— विशेष टिपण्णी : गोपाल स्वरूप वाजपेयी, पत्रकार व लेखक ईमानदारी तेरा किरदार है तो खुदकुशी कर ले, सियासी दौर को तो जी हुजूरी की जरूरत है। भ्रष्टाचार का विरोध करने पर एडीएम पद से हटाए गए मध्यप्रदेश के युवा आईएएस लोकेश कुमार जांगिड़ ने इस शायरी से अपना दर्द बयां किया। 2014 बैच का ये आईएएस अफसर एक सप्ताह तक देशभर में सुर्खियों में रहा और अब यह मुद्दा शांत हो गया है। बिना हल निकले इतने गंभीर मामले की इतनी जल्दी हवा निकलना वर्तमान माहौल में कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। ये मामला इसलिए और गंभीर और संवेदनशील है, क्योंकि मख्यमंत्री शिवराज सिंह के करीब 15 साल के कार्यकाल में पहली बार किसी आईएएस अफसर ने निशाने पर लिया और वह भी भ्रष्टाचार के मामले में। गजब यह है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले अपर कलेक्टर को 24 घंटे के अंदर पद से हटा दिया गया लेकिन जिस पर आरोप लगे, यानी जिले के कलेक्टर का बाल बांका नहीं हुआ। ये मुद्दा भले ही शांत हो गया हो, लेकिन कई सवाल भी खड़े कर गया। क्या भ्रष्टाचार का विरोध करना बगावत है? क्या भ्रष्टाचार का विरोध कर आईएएस लोकेश जांगिड़ ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की आचार संहिता का उल्लंघन किया? क्या जिले में तैनात कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक सूबे के मुख्यमंत्री के वसूली एजेंट होते हैं? आईएएस और आईपीएस को जिले में कलेक्टर व एसपी के रूप में तैनात करने के क्या मानक हैं? क्या इन दोनों अफसरों की तैनाती सियासी रसूख के दम पर होती है? क्या कलेक्टर व एसपी बनने के लिए सियासी गलियों में बोली लगती है? क्या कलेक्टर व एसपी का भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगाना मजबूरी है? कलेक्टर व एसपी को जिले से हटाने का क्या पैमाना है? सरकार को डायरेक्ट आईएएस की तुलना में प्रमोटी आईएएस क्यों प्रिय हैं? और सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार को लोगों ने रीति-नीति में गुप्त रूप से शिष्टाचार का दर्जा दे दिया है? क्या भ्रष्टाचार व अनैतिकता का विरोध करने वाले का बहिष्कार नहीं किया जा रहा? दरअसल, आईएएस अफसर लोकेश कुमार जांगिड़ को शिवराज सरकार हरियाणा के आईएएस अफसर खेमका की तर्ज पर फुटबाल बना रही है। 2014 बैच के मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अफसर लोकेश जांगिड़ की फील्ड पोस्टिंग के अभी साढ़े 4 साल हुए हैं, लेकिन उनके 8 बार ट्रांसफर हो चुके हैं। यानी औसतन हर 6 माह में उन्हें हटाया गया। 42 दिन पहले राज्य शिक्षा केंद्र के अपर संचालक से बड़वानी अपर कलेक्टर बनाया गया था, लेकिन अब उन्हें वापस राज्य शिक्षा केंद्र भेज दिया गया है। बड़वानी में पदस्थ होने के बाद उन्हें जिले का कोविड प्रभारी बनाया गया था। इस दौरान जांगिड़ ने पूरे जिले का तूफानी दौरा किया और कोरोना की रफ्तार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। बड़वानी कलेक्टोरेट के अधिकारी बताते हैं कि अप्रैल और मई में वह शायद ही अपने दफ्तर में बैठे। वे हमेशा फील्ड में रहते थे। इसी दौरान जांगिड़ ने आॅक्सीजन कंसट्रेटर की खरीदी में हुए भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया। बड़वानी में कोरोना महामारी में उपकरणों की खरीदी में भारी हेरफेर हुआ था। 39 हजार के आॅक्सीजन कंसंट्रेटर 60 हजार रुपए में खरीदे गए। भ्रष्टाचार के इस खेल में जांगिड़ शामिल नहीं हुए और उन्होंने इसका विरोध किया। यह खरीदी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा के माध्यम से हुई। इसके साथ ही अन्य उपकरणों की खरीदी में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ था। जांगिड़ ने चार्ज लेते ही भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगा दी थी। इसकी कीमत जांगिड़ को देनी पड़ी। जांगिड़ को अपर कलेक्टर के पद से हटा दिया गया। बड़वानी से तबादले के बाद लोकेश जांगिड़ ने बड़वानी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा पर गंभीर आरोप लगाते हुए आईएएस एसोसिएशन के सोशल मीडिया ग्रुप में लिखा कि कलेक्टर पैसा नहीं खा पा रहे हैं। इसलिए वर्मा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कान भर दिए। वे एक ही किरार समुदाय से हैं और कलेक्टर की पत्नी किरार महासभा की सचिव हैं, मुख्यमंत्री की पत्नी अध्यक्ष हैं। नैतिकता का तकाजा कहता है कि इतना गंभीर आरोप लगने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से इस बारे में स्पष्टीकरण जारी होना चाहिए था। लेकिन एक शब्द नहीं कहा गया। चूंकि, बड़वानी कलेक्टर पर सीधेतौर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे तो उन्हें भी पद से हटाया जाना चाहिए था और जांच होनी चाहिए थी। लेकिन ये सब तो बहुत दूर, कलेक्टर को एक नोटिस तक जारी नहीं किया गया। भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों के लिए यह हतप्रभ व हताश करने वाली घटना है। दरअसल, ऐसा माहौल बनता जा रहा है कि भ्रष्टाचार व अनैतिकता पर बहस करना अब समय की बर्बादी है। घोटालों व भ्रष्टाचार के आरोपों को शिवराज सरकार गंभीरता से नहीं लेती। कुछ माह पहले प्रदेश कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि शिवराज सरकार ने सात माह में 17 घोटाले किए। ग्वालियर में आटा घोटाले में गरीब-मजदूरों को 10 किलो आटे के पैकेट में महज छह किलो से लेकर आठ किलो आटा दिया गया। कोरोना काल में बांटे गए त्रिकूट चूर्ण में भी घोटाले का आरोप लगा। शिवराज सरकार ने इन आरोपों पर ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस विपक्षी दल है। इसलिए मान लेते हैं उनका काम ही आरोप लगाना है। लेकिन जब केंद्र की मोदी सरकार की एजेंसियां ही शिवराज सरकार को घोटाले को लेकर एलर्ट करें तो मामला बेहद संगीन हो जाता है। प्रदेश में उपचुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार ने बालाघाट व मंडला में हुए चावल घोटाले पर शिवराज सरकार को पत्र लिखकर जांच के निर्देश दिए थे। केंद्रीय एजेंसी ने माना था कि प्रदेश में बालाघाट और मंडला में पोल्ट्री ग्रेड का चावल गरीबों को बांटा गया है। केंद्र सरकार ने यूरिया घोटाले को लेकर भी शिवराज सरकार को पत्र लिखकर आगाह किया था। केंद्र सरकार ने यूरिया घोटाले में बड़े पैमाने पर कालाबाजारी की जानकारी भी शिवराज सरकार को दी। मध्यप्रदेश में सहकारी समितियों ने किसानों को यूरिया देने के नाम पर बड़ा फजीर्वाड़ा किया। इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार ने शिवराज सरकार को दी थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत शिवपुरी जिले में कटनी और रीवा से दो रैक में 51 हजार क्विंटल चावल पिछले साल जुलाई में आया था। घटिया चावल … Read more