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सरकार इन किसानों को नहीं देगी 21वीं किस्त, तत्काल जानें

The government will not give the 21st installment to these farmers, know immediately नई दिल्ली। देश की तमाम राज्य सरकारें अपने नागरिकों के लिए कई तरह की योजनाएं चलाती हैं। इनमें कई योजनाएं सीधे किसानों के लिए होती हैं। छोटे और सीमांत किसान अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और उन्हें सरकारी मदद की जरूरत होती है। केंद्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना शुरू की गई है। ताकि किसानों की आमदनी बढ़ सके और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो। पीएम-किसान योजना के तहत अब तक किसानों को 20 किस्तें भेजी जा चुकी हैं। सरकार की ओर से 4 महीनों के अंतराल किस्त की राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर होती रही है। योजना का मकसद छोटे किसानों को आर्थिक राहत देना और उनकी खेती से जुड़ी जीवनशैली में सुधार लाना है। इससे किसान अपनी जरूरतें आसानी से पूरी कर सकते हैं। अब कई किसान 21वीं किस्त का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन सभी इसके पात्र नहीं होंगे। कुछ किसानों के खाते में किस्त नहीं जाएगी। क्योंकि उनके दस्तावेज पूरी तरह अपडेट नहीं हैं। ऐसे किसानों को यह काम करने की जरूरत है। जिससे उन्हें योजना का लाभ मिल सके।आपको बता दें 21वीं किस्त का लाभ कई किसानों को नहीं मिलेगा। जिन किसानों ने अब तक ई-केवाईसी और भूसत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की है। उनके खाते में पैसे नहीं आएंगे। इन दोनों प्रक्रियाओं को पूरा करना जरूरी है। तभी 21वीं किस्त का लाभ मिल पाएगा। इसलिए जिन किसानों ने अबतक यह काम नहीं करवाया है। उन्हें तुरंत अपने दस्तावेज अपडेट करने की जरूरत है। ई-केवाईसी पीएम किसान योजना की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर पूरा कर सकते हैं। और अपने भूसत्यापन के लिए भूलेख रिकॉर्ड की वेबसाइट या विभाग जाना होगा। इसके अलावा 21वीं किस्त पाने के लिए जरूरी है कि बैंक खाता, आधार कार्ड और नाम की जानकारी सही हो। अगर कोई जानकारी अधूरी या गलत पाई जाता है तो भुगतान नहीं होगा। अगर आपने भी नहीं करवाया यह काम तो तुरंत करवा लें।

नई नवेली दुल्हन को मायके तो दामाद को ससुराल में क्यों मनानी चाहिए पहली होली, कलह और सास-बहू से जुड़ी है वजह

why newly married women should celebrate first holi in mayke know reason behind relationship between saas bahu हर साल की तरह इस साल भी भारत में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाना है। लोग रंग-बिरंगे रंगों में सराबोर होने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। रंगों की बोछार के बीच लोग गिले-शिकवे भी भूल जाते हैं। नई नवेली दुल्हन अपने मायके में जाकर होली मनाती हैं यहां तक कि दामाद को भी ससुराल में होली मनाने के लिए कहा जाता है। लेकिन आपने कभी सोचा है कि आखिर दुल्हन की पहली होली मायके तो दामाद की ससुराल में क्यों होना चाहिए। और, नई नवेली दुल्हन की तरह क्या प्रेग्नेंट महिलाओं को भी मायके में मायके में होली मनानी चाहिए। इसकी वजह सास-बहू और पति-पत्नी की रिश्तों से जुड़ी हुई है। जिसके बारे में कंटेंट क्रिएटर सोनिया चौहान ने भी बताया है।(सभी फोटो सांकेतिक हैं) सबसे पहले जानें कारण पौराणिक कथा के अनुसार, होलिका एक दिव्य वस्‍त्र को ओढ़कर प्रह्लाद को जलाने के लिए आग में बैठी थी, लेकिन जब प्रह्लाद ने भगवान विष्णु के नाम का जाप किय तो, होलिका का अग्निरोधक वस्त्र प्रह्लाद के ऊपर आ गया और वह बच गए, जबकि होलिका भस्म हो गई। कहते हैं कि जिस दिन होलिका आग में बैठी का काम किया, अगले दिन उसका विवाह भी होना था।उनके होने वाली पति का नाम इलोजी बताया जाता है, इलोजी की मां जब बेटे की बारात लेकर होलिका के घर पहुंची तो उन्होंने उसकी चिता जलते दिखी। बेटे का बसने वाला संसार उजड़ता देख बेसुध हो गईं और प्राण त्याग दिए। बस तभी से प्रथा चला आ रही है कि नई बहू को ससुराल में पहली होली नहीं देखनी चाहिए। सास बहू के झगड़े से जुड़ा कारण होली और होलिका दहन के वक्त सास-बहू का साथ में रहना ठीक नहीं माना जाता है। नई दुल्हन के लिए कहा जाता है कि उसे अपनी पहली होली ससुराल के जगह मायके में मनाना चाहिए। जब सास -बहू अगर साथ में होलिका दहन देखती हैं तो घर में कलह की शुरुआत हो जाती है। सास-ससुर के साथ रिश्ते खराब होने लगते हैं, बिना बात के झगड़े भी होने लगते हैं। सास-बहू के रिश्तों में यदि तकरार हो तो उससे आने वाले समय में तनाव बढ़ जाता है।वहीं एक और धारणा है जो कहीं न कहीं सटीक रहती है कि शादी के तुरंत बाद दुल्हन ससुराल में कंफर्टेबल महसूस नहीं करती है, इसलिए मायके में होली मनाने का चलन है जिसे प्रथा का नाम दे दिया गया है।

International Women’s Day : क्या है वुमन डे का इतिहास? जानें इसे जुड़ी खास बातें

international womens day 2025 history significance and this year theme know here हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. जिसे हमेशा अलग-अलग थीम के साथ सेलिब्रेट किया जाता है. आइए आर्टिकल में जानते हैं अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के शुरुआत कब और कैसे हुई, साथ ही इस साल की थाम के बारे में हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. आजकल महिलाएं घरेलू कामों के अलावा भी अलग-अलग क्षेत्रों में अपने कौशल का प्रदर्शन करती हैं. ऐसे में इस दिन महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों को सम्मानित करने का अवसर होता है. इस दिन का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना और समानता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है. ऑफिस, कॉलेज और कई जगहों पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को सेलिब्रेट किया जाता है. इसकी शुरुआत के पीछे की कहानी के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता होगा. हर साल महिला दिवस को एक थीम के साथ सेलिब्रेट किया जाता है. आइए जानते हैं इस आर्टिकल में इसका इतिहास और इस साल की थीम के बारे में. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास1908 में न्यूयॉर्क शहर में महिलाएं बेहतर कार्य स्थितियों, मतदान अधिकार और समान वेतन के लिए सड़कों पर परेड निकाली थी. 1910 में कोपेनहेगन में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन आयोजित किया गया, जहां क्लारा जेटकिन ने महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा. पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 19 मार्च 1911 में ऑस्ट्रिया, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और डेनमार्क में मनाया गया था. बाद में महिला दिवस की तारीख को बदलकर 8 मार्च कर दिया गया. तब से महिला दिवस पूरी दुनिया में 8 मार्च को ही मनाया जा रहा है. 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार आधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता दी थी. तब से हर साल इसे एक थीम का मनाया जाता है. पहले महिलाओं को समाज में एक सीमित दायरे में रखा जाता था, लेकिन समय के साथ उनकी स्थिति में सुधार हुआ है. आज महिलाएं न केवल घर के कार्यों को संभालती हैं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी कड़ी मेहनत और संघर्ष से सफलता की मिसाल भी प्रस्तुत कर रही हैं. आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में सफलता की नई ऊंचाइयों को छू रही हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी की समस्याएं आज भी महिलाओं की जिंदगी का हिस्सा है. इस दिन का उद्देश्य इन समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाना और समानता की दिशा में कदम बढ़ाना है. क्या है इस साल की थीम?इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम “सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए: अधिकार, समानता. सशक्तिकरण.” है. इस थीम का मतलब सभी महिलाओं के लिए सम्मान, अधिकार, शक्ति और अवसरों से उनके भविष्य को बेहतर बनाना है. इस दिन को मनाने का मतलब सिर्फ ये नहीं है कि हम महिलाओं की सराहना करें, बल्कियह भी है कि हम उन्हें सशक्त बनाने के लिए काम करें. महिलाओं के लिएसम्मान,अवसर, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस इस दिशा में पॉजिटिव बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है.

चैंपियंस ट्रॉफी– भारत को 265 रन का टारगेट: सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया ऑलआउट; शमी को 3, जडेजा–वरुण को 2–2 विकेट; स्मिथ–कैरी की फिफ्टी

Champions Trophy- India has a target of 265 runs दुबई । 38वें ओवर की तीसरी बॉल पर अक्षर ने ग्लेन मैक्सवेल को बोल्ड किया। 37वें ओवर की तीसरी बॉल में मोहम्मद शमी ने स्टीव स्मिथ (73 रन) को फुलटॉस पर बोल्ड किया।चैंपियंस ट्रॉफी के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया टॉस जीतकर बल्लेबाजी कर रहा है। 49 ओवर के बाद टीम का स्कोर 10 विकेट के नुकसान पर 264 रन है।नाथन एलिस (10 रन) को शमी ने कोहली के हाथों कैच कराया। उन्होंने स्टीव स्मिथ (73 रन) और कूपर कोनोली (शून्य) के विकेट लिए। एलेक्स कैरी (60 रन) श्रेयस अय्यर के डायरेक्ट थ्रो पर रनआउट हुए। वरुण चक्रवर्ती ने बेन ड्वारशस (19 रन) और ट्रैविस हेड (39 रन) के विकेट लिए। अक्षर ने ग्लेन मैक्सवेल को बोल्ड किया। रवींद्र जडेजा ने जोश इंग्लिस (11 रन) और मार्नस लाबुशेन (29 रन) को पवेलियन भेजा। मैच दुबई के इंटरनेशनल स्टेडियम में खेला जा रहा है।

Jammu Kashmir Army Vehicle Accident: बांदीपोरा में सेना का ट्रक खाई में गिरा… चार जवानों की मौत, दो घायल

Jammu Kashmir Army Vehicle Accident जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा जिले में बड़ा हादसा हुआ है। सेना का एक वाहन खाई में गिर गया। हादसे में चार सैनिकों की मौत हो गई। जबकि दो अन्य घायल हो गए। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मौके पर राहत एवं बचाव कार्य चल रहा है। जानकारी के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में शनिवार दोपहर यह हादसा हुआ। बताया जा रहा है कि फिसलन के कारण सेना का एक ट्रक पहाड़ी से नीचे खाई में गिर गया। इस हादसे में चार जवानों की मौत हो गई। जबकि दो घायल हो गए। इनकी हालत नाजुक बताई जा रही है। यह दुर्घटना बंदीपोरा के सदरकूट पाईन इलाके में हुई जहां सेना का ट्रक फिसलन के कारण खाई में जा गिरा। हादसे के बाद स्थानीय पुलिस और सेना के अन्य जवान राहत कार्य में जुट गए। इस घटना के कारणों की जांच की जा रही है।

1 जनवरी 2025 से बदल जाएंगे 5 नियम जो डालेंगे आपकी जेब पर असर, ध्यान से कर लें नोट

rules changing from 1st jan 2025 new year things that can affect your finances नए साल के आगाज के साथ बेशक तारीख बदल जाएगी पर तारीख के साथ कुछ ऐसी चीजें भी बदलेंगी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर आपकी जेब को भी प्रभावित करेंगी. 1 जनवरी 2025 से कुछ नए नियम लागू होंगे तो कुछ नए बदलाव होंगे, जिनके बारे में आपको जानना बेहद जरूरी है. फिर चाहे टैक्स से जुड़ा मामला हो, यूपीआई पेमेंट हो, गैस सिलेंडर की कीमतें हों या फिर पीएफ अकाउंट से जुड़ा मामला. इस आर्टिकल में जानें 1 जनवरी 2025 होने वाले ऐसे ही बदलावों के बारे में. लग्जरी वस्तु खरीदने पर देना होगा ज्यादा टैक्स नव वर्ष 2025 में अगर आप कोई लग्जरी चीज खरीदते हैं तो अब आपको इसपर ज्यादा टैक्स देना होगा. दरअसल, बजट में किए गए प्रावधान के मुताबिक लिस्टेड लग्जरी आइटम जिसकी कीमत 10 लाख रु से ज्यागा है तो उसपर टीसीएस (Tax collected at source) का भी भुगतान करना होगा. ये नया नियम 1 जनवरी, 2025 से लागू प्रभावी होगा. वहीं इनकम टैक्स से जुड़े कई नियम नव वर्ष में नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ लागू होंगे. 1 जनवरी 2025 से महंगा पड़ेगा कार खरीदना दिसंबर में जहां कार कंपनियां अपनी कारों में बंपर डिस्काउंट दे रही हैं, तो वहीं 1 जनवरी से ज्यादातर कंपनियों की कीमतें काफी ज्यादा बढ़ने वाली है. इसका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा. दरअसल, 1 जनवरी, 2025 से हुंडई, महिंद्रा, टाटा, मारुति सुजुकी, मर्सिडीज-बेंज, होंडा, ऑडी आदि जैसी कई कार कंपनियां गाड़ियों की कीमतों को 3 प्रतिशत तक बढ़ाने जा रही हैं. उदाहरण के तौर पर 7 लाख रु की कार खरीदने के लिए नए साल में आपको 7 लाख 21 हजार रु चुकाने होंगे. इसके पीछे की वजह मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट में बढ़ोतरी है. ईपीएफओ का राहत देने वाला बदलाव नए साल में जहां कुछ चीजें आपकी जेब पर भारी पड़ेगी तो वहीं कुछ चीजें में राहत भी मिलेगी. इसी में से एक बदलाव ईपीएफओ पेंशन से जुड़ा हुआ है. साल पेंशन धारकों के लिए राहत लेकर आ रहा है. 1 जनवरी, 2025 से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने पेंशन निकासी के नियमों को सरल बना दिया है. अब पेंशनभोगी देश के किसी भी बैंक से अपनी पेंशन निकाल सकेंगे. इसके लिए उन्हें किसी अतिरिक्त सत्यापन की आवश्यकता नहीं होगी. यह सुविधा पेंशनभोगियों के लिए बड़ी राहत है. यूपीआई 123पे के नियमों में बदलाव नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की पेमेंट तकनीक यूपीआई 123पे की लिमिट 1 जनवरी 2025 से बढ़ा दी जाएगी. पहले इस पेमेंट सर्विस के जरिए अधिकतम 5 हजार रु तक का लेनदेन किया जा सकता था, लेकिन अब यह लिमिट बढ़ाकर 10 हजार रु कर दी गई है. गौरतलब है कि यूपीआई 123पे एक ऐसी सेवा है जिससे कीपैड फोन चलाने वाले यूजर बिना इंटरनेट कनेक्शन के यूपीआई पेमेंट कर सकते हैं. LPG सिलेंडर की कीमतोें में बदलाव हर महीने की पहली तारीख को ऑयल व गैस कंपनियां LPG की कीमतों का रिव्यू करती हैं. इसके बाद इनकी कीमतें घटाई या बढ़ाई जाती है. पिछले कुछ महीनों से घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें स्थिर हैं. हालांकि, 1 जनवरी 2025 को इसमें बदलाव भी किया जा सकता है. बता दें कि मध्यप्रदेश में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 808 रु 50 पैसे है.

औषधीय गुणों से भरपूर अर्जुन के पेड़ से संबंधित विस्तृत जानकारी,एवं फायदे

Detailed information and benefits related to Arjuna tree which is rich in medicinal properties. अर्जुन के पेड़ को औषधीय पेड़ माना जाता हैं क्यूंकि इसे बहुत सी दवाइयों के लिए उपयोगी माना जाता है। यह पेड़ ज्यादातर नदी और नालों के किनारे पाए जाते है। अर्जुन का पेड़ सदाहरित रहता हैं। अर्जुन के पेड़ को अन्य कई नामो से जाना जाता हैं जैसे ,घवल और नदीसर्ज। इस पेड़ की ऊंचाई लगभग 60 -80 फ़ीट ऊँची रहती हैं। अर्जुन का पेड़ ज्यादातर उत्तर प्रदेश ,महाराष्ट्र ,बिहार और अन्य कई राज्यों नदियों के किनारे या सुखी नदियों के तल के पास पाए जाते है। अर्जुन का पेड़ कैसा होता हैं अर्जुन के पेड़ की लम्बाई काफी ऊँची रहती है। अर्जुन का पेड़ बहुत ही शुष्क इलाकों में पाया जाता हैं। अर्जुन के पेड़ को किसी भी मिटटी में उगाया जा सकता है। अर्जुन के पेड़ को अनुनारिष्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस पेड़ का उपयोग बहुत सालों से आयुर्वेदिक दवाइयों के लिए किया जा रहा है। अर्जुन के पेड़ का फल कैसा होता हैं अर्जुन के पेड़ का फल शुरुआत हल्के सफ़ेद और पीले रंग का होता हैं ,कुछ समय पश्चात जब फल में बढ़ोत्तरी होती हैं तो ये फल हरे और पीले रंग का दिखाई पड़ता हैं ,साथ ही इसमें से हल्की हल्की सुगंध भी आने लगती है। पकने के बाद ये फल लाल रंग का दिखाई पड़ने लगता है। अर्जुन के पेड़ के पत्ते हैं लाभकारी अर्जुन के पेड़ के पत्ते खाने से ये शरीर में जमा गंदे कॉलेस्ट्रॉल को बाहर निकलता हैं। इसका सेवन सुबह खाली पेट करना चाहिए। इन पत्तों का सेवन करने से ब्लड शुगर नियंत्रित रहता हैं। अर्जुन की छाल से मिलने वाले फायदे अर्जुन की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से खून पतला होता हैं जो शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को संतुलित बनाये रखता है। इस छाल के काढ़े का उपयोग दो से तीन महीने लगातार करना चाहिए। इस काढ़े के उपयोग से रक्तश्राव कम होता है। यह ह्रदय के रक्तचाप जैसी गतिविधियों की क्षमता में सुधार लाता है। पाचन किर्या में सहायक अर्जुन का पेड़ पाचन किर्या में सहायक होता हैं। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर लेने से ये पाचन तंत्र को संतुलित बनाये रखता है। यह बड़े हुए चर्बी को कम करने में मदद करता हैं ,अर्जुन की छाल का सेवन लिवर जैसी समस्याओं के लिए बेहतर माना जाता है। यह वजन घटाने में भी सहायता प्रदान करती है। सर्दी खांसी में है लाभकारी अर्जुन के पेड़ की छाल का कड़ा बनाकर पीने से या फिर अर्जुन के चूर्ण में शहद मिलाकर खाने से सर्दी और खांसी दोनों में फायदा होता है। अर्जुन के पेड़ का रस औषिधि के रूप में सदियों से किया जा रहा हैं। हड्डियों के जोड़ने में मददगार अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग टूटी हुई हड्डियों या फिर मांसपेशियों में होने वाले दुखाव के लिए किया जाता हैं। इसमें छाल के चूर्ण को एक गिलास दूध में दो चम्मच चूर्ण मिलाकर पीने से हड्डियां मजबूत होती है। ये हड्डी में होने वाले दर्द से भी आराम दिलाता हैं। अल्सर बीमारी में है फायदेमंद अर्जुन का प्रयोग अल्सर जैसी बीमारी में भी किया जाता हैं। कई बार अल्सर का घाव जल्द ही नहीं भर पाता हैं। या फिर घाव सूखते ही दूसरे घाव निकल आते हैं ,इसमें अर्जुन के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर ,घाव को इससे धोये। ऐसा करने से घाव कम होने लगते हैं,साथ ही अल्सर जैसे रोग को भी नियंत्रित करता है। अर्जुन की छाल से होने वाले नुकसान अर्जुन के पेड़ को बहुत सी बीमारियों के लिए लाभकारी माना जाता हैं ,लेकिन इसके कुछ नुक्सान भी हैं जो शरीर पर गलत प्रभाव डालते है। सीने में जलन होना अर्जुन की छाल का सेवन बहुत से लोगो की सेहत के लिए ठीक नहीं रहता हैं, जिसकी वजह से उन्हें जी मचलना या घबराहट जैसी परेशानियां अक्सर हो जाती है। यदि आप छाल का सेवन कर रहे हैं और आपको ऐसा महसूस होता हैं की सीने में जलन या दर्द हो रहा हैं तो इसका उपयोग करना उसी वक्त छोड़ दे। पेट में दर्द या ऐठन का महसूस होना यदि छाल का उपयोग करने से आपको पेट में दर्द या और कोई परेशानी महसूस होती हैं तो छाल का सेवन करना बंद कर दे। हालाँकि अर्जुन एक आयुर्वेदिक जड़ीबूटी हैं लड़की कुछ लोगों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। एलेर्जी जैसो रोगों को जन्म देता हैं अर्जुन के पेड़ की छाल का घोल बनाकर शरीर पर लगाया जाता हैं, यह त्वचा के लिए बहुत ही लाभकारी माना जाता हैं। लेकिन इसका लेप बहुत से लोगो के शरीर एलेर्जी से जुडी समस्याओं को भी खड़ा कर देता हैं। यदि इस लेप का उपयोग करने के बाद शरीर में खुजली जैसी परेशानिया हो तो इस लेप का उपयोग न करें। आयुर्वेद में अर्जुन के पेड़ को बहुत ही लाभकारी माना गया हैं। अर्जुन के पेड़ में सबसे ज्यादा उपयोग छाल का किया जाता हैं। अर्जुन के पेड़ की छाल में मैग्नीशियम ,पोटेसियम और कैल्शियम पाया जाता है। इस पेड़ की छल का इस्तेमाल बहुत से रोगो में किया जाता हैं ,और ये लाभकारी भी है। अर्जुन के पेड़ की छाल का उपयोग कैंसर सम्बंधित रोगो से निपटने के लिए भी किया जाता है। साथ ही इसके कुछ नुक्सान भी हैं। जो व्यक्ति पहले से किसी भी प्रकार की कोई दवाई ले रहा हैं ,उसे इसका सेवन डॉक्टर से परामर्श लेकर ही करना चाहिए।

भारत दर्शन : अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तक पहुंचने का सम्पूर्ण मार्गदर्शन

Bharat Darshan: Complete guide to reach Ayodhya Shri Ram Janmabhoomi Temple भोपाल ! अयोध्या उत्तर प्रदेश में स्थित, भारतीय इतिहास और धार्मिक मान्यताओं का अभिन्न अंग है। यह भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में जानी जाती है, जो पूरे भारत और दुनिया भर के लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, इसकी भव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध, हर भक्त के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव है। आइए जानते हैं कि भोपाल सहित मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों से अयोध्या तक कैसे पहुंचा जा सकता है। भोपाल से अयोध्या तक की यात्रा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से अयोध्या पहुंचने के लिए तीन मुख्य साधन उपलब्ध हैं: रेल, सड़क, और हवाई मार्ग। रेल मार्ग: भोपाल से अयोध्या तक ट्रेन यात्रा सबसे लोकप्रिय और किफायती विकल्प है।मुख्य रेलवे स्टेशन: अयोध्या कैंट और फैजाबाद जंक्शन। प्रमुख ट्रेनें: साकेत एक्सप्रेस (भोपाल से फैजाबाद)।गोंडा एक्सप्रेस (भोपाल से अयोध्या के पास)।अन्य ट्रेनें लखनऊ होते हुए उपलब्ध हैं।समय: 12-15 घंटे।किराया: ₹400-₹1500 (स्लीपर से एसी क्लास)। सड़क मार्ग: भोपाल से अयोध्या सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। बसें और निजी वाहन द्वारा यात्रा करना सुविधाजनक है।मार्ग: भोपाल → झांसी → कानपुर → लखनऊ → अयोध्या।समय: 16-18 घंटे।बस किराया: ₹1000-₹2000।निजी वाहन से यात्रा करना चाहें तो यह यात्रा दर्शनीय स्थलों के साथ रोमांचक बन सकती है। हवाई मार्ग: भोपाल से अयोध्या के लिए सीधी उड़ान नहीं है, लेकिन लखनऊ तक फ्लाइट लेकर वहां से अयोध्या पहुंच सकते हैं।हवाई अड्डा: लखनऊ (चौधरी चरण सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा)।भोपाल से लखनऊ फ्लाइट: 1.5 घंटे।लखनऊ से अयोध्या: टैक्सी/बस द्वारा 140 किमी (2-3 घंटे)।किराया: ₹4000-₹8000। मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों से यात्रा मार्गदर्शन उत्तर प्रदेश:उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर जैसे लखनऊ, वाराणसी, और गोरखपुर से अयोध्या आसानी से पहुंचा जा सकता है।लखनऊ से अयोध्या: 140 किमी। टैक्सी और बसें 2-3 घंटे में पहुंचा देती हैं।वाराणसी से अयोध्या: 200 किमी, ट्रेन/बस द्वारा 4-5 घंटे। राजस्थान:जयपुर, कोटा और उदयपुर से अयोध्या के लिए ट्रेन और बसें उपलब्ध हैं। महाराष्ट्र:मुंबई और पुणे से ट्रेनें और फ्लाइट्स उपलब्ध हैं। छत्तीसगढ़:रायपुर और बिलासपुर से ट्रेन और बसें आसानी से उपलब्ध हैं। गुजरात:अहमदाबाद और सूरत से लखनऊ होकर अयोध्या पहुंचा जा सकता है। अयोध्या में प्रमुख आकर्षण यात्रा के लिए उपयोगी सुझाव अयोध्या एक ऐसा शहर है, जो आध्यात्मिकता, भक्ति, और भारतीय इतिहास का प्रतीक है। भोपाल और आसपास के राज्यों से अयोध्या की यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन के लिहाज से भी अद्वितीय है। चाहे आप रेल, सड़क, या हवाई मार्ग से जाएं, यह तीर्थ यात्रा आपको अनमोल अनुभव प्रदान करेगी। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के दर्शन हर व्यक्ति के जीवन का एक यादगार हिस्सा बन सकते हैं। जय श्री राम!

‘उम्मीदवार की जाति, धर्म और नस्ल देखकर वोट…’, मतदाताओं से क्या बोले नितिन गडकरी?

‘Vote considering the caste, religion and race of the candidate…’, what did Nitin Gadkari say to the voters? केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि कांग्रेस ही थी जिसने अपने स्वार्थ के लिए संविधान को तोड़ा-मरोड़ा और अब वह इसका दोष भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर मढ़ रही है. नितिन गडकरी ने काटोल में बीजेपी प्रत्याशी चरणसिंह ठाकुर के लिए एक रैली को संबोधित करते हुए सोमवार (10 नवंबर, 2024) को कहा कि भाजपा न तो डॉ. बी आर आंबेडकर का संविधान बदलेगी और न ही किसी को ऐसा करने देगी. महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 20 नवंबर को होगा और मतगणना 23 नवंबर को होगी. नितिन गडकरी ने कहा, ‘हम न तो बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान बदलेंगे और न ही हमें किसी को ऐसा करने देंगे. संविधान की मूल संरचना को बदला नहीं जा सकता है.’ उन्होंने अपनी बात के समर्थन में ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया. नितिन गडकरी ने कहा, ‘संविधान की मुख्य विशेषताएं जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ मौलिक अधिकारों को कोई भी नहीं बदल सकता है. आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने संविधान को तोड़-मरोड़ा. देश के इतिहास में कांग्रेस ही थी जिसने संविधान को तोड़ने-मरोड़ने का पाप किया और अब वे हम पर दोष मढ़ रहे हैं.’ छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि महाराज ने लोगों को भगवान राम के राम राज्य के समान शिवशाही दी, जिसके बारे में महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि देश में इसे स्थापित किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘अगर आप राम राज्य स्थापित करना चाहते हैं तो यह नेताओं के हाथ में नहीं बल्कि जनता के हाथ में है. जाति, नस्ल, धर्म और भाषा के आधार पर मतदान न करें. कोई व्यक्ति अपनी जाति से नहीं बल्कि अपने गुणों से बड़ा होता है. छूआछूत और जातिवाद खत्म होना चाहिए.’ नितिन गडकरी ने कहा कि जो नेता अपनी योग्यता के आधार पर नहीं जीत सकते, वे चुनावी लाभ के लिए जाति का इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने कहा, ‘आप भोजन और स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छे व्यक्ति के पास उसकी जाति देखे बगैर जाते हैं. जब तक आप ईमानदार, गैर-भ्रष्ट नेताओं और दल को नहीं चुनते, तब तक आपका भविष्य नहीं बदलेगा.’ उन्होंने कहा कि महायुति सरकार लोगों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लेकर आई है. नितिन गडकरी ने पूछा कि क्या इनमें से कोई भी ऐसी योजना है जिसमें मुस्लिम और दलित आवेदन नहीं कर सकते?

मसाले, दूध, तेल में मिलावट पर कानून का शिकंजा: जानें सजा और प्रावधान

Now you will get 10 years imprisonment for selling adulterated milk and ghee, know what the law says भोपाल। भारत में मिलावटी चीजों की भरमार है.। खासतौर से जब आप खाद्य पदार्थों की बात करते हैं तो उसमें सबसे ज्यादा मिलावट देखने को मिलती है। मसाले, दूध, घी, तेल हर चीज में मिलावट होती है. चलिए आज इस खबर में जानते हैं कि अगर कोई मिलावट खोर खाने की चीजों में मिलावट करता पकड़ा गया तो उसे भारतीय कानून के तहत कितनी सजा होगी। क्या कहता है नियम-कानून भारत में मिलावटखोरी और खाद्य सुरक्षा से संबंधित मामलों को देखने के लिए, फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 (Food Safety and Standards Act, 2006) बनाया गया है. इसके अलावा इसके तहत बनाए गए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के नियमों का भी पालन किया जाता है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 को भारतीय खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, स्वच्छता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है। इस कानून के तहत खाद्य पदार्थों में मिलावट को प्रतिबंधित किया गया है और अगर कोई व्यक्ति मिलावटी सामान बेचता पाया जाता है, तो उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होती है। कितनी मिलती है सजा फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति मिलावटी खाद्य पदार्थों का उत्पादन, बिक्री या वितरण करते पाया गया तो इसे गंभीर अपराध माना जाता है। दोषी पाए जाने पर जुर्माना, सजा या दोनों का प्रावधान है. जुर्माने की बात करें तो मिलावटी खाद्य पदार्थों को बनाने और बेचने पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। जबकि, अपराध के गंभीरता को देखते हुए, इस तरह के मामलों में 6 महीने से लेकर 7 साल तक की सजा भी हो सकती है। वहीं अगर मिलावटी खाद्य पदार्थ खाने से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो मिलावटखोर को आजीवन कारावास या 10 साल तक की सजा हो सकती है। धारा 272 और 273 के तहत भी मिलती है सजा फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के अलावा भारतीय दंड संहिता (IPC) में भी मिलावटखोरी से संबंधित अपराधों के लिए दंडात्मक प्रावधान हैं। खासतौर से धोखाधड़ी और आम जनता के जीवन को खतरे में डालने के मामले में है। दरअसल, अगर किसी व्यक्ति द्वारा मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री की जाती है, जिससे किसी जान जाने का खतरा ना हो तो यह धोखाधड़ी के अंतर्गत आता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273 के तहत इसमें, मिलावटी खाद्य पदार्थों को बेचने वाले को 6 महीने से लेकर 2 साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। जबकि, अगर मिलावटी खाद्य पदार्थ से किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हो जाती है या कोई बीमारी फैल जाती है या किसी के जान पर बन आती है तो यह एक गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में, संबंधित व्यक्ति को 3 से 7 साल तक की सजा हो सकती है और उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला: निजी संपत्तियां ‘समुदाय के भौतिक संसाधन’ नहीं, राज्य नहीं कर सकता जबरन अधिग्रहण

Historic decision of the Supreme Court: Private properties are not ‘physical resources of the community’, the state cannot forcibly acquire them नई दिल्ली ! सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सभी निजी स्वामित्व वाली संपत्तियां सामुदायिक संसाधन नहीं होतीं, जिन्हें राज्य आम भलाई के लिए अपने अधीन कर सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8-1 के बहुमत से इस विवादास्पद मुद्दे पर फैसला सुनाया। तीन फैसले लिखे गएमुख्य न्यायाधीश ने अपने और छह सहयोगियों के लिए एक फैसला लिखा, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने एक समवर्ती लेकिन अलग फैसला लिखा और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने असहमति जताई। पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति नागरत्ना बीवी, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति एजी मसीह शामिल थे।यह मामला संविधान के अनुच्छेद 31सी से संबंधित है जो राज्य द्वारा राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को पूरा करने के लिए बनाए गए कानूनों की रक्षा करता है – संविधान सरकारों को कानून और नीतियां बनाते समय पालन करने के लिए दिशा-निर्देश देता है। अनुच्छेद 31सी जिन कानूनों की रक्षा करता है उनमें अनुच्छेद 39बी भी शामिल है। अनुच्छेद 39बी में प्रावधान है कि राज्य अपनी नीति इस प्रकार बनाएगा कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित हो कि सर्वजन हिताय हो। किसी की निजी संपत्ति नहीं हो सकती पब्लिकइस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “क्या 39बी में इस्तेमाल किए गए समुदाय के भौतिक संसाधन में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हैं? सैद्धांतिक रूप से, इसका उत्तर हां है, इस वाक्यांश में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हो सकते हैं। हालांकि, यह न्यायालय रंगनाथ रेड्डी में न्यायमूर्ति अय्यर के अल्पमत के दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। हमारा मानना ​​है कि किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले प्रत्येक संसाधन को केवल इसलिए समुदाय का भौतिक संसाधन नहीं माना जा सकता क्योंकि वह भौतिक आवश्यकताओं की योग्यता को पूरा करता है।”उन्होंने कहा, “39बी के अंतर्गत आने वाले संसाधन के बारे में जांच विवाद-विशिष्ट होनी चाहिए और संसाधन की प्रकृति, विशेषताओं, समुदाय की भलाई पर संसाधन के प्रभाव, संसाधन की कमी और ऐसे संसाधन के निजी लोगों के हाथों में केंद्रित होने के परिणामों जैसे कारकों की एक गैर-संपूर्ण सूची के अधीन होनी चाहिए, इस न्यायालय द्वारा विकसित सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत भी उन संसाधनों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो समुदाय के भौतिक संसाधन के दायरे में आते हैं।”46 साल बाद पलटा फैसला1977 में, सात न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 बहुमत से फैसला सुनाया था कि निजी स्वामित्व वाली सभी संपत्ति समुदाय के भौतिक संसाधनों के दायरे में नहीं आती है। हालाँकि, अल्पमत की राय में, न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने माना कि सार्वजनिक और निजी दोनों संसाधन अनुच्छेद 39(बी) के तहत “समुदाय के भौतिक संसाधनों” के दायरे में आते हैं। अपने अलग फैसले में, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायमूर्ति अय्यर के फैसले पर उनकी टिप्पणियों पर मुख्य न्यायाधीश से असहमति जताई।

राहुल गांधी की कारीगर समुदाय से मुलाकात: पेंटरों और कुम्हारों की चुनौतियों पर चर्चा और आर्थिक सशक्तिकरण की अपील

Rahul Gandhi meets artisan community: discusses challenges in life of painters and potters नेता विपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में पेंटर और कुम्हार समुदाय के सदस्यों के साथ समय बिताया, उनके काम की बारीकियों को समझा और उनकी जिंदगी से जुड़ी परेशानियों पर गहन चर्चा की। राहुल गांधी ने इन मेहनतकश कारीगरों के साथ काम में हाथ बंटाया और उनकी कठिनाइयों को नजदीक से जानने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि ये कारीगर हमारे घरों को अपनी कला से रोशन करते हैं, लेकिन उनके खुद के जीवन में खुशहाली और स्थिरता की कमी है। इसके लिए समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह इन हुनरमंदों को न केवल पहचान दे, बल्कि उनके जीवन को बेहतर बनाने में सहयोग भी करे। पेंटर समुदाय की चुनौतियाँ: सीमित अवसर, जोखिमपूर्ण काम और स्थायित्व की कमी राहुल गांधी ने पेंटर समुदाय के साथ चर्चा करते हुए पाया कि उनके काम में कई तरह की चुनौतियाँ हैं। इन कलाकारों का काम चाहे घरों की दीवारों पर हो या बड़े भवनों पर, इनमें कई जोखिम जुड़े होते हैं। अधिकतर पेंटर अनौपचारिक श्रम बाजार में काम करते हैं, जिसके चलते उन्हें नियमित आय या भविष्य में स्थायित्व की कोई गारंटी नहीं मिलती। कई पेंटरों ने अपनी परेशानियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनके पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं होते, जिससे उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। राहुल गांधी ने इस पर चिंता जताई और कहा कि इस समुदाय को बेहतर उपकरण और सुरक्षा व्यवस्था प्रदान करना अत्यंत जरूरी है। साथ ही, उन्होंने पेंटरों के बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं का समाधान करने पर भी जोर दिया, ताकि इस समुदाय को एक सुरक्षित और बेहतर भविष्य मिल सके। कुम्हार समुदाय से बातचीत: पारंपरिक कला के संरक्षण की जरूरत राहुल गांधी ने कुम्हार समुदाय के साथ बातचीत करते हुए उनकी कला की बारीकियों को समझा। कुम्हारों की कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा है। लेकिन आज, आधुनिकता के इस दौर में यह कला विलुप्त होने के कगार पर है। कुम्हारों ने बताया कि पारंपरिक मिट्टी के बर्तन और मूर्तियाँ बनाने का काम पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है, लेकिन अब प्लास्टिक और मशीनी उत्पादों के कारण उनकी मांग घटती जा रही है। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार और समाज को मिलकर कुम्हारों को उचित बाजार और सहयोग प्रदान करना चाहिए। यदि उनके उत्पादों को बढ़ावा दिया जाए, तो ये लोग न केवल आर्थिक रूप से सशक्त होंगे बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर को भी संजीवनी मिलेगी। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि इस कला को आधुनिक बाजार में स्थान दिलाने के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की भी आवश्यकता है। हुनरमंदों को मौके देने पर जोर: स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण राहुल गांधी का मानना है कि यदि सही प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता मिले तो कारीगर और कलाकार अपनी कला से समाज में योगदान कर सकते हैं और एक आर्थिक संबल पा सकते हैं। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि पेंटरों और कुम्हारों जैसे कारीगरों के लिए विशेष योजनाएं लाई जाएं। उन्होंने कहा कि ऐसे कलाकारों के लिए वित्तीय योजनाओं, लोन स्कीम और सरकारी सब्सिडी की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि उन्हें अपनी कला को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक आधार मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय बाजारों और कला मेलों का आयोजन करने का सुझाव दिया, जहां ये कलाकार सीधे अपने उत्पादों को बेच सकें और उचित मुनाफा कमा सकें। समाज के प्रति संदेश: कला और मेहनत की इज्जत करें राहुल गांधी ने इस मुलाकात के दौरान एक संदेश दिया कि समाज को इन मेहनतकशों के योगदान को समझना चाहिए और उनकी कला का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेंटर और कुम्हार जैसे लोग हमारे घरों और समाज को सुंदर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर हम इनकी कला और मेहनत की इज्जत करेंगे और इन्हें सहयोग देंगे, तो एक समृद्ध और सशक्त समाज की स्थापना हो सकती है। राहुल गांधी की यह पहल न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि यह समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया कि कैसे नेता जनता के करीब जाकर उनकी असली समस्याओं को समझ सकते हैं और उनके समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

पूर्वी लद्दाख में शांति की ओर कदम: भारतीय सेना ने डेमचोक में गश्त फिर से शुरू की, दिवाली पर हुआ मिठाईयों का आदान-प्रदान

Step towards peace in Eastern Ladakh: Indian Army resumes patrolling in Demchok, sweets exchanged on Diwali पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले प्रमुख बिंदुओं से भारतीय और चीनी सैनिकों के पूरी तरह पीछे हटने के कुछ ही दिनों बाद भारतीय सेना ने शुक्रवार (1 नवंबर 2024) को डेमचोक में गश्त फिर से शुरू कर दी। सेना के सूत्रों ने इसे भारत-चीन संबंधों में स्थिरता की दिशा में एक सकारात्मक संकेत बताया है। सूत्रों के अनुसार, डेमचोक में गश्त शुरू हो चुकी है, और जल्द ही भारतीय सेना देपसांग में भी गश्त पर लौटेगी। इससे पहले दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत सैनिकों ने टकराव वाले बिंदुओं से पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी की थी। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति को बहाल करना है, जब लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों में तनाव गहरा गया था। दिवाली पर सीमा पर मिठाईयों का आदान-प्रदान समझौते के ठीक एक दिन बाद, दिवाली के अवसर पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर विभिन्न सीमा बिंदुओं पर भारतीय और चीनी सैनिकों ने मिठाईयों का आदान-प्रदान किया। इसे दोनों देशों के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध की एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इस परंपरागत आदान-प्रदान में दोनों पक्षों में सौहार्द और मित्रता का माहौल देखने को मिला। गलवान झड़प के बाद चार साल से जारी गतिरोध में सफलता जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया था और पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर गतिरोध जारी था। लेकिन विदेश सचिव विक्रम मिस्री के अनुसार, हाल ही में हुई बातचीत के बाद दोनों देशों ने गतिरोध समाप्त करने के एक महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति जताई है। इस समझौते को 2020 में उत्पन्न हुए मुद्दों को हल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। गश्त की बहाली से अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति की ओर वापसी सेना के सूत्रों का कहना है कि गश्त बहाली के लिए स्थानीय स्तर पर कमांडरों के बीच बातचीत जारी रहेगी। इसके साथ ही भारतीय सेना अप्रैल 2020 से पहले की गश्त वाली स्थिति और स्तर को बहाल करने का प्रयास करेगी। सत्यापन प्रक्रिया चल रही है और गश्त के तरीकों पर चर्चा और निर्णय हो रहे हैं। भारत-चीन के बीच यह प्रगति दोनों देशों के बीच शांति और सामंजस्य बढ़ाने का एक कदम है, जो आने वाले समय में स्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

जनगणना 2025: नई चुनौतियाँ और राजनीतिक रणनीतियाँ

Census 2025: New challenges and political strategies केंद्र सरकार ने देश में जनगणना कराने की पूरी तैयारी कर ली है। यह प्रक्रिया अगले साल से शुरू होकर एक साल में पूरी होगी और 2026 में इसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे। इस जनगणना में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि इस बार सर्वे में सम्प्रदाय की जानकारी भी पूछी जाएगी, जिससे देश के विभिन्न सम्प्रदायों की जनसंख्या के आधार पर योजनाएं बनाई जा सकेंगी। जनगणना में कुल 30 सवाल शामिल होंगे, जो पिछली 2011 की जनगणना में पूछे गए 29 सवालों से एक अधिक है। देरी के कारण और नई समय-सीमायह जनगणना 2021 में ही होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसे स्थगित करना पड़ा। इसके बाद लोकसभा चुनावों के चलते इसे और आगे बढ़ाया गया। अब सरकार ने इस पर तेजी से कदम बढ़ा दिए हैं, क्योंकि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन किया जाएगा, जो 50 वर्षों से रुका हुआ है। संप्रदाय आधारित सवालों का राजनीतिक महत्वइस बार जनगणना में शामिल किए गए सम्प्रदाय आधारित सवाल विशेष चर्चा का विषय हैं। जनगणना में कबीरपंथी, रविदासी, दलित बौद्ध और अन्य सम्प्रदायों के बारे में पूछा जाएगा। इसके पीछे उद्देश्य केवल आंकड़े इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि इन आंकड़ों के आधार पर सरकारी योजनाओं को बेहतर बनाना और समाज में राजनीतिक समीकरणों को समझना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सम्प्रदाय आधारित आंकड़े राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि यह राजनीतिक दलों को इन सम्प्रदायों के आधार पर नीतियां बनाने और समर्थन प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं। परिसीमन और महिला आरक्षण2029 में लोकसभा सीटों में वृद्धि और महिला आरक्षण की संभावनाओं के चलते यह जनगणना और भी महत्वपूर्ण हो गई है। परिसीमन के आधार पर सीटों के पुनर्गठन से भारत के जनसांख्यिकीय बदलावों का सीधा असर चुनावी सीटों पर पड़ेगा, जो विभिन्न राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करेगा। जाति जनगणना पर चुप्पीहालांकि जाति जनगणना पर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन सूत्रों के अनुसार सम्प्रदाय की जानकारी पूछे जाने की तैयारी चल रही है। इससे राजनीतिक लाभ के साथ-साथ योजनाओं के क्रियान्वयन में भी सहयोग मिलेगा। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं और उनकी जनसंख्या के अनुपात को समझने में सहायता मिलेगी, जिससे विकास कार्यों में पारदर्शिता आएगी। आगामी जनगणना न केवल देश की जनसांख्यिकी को समझने का एक साधन होगी, बल्कि इसके माध्यम से राजनीतिक दलों को नई योजनाएं और विकास की दिशा तय करने का आधार मिलेगा। इस बार जनगणना के व्यापक परिणाम, भारतीय राजनीति और समाज दोनों पर गहरे असर डाल सकते हैं। इस बार जानकारी में लोगों से उनका संप्रदाय भी पूछा जाएगा। कबीरपंथी, रविदासी, दलित बौद्ध समेत देश के अलग-अलग राज्यों में कई संप्रदाय हैं। ऐसे में संप्रदाय भी राजनीति का एक बड़ा आधार हो सकता है। इस तरह 30 सवाल जनगणना में पूछे जाएंगे। ये हैं वो सवाल जिनका जवाब हर घर से लिया जाएगा व्यक्ति का नाम।परिवार के मुखिया से संबंध?लिंग?जन्मतिथि और आयु?मौजूदा वैवाहिक स्थिति?शादी के वक्त उम्र?धर्म?संप्रदाय?अनुसूचित जाति या जनजाति?दिव्यांगता (यदि हो तो)मातृभाषा कौनसी?कौन-कौन सी भाषाओं का ज्ञान?साक्षरता की स्थिति क्या?मौजूदा शैक्षणिक स्थितिउच्चतम शिक्षा कितनी?बीते साल का रोजगार?आर्थिक गतिविधि की श्रेणी?रोजगार?उद्योग की प्रकृति, रोजगार एवं सेवाएं?वर्कर्स की क्लास?गैर-आर्थिक गतिविधि ?कैसे रोजगार की चाह?काम पर जाने का माध्यम? (i) एक तरफ से दूरी।(ii) यात्रा का माध्यम। जन्म मूल स्थान पर ही हुआ या फिर कहीं और (दूसरे देश में हुआ हो तो उसका नाम)मूल स्थान पर हैं या पलायन किया? (a) क्या भारत में ही पलायन किया?(b) किस समय पलायन किया? मूल स्थान से पलायन का कारण?कितनी संतान? (a) बेटे कितने ?(b) बेटियां कितनी? जन्म लेने वाले कितने बच्चे जीवित? (a) बेटे कितने ?(b) बेटियां कितनी? बीते एक साल में पैदा बच्चों की संख्या?पलायन के बाद कितने साल से नए स्थान पर ?पलायन से पूर्व का मूल स्थान?

सुकमा में बड़ी सफलता: 24 लाख के इनामी 6 नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण, दंपती भी शामिल

Big success in Sukma: 6 Naxalites with a reward of Rs 24 lakh surrendered, couple also included सुकमा। छत्‍तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति के तहत सोमवार को बड़ी सफलता मिली, जब कुल 24 लाख रुपये के इनामी 6 नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के सामने आत्मसमर्पण किया। इन नक्सलियों में एक दंपती भी शामिल है, जिनमें से प्रत्येक पर पांच-पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था। आत्मसमर्पण करने वाले इन नक्सलियों को पुनर्वास नीति के तहत शासन की सुविधाओं का लाभ मिलेगा। इन नक्सलियों ने सीआरपीएफ डीआईजी आनंद सिंह और सुकमा एसपी किरण चव्हाण के सामने आत्मसमर्पण किया। अधिकारियों ने इस मौके पर आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास योजनाओं की जानकारी दी और भविष्य में मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया। पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर किया सरेंडरआत्मसमर्पण के दौरान इन नक्सलियों ने स्वीकार किया कि वे लंबे समय से संगठन में सक्रिय थे, लेकिन नियद नेल्ला नार और सरकार की पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पण से बढ़ी सुरक्षा बलों की हौसलाअफजाईयह आत्मसमर्पण सुरक्षा बलों के लिए बड़ी उपलब्धि है, जिससे क्षेत्र में शांति बहाली के प्रयासों को नई ताकत मिली है। सुकमा एसपी किरण चव्हाण ने बताया कि जिले में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन और पुनर्वास नीति की वजह से नक्सली संगठनों में फूट पड़ रही है, और कई नक्सली मुख्यधारा में लौट रहे हैं। सरकार की पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर किया सरेंडरछत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लागू की गई पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को सहायता प्रदान की जा रही है, जिससे वे समाज में अपनी पहचान बना सकें। नीति के अंतर्गत उन्हें विभिन्न आर्थिक और सामाजिक योजनाओं का लाभ मिलता है। अधिकारियों ने बताया कि इन नक्सलियों को अब पुनर्वास योजना के तहत रोजगार, शिक्षा, और सामाजिक सुरक्षा का लाभ दिया जाएगा। क्षेत्र में शांति स्थापना की ओर एक कदमसुकमा जिले में आत्मसमर्पण की बढ़ती घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि सुरक्षा बलों और पुनर्वास नीति के संयुक्त प्रयासों के कारण नक्सली हिंसा का प्रभाव कम हो रहा है। अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि आने वाले समय में और भी नक्सली संगठन छोड़कर मुख्यधारा में लौटेंगे, जिससे क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी।

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