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महाशिवरात्रि 2026: पूजा का फल बिगड़ने से बचाने के लिए शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय करें ये 6 चीजें

 इस बार महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा. महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव को समर्पित सबसे पवित्र रातों में से एक माना जाता है. इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र अर्पित करते हैं. मान्यता है कि भगवान शिव को सच्चे मन से अर्पित किया गया जल जीवन की बाधाओं को दूर करता है. लेकिन कई बार अनजाने में की गई छोटी-छोटी गलतियां पूजा का पूर्ण फल मिलने से रोक सकती हैं. इसलिए जलाभिषेक करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. 1. तांबे के पात्र की जगह प्लास्टिक का इस्तेमाल शास्त्रों में तांबे या पीतल के पात्र से जल चढ़ाने की परंपरा बताई गई है. प्लास्टिक या गंदे बर्तन से जल चढ़ाना अशुभ माना जाता है. कोशिश करें कि साफ और शुद्ध पात्र का ही उपयोग करें. 2. तुलसी दल न चढ़ाएं भगवान शिव की पूजा में तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता. तुलसी का संबंध भगवान विष्णु से माना जाता है. इसलिए भूलकर भी शिवलिंग पर तुलसी न चढ़ाएं. 3. केतकी का फूल अर्पित न करें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केतकी का फूल शिव पूजा में वर्जित है. इसलिए महाशिवरात्रि पर इसे चढ़ाने से बचें. 4. बेलपत्र उल्टा न रखें बेलपत्र हमेशा तीन पत्तियों वाला और साबुत होना चाहिए. इसे शिवलिंग पर इस तरह रखें कि उसकी चिकनी सतह ऊपर की ओर रहे. फटा या कीड़ा लगा बेलपत्र अर्पित न करें. 5. जल चढ़ाते समय दिशा का ध्यान रखें जलाभिषेक करते समय उत्तर दिशा की ओर मुख करना शुभ माना जाता है. साथ ही जल धीरे-धीरे अर्पित करें, एकदम से न उड़ेलें. 6. अभिषेक के जल का अपमान न करें जो जल शिवलिंग से बहकर निकलता है, उसे पवित्र माना जाता है. उस पर पैर रखना या उसे अपवित्र करना ठीक नहीं माना जाता है.

Maha Shivratri 2026 Date & Muhurat: इस पावन महासंयोग में भोलेनाथ करेंगे हर कामना पूर्ण

हर साल महाशिवरात्रि का इंतजार शिवभक्तों को बेसब्री से होता है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। इसे हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस खास दिन पर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से शिव-शक्ति को पूजा जाए तो हर कामना पूरी होती है। इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं। माना जाता है इस दिन की गई पूजा और इस दिन रखे गए व्रत से सुख-समृद्धि आती है और हर रूका हुआ काम पूरा हो जाता है। हर बार की तरह इस बार भी लोग महाशिवरात्रि की तारीख को लेकर कन्फ्यूज हैं।  महाशिवरात्रि की तारीख और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल फाल्गुन महीने में पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी से शुरु होगी। इसका समय शाम को 5:04 से शुरू होगा। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 16 फरवरी की शाम साढ़े 5 बजे होगी। इस वजह के महाशिवरात्रि 15 फरवरी को होगी। इसी दिन भगवान शिव की पूजा होगी और इसी दिन व्रत रखा जाएगा। बात करें पूजा के शुभ मुहूर्त की तो 15 फरवरी की शाम 5:54 बजे से लेकर रात 12:12 बजे के बीच कभी भी महाशिवरात्रि की पूजा की जा सकती है। अगले दिन दोपहर 3 बजे तक इस व्रत का पारण कभी भी किया जा सकता है। बन रहा है ये खास योग इस साल की महाशिवरात्रि कई वजह से खास होने वाली है। इस दिन कई योग एक साथ बन रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि इस महासंयोग से हर कामना पूरी हो सकती है। ऐसे में इस दिन व्रत रखना काफी फलदायी होगा। इस साल महाशिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। वहीं अभिजीत मुहूर्त के साथ ही इस दिन भद्रावास योग का भी संयोग बनने वाला है। इस महासंयोग को काफी दुर्लभ माना जाता है।

60 साल बाद त्रिग्रही योग में मनेगी महाशिवरात्रि, दूल्हा बनेंगे भोलेनाथ, चार प्रहर की साधना देगी धन, यश, प्रतिष्ठा व समृद्धि

ज्योतिष शास्त्र व पंचांग की गणना के अनुसार इस बार महाशिवरात्रि का पर्वकाल त्रिग्रही युति योग में मनाया जाएगा। इस योग में की गई शिव साधना मनोवांछित फल प्रदान करने वाली मानी गई है। शिव साधना की दृष्टि से ऐसा शुभ संयोग वर्ष 2025 से पहले सन 1965 में बना था। मकर राशि में तीन ग्रहों की युति रहेगी     ज्योतिषाचार्य  ने बताया कि महाशिवरात्रि 26 फरवरी को बुधवार के दिन श्रवण उपरांत धनिष्ठा नक्षत्र, परिघ योग, वणिज उपरांत शकुनीकरण तथा मकर राशि के चंद्रमा की साक्षी में आ रही है।     जब भी कोई महापर्व आता है, तो ग्रह योग, नक्षत्र व संयोग देखा जाता है, क्योंकि ग्रहों की साक्षी एवं परिभ्रमण का प्रभाव जीवन पर पड़ता है। ग्रहों के परिभ्रमण का लाभ लेते हुए साधना की दृष्टि से जीवन को कैसे सुखमय बनाया जाए ज्योतिष शास्त्र इसका मार्ग बताते हैं।     महाशिवरात्रि पर मकर राशि के चंद्रमा की साक्षी में सूर्य, बुध व शनि की युति कुंभ राशि में रहेगी। सूर्य व शनि पिता पुत्र हैं और सूर्य शनि की कक्षा अर्थात शनि की राशि कुंभ में रहेंगे।     इस दृष्टि से यह विशिष्ट संयोग भी है, यह योग लगभग एक शताब्दी में एक बार बनता है। इस योग में की गई साधना परम पद व आध्यात्मिक धार्मिक उन्नति प्रदान करती है। इस दृष्टि से इन योग संयोग में विशिष्ट साधना अवश्य करनी चाहिए। -महाशिवरात्रि का पूजन रात्रि में करने का है विशेष प्रावधान  इस वर्ष आठ मार्च की महाशिवरात्रि बेहद खास है। ज्योतिषविदों के अनुसार 60 साल के बाद शिव योग एवं सवार्थ सिद्धि योग के साथ ग्रहों की शुभ युति के त्रिग्रही योग में मनाई जाएगी। इसमें सिद्धि योग एवं श्रवण नक्षत्र का भी संयोग बना है। कुंभ राशि में सूर्य, शनि व शुक्र साथ मिलकर त्रिग्रही योग का निर्माण कर रहे हैं। ग्रहों की युति के साथ ही शिवयोग, प्रदोष व्रत एवं सवार्थ सिद्धि योग के दुर्लभ बना यह संयोग लगभग तीन सौ साल के बाद आया है। पंडित सुनील दाधीच ने बताया कि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार ऐसा योग बेहद दुर्लभ और अकल्पनीय सुखद संयोग लेकर आता है। इस दिन की भगवान शिव के व्रत एवं अर्चन की तुलना सामान्य दिनों में होने वाले पूजन कार्यों से नहीं की जा सकती है। मेष, वृषभ, तुला, मकर एवं कुंभ राशि के लिए बेहद खास रहेगा यह संयोग। शनिदेव अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में विराजमान है। इसके साथ ही सूर्यदेव अपने पुत्र एवं आदर्श शत्रु शनि की राशि कुंभ में चन्द्रमा के साथ विराजित रहेंगे। ग्रहों की ये स्थिति त्रिग्रही योग का निर्माण कर रही है। जो कि फलदायी है। रात्रि में ही क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि ज्योतिषी महेश गुरु के अनुसार ईषान संहिता में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि रात्रि के द्वितीय पहर में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। शिव यानि की रात्रि के प्रतीक हैं, और यह भूतेश्वर या भूतनाथ कहे जाते हैं। भूत आदि रात्रि में ही सक्रिय होते हैं। इस दिन में रात्रि में ही इनका प्रादुर्भाव होने की वजह से ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है। शिवरात्रि पर चार प्रहर में यानि की चार बार पूजन का विधान आता है। पहले प्रहर में दूध से शिव के ईशान स्वरूप का, दूसरे प्रहर में दही से अघोर स्वरूप का, तीसरे प्रहर में घी से वामदेव रूप का और चौथे प्रहर में शहद से सद्योजात स्वरूप का अभिषेक कर पूजन करना चाहिए। यदि कन्याएं चार बार पूजन न कर सकें, तो पहले प्रहर में एक बार तो पूजन अवश्य ही करें। महाशिवरात्रि की रात महासिद्धिदायिनी होती है। इस रात्रि को निशा रात्रि भी कहते हैं। यानि की चारों ओर घोर अंधकार की स्थिति में शिवलिंग का उद्भव अंधकार में प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। पूजा पद्धति सात्विक व शाक्त अलग-अलग विधियों से संपन्न कराई जाती है। इसी दिन शिव एवं पार्वती का पाणीग्रहण भी हुआ था। इस वजह से भी पूरी रात्रि को उत्सव की तरह मनाया जाता है। रात्रि पूजन का है विशेष विधान महाशिवरात्रि पर ऐसे की जा सकती है पूजा पूरी तरह से शुद्ध होने के बाद घर के मंदिर में या शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा की जा सकती र्है। पहले शिवलिंग में चंदन का लेप करने के साथ ही पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। इसमें गन्ने के रस, कच्चे दूध, या शुद्ध घी से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। इसके पश्चात महादेव को बेलपत्र, धतूरा, जायफल, कमल गट्टे, फल, फूल, मिठाई, मीठा पान, इत्र आदि अर्पित करना चाहिए। अर्चन सदैव पूर्वाभिमुखी या फिर उत्तरामुखी करनी चाहिए। इसके पश्चात शिव पंचाक्षर मंत्र आदि के साथ शिव ताण्डव स्तोत्र आदि का पाठ किया जा सकता है। व्रत रहने वाले को पूरा दिन निराहार रहना चाहिए। रोगी या अशक्त फलाहार कर सकते हैं। व्रत रखने वाले को फल, फूल, चंदन, बिल्व पत्र, धतूरा, धूप व दीप से रात के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए साथ ही भोग भी लगाना चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिवलिंग को स्नान कराकर जल से अभिषेक भी किया जाता है। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से फूल अर्पित कर भगवान शिव की आरती और परिक्रमा करने का विधान है। इसमें पूजन तो चारों पहर में होता है, लेकिन मध्यरात्रि की पूजा को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।  

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