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राष्ट्रपति के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदला जा सकता है? अनुच्छेद 143 और सलाहकार क्षेत्राधिकार की व्याख्या

नई दिल्ली भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट की सलाह मांगी है कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए निर्धारित समयसीमा देश की सर्वोच्च अदालत के द्वारा तय की जा सकती है। यह कदम तब उठाया गया जब 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों को राष्ट्रपति को तीन माह में निपटाना होगा। क्या है अनुच्छेद 143(1)? संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति किसी कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह ले सकते हैं। यह राय बाध्यकारी नहीं होती, लेकिन इसका संवैधानिक महत्व काफी अधिक होता है। सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दी जाती है। राष्ट्रपति ने यह संदर्भ 13 मई को भेजा और इसमें कुल 14 कानूनी प्रश्न शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट क्या पहले भी राय देने से मना कर चुका है? सुप्रीम कोर्ट ने दो बार राष्ट्रपति की राय मांगने पर जवाब देने से इनकार किया है। 1993 में जब राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में मंदिर की पूर्वस्थिति पर राय मांगी गई थी, जिसे कोर्ट ने धार्मिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत मानते हुए खारिज कर दिया। इससे पहले 1982 में पाकिस्तान से आए प्रवासियों के पुनर्वास संबंधी कानून पर राय मांगी गई थी, लेकिन बाद में वह कानून पारित हो गया और कोर्ट में याचिकाएं दायर हो गईं, जिससे राय अप्रासंगिक हो गई। कब-कब सुप्रीम कोर्ट ने दी थी राय? संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सबसे पहले महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली लॉज एक्ट- 1951 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी. केरल शैक्षणिक बिल- 1957 पर संदर्भ को संवैधानिक तौर पर व्याख्या करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर विवाद पर नरसिंह राव सरकार के समय भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों से जुड़े मामलों में राय देना अनुच्छेद 143 के दायरे में नहीं आता है. साल 1993 में कावेरी जल विवाद मामले के संदर्भ पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था. साल 2002 में गुजरात चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपील या पुनर्विचार याचिका दायर करने के बजाय 143 के तहत संदर्भ भेजा जाना सांविधानिक तौर पर गलत विकल्प है. हालांकि, पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की तरह संदर्भ पर राय बाध्यकारी नहीं होना संविधानिक तौर पर विचित्र है. राज्यपाल मामले से जुड़े कुछ पहलू 2G मामले में यूपीए सरकार के संदर्भ से मेल खाते हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने 122 फर्म और कंपनियों के 2G लाइसेंस पर स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द कर दिया था. तब केंद्र ने उसे फैसले के खिलाफ संदर्भ भेजते हुए पूछा था कि क्या नीतिगत मामलों में सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी होनी चाहिए. दरअसल, केशवानंद भारती मामले में संविधान पीठ के फैसले के अनुसार नीतिगत मामलों में संसद और केंद्र के निर्णय पर अदालतों की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल मामले में क्या हुआ? राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो जजों ने दिया था. कानूनविदों की मानें तो इस मामले में कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए थी. दरअसल, पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति को उन विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की थी जिन्हें राज्यपाल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया. आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए एक समय-सीमा निर्धारित कर दी थी. इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से सुप्रीम कोर्ट से सवाल किए गए हैं कि जबकि संविधान में ऐसा जिक्र नहीं है, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे दी. कानूनविद दो जजों की पीठ के फैसले पर इसलिए भी सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि पूर्व में दिया गया सर्वोच्च अदालत की बड़ी पीठ का फैसले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका की सीमा तय की गई है. दूसरी ओर संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास विधायक कितने दिन लंबित रहेगा, इसका जिक्र नहीं है. संविधान में जो प्रावधान नहीं है उसकी व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने नए प्रावधान बना दिए. जबकि केशवानंद भारती फैसले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को कानून निर्माण या संविधान संशोधन की शक्ति नहीं है सरकार की खामियों, कानून के निर्वात को ठीक करने के लिए जजों को संरक्षक की भूमिका मिली है. लेकिन यह साफ है कि राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए संदर्भ पर अगर सुप्रीम कोर्ट आगे बढ़ता है यानी राय देता है तो वह बाध्यकारी नहीं होगी. वह महज एक राय, सलाह या मशविरा होगा. क्या राष्ट्रपति निर्णय को पलटना चाहती हैं? सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि अनुच्छेद 143 का उपयोग किसी पहले से दिए गए निर्णय की समीक्षा या पलटने के लिए नहीं किया जा सकता है। 1991 में कावेरी जल विवाद पर कोर्ट ने कहा था कि निर्णय देने के बाद उसी विषय पर राष्ट्रपति की राय मांगना न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध है। यदि सरकार चाहे तो वह पुनर्विचार याचिका या क्युरेटिव याचिका दायर कर सकती है, जो कि न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। राष्ट्रपति ने पूछे कैसे प्रश्न? अधिकांश प्रश्न 8 अप्रैल के फैसले से जुड़े हैं, लेकिन अंतिम कुछ प्रश्नों में सुप्रीम कोर्ट की स्वयं की शक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रश्न 12 में पूछा गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को पहले यह तय करना चाहिए कि कोई मामला संविधान की व्याख्या से जुड़ा है या नहीं, ताकि उसे बड़ी पीठ को भेजा जा सके? इसी तरहा प्रश्न 13 में पूछा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की शक्ति) के प्रयोग की सीमा क्या है। प्रश्न संख्या 14 में पूछा गया है कि केंद्र-राज्य विवादों की मूल सुनवाई का अधिकार किसके पास है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास या अन्य अदालतों के पास … Read more

तख्तापलट की साजिश रचने वालों को मिलेगी कड़ी सजा, ब्राजील के राष्ट्रपति ने अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद किया ऐलान

साओ पाउलो। ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला डा सिल्वा ब्रेन सर्जरी के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज हो गए हैं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया और 2022 में तख्तापलट की कोशिश में शामिल लोगों को ‘कड़ी सजा’ देने का ऐलान किया है। लूला के डिस्चार्ज होने के तुरंत बाद सिरियो लिबनेस अस्पताल में यह प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई जो पिछले सप्ताह हुई सर्जरी के बाद से उनकी पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी। उनकी मेडिकल टीम और प्रथम महिला रोसांगेला डा. सिल्वा उनके साथ मौजूद थीं। लूला ने हिरासत में लिए गए रिटायर जनरल वाल्टर ब्रागा नेट्टो का जिक्र करते हुए कहा, “मेरा मानना ​​है कि जनरल ब्रागा को निर्दोष होने का पूरा अधिकार है।” ब्रागा ने पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो के अधीन रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया था। जांच में हस्तक्षेप करने के प्रयास के आरोपी ब्रागा नेट्टो को सुप्रीम फेडरल कोर्ट के आदेश के बाद शनिवार को गिरफ्तार कर किया गया। फेडकरल पुलिस के अनुसार, बोल्सोनारो कथित तौर पर 2022 में लूला को राष्ट्रपति पद संभालने से रोकने के लिए तख्तापलट की योजना बना रहे थे। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार लूला ने कहा कि राष्ट्रपति की हत्या की साजिश में उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारियों का शामिल होना अस्वीकार्य है। छुट्टी मिलने के बाद लूला गुरुवार तक साओ पाओलो स्थित अपने आवास पर काम करेंगे। उसके बाद उन्हें राजधानी ब्रासीलिया की यात्रा के लिए परमिट प्राप्त करने के लिए सीएटी स्कैन कराना होगा, ताकि वे प्लानाल्टो पैलेस में अपना काम फिर से शुरू कर सकें। 79 वर्षीय लूला ने गंभीर सिरदर्द की शिकायत की थी, जब उनके मस्तिष्क और मेनिन्जियल झिल्ली के बीच हेमेटोमा पाया गया तो उन्हें इमरजेसी सर्जरी के लिए भर्ती किया गया था। डॉक्टरों ने पुष्टि की कि हेमेटोमा से कोई चोट या अन्य बीमारियां नहीं हुई हैं। यह मामला अक्टूबर महीने के अंत में राष्ट्रपति निवास, पैलेसियो डा अलवोराडा में लूला के गिरने से जुड़ा था, जब उनके सिर के पिछले हिस्से में चोट लगी थी और पांच टांके लगे थे, जिसके कारण उन्हें रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने की अपनी यात्रा को ऐन मौके पर कैंसिल करना पड़ा था। ब्राजील के सामाजिक संचार सचिव पाउलो पिमेंटा ने पुष्टि की है कि डा सिल्वा 2026 में फिर से चुनाव लड़ेंगे। सीएनएन ब्राज़ील के साथ एक इंटरव्यू में, पिमेंटा ने आश्वासन दिया कि दिमाग में हुए रक्तस्राव के उपचार के बाद राष्ट्रपति का स्वास्थ्य अच्छा है। उन्होंने कहा कि वह देश का नेतृत्व जारी रखने के लिए “सबसे योग्य और तैयार व्यक्ति” हैं।

बिफरे विपक्ष ने बताया दूसरा तख्तापलट, दक्षिण कोरिया-राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को सौंपीं शक्तियां

सियोल. दक्षिण कोरिया में लगातार सियासी उथल-पुथल जारी है। यहां के हालात तब ज्यादा बदतर हो गए, जब तीन दिसंबर की रात राष्ट्रपति यून सुक-योल ने इमरजेंसी यानी मार्शल लॉ लगाने का एलान किया था। हालांकि, भारी विरोध के बाद कुछ ही घंटों बाद इसे समाप्त कर दिया गया था। हालांकि, इसके वाबजूद भी हालात सही नहीं हैं। अब यहां के विपक्ष ने सत्तारूढ़ पार्टी पर सत्ता पर काबिज होने तथा मार्शल लॉ के एलान के लिए राष्ट्रपति यून सूक योल पर महाभियोग चलाने से इनकार करके दूसरा तख्तापलट करने का आरोप लगाया। छह घंटे चले मार्शल लॉ ने बिगाड़े हालात राष्ट्रपति यून सुक योल ने हाल ही में मार्शल लॉ (सैन्य शासन) घोषित कर दिया था, यह आरोप लगाते हुए कि विपक्ष देश की लोकतंत्र और स्थिरता के लिए खतरा बन रहा है। हालांकि, कुछ ही घंटों बाद, राष्ट्रपति ने इस फैसले को वापस ले लिया। यह कदम जनता के विरोध और नेशनल असेंबली की कड़ी आलोचना के बाद लिया गया था। दक्षिण कोरिया में मार्शल लॉ केवल लगभग छह घंटे चला। हालांकि चंद घटों के लिए लागू हुए मार्शल लॉ ने देश की राजनीतिक को हिला कर रख दिया। यून पर महाभियोग लगाने में नाकाम रहा विपक्ष राष्ट्रपति योल के इस फैसले के खिलाफ विपक्ष समेत देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। मार्शल लॉ के कारण विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति यून पर महाभियोग लगाने का प्रयास किया। हालांकि, यह प्रस्ताव असफल हो गया क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी के ज्यादातर सांसदों ने वोटिंग का बहिष्कार किया। वहीं, विपक्षियों ने कथित विद्रोह को लेकर यून और पूर्व रक्षा मंत्री सहित कम से कम नौ लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। प्रधानमंत्री को सत्ता सौंपने पर सहमति! राष्ट्रपति और कुछ शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह के लिए जांच की जा रही है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के बहिष्कार के बाद शनिवार को योल के खिलाफ महाभियोग चलाने का प्रयास विफल हो गया। पार्टी का दावा है कि बेहद अलोकप्रिय नेता ने प्रधानमंत्री हान डक-सू और पार्टी प्रमुख को सत्ता सौंपने पर सहमति जता दी है। यह दूसरा तख्तापलत… डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता पार्क चान-डे ने कहा कि यह एक गैरकानूनी, असंवैधानिक कृत्य है, जो दूसरा विद्रोह और दूसरा तख्तापलट है। उन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी से इसे तुरंत रोकने का आग्रह किया। क्या है नियम? दक्षिण कोरिया के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति तब तक सरकार का मुखिया और सेना का कमांडर इन चीफ बना रहता है, जब तक कि वह अक्षम न हो जाए, इस्तीफा न दे दे या पद न छोड़ दे। ऐसे मामले में, चुनाव होने तक अंतरिम आधार पर सत्ता प्रधानमंत्री को सौंप दी जाती है। सू को खुद को ऊपर रखना योल के रवैया जैसा: पार्क पार्क ने कहा कि यह दावा करना कि राष्ट्रपति योल पद पर बने रह सकते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी शक्तियां प्रधानमंत्री और अपनी सत्तारूढ़ पीपुल्स पावर पार्टी के नेता को सौंप दी हैं – जो निर्वाचित अधिकारी नहीं हैं। यह एक स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने कहा, ‘खुद को संविधान से ऊपर रखने का उनका रवैया विद्रोही यून सुक योल जैसा है।’ पुलिस का क्या कहना है? जांचकर्ताओं ने पहले ही पूर्व रक्षा मंत्री को हिरासत में ले लिया है, उनके कार्यालयों पर छापे मारे हैं, कई शीर्ष अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध लगा दिए हैं और सोमवार को जनरल को बुलाया है, जिन्हें आगे की पूछताछ के लिए मार्शल लॉ कमांडर बनाया गया था।पुलिस ने सोमवार को कहा कि यून को भी पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या उन्हें यात्रा करने से प्रतिबंधित किया जाए। राष्ट्रीय पुलिस एजेंसी के राष्ट्रीय जांच मुख्यालय के प्रमुख वू जोंग-सू ने कहा, ‘जांच के विषय पर कोई मानवीय या शारीरिक प्रतिबंध नहीं हैं। पुलिस बिना किसी अपवाद के कानून और सिद्धांतों के अनुसार जांच करेगी।’

एशिया को मजबूत बनाने में बौद्ध धर्म की भूमिका पर चर्चा की आवश्यकता : राष्ट्रपति

नई दिल्ली  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने एशिया को मजबूत बनाने में बौद्ध धर्म की भूमिका को लेकर कहा कि हमें इस बात पर चर्चा की आवश्यकता है कि बौद्ध धर्म एशिया और दुनिया में वास्तविक शांति कैसे ला सकता है। एक ऐसी शांति जो न केवल शारीरिक हिंसा से मुक्त हो बल्कि सभी प्रकार के लालच और घृणा से भी मुक्त हो। राष्ट्रपति ने मंगलवार को नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (आईबीसी) के सहयोग से भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रथम एशियाई बौद्ध शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि शिखर सम्मेलन बुद्ध की शिक्षाओं की हमारी साझा विरासत के आधार पर हमारे सहयोग को मजबूत करने में एक लंबा रास्ता तय करेगा। उन्होंने कहा कि भारत धर्म की पवित्र भूमि है। हर युग में भारत में महान गुरु और रहस्यवादी, द्रष्टा और साधक हुए हैं जिन्होंने मानवता को अंदर शांति और बाहर सद्भाव खोजने का मार्ग दिखाया है। इन पथ प्रदर्शकों में बुद्ध का अद्वितीय स्थान है। बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ गौतम का ज्ञान प्राप्त करना इतिहास में अद्वितीय घटना है। उन्होंने न केवल मानव मन के कामकाज के बारे में अतुलनीय समृद्ध अंतर्दृष्टि प्राप्त की, बल्कि उन्होंने बहुजन सुखाय बहुजन हिताय की भावना से सभी लोगों के साथ इसे साझा किया। राष्ट्रपति ने कहा कि सदियों से यह स्वाभाविक ही रहा है कि अलग-अलग साधकों ने बुद्ध के प्रवचनों में अलग-अलग अर्थ निकाले और इस तरह कई तरह के संप्रदाय उभरे। व्यापक वर्गीकरण में, आज हमारे पास थेरवाद, महायान और वज्रयान परंपराएं हैं, जिनमें से प्रत्येक में कई विचारधारा व संप्रदाय हैं। इसके अलावा, बौद्ध धर्म का ऐसा उत्कर्ष इतिहास के विभिन्न कालखंडों में कई दिशाओं में हुआ। एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में धम्म के इस प्रसार ने एक समुदाय, एक बड़ा संघ बनाया। एक तरह से बुद्ध के ज्ञान की भूमि भारत इसका केंद्र है। लेकिन, ईश्वर के बारे में जो कहा जाता है, वह इस बड़े बौद्ध संघ के बारे में भी सच है, इसका केंद्र हर जगह है और परिधि कहीं नहीं है। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया कई मोर्चों पर अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है, न केवल संघर्ष बल्कि जलवायु संकट भी तो एक बड़े बौद्ध समुदाय के पास मानव जाति को देने के लिए बहुत कुछ है। बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय दुनिया को दिखाते हैं कि संकीर्ण संप्रदायवाद का मुकाबला कैसे किया जाए। उनका मुख्य संदेश शांति और अहिंसा पर केंद्रित है। यदि कोई एक शब्द बौद्ध धम्म को व्यक्त कर सकता है, तो वह है ‘करुणा’ जिसकी आज दुनिया को जरूरत है। राष्ट्रपति ने कहा कि बुद्ध की शिक्षाओं का संरक्षण हम सभी के लिए महान सामूहिक प्रयास रहा है। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि भारत सरकार ने अन्य भाषाओं के साथ-साथ पाली और प्राकृत को भी ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि पाली और प्राकृत को अब वित्तीय सहायता मिलेगी, जो उनके साहित्यिक समृद्धि के संरक्षण और उनके पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण योगदान देगी।    

शपथ समारोह में पहुंचे 40 से अधिक देशों के नेता, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति बने प्रबोवो सुबियांतो

जकार्ता. इंडोनेशिया को नया राष्ट्रपति मिल गया है। प्रबोवो सुबियांतो ने आज सुबह आधिकारिक तौर पर दुनिया के सबसे अधिक मुस्लिम बहुल राष्ट्र के आठवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। इसी के साथ उन्होंने इंडोनेशिया की सैन्य तानाशाही के काले दिनों के दौरान अधिकारों के हनन के आरोपी एक पूर्व जनरल से राष्ट्रपति भवन तक की अपनी यात्रा पूरी की। 73 साल के पूर्व रक्षा मंत्री सुबियांतो ने सांसदों और विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की मौजूदगी में मुस्लिम पवित्र ग्रंथ कुरान पर शपथ ली। इसके बाद हजारों समर्थकों ने सड़कों पर खुशी मनाई। जकार्ता में आयोजित समारोह में हिस्सा लेने के लिए ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, सऊदी अरब, रूस, दक्षिण कोरिया, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों समेत 40 से अधिक देशों के नेता और वरिष्ठ अधिकारी पहुंचे। एक लाख जवान तैनात इंडोनेशियाई पुलिस और सेना ने शपथ समारोह की तैयारी के लिए जकार्ता में कम से कम एक लाख कर्मियों को तैनात किया है, जिसमें स्नाइपर और दंगा-रोधी इकाइयां शामिल हैं, जो बुधवार तक तैनात रहेंगे। इस नेता की जगह ली सुबियांतो ने राष्ट्रपति रहे जोको विडोडो की जगह ली है। वह इससे पहले भी विडोडो के सामने दो बार चुनाव लड़ चुके थे, लेकिन हार का ही सामना करना पड़ा। हालांकि, विडोडो ने अपने पुनर्निर्वाचन के बाद सुबियांतो को रक्षा प्रमुख नियुक्त किया था, जिससे उनके प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के बावजूद गठबंधन का रास्ता साफ हो गया। अप्रैल में किया था एलान इंडोनेशिया के चुनाव आयोग ने 24 अप्रैल को एक समारोह में औपचारिक रूप से प्रबोवो सुबियांतो को राष्ट्रपति घोषित कर दिया था। प्रबोवो सुबियांतो पूर्व रक्षा मंत्री हैं। उन्होंने 58.6 फीसदी वोटों या 96 मिलियन से अधिक मतपत्रों के साथ राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की। उन्होंने अपने दोनों प्रतिद्वंदियों से भी दोगुने वोट से जीत हासिल की है। हालांकि, उनके प्रतिद्वंद्वियों ने आरोप लगाया था कि उन्होंने धोखाधड़ी से जीत हासिल की है।

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