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बिलासपुर में खामेनेई की मौत पर खुशी, मिठाइयां बांटी; हिंदू संगठन नेता ने मुसलमानों पर की आपत्तिजनक टिप्पणी

बिलासपुर  बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयत उल्लाह अली खामेनेई शहीद हो गए. खामेनेई की मौत के बाद दुनियाभर के कई देशों इसकी खूब आलोचना की. वहीं, भारत में दक्षिणपंथी संगठन लगातार उनकी मौत की खबर सामने आने के बाद जश्न मना रहे हैं. इसी तरह का एक मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से सामने आया है और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही हड़कंप मच गया। मामला बिलासपुर जिले का है, जहां हिंदू संगठन से जुड़े ठाकुर राम सिंह के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में पुलिस के जरिये एफआईआर दर्ज किया गया है. बताया जा रहा है कि आरोपी ठाकुर राम सिंह ने मुस्लिम धर्मगुरु और ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयत उल्लाह अली खामेनेई को लेकर सोशल मीडिया पर एक विवादित टिप्पणी पोस्ट की थी. इतना ही नहीं, उसने आयत उल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सुनकर जश्न मनाते हुए मिठाई बांटी। आरोपी राम सिंह ने एक वीडियो भी अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट की है, जिसमें वह आयत उल्लाह अली खामेनेई की मौत पर मातम मनाने वालों को अपशब्द कहता हुआ दिखाई पड़ रहा है. राम सिंह इस वीडियो में बहुसंख्यक समुदाय को मुसलमानों के खिलाफ उकसाते हुए कहा कि “हिंदूओं जागों और इन लोगों को पहचानों जो भारत में रहकर, भारत को खोखला करने की कोशिश कर रहे हैं.” आरोपी ने वीडियो में भारतीय मुसलमानों को देशद्रोही बताते हुए गालियां दी और उन्हें पीएम मोदी से मुस्लिम बहुल देश में भेजने की मांग की है। इस घटना की जानकारी सामने आने के बाद मुस्लिम समुदाय के साथ इंसाफ पसंद लोगों में भारी आक्रोश फैल गया. समुदाय के लोगों ने इस पूरे मामले को लेकर आपत्ति जताई और इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया. ईरान को उन्होंने भारत का मित्र देश बताया है. बता दें, हालिया दिनों ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर भारत ने दुख जताया है. भारत सरकार की ओर से ईरान के प्रति संवेदना व्यक्त की गई है. विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने गुरुवार (5 मार्च) को नई दिल्ली में ईरान के राजदूत से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने ईरानी दूतावास पहुंचकर खामेनेई के निधन पर शोक व्यक्त किया और शोक-पुस्तिका (कंडोलेंस बुक) में अपनी संवेदना दर्ज की।  भारत सरकार के जरिये ईरान को मित्र देश बताते हुए शोक व्यक्त करने और दूसरी तरफ हिंदूवादी संगठनों के जरिये खामेनेई की मौत पर जश्न मनाने की घटना के बाद समुदाय के प्रतिनिधियों ने पुलिस के पास पहुंचकर लिखित शिकायत दर्ज कराई है. शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की संवेदनशीलत और गंभीरता को देखते हुए पुलिस हरकत में आ गई। बिलासपुर जिले की सरकंडा थाना पुलिस ने प्रारंभिक जांच के बाद आरोपी ठाकुर राम सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. पुलिस के मुताबिक, आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 और धारा 3(5) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की बारीकी से जांच की जा रही है. सोशल मीडिया पोस्ट और उससे जुड़े अन्य पहलुओं को भी जांच के दायरे में लिया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और पूरे प्रकरण की सूक्ष्मता से जांच कर रही है. पुलिस का कहना है कि इस मामले में आगे की कार्रवाई जांच के आधार पर की जाएगी, ताकि क्षेत्र में शांति और सौहार्द बनाए रखा जा सके।

25 साल पहले जारी फतवे में परमाणु हथियारों पर रोक, फिर भी ईरान को लेकर अमेरिका की चिंता बरकरार

तेहरान  ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियन ने कहा कि सुप्रीम लीडर अली खामनेई के परमाणु हथियारों पर जारी फतवे के चलते ईरान कभी न्यूक्लियर हथियार विकसित नहीं करेगा. ईरान की ओर से आया ये बयान साफ करता है कि वो अमेरिका के साथ किसी भी तरह की लड़ाई में पड़ने के मूड में नहीं है. हालांकि अमेरिका की तैयारी को देखते हुए ईरान ने भी अपनी पूरी तैयारी रखी हुई है लेकिन उसने साफ किया है कि उस पर बनाया जा रहा दबाव फालतू है. अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता से पहले ईरानी राष्ट्रपति ने दोहराया कि खामेनेई का स्पष्ट ऐलान है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने गुरुवार को कहा कि उनका देश परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा, क्योंकि देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई पहले ही इस पर प्रतिबंध लगा चुके हैं. राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने कहा -‘जब हमारे सर्वोच्च नेता घोषणा करते हैं कि हम परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, तो इसका मतलब है कि हम उन्हें नहीं बनाएंगे.’ उन्होंने यह भी कहा कि किसी समाज का धार्मिक नेता राजनीतिक नेताओं की तरह झूठ नहीं बोल सकता. परमाणु वार्ता से ठीक पहले आया बयान यह बयान अमेरिका के साथ परमाणु मुद्दे पर तीसरे दौर की वार्ता से पहले आया है. अमेरिका लगातार ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाता रहा है, जबकि तेहरान इन आरोपों से इनकार करता है. गौरतलब है कि अयातुल्ला अली खामेनेई ने 2000 के दशक की शुरुआत में एक फतवा जारी कर परमाणु हथियारों के विकास पर रोक लगा दी थी. ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. ईरान ने पहले भी दी थी परमाणु कार्यक्रम घटाने की डील ईरान और अमेरिका के बीच जेनेवा में तीसरे दौर की वार्ता से पहले ईरान के राष्ट्रपति ने ये बयान दिया है. इससे पहले दूसरी वार्ता के दौरान विदेश मंत्री ने अमेरिका के सामने प्रस्ताव रखा था कि अगर वो अपने सारे प्रतिबंध ईरान पर से हटा लेता है, तो वो अपने यूरेनियम संवर्धन को 60 फीसदी तक घटाने के लिए तैयार है. ताजा खबरें आईं कि ईरान इसे 3-4 फीसदी तक भी सीमित रखने को तैयार हो सकता है, जैसा साल 2015 की डील में हुआ था. हालांकि अमेरिका चाहता है कि वो इसे खत्म कर दे, जिसे लेकर दोनों में विवाद बना हुआ है.

खामेनेई की मौत पर ईरान में खुशी, भारत में क्यों मना रहे हैं मातम?

नई दिल्ली ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मिसाइल हमले में हत्या की खबर सामने आने के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है और पूरे इलाके में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं. अमेरिका और इजरायल की तरफ से किए गए इस हमले के बाद जहां एक तरफ कई देशों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं और शिया मुस्लिम समुदाय के बीच गहरा शोक छा गया है. वहीं दूसरी तरफ ईरान और दुनिया के कुछ हिस्सों में लोगों ने इसे ‘फ्री ईरान’ की दिशा में पहला कदम बताते हुए जश्न भी मनाया है. इसी बीच भारतीय सिनेमा में काम कर रहीं ईरानी एक्ट्रेस एलनाज नोरौजी का सोशल मीडिया रिएक्शन सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है. ईरान से आई दो तस्वीरों ने पहले विरोध की आग दिखाई थी, अब वही तस्वीरें जश्न की कहानी बन गई हैं. कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर में एक युवती देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तस्वीर जलाकर उसी आग से सिगरेट सुलगाती नजर आई थी. यह दृश्य ईरान में महिलाओं के गुस्से और सत्ता के खिलाफ खुली चुनौती का प्रतीक बना. अब खामेनेई की मौत की खबर सामने आने के बाद उसी तरह की महिलाएं ‘चीयर्स’ करती और जश्न मनाती दिखाई दे रही हैं. इन तस्वीरों ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी है कि क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है या फिर दशकों से सख्त सामाजिक और धार्मिक पाबंदियों में जी रही ईरानी महिलाओं की आजादी की शुरुआत? ईरान में महिलाओं का संघर्ष क्यों बना वैश्विक मुद्दा?     पिछले कुछ सालों में ईरान में महिलाओं के अधिकार सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनकर उभरे हैं. ड्रेस कोड, सार्वजनिक जीवन में पाबंदियां और मोरल पुलिसिंग के खिलाफ लगातार आंदोलन होते रहे हैं. कई बार इन आंदोलनों को सख्ती से दबाया गया, लेकिन विरोध की आवाज पूरी तरह खत्म नहीं हुई. महसा अमिनी की मौत के बाद आंदोलन और तेज हो गया.     खामेनेई की मौत के बाद सत्ता संरचना में संभावित बदलाव महिलाओं के आंदोलन को नई दिशा दे सकता है. हालांकि यह भी सच है कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था सिर्फ एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है, इसलिए तुरंत बड़े बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी. खामेनेई की मौत पर भारत में मातम क्यों  तेहरान में अमेरिका और इजरायल ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले किए और इसमें ईरान के सुप्रीम लीडर 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई ने जान गंवाई, उसे लेकर हंगामा मचा हुआ है। खामेनेई की मौत को लेकर भारत के मुस्लिम समुदाय में कुछ वर्गों के बीच खास प्रतिक्रिया नजर आई। लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई और अलीगढ़ में शोक सभाओं, अंतिम संस्कार की प्रार्थना और ऑनलाइन संदेशों से संकेत मिलता है कि यह एक रेयर मूमेंट है। ऐसा पहली बार है जब शिया और सुन्नी, धार्मिक मतभेदों के लंबे इतिहास के बाद भी एक नेता के निधन पर साथ में शोक जताते नजर आए। खामेनेई 1989 से कर रहे थे ईरान का नेतृत्व     खामेनेई, जिन्होंने अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी की मृत्यु के बाद 1989 से ईरान का नेतृत्व किया।     वो एक शिया धर्मगुरु थे और सुन्नियों के लिए कोई धार्मिक प्राधिकारी नहीं थे।     उनकी मृत्यु पर प्रतिक्रियाएं सांप्रदायिक सीमाओं को पार कर गईं।     कई सुन्नियों के लिए, यह भावना ईरान से कम और फिलिस्तीन से अधिक जुड़ी है।     ये एक ऐसा मुद्दा है जो दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक विभाजनों को भी पार कर जाता है। खामेनेई पर क्यों आए शिया सुन्नी साथ? जमात-ए-इस्लामी हिंद के प्रमुख सैयद सदातुल्लाह हुसैनी ने कहा कि खामेनेई का जीवन धार्मिक अधिकार के साथ-साथ राजनीतिक दृढ़ विश्वास को भी दर्शाता था। एक बयान में कहा गया कि रमजान के पवित्र महीने में खामेनेई की शहादत ने मुस्लिम जगत के लाखों लोगों को गहरा शोक पहुंचाया है। कुछ सुन्नी मौलवियों में शोक के साथ-साथ उन मुस्लिम सरकारों की आलोचना भी शामिल थी जिन्हें चुप्पी साधे हुए देखा गया।  सुन्नियों की इस प्रतिक्रिया पर क्या कह रहे जानकार विद्वान बशारत अली ने कहा कि शिया राजनीतिक कल्पना में, शहादत एकता और राजनीतिक शक्ति का स्रोत बन जाती है। भारत में कई शियाओं के लिए, ईरान का धार्मिक महत्व है क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा शिया-बहुसंख्यक देश है। ये कोम और मशहद जैसे धार्मिक केंद्रों का घर है। सुन्नियों के लिए प्रतिक्रिया काफी हद तक राजनीतिक रही है, जो फिलिस्तीन और इजरायल के विरोध के इर्द-गिर्द केंद्रित है।  

खामेनेई की मौत से तनाव: दूतावास के बाहर उपद्रव, अमेरिकी फायरिंग में 8 पाकिस्तानी प्रदर्शनकारी ढेर

ईरान ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के विरोध में पाकिस्तान का औद्योगिक शहर कराची रविवार को रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुई हिंसक झड़प में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 30 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं। यह हिंसा उस समय भड़की जब प्रदर्शनकारियों ने दूतावास की सुरक्षा घेराबंदी को तोड़ने का प्रयास किया। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विभिन्न शिया समूहों द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत सुल्तानबाद से हुई थी। प्रदर्शनकारी ‘माई कोलाची’ मार्ग से होते हुए अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर बढ़ रहे थे। भीड़ वाशिंगटन और तेल अवीव के खिलाफ नारेबाजी कर रही थी। जैसे ही प्रदर्शनकारी डिप्लोमैटिक जोन के करीब पहुंचे, पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेड्स लगा दिए। प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित तौर पर पथराव किए जाने के बाद पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। स्थिति तब और बिगड़ गई जब भीड़ ने प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने की कोशिश की। फायरिंग और मौतों का मंजर तनाव चरम पर पहुंचने के बाद वाणिज्य दूतावास के अंदर तैनात अमेरिकी मरीन सुरक्षा कर्मियों को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा गया था। पाकिस्तान के ‘समा टीवी’ की रिपोर्ट के अनुसार, दूतावास की सुरक्षा में तैनात सैन्य कर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधा टकराव हुआ, जिसके दौरान हुई फायरिंग में 8 लोगों की जान चली गई। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों या अमेरिकी दूतावास ने अभी तक आधिकारिक तौर पर इन मौतों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन अस्पतालों से मिल रही जानकारी के अनुसार हताहतों की संख्या बढ़ सकती है। पूरे कराची में फैला तनाव खामेनेई की मौत की खबर मिलते ही कराची के विभिन्न हिस्सों, जैसे नसीम चौरंगी और अन्य इमामबाड़ों में मातम छा गया, जो जल्द ही गुस्से में बदल गया। प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से एम.टी. खान रोड और दूतावास की ओर जाने वाले सभी प्रमुख चौराहों को पूरी तरह सील कर दिया है। ट्रैफिक पुलिस ने नागरिकों को प्रभावित इलाकों से दूर रहने की सलाह दी है। क्षेत्रीय तनाव का असर कराची में भड़की यह हिंसा उस वैश्विक उबाल का हिस्सा है जो शनिवार को ईरान पर हुए इजरायल-अमेरिकी हमलों के बाद देखा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि अमेरिका और इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर ईरान की संप्रभुता पर हमला किया है। देर रात तक कराची में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई थी। कानून प्रवर्तन एजेंसियां अतिरिक्त बल की तैनाती कर व्यवस्था बहाल करने की कोशिश कर रही हैं, जबकि दूतावास के आसपास सुरक्षा घेरा और कड़ा कर दिया गया है।  

खामेनेई की हत्या का ग़म: शिया मुसलमानों का लखनऊ में जोरदार विरोध प्रदर्शन

लखनऊ राजधानी लखनऊ में रविवार को सुबह शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए। रोते बिलखते हुए नारेबाजी शुरू कर दी। यहां तक कि महिलाएं भी सड़कों पर रोते दिखीं। छोटे इमामबाड़े के पास बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग एकत्र हो गए। इस्लामिक सेंटर आफ इंडिया के अध्यक्ष एवं इमाम ईदगाह मौलाना खालिद रशीद ने कहा कि इस्राइल और यूएस ने मिलकर एक स्वतंत्र देश ईरान पर हमला किया, उन्होंने स्कूलों को भी नहीं छोड़ा। इसकी हम निंदा करते हैं। वहीं शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी ने कहा कि खामेनेई दुनिया के सभी मुसलमानों का ख्याल रखने वाले नेता थे। आज पूरी दुनिया ने देख लिया कि इस्राइल और यूएस ने किस तरह दहशतगर्दी फैलाई है। लखनऊ में शिया समुदाय के लोग तीन दिन का मनाएंगे शोक आयतुल्ला ख़ामेनई की शहादत पर घोषित तीन दिवसीय शोक के तहत शिया समुदाय के लोग अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इस संबंध में मौलाना कल्बे जवाद ने तमाम उम्मते मुस्लिमा और इंसानियत परस्त लोगों से शोक में शामिल होने की अपील की है।   उन्होंने बताया कि रविवार रात 8 बजे छोटे इमामबाड़े में शोकसभा आयोजित की जाएगी, जिसके बाद कैंडल मार्च निकाला जाएगा। मौलाना ने देशभर के शिया समुदाय से अपील की है कि रात 8 बजे एक ही समय पर शोकसभाएं आयोजित करें और जहां संभव हो वहां कैंडल मार्च निकालें। साथ ही सभी लोगों से बड़ी संख्या में शोकसभा में शामिल होकर दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देने का आह्वान किया गया है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर एक प्रदर्शनकारी महिला ने कहा कि “जिनके खून में गद्दारी है, उन्होंने खामेनेई को धोखे से मारा है, अगर एक खामेनेई मारा गया, तो हज़ार खामेनेई उठ खड़े होंगे। इस्राइल और अमेरिका धोखेबाज़ हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर शिया धार्मिक नेता मौलाना सैफ अब्बास ने कहा कि कल इस्राइल और अमेरिका ने जो हमला किया, उसे टेररिस्ट अटैक कहा जा रहा है। आज इसने पूरी खाड़ी को जंग में झोंक दिया है, और आप सब खाड़ी में हालात देख रहे हैं। दुनिया को समझना चाहिए कि अमेरिका और इज़राइल कैसे पूरी दुनिया में खून-खराबा, नफरत और दहशतगर्दी फैला रहे हैं… खामेनेई किसी एक देश के लीडर नहीं थे, बल्कि हर दबे-कुचले इंसान, हर मुसलमान और हर इंसान के लीडर थे… कोई नहीं जानता कि यह चल रहा झगड़ा कहां ले जाएगा। लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि ईरान जीतेगा…” ‘हम शहादत से नहीं डरते’ ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि हम शहादत से नहीं डरते… ईरान ने अमेरिका और इस्राइल को कड़े शब्दों में कहा है कि ऐसा करारा जवाब दिया जाएगा कि वे इसे हमेशा याद रखेंगे… दुनिया दोनों देशों को खत्म होते देखेगी। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर, इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एग्जीक्यूटिव मेंबर, खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, “ईरान एक आज़ाद देश है और जिस तरह से उस पर हमला किया गया, वह सभी इंटरनेशनल कानूनों के खिलाफ है… हम इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और इंटरनेशनल कम्युनिटी से अपील करते हैं कि वे आगे आएं और इस जंग को रोकें। हम यह भी अपील करते हैं कि खामेनेई की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर इंटरनेशनल कोर्ट में केस चलाया जाए। मैं दुनिया भर के लोगों से, और खासकर अपने देश के लोगों से, शांति बनाए रखने की अपील करता हूं…” ‘ट्रंप आसानी से नहीं जीत सकते’ ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर एक प्रदर्शनकारी महिला ने कहा कि वो (US) बातचीत से धोखा देते रहे और युद्ध की धमकी देते रहे, लेकिन हमारे लीडर डरे नहीं और झुके नहीं। अगर एक खामेनेई मारा गया, तो हजार खामेनेई उठ खड़े होंगे और यह युद्ध जारी रहेगा। ट्रंप आसानी से नहीं जीत सकते। ‘यह इंसानियत के लिए बहुत बड़ा नुकसान है’ इस्रइल और US के हमलों में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई पर शिया धर्मगुरु मौलाना सैयद कल्बे जवाद ने कहा कि ये सब कायर हैं जिन्होंने एक ऐसे लीडर को शहीद कर दिया जो हमेशा दबे-कुचले लोगों की मदद करता था। ट्रंप और नेतन्याहू ने अपने डेथ वारंट पर साइन कर दिए हैं। अल्लाह उन्हें सजा देगा। हमने तीन दिन के शोक का एलान किया है, और लोगों को अपनी दुकानें और बिजनेस बंद कर देने चाहिए, लेकिन हमें किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। यह इंसानियत के लिए बहुत बड़ा नुकसान है। हम आज रात 8 बजे कैंडललाइट मार्च निकालेंगे।

तनाव चरम पर: खामेनेई बोले– अमेरिकी कार्रवाई बनी तो पश्चिम एशिया बनेगा युद्ध का मैदान

ईरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने अमेरिका को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वाशिंगटन ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, तो यह संघर्ष सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया को अपनी चपेट में लेने वाला क्षेत्रीय युद्ध बन जाएगा। ईरान के सरकारी टेलीविजन के अनुसार, खामेनेई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अमेरिकियों को यह जान लेना चाहिए कि अगर वे युद्ध शुरू करते हैं, तो इस बार यह एक क्षेत्रीय युद्ध होगा।” खामेनेई की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को सैन्य कार्रवाई की धमकी दे चुके हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका वास्तव में हमला करेगा या नहीं, लेकिन खामेनेई के बयान को सीधी और गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। खामेनेई ने कहा कि ईरान किसी भी देश पर हमला करने की पहल नहीं करता और न ही वह युद्ध चाहता है। उन्होंने जोड़ा, “हम उकसाने वाले लोग नहीं हैं, लेकिन ईरानी राष्ट्र किसी भी हमले या उत्पीड़न का करारा जवाब देगा।” इस बयान से संकेत मिलता है कि ईरान अमेरिका या उसके सहयोगियों की किसी भी कार्रवाई का जवाब केवल सीधे तौर पर नहीं, बल्कि अपने क्षेत्रीय प्रभाव और सहयोगी गुटों के जरिए भी दे सकता है।  विश्लेषकों के अनुसार, ईरान की चेतावनी का मतलब है कि संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और खाड़ी क्षेत्र, ईरान समर्थित सशस्त्र गुट, इजराइल और अमेरिकी सैन्य ठिकाने, इन सभी के युद्ध में घसीटे जाने की आशंका है। यही वजह है कि खामेनेई “क्षेत्रीय युद्ध” शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। ईरान-अमेरिका टकराव की आशंका ने पहले से अस्थिर पश्चिम एशिया में चिंता बढ़ा दी है। कूटनीतिक हल की संभावनाओं के बीच यह बयान संकेत देता है कि अगर हालात बिगड़े, तो इसका असर तेल बाजार, वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक पड़ेगा।  

इजरायल ने साफ कहा है कि उसका इरादा ईरान में सत्ता परिवर्तन का है, खामेनेई को भी खत्म करने की बात कही

तेहरान अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली ईरान की सत्तारूढ़ व्यवस्था वर्तमान में इजरायल के हवाई हमलों के कारण भारी दबाव में है। इजरायली सेना उच्च पदस्थ अधिकारियों, सुरक्षा तंत्र और सरकारी मीडिया को निशाना बना रही है। ईरान के सबसे बड़े सैन्य अधिकारी पहले ही मारे जा चुके हैं। इजरायल ने साफ कहा है कि उसका इरादा ईरान में सत्ता परिवर्तन का है। यहां तक कि इजरायल ने खामेनेई को भी खत्म करने की बात कही है। ऐसे में सवाल उठता है कि मौजूदा सत्ताधारी लोगों के अलावा, ईरान में विपक्ष कौन है? दशकों से चली आ रही राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों की लहर के बावजूद, ईरान का विपक्ष खंडित और असंगठित नजर आता है। विभिन्न गुटों और वैचारिक मतभेदों के कारण यह विपक्ष देश के भीतर कोई मजबूत संगठित उपस्थिति स्थापित करने में असमर्थ रहा है। आइए ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को विस्तार से समझते हैं। ईरान की सत्तारूढ़ व्यवस्था के खिलाफ विरोध का इतिहास लंबा और जटिल रहा है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से, विभिन्न समूहों ने समय-समय पर शासन के खिलाफ आवाज उठाई है। हालांकि, ये समूह एकजुट होने में असफल रहे हैं, जिसके कारण उनका असर सीमित रहा है। विपक्षी समूहों में राजशाही समर्थक, इस्लामी सुधारवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रवादी, और जातीय/क्षेत्रीय स्वायत्तता आंदोलन शामिल हैं। इसके अलावा, निर्वासित समूह जैसे मोजाहेदीन-ए-खल्क (MEK) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शाही समर्थक गुट (Monarchists) 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी देश के अंतिम शासक थे। क्रांति के बाद ईरानी राजा को देश छोड़ना पड़ा और 1980 में मिस्र में उनका निधन हो गया। उनके पुत्र रजा पहलवी अब अमेरिका में रहते हैं। वह शांतिपूर्ण असहयोग और जनमत संग्रह के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की मांग करते हैं। हालांकि प्रवासी ईरानियों के एक वर्ग में शाही व्यवस्था यानी राजा की वापसी के प्रति झुकाव है, लेकिन ईरान के भीतर इस विचार की लोकप्रियता को लेकर संदेह बना हुआ है। अधिकांश ईरानी आज उस दौर को याद भी नहीं कर सकते क्योंकि वे क्रांति के बाद पैदा हुए हैं। शाही युग की यादें एक ओर जहां आधुनिकता और समृद्धि से जुड़ी हैं, वहीं कई लोग उस समय की असमानता और दमन को भी नहीं भूलते। स्वयं शाही समर्थकों के बीच भी एकजुटता का अभाव देखा जाता है। रजा पहलवी ने हाल के वर्षों में एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की स्थापना के लिए “महसा चार्टर” जैसे पहलों का समर्थन किया है, जिसमें मसीह अलीनेजाद, नाजनीन बोनियादी, शिरीन एबादी, हामेद इस्माईलियोन, अब्दुल्ला मोहतादी जैसे प्रमुख विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया। यह चार्टर शांतिपूर्ण तरीके से शासन को उखाड़ फेंकने का एक ढांचा प्रस्तुत करता है। मुजाहिदीन-ए-खल्क (MEK) मुजाहिदीन-ए-खल्क (MEK) कभी शाह शासन और अमेरिका विरोधी लेफ्ट विचारधारा का बड़ा नाम हुआ करता था। परंतु 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान इराक के साथ खड़ा होने के कारण इस संगठन को आज भी देश में गद्दार की नजरों से देखा जाता है- यहां तक कि इस्लामी गणराज्य के विरोधी भी इसे क्षमा करने को तैयार नहीं हैं। 2002 में ईरान के गुप्त यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम का खुलासा करने वाला यही समूह था। लेकिन वर्तमान में ईरान के भीतर इसकी सक्रियता न के बराबर है। संगठन के संस्थापक मसूद रजवी बीते दो दशकों से लापता हैं और उनकी पत्नी मरियम रजवी अब इसका नेतृत्व कर रही हैं। हालांकि पश्चिमी देशों में इसका सक्रिय नेटवर्क है, परंतु मानवाधिकार समूह इसे एक “संप्रदाय” की तरह चलाने का आरोप भी लगाते हैं, जिसे संगठन नकारता है। इस्लामी सुधारवादी (Reformists) ईरान के भीतर कुछ विपक्षी समूह इस्लामी गणतंत्र के ढांचे के भीतर सुधार की वकालत करते हैं। इनमें पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातामी, हसन रूहानी और अली अकबर हाशमी रफसंजानी जैसे नेताओं के समर्थक शामिल हैं। ये सुधारवादी सख्त इस्लामी नियमों में ढील और अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करते हैं। हालांकि, ये समूह मौजूदा शासन के खिलाफ पूर्ण विद्रोह के बजाय सिस्टम के भीतर बदलाव पर जोर देते हैं, जिसके कारण इनकी विश्वसनीयता विपक्ष के अन्य कट्टरपंथी गुटों के बीच कम हो जाती है। जातीय अल्पसंख्यक समूह ईरान में कुर्द, अजरबैजानी, अरब और बलोच जैसे जातीय समूह भी विपक्ष का हिस्सा हैं, जो अधिक स्वायत्तता या कुछ मामलों में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हैं। ये समूह अक्सर केंद्र सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में शामिल रहे हैं। हालांकि, इनके बीच वैचारिक और क्षेत्रीय मतभेदों के कारण एकजुटता की कमी है, जिससे ये समूह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी विपक्ष के रूप में उभरने में असमर्थ रहे हैं। कुर्द और बलूच जैसे सुन्नी मुस्लिम अल्पसंख्यक लंबे समय से शासन व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। देश के पश्चिमी हिस्से में कुर्द समूहों ने अक्सर हथियारबंद विद्रोह किया है। वहीं, बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थिति और अधिक जटिल है- कुछ समूह जहां केवल धार्मिक स्वतंत्रता की मांग करते हैं, वहीं कुछ चरमपंथी तत्व अल-कायदा जैसे संगठनों से जुड़े हुए हैं।

ईरानी सेना की कार्रवाई इजरायल के अपराधों के जवाब में दी गई सबसे छोटी सजा है- खामेनेई

तेहरान ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने कहा है कि हाल ही में इजरायल के खिलाफ ईरान की सैन्य कार्रवाई “पूरी तरह कानूनी और जायज” है। खामेनेई ने यह बात ईरान की राजधानी तेहरान में की नमाज के दौरान बड़ी संख्या में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कही। यह बयान उनके कार्यालय की वेबसाइट पर जारी किया गया। शिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक वह ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) द्वारा इजरायल पर किए गए हाल के मिसाइल हमले पर टिप्पणी कर रहे थे। खामेनेई ने जोर देकर कहा कि ईरानी सेना की कार्रवाई इजरायल के अपराधों के जवाब में दी गई सबसे छोटी सजा है, जो इजरायल और अमेरिका ने पश्चिम एशिया में किए हैं। उन्होंने कहा कि ईरान इस मामले में “मजबूती, बहादुरी और दृढ़ता” से अपनी जिम्मेदारियों को निभाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा, “हम न तो हिचकिचाएंगे, न लापरवाही करेंगे और न ही जल्दबाजी करेंगे।” खामेनेई ने कहा, “जो भी उचित, तर्कसंगत और सही होगा, उसे सही समय पर किया जाएगा, जैसा कि यह मिसाइल हमला किया गया और भविष्य में भी अगर जरूरी हुआ तो किया जाएगा।” मंगलवार को आईआरजीसी ने इजरायल के रणनीतिक केंद्रों पर लगभग 180 मिसाइलें दागी। ईरान ने कहा कि ये हमले इजरायल द्वारा हमास के प्रमुख इस्माइल हानियेह, हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह और आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडर अब्बास नीलफोरुशान की हत्याओं के जवाब में थे। साथ ही, इजरायल की आक्रमकता और अमेरिका के समर्थन से लेबनानियों और फिलिस्तीनियों के खिलाफ बढ़ते “दुष्ट कार्यों” का बदला भी था।    

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