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करवा चौथ पर भोपाल -इंदौर में कितने बजे निकलेगा चांद? जानें यूपी के हाल

भोपाल हिन्दू धर्म में करवा चौथ का व्रत सबसेअधिक महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे जीवन में के लिए निर्जला उपवास रखती है. ये व्रत हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. इस दिन महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए पति की लंबी आयु के लिए उपवास करती है और रात को चांद देखने के बाद अपना व्रत तोड़ती करती हैं. करवा चौथ का पर्व पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है. उत्तर प्रदेश में भी इस पर्व की धूम देखने को मिलती है. देश में हर साल की तरह इस बार भी करवाचौथ का त्योहार आज धूमधाम से मनाया जा रहा है. आज के दिन महिलाएं अपने पतियों की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. दिन भर निर्जला व्रत रखने के बाद महिलाएं रात को चांद दिखने पर चंद्रमा को अर्ध्य देकर उपवास तोड़ती हैं.  करवा चौथ व्रत की शुरुआत सुबह सरगी खाने के साथ होती है. सूर्योदय से शुरू हुआ यह व्रत रात में महिलाओं द्वारा चंद्रमा की पूजा और छलनी से चांद को देखने के बाद होती है. इस दौरान महिलाएं अपने पति की आरती भी उतारती हैं. पति अपने हाथों ने पत्नी को पानी पिलाते हैं.  करवा चौथ का व्रत गणपति जी और करवा माता को समर्पित है. यहां पर आपको ये भी बता दें कि यह व्रत चांद की पूजा के बिना अधूरा माना जाता है. करवा चौथ 2024 पूजा मुहूर्त  करवा चौथ पूजा समय- शाम 05.46 – रात 07.09 (अवधि 1 घंटा 16 मिनट) करवा चौथ व्रत समय – सुबह 06.25 – रात 07.54 (अवधि 13 घंटे 29 मिनट) हिन्दू धर्म में करवा चौथ को सुहागिन स्त्रियों को सबसे बड़ा माना जाता है. ये व्रत सूर्योदय से लेकर रात में चंद्रोदय तक चलता हैं. महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार करती है और अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत करती है. महिलाएं पूरा दिन न तो अन्न ग्रहण करती और न ही जल. रात को जब चंद्रोदय होता है तब महिला चांद अर्घ्य देकर पति की लंबी आयु की मंगल कामना करते हुए अपना उपवास पूरा करती है. करवा चौथ पर चतुर्थी तिथि 20 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 46 मिनट से प्रारंभ होगी और 21 अक्टूबर को सुबह 04 बजकर 16 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में शाम होने के बाद से ही महिलाओं को चांद के निकलने का इंतजार रहता है. लेकिन, इस बार चांद देखने के लिए महिलाओं को ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा. इस बार रविवार को चंद्रमा का उदय शाम 7 बजकर 40 मिनट पर हो जाएगा. राजधानी दिल्ली-नोएडा से लेकर प्रयागराज और अयोध्या तक तमाम बड़े शहरों में चांद इस समय दिखाई देगा. किस शहर में कब दिखेगा चांद शहर का नाम चांद निकलने का समय लखनऊ 07 बजकर 42 मिनट कानपुर 07 बजकर 47 मिनट नोएडा 07 बजकर 52 मिनट दिल्ली 9 बजकर 10 मिनट प्रयागराज 07 बजकर 42 मिनट अयोध्या 07 बजकर 38 मिनट वाराणसी 07 बजकर 32 मिनट बरेली 07 बजकर 46 मिनट गाजियाबाद 07 बजकर 52 मिनट आगरा 07 बजकर 55 मिनट कोलकाता 07 बजकर 46 मिनट देहरादून 07 बजकर 09 मिनट अमृतसर 07 बजकर 54 मिनट भोपाल 08 बजकर 29 मिनट अहमदाबाद 07 बजकर 38 मिनट चेन्नई 08 बजकर 43 मिनट मुंबई 08 बजकर 59 मिनट कुरुक्षेत्र 08 बजे शिमला 07 बजकर 47 मिनट जम्मू 07 बजकर 52 मिनट पंजाब 07 बजकर 48 मिनट बिहार 08 बजकर 29 मिनट झारखंड 08 बजकर 35 मिनट कुछ ऐसी है मान्यता ऐसा माना जाता है कि पूजा के दौरान करवा (मिट्टी का पात्र) का प्रयोग किया जाता है, जिसे पति की प्रतीकात्मक सुरक्षा के रूप में देखा जाता है. महिलाएं करवा को भगवान गणेश और चंद्रमा के सामने रखकर पूजा करती हैं. फिर चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से पानी पीकर व्रत का समापन करती हैं. पति पत्नी को आवश्यक रूप से विशेष उपहार देते हैं, इसमें आभूषण, कपड़े और अन्य उपहार शामिल होते हैं. करवा चौथ 2024 मून टाइम  20 अक्टूबर 2024 को रात 7 बजकर 54 मिनट पर चांद निकलेगा. दिल्ली में चांद दिखने का सही समय सात बजकर 53 मिनट है. नोएडा में यह समय 7 बजकर 52 मिनट है. शहर के अनुसार चंद्रोदय समय कुछ मिनट के अंतर से अलग-अलग हो सकता है.  क्या है करवा चौथ की अहमियत? दिल्ली सहित पूरे देश में करवा चौथ का व्रत पति-पत्नी के अखंड प्रेम, सम्मान और त्याग की चेतना का प्रतीक है. ये व्रत दांपत्य जीवन में अपार खुशियां लेकर आता है. करवाचौथ की सबसे पहले शुरुआत सावित्री की पतिव्रता धर्म से हुई. महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलती हैं.  करवा चौथ के पीछे मान्यता यह है कि देवी पार्वती ने भी ये व्रत किया था. दूसरी मान्यता है कि करवा चौथ व्रत महाभारत काल में द्रोपदी ने भी किया था. जब पांडवों पर संकट के बादल मंडराए थे तो श्रीकृष्ण के कहे अनुसार द्रोपदी ने करवा चौथ का व्रत पूजन किया था, जिसके प्रभाव से पांडवों का संकट टल गया था.  इस त्योहार को लेकर एक मान्यता यह है जो सुहागिन स्त्री इस दिन अन्न-जल का त्याग कर व्रत रखती हैं, उसके सुहाग पर कभी कोई आंच नहीं आती.

कल करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं निराहार रहकर पति की दीर्घायु के लिए करेंगी

प्रयागराज नकारात्मकता को दूर कर मानसिक और आध्यात्मिक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं निराहार रहकर अपने वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और पति की दीर्घायु के लिए रविवार को करेंगी। कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चाैथ पर्व पति के प्रति समर्पण की भावना को प्रकट करता है। यह पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा को दमकाता है और आधुनिकता भी इस परंपरा को डिगा नहीं सका है। इसमें और ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति परिलक्षित हो रही है। इस दिन सुहागिन स्त्रियां पूरे दिन निराहार रहकर अपने सौभाग्य के लिए मां गौरी का व्रत करती हैं और पूजन के पश्चात पति के हाथ से पानी का घूंट पीकर व्रत खोलती हैं। प्रयागराज वन अनुसंधान केन्द्र की वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ़ कुमुद दुबे ने बताया कि वह वैज्ञानिक बाद में है पहले एक भारतीय महिला हैं, जितना हो सकता है परंपराओं का निर्वहन करने का प्रयास करती हैं। हमें अपने प्राचीन परंपराओं और संस्कार को मजबूती से पकडे रहना चाहिए। यदि हम आधुनिकता के नाम पर इससे दूरी बनाते हैं तब हम अपने जड़ से कट जाएंगे और हमारा वजूद ही खत्म हो जाएगा। पाश्चात्य संस्कृति के पीछे भागने वाली आधुनिकता का लिबास ओढ़े कुछ भारतीय महिलाएं पुरानी परंपराओं को रूढ़िवादिता का नाम देकर भुला रही हैं। उन्होने बताया कि बदलते परिवेश में करवा चौथ व्रत का भी ग्लोबलाइजेशन हो गया है। अब यह पर्व देश में ही नहीं बल्कि विकसित देशों अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर से लेकर दुबई के साथ अन्य स्थानों पर जहां भारतीय रहते हैं धूमधाम से मनाया जाता है। यह भारत के जम्मू, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत तमाम अन्य राज्यों में भी ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाएं सभी भारतीय परंपरा के इस व्रत को करती हैं। उन्होंने बताया कि लंदन में रहने वाली उनकी भाभी अपनी सहेलियों के साथ इस व्रत को बडी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ करती हैं। डाॅ दुबे ने बताया कि करवा चाैथ व्रत का पहले इतना प्रचार प्रसार नहीं था। इसे बड़े सादगी ढंग से मनाया जाता रहा है। आधुनिक दौर में सिनेमा और टीवी सीरियल ने इस व्रत को और अधिक बढ़ावा दिया। कुछ महिलाएं तो टी वी सीरियल देखकर इस व्रत को अपना रही है। हालांकि यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए होता है लेकिन आजकल कुछ कुंवारी लडकियां भी मनचाहा वर पाने की चाहत से यह व्रत करती हैं। उन्होंने बताया कि यह व्रत पति-पत्नी के बीच विश्वास, प्रेम और पवित्रता की डोर से बंधा एक ईश्वरीय बंधन है। यह बंधन, सुखद, अपनेपन और सुरक्षा का अहसास दिलाता है। करवा चौथ इसी बंधन को अटूट रखने की कामना के साथ किया जाता है। यह आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूती प्रदान करता है। बदलते परिवेश में पत्नी के साथ पति भी अपने सफल दाम्पत्य जीवन के लिए करवा चौथ व्रत का पालन करने लगे है। आधुनिकता के बावजूद इस व्रत को करने में महिलाओं में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आई बल्कि और आकर्षण बढ़ा है। टीवी धारावाहिकों और फिल्मों से इसको अधिक बल मिला है। करवा चौथ भावना के अलावा रचनात्मकता और आधुनिकता का भी पर्याय बन चुका है। डा दुबे ने बताया कि करवा चौथ व्रत हमें हमारी संस्कृति से जोड़ता है। अगर नवविवाहिता यह व्रत करती है तब उन्हें पारंपरिक पुरानी रीति रिवाजों काे समझने का अवसर मिलता। यह व्रत उनमें मानसिक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह व्रत आध्यात्मिक और भावनात्मक मजबूती भी प्रदान करता है। यह ईश्वर के नज़दीक लाता है और आंतरिक शांति का अनुभव कराता है। व्रत के दौरान ध्यान और प्रार्थना करने से मानसिक शांति मिलती है। इसके अलावा, यह परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और एकता को भी बढ़ाता है। महिलाएं इस दिन एक साथ बैठकर व्रत की तैयारी करती हैं जो पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने और सामूहिकता का अनुभव कराता है। डाॅ दुबे ने बताया कि यदि एक बौद्धिक स्तर पर विचार किया जाए तो किसी समाज की सांस्कृतिक विरासत उसके मूल्यों, परंपराओं और साझा अनुभवों की परिणति है, जो एकता और उद्देश्य की भावना को बढ़ावा देती है। भारत की एकता इसकी संस्कृति में गहराई से निहित है। भारतीय संस्कृति का केंद्र हिंदू धर्म है, जो सिर्फ एक धर्म नहीं बल्कि एक व्यापक जीवन शैली है। भारतीय संस्कृति का लोकाचार हिंदू धर्म के सिद्धांतों और इसके सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुंबकम के मूल दर्शन के साथ जुड़ा हुआ है।  

करवा चौथ: प्रकृति प्रेम का प्रतीक पर्व, परिवार और परंपराओं का मिलन

Karva Chauth: Festival symbolizing love of nature, union of family and traditions हम कोई भी व्रत-त्योहार मनाएं, वह किसी न किसी रूप में प्रकृति प्रेम का संदेश देता है. यह संदेश जल, जमीन और पेड़-पौधों को संरक्षित और सुरक्षित करने के प्रण से जुड़ा होता है. यह सच है कि हम प्रकृति को सुरक्षित रखेंगे, तभी हम दीघांयु होंगे, हम पीढ़ी- दर-पीढ़ी आगे बढ़ेंगे. दशहरा के बाद हम अंधकार पर प्रकाश के विजय का पर्व दीपावली मनाते हैं, लेकिन इससे पहले हम कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवा चौथ भी मनाते हैं. स्त्रियां पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं. स्त्रियां जानती हैं कि जिस धरा पर हमारा सुखमय दांपत्य जीवन बीत रहा है, उसके लिए पृथ्वी और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना जरूरी है, इसलिए वह करवा चौथ के अवसर पर ऐसे अनुष्ठान संपन्न करती है, जो प्रकृति की सुरक्षा और संरक्षण का भी संदेश देता है. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन स्त्रियां सुख-शांति और समृद्धि से परिपूर्ण दांपत्य-जीवन की कामना लिये करवा चौथ का व्रत रखती हैं. वास्तव में यह वत न सिर्फ स्त्रियों, बल्कि पुरुषों के भी प्रेम, समर्पण और त्याग का महापर्व है. यदि हम इसे विस्तृत रूप में देखें, तो यह सृष्टि और प्रकृति प्रेम का भी संदेश देता है. पौराणिक पात्र से जुड़ा है करवा चौथ मान्यता है कि महाभारत काल में द्रौपदी ने यह व्रत रखा था. पांडवों पर आयी विपत्ति को दूर करने की कामना के लिये द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से मदद मांगी और करवा चौथ का व्रत रखा. सावित्री और सत्यवान के अलौकिक प्रेम संबंध की कथा को भी इससे जोड़ कर देखा जाता है. व्रत के शुभ मुहूर्त में सबसे पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है. इसके बाद शिव- पार्वती और कार्तिकेय की पूजा की जाती है. व्रत खोलने से पहले इस दिन छलनी करवा चौथ 20 अक्तूबर के माध्यम से चंद्रमा दर्शन का विधान है. यह इंगित करता है कि दांपत्य संबंधों में तभी शीतलता होगी, जब हम एक-दूसरे के अवगुणों को छलनी से छान कर देखेंगे. करवा चौथ मानवीय मनोभावों के साथ- साथ प्रकृति के प्रति भी प्रेम प्रकट करने का संदेश देता है. संपूर्ण ब्र‌ह्मांड के प्रति आभार यदि आपने कभी करवा चौथ करती हुई स्त्री को गौर से देखा होगा, तो पाया होगा कि इस दिन वह चंद्रमा को मिट्टी के पात्र में शीतल कलश में मौजूद पानी और अन्य तत्व वनस्पति और खनिजों सहित हमारी धरती की समृद्धि का प्रतीक हैं. हम कलश को पांच तत्वों- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी से जोड़ सकते हैं. इसके आधार पर मिट्टी या किसी धातु का बर्तन पृथ्वी या धरती का प्रतीक है. जीवन का आधार गंगा जल कलश हिंदू अनुष्ठानों में गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है, जो समृद्धि और आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतिनिधित्व करता है. कलश या करवा को पवित्र गंगा नदी के जल से भरा जाता है. यहां गंगा जल जीवन को बनाये रखने वाली दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है. जल जीवन का आधार है. गंगा तभी हमें ऊर्जा पूरित करेगी, जब उसका जल स्वच्छ रहेगा. जल लेकर अर्घ्य देती है. इसका आशय है, जहां से शीतलता और रोशनी मिले, उसके प्रति संवेदना की आर्द्रता जरूर प्रदान करना चाहिए, साथ ही यह संदेश मिलता है कि जल, थल और नभ यानी संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रति हम आभार प्रकट करें. हम उन्हें स्वच्छ व संरक्षित रखने की कोशिश करें, हम ऐसा कोई भी कार्य न करें, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचे. ईश्वर के करीब लाता है यह पर्व करवा चौथ में पति के स्वास्थ और लंबी आयु के लिए व्रत रखा जाता है. इसमें सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक उपवास किया जाता है. इस अनुष्ठान के अंतर्गत शिव-पार्वती पूजा की थाली तैयार करना, चंद्रमा की पूजा करना और चंद्र दर्शन के बाद पति के हाथों जल और मठरी से व्रत तोड़ने का विधान है. यह एक-दूसरे के प्रति प्रेम-सम्मान और भक्ति का प्रतीक है. मन अशांत होने पर न हम मनुष्य के प्रति प्रेम प्रकट कर पाते हैं और न ही ईश्वर- पृथ्वी का चित्रण है कलश करवा चौथ के नाम में ‘करवा’ शब्द मिट्टी के बर्तन को संदर्भित करता है. पूर्ण कलश पृथ्वी का चित्रण है. भक्ति में ध्यान लगा पाते हैं. यदि हम गौर करें, तो करवा चौथ उपवास का मुख्य उद्देश्य मन को शांत कर ईश्वर और गुरु के करीब आना है.

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