दूध में यूरिया, डिटर्जेंट और पानी की मिलावट, टॉप डेयरी ब्रांड्स FSSAI जांच में फेल
भोपाल भारत, जो दुनिया के कुल दूध उत्पादन में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा उत्पादक देश है, अब ‘मिलावटी और असुरक्षित’ दूध के केंद्र के रूप में उभर रहा है। हाल ही में ‘ट्रस्टीफाइड’ (एक स्वतंत्र लैब टेस्टिंग प्रोग्राम) द्वारा की गई जांच ने देश के टॉप डेयरी ब्रांडों के दावों की पोल खोल दी है। बैक्टीरिया का स्तर खतरे के निशान से ऊपर ट्रस्टीफाइड की रिपोर्ट के अनुसार, कई नामी ब्रांडों के दूध के नमूनों में कोलीफॉर्म (Coliform) का स्तर FSSAI की निर्धारित सीमा से 98 गुना अधिक पाया गया। इसके अलावा, ‘टोटल प्लेट काउंट’ (Total Plate Count) भी सुरक्षित सीमा से कहीं ज्यादा था, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। हर तीन में से एक नमूना फेल दूध की शुद्धता को लेकर सरकारी आंकड़े भी डराने वाले हैं। FSSAI द्वारा 2025 में की गई जांच में 38 प्रतिशत नमूने मिलावटी पाए गए। पिछले कुछ वर्षों का रुझान देखें तो स्थिति और भी चिंताजनक हुई है: 2015-2018: मिलावटी नमूनों की संख्या में 16.64% का इजाफा हुआ। 2022: कुल 798 नमूनों में से आधे मिलावटी पाए गए। 2025: लगभग हर तीसरा नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरा। उत्तर भारत सबसे ज्यादा प्रभावित एफएसएसएआई की ‘मिल्क सर्विलांस रिपोर्ट’ के अनुसार, मिलावट के मामले में क्षेत्रीय स्तर पर भारी अंतर देखा गया है: क्षेत्र – मानकों में फेल नमूनों का प्रतिशत उत्तर भारत: 47% (सबसे असुरक्षित) पश्चिम भारत: 23% दक्षिण भारत: 18% पूर्वी भारत: 13% क्या मिलाया जा रहा है आपके दूध में? इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन की एक ताजा स्टडी में 330 नमूनों की जांच की गई, जिसमें से 70.6% में गंभीर मिलावट पाई गई। मिलावट के मुख्य कारक इस प्रकार हैं: पानी: 193 नमूनों में मात्रा बढ़ाने के लिए पानी मिलाया गया। डिटर्जेंट (23.9%): झाग बनाने और दूध को गाढ़ा दिखाने के लिए। यूरिया (9.1%): फैट और प्रोटीन की मात्रा को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए। स्वास्थ्य पर प्रभाव और सावधानी विशेषज्ञों का कहना है कि कोलीफॉर्म और डिटर्जेंट युक्त दूध पीने से पेट में संक्रमण, किडनी की बीमारी और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। उपभोक्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे दूध खरीदने से पहले ब्रांड की लेटेस्ट लैब रिपोर्ट और FSSAI मार्क की जांच जरूर करें। सोर्स- एफएसएसएआई