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मंत्री परमार ने, शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय भोपाल द्वारा प्रकाशित शोध जर्नल का किया विमोचन

भोपाल. उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने, भोपाल स्थित निवास कार्यालय में मंगलवार को शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय भोपाल द्वारा संकलित शोध पत्रों पर प्रकाशित शोध जर्नल (RJMLB) का विमोचन किया। उच्च शिक्षा मंत्री परमार ने महाविद्यालय द्वारा प्रकाशित शोध पत्रों एवं उनकी गुणवत्ता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश के अन्य महाविद्यालयों द्वारा भी इस प्रकार के शोध प्रकाशन किए जाना चाहिये। मंत्री परमार ने छात्र-छात्राओं को भी शोध पत्र लेखन के लिये प्रोत्साहित किये जाने को कहा। परमार ने भारतीय ज्ञान परम्परा से संबंधित आलेख का भी समुचित समावेश किये जाने पर जोर दिया ताकि नयी पीढी भारतीय समृद्ध पुरातन ज्ञान एवं संस्कृति से परिचित हो सकें। ज्ञातव्य है कि शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय भोपाल द्वारा पर्यावरण से संबंधित राष्ट्रीय स्तर का वेबीनार का आयोजन किया गया था, जिसमें लगभग 250 से अधिक प्रतिभागी सम्मिलित हुये थे। प्रतिभागियों की ओर से दिये गये शोध पत्रों की समीक्षा उपरांत चयनित शोध पत्र एवं महाविद्यालय द्वारा आमंत्रित अन्य शोध पत्रों का संकलन कर, महाविद्यालय द्वारा शोध जर्नल (RJMLB) प्रकाशित किया गया है। इस अवसर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अजय अग्रवाल, डॉ. प्रवीण तामोट, विभागाध्यक्ष प्राणीशास्त्र डॉ. मीनल फडनीस एवं डॉ. संजय सिंह उपस्थित थे।  

मंत्री परमार ने कहा महाविद्यालय का अभिनव प्रयास, भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करेगा

भोपाल उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने भोपाल स्थित सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय में “विवाह एवं परिवार परामर्श केन्द्र” की स्थापना के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। परमार ने कहा कि महाविद्यालय का यह अभिनव प्रयास, भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करेगा और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए अभिप्रेरणा का आदर्श केंद्र बनेगा। मंत्री परमार ने कहा कि परिवार, राष्ट्र की प्रथम इकाई है, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का मौलिक सृजन होता है। राष्ट्र के सांस्कृतिक सृजन में, पारिवारिक मूल्यों एवं मौलिक संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। विवाह संस्कार, सनातन के 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। विवाह संस्कार के पालन एवं कुटुम्ब में सौहार्दपूर्ण समन्वय, वर्तमान परिदृश्य की आवश्यकता भी है। मंत्री परमार ने कहा कि यह केंद्र, पारिवारिक मूल्यों के सांस्कृतिक संवर्धन एवं संरक्षण में अपनी महती उपयोगिता सिद्ध करेगा। भोपाल स्थित सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय में, सोमवार को जनभागीदारी समिति की अध्यक्ष डॉ. भारती कुंभारे सातनकर एवं प्राचार्य डॉ. दीप्ति श्रीवास्तव ने “विवाह एवं परिवार परामर्श केन्द्र” का शुभांरभ किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापकगण एवं छात्राएं उपस्थित थीं। प्रकोष्ठ के माध्यम से अनुभवी मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों एवं मध्यस्थता करने वाले व्यवसायिक परामर्शदाताओं की परामर्श एवं काउन्सलिंग छात्राओं को उपलब्ध करायी जाएगी। प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. आलोक कुमार निगम एवं सह संयोजक डॉ. संजना शर्मा हैं। “विवाह एवं परिवार” के संदर्भ में छात्राओं के मध्य परामर्श सुविधा उपलब्ध कराने के लिए, केन्द्र की स्थापना करने वाला यह महाविद्यालय, प्रदेश का प्रथम शासकीय महाविद्यालय है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान परिदृश्य में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण विवाह एवं परिवार संस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जहाँ एक ओर नारी सशक्तिकरण की ओर बढ़ रही है, वहीं उसे पारिवारिक समायोजन में विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में विवाह और परिवार जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और ये बिखरती जा रही है। विवाह और परिवार जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के विषय में महाविद्यालय की छात्राओं में जागरूकता लाने एवं नकारात्मक विचारों को हटाने के उद्देश्य से महाविद्यालय के समाजशास्त्र, समाजकार्य विभाग तथा मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वाधान में “विवाह एवं परिवार परामर्श केन्द्र” की स्थापना का अभिनव प्रयास किया गया है। परिवार में सौहार्द्रता वृद्धि और मूल्यों के संवर्धन के उद्देश्य से, छात्राओं को बौद्धिक एवं मानसिक रूप से प्रबल करना इस प्रकल्प का ध्येय है। पारिवारिक सम्बन्धों को मजबूत करना, विवाह संबंधों को सुधारना, व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विकास, सामाजिक एवं भावनात्मक समर्थन जैसे विविध मूल्य आधारित लक्ष्यों के साथ; यह केंद्र छात्राओं को जीवन में आने वाली चुनौतियों से सामना करने में सक्षम बनाने में सहयोगी बनेगा।  

समस्त विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ में स्थापित होगी जनजातीय गौरव प्रदर्शनी: मंत्री परमार

जनजातीय नायकों के पुरुषार्थ एवं कृतित्व को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की आवश्यकता : मंत्री परमार समस्त विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के पुस्तकालयों को जनजातीय योगदान से जुड़े साहित्य से समृद्ध करेंगे समस्त विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ में स्थापित होगी जनजातीय गौरव प्रदर्शनी जनजातीय गौरव दिवस के उपलक्ष्य पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन भोपाल अतीत के कालखंडों में इतिहासकारों ने जनजातीय नायकों एवं महापुरुषों के पुरुषार्थ एवं कृतित्व के साथ न्याय नहीं किया। इतिहास के पन्नों में जनजातीय नायकों के संघर्ष, शौर्य, पराक्रम, बलिदान और त्याग को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया गया। जनजातीय समाज के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक गौरवपूर्ण योगदान और देश की स्वाधीनता के लिए दिए उनके बलिदान को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। जनजातीय नायकों एवं महापुरुषों के पुरुषार्थ एवं कृतित्व से मात्र जनजातीय समाज नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र लाभान्वित हुआ। राष्ट्र के लिए जनजातीय योगदान का यह समग्र विचार, जनमानस के समक्ष लाने की आवश्यकता है। इसके लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय दृष्टि से स्वाधीनता के संघर्ष के सही इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण के साथ भारतीय परिप्रेक्ष्य में लिखने का अवसर प्रदान किया है। यह बात उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने बुधवार को भोपाल स्थित रविन्द्र भवन के गौरांजनी सभागृह में राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के शुभारम्भ अवसर पर कही। उच्च शिक्षा मंत्री परमार ने कहा कि भारत के गौरवशाली इतिहास, श्रेष्ठ ज्ञान परम्परा, सभ्यता, संस्कृति , विरासत, शौर्य, पराक्रम एवं स्वाधीनता के नायकों का बलिदान और उपलब्धियों को, वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को सही परिप्रेक्ष्य में भारतीय दृष्टिकोण से बताने की आवश्यकता है। परमार ने कहा कि जनजातीय समाज प्रकृति पूजक समाज है। प्रकृति की पूजा में भारतीय सभ्यता का मूल भाव कृतज्ञता है। कृतज्ञता का भाव, हमारी सभ्यता और विरासत है। प्रकृति, जल स्त्रोतों एवं सूर्य सहित समस्त ऊर्जा स्रोतों के प्रति कृतज्ञता का भाव भारतीय समाज में परम्परागत रूप से आदिकाल से विद्यमान है। भारत का ज्ञान विश्व मंच पर ईसा से हजारों वर्षों पूर्व भी सर्वश्रेष्ठ था, इसलिए भारत विश्व गुरु के रूप में सुशोभित था। हम सभी को भारत के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान पर गर्व का भाव जागृत कर, देश को पुनः विश्व मंच पर सिरमौर बनाने में सहभागिता करने की आवश्यकता है। इसके लिए भारतीय उपलब्धियों पर हीन भावना से बाहर आकर, स्वत्व का भाव जागृत करना होगा। जनजातीय नायकों के अपने अस्त्र-शस्त्र होते थे, जो वे स्वयं निर्माण करते थे। ईसा पूर्व ही जनजातीय समाज, श्रेष्ठ लोहा निर्माण करते रहे हैं। जनजातीय समाज के ऐसे कई कृतित्व, आज भी विद्यमान है। ऐसे कृतित्व का पुनः अध्ययन, शोध एवं अनुसंधान कर, तथ्यपूर्ण एवं सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। परमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा को भारतीय ज्ञान परम्परा से समृद्ध करने का अवसर है। इसके लिए प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पुस्तकालयों को, भारतीय ज्ञान परम्परा और जनजातीय योगदान से जुड़े साहित्य से समृद्ध करेंगे। परमार ने कहा कि ईसा के पूर्व के भारतीय ज्ञान को पुनः विश्वमंच पर प्रस्तुत करने के लिए, शोध एवं अध्ययन के आधार पर युगानुकुल परिप्रेक्ष्य में भारतीय दृष्टिकोण के साथ, शैक्षिक परिदृश्य में तथ्यपूर्ण समावेश की आवश्यकता है। परमार ने कहा कि हम सभी की सहभागिता से स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष में भारत पुनः विश्वमंच पर सिरमौर बनेगा। सौर ऊर्जा से ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भर होकर, अन्य देशों की पूर्ति करने में सक्षम राष्ट्र होगा। खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म निर्भर होकर अन्य देशों के भरण पोषण करने में सामर्थ्यवान देश बनेगा। वर्ष 2047 के विकसित एवं विश्व गुरु भारत की संकल्पना को साकार करने में हम सभी की सहभागिता आवश्यक है। मंत्री परमार ने राष्ट्र के जनजातीय नायकों के पुरुषार्थ एवं कृतित्व पर प्रदर्शित चित्र प्रदर्शनी का शुभारंभ कर प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा अनुपम राजन ने कहा कि स्वाधीनता संग्राम में अपनी प्राणों की आहुति देने वाले जनजातीय अमर बलिदानियों के पुरुषार्थ पर आधारित प्रदर्शनी शुभारंभ किया गया है, किंतु दुर्भाग्यवश जनजाति नायकों के चित्रों की प्रदर्शनी में लगाए गए पचहत्तर प्रतिशत चित्रों को आज हम नहीं पहचानते हैं। हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि जिनके बलिदान से आज हम सब खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उनके बलिदान को हम याद रखें। राजन ने कहा कि आने वाली पीढ़ी के सामने इन बातों को रखना होगा, जिससे वह अपने नायकों को जानें और पहचानें। अपर सचिव (मुख्यमंत्री सचिवालय) लक्ष्मण सिंह मरकाम ने बीज वक्तव्य में बताया कि जनजाति गौरव दिवस का बीजारोपण करने वाला पहला राज्य मध्यप्रदेश है। जनजातीय गौरव दिवस के पीछे मध्यप्रदेश की एक दशक की वैचारिक यात्रा रही है। इसके बाद वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश ने सबसे पहला जनजातीय गौरव दिवस मनाया। मरकाम ने कहा कि पराधीन भारत में भी जनजातीय समाज इकलौता ऐसा समाज था, जो पराधीन नहीं रहा बल्कि अंग्रेजी पराधीनता के विरुद्ध मुखर रूप से विद्रोह करता रहा। ऐतिहासिक पाखंड को सही परिप्रेक्ष्य में सुधारते हुए, समाज के गौरव को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है। हमारे देश के शोधकर्ता एवं इतिहासकारों की नैतिक जिम्मेदारी है कि जनजातीय गुमनाम नायकों के पुरुषार्थ एवं योगदान को सही परिप्रेक्ष्य में भारतीय जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करें। जनजातियों के द्वारा राष्ट्र के लिए किए गए त्याग, बलिदान को रेखांकित करना, उनके ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक गौरवपूर्ण इतिहास को जानना इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य था। कार्यशाला में वीरांगना रानी दुर्गावती की 500वीं जन्म जयंती वर्ष एवं धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य पर प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जनजातीय नायकों के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान पर विभिन्न गतिविधियों के आयोजन पर विचार मंथन हुआ। राष्ट्र के लिए जनजातीय शूरवीरों के बलिदान एवं उनके पुरुषार्थ पर आधारित गतिविधियों के लिए भी मंथन हुआ। प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जनजातीय नायकों पर आधारित वर्ष भर के कार्यक्रम एवं विभिन्न गतिविधियों के सम्बन्ध में कार्ययोजना के सृजन के लिए विमर्श हुआ। कार्यशाला में विमर्श हुआ कि सभी विश्वविद्यालय अलग अलग समूहों के साथ मिलकर अपने विश्वविद्यालय में गतिविधियों का आयोजन करेंगे, जिसमें उनसे … Read more

उच्च शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में “भारतीय ज्ञान परंपरा शीर्ष समिति” की बैठक हुई

भोपाल उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार की अध्यक्षता में मंत्रालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा शीर्ष समिति” की बैठक हुई। बैठक में विश्वविद्यालय/सम्भागीय कार्यशालाओं की जानकारी और समस्त विश्वविद्यालयों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्परा को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षकों के प्रशिक्षण की समीक्षा की गई। मंत्री परमार ने विभिन्न बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा कर समस्त विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परम्परा विविध संदर्भ” को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न अकादमिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने के निर्देश दिये। बैठक में भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के लिए पुस्तकों की सूची का अवलोकन एवं अनुमोदन हुआ, साथ ही मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी लेखकों द्वारा पुस्तकों की सूची का विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण पर भी चर्चा की गई। मंत्री परमार ने स्नातक प्रथम वर्ष के पाठयक्रम का रिव्यू करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण 20 नवम्बर 2024 तक, चिन्हित लेखकों द्वारा पाण्डुलिपि का निर्माण 31 जनवरी 2025 तक, पाण्डुलिपि का परीक्षण फरवरी 2025 तक तथा पुस्तकों का प्रकाशन मई 2025 तक पूर्ण करने के निर्देश दिये। मंत्री परमार ने कहा कि पाठय पुस्तकों में स्थानीय समुदाय/जनजातीय समुदाय की आस्था, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान, प्रकृति के प्रतिश्रद्धा-समन्वय के भाव का समावेश होना चाहिये। सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी करने वाले विद्यार्थियों को पुरूस्कृत किया जाना चाहिए। परमार ने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में विद्यार्थियों को अध्ययन केंद्रो का भ्रमण कराया जाये। शिक्षा के लिए समाज को योगदान देने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। विद्यादान जैसा अभियान चलाकर समाज की सहभागिता प्राप्त की जाना चाहिये। विश्वविद्यालय /सम्भागीय कार्यशालाओं की जानकारी बैठक में आयुक्त उच्च शिक्षा निशांत बरवड़े ने बताया कि 26 विश्वविद्यालयों में विगत 3 माह में स्नातक स्तर के 18 विषयों सहित कुल 26 विषय पर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। 10 संभागों में विगत 2 माह में 24 विषयों पर एक दिवसीय कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। राजाशंकर शाह विश्वविद्यालय, छिन्दवाड़ा में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। समस्त विश्वविद्यालयों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्परा को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षकों को प्रशिक्षण 5 नवम्बर से 24 दिसम्बर तक दिया जायेगा। इसके अंतर्गत विज्ञान समूह, में वनस्पति विज्ञान, प्राणी विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, बी.एच.एस.सी./बी.एस.सी., गणित विषय सम्मिलित है। सामाजिक विज्ञान समूह में समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, भूगोल है। साहित्य एवं मनोविज्ञान समूह में अंग्रेजी साहित्य, हिन्दी साहित्य, संगीत, संस्कृत साहित्य, मनोविज्ञान, दर्शन हैं। वाणिज्य समूह में अर्थशास्त्र, वाणिज्य समूह शामिल है। बैठक में संबंधित मेजर एवं माइनर विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित किए जाने के परिप्रेक्ष्य में विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान/परिसंवाद, “शिक्षण अधिगम को रूचिकर बनाने” विषय पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान, परीक्षा संचालन एवं मूल्यांकन पद्दति की रूपरेखा पर चर्चा की गयी। समस्त विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परम्परा विविध संदर्भ” को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न अकादमिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों आयोजित की जायेंगी। इन गतिविधियों में भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित भाषण प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, पोस्टर प्रतियोगिता, भारतीय सांस्कृतिक लोक नृत्य, भारतीय सांस्कृतिक लोकगीत, भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता शामिल है। महाविद्यालय स्तरीय आयोजन समस्त महाविद्यालयों में होगा, यह आयोजन 21 से 26 अक्टूबर के मध्य किया जायेगा। जिला स्तरीय आयोजन संबंधित जिले के अग्रणी महाविद्यालय में 5 से 9 नवंबर के मध्य होगा। संभाग स्तरीय आयोजन संबंधित संभाग के अग्रणी महाविद्यालय में 25 से 29 नवंबर के मध्य होगा तथा राज्य स्तरीय आयोजन भोपाल संभाग के अग्रणी महाविद्यालय में 10 से 14 दिसंबर 2024 के मध्य आयोजित होगा। बैठक में शीर्ष समिति के उपाध्यक्ष एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के सचिव डॉ. अतुल कोठारी, मध्यप्रदेश शुल्क विनियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. रवीन्द्र कान्हेरे, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, अशोक कड़ेल, राजा शंकरशाह विश्वविद्यालय, छिन्दवाड़ा की कुलगुरू डॉ. लीला भलावी, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल के निदेशक डॉ. रमाकांत पांडेय, महर्षि वाल्मिकी संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल, हरियाणा के कुलपति डॉ. रमेश चन्द्र भारद्वाज एवं मध्यप्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलगुरु डॉ. संजय तिवारी सहित अन्य शिक्षाविद् तथा उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।  

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