एक्सपर्ट्स इसे सिर्फ सऊदी अरब की हथियार खरीद में विविधिता के नजरिए से ही देख रहे हैं। IDRW ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सऊदी अरब और पश्चिमी देशों के अधिकारी पहले से ही गोपनीय स्तर पर इस नये प्रोजेक्ट पर बातचीत कर रहे हैं। पश्चिमी देशों के बीच फाइटर जेट निर्माण के लिए हाई टेक्नोलॉजी है, जो सऊदी और पश्चिमी देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीति का संकेत देता है। जे-35 लड़ाकू विमान को नहीं मिल रहा खरीददार? पाकिस्तान के अलावा किसी भी और देश ने अभी तक जे-35 लड़ाकू विमान को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाई है। चीनी फाइटर जेट हालांकि एफ-35 जैसे अमेरिकी फाइटर जेट्स की तुलना में काफी सस्ता है और इसका मेटिनेंस भी कम खर्चीला है, लेकिन ये प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा है। फरवरी 2024 में सऊदी अरब में आयोजित ग्लोबल एयरशो के दौरान चीन ने FC-31 को प्रदर्शन के लिए भेजा था। FC-31 लड़ाकू विमान, J-35 का पूर्व वैरिएंट है। लेकिन FC-31 भी डिफेंस एक्सपर्ट्स को प्रभावित नहीं कर पाया। चीन की डिफेंस इंडस्ट्री ने बहुत शानदार तरक्की की है और देश की रक्षा जरूरतों को पूरा किया है। लेकिन बावजूद इसके चीन को विदेशी ग्राहकों की तलाश के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। मध्य-पूर्व से चीन को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वहां भी उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। इन बातों के अलावा भी साल 2019 से 2023 तक चीन के हथियार कंपोनेंट्स में 77% हिस्सा रूस से आयात किया गया था। वहीं चीन कई क्रिटिकल हथियारों के लिए फ्रांस और रूस पर भी निर्भर था, लिहाजा यह निर्भरता चीन के आत्मनिर्भरता और तकनीकी कौशल के दावों पर सवाल उठाती है।

अब चीन का एक्शन, अमेरिकी आयात पर इतने प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने एक्शन से टैरिफ वॉर शुरू करते दिख रहे हैं और इसने वर्ल्ड इकनॉमी में खलबली मचा दी है. अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप एक के बाद एक देशों से आयात पर टैरिफ (टैक्स) लगा रहे हैं और अब दूसरे देश जवाबी कदम उठा रहे हैं. मंगलवार, 4 मार्च को पहले कनाडा, मैक्सिको और चीन के खिलाफ ट्रंप के नए टैरिफ की घोषणा की और इसके लागू होते ही चीन और कनाडा ने जवाबी कार्रवाई का ऐलान कर दिया है. यहां हम आपको बताएंगे कि अमेरिका ने किन देशों पर कितना टैरिफ लगाया है और उन देशों ने जवाब में क्या कदम उठाए हैं. फिर आपको आसान शब्दों में बताएंगे कि टैरिफ होता क्या है और ट्रंप इसका इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं. अमेरिका ने किसपर कितना टैरिफ लगाया? राष्ट्रपति ट्रंप ने कनाडा और मैक्सिको के खिलाफ 25% टैरिफ और चीन के खिलाफ 20% टैरिफ की घोषणा की है. चीन पर पिछले महीने जो 10% टैरिफ लगाया गया था, उसे अब दोगुना कर दिया गया है. चीन की जवाबी कार्रवाई बीजिंग के वित्त मंत्रालय ने चिकन, गेहूं, मक्का और कपास सहित कई अमेरिकी कृषि आयातों पर 15% टैरिफ की घोषणा की है. साथ ही सोयाबीन, पोर्क, बीफ, फल, सब्जियां और डेयरी उत्पादों जैसे अन्य उत्पादों पर 10% टैरिफ लगाया है. ये टैक्स 10 मार्च से लागू होंगे. साथ ही चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने 10 अमेरिकी कंपनियों को तथाकथित “अविश्वसनीय इकाई सूची” (unreliable entity list) में और 15 अमेरिकी संस्थाओं को निर्यात नियंत्रण सूची में जोड़ा है, जो आज से प्रभावी हो जाएगा. जिन अमेरिकी संस्थाओं को चीन ने निशाना बनाया है, उनमें अमेरिकी बायोटेक फर्म इल्लुमिनिया (Illuminia) शामिल है. चीन ने इल्लुमिनिया पर आरोप लगाया है कि वह “चीनी कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कदम” उठाती है. 4 मार्च से इल्लुमिनिया को चीन में जीन अनुक्रमण यानी सिक्वेंसिंग की मशीनों के निर्यात पर बैन लगा दिया है. चीन की निर्यात नियंत्रण लिस्ट में जोड़ी गई 15 संस्थाओं में एविएशन, समुद्री इंजीनियरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं. कनाडा ने भी टैरिफ लादा कनाडा ने घोषणा की है कि वह 4 मार्च से 107 बिलियन डॉलर (155 बिलियन कनाडाई डॉलर) के अमेरिकी सामानों पर 25% का जवाबी टैरिफ लगाएगा. रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडाई प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अमेरिका के टैरिफ को टालने के प्रयास में कहा कि अगर ट्रंप प्रशासन अपनी योजना पर अमल करता है तो कनाडा मंगलवार से अमेरिकी सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा. मैक्सिको ने भी कर ली तैयारी बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जहां एक तरफ कनाडा और चीन पहले ही जवाबी टैरिफ लगाने की कसम खा चुके हैं, वहीं मेक्सिको भी 24 घंटे के अंदर जवाबी टैरिफ लगा सकता है. मैक्सिको से होने वाले आयात पर अमेरिका के 25% टैरिफ लागू होने से पहले, मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने कहा कि उनके देश ने आकस्मिक योजनाएं बनाई हैं. उन्होंने कहा, “इस स्थिति में, हमें संयम, शांति और धैर्य की आवश्यकता है. हमारे पास प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी और यहां तक ​​कि प्लान डी भी है.” शीनबाम ने कहा कि वह कनाडाई समयानुसार मंगलवार को मेक्सिको के जवाब के बारे में और बात करेंगी. टैरिफ क्या होता है? टैरिफ दूसरे देशों से आयात होने वाली वस्तुओं पर लगाया जाने वाला टैक्स है. जो कंपनियां विदेशी सामान देश में लाती हैं वे सरकार को टैक्स देती हैं. सरकार इस टैक्स को बढ़ाकर उस सामान की कीमत बढ़ा सकती है और टैक्स कम करके उसकी कीमत कम कर सकती है. यानी कुल मिलाकर सरकार टैरिफ के जरिए इस चीज को कंट्रोल करती है कि उसे देश में कौन सा विदेशी सामान चाहिए और कितना चाहिए. आमतौर पर, टैरिफ किसी प्रोडक्ट के कीमत का एक खास प्रतिशत होता है. आपको उदाहरण से बताते हैं. जैसे ट्रंप ने चीन पर 20% टैरिफ लगाया है. अब इसका मतलब हुआ कि चीन से अगर 10 डॉलर का कोई सामान अमेरिका के अंदर आता है तो उसपर 2 डॉलर का अतिरिक्त टैक्स लगेगा. अब यह कंपनियों पर निर्भर करता है कि वो टैरिफ की कुछ या पूरी लागत अपनी ग्राहकों पर डालती है या नहीं. अब अमेरिका में चीन, कनाडा और मेक्सिको से आने वाले सामान की कीमत अचानक से बढ़ सकती है. ट्रंप टैरिफ क्यों लगा रहे हैं? इसका आसान सा जवाब ट्रंप के चुनावी स्लोगन ‘अमेरिका फर्स्ट’ में छिपा है. ट्रंप संरक्षणवादी है यानी अमेरिका के अपने बिजनेस को तरजीह देते हैं. ऐसे में जो टैरिफ वाला हथकंडा है वो ट्रंप की आर्थिक योजनाओं का एक केंद्रीय हिस्सा है. उनका कहना है कि टैरिफ से अमेरिकी के अंदर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और नौकरियों की रक्षा होगी, साथ ही सरकार को मिलने वाला टैक्स बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होगी. ड्रग्स सप्लाई पर ऐक्शन ट्रंप ने फरवरी में तीनों देशों पर टैरिफ जड़ने का ऐलान किया था। ट्रंप के मुतबिक कनाडा और मेक्सिको की सीमा से अवैध नशीले पदार्थों का कारोबार चल रहा है जिसकी रोकथाम के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। बाद में कनाडा और मेक्सिको की ओर से सीमा सुरक्षा को लेकर वादे करने पर उनके ऊपर 25% टैरिफ के फैसले को एक महीने के लिए स्थगित कर दिया था। उनसे सोमवार को इस बारे में सवाल किया गया कि क्या अभी दोनों देशों से इसे लेकर कोई डील की जा सकती है तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया और दोहराया कि टैरिफ मंगलवार से लागू हो रहे हैं। ट्रंप ने 2 अप्रैल से जवाबी टैरिफ जड़ने का ऐलान भी किया है। फरवरी अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर ट्रंप ने कहा था कि मेक्सिको और कनाडा से अभी भी बड़े और अस्वीकार्य स्तर पर ड्रग्स आ रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक 1 लाख से ज्यादा लोगों की मौत इन ड्रग्स के कारण हुई है। उन्होंने दावा किया था कि इनमें से ज्यादातर, जो फेंटनिल प्रकार के हैं, वे चीन से सप्लाई हो रहे हैं। अपने हालिया फैसले में ट्रंप ने चीन के ऊपर लगने वाली 10% ड्यूटी के ऊपर अतिरिक्त 10% ड्यूटी जड़ दी है। राष्ट्रपति का आरोप है कि चीन ने अवैध ड्रग्स के कारोबार को रोकने के … Read more

चीन का ट्रंप पर पलटवार, अमेरिकी प्रोडक्ट पर 10 से 15 फीसदी टैरिफ का किया ऐलान, बढ़ा तनाव

बीजिंग  चीन ने अमेरिका पर नए टैरिफ लगाने का फैसला लिया है। ये टैरिफ 10 फरवरी से अमेरिकी उत्पादों पर लागू हो जाएंगे। चीन ने ये कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से उसके उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ के जवाब में उठाया है। अमेरिका ने चीन के उत्पादों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। चीन ने भी इसके जवाब में अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा दिया है। चीनी वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को अमेरिकी उत्पादों पर 10 से 15 प्रतिशत टैरिफ लगाने के फैसले की जानकारी दी है। बीजिंग के टैरिफ लगाए जाने से चीन में अमेरिका से आने वाले बड़ी कारों, पिक ट्रक, एलएनजी, कच्चा तेल और खेती-बाड़ी की मशीनों के आयात पर असर पड़ेगा। चीन ने कोयले और प्राकृतिक गैस पर 15 प्रतिशत और पेट्रोलियम, कृषि उपकरण, उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों और पिकअप ट्रकों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। चीन ने कुछ प्रमुख खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण लगाया है। साथ ही गूगल और कुछ अमेरिकी कंपनियों की जांच शुरू कर दी है। चीन-यूएस में ट्रेड वॉर! अमेरिका और चीन के एक-दूसरे पर टैरिफ लगाने से दोनों मुल्कों में व्यापार के स्तर पर तनाव बढ़ गया है। इससे आने वाले दिनों में अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर तेज होने की भी संभावना है। ये तनाव डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद शुरू हुआ है। ट्रेप ने कई देशों पर टैरिफ लगाए हैं। इन देशों में चीन भी शामिल है। चीन ने अमेरिका की ओर से अपने सामानों पर टैरिफ बढ़ाए जाने के बाद नाराजगी जताई है। चीन के वित्त मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका की ओर से एकतरफा टैरिफ लगाना WTO के नियमों का खुला उल्लंघन है। डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला चीन और अमेरिका के बीच सामान्य आर्थिक और व्यापार सहयोग को कमजोर करता है। अमेरिकी कंपनियों पर भी एक्शन चीन ने अमेरिकी टेक दिग्गज गूगल के खिलाफ एकाधिकार विरोधी जांच शुरू की है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने टंगस्टन, टेल्यूरियम, बिस्मथ, मोलिब्डेनम और इंडियम को निर्यात नियंत्रण सूची में जोड़ा है। चीन ने अमेरिकी कपड़ों की कंपनी PVH और बायोटेक्नोलॉजी कंपनी इलुमिना को अविश्वसनीय संस्थाओं की सूची में डाल दिया है। चीन सरकार का कहना है कि इन संस्थाओं ने चीनी उद्यमों के साथ सामान्य लेनदेन में बाधा डाली और उनके खिलाफ भेदभावपूर्ण उपाय अपनाए हैं।

एक मिनट में साढ़े चार लाख गोलियां करती है फायर, चीन ने बनाई दुनिया की सबसे ताकतवर मशीनगन ‘मेटल स्टॉर्म’

  बीजिंग। चीन एक ऐसा हथियार बनाने में लगा है, जिसका नाम सुनकर अमेरिका भी थर्राने लगेगा. यह मानव इतिहास की सबसे शक्तिशाली मशीन गन है, जिसे चीनी इंजीनियर और वैज्ञानिक विकसित कर रहे हैं. इसकी ताकत का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसमें पांच से ज्यादा बैरल होंगे. वहीं यह 450,000 गोलियां प्रति मिनट फायर कर सकेगा. गोलीबारी का घनत्व 7 मैक से ज्यादा की गति से यात्रा करने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों को भी रोक सकता है. अमेरिका के लिए यह चिंता की बात है. क्योंकि अभी तक उसके पास मौजूद ‘फालैंक्स सिस्टम’ प्रति मिनट 4,500 राउंड गोलियां फायर कर सकता है. हालांकि इस हथियार की ताकत ही इसकी कमजोरी रही है. लाखों गोलियां प्रति मिनट दागने वाले इस हथियार के लिए गोला-बारूद भरना एक असंभव चुनौती माना जाता रहा है. लेकिन चीन के केंद्रीय औद्योगिक केंद्र ताइयुआन के शोधकर्ताओं ने इसका समाधान खोज निकाला है. इसके लिए वह एक कंटेनर जैसा मैग्जीन बनाएंगे, जिसमें बैरल भरे होते हैं. प्रत्येक बैरल पहले से ही गोलियों से भरा होता है. फायरिंग के बाद बैरल को कंटेनर समेत डिस्पोज कर दिया जाता है. क्या है इस बंदूक की टेक्नोलॉजी साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर चीन विश्वविद्यालय के यांत्रिक और विद्युत इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर लू शुताओ के नेतृत्व वाली प्रोजेक्ट टीम ने कहा, ‘बॉक्सटाइप रोटरी फायरिंग तकनीक से लोडिंग की स्पीड बढ़ती है और बैरल की शक्ति और सटीकता में गिरावट नहीं आती. साथ ही, कई हमलों के दौरान लगातार संचालन और तेज जवाबी हमला संभव हो सका है. पारंपरिक मशीन गन मैकेनिकल ट्रिगर्स का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन यह प्रति सेकंड 7,500 हमले नहीं कर सकती है, जो चीन की सेना चाहती है. इस समस्या से निपटने के लिए लू और उनके सहयोगियों ने एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रिगर विकसित किया है, जिसमें कॉइल्स का इस्तेमाल होता है. यह संपर्क रहित ट्रिगर तुरंत गोली में मौजूद मिश्र धातु की तार को पिघला देगा, जिससे हाई पावर के साथ गोली निकलेगी. इस इलेक्ट्रॉनिक ट्रिगर की दक्षता इतनी ज्यादा है कि यह 17.5 माइक्रोसेकंड में फायरिंग करने लगता है. रिपोर्ट के मुताबिक टेस्ट डेटा कन्फर्म करता है कि प्रत्येक बैरल 450,000 राउंड प्रति मिनट का लक्ष्य पाने के लिए पर्याप्त है. सबसे पहले कब आया खतरनाक हथियार? इस हथियार की अवधारणा पहली बार 1990 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई आविष्कारक माइक ओ’ड्वायर ने प्रस्तुत की थी. हथियार का नाम मेटल स्टॉर्म रखा गया. उनकी कंपनी, मेटल स्टॉर्म इंक, ने एक 36-बैरल टेस्ट सिस्टम बनाया जो 10 लाख राउंड प्रति मिनट की फायरिंग दर तक पहुंच गई. साल 2006 में उन्होंने मीडिया को बताया कि चीनी सेना ने इस तकनीक के लिए 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर की पेशकश की थी. जब अमेरिका को इसकी खबर लगी तो उन्होंने ओ’ड्वायर के साथ युद्धक्षेत्र के लिए नए हथियार सिस्टम विकसित करने में सहयोग किया. लेकिन तकनीकी और अन्य चुनौतियों के कारण प्रोजेक्ट रद्द हो गया. बाद में 2012 में मेटल स्टॉर्म इंक दिवालिया हो गई.

भारतीय चीन में बढ़ते श्वसन रोगों को देखते हुए निगरानी बढ़ाई, WHO को ताजा जानकारी देने के लिए कहा

नई दिल्ली भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय चीन में बढ़ते सांस की बीमारियों के मामलों पर नजर रखे हुए है। चीन में क्या हो रहा है,इसकी जानकारी के लिए WHO से भी संपर्क किया गया है।  को स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इस बैठक में WHO,आपदा प्रबंधन, रोग निगरानी कार्यक्रम,राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र,भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और AIIMS दिल्ली सहित कई अस्पतालों के विशेषज्ञ शामिल हुए। विशेषज्ञों ने बताया कि फ्लू के मौसम में सांस की बीमारियों का बढ़ना सामान्य है। रिपोर्ट्स के अनुसार,इस बार इन्फ्लुएंजा वायरस,RSV और HMPV के कारण मामले बढ़ रहे हैं। ये वायरस भारत समेत दुनिया भर में फैले हुए हैं। घबराने की जरूत नहीं हाल ही में,सोशल मीडिया पर चीन के अस्पतालों में मरीजों की भीड़ के वीडियो वायरल हुए थे। कुछ लोगों का दावा था कि यह संकट ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (HMPV) के कारण हुआ है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ.अतुल गोयल ने शुक्रवार को कहा कि चीन में HMPV वायरस की खबरें चल रही हैं, जो गंभीर है। HMPV एक सामान्य सांस संबंधी वायरस है जो सर्दी जैसे लक्षण पैदा करता है। कुछ लोगों को,खासकर बुजुर्गों और शिशुओं को,फ्लू जैसे लक्षण हो सकते हैं। लेकिन यह कुछ गंभीर या चिंताजनक नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि सर्दियों में सांस के संक्रमण के मामले बढ़ जाते हैं। डॉ. गोयल ने कहा कि हमारे अस्पताल इस तरह की वृद्धि से निपटने के लिए तैयार हैं। हमारे पास पर्याप्त बिस्तर और ऑक्सीजन की आपूर्ति है।” उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक देश में सांस के संक्रमण के मामलों में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। कोविड से कितना अलग है एचएमपीवी वायरस कोविड-19 और अन्य श्वसन वायरस की तरह HMPV भी खांसने, छींकने और संक्रमित लोगों के निकट संपर्क से उत्पन्न बूंदों या एरोसोल के माध्यम से फैलता है। बुखार,सांस फूलना,नाक बंद होना,खांसी,गले में खराश और सिरदर्द इसके सामान्य लक्षण हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि कुछ मरीजों को इस संक्रमण के कारण ब्रोंकाइटिस और निमोनिया हो सकता है। HMPV के खिलाफ कोई टीका या प्रभावी दवा नहीं है, और इलाज ज्यादातर लक्षणों को प्रबंधित करने के लिए होता है। भारत सरकार की पूरी नजर चीन में सांस की बीमारियों के बढ़ते मामलों की खबरों के बाद, भारत सरकार ने सतर्कता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने WHO से स्थिति पर लगातार अपडेट देने का अनुरोध किया है।  को विशेषज्ञों की एक बैठक में चीन की स्थिति और भारत में तैयारी की जरूरत पर विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि फ्लू के मौसम में सांस की बीमारियों में वृद्धि असामान्य नहीं है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि मौजूदा उछाल इन्फ्लुएंजा वायरस, RSV और HMPV के कारण है, जो इस मौसम में पाए जाने वाले सामान्य रोगजनक हैं। ये वायरस पहले से ही भारत समेत दुनिया भर में फैले हुए हैं। सरकार सभी उपलब्ध माध्यमों से स्थिति पर नजर रख रही है और WHO से चीन की स्थिति के बारे में समय पर अपडेट साझा करने का अनुरोध किया गया है।  

समंदर में बालू भर-भरकर चीन ने बना दिया कृत्रिम द्वीप फिर हवाई अड्डा

बीजिंग. पड़ोसी देश चीन ने इंजीनियरिंग और निर्माण सेक्टर में एक और चमत्कार किया है। उसने पूर्वोत्तर तट पर लिओनिंग प्रांत के एक व्यस्त बंदरगाह वाले शहर डालियान को बेहतर सुविधा परिवहन मुहैया कराने के लिए नजदीकी समंदर में बालू भर-भरकर एक बड़ा सा कृत्रिम द्वीप बना दिया है। इस द्वीप पर हवाई अड्डा बनाने की योजना पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह मानव निर्मित द्वीप पर दुनिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा होगा जो चीन की शानदार उपलब्धि को दुनिया के सामने बताएगा। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कृत्रिम द्वीप पर निर्माणाधीन डालियान जिनझोउ बे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा 20.9 वर्ग किलोमीटर (7.7 वर्ग मील) में फैला होगा। इसमें चार रनवे और 900,000 वर्ग मीटर (969,000 वर्ग फीट) में यात्री टर्मिनल होगा। यह हवाई अड्डा पहले चरण में 2035 में चालू हो जाएगा। योजना के मुताबिक, इस हवाई अड्डे से प्रति वर्ष 540,000 उड़ानों को संचालित करना है, जहां से करीब 8 करोड़ यात्री सफर कर सकेंगे। चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीचैट पर डालियान जिनझोउ बे इंटरनेशनल ने एक पोस्ट में लिखा है, “देश का सबसे बड़ा अपतटीय हवाई अड्डा पूर्व में सूर्योदय की तरह समुद्र तल से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है।” रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्माण कार्य पूरा हो जाने पर इस कृत्रिम द्वीप पर दुनिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा बन जाएगा, जो दूसरे कृत्रिम द्वीप पर स्थित हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (HKG) और जापान के कंसाई हवाई अड्डे (KIX) दोनों को पीछे छोड़ देगा। हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे 12.48 वर्ग किलोमीटर और कंसाई हवाई अड्डे 10.5 वर्ग किलोमीटर में फैला है। डालियान जिनझोउवान अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा मुख्य भूमि चीन के तट पर पहला कृत्रिम द्वीप हवाई अड्डा होगा। यह हवाई अड्डा चीन के क्षेत्रीय पड़ोसियों, जापान और दक्षिण कोरिया के निकट होगा, जो रणनीतिक रूप से काफी अहम है। डालियान का बंदरगाह शहर तेल रिफाइनरी, शिपिंग, रसद और तटीय पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है। जापान को इस बात का भी टेंशन है कि भविष्य में चीन इस हवाई अड्डे का इस्तेमाल सामरिक दृष्टिकोण से कर सकता है क्योंकि चीन क्षेत्रीय वर्चस्व जमाना चाहता है और वह लंबे समय से कई महासागरों में विवादित जलक्षेत्रों में भी अपने सैन्य और सामरिक अड्डे बनाने में दिलचस्पी रखता रहा है।

देश के सबसे बड़े घोटाले में लिप्त अधिकारी को फांसी पर चढ़ाया, चीन में भ्रष्टाचार की कोई माफी नहीं

बीजिंग. चीन की सरकार में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति है और इसी नीति के तहत चीन की सरकार ने अपने एक और शीर्ष अधिकारी को मौत की सजा दे दी है। चीन की सरकार ने मंगलवार को उत्तरी इनर मंगोलिया स्वायत्त क्षेत्र के पूर्व अधिकारी ली जियानपिंग को फांसी दे दी। ली जियानपिंग को देश के अब तक के सबसे बड़े भ्रष्टाचार मामले में दोषी ठहराया गया था। यह भ्रष्टाचार 42 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का बताया जा रहा है। ली जियानपिंग चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य थे। ली को पूर्व में सितंबर 2022 में ही मौत की सजा दी जानी थी, लेकिन उन्होंने सजा के खिलाफ अपील की थी। अपील के बाद भी चीन के सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद अब ली को फांसी की सजा दी गई। चीन के मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, ली जियानपिंग को अदालत द्वारा 42 करोड़ डॉलर की अवैध कमाई का दोषी पाया गया था। यह चीन के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला बताया जा रहा है। सत्ता पर काबिज होने के बाद से ही सख्त रुख साल 2012 में चीन की सत्ता पर काबिज होने के बाद से ही राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भ्रष्टाचार के खिलाफ रुख सख्त रहा है। अब तक शी जिनपिंग के कार्यकाल के दौरान दो पूर्व रक्षा मंत्रियों और दर्जनों सैन्य अधिकारियों समेत दस लाख से अधिक पार्टी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त कार्रवाई की गई है। इस साल जनवरी में केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग (सीसीडीआई) के पूर्ण सत्र में दिए गए अपने भाषण में भी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पार्टी कार्यकर्ताओं से भ्रष्टाचार का डटकर सामना करने का आह्वान किया था। गौरतलब है कि चीन में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के बावजूद घोटालों में लिप्त अधिकारियों के सजा पाने के मामले बढ़े हैं। सेना में शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान ने वैश्विक ध्यान खींचा है, जिसके बारे में उनके आलोचकों का कहना है कि इसने उन्हें सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने में सक्षम बनाया है।

चीनियों ने जिनपिंग से कहा उन्‍हें सुरक्षा के लिए अब पाकिस्‍तानी सैनिकों पर भरोसा नहीं

इस्‍लामाबाद पाकिस्‍तान और चीन के बीच बलूचों के हमलों को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। बलूच व‍िद्रोही चाइना पाकिस्‍तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) को बनाने में लगे चीनी इंजीनियरों पर लगातार खूनी हमले कर रहे हैं। यही नहीं चीनी बिजनसमैन को भी पाकिस्‍तान के पंजाब प्रांत के अंदर न‍िशाना बनाया जा रहा है। इससे उनके अंदर दहशत का माहौल है। चीनियों ने साफ तौर पर शी जिनपिंग की सरकार को बोल दिया है कि उन्‍हें सुरक्षा के लिए अब पाकिस्‍तानी सैनिकों पर भरोसा नहीं है। हम चीनी सैनिकों को प्राथमिकता देंगे। इन हमलों की वजह से कई चीनी बिजनसमैन पाकिस्‍तान छोड़ना चाहते हैं और उन्‍हें पाकिस्‍तान के अंदर अपना कोई भविष्‍य नहीं दिख रहा है। इससे राष्‍ट्रपति जिनपिंग अब चीनी सेना को तैनात करने को लेकर भारी दबाव में हैं। चीन अगर पाकिस्‍तान में सेना को तैनात करता है तो इसका पाकिस्‍तान और भारत पर क्‍या असर होगा? आइए समझते हैं चीन सरकार पर यह दबाव तब बढ़ गया है जब पिछले महीने दोनों चीनी इंजीनियरों की बलूचों के हमले में मौत हो गई। चीन ने सीपीईसी परियोजना पर अब तक 62 अरब डॉलर का निवेश किया है। सीपीईसी चीन के बीआरआई के सबसे बड़े प्राजेक्‍ट में से एक है। बीआरआई चीनी राष्‍ट्रपति का ड्रीम प्राजेक्‍ट है और सीपीईसी को इसका मुखौटा करार दिया जाता है। चीन के इस प्राजेक्‍ट का बलूच‍िस्‍तान में कड़ा विरोध हो रहा है और बलूचिस्‍तान लिबरेशन आर्मी ने चीनी लोगों को वापस जाने के लिए अल्‍टीमेटम दे रखा है। चीनियों की सुरक्षा में तैनात हैं 15 हजार पाक‍िस्‍तानी सैनिक चीनी निवेशकों को अब तक पाकिस्‍तानी सेना और चीन की निजी सुरक्षा एजेंसियों से सुरक्षा मिली हुई है। हालांकि बाद में पाकिस्‍तान ने विदेशी सुरक्षा एजेंसियों पर प्रतिबंध लगा दिया। बीआरआई मामलों के विशेषज्ञ अलेसांद्रो अरदुइनो ने फाइनेंशियल टाइम्‍स से कहा कि मैं समझता हूं कि यह मुद्दा अब अहम मोड़ पर पहुंच चुका है और सुरक्षा मुहैया कराने के मुद्दे पर चीन पाकिस्‍तान से और ज्‍यादा डिमांड कर रहा है। पाकिस्‍तान में चीनी सुरक्षा एजेंसियां करेंगी, वह पूरी दुनिया के लिए एक लिटमस टेस्‍ट होगा। इससे पता चलेगा कि चीन अपने नागरिकों की पूरी दुनिया में कैसे सुरक्षा करेगा। पाकिस्‍तानी सेना ने चीनियों की सुरक्षा के लिए करीब 15 हजार जवानों को तैनात किया है, इसके अलावा एक नौसैनिक यूनिट को ग्‍वादर में रखा है जहां चीन नौसैनिक अड्डा बना रहा है। इन सैनिकों की तैनाती का पूरा खर्च चीन के रक्षा मंत्रालय को वहन करना पड़ रहा है। बलूच विद्रोहियों ने ग्‍वादर पोर्ट को भी निशाना बनाने का प्रयास किया था जहां बड़ी संख्‍या में चीनी नागरिक काम करते हैं। बलूच 26 मार्च को पाकिस्‍तानी वायुसेना के पीएनएस सिद्दीक एयरबेस को भी निशाना बना चुके हैं। इन हमलों को रोकने में पाकिस्‍तानी सेना को काफी नुकसान पहुंचा है। पाकिस्‍तानी सेना की दुनिया में उड़ेगी खिल्‍ली चीनियों में खौफ की वजह एक यह है कि हाल ही में पाकिस्‍तानी सुरक्षा गार्ड ने दो चीनी वर्कर्स को गोली मार दी थी जिसमें वे बुरी तरह से घायल हो गए थे। इन सब वजहों से चीन पाकिस्‍तान में अपने सुरक्षाकर्मी तैनात करना चाहता है। चीन के सैनिक तैनात होना पाकिस्‍तान की संप्रभुता का खुला उल्‍लंघन होगा और दुनियाभर में पाकिस्‍तानी सेना की जो खिल्‍ली उड़ेगी, वह अलग से होगी। इसी वजह से पाकिस्‍तानी सेना चाह रही है कि चीन जासूसी और निगरानी करने में मदद करे। वहीं चीन के आर्थिक गुलाम बन चुके पाकिस्‍तान में अगर चीनी सेना आती है तो इसका भारत पर भी असर होगा। चीन की सेना पाकिस्‍तान पहुंची तो भारत को खतरा! यह वजह है कि भारत इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर बनाए हुए है। चीन अगर पाकिस्‍तान में अपनी सेना को तैनात करता है तो वे पीओके में भी आएंगे। पीओके से ही होकर सीपीईसी परियोजना जाती है। भारत इसका कड़ा विरोध करता रहा है। भारत ने साफ कहा है कि पीओके उसका हिस्‍सा है और मानता है कि अगर कोई भी विदेशी मौजूदगी नई दिल्‍ली की संप्रभुता का उल्‍लंघन है। भारत ने बार-बार पड़ोसी देशों श्रीलंका, नेपाल और बांग्‍लादेश को चेतावनी दी है कि वे बीआरआई से पैदा होने वाले खतरे से सजग रहें। बीआरआई आज दुनिया में कर्ज के जाल के रूप में देखा जा रहा है। वहीं अगर चीनी सेना पीओके में मौजूदगी बनाने में कामयाब हो जाती है तो इससे भारत के उत्‍तरी सीमा पर उसका प्रभाव काफी बढ़ जाएगा। इससे दोनों देशों से एक साथ निपटने की भारत की रणनीति और जटिल हो जाएगी।

चीन की चाल का खुलासा सैटेलाइट तस्वीरों से हुआ, पैंगोंग झील किनारे बस्ती को आकार दिया जा रहा

बीजिंग भारत और चीन सीमा पर तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखे हुए हैं। हालांकि इस बातचीत का बहुत थोड़ा फायदा होता नजर आ रहा है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर कई बिंदु ऐसे हैं, जहां अब भी भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं। इसमें पूर्वी लद्दाख में स्थित पैंगोंग त्सो झील दोनों देशों के बीच तनाव का एक महत्वपूर्ण स्थल है। अब पता चला है कि चीन इन दिनों भारत से बातचीत की आड़ में पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी तट के पास बड़े पैमाने पर एक बस्ती का निर्माण कर रहा है। चीन की इस चाल का खुलासा सैटेलाइट तस्वीरों से हुआ है, जिसमें बस्ती को आकार लेते देखा जा सकता है। पैंगोंग झील के उत्तर में बन रही बस्ती  हालिया सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी तट के पास एक बड़ी चीनी बस्ती का निर्माण चल रहा है। यह बस्ती भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच 2020 के गतिरोध बिंदुओं में से एक से लगभग 38 किलोमीटर पूर्व में स्थित है, हालांकि यह भारत के क्षेत्रीय दावों से बाहर है। दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झील पैंगोंग त्सो भारत, चीन प्रशासित तिब्बत और उनके बीच विवादित सीमा पर फैली हुई है। 17 हेक्टेयर के क्षेत्र में हो रहा निर्माण कार्य रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कंपनी मैक्सार टेक्नोलॉजीज द्वारा 9 अक्टूबर को कैप्चर की गई सैटेलाइट तस्वीरों में लगभग 17 हेक्टेयर क्षेत्र में तेजी से निर्माण कार्य दिखाया गया है। 4,347 मीटर की ऊंचाई पर येमागौ रोड के पास स्थित यह स्थल निर्माण और मिट्टी हटाने वाली मशीनरी से भरा हुआ है। तक्षशिला संस्थान में जियो पॉलिटिकल रिसर्च प्रोग्राम के प्रोफेसर और प्रमुख वाई निथ्यानंदम के अनुसार, “आवासीय संरचनाओं और बड़ी प्रशासनिक इमारतों सहित 100 से अधिक इमारतें बनाई जा रही हैं। खुली जगहें और समतल भूमि पार्कों या खेल सुविधाओं के लिए संभावित भविष्य के उपयोग का सुझाव देती हैं।” हेलीकॉप्टर के लिए हेलीपैड का भी किया गया निर्माण उन्होंने दक्षिण-पूर्व कोने में 150 मीटर लंबी आयताकार पट्टी की ओर भी इशारा किया, यह अनुमान लगाते हुए कि इसे हेलीकॉप्टर संचालन के लिए तैयार किया जा सकता है। ओपन-सोर्स सैटेलाइट इमेजरी के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि झील की ओर ढलान वाली नदी के किनारे अप्रैल 2024 की शुरुआत में निर्माण शुरू हुआ था। सैन्य सूत्रों के अनुसार, यह बस्ती संभवतः प्रशासनिक और परिचालन क्षेत्रों के बीच अंतर करते हुए दो भागों में विभाजित प्रतीत होती है। एक से दो मंजिला इमारतें बनाई जा रहीं संरचनाओं के छाया विश्लेषण से पता चलता है कि इस बस्ती में एक और दो मंजिला इमारतों का मिश्रण है, पास में छोटी झोपड़ियां हैं, जिनमें से प्रत्येक में छह से आठ लोग रह सकते हैं। दो बड़ी संरचनाएं प्रशासन और भंडारण सुविधाओं के रूप में काम कर सकती हैं। सीधी रेखाओं के बजाय अर्धचंद्राकार लाइनों में डिजाइन किया गया लेआउट लंबी दूरी के हमलों के प्रति असुरक्षा को कम करने के इरादे का सुझाव देता है। ऊंची चोटियों के पीछे बस्ती बना रहा चीन ऊंची चोटियों के पीछे बस्ती का स्थान इसके रणनीतिक लाभ को और बढ़ाता है, जिससे आस-पास के क्षेत्रों से दृश्यता सीमित हो जाती है। निथ्यानंदम ने कहा, “आस-पास की ऊंची चोटियां भूमि-आधारित निगरानी उपकरणों से साइट को अस्पष्ट करती हैं।” सैन्य सूत्रों का अनुमान है कि यदि सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है, तो बस्ती “एड-हॉक फॉरवर्ड बेस” के रूप में कार्य कर सकती है, जिससे चीनी सेना के लिए प्रतिक्रिया समय कम हो सकता है।

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