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हजारों सैनिकों की शुरू कर दी मिलिट्री ड्रिल, अब किम जोंग से पंगा ले रहे डोनाल्ड ट्रंप

वासिंगटन. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बीते 10 दिनों से जारी भीषण युद्ध का कोई अंत फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और जंग का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच अब अमेरिका ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उत्तर कोरिया का भड़कना तय है। दरअसल अमेरिका ने सोमवार को दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अभ्यास में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जिससे उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन का पारा चढ़ सकता है। दक्षिण कोरिया के ‘ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ’ ने जानकारी देते हुए बताया कि लगभग 18,000 कोरियाई सैनिक इस ‘फ्रीडम शील्ड’ अभ्यास में हिस्सा लेंगे, जो 19 मार्च तक चलेगा। हालांकि अमेरिकी सेना ने दक्षिण कोरिया में इस अभ्यास में शामिल अपने सैनिकों की संख्या नहीं बताई है इन दोनों सहयोगी देशों का यह संयुक्त अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है जब दक्षिण कोरियाई मीडिया में अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिका कुछ सैन्य संसाधनों को दक्षिण कोरिया से हटा कर ईरान के खिलाफ लड़ाई में ले जा रहा है। पैट्रियट मिसाइल सिस्टम पश्चिम एशिया भेजे जाने की खबरें इससे पहले ‘यूएस फोर्सेज कोरिया’ ने पिछले सप्ताह कहा था कि सुरक्षा कारणों से वह सैन्य संसाधनों की विशिष्ट गतिविधियों पर टिप्पणी नहीं करेगी। वहीं दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने भी इस खबर पर टिप्पणी करने से इनकार किया कि कुछ अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और अन्य उपकरण पश्चिम एशिया भेजे जा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि इससे सहयोगी देशों की संयुक्त रक्षा रणनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। बौखला सकता है उत्तर कोरिया ‘फ्रीडम शील्ड’ अभ्यास को लेकर उत्तर कोरिया की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। उत्तर कोरिया लंबे समय से सहयोगी देशों के संयुक्त अभ्यासों को आक्रमण का पूर्वाभ्यास बताता रहा है और इसे अपने सैन्य प्रदर्शनों और हथियार परीक्षणों को बढ़ाने का बहाना बनाता रहा है। अमेरिका एवं दक्षिण कोरिया का कहना है कि ये अभ्यास रक्षा उद्देश्य के लिए होते हैं।

जंग के बीच ट्रंप को ₹16 लाख करोड़ का झटका, US पर दोहरी मार, भारत को राहत की उम्मीद

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को एक और झटका लगा है। न्यूयॉर्क के एक फेडरल जज ने फैसला सुनाया है कि जो कंपनियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए टैरिफ का पेमेंट कर चुकी हैं, उन्हें रिफंड मिलना चाहिए। एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, U.S. कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने फैसले में लिखा है कि रिकॉर्ड में दर्ज सभी इंपोर्टर्स सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फायदा पाने के हकदार हैं। ट्रंप की तरफ से पिछले साल भारत समेत करीब 60 देशों के खिलाफ जारी किए गए टैरिफ ऑर्डर्स को इस साल फरवरी महीने में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द घोषित कर दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़े लेवी लगाकर अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA), 1977 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी घोषित किया है। इसी के तहत ट्रंप ने पिछले साल टैरिफ लगाए थे। ट्रंप को 16 लाख करोड़ रुपये का झटका   कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार को 175 अरब डॉलर का रिफंड चुकाना पड़ सकता है. न्यूयॉर्क के फेडरल जज रिचर्ड ईटन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार ने जिन भी कंपनियों से अवैध टैरिफ वसूला है, उन्हें अब रिफंड करना होगा. ये कंपनियां अपना पैसा वापस पाने की हकदार हैं. जज ईटन ने कहा कि रिफंड का दायरा सिर्फ अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा,उन आयातकों पर भी लागू होगा, जिन्होंने टैक्स चुकाया है.  कोर्ट के इस फैसले से अमेरिकी खजाने पर करीब 16 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा.बता दें कि अमेरिका ने दिसंबर दिसंबर 2025 तक टैरिफ से 130 अरब डॉलर की कमाई की। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.   क्या भारत को इस फैसले से फायदा मिलेगा ?  टैरिफ हटने के बाद अमेरिका की ओर से कुल इंपोर्ट टैक्स 10 फीसदी का है. जिसका फायदा भारतीय निर्यातकों को मिला. अगर रिफंड की बात करें तो भारत को सीधे तौर पर इसका फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि भारतीय निर्यातकों ने टैरिफ का भुगतान नहीं किया, बल्कि अमेरिकी आयातकों ने भारत पर लगाए गए टैरिफ का भुगतान अमेरिकी सरकार को किया था. इस शुल्क का बोझ आयातकों ने ग्राहकों पर डाला. अमेरिकी बाजार में भारतीय प्रोडक्ट्स के लिए प्रतिस्पर्धा कड़ी हो गई. भारतीय सामान महंगे हो गए . इस टैरिफ के हटने और रिफंड का फायदा भी उन आयातकों को मिलेगा, जिन्होंने शुल्क चुकाया था.  हालांकि अप्रत्यक्ष लाभ भारत को मिलेगा, क्योंकि टैरिफ कम होने से भारत से सामान खरीदना सस्ता और आसान हो जाएगा, अमेरिकी बाजार में भारत के सामान सस्ते हो जाएंगे.  भारतीय कंपनियों को इस फैसले से लाभ मिलेगा, उनका निर्यात बढ़ेगा ईटन खास तौर पर एटमस फिल्ट्रेशन के एक केस पर फैसला सुना रहे थे। यह नैशविले, टेनेसी की एक कंपनी है, जो फिल्टर और दूसरे फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है। कंपनी टैरिफ रिफंड के अधिकार का दावा कर रही है।इस सप्ताह की शुरुआत में एक और फेडरल कोर्ट ने रिफंड प्रोसेस को धीमा करने की ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया। U.S. कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने रिफंड प्रोसेस का अगला फेज शुरू किया और इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजकर इसे सुलझाने के लिए कहा। अब U.S. कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी को रिफंड प्रोसेस करने का कोई तरीका निकालना होगा। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.  

महिला नेता पर राष्ट्रपति ट्रंप का गुस्सा, टैरिफ वृद्धि से दिखाया विरोध

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है। ट्रंप ने कहा, ‘मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।’ ट्रंप ने कहा, ‘नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।’ उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था। पहले भी किया था दावा दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, ‘मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।’ खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं। भारत के साथ डील हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

डोनाल्ड ट्रंप बोले- हो गई डील, अब रूस और ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा भारत

नई दिल्ली. भारत और अमेरिका के बीच अभी कोई ट्रेड डील फाइनल नहीं हो पाई है लेकिन भारत को लेकर दावे करने से डोनाल्ड ट्रंप चूकते नहीं हैं। उन्होंने शनिवार को कहा कि भारत ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा। उन्होंने कहा, हम लोगों ने इसको लेकर डील कर ली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत के सामने वेनेजुएला से तेल खरीदने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि भारत ने उसपर क्या प्रतिक्रिया दी है, यह सामने नहीं आया है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस और ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। जिस वेनेजुएला से आज ट्रंप तेल खरीदने की बात कर रहे हैं, उसी वेनेजुएला से तेल खरीदने पर वह विरोध भी करते थे। हालांकि अब उन्होंने वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति को बंधक बना लिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए चीन का भी स्वागत है। कहां पहुंची है ट्रेड डील की बातचीत भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों देश इसे जल्द पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को यह जानकारी दी उन्होंने भरोसा जताया कि निकट भविष्य में इस मोर्चे पर अच्छी खबर दी जाएगी। गोयल ने कहा, ”हर मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) अपनी शर्तों और खूबियों पर टिका होता है। हमारी बातचीत बहुत अच्छी चल रही है। अमेरिका में मेरे समकक्ष और मेरे बीच बहुत ही शानदार कामकाजी संबंध और व्यक्तिगत मित्रता है। हम इस समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं।” जब उनसे पूछा गया कि ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (भारत-ईयू समझौता) के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच ‘फादर ऑफ ऑल डील्स’ कब तक हकीकत बनेगी, तो उन्होंने कहा कि व्यापार समझौतों के लिए कभी कोई समय सीमा तय नहीं की जाती। इन्हें दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए सही समय पर अंतिम रूप दिया जाएगा। अगले सप्ताह वॉशिंगटन की अपनी निर्धारित यात्रा से पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बृहस्पतिवार को अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिजों और रक्षा सहित द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख आयामों पर चर्चा की। उम्मीद है कि वह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। जब गोयल से पूछा गया कि क्या रूसी तेल की खरीद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का कारण है, तो उन्होंने कहा, ”मुझे नहीं लगता कि यह कोई बाधा या अड़चन है। कुछ गलतफहमियां हो सकती थीं, जिन्हें काफी हद तक सुलझा लिया गया

डोनाल्ड ट्रंप ढाई महीने में क्यों लिया यू-टर्न?, PAK को आतंकी पनाहगाह कहा फिर अचानक उसी पर हुए मेरबान

नई दिल्ली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए नया यात्रा प्रतिबंध लगाया है, जो 19 देशों पर लागू होते हैं। जिन देशों पर ये बैन लगाए गए हैं, उनमें मुख्य रूप से अफ्रीका और पश्चिम एशिया के देश शामिल हैं। इनमें 12 देश ऐसे हैं, जिसके नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। इनमें अफगानिस्तान, म्यांमा, चाड, कांगो गणराज्य, इक्वेटोरियल गिनी, इरीट्रिया, हैती, ईरान, लीबिया, सोमालिया, सूडान और यमन शामिल हैं। इसके अलावा सात अन्य देशों से आने वाले नागरिकों पर भी आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। इनमें बुरुंडी, क्यूबा, ​​लाओस, सिएरा लियोन, टोगो, तुर्कमेनिस्तान और वेनेजुएला शामिल हैं। इस अपडेटेड लिस्ट में देशों को शामिल करते हुए तर्क दिया गया है कि इनसे अमेरिका को सुरक्षा खतरा है लेकिन पाकिस्तान पर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने पिछले ढाई महीने में यू-टर्न लेते हुए अलग रुख दिखाया है। मार्च तक पाकिस्तान को भी इस लिस्ट में शामिल किए जाने की चर्चा चल रही थी लेकिन अब जब लिस्ट सामने आई है तो उससे पाकिस्तान का नाम गायब है। दिलचस्प यह भी है कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रुख में यह नरमी तब आई है, जब भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सबसे खराब और तनावपूर्ण दौर में हैं। बड़ी बात यह है कि अमेरिकी अधिकारियों द्वारा लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवादी नेटवर्क को पनाह देने का आरोप लगाया जाता रहा है, बावजूद इसके यात्रा प्रतिबंध वाले देशों की लिस्ट से पाकिस्तान का नाम गायब है। पाकिस्तान को इस लिस्ट से बाहर रखने का यह हालिया फैसला डोनाल्ड ट्रम्प के पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल (2017 से 2021 तक) के दौरान उनके कार्यों और बयानों के बिल्कुल विपरीत है, जब उन्होंने इस्लामाबाद द्वारा आतंकवाद के कथित समर्थन पर काफी सख्त रुख अपनाया था। ट्रंप के रुख में अचानक बदलाव क्यों? रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में ट्रंप प्रशासन के एक आंतरिक ज्ञापन ने पुष्टि की थी कि सुरक्षा खतरों के रूप में पाकिस्तान को भी यात्रा प्रतिबंध वाली संशोधित सूची में शामिल करने पर विचार किया गया था लेकिन अब जब अंतिम सूची जारी की गई, तो उससे पाकिस्तान का नाम हटा दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अचानक यह बदलाव तब किया गया है, जब पाकिस्तान और ट्रम्प परिवार से जुड़ी व्यापारिक संस्थाओं के बीच व्यावसायिक और राजनीतिक संबंध गहरे हो रहे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि ये वही डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिन्होंने 2018 में कहा था कि अल-कायदा नेता ओसामा बिन लादेन को छिपाने में पाकिस्तान की मिलीभगत थी। उन्होंने तब कहा था, “पाकिस्तान में सैन्य अकादमी के ठीक बगल में रहने के कारण, पाकिस्तान में हर कोई जानता था कि लादेन वहीं है।” ट्रंप ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान आतंकवादियों का पनाहगाह है और इस वजह से अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता में 300 मिलियन डॉलर की कटौती की थी। इसके बाद अमेरिका ने 2019 में कई पाकिस्तानी अधिकारियों और सरकार के प्रतिनिधियों पर वीजा बैन भी लगाया था। ट्रंप परिवार से क्या कनेक्शन? दरअसल, पाकिस्तान के प्रति ट्रंप की नरमी का यह रुख इसलिए सामने आया है क्योंकि पाकिस्तान और वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (WLF) के बीच क्रिप्टोकरेंसी को लेकर अप्रैल में एक समझौता हुआ है। WLF संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित एक फिनटेक फर्म है और कथित तौर पर WLF ट्रम्प परिवार के सदस्यों से जुड़ा हुआ है, जिसमें एरिक ट्रम्प, डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर और जेरेड कुशनर शामिल हैं। ये लोग सामूहिक रूप से WLF के स्वामित्व में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। अप्रैल में हस्ताक्षरित इस समझौते में पाकिस्तान में ब्लॉकचेन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना और राष्ट्रीय संपत्तियों को टोकन करना शामिल है। अप्रैल में जब इस्लामाबाद में WLF का प्रतिनिधिमंडल यह समझौता करने पहुंचा तो उसमें ट्रंप के पुराने मित्र और मध्य-पूर्व में अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बेटे जैचरी विटकॉफ भी शामिल थे। पाक सेना प्रमुख, पीएम और मंत्रियों ने बिछाए थे पलक पवाड़े पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने खुद आगे बढ़कर WLF प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया था। बाद में इस प्रतिनिधिमंडल से खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, उप प्रधानमंत्री इशाक डार और रक्षा और सूचना मंत्रियों सहित शरीफ सरकार की बड़ी हस्तियों ने भी मुलाकात की थी। तभी से यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि इन हस्तियों की बैठकों में मौजूदगी से साफ है कि यह कोई साधारण वाणिज्यिक समझौता नहीं था। अब ट्रंप ने पाकिस्तान को उस लिस्ट से बाहर कर उस गठजोड़ का खुलासा खुद कर दिया है।  

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारत से बाचतीत के लिए राष्ट्रपति ट्रंप से मदद की गुहार लगाई

इस्लामाबाद  आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया में अलग-थलग पड़ रहा पाकिस्तान अब भारत से बाचतीत के लिए छटपटा रहा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मदद की गुहार लगाई है। इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शहबाज शरीफ ने भारत के साथ तनाव कम करने में ट्रंप की कथित भूमिका के लिए खूब तारीफ की। इस दौरान शहबाज ने वॉशिंगटन से दोनों देश के बीच व्यापक बातचीत की सुविधा शुरू करने में मदद का आग्रह किया। शहबाज ने ट्रंप को दिया क्रेडिट अमेरिका की आजादी की 249वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति की तारीफ की और युद्ध विराम सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को श्रेय दिया। शहबाज ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बिना किसी संदेह के यह दिखा दिया है कि ‘वे शांति और लाभकारी व्यापारिक सौदों के पक्षधर हैं।’ भारत ने साफ कहा है कि युद्धविराम में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के सुर में सुर मिला रहे थे, जिन्होंने दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष रोकने में मदद के लिए ट्रंप को क्रेडिट दिया था। वॉशिंगटन में पाकिस्तानी पत्रकारों से बात करते हुए बिलावल ने कहा कि ’10 अलग-अलग मौकों पर उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम की सुविधा प्रदान करने का श्रेय लिया है – और यह सही भी है। वह इस श्रेय के हकदार हैं, क्योंकि उनके प्रयासों से ही युद्ध विराम संभव हो पाया।’ भुट्टो ने आगे कहा ‘अगर अमेरिका इस युद्ध विराम को बनाए रखने में पाकिस्तान की मदद करने को तैयार है, तो यह उम्मीद करना उचित है कि व्यापक वार्ता की व्यवस्था करने में अमेरिकी भूमिका हमारे लिए भी फायदेमंद होगी।’ शहबाज शरीफ ने भारत पर उकसावे के तहत हमला करने का आरोप लगाया और कहा कि पाकिस्तान ने भारतीय आक्रमण का संयम और धैर्य के साथ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भारत को ‘ठोस सबूतों के साथ सामने आना चाहिए था और दुनिया को घटना के बारे में आश्वस्त करना चाहिए था।’

Donald Trump का ये विधेयक अमेरिका के लिए मुसीबत, जाएंगी 8.30 लाख से ज्‍यादा नौकरियां

वाशिंगटन डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने अमेरिका में एक नया प्रस्‍ताव पेश किया है, जो ‘One Big, Beautiful Bill Act’ है. यह एक ऐसा बिल है, जिसकी चर्चा सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी हो रही है. यह बिल अमेरिका के 2017 के टैक्‍स कट को स्‍थायी बनाने का प्रयास है. यह एक व्‍यापक विधेयक है, जिसमें सीमा सुरक्षा, खर्च और टैक्‍स शामिल किए गए हैं. यह बिल कई चीजों को लेकर राहत भी देता है, लेकिन कुछ चीजों पर विवाद भी पैदा कर रहा है. सबसे ज्‍यादा विवाद का विषय अमेरिका में रह रहे दूसरे देश के लोगों द्वारा घर पैसा भेजने पर 5 प्रतिशत का टैक्‍स लगाने पर है. इसके अलावा, रिन्‍यूवेबल एनर्जी जैसी चीजों के लिए सब्सिडी खत्‍म करना. वहीं इस बिल को लेकर कुछ रिपोर्ट का दावा है कि इससे अमेरिका पर भारी कर्ज बढ़ेगा, करीब 36 ट्र‍िलियन डॉलर तक कर्ज में इजाफा हो सकता है. इकोनॉमी पर भी गहरा असर होगा और 8.30 लाख से ज्‍यादा नौकरियां चली जाएंगी. वहीं अमेरिका में रहने वाले लोगों के घरों का बिल भी बढ़ जाएगा. बाइडेन के फैसले को बदलता है ये बिल ट्रंप का यह विधेयक बाइडेन युग के उस आदेश को समाप्त कर देगा, जिसके अनुसार 2032 तक नई कार की बिक्री में दो-तिहाई इलेक्ट्रिक वाहन होंगे. विधेयक में तेल, गैस और कोयला निकालने के लिए कंपनियों द्वारा भुगतान की जाने वाली रॉयल्टी रेट्स में कटौती का प्रस्ताव है. बाइडेन ने रिन्‍यूवेबल एनर्जी जैसी चीजों को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी लेकर आए थे, लेकिन अब इस विधेयक से सबकुछ समाप्‍त होने वाला है. खासकर रिन्‍यूवेबल एनर्जी सेक्‍टर्स पर इसका गहरा असर होगा.  830,000 से ज्‍यादा नौकरियां खतरे में द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि क्‍लीन एनर्जी प्रोत्साहन को खत्म करने के लिए रिपब्लिकन द्वारा किया गया प्रयास अमेरिका को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा, क्योंकि इससे 830,000 से अधिक नौकरियां खत्म हो जाएंगी, अमेरिकी घरों के लिए ऊर्जा बिल बढ़ जाएंगे और लाखों टन अधिक प्रदूषण फैलने का खतरा होगा, जो जलवायु संकट का कारण बन रहा है. रिन्‍यूवेबल एनर्जी के लिए सब्सिडी हो जाएगी खत्‍म ट्रंप का यह विधेयक बाइडेन द्वारा हस्ताक्षरित जलवायु कानून के प्रमुख तत्वों को खत्म करता है, जिसने पूरे अमेरिका में रिन्‍यूवेबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों में निवेश को बढ़ावा दिया था. ‘बिग, ब्यूटीफुल’ बिल इस साल इलेक्ट्रि कारों के लिए टैक्‍स क्रेडिट समाप्त कर सकता है. विंड, सोलर एनर्जी और यहां तक ​​कि परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए प्रोत्साहन धीरे-धीरे कम हो जाएंगे और 2032 तक पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगे. अमेरिका के लिए नुकसानदायक बिल द गार्जियन की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह रिपोर्ट आपके सोच से भी बदतर है. इससे डेली के खर्च सैकड़ों डॉलर तक बढ़ सकता है और जलवायु परिवर्तन पर किसी भी तरह की कार्रवाई को कम करता है. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि आप नहीं बता सकते हैं कि US की स्थिति कमजोर करने में यह कितना खास होगा. महंगाई, टैरिफ और बिजली के बढ़ते उपयोग के साथ यह प्रस्‍ताव आना नहीं चाहिए था. यह अमेरिका के लिए नुकसानदायक बिल है. अमेरिकी इकोनॉमी के लिए भी खतरा इकोनॉमिक्‍स टाइम्‍स की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बदलावों से 10 सालों मे अमेरिका की GDP में 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्‍यादा की कमी आएगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रस्तावित बिल से ऊर्जा बिलों में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. 2035 तक, औसत परिवार को ऊर्जा बिलों में 230 डॉलर से अधिक की वृद्धि का सामना करना पड़ने का अनुमान है.  

मीटिंग के दौरान ट्रंप ने अचानक ही रामफोसा को नस्लवाद के मुद्दे पर घेरना शुरू कर दिया फिर वह हुआ …….

वाशिंगटन व्हाइट हाउस में एक बार फिर इतिहास दोहराया गया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा से भिड़ गए. दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच ठीक वैसी ही तीखी बहस हुई, जैसे कुछ महीने पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और ट्रंप के बीच देखने को मिली थी. दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामफोसा 19 मई को वॉशिंगटन पहुंचे थे. उनकी इस यात्रा का मकसद अफ्रीका और अमेरिका के संबंधों में नई जान फूंकना है. लेकिन व्हाइट हाउस में इस मीटिंग के दौरान ट्रंप ने अचानक ही रामफोसा को नस्लवाद के मुद्दे पर घेरना शुरू कर दिया. ट्रंप ने सिरिल रामफोसा पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में दक्षिण अफ्रीका में श्वेत किसानों का नरसंहार हो रहा है और आप तमाशबीन बने हुए हैं. इस आरोप को जैसे ही रामफोसा ने खारिज करना शुरू किया. ट्रंप ने बिग स्क्रीन पर एक वीडियो दिखाया. इस  वीडियो में दावा किया गया कि दक्षिण अफ्रीका में हजारों श्वेत किसानों की हत्या की गई है. इस दौरान ट्रंप ने मीडिया में छपे कुछ लेख की कॉपी भी सिरिल रामफोसा को दिखाई, जिसमें अफ्रीका में श्वेत किसानों के नरसंहार का दावा किया गया है. रामफोसा को ये कॉपी दिखाते हुए ट्रंप ने जोर देकर कहा Death, Death… इससे माहौल बहुत तनावपूर्ण हो गया. रामफोसा ने ट्रंप को नेल्सन मंडेला की याद दिलाई… ट्रंप के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सिरिल रामफोसा ने कहा कि अफ्रीका में हिंसा बढ़ी है और सभी जातियां और वर्ग इससे जूझ रहे हैं. इन हिंसा में मारे गए लोग सिर्फ श्वेत नहीं है बल्कि अश्वेत भी मारे जा रहे हैं. श्वेतों से ज्यादा अश्वेत लोगों की हत्याएं हुई हैं. रामफोसा ने कहा कि मैंने पहले कभी यह वीडियो नहीं देखा है. हम इसकी प्रमाणिकता का पता लगाएंगे कि वीडियो कहां का है. हमारे देश में अपराध है और इससे सभी प्रभावित हैं फिर चाहे वह श्वेत हो या अश्वेत. मेरी अमेरिकी यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर करना था, जो 1994 में रंगभेद युग के बाद से निचले स्तर पर हैं. इस दौरान रामफोसा ने ट्रंप को कतर की सरकार से गिफ्ट में मिले रॉयल प्लेन पर भी तंज कसा. उन्होंने कहा कि हमारी सरकार दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद दूर करने की कोशिश कर रही है. हालांकि, मुझे दुख है कि मेरे पास आपको देने के लिए विमान नहीं है, जिस पर ट्रंप ने कहा कि काश आपके पास होता. बता दें कि ट्रंप के कतर दौरे के दौरान अमेरिका को कतर सरकार की ओर से 3400 करोड़ रुपये का लग्जरी प्लेन गिफ्ट किया गया था. बता दें कि फरवरी महीने में ही ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका को दी जाने वाली सहायता रोकने की घोषणा की थी, जिसका कारण उन्होंने वहां श्वेत लोगों के खिलाफ कथित उत्पीड़न और भूमि अधिग्रहण की नीतियों को बताया था. रामाफोसा ने इसका जवाब देते हुए ट्रंप से दक्षिण अफ्रीका के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने को कहा था. बता दें कि इस साल 20 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद यह दूसरा मौका है, जब उनकी व्हाइट हाउस में किसी देश के राष्ट्रपति के साथ बहस हुई. इससे पहले 28 फरवरी को ट्रंप की यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ यूक्रेन जंग पर व्हाइट हाउस में तीखी बहस हुई थी.  

राष्ट्रपति ट्रंप ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का टैक्स छूट का दर्जा समाप्त कर दिया

  वॉशिंगटन     अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का टैक्स छूट (Tax Exempt) का दर्जा समाप्त कर दिया है. ट्रंप ने शुक्रवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में इसकी घोषणा की. उनका यह कदम हार्वर्ड जैसी प्रतिष्ठित संस्था पर सरकार की कड़ी निगरानी और नीतिगत बदलावों की ओर इशारा कर सकता है. डोनाल्ड ट्रंप ने 2 मई 2025 को ऐलान किया कि उनका प्रशासन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का टैक्स-छूट (Tax-Exempt) का दर्जा समाप्त करने जा रहा है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, ‘हम हार्वर्ड का टैक्स-छूट दर्जा समाप्त करने जा रहे हैं. वो इसी लायक हैं.’ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिया है कि उनका प्रशासन हार्वर्ड विश्वविद्यालय को अनुदान रोक सकता है, जिसने उनके निर्देशों का पालन नहीं किया है।”और ऐसा लगता है कि हम उन्हें अब और अनुदान नहीं देने जा रहे हैं, है न लिंडा?” समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ट्रम्प की टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने अमेरिकी शिक्षा सचिव लिंडा मैकमोहन का हवाला दिया था। उन्होंने कहा, “अनुदान देना हमारे विवेक पर निर्भर है और वे वास्तव में अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं। इसलिए यह बहुत बुरा है।” विश्वविद्यालय ने पहले ट्रम्प प्रशासन की मांगों की एक सूची को अस्वीकार कर दिया था जिसका उद्देश्य विविधता पहलों पर अंकुश लगाना और यहूदी-विरोधी भावना से लड़ना था। ट्रम्प ने हार्वर्ड को उदारवादी गड़बड़ बताया इससे पहले, डोनाल्ड ट्रम्प ने हार्वर्ड को “यहूदी विरोधी, अति वामपंथी संस्थान” कहा था, क्योंकि विश्वविद्यालय ने उनके प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। ट्रम्प ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा, “यह जगह एक उदारवादी गड़बड़ है”, उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ने “पूरी दुनिया से ऐसे छात्रों को प्रवेश दिया है जो हमारे देश को तोड़ना चाहते हैं।” ट्रम्प प्रशासन का हार्वर्ड पर दावा ट्रम्प प्रशासन ने बार-बार हार्वर्ड विश्वविद्यालय पर अमेरिका के सहयोगी देश इजरायल के खिलाफ परिसर में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों को लेकर निशाना साधा है। विश्वविद्यालय ने इससे पहले ट्रम्प प्रशासन की मांगों की सूची को अस्वीकार कर दिया था, जिसका उद्देश्य विविधता संबंधी पहलों पर अंकुश लगाना और यहूदी-विरोधी भावना से लड़ना था, तथा इसे मुक्त भाषण और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमला बताया था। हार्वर्ड के खिलाफ कार्रवाई ट्रम्प प्रशासन ने विश्वविद्यालय के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। हार्वर्ड के लिए संघीय निधि में लगभग 9 बिलियन डॉलर की औपचारिक समीक्षा शुरू की गई, विविधता, समानता और समावेशन प्रथाओं पर विश्वविद्यालय प्रतिबंध की मांग की गई, और कुछ फिलिस्तीनी समर्थक समूहों पर कार्रवाई की गई। इसके अतिरिक्त, प्रशासन ने विश्वविद्यालय के विदेशी संबंधों के बारे में और अधिक जानकारी मांगी, इसकी कर-मुक्त स्थिति और विदेशी छात्रों को दाखिला देने की इसकी क्षमता को हटाने का प्रस्ताव रखा। अमेरिकी प्रशासन ने यूनिवर्सिटी के लिए संघीय निधि में 2.3 बिलियन डॉलर की राशि रोक दी। इसके बाद हार्वर्ड ने ट्रम्प प्रशासन पर मुकदमा दायर किया। हार्वर्ड के अतिरिक्त, डोनाल्ड ट्रम्प ने फिलिस्तीन समर्थक विरोध प्रदर्शन, DEI, जलवायु पहल और ट्रांसजेंडर अधिकारों जैसे मुद्दों पर अन्य शैक्षणिक संस्थानों को संघीय वित्त पोषण में कटौती की धमकी दी। हार्वर्ड $1 बिलियन के निजी इक्विटी फंड को बेचने के लिए बातचीत कर रहा है मामले से परिचित एक व्यक्ति के हवाले से रॉयटर्स ने खबर दी है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय की संस्था एक अरब डॉलर मूल्य के निजी इक्विटी फंड को बेचने के लिए बातचीत कर रही है , क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संस्था को संघीय धन देने पर रोक लगा दी है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल शुरू हुई बिक्री प्रक्रिया का राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा वित्त पोषण में कटौती से कोई संबंध नहीं है।  

Trump ने कर दिया अमेरिकी शिक्षा विभाग को बंद करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर, क्या है मामला

वाशिंगटन  अमेरिका में एजुकेशन डिपार्टमेंट यानी शिक्षा विभाग पर ताला लग गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने उस आदेश पर अपनी कलम भी चला दी है. जी हां, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शिक्षा विभाग को ‘खत्म’ करने के उद्देश्य से एक आदेश पर हस्ताक्षर किए. यह अमेरिकी दक्षिणपंथियों का दशकों पुराना लक्ष्य रहा है. वो चाहते हैं कि अलग-अलग राज्य संघीय सरकार से मुक्त होकर खुद स्कूलों का संचालन करें. व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में डेस्क पर बैठे स्कूली बच्चों से घिरे डोनाल्ड ट्रंप एक खास समारोह में हस्ताक्षर करने के बाद आदेश दिखाते हुए मुस्कुरा रहे थे. समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यह आदेश संघीय शिक्षा विभाग को हमेशा के लिए खत्म करने की शुरुआत करेगा. हम इसे बंद करने जा रहे हैं और जितनी जल्दी हो सके इसे बंद कर देंगे. यह हमारे लिए कुछ नहीं कर रहा है. हम शिक्षा को वापस राज्यों को सौंपने जा रहे हैं, जहां यह होना चाहिए.’ हालांकि, यह भी सच है कि 1979 में बनाए गए अमेरिकी शिक्षा विभाग को कांग्रेस की मंजूरी के बिना बंद नहीं किया जा सकता है. लेकिन ट्रंप के आदेश में इसे फंड और स्टाफ से वंचित करने की शक्ति होने की संभावना है. यह कदम डोनाल्ज ट्रंप के एक चुनावी वादे को पूरा करता है. यह सरकार के क्रूर बदलाव के अब तक के सबसे कठोर कदमों में से एक है जिसे ट्रंप टेक टाइकून एलन मस्क की मदद से अंजाम दे रहे हैं. आदेश में शिक्षा सचिव लिंडा मैकमोहन को ‘शिक्षा विभाग को बंद करने और शिक्षा प्राधिकरण को राज्यों को वापस करने की सुविधा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने’ का निर्देश दिया गया है. शिक्षा विभाग को आखरि ट्रंप ने क्यों किया ‘बंद’? ट्रंप ने राष्ट्रपति की कुर्सी पर वापसी के लिए अपने चुनावी कैंपेन में एक वादा किया था- वादा था कि शिक्षा का विकेंद्रीकरण करने का. यानी केंद्र सरकार के हाथ में शिक्षा की बागड़ोर नहीं होगी. उन्होंने कहा था कि वह विभाग की शक्तियों को राज्य सरकारों को सौंप देंगे, जैसा कि कई रिपब्लिकन दशकों से चाहते थे. बता दें कि परंपरागत रूप से, अमेरिका में शिक्षा में फेडरल सरकार (केंद्रीय सरकार) की सीमित भूमिका रही है. प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों के लिए केवल 13 प्रतिशत फंड केंद्र के खजाने से आता है. बाकी राज्यों और स्थानीय समुदायों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है. लेकिन कम आय वाले स्कूलों और विशेष जरूरतों वाले छात्रों के लिए केंद्र से आने वाला फंड अमूल्य है, उनके चलने का जरीया है. अब तक फेडरल सरकार छात्रों के लिए प्रमुख नागरिक अधिकार सुरक्षा लागू करने में आवश्यक रही है.

अब चीन का एक्शन, अमेरिकी आयात पर इतने प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने एक्शन से टैरिफ वॉर शुरू करते दिख रहे हैं और इसने वर्ल्ड इकनॉमी में खलबली मचा दी है. अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप एक के बाद एक देशों से आयात पर टैरिफ (टैक्स) लगा रहे हैं और अब दूसरे देश जवाबी कदम उठा रहे हैं. मंगलवार, 4 मार्च को पहले कनाडा, मैक्सिको और चीन के खिलाफ ट्रंप के नए टैरिफ की घोषणा की और इसके लागू होते ही चीन और कनाडा ने जवाबी कार्रवाई का ऐलान कर दिया है. यहां हम आपको बताएंगे कि अमेरिका ने किन देशों पर कितना टैरिफ लगाया है और उन देशों ने जवाब में क्या कदम उठाए हैं. फिर आपको आसान शब्दों में बताएंगे कि टैरिफ होता क्या है और ट्रंप इसका इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं. अमेरिका ने किसपर कितना टैरिफ लगाया? राष्ट्रपति ट्रंप ने कनाडा और मैक्सिको के खिलाफ 25% टैरिफ और चीन के खिलाफ 20% टैरिफ की घोषणा की है. चीन पर पिछले महीने जो 10% टैरिफ लगाया गया था, उसे अब दोगुना कर दिया गया है. चीन की जवाबी कार्रवाई बीजिंग के वित्त मंत्रालय ने चिकन, गेहूं, मक्का और कपास सहित कई अमेरिकी कृषि आयातों पर 15% टैरिफ की घोषणा की है. साथ ही सोयाबीन, पोर्क, बीफ, फल, सब्जियां और डेयरी उत्पादों जैसे अन्य उत्पादों पर 10% टैरिफ लगाया है. ये टैक्स 10 मार्च से लागू होंगे. साथ ही चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने 10 अमेरिकी कंपनियों को तथाकथित “अविश्वसनीय इकाई सूची” (unreliable entity list) में और 15 अमेरिकी संस्थाओं को निर्यात नियंत्रण सूची में जोड़ा है, जो आज से प्रभावी हो जाएगा. जिन अमेरिकी संस्थाओं को चीन ने निशाना बनाया है, उनमें अमेरिकी बायोटेक फर्म इल्लुमिनिया (Illuminia) शामिल है. चीन ने इल्लुमिनिया पर आरोप लगाया है कि वह “चीनी कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कदम” उठाती है. 4 मार्च से इल्लुमिनिया को चीन में जीन अनुक्रमण यानी सिक्वेंसिंग की मशीनों के निर्यात पर बैन लगा दिया है. चीन की निर्यात नियंत्रण लिस्ट में जोड़ी गई 15 संस्थाओं में एविएशन, समुद्री इंजीनियरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं. कनाडा ने भी टैरिफ लादा कनाडा ने घोषणा की है कि वह 4 मार्च से 107 बिलियन डॉलर (155 बिलियन कनाडाई डॉलर) के अमेरिकी सामानों पर 25% का जवाबी टैरिफ लगाएगा. रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडाई प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अमेरिका के टैरिफ को टालने के प्रयास में कहा कि अगर ट्रंप प्रशासन अपनी योजना पर अमल करता है तो कनाडा मंगलवार से अमेरिकी सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा. मैक्सिको ने भी कर ली तैयारी बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जहां एक तरफ कनाडा और चीन पहले ही जवाबी टैरिफ लगाने की कसम खा चुके हैं, वहीं मेक्सिको भी 24 घंटे के अंदर जवाबी टैरिफ लगा सकता है. मैक्सिको से होने वाले आयात पर अमेरिका के 25% टैरिफ लागू होने से पहले, मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने कहा कि उनके देश ने आकस्मिक योजनाएं बनाई हैं. उन्होंने कहा, “इस स्थिति में, हमें संयम, शांति और धैर्य की आवश्यकता है. हमारे पास प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी और यहां तक ​​कि प्लान डी भी है.” शीनबाम ने कहा कि वह कनाडाई समयानुसार मंगलवार को मेक्सिको के जवाब के बारे में और बात करेंगी. टैरिफ क्या होता है? टैरिफ दूसरे देशों से आयात होने वाली वस्तुओं पर लगाया जाने वाला टैक्स है. जो कंपनियां विदेशी सामान देश में लाती हैं वे सरकार को टैक्स देती हैं. सरकार इस टैक्स को बढ़ाकर उस सामान की कीमत बढ़ा सकती है और टैक्स कम करके उसकी कीमत कम कर सकती है. यानी कुल मिलाकर सरकार टैरिफ के जरिए इस चीज को कंट्रोल करती है कि उसे देश में कौन सा विदेशी सामान चाहिए और कितना चाहिए. आमतौर पर, टैरिफ किसी प्रोडक्ट के कीमत का एक खास प्रतिशत होता है. आपको उदाहरण से बताते हैं. जैसे ट्रंप ने चीन पर 20% टैरिफ लगाया है. अब इसका मतलब हुआ कि चीन से अगर 10 डॉलर का कोई सामान अमेरिका के अंदर आता है तो उसपर 2 डॉलर का अतिरिक्त टैक्स लगेगा. अब यह कंपनियों पर निर्भर करता है कि वो टैरिफ की कुछ या पूरी लागत अपनी ग्राहकों पर डालती है या नहीं. अब अमेरिका में चीन, कनाडा और मेक्सिको से आने वाले सामान की कीमत अचानक से बढ़ सकती है. ट्रंप टैरिफ क्यों लगा रहे हैं? इसका आसान सा जवाब ट्रंप के चुनावी स्लोगन ‘अमेरिका फर्स्ट’ में छिपा है. ट्रंप संरक्षणवादी है यानी अमेरिका के अपने बिजनेस को तरजीह देते हैं. ऐसे में जो टैरिफ वाला हथकंडा है वो ट्रंप की आर्थिक योजनाओं का एक केंद्रीय हिस्सा है. उनका कहना है कि टैरिफ से अमेरिकी के अंदर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और नौकरियों की रक्षा होगी, साथ ही सरकार को मिलने वाला टैक्स बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होगी. ड्रग्स सप्लाई पर ऐक्शन ट्रंप ने फरवरी में तीनों देशों पर टैरिफ जड़ने का ऐलान किया था। ट्रंप के मुतबिक कनाडा और मेक्सिको की सीमा से अवैध नशीले पदार्थों का कारोबार चल रहा है जिसकी रोकथाम के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। बाद में कनाडा और मेक्सिको की ओर से सीमा सुरक्षा को लेकर वादे करने पर उनके ऊपर 25% टैरिफ के फैसले को एक महीने के लिए स्थगित कर दिया था। उनसे सोमवार को इस बारे में सवाल किया गया कि क्या अभी दोनों देशों से इसे लेकर कोई डील की जा सकती है तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया और दोहराया कि टैरिफ मंगलवार से लागू हो रहे हैं। ट्रंप ने 2 अप्रैल से जवाबी टैरिफ जड़ने का ऐलान भी किया है। फरवरी अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर ट्रंप ने कहा था कि मेक्सिको और कनाडा से अभी भी बड़े और अस्वीकार्य स्तर पर ड्रग्स आ रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक 1 लाख से ज्यादा लोगों की मौत इन ड्रग्स के कारण हुई है। उन्होंने दावा किया था कि इनमें से ज्यादातर, जो फेंटनिल प्रकार के हैं, वे चीन से सप्लाई हो रहे हैं। अपने हालिया फैसले में ट्रंप ने चीन के ऊपर लगने वाली 10% ड्यूटी के ऊपर अतिरिक्त 10% ड्यूटी जड़ दी है। राष्ट्रपति का आरोप है कि चीन ने अवैध ड्रग्स के कारोबार को रोकने के … Read more

डोनाल्ड ट्रंप का गाजा का पुनःनिर्माण में निकल जाएंगा पसीना! सिर्फ मलबा साफ करने में 1.2 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च

गाजा  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पर कब्जा करने और उसे जन्नत बनाने की बात कही है। ट्रंप के बयान ने दुनिया को चौंका दिया है। अरब देशों के साथ साथ अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने भी उनके प्लान की निंदा की है। डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा को ‘मध्य पूर्व का रिवेरा’ बनाने और ‘गाजा को फिर से महाने बनाने’ का अपना प्लान पेश किया है। जिसके तहत गाजा में रहने वाले करीब 23 लाख लोगों को उन्होंने मिस्र, जॉर्डन और अरब देशों में भेजने की पेशकश की है। हालांकि, उनके प्लान को अरब देशों ने फौरन ही खारिज कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप के प्लान पर विवाद जरूर हो रहे हैं, लेकिन एक सवाल भी उठ रहे हैं कि इजरायली बमबारी में ध्वस्त हो चुके गाजा का फिर से निर्माण कैसे होगा? डोनाल्ड ट्रंप के प्लान पर शक करने वाले लोगों का कहना है, कि असल में ये गाजा में रहने वाले लोगों के सफाए के लिए बनाया गया ये एक फॉर्मूला है। लोगों का कहना है कि ट्रंप का प्लान असल में गाजा पर कब्जा करना है। लेकिन सवाल ये है, कि गाजा को जन्नत बनाने में कितने साल लगेंगे? और गाजा स्वर्ग की तरह दिखे, ऐसा होने में जो खर्च आएगा, उसे कौन वहन करेगा? एक्सपर्ट्स का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के लिए जो प्लान किया है, उसे पूरा करने में कई सालों का वक्त लगेगा और अरबों डॉलर का खर्च आएगा। गाजा को फिर से बनाने में कितने साल लगेंगे? गाजा में जिस तरह की बर्बादी फैली है, उसे देखते हुए एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि पुननिर्माण में कम से कम 20 सालों से ज्यादा का वक्त लगेगा। गाजा को साफ करने में अमेरिका को लाखों टन मलबा पट्टी से बाहर निकालना होगा। मलबे को निकालने में ही कई सालों का वक्त लग जाएगा। सवाल ये भी हैं, कि आखिर इतना मलबा कहां रखा जाएगा? ब्रिटिश सेना के कर्नल रिचर्ड केम्प ने द सन की रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप के प्लान का समर्थन किया है। उन्होंने इसे एक तार्किक योजना बताया है। उन्होंने कहा, कि “गाजा के पुनर्निर्माण में कम से कम एक दशक का समय लगेगा।” केम्प ने द सन की रिपोर्ट में कहा है, कि “गाजा को एक ऐसी जगह में बदलने के लिए, जहां लोग फिर से रह सकें, इसमें शायद कम से कम एक दशक लगने वाला है।” उन्होंने कहा, कि “इसमें शायद अरबों डॉलर खर्च होंगे, लेकिन मध्य पूर्व में कई अरब देश हैं, और वो इस प्रोजेक्ट में मदद दे सकते हैं।” हालांकि, बुधवार को व्हाइट हाउस ने कहा है, कि ट्रंप ने फिलिस्तीनी एन्क्लेव के अपने प्रस्ताव के तहत गाजा पट्टी में अमेरिकी सैनिकों को तैनात करने के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने संवाददाताओं से कहा, कि ट्रंप का मानना है कि “क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए” गाजा के पुनर्निर्माण में संयुक्त राज्य अमेरिका को शामिल होना चाहिए। गाजा पट्टी में कितनी बर्बादी फैली है? यूनाइटेड नेशंस ने अनुमान लगाा है, कि गाजा में करीब 50 मिलियन टन मलबा फैला है, जिसे साफ करने में 21 सालों का वक्त लग सकता है। अनुमान में कहा गया है, कि गाजा पट्टी से सिर्फ मलबा साफ करने में 1.2 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो सकते हैं। केम्प ने कहा कि, “मेरा मानना है, कि गाजा में लोगों को ट्रंप के प्लान के मुताबिक अलग रखा जाए, सुरंगों को साफ किया जाए, हथियारों को हटाया जाए और फिर एक नये गाजा का निर्माण किया जाए। हवाई अड्डे का निर्माण हो, बंदरगाह का निर्माण हो और ये सभी के लिए बेहतर होगा।” लेकिन असल सवाल ये है, कि क्या गाजा से लोगों को निकालना संभव है? डोनाल्ड ट्रंप ने सुझाव दिया है, कि गाजा के लोगों को निकालकर अस्थाई तौर पर मिस्र और जॉर्डर में बसाया जाए, जिसे दोनों देशों ने खारिज कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, कि “गाजा के लोगों ने मौत और विनाश के अलावा कुछ नहीं देखा है और अगर नये गाजा का निर्माण होगा, तो कौन होगा जो वापस नहीं जाना चाहेगा।” अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, गाजा “मध्य पूर्व का रिवेरा” होगा। लेकिन, सवाल ये है कि क्या ऐसा संभव है?

अमेरिका गाजा पट्टी में आर्थिक विकास करेगा जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार और आवास उपलब्ध हो सकेगा: डोनाल्ड ट्रंप

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रत्याशित ऐलान करते हुए कहा कि अमेरिका गाजा पट्टी पर अपना स्वामित्व कायम करेगा और उसे अपने अधीन करेगा। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका गाजा पट्टी में आर्थिक विकास करेगा जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार और आवास उपलब्ध हो सकेगा। ‘व्हाइट हाउस’ में ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में ये बातें कहीं। हालांकि, ट्रंप ने कहा कि वहां मौजूद सभी खतरनाक बमों और अन्य हथियारों को निष्क्रिय करने, जगह को समतल करने और तबाह हो चुकी इमारत को हटाने की जिम्मेदारी हमारी होगी। हालांकि, उन्होंने इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी कि वहां किसे रहने की अनुमति दी जाएगी। इस बीच अमेरिकी सांसद और ट्रंप की पार्टी की सदस्य नैन्सी मेस ने आह्वान किया, “आइए, गाजा को मार-ए-लागो में तब्दील करें।” रिपब्लिकन सांसद मेस ने यह टिप्पणी और आह्वान तब किया, जब सोशल मीडिया पर ट्रंप के बयान की तीखी आलोचना हो रही है। हालांकि, कई लोग गाजा को अमेरिका के अधीन करने के ट्रंप के प्रस्ताव का समर्थन भी कर रहे हैं। मेस अकेली नहीं हैं, जो ट्रंप के इस अभियान की समर्थक बनकर उभरी हैं। क्या है मार-ए-लागो मार-ए-लागो, संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में पाम बीच के बैरियर द्वीप पर 17 एकड़ में बना एक रिसॉर्ट है। यह एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल भी है, जिसमें 126 कमरे हैं। यह 62,500 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला है। 1985 से डोनाल्ड ट्रम्प के स्वामित्व में है। 2019 से यह संपत्ति उनका प्राथमिक निवास स्थान है। 1924 और 1927 के बीच फ्लोरिडा भूमि बूम के दौरान मार-ए-लागो का निर्माण व्यवसायी और सोशलाइट मार्जोरी मेरिवेदर पोस्ट के लिए किया गया था। 1973 में अपनी मौत से पहले पोस्ट ने राष्ट्रीय उद्यान सेवा को ये रिसॉर्ट दे दिया था। बाद में 23 दिसंबर 1980 को अमेरिकी संसद के अधिनियम 96-586 द्वारा पोस्ट फाउंडेशन को इसे वापस कर दिया गया था। 1985 में रियल इस्टेट कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप ने इसका अधिग्रहण कर लिया था। इसे विंटर व्‍हाइट हाउस भी कहा जाता है। ट्रंप ने मार-ए-लागो को 10 मिलियन डॉलर में खरीदा था और अब इसकी कीमत 342 मिलियन डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में करीब 3 हजार करोड़ रुपए है। इसमें 128 कमरे, 58 बेडरूम और 33 बाथरूम हैं। बाथरूम तक में सोने की परत चढ़ी है। साथ ही यहां थिएटर, प्राइवेट क्लब और स्पा भी हैं। इसे ब्रह्मांड का केंद्र भी कहा जाता है। गाजा पट्टी का भूगोल कैसा है मेसी की तरह अन्य कई रिपब्लिकन चाहते हैं कि भूमध्यसागर के पूर्वी किनारे पर 41 किलोमीटर लंबे और 6 से 12 किलोमीटर चौड़ी गाजा पट्टी, जिसका कुल क्षेत्रफल 360 वर्ग किलोमीटर है, का अमेरिकी सरकार मार-ए-लागो की तर्ज पर विकास और पुनर्निर्माण करे। फिलहाल इजरायली हमले में गाजा पट्टी तबाह हो चुकी है और वहां की इमारतें खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। इजरायल और हमास के बीच 15 महीने से चल रहे संघर्ष में गाजा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिसमें 47,000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। दूसरी तरफ, सऊदी अरब, जॉर्डन और मिस्र जैसे अन्य इस्लामिक देशों ने पहले ही ट्रम्प के गाजा पर कब्जा करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र में भी फिलिस्तीनी राजदूत ने कहा कि यह हमारी मातृभूमि है और किसी को नहीं दे सकते। इस बीच, इजरायल सरकार और हमास के बीच युद्ध विराम समझौते के बावजूद मध्य पूर्व में तनाव उच्चतम स्तर पर बना हुआ है।  

‘सत्ता हस्तांतरण को मुश्किल बनाने की हरसंभव कोशिश’, अमेरिका: डोनाल्ड ट्रंप का बाइडन पर बड़ा आरोप

वाशिंगटन। अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी को शपथ लेंगे। इससे पहले, रिपब्लिकन नेता ने मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ट्रंप का कहना है कि डेमोक्रेटिक नेता सत्ता के हस्तांतरण को मुश्किल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने हाल के दिनों में जलवायु और अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर बाइडन के कार्यकारी आदेशों का उदाहरण देते हुए यह आरोप लगाया। डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे। इसी के साथ वह अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ में बाइडन की जगह ले लेंगे। रिपब्लिकन नेता ने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर कहा, ‘बाइडन सत्ता हस्तांतरण को मुश्किल बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसलिए इस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं जो पहले कभी नहीं देखे गए। ‘ग्रीन न्यू स्कैम’, धन की बर्बादी के फैसले और हास्यास्पद कार्यकारी आदेश इसके उदाहरण हैं।’ डरो मत…. उन्होंने कहा, ‘डरो मत, ये सभी आदेश जल्द ही समाप्त हो जाएंगे हम सामान्य समझ तथा ताकत वाला देश बन जाएंगे।’ अमेरिकी संसद द्वारा ट्रंप की जीत की पुष्टि किए जाने से कुछ पहले और बाइडन के अमेरिका के अधिकांश तटरेखा पर तेल तथा प्राकृतिक गैस के लिए खोदाई पर प्रतिबंध लगाने के आदेश के बाद उनका यह बयान आया।

विरोध को किया खारिज’, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बोले, ‘एच-1बी’ वीजा पर है विश्वास

न्यूयॉर्क। राष्ट्रपति-चुनाव डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि वे “एच-1बी” वीजा में विश्वास करते हैं, उन्होंने योग्य पेशेवरों के विरोध को लेकर चल रही खबरों को खारिज कर दिया। “यह एक शानदार कार्यक्रम है,” उन्होंने शनिवार को न्यूयॉर्क पोस्ट को एक फोन साक्षात्कार में बताया। अपने अनूठे अंदाज में उन्होंने कहा, “मुझे हमेशा से वीजा पसंद रहे हैं, मैं हमेशा से वीजा के पक्ष में रहा हूं। इसलिए हमारे पास ये हैं।” उन्होंने रूपर्ट मर्डोक-नियंत्रित न्यूज कॉर्प का हिस्सा अखबार से कहा, “मेरी संपत्तियों पर कई एच-1बी वीजा हैं। मैं एच-1बी में विश्वास करता रहा हूं। मैंने इसका कई बार इस्तेमाल किया है।” ट्रंप ने आव्रजन प्रणाली में सुधार का समर्थन किया है ताकि इसे योग्यता के अनुरूप ढाला जा सके। कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की तरह एक अंक प्रणाली को अपनाया जा सके जो शैक्षणिक और रोजगार योग्यताओं को महत्व देती है। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से स्नातक करने वाले विदेशी छात्रों को उनके डिप्लोमा के साथ ग्रीन कार्ड मिले। उन्होंने इस साल अपने अभियान के दौरान कहा, “मैं जो करना चाहता हूं और जो मैं करूंगा, वह यह है कि आप कॉलेज से स्नातक हों, मुझे लगता है कि आपको अपने डिप्लोमा के हिस्से के रूप में इस देश में रहने में सक्षम होने के लिए स्वचालित रूप से ग्रीन कार्ड मिलना चाहिए।” एच-1बी वीजा और उच्च योग्यता वाले व्यक्तियों के आव्रजन पर मतभेद ट्रंप तब उभरा जब उन्होंने एक भारतीय अप्रवासी श्रीराम कृष्णन को अपना एआई सलाहकार नियुक्त किया। सबसे पहले हमला लॉरा लूमर ने विरोध में आवाज उठाई। जिन्हें ट्रंप के वफादारों में से एक माना जाता है। उन्होंने मस्क के एक्स पर पोस्ट किया, “श्रीराम कृष्णन की नियुक्ति को देखकर बहुत परेशान हूं।” लॉरा ने दावा किया कि कृष्णन ग्रीन कार्ड की संख्या पर सभी पाबंदी हटाने की ख्वाहिश रखते हैं। डेविड सैक्स, जिन्हें ट्रंप ने क्रिप्टो और एआई जार का नाम दिया है और जो कृष्णन के बॉस होंगे, ने एक्स पर बताया कि उन्होंने केवल उन ग्रीन कार्डों की सीमा को हटाने का सुझाव दिया था जो अलग-अलग देशों को दिए जा सकते हैं, जबकि समग्र सीमा को बनाए रखा ताकि ग्रीन कार्ड उन लोगों को वितरित किए जा सकें जिनके पास बहुत अधिक बैकलॉग हैं। जब कृष्णन के खिलाफ व्यक्तिगत हमले और झूठे आरोप लगे तो सैक्स फिर से उनके बचाव में आए और एक्स पर लिखा कि “झूठ बस बदल गया, जिसमें उन पर कुछ हमले भी शामिल थे।” मस्क ने व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाया और एक्स पर पोस्ट किया, “मैं अमेरिका में इतने सारे महत्वपूर्ण लोगों के साथ हूं, जिन्होंने स्पेसएक्स, टेस्ला और सैकड़ों अन्य कंपनियों का निर्माण किया, जिन्होंने अमेरिका को मजबूत बनाया, इसका कारण एच-1बी है।” उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित किए बिना अमेरिका “हार” जाएगा। उन्होंने एक्स पर लिखा, “उत्कृष्ट इंजीनियरिंग प्रतिभा की स्थायी कमी है। यह सिलिकॉन वैली में मूलभूत सीमित कारक है।” उन्होंने लिखा, “यदि आप दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को दूसरे पक्ष के लिए खेलने के लिए मजबूर करते हैं तो अमेरिका हार जाएगा और आलोचकों को चुनौती देते हुए पूछा कि क्या वे अमेरिका को जीतते या हारते देखना चाहते हैं। भारतीय अब तक एच-1बी वीजा के सबसे बड़े प्राप्तकर्ता हैं, जिन्हें पिछले साल 72.3 प्रतिशत प्राप्त हुए।

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