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भारत के शुभांशु शुक्ला का मिशन Axiom-4 को 22 जून तक के लिए स्थगित, AI से पड़ेगा नौकरियों पर असर

नई दिल्ली  भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला समेत चार अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) ले जाने वाले मिशन एक्सिओम-4 को 22 जून तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। एक्सिओम स्पेस ने बुधवार को यह घोषणा की। भारत, हंगरी और पोलैंड के यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने वाला यह मिशन पहले 19 जून को निर्धारित था। मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्रियों को फ्लोरिडा में नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट से आईएसएस भेजा जाना है। एक्सिओम स्पेस ने एक बयान में कहा, “नासा, एक्सिओम स्पेस और स्पेसएक्स अब एक्सिओम मिशन 4 को 22 जून को आईएसएस में भेजने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं।”  Axiom-4 मिशन क्या है? Axiom Mission 4 एक निजी अंतरिक्ष मिशन है, जो Axiom Space, NASA और SpaceX के सहयोग से संचालित हो रहा है. यह मिशन SpaceX की Falcon 9 रॉकेट और Crew Dragon अंतरिक्ष यान के जरिए चार अंतरिक्ष यात्रियों को ISS तक ले जाएगा. इस मिशन में भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला शामिल हैं, जो ISRO की ओर से पायलट की भूमिका निभाएंगे. उनके साथ पोलैंड और हंगरी के अंतरिक्ष यात्री भी होंगे. मिशन की अवधि 14 दिन होगी, जिसमें अंतरिक्ष यात्री ISS पर रहकर वैज्ञानिक प्रयोग, अनुसंधान और जन-जागरूकता गतिविधियां करेंगे. यह मिशन भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम, गगनयान के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ISRO को भविष्य के मिशनों के लिए अनुभव प्रदान करेगा. क्यों हुई लॉन्च में देरी? Axiom-4 मिशन की शुरुआत पहले 29 मई 2025 के लिए निर्धारित थी, लेकिन कई तकनीकी और पर्यावरणीय कारणों से इसे कई बार स्थगित करना पड़ा. प्रमुख कारणों में शामिल हैं… क्यों हुई लॉन्च में देरी? Axiom-4 मिशन की शुरुआत पहले 29 मई 2025 के लिए निर्धारित थी, लेकिन कई तकनीकी और पर्यावरणीय कारणों से इसे कई बार स्थगित करना पड़ा. प्रमुख कारणों में शामिल हैं…     Falcon 9 रॉकेट में रिसाव: SpaceX की Falcon 9 रॉकेट में लिक्विड ऑक्सीजन रिसाव की समस्या पाई गई थी, जिसे अब ठीक कर लिया गया है. रॉकेट का वेट ड्रेस रिहर्सल सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है.     Crew Dragon यान की समस्या: Crew Dragon के इलेक्ट्रिकल हार्नेस में खराबी के कारण लॉन्च को स्थगित करना पड़ा.     ISS के Zvezda मॉड्यूल में रिसाव: रूसी Zvezda मॉड्यूल में हवा के रिसाव की समस्या थी, जिसे रूसी कॉस्मोनॉट्स ने ठीक किया. अब दबाव स्थिर है, लेकिन NASA और Roscosmos इसकी और जांच कर रहे हैं.     मौसम की स्थिति: लॉन्च के रास्ते में खराब मौसम ने भी देरी का कारण बना.     चालक दल की तैयारी: अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत और प्रशिक्षण की जांच भी एक महत्वपूर्ण कारक है. सभी अंतरिक्ष यात्री क्वारंटाइन में हैं. पूरी तरह तैयार हैं. इन सभी मुद्दों को हल करने के लिए ISRO, पोलैंड और हंगरी की टीमें Axiom Space, NASA और SpaceX के साथ मिलकर काम कर रही हैं. 22 जून 2025: नई लॉन्च तारीख Axiom Space ने सभी तैयारियों का मूल्यांकन करने के बाद 22 जून 2025 को अगली संभावित लॉन्च तारीख घोषित की है। यह तारीख निम्नलिखित मापदंडों पर आधारित है…     Falcon 9 और Crew Dragon की स्थिति: SpaceX ने रॉकेट और अंतरिक्ष यान की सभी समस्याओं को ठीक कर लिया है.     Zvezda मॉड्यूल की मरम्मत: ISS के रूसी मॉड्यूल में रिसाव को ठीक करने के बाद दबाव स्थिर है.     मौसम की अनुकूलता: लॉन्च कॉरिडोर में मौसम की स्थिति अब अनुकूल होने की उम्मीद है. लॉन्च NASA के कैनेडी स्पेस सेंटर, फ्लोरिडा के लॉन्च कॉम्प्लेक्स 39A से होगा. लिफ्टऑफ का समय भारतीय समयानुसार दोपहर 2:23 बजे के आसपास का है.     Axiom-4 मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं… पेगी व्हिट्सन (कमांडर): पूर्व NASA अंतरिक्ष यात्री और Axiom Space की मानव अंतरिक्ष उड़ान निदेशक. यह उनका दूसरा निजी अंतरिक्ष मिशन होगा. शुभांशु शुक्ला (पायलट): ISRO के अंतरिक्ष यात्री और भारतीय वायुसेना के पायलट. वह भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री होंगे, जो ISS पर जाएंगे. स्लावोश उज़नांस्की-विस्निव्स्की (मिशन विशेषज्ञ): यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के पोलिश अंतरिक्ष यात्री. यह पोलैंड का दूसरा अंतरिक्ष मिशन है. टिबोर कपु (मिशन विशेषज्ञ): हंगरी के HUNOR कार्यक्रम के तहत चुने गए अंतरिक्ष यात्री. यह हंगरी का दूसरा अंतरिक्ष मिशन है. मिशन के उद्देश्य Axiom-4 मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री कई वैज्ञानिक प्रयोग और गतिविधियां करेंगे… ISRO के प्रयोग: शुभांशु शुक्ला सात प्रयोग करेंगे, जिनमें माइक्रोग्रैविटी में सूक्ष्मजीवों का अध्ययन, मांसपेशियों के पुनर्जनन और अंतरिक्ष में फसलों की वृद्धि शामिल है. पोलैंड और हंगरी के प्रयोग: इन देशों के अंतरिक्ष यात्री भी अपने वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे, जैसे कि माइक्रोग्रैविटी में मानव आवाज और संज्ञानात्मक कार्यों का विश्लेषण. जन-जागरूकता: हंगरी का SUMIMANT प्रोजेक्ट बच्चों और युवाओं में अंतरिक्ष के प्रति जागरूकता बढ़ाएगा. कुल मिलाकर, इस मिशन में 31 देशों की 60 वैज्ञानिक गतिविधियां शामिल हैं, जो इसे अब तक का सबसे बड़ा Axiom मिशन बनाती हैं. भारत के लिए महत्व Axiom-4 मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर है. यह मिशन न केवल ISRO की तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करता है, बल्कि गगनयान मिशन की तैयारियों को भी मजबूत करता है. गगनयान भारत का पहला स्वतंत्र मानव अंतरिक्ष मिशन होगा, जो 2026 में तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में ले जाएगा.  शुभांशु शुक्ला का ISS पर अनुभव ISRO को भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) बनाने में मदद करेगा. यह मिशन भारत की आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी दर्शाता है.

शुभांशु शुक्ला कब भरेंगे अंतरिक्ष की उड़ान, ISRO ने बताई नई तारीख

नई दिल्ली भारतीय वायुसेना के पायलट और इसरो के नए नवेले अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अब 19 जून 2025 को अंतरिक्ष के लिए रवाना होंगे। Ax-04 मिशन की लॉन्चिंग की नई तारीख की आधिकारिक पुष्टि की गई है। इसे पहले अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था। इसे फ्लोरिडा स्थित NASA के केनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा। आपको बता दें कि यह Axiom Space, SpaceX और ISRO का संयुक्त मिशन है। इसके साथ ही शुभांशु शुक्ला अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की यात्रा करने वाले भारत के चुनिंदा अंतरिक्ष यात्रियों में शामिल हो जाएंगे। लिक्विड ऑक्सीजन लीक की समस्या हल पिछले हफ्ते, 10 जून 2025 को Axiom-4 मिशन की शुरुआत टल गई थी, क्योंकि फाल्कन 9 रॉकेट में लिक्विड ऑक्सीजन लीक मिला था. यह लीक रॉकेट के बूस्टर में पाया गया था, जिससे लॉन्च को रोकना पड़ा. ISRO, Axiom Space और SpaceX के विशेषज्ञों ने मिलकर इस समस्या को सुलझाया.  बैठक में बताया गया कि लीक की मरम्मत पूरी हो गई है. रॉकेट के बूस्टर को फिर से जांचा गया और अब यह सुरक्षित है. ISRO के चेयरमैन ने इस फैसले की तारीफ की और कहा कि सुरक्षा पहले है. इसके बाद, टीम ने मिशन को फिर से शुरू करने की योजना बनाई. Zvezda सर्विस मॉड्यूल की जांच दूसरी ओर, Axiom Space ने NASA के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर Zvezda सर्विस मॉड्यूल में एक दबाव की असामान्यता (pressure anomaly) की जांच शुरू की है. यह मॉड्यूल रूस का हिस्सा है. हाल ही में इसकी मरम्मत की गई थी.  इससे पहले Falcon 9 रॉकेट में लिक्विड ऑक्सीजन लीकेज की समस्या सामने आई थी, जिसे SpaceX के इंजीनियरों ने अब पूरी तरह ठीक कर दिया है। इसरो, Axiom Space और SpaceX के बीच हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में तकनीकी पहलुओं की समीक्षा के बाद मिशन को हरी झंडी दी गई। अंतरिक्ष में भारत के प्रयोग इस मिशन के दौरान शुभांशु शुक्ला भारत द्वारा डिजाइन किए गए सात वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे और NASA के साथ संयुक्त शोध में भी भाग लेंगे। यह भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन कार्यक्रम के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है। Axiom Space और NASA फिलहाल अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के Zvezda सर्विस मॉड्यूल में सामने आई दबाव असमान्यता (pressure anomaly) की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि यह समस्या Ax-04 मिशन से संबंधित नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करती है। Ax-04 मिशन Axiom Space की उस दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है, जिसके तहत वे दुनिया का पहला कॉमर्सियल अंतरिक्ष स्टेशन विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। Axiom Space ने कहा कि वे NASA के साथ मिलकर इस समस्या का हल निकाल रहे हैं. यह जांच मिशन की सुरक्षा के लिए जरूरी है. अभी तक कोई बड़ा खतरा नहीं है, लेकिन सावधानी बरती जा रही है. Ax-04 मिशन की नई तारीख: 19 जून 2025 Axiom Space ने अब Ax-04 मिशन के लिए नई लॉन्च तारीख 19 जून 2025 तय की है. यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला सहित चार लोगों को ISS पर ले जाएगा. लॉन्च फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से होगा.  फाल्कन 9 रॉकेट और ड्रैगन अंतरिक्ष यान का इस्तेमाल होगा. मिशन में वैज्ञानिक प्रयोग और अंतरिक्ष में मानव जीवन का अध्ययन शामिल है. शुभांशु शुक्ला भारत के पहले गगनयात्री होंगे, जो इस मिशन के जरिए अंतरिक्ष में जाएंगे. हाल की चुनौतियां और सफलता इससे पहले, Ax-04 मिशन की शुरुआत कई बार टली. मई 2025 में खराब मौसम और जून में लिक्विड ऑक्सीजन लीक के कारण देरी हुई. लेकिन अब टीम का कहना है कि सारी समस्याएं हल हो गई हैं. SpaceX ने कहा कि वे रेंज की उपलब्धता के बाद नई तारीख की पुष्टि करेंगे. ISRO ने भी इस मिशन में तकनीकी सहायता दी है, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए गर्व की बात है.

भारत के सैटेलाइट्स ने सेना को हवा में आ रहे हथियारों की सटीक दिशा-ट्रैजेक्टरी की जानकारी देकर अहम भूमिका निभाई: वी. नारायणन

नई दिल्ली पाकिस्तान की ओर से हाल ही में हुए सैन्य संघर्ष के दौरान ड्रोन और मिसाइलों की बौछार के बीच भारत का एयर डिफेंस सिस्टम पूरी मजबूती से खड़ा रहा और एक प्रभावी ढाल का काम किया. भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो (ISRO) ने बताया कि भारत के सैटेलाइट्स ने सशस्त्र बलों को हवा में आ रहे हथियारों की सटीक दिशा-ट्रैजेक्टरी की जानकारी देकर अहम भूमिका निभाई. 9 और 10 मई की रात को भारत के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम ‘आकाशतीर’ और रूस से मंगाए गए S-400 सिस्टम ने मिलकर एक अदृश्य कवच का निर्माण किया, जिसने पाकिस्तानी हमलों को भारतीय नागरिक और सैन्य ठिकानों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया और उन्हें नष्ट कर दिया. ISRO के पास 72 सेमी रेजोल्यूशन वाले कैमरे की नजर ISRO के चेयरमैन वी. नारायणन ने बताया कि कैसे भारत की सैटेलाइट्स ने कठिन परिस्थितियों में सशस्त्र बलों की मदद की और तत्काल खतरे को टालने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने कहा, ‘हमारे सभी सैटेलाइट्स ने पूरी सटीकता के साथ काम किया. जब हमने शुरुआत की थी, तब हमारे कैमरों की रेजोल्यूशन 36 से 72 सेंटीमीटर के बीच थी. लेकिन अब हमारे पास चंद्रमा पर ‘ऑन-ऑर्बिटर हाई रेजोलूशन कैमरा’ है, जो दुनिया का सबसे बेहतरीन रेजोलूशन कैमरा है. इसके अलावा हमारे पास ऐसे कैमरे भी हैं जो 26 सेंटीमीटर रेजोलूशन तक की स्पष्ट तस्वीरें दिखा सकते हैं.’ रणनीतिक उद्देश्यों से काम कर रहे इसरो के सैटेलाइट्स 11 मई को इम्फाल में सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (CAU) के 5वें दीक्षांत समारोह के दौरान नारायणन ने कहा कि कम से कम 10 सैटेलाइट्स लगातार रणनीतिक उद्देश्यों के लिए काम कर रहे हैं, ताकि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. नारायणन की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई, के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. फिलहाल एक्टिव हैं 50 सैटेलाइट्ल   उन्होंने यह भी कहा, ‘हम जो भी सैटेलाइट्स भेजते हैं, उनका मकसद लोगों की भलाई होता है, जिसमें सुरक्षा भी शामिल है. फिलहाल कम से कम 50 सैटेलाइट्ल टीवी ब्रॉडकास्टिंग, टेलीकम्यूनिकेशन और सुरक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं.’ नारायणन ने बताया कि मंगलयान ऑर्बिटर मिशन के बाद इसरो अब एक लैंडिंग मिशन पर भी काम कर रहा है, जिसे लगभग 30 महीनों में लॉन्च किए जाने की योजना है. इसरो प्रमुख नारायणन गुरुवार को चेन्नई पहुंचे, जहां PSLV-C61 रॉकेट लॉन्च की अंतिम तैयारियां चल रही हैं. यह इसरो का 101वां मिशन होगा.  

इसरो कल पीएसएलवी-सी61के माध्यम से खास ईओएस-09 (RISAT-1B) सैटेलाइट को प्रक्षेपित करने जा रहा

नई दिल्ली भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक बार फिर अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए तैयार है। इसरो 18 मई यानी कल अपने विश्वसनीय पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी61) के माध्यम से खास ईओएस-09 (RISAT-1B) सैटेलाइट को प्रक्षेपित करने जा रहा है। यह प्रक्षेपण सुबह 5:59 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से होगा। इस सैटेलाइट के साथ भारत की रात के समय और हर मौसम में निगरानी की क्षमता को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। बादलों के आर-पार देखने की क्षमता यह उपग्रह न केवल बादलों के आर-पार देख सकता है, बल्कि रात के अंधेरे में भी हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें ले सकता है। इसके जरिए भारत की अंतरिक्ष से निगरानी क्षमता को और अधिक मजबूती मिली है, खासतौर पर उस समय जब पाकिस्तान के साथ सीमा पर भले ही अभी शांति हो, लेकिन भारत हर स्थिति को लेकर सतर्क बना हुआ है। यह सैटेलाइट आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसरो के भरोसेमंद रॉकेट पीएसएलवी (PSLV) के जरिए छोड़ी जाएगी। यह इसरो की अब तक की 101वीं बड़ी रॉकेट लॉन्चिंग है। EOS-9 का वजन 1,696 किलोग्राम है और इसे पृथ्वी की सतह से करीब 500 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। कम रोशनी में भी जमीन की सटीक तस्वीरें इस सैटेलाइट को इसरो के यू आर राव सैटेलाइट सेंटर, बेंगलुरु में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है। इसमें C-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो हर मौसम में और कम रोशनी में भी जमीन की सटीक तस्वीरें लेने में सक्षम है। यह “जासूसी सैटेलाइट” भारत के उस सैटेलाइट सिस्टम का हिस्सा बनेगी, जिसमें पहले से ही 50 से अधिक सैटेलाइट अंतरिक्ष में तैनात हैं। इनमें से सात रडार सैटेलाइट्स विशेष रूप से सीमा क्षेत्रों की निगरानी में सक्रिय हैं, जो अप्रैल 22 को हुए पहगाम हमले और उसके बाद दोनों देशों के बीच हुई सैन्य गतिविधियों के दौरान अहम भूमिका में रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों को काफी मदद मिलेगी EOS-9 से पहले भारत के पास जो प्रमुख इमेजिंग सैटेलाइट Cartosat-3 थी, वह रात में तस्वीरें नहीं ले पाती थी। EOS-9 इस कमजोरी को दूर करेगी और इससे मिली तस्वीरें पहले से ज्यादा स्पष्ट और सटीक होंगी, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को काफी मदद मिलेगी। हाल ही में इसरो अध्यक्ष डॉ वी. नारायणन ने इस मौके पर कहा, “कम से कम 10 सैटेलाइट चौबीसों घंटे देश की सुरक्षा में लगे हैं। भारत को अपनी 7,000 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा और पूरे उत्तरी क्षेत्र की निगरानी करनी होती है। यह सैटेलाइट और ड्रोन तकनीक के बिना संभव नहीं है।” वहीं, केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने इस लॉन्च पर कहा, “सटीकता, टीमवर्क और इंजीनियरिंग भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को शक्ति देती हैं।” इस ऐतिहासिक लॉन्च को देखने के लिए कई सांसद और वैज्ञानिक श्रीहरिकोटा में मौजूद रहे। मुख्य बातें:     अंतरिक्ष एजेंसी इसरो का यह 101वां मिशन है।     शनिवार सुबह सात बजकर 59 मिनट पर उलटी गिनती शुरू हो गई। कुल 22 घंटे की उलटी गिनती है।     सैटेलाइट का नाम: EOS-9     वजन: 1,696 किलोग्राम     लॉन्च व्हीकल: PSLV     स्थान: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा     खासियत: बादलों के आर-पार और रात में भी हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग     तकनीक: C-बैंड Synthetic Aperture Radar (SAR)     निर्माण: यू आर राव सैटेलाइट सेंटर, बेंगलुरु राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में योगदान यह लॉन्च भारत की सुरक्षा और अंतरिक्ष तकनीक दोनों के लिए मील का पत्थर है। ईओएस-09 की उन्नत रडार इमेजिंग क्षमता इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बनाती है। यह सैटेलाइट भारत की सीमाओं और तटीय क्षेत्रों की 24×7 निगरानी करने में सक्षम होगी, जिससे सैन्य और रक्षा तैयारियों को मजबूती मिलेगी। इसके अलावा, यह सैटेलाइट कृषि, वानिकी, बाढ़ निगरानी, मृदा नमी मूल्यांकन, भूविज्ञान, समुद्री बर्फ और तटीय निगरानी जैसे नागरिक अनुप्रयोगों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कुल मिलाकर इस मिशन का उद्देश्य देश भर में विस्तारित तात्कालिक समय पर होने वाली घटनाओं की जानकारी जुटाने की आवश्यकता को पूरा करना है। पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट-09 वर्ष 2022 में प्रक्षेपित किए गए ईओएस-04 जैसा ही एक सैटेलाइट है। पीएसएलवी-सी61 रॉकेट 17 मिनट की यात्रा के बाद ईओएस-09 उपग्रह को सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (एसएसपीओ) में स्थापित कर सकता है। सैटेलाइट के वांछित कक्षा में अलग होने के बाद वैज्ञानिक बाद में कक्षा की ऊंचाई कम करने के लिए वाहन पर ‘ऑर्बिट चेंज थ्रस्टर्स’ (ओसीटी) का उपयोग करेंगे। इसरो ने बताया कि ईओएस-09 की मिशन अवधि पांच वर्ष है। वैज्ञानिकों के अनुसार, सैटेलाइट को उसकी प्रभावी मिशन अवधि के बाद कक्षा से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त मात्रा में ईंधन आरक्षित कर लिया गया है ताकि इसे दो वर्षों के भीतर कक्षा में नीचे उतारा जा सके, जिससे मलबा-मुक्त मिशन सुनिश्चित हो सके।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन का निधन, 84 साल की आयु में बेंगलुरु में ली अंतिम सांस

बेंगलुरु भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व प्रमुख और प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. के. कस्तूरीरंगन का 84 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। 27 अप्रैल को लोग कर सकेंगे अंतिम दर्शन के कस्तूरीरंगन नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के मसौदा समिति के अध्यक्ष भी थे। अधिकरियों ने बताया कि आज सुबह उनका निधान हुआ है। 27 अप्रैल को अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) में रखा जाएगा। एनईपी में सूचीबद्ध शिक्षा सुधारों के पीछे के व्यक्ति के रूप में जाने जाने वाले कस्तूरीरंगन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और कर्नाटक ज्ञान आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया था। राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं कस्तूरीरंगन डॉ. कस्तूरीरंगन साल 2003 से लेकर 2009 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे और तत्कालीन भारतीय योजना आयोग के सदस्य के रूप में भी कार्य किया था। कस्तूरीरंगन अप्रैल 2004 से 2009 तक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, बैंगलोर के निदेशक भी रहे। डॉ. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में इसरो ने रचा इतिहास डॉ. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में इसरो ने भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के सफल प्रक्षेपण और संचालन सहित कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की। डॉ. कस्तूरीरंगन ने जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) के पहले सफल उड़ान परीक्षण की भी देखरेख की। उनके कार्यकाल में आईआरएस-1सी और 1डी सहित प्रमुख उपग्रहों का विकास और प्रक्षेपण और दूसरी और तीसरी पीढ़ी के इनसैट उपग्रहों की शुरुआत हुई। इन प्रगति ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में मजबूती से स्थापित कर दिया।  इसरो के अध्यक्ष बनने से पहले डॉ. कस्तूरीरंगन इसरो उपग्रह केंद्र के निदेशक थे, जहां उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसैट-2) और भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रहों (आईआरएस-1ए और आईआरएस-1बी) जैसे अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष यान के विकास का नेतृत्व किया। उपग्रह आईआरएस-1ए के विकास में उनका योगदान भारत की उपग्रह क्षमताओं के विस्तार में महत्वपूर्ण था।

मिशन शक्ति सेट में स्कूली बच्चियों को सैटेलाइट बनाने का प्रशिक्षण, इसरो120 घंटे का ऑनलाइन प्रशिक्षण देगा

इंदौर  पिछड़े क्षेत्र की बच्चियों को भी चंद्रयान-4 से जुड़ने का मौका मिलेगा। ये बच्चियां न सिर्फ अंतरिक्ष विज्ञान में करियर के अवसरों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगी, बल्कि उन्हें सैटेलाइट बनाने का व्यावहारिक ज्ञान भी मिलेगा। इसके लिए मिशन शक्ति सेट के अंतर्गत इंदौर की करीब 14 बच्चियों का चयन किया गया है। ये सभी स्कूली बच्चियां हैं, जिन्हें 120 घंटे का प्रशिक्षण दिया जाएगा। भारत अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। अपने अभिनव मिशनों और तकनीकी उपलब्धियों के माध्यम से वैश्विक मंच पर एक प्रमुख स्थान बना रहा है। इस क्षेत्र में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करें और अंतरिक्ष क्षेत्र में सक्रिय रूप से शामिल हो सकें, इस उद्देश्य के साथ मिशन शक्ति-सेट की शुरुआत की गई है। यह मिशन चेन्नई स्थित स्पेस किड्स इंडिया द्वारा विकसित किया गया है। मिशन शक्ति सेट की निदेशक और स्पेस किड्स इंडिया की संस्थापक-सीईओ डॉ. केशन ने 16 जनवरी को इस मिशन की शुरुआत की थी। इसके माध्यम से बच्चियां शोध, नवाचार और नेतृत्व की भूमिकाएं भी निभाने में सक्षम होंगी। 120 घंटे का ऑनलाइन प्रशिक्षण मिशन शक्ति सेट में भारत सहित 108 देशों की हाईस्कूल की करीब 12 हजार छात्राएं शामिल रहेंगी। इनमें भारत की 130 छात्राएं शामिल हैं। इन छात्राओं को इसरो और इनस्पेस द्वारा 120 घंटे का ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अंतरिक्ष तकनीक, पेलोड विकास और अंतरिक्ष यान प्रणालियों से संबंधित विषय शामिल होंगे। इसरो और अन्य वैश्विक संस्थानों के विज्ञानियों द्वारा डिजाइन किया गया यह कार्यक्रम छात्राओं को अंतरिक्ष विज्ञान के व्यावहारिक अनुभव से अवगत कराएगा। प्रशिक्षण के बाद हर देश की एक बच्ची का चयन होगा और ये 108 बच्चियां चंद्रयान मिशन 2026 में भी योगदान देंगी और सैटेलाइट विकसित कर उसका प्रक्षेपण करेंगी। अंतरिक्ष विज्ञान में करियर के अवसर भारत में इस इस मिशन का नेतृत्व वायुसेना में पायलट रह चुकीं सेवानिवृत्त विंग कमांडर जया तारे कर रही हैं। उन्होंने बताया कि जो बच्चियां अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहती हैं, हम उनके लिए यह अभियान चला रहे हैं। इसके अंतर्गत बच्चियों को विशेषज्ञों द्वारा मेंटरशिप प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही 108 देशों की बच्चियां एक ही मंच पर होंगी, जिससे उन्हें एक-दूसरे से जुड़ने का भी मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि यदि इन छात्राओं को सही दिशा, प्रेरणा और मार्गदर्शन दिया जाए, तो वे न केवल अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में असाधारण उपलब्धियां हासिल करेंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत भी बनेंगी। खरगोन की बच्ची भी शामिल इस अभियान के लिए इंदौर से 14 बच्चियों को चयन किया गया है। वहीं, खरगोन की भी एक बच्ची राशि चौरे का चयन हुआ है। इस तरह इस मिशन के लिए प्रदेशभर से 15 बच्चियां चयनित हुई हैं। मध्य प्रदेश में इन बच्चियों का चयन विजय सोशल वेलफेयर सोसाइटी द्वारा किया गया है। सोसाइटी की संस्थापिका माधुरी मोयदे ने बताया कि वे कई वर्षों से शिक्षकों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर बच्चियों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए प्रयास कर रही हैं। इसी के चलते इस मिशन के अंतर्गत इन बच्चियों का चयन किया गया है। ऐसे हुआ चयन मिशन के लिए चयनित ये सभी बच्चियां शासकीय विद्यालयों की हैं। इनका टेस्ट और इंटरव्यू लिया गया था। चयनित बच्चियों में से अधिकतर बाल विनय मंदिर, सांदीपनि और पीएमश्री स्कूलों की हैं। इन बच्चियों का हुआ चयन तान्या यादव, कुशी तायड़े, कृष्णा खाजेकर, आरती पवार, अक्षरा जैन, शीतल मोरे, सुहानी मेश्राम, मुस्कान कैरो, निधि शर्मा, कलश जैन, दर्शना शर्मा, सुजाता इंगले, गौरी भदौरिया, वंशिका सोलंकी सभी इंदौर और राशि चौरे खरगोन।

मोदी सरकार ने ‘चंद्रयान-5’ मिशन को दी मंजूरी, जापान भी करेगा सहयोग; इसरो प्रमुखवी नारायणन

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने महत्वाकांक्षी ‘चंद्रयान-5 मिशन’ को मंजूरी दे दी है. इस मिशन के तहत, चंद्रमा की सतह का अध्ययन करने के लिए 250 किलोग्राम का रोवर भेजा जाएगा. ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन ने इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि यह मिशन जापान के सहयोग से संचालित किया जाएगा. रविवार को एक सम्मान समारोह में बोलते हुए ISRO प्रमुख ने कहा कि ‘चंद्रयान-5’ को हाल ही में हरी झंडी मिली है. उन्होंने बताया कि इससे पहले ‘चंद्रयान-3’ मिशन के तहत 25 किलोग्राम का रोवर ‘प्रज्ञान’ चंद्रमा पर भेजा गया था, जो सफलतापूर्वक लैंड हुआ था. इस बार चंद्रयान-5 में अधिक क्षमता वाला रोवर भेजा जाएगा, जिससे चंद्रमा की सतह पर और गहराई से अध्ययन किया जा सकेगा ‘चंद्रयान-4’ मिशन पर काम जारी बता दें, ISRO ने चंद्रयान-3 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था, जिसमें लैंडर ‘विक्रम’ ने 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की थी. यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा. इससे पहले, ISRO ‘चंद्रयान-4’ मिशन पर भी काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लाना है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसे 2027 में लॉन्च किया जा सकता है.  ‘चंद्रयान-5 मिशन’ का मकसद? चंद्रयान मिशनों का मकसद चंद्रमा की सतह और वहां मौजूद खनिजों का अध्ययन करना है. इसरो के वैज्ञानिक लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं और भारत को स्पेस रिसर्च के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं. चंद्रयान-5 मिशन के ऐलान के बाद देशभर में वैज्ञानिक समुदाय में उत्साह है, और अब सभी की नजरें इस नए मिशन पर टिकी हैं. जापान के साथ मिलकर चंद्रयान-5 मिशन को अंजाम देगा इसरो नारायणन ने कहा, ‘अभी तीन दिन पहले ही हमें चंद्रयान-5 मिशन के लिए मंजूरी मिली है। हम इसे जापान के साथ मिलकर करेंगे।’ चंद्रयान-4 मिशन के 2027 में लॉन्च होने की उम्मीद है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा से एकत्र किए गए नमूने लाना है। इसरो की भविष्य की परियोजनाओं के बारे में नारायणन ने कहा कि गगनयान सहित विभिन्न मिशनों के अलावा, भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजनाएं चल रही हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हाल ही में अपने अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग – स्पैडेक्स की सफल अनडॉकिंग करने में भी सफलता हासिल की। इससे चंद्रयान-4 और अन्य भविष्य के मिशनों के लिए मंच तैयार हो गया। 

तकनीकी गड़बड़ी के कारण स्‍पेस में अटकी NVS-02 नेविगेशन सेटेलाइट, 100वें मिशन को लगा झटका, अब क्‍या करेगा ISRO?

बेंगलुरु ISRO यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के 100वें रॉकेट मिशन को झटका लगा है। खबर है कि बुधवार को लॉन्च हुए मिशन को रविवार को तकनीकी परेशानी का सामना करना पड़ा है। 2250 किलो वजनी सैटेलाइट नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टलेशन या NavIC का हिस्सा थी। माना जाता है कि NavIC सीरीज की कई सैटेलाइट्स 2013 से लेकर अब तक उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। ISRO के NVS-02 उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के प्रयासों को उस समय झटका लगा जब अंतरिक्ष यान में लगे ‘थ्रस्टर्स’ काम नहीं कर सके। स्पेस एजेंसी ने रविवार को घटना की जानकारी दी है। इसरो ने अपनी वेबसाइट पर कहा कि अंतरिक्ष यान में लगे ‘थ्रस्टर्स’ के काम नहीं करने के कारण एनवीएस-02 उपग्रह को वांछित कक्षा में स्थापित करने का प्रयास सफल नहीं हो सका। भारत की अपनी अंतरिक्ष-आधारित नेविगेशन प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले एनवीएस-02 उपग्रह को 29 जनवरी को जीएसएलवी-एमके 2 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसरो ने यह भी कहा, ‘सैटेलाइट सिस्टम स्वस्थ हैं और सैटेलाइट फिलहाल एलिप्टिकल ऑर्बिट में है। एलिप्टिकल ऑर्बिट में नेविगेशन के लिए सैटेलाइट के इस्तेमाल के लिए मिशन की वैकल्पिक रणनीतियों पर काम किया जा रहा है।’ खबरें हैं कि साल 2013 के बाद से अब तक NavIC सीरीज की कुल 11 सैटेलाइट लॉन्च की गई हैं, जिनमें से 6 पूरी या आशिंक रूप से असफल हो गई हैं। भारत ने साल 1999 में पाकिस्तान के साथ करगिल युद्ध के बाद NavIC को विकसित किया था। युद्ध के दौरान भारत को GPS डेटा देने से इनकार कर दिया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने GPS का एक क्षेत्रीय संस्करण बनाने का वादा किया था। क्‍या था इसरो का प्‍लान? इसरो के सूत्रों का कहना है कि सेटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने के बाद वो फायर करने में विफल रहा. इसरो ने कहा, “सेटेलाइट सिस्‍टम एक दम हेल्दी है और वो मौजूदा वक्‍त में अण्डाकार कक्षा में है. अण्डाकार कक्षा में नेविगेशन के लिए उपग्रह का उपयोग करने के लिए वैकल्पिक मिशन रणनीतियों पर काम किया जा रहा है.” इसरो का NVS-02 सेटेलाइट को पृथ्वी के चारों ओर एक अण्डाकार कक्षा में स्थापित करने का इरादा था. बताया गया था कि इसकी अपोजी यानी सबसे दूर का बिंदू 37,500 किमी रहेगा जबकि पेरीजी यानी निकटतम बिंदू और 170 किमी की होगी. 29 जनवरी को GSLV द्वारा बहुत सटीक इंजेक्शन ने सेटेलाइट को एक ऐसी कक्षा में स्थापित कर दिया था जो लक्ष्‍य किए गए अपोजी से 74 किमी और पेरीजी से 0.5 किमी दूर थी. भारत के लिए क्‍यों अहम है यह मिशन? भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (INSACI)आईएनएसपीएसीई) के अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका ने लॉन्‍च के वक्‍त कहा था, ‘‘यह मिशन भारत की अंतरिक्ष एक्‍सप्‍लोरेशन की दशकों पुरानी विरासत और हमारे भविष्य के संकल्प को भी दर्शाता है. निजी प्रक्षेपणों के साथ-साथ, मैं अगले पांच वर्षों में अगले 100 प्रक्षेपणों को देखने के लिए उत्सुक हूं.’’ हैदराबाद स्थित अनंत टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के सीएमडी सुब्बा राव पावुलुरी ने कहा था कि 100वां प्रक्षेपण न केवल इसरो की तकनीकी क्षमता का उत्सव है, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती क्षमताओं का भी प्रदर्शित करता है. ‘‘पिछले कुछ वर्षों में हमें इसरो के अनेक मिशनों में योगदान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जहां हमने अत्याधुनिक वैमानिकी, प्रणालियां और समाधान उपलब्ध कराए हैं, जिन्होंने इन प्रयासों की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.’’ इसरो ने क्या कहा, पहले यह जान लीजिए इसरो के पूर्व साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि एनवीएस-02 उपग्रह को उसकी मनचाही कक्षा में स्थापित करने के इसरो के प्रयासों को झटका लगा है। दरअसल, अंतरिक्ष यान के थ्रस्टर को एक्टिव नहीं किया जा सका है। एनवीएस-02 उपग्रह भारत के स्वदेशी अंतरिक्ष-आधारित नेविगेशन सिस्टम यानी नाविक के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे 29 जनवरी को जीएसएलवी-एमके 2 रॉकेट से श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। थ्रस्टर्स को फायर करने के लिए वॉल्व नहीं खुल पाए इसरो के पूर्व साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि किसी भी सैटेलाइट को एक तय कक्षा में स्थापित किया जाता है। इसरो के इस सैटेलाइट को भी तय ऑर्बिट में ही कायम किया जाना था। मगर, वक्त पर इसके थ्रस्टर्स फायर नहीं कर पाए। ये थ्रस्टर्स एक तरह से छोटे-छोटे रॉकेट होते हैं। इनमें ऑक्सीडाइजर को प्रवेश देने वाले वॉल्व नहीं खुल पाए, जिससे फायरिंग नहीं हुई। दीर्घवृत्ताकार ऑर्बिट में नेविगेशन की खातिर सैटेलाइट का उपयोग करने के लिए वैकल्पिक मिशन रणनीतियों पर काम किया जा रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कवर करेगा इसरो इससे पहले ISRO ने बताया था कि NVS-02 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित कर दिया गया है। यह सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का हिस्सा है, जो भारत में GPS जैसी नेविगेशन सुविधा को बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसरो के पूर्व साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि यह सिस्टम कश्मीर से कन्याकुमारी, गुजरात से अरुणाचल तक का हिस्सा कवर करेगा। साथ ही साथ कोस्टल लाइन से 1500 किमी तक की दूरी भी कवर होगी। इससे हवाई, समुद्री और सड़क यात्रा के लिए बेहतर नेविगेशन हेल्प मिलेगी। अभी किस स्थिति में है नाविक सैटेलाइट विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, सैटेलाइट अब अंडाकार भू-समकालिक स्थानांतरण कक्ष (GTO) में पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है, जो नेविगेशन सिस्टम के लिए ठीक नहीं है। इसरो ने कहा, सैटेलाइट सिस्टम ठीक है और सैटेलाइट मौजूदा वक्त में अंडाकार ऑर्बिट में है। यह ऑर्बिट में नेविगेशन के लिए सैटेलाइट का उपयोग करने के लिए वैकल्पिक मिशन रणनीतियों पर काम किया जा रहा है।  

अमेरिकी कंपनी ‘टी स्पेसमोबाइल’ के संचार उपग्रह को प्रक्षेपित करेगा इसरो

नई दिल्ली भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का एलवीएम3 रॉकेट मार्च में अमेरिकी कंपनी ‘टी स्पेसमोबाइल’ के संचार उपग्रह को प्रक्षेपित करेगा, जो स्मार्टफोन पर अंतरिक्ष आधारित सेलुलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क सेवाएं प्रदान करने की योजना बना रहा है। यहां जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘‘मार्च के लिए निर्धारित वाणिज्यिक एलवीएम3-एम5 मिशन, अमेरिका की ‘टी स्पेसमोबाइल’ के साथ अनुबंध के तहत ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 उपग्रहों को तैनात करेगा।’’ यह बयान विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अंतरिक्ष विभाग के कामकाज की समीक्षा के बाद आया है, जिसमें इसरो के निवर्तमान अध्यक्ष एस सोमनाथ, उनके उत्तराधिकारी वी नारायणन और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (आईएन-स्पेस) के अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका शामिल थे। नारायणन 14 जनवरी को सोमनाथ का स्थान लेंगे। उन्होंने बैठक के दौरान इसरो के वैश्विक विस्तार के लिए एक रणनीतिक खाका तैयार किया। बयान में कहा गया है कि नासा-इसरो का संयुक्त उपग्रह – निसार – और नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-02 फरवरी में जीएसएलवी रॉकेट के दो अलग-अलग मिशनों के जरिए प्रक्षेपित किए जाएंगे। ‘गगनयान’ के तहत पहले ‘मानवरहित’ कक्षीय मिशन समेत महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के साथ, भारत के अंतरिक्ष अन्वेषण प्रयास अभूतपूर्व उपलब्धियों के लिए तैयार हैं। इसरो ने तकनीकी कौशल और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रदर्शित करने वाले महत्वपूर्ण मिशनों की योजना बनाई है, जिसमें गगनयान के मानवरहित कक्षीय परीक्षण मिशन का प्रक्षेपण भी शामिल है। बयान में कहा गया है, ‘‘यह महत्वपूर्ण प्रयास भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिसका लक्ष्य चालक दल की सुरक्षा और पुनर्प्राप्ति के लिए प्रणालियों का परीक्षण तथा उन्हें मान्य करना है।’’ इसके अलावा, आने वाले महीनों में दो जीएसएलवी मिशन, एलवीएम3 का वाणिज्यिक प्रक्षेपण और निसार (एनआईएसएआर) उपग्रह पर बहुप्रतीक्षित इसरो-नासा सहयोग निर्धारित है। सिंह ने नवाचार को बढ़ावा देने में इसरो की प्रगति की सराहना की। उन्होंने देश की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने में सार्वजनिक-निजी सहयोग के महत्व पर बल दिया।  

जल्द पूरा होगा भारत का सपना, लॉन्च होने वाला है ISRO का SPADEX मिशन… जानिए क्यों है खास ?

चेन्नई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) वर्ष 2024 शानदार  विदाई देने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुये अपने दोहरे रिकॉर्ड कायम करने वाले ‘स्पैडेक्स’ अंतरिक्ष मिशन के लिए उलटी गिनती काम आज से शुरू करेगा। इसके तहत पहली अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक पर – स्पैडेक्स उपग्रह से जुड़ी डॉकिंग और अनडॉकिंग श्रृंखला है और दूसरा पीएसएलवी-सी60 प्रक्षेपण यान पर पीओईएम-4 के हिस्से के रूप में 24 वैज्ञानिक प्रयोगों का पीएसएलवी का चौथा चरण शामिल है। पीएसएलवी-सी60 स्पैडेक्स मिशन का प्रक्षेपण 30 दिसंबर को श्रीहरिकोटा के पहले अंतरिक्ष बंदरगाह पर पैड से 2158 बजे निर्धारित है। पीएसएलवी मिशन के लिए उलटी गिनती का काम जो आम तौर पर 24 से 25 घंटे का होता है, कल से शुरू होने की उम्मीद है, जिसके दौरान चार चरण वाले वाहन में प्रणोदक भरने का कार्य किया जाएगा। इसरो ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, प्रक्षेपण के करीब एक कदम और बढ़ाते हुये स्पैडेक्स के प्रक्षेपण यान के साथ दो उपग्रह एकीकृत हो गए है। कहा गया, “एकीकरण मील का पत्थर है, एसडीएससी शार ‘लिफ्टऑफ़’ के एक कदम और करीब स्पैडेक्स उपग्रहों को पीएसएलवी-सी60 के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया है।” बताया गया,“ पीएसएलवी-सी60 पर पहली बार पीआईएफ सुविधा में पीएस 4 (चौथे चरण इंजन) तक पूरी तरह से एकीकृत कर इसे पहले लॉन्च पैड पर ले जाया गया।” इसरो अपने पहले सफल अंतरिक्ष डॉकिंग प्रदर्शन के साथ वर्ष 2024 की शानदार विदाई करने के लिए उत्सुक है, क्योंकि यह अग्रणी मिशन भारत को चौथा देश बनने के लिए प्रेरित करेगा। इससे दुनिया को पता चलेगा कि देश जटिल अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक में महारत हासिल कर रहा है” इसरो के लिए यह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मिशन होगा जिसके तहत अंतरिक्ष डॉकिंग प्रदर्शन के लिए दो उपग्रह चेज़र और टारगेट वाले स्पैडेक्स लॉन्च के अलावा, स्पैडेक्स मिशन के साथ पीएसलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंट मॉड्यूल-4 (पीओईएम-4) पर अंतरिक्ष में रिकॉर्ड 24 वैज्ञानिक प्रयोग किये जायेंगे।  क्या है यह मिशन? अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक तब बहुत जरूरी होती है जब साझा मिशन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए कई रॉकेट लॉन्च करने की जरूरत होती है। इसरो के अनुसार, स्पेडेक्स मिशन में दो छोटे अंतरिक्ष यान (प्रत्येक लगभग 220 किग्रा) शामिल हैं, जिन्हें पीएसएलवी-सी60 के जरिये स्वतंत्र रूप से और एक साथ, 55 डिग्री झुकाव पर 470 किमी वृत्ताकार कक्षा में प्रक्षेपित किया जाएगा, जिसका स्थानीय समय चक्र लगभग 66 दिन का होगा। अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग का प्रदर्शन के लिए मिशन इस मिशन के माध्यम से, भारत अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक रखने वाला दुनिया का चौथा देश बनने की ओर अग्रसर है। 9 दिसंबर को पीएसएलवी-सी59/प्रोबास-3 मिशन के सफल प्रक्षेपण के बाद, इसरो के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव, एस सोमनाथ ने कहा कि दिसंबर में ही पीएसएलवी-सी60 के प्रक्षेपण के साथ एक समान मिशन आने वाला है। सोमनाथ ने कहा, ‘यह (पीएसएलवी-सी60 मिशन) स्पैडेक्स नामक अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग का प्रदर्शन करने जा रहा है। रॉकेट अब तैयार है और हम प्रक्षेपण की ओर ले जाने वाली गतिविधियों के अंतिम चरण के लिए तैयार हो रहे हैं, संभवतः दिसंबर में ही।’ बताया जाता है कि अंतरिक्ष में डॉकिंग की यह प्रक्रिया सबसे कठिन होती है और इसमें जरा सी चूक बड़ी मुसीबतें पैदा कर सकती है।   गोलाकार कक्षा में लॉन्च किया जाएगा मिशन इसरो के अनुसार, स्पेडेक्स मिशन को दो छोटे अंतरिक्ष यानों (एसडीएक्स01, जो कि चेजर है और एसडीएक्स02, जिसका नाम टारगेट है) के पृथ्वी की निचली वृत्ताकार कक्षा में तेज गति में मिलन, डॉकिंग और अनडॉकिंग को प्रदर्शित किया जाएगा। पीएसएलवी कक्षीय प्रयोग मॉड्यूल (पीओईएम) अंतरिक्ष में विभिन्न प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन करने के लिए 24 प्रयोग करेगा। इनमें 14 प्रयोग भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की विभिन्न प्रयोगशालाओं से और प्रयोग 10 निजी विश्वविद्यालयों तथा ‘स्टार्ट-अप’ से संबंधित हैं। डॉकिंग प्रक्रिया से ही बने हैं अमेरिका और रूस के स्पेस स्टेशन गौरतलब है कि अमेरिका और रूस धरती पर एक-दूसरे के दुश्मन हैं, हालांकि अंतरिक्ष में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) स्थापित करने में दोनों देशों ने साथ काम किया है। जहां नासा के स्पेस शटल ने आईएसएस के एक भाग का निर्माण किया है, वहीं रूस ने भी अपने कई स्पेस शटल्स का इस्तेमाल किया। नासा के पा मौजूदा समय में कोलंबिया, चैलेंजर, डिस्कवरी, अटलांटिस, एंडियेवर जैसे स्पेस शटल हैं, वहीं रूसी स्पेस एजेंसी रॉस्कॉस्मोस ने अपने स्पेस शटल का नाम बुरान रखा है।  

कल से शुरू होगी इसरो के अनूठे रिकॉर्ड कायम करने वाले मिशन ‘स्पैडेक्स’ की उलटी गिनती

चेन्नई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) वर्ष 2024 शानदाई विदाई देने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुये अपने दोहरे रिकॉर्ड कायम करने वाले ‘स्पैडेक्स’ अंतरिक्ष मिशन के लिए उलटी गिनती काम कल से शुरू करेगा। इसके तहत पहली अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक पर – स्पैडेक्स उपग्रह से जुड़ी डॉकिंग और अनडॉकिंग श्रृंखला है और दूसरा पीएसएलवी-सी60 प्रक्षेपण यान पर पीओईएम-4 के हिस्से के रूप में 24 वैज्ञानिक प्रयोगों का पीएसएलवी का चौथा चरण शामिल है। पीएसएलवी-सी60 स्पैडेक्स मिशन का प्रक्षेपण 30 दिसंबर को श्रीहरिकोटा के पहले अंतरिक्ष बंदरगाह पर पैड से 2158 बजे निर्धारित है। पीएसएलवी मिशन के लिए उलटी गिनती का काम जो आम तौर पर 24 से 25 घंटे का होता है, कल से शुरू होने की उम्मीद है, जिसके दौरान चार चरण वाले वाहन में प्रणोदक भरने का कार्य किया जाएगा। इसरो ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, प्रक्षेपण के करीब एक कदम और बढ़ाते हुये स्पैडेक्स के प्रक्षेपण यान के साथ दो उपग्रह एकीकृत हो गए है। कहा गया, “एकीकरण मील का पत्थर है, एसडीएससी शार ‘लिफ्टऑफ़’ के एक कदम और करीब स्पैडेक्स उपग्रहों को पीएसएलवी-सी60 के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया है।” बताया गया,“ पीएसएलवी-सी60 पर पहली बार पीआईएफ सुविधा में पीएस 4 (चौथे चरण इंजन) तक पूरी तरह से एकीकृत कर इसे पहले लॉन्च पैड पर ले जाया गया।” इसरो अपने पहले सफल अंतरिक्ष डॉकिंग प्रदर्शन के साथ वर्ष 2024 की शानदार विदाई करने के लिए उत्सुक है, क्योंकि यह अग्रणी मिशन भारत को चौथा देश बनने के लिए प्रेरित करेगा। इससे दुनिया को पता चलेगा कि देश जटिल अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक में महारत हासिल कर रहा है” इसरो के लिए यह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मिशन होगा जिसके तहत अंतरिक्ष डॉकिंग प्रदर्शन के लिए दो उपग्रह चेज़र और टारगेट वाले स्पैडेक्स लॉन्च के अलावा, स्पैडेक्स मिशन के साथ पीएसलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंट मॉड्यूल-4 (पीओईएम-4) पर अंतरिक्ष में रिकॉर्ड 24 वैज्ञानिक प्रयोग किये जायेंगे।  

इसरो के चेयरमैन ने कहा- चांद पर अब इंसान भेजने की भी हो गई तैयारी, बताया किस साल लहराएगा तिरंगा

नई दिल्ली भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद के चेयरमैन डॉ. एस सोमनाथ का कहना है कि भारत 2040 में चांद पर लैंडिंग करेगा। उन्होंने कहा कि हम इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू करने वाले हैं और इंसान को चांद पर लैंड कराएंगे। यही नहीं भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भी 2035 में स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया है। स्पेस स्टेशन मॉड्यूल की लॉन्चिंग 2028 में की जाएगी और फिर अगले 7 सालों में यह अभियान पूरा हो जाएगा। भारत के चंद्रयान मिशन की बड़ी सफलता के बाद इसरो का यह महत्वाकांक्षी अभियान पूरी दुनिया को अंतरिम में भारत की क्षमता को दिखाने वाला है। एस. सोमनाथ ने कहा कि अगले 15 सालों का रोडमैप हमने तैयार कर लिया है और लॉन्ग टर्म विजन के साथ प्रयासों में जुटे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने 31 हजार करोड़ रुपये का फंड इसरो के लिए जारी किया है। इसी पर बात करते हुए इसरो चीफ एस. सोमनाथ ने एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘मुझे विश्वास है कि यह साल हमारे लिए बहुत शानदार रहेगा। हम अपने मिशनों पर आगे बढ़ेंगे। इसके अलावा पीएम के विजन के आधार पर आगे का भी रोडमैप तय करेंगे। स्पेस प्रोग्राम के इतिहास में हमारे पास पहली बार अगले 25 सालों का प्लान तय है।’ इस प्लान के तहत भारत अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने वाला है, जिसकी शुरुआत 2028 से होगी। इसके अलावा 2040 में भारत ने चांद पर इंसान को भेजने का लक्ष्य तय किया है। यह बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है। डॉ. सोमनाथ ने कहा कि ऐसा कारनामा हम देश की आजादी की 100वीं वर्षगांठ पर करके दिखाएंगे। उन्होंने कहा, ‘हम जब देश की आजादी की 100वीं सालगिरह मनाएंगे तो भारत का झंडा भी चांद पर लहराएगा। हमारा एक यात्री वहां जाएगा और वहीं पर तिरंगा लहराकर लौटेगा। हमारा यह लक्ष्य वर्ष 2040 के लिए है।’ इससे पहले चंद्रयान-4 मिशन पर काम चल रहा है। इसके तहत यह तय किया जाएगा कि चंद्रयान मिशन कैसे सुरक्षित वापस लौटकर भी दिखाए। फिलहाल भारत इस बात की तैयारी कर रहा है कि कैसे चंद्रयान मिशन के लिए पेलोड तैयार किए जाएं। लॉन्च वीकल आदि को विकसित किया जाए, जिससे चांद पर लैंडिंग के साथ ही सुरक्षित वापसी भी की जा सके।

भारत पहली बार अंतरिक्ष में ‘पोएम’ लिखने की तैयारी में ISRO, गगनयान मिशन में होगा मददगार

नई दिल्ली भारत पहली बार एक स्वदेशी रॉकेट का उपयोग करके अंतरिक्ष में जैविक प्रयोग कर रहा है। ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के अगले प्रक्षेपण में एक नहीं, बल्कि तीन जैविक प्रयोग किए जाएंगे। इनमें जीवित कोशिकाओं को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाएगा। अंतरिक्ष के बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल में इन चीजों को जिंदा रखना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। जिन जैविक सामानों को पीएसएलवी के जरिए भेजा जाएगा, उनमें पालक, लोबिया और गट बैक्टीरिया जैसी चीजें शामिल हैं। इसरो ने इसे पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल-4 (पोएम -4) नाम दिया है। इस तरह कहा जा सकता है कि इसरो अंतरिक्ष की दुनिया में एक कविता लिखने की तैयारी में है। बताया जाता है कि इसरो का यह प्रयोग गगनयान मिशन में भी मददगार होगा। अंतरिक्ष में किसी जीव को जिंदा रखना एक बड़ी चुनौती है। वजह, सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम को एक सीलबंद बॉक्स में रखना होता है। यह पीएसएलवी का चौथा चरण है। इसरो इसे वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में प्रयोग करने के लिए शिक्षाविदों को उपलब्ध कराता है। इसरो चेयरमैन डॉक्टर एस सोमनाथ ने कहाकि यह पहली बार है जब इसरो भारत से अंतरिक्ष में इस तरह का प्रयोग कर रहा है। उन्होंने कहाकि पीएसएलवी के प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करते हुए भारतीय जीवविज्ञानी यह पता लगाएंगे कि अंतरिक्ष के प्रतिकूल वातावरण में जीवित कैसे रहा जा सकता है। यह इसरो का एक छोटा जैविक कदम है, जिससे भारत को गगनयान मिशन में भी फायदा होगा। गगनयान मिशन के तहत भारत, भारतीय अंतरिक्षयात्री को भारतीय रॉकेट से अंतरिक्ष में ले जाना चाहता है। वहीं, 2035 तक आने वाले भारतीय अंतरारिक्ष स्टेशन पर विभिन्न प्रयोगों की योजना भी बन सकती है। गौरतलब है कि पीएसएलवी का अगला मिशन सी-60 है। यह भी एक बेहद प्रयोगात्मक मिशन है, जिसका मुख्य प्रयोग स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्पैडेक्स) है। इसके तहत इसरो पहली बार अंतरिक्ष में दो भारतीय उपग्रहों की डॉकिंग और अनडॉकिंग को अंजाम देगा। यह हैं तीन एक्सपेरिमेंट्स -एमिटी यूनिवर्सिटी, मुंबई के वैज्ञानिक इस बात का परीक्षण कर रहे हैं कि अंतरिक्ष के लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण वातावरण में आम पालक की कोशिकाएं कैसे प्रदर्शन करती हैं। -इसी तरह आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, बेंगलुरु के यूजी छात्र गट बैक्टीरिया का इस्तेमाल करके भारत के पहले माइक्रोबायोलॉजिकल पेलोड आरवीसैट -1 को उड़ा रहे हैं। एक बंद कैप्सूल में गट बैक्टीरिया को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। -इसके अलावा इसरो के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी), तिरुवनंतपुरम की एक इन-हाउस टीम, ऑर्बिटल प्लांट स्टडीज (क्रॉप्स) के लिए कॉम्पैक्ट रिसर्च मॉड्यूल का उपयोग करके यह प्रदर्शित करेगी कि कैसे लोबिया के बीज और पत्तियां अंतरिक्ष के लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण वातावरण में अंकुरित होती हैं।

इसरो वैज्ञानिक प्रमोद आर. नायर को युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया

तिरुवनंतपुरम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिक प्रमोद आर नायर को हाई एनर्जी मैटेरियल्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की ओर से युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। डीआरडीओ और इसरो के संयुक्त संगठन, हाई एनर्जी मैटेरियल्स सोसाइटी ऑफ इंडिया ने ‘एम.आर.’ कुरुप एंडोमेंट अवार्ड’ की स्थापना की है, जो उच्च ऊर्जा सामग्री (प्रणोदक और पायरो) के क्षेत्र में काम करने वाले युवा वैज्ञानिकों को मान्यता देता है। इसरो के अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने डीआरडीओ के महानिदेशक और वीएसएससी, एलपीएससी और आईआईएसयू के निदेशकों की उपस्थिति में पुरस्कार प्रदान किया। गौरतलब है कि एम.आर. कुरुप एक भारतीय रॉकेट वैज्ञानिक और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) में भारत के पहले ठोस रॉकेट प्रणोदक संयंत्र के संस्थापक थे। उन्हें तिरुवनंतपुरम में वीएसएससी केंद्र के निदेशक के रूप में संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (एएसएलवी) के सफल प्रक्षेपण में योगदान देने के लिए जाना जाता है। केरल के चेंगन्नूर के मूल निवासी श्री कुरुप ने इसरो के वीएसएससी से अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने वीएसएससी में महाप्रबंधक, उप निदेशक और रसायन, सामग्री और प्रणोदन इकाइयों के मुख्य कार्यकारी जैसे विभिन्न पदों पर काम किया, जहां उन्हें ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ काम करने का अवसर मिला। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने देश में पहला ठोस रॉकेट प्रणोदन संयंत्र स्थापित किया। वह विक्रम साराभाई द्वारा पहले भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण यान को डिजाइन करने के लिए चुनी गई टीम के सदस्य भी रहे हैं। वह 1990 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, ‘पद्म श्री’ से भी अलंकृत हैं।  

इसरो ने ‘प्रोबा-3’ मिशन की शुरुआत के लिए फिर से 8.5 घंटे की उल्टी गिनती शुरू की

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के ‘प्रोबा-3’ मिशन की शुरुआत के लिए फिर से 8.5 घंटे की उल्टी गिनती शुरू की। बेंगलुरु स्थित अंतरिक्ष एजेंसी ने मूल रूप से यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के ‘प्रोबा-3’ को बुधवार को शाम 4.08 बजे यहां के ‘स्पेसपोर्ट’ से प्रक्षेपित करने की योजना बनाई थी। हालांकि, प्रक्षेपण से कुछ देर पहले ही यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अनुरोध के बाद इसरो ने ‘पीएसएलवी-सी59/प्रोबा-3’ के प्रक्षेपण का समय पुनर्निधारित किया और प्रक्षेपण की उल्टी गिनती के लिए पांच दिसंबर शाम चार बजकर चार मिनट का समय तय किया। उपग्रह प्रणोदन प्रणाली में विसंगति पाए जाने के बाद इसे पुनर्निर्धारित किया गया। इसरो ने बृहस्पतिवार को एक अद्यतन जानकारी में कहा, ‘‘पीएसएलवी-सी59/प्रोबा-3 मिशन। उल्टी गिनती शुरू हो गई है। प्रक्षेपण का समय पांच दिसंबर, 2024 को शाम चार बजकर चार मिनट निर्धारित है। पीएसएलवी-सी59 के ईएसए के ‘प्रोबा-3’ उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने की तैयारी के लिए बने रहें।’’ इसरो की वाणिज्यिक शाखा ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ को ईएसए से यह ऑर्डर मिला है। प्रोबा-3 (प्रोजेक्ट फॉर ऑनबोर्ड एनाटॉमी) में दो उपग्रह – कोरोनाग्राफ (310 किलोग्राम) और ऑकुल्टर (240 किलोग्राम) हैं। इसमें दो अंतरिक्ष यान एक साथ उड़ान भरेंगे तथा सूर्य के बाहरी वायुमंडल कोरोना का अध्ययन करने के लिए एक मिलीमीटर तक सटीक संरचना बनाएंगे। ईएसए ने कहा कि कोरोना सूर्य से भी ज्यादा गर्म है और यहीं से अंतरिक्षीय मौसम की उत्पत्ति होती है। यह व्यापक वैज्ञानिक और व्यावहारिक रुचि का विषय भी है।  

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