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निज्जर हत्याकांड के आरोपियों पर SC में कनाडा चलाएगा केस, गिरफ्त में हैं 4 भारतीय

ओटावा खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में कनाडा सरकार ने चार भारतीय नागरिकों के खिलाफ “सीधा अभियोग” (Direct Indictment) दायर करने का फैसला लिया है। इस फैसले के कारण सुरे प्रांतीय अदालत में चल रही प्रारंभिक सुनवाई को रोक दिया गया है, और अब यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा। द इंडियन एक्सप्रेस ने बीसी प्रॉसिक्यूशन सर्विस के प्रवक्ता के हवाले से ये जानकारी दी। सीधा अभियोग दायर होने का मतलब है कि मामले में प्रारंभिक सुनवाई नहीं होगी और मामला सीधे ट्रायल के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। इस प्रक्रिया में अभियुक्तों के वकीलों को अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करने और मामले के खिलाफ साक्ष्य एकत्र करने का मौका नहीं मिलता। सीधे शब्दों में कहें तो निज्जर की कथित हत्या के आरोपियों के वकीलों को सरकारी गवाहों से जिरह करने का मौका नहीं मिल पाएगा। क्यों लिया गया यह कदम? कनाडा के आपराधिक संहिता के तहत, सीधा अभियोग एक विशेष अधिकार है जिसे बहुत कम मामलों में लागू किया जाता है। यह तब इस्तेमाल में लाया जाता है जब जनता के हित में ऐसा करना आवश्यक हो, जैसे कि गवाहों, उनके परिवारों, या मुखबिरों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं हों। कौन हैं आरोपी? चारों आरोपी भारतीय नागरिक हैं। इनके नाम —करन बराड़, अमनदीप सिंह, कमलप्रीत सिंह, और करनप्रीत सिंह हैं। इनको मई 2024 में गिरफ्तार किया गया था। आरोपियों पर 18 जून 2023 को ब्रिटिश कोलंबिया के सुरे में स्थित एक गुरुद्वारे के परिसर में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या करने का आरोप है। चारों अभियुक्तों पर फर्स्ट-डिग्री हत्या और हत्या की साजिश का आरोप लगाया गया है। ये पुलिस हिरासत में हैं और अब तक किसी को जमानत नहीं मिली है। अगली सुनवाई और प्रक्रिया पहले यह सुनवाई 21 नवंबर 2024 को सुरे प्रांतीय अदालत में होनी थी, लेकिन इसे रद्द कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि मुकदमा कब शुरू होने की उम्मीद है, इसके लिए कोई अस्थायी तारीख या समयसीमा नहीं है। ब्रिटिश कोलंबिया (बीसी) के सरे में एक गुरुद्वारे के परिसर में 18 जून, 2023 को निज्जर की हत्या के लिए इस साल मई में गिरफ्तार किए गए चार लोगों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद से मामले की सुनवाई पांच बार स्थगित की जा चुकी है। अब यह मामला 11 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट में एक केस मैनेजमेंट कॉन्फ्रेंस के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, बीसी प्रॉसिक्यूशन सर्विस के प्रवक्ता डेमिएन डार्बी ने बताया, “18 नवंबर 2024 को अभियोजन पक्ष ने सुरे प्रांतीय अदालत की फाइल को रोक दिया और अब सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से सीधा अभियोग चलाने का फैसला किया है।” सुप्रीम कोर्ट में 18 नवंबर को हुई पहली सुनवाई में चारों अभियुक्त वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए, जबकि अमनदीप सिंह अपने वकील के माध्यम से उपस्थित रहे। अदालत ने अभियोजन पक्ष के आवेदन पर, और बचाव पक्ष की सहमति से, सुनवाई से संबंधित जानकारी के प्रकाशन पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया है। ट्रायल के समय पर अनिश्चितता अधिकारियों के अनुसार, अभी तक ट्रायल की तारीख या समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। परीक्षण से पहले कई आवेदन दाखिल किए जाएंगे, लेकिन यह बताना मुश्किल है कि इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और अन्य अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि निज्जर की हत्या में भारत सरकार का हाथ है। भारत ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि कनाडा ने इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया है। गवाहों और सबूतों की स्थिति अभियोजन पक्ष का कहना है कि चार अभियुक्तों के अलावा अभी किसी और पर आरोप नहीं लगाया गया है। हालांकि, जिन गवाहों के पास प्रासंगिक और स्वीकार्य साक्ष्य हैं, उन्हें अदालत में बुलाया जाएगा। गवाहों की सूची अभी दाखिल नहीं की गई है। प्रवक्ता ने बताया कि यह सूची आमतौर पर ट्रायल शुरू होने से पहले दायर की जाती है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, हत्या की साजिश 1 मई 2023 से 18 जून 2023 तक एडमंटन (अल्बर्टा) और सुरे (बीसी) में रची गई थी। हत्या 18 जून 2023 को सुरे में की गई थी। क्या है डायरेक्ट इंडिक्टमेंट? भारतीय कानून में “डायरेक्ट इंडिक्टमेंट” (Direct Indictment) जैसी कोई विशिष्ट अवधारणा नहीं है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से कनाडा और अन्य देशों के कानूनी तंत्र में प्रचलित है, जहां अभियोजन पक्ष प्रारंभिक सुनवाई (preliminary hearing) को बायपास करते हुए सीधे मुख्य परीक्षण (trial) के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट या उच्चतर न्यायालय में ले जाता है। कुछ हद तक ये दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 209 से मेल खाती है। इसके तहत अगर किसी मामले में अभियुक्त पर सत्र न्यायालय में विचारणीय अपराध का आरोप है, तो निचली अदालत (मजिस्ट्रेट कोर्ट) मामले को सत्र न्यायालय में ट्रांसफर कर देती है।

पराली जलाने पर SC सख्त, पराली जलाने पर CQM से मांगा जवाब

लुधियाना बीते 24 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पराली जलाने के मुद्दे पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से जवाब तलब किया कि पराली जलाना फिर से क्यों शुरू हो गया? सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि ‘सीएक्यूएम एक्ट की धारा-14 के तहत जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कदम उठाया गया है।’ अदालत ने पंजाब और हरियाणा की सरकारों को भी फटकार लगाते हुए कहा कि दोनों राज्यों ने पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की है। दरअसल, सीएक्यूएम की धारा के तहत पराली जलाने पर अधिकारियों, कर्मचारियों को सजा का भी प्रावधान है। सवाल है कि क्या अकारण सर्वोच्च न्यायालय को पराली जलाने पर एक जिम्मेदार संस्थान को फटकार लगानी पड़ी! पंजाब में पराली जलाने के मामले आठ से 93 तक पहुंच गए क्या सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद पराली प्रबंधन विफल हो चुका है? क्या कृषक जन-मन अब भी पूरी तरह से पराली प्रबंधन पर पुरानी परिपाटी से चल रहा है? जाहिर है, कुछ न कुछ कुप्रबंधित जरूर है। सितंबर माह के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पराली जलाने के कुल 75 मामले उजागर हो चुके हैं। हैरत की बात है कि 15-25 सितंबर के बीच पिछले वर्ष की तुलना में हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं पांच से ग्यारह फीसद तक बढ़ी हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष इसी अवधि में जहां हरियाणा में पराली जलाने के तेरह मामले पाए गए थे, इस बार बढ़ कर 70 हो गए। इसी तरह पंजाब में पराली जलाने के मामले आठ से 93 तक पहुंच गए। हरियाणा में करनाल, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर सर्वाधिक प्रभावित जनपद हैं। वहां कुल 70 मामलों में 31 मामले पाए गए। इसी तरह पंजाब के कुल 93 मामलों में से 58 मामले तरनातरन, गुरुदासपुर और अमृतसर में पाए गए। अनवरत पराली दहन से बिगड़ती आबोहवा का खमियाजा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को भुगतना पड़ता है। सर्दियों के शुरुआती दौर में ही दम घुटने-सा लगता है। अभी बीते 24 सितंबर तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता सूचकांक 203 तक दर्ज किया गया। ऐसे हालात में सुप्रीम की फटकार स्वाभाविक है। पराली जलाने पर निगरानी के लिए हर वर्ष निगाह रखी जाती है ऐसा नहीं कि सरकार ने विगत वर्षों में पराली दहन को लेकर कुछ नहीं किया। पर शासन, प्रशासन, सरकारी संस्थाओं और पराली जलाने वाले किसानों के बीच संबंध में जरूर कुछ कमी रह जाती है। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के हवाले से केंद्र सरकार ने सूबे की सरकारों को पराली जलाने के दोषी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ न देने का सख्त निर्देश दिया है। पराली जलाने पर निगरानी के लिए हर वर्ष 15 सितंबर तक ‘कंसोर्टियम फार रिसर्च आन एग्रो इकोसिस्टम मानिटरिंग ऐंड माडलिंग फ्राम स्पेस’ (क्रीम्स) द्वारा सेटेलाइट से निगाह रखी जाती है। इससे ‘गूगल लोकेशन’ के साथ पराली जलाने का पता लग जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पराली जलाने पर दो एकड़ से कम क्षेत्र के लिए ढाई हजार रुपए, दो से पांच एकड़ क्षेत्र के लिए पांच हजार रुपए और पांच एकड़ से अधिक क्षेत्र के लिए पंद्रह हजार रुपए तक अर्थदंड का प्रावधान किया है। दुबारा पराली जलाने पर संबंधित किसान के खिलाफ कारावास और अर्थदंड का भी प्रावधान है। इसी तरह धान काटने के यंत्र कंबाइन हार्वेस्टर में ‘स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम’ (एसएमएस) अनिवार्य कर दिया गया है। बिना एसएमएस वाले कंबाइन के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। विगत वर्षों में विभिन्न सूबों में हजारों किसानों के विरुद्ध पराली जलाने पर एफआइआर भी दर्ज कराई गई है। पराली जलाने से मृदा में मौजूद अनेक लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक एक टन पराली जलने से मृदा में मौजूद 5.5 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलो ग्राम फास्फोरस, 25 किलो ग्राम पोटैशियम, 1.2 किलो ग्राम सल्फर समेत अन्य उपयोगी पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की रपट के मुताबिक उत्तर भारत के राज्यों में पराली जलाने के कारण तकरीबन दो लाख करोड़ रुपए की आर्थिक हानि होती है। एक अन्य जानकारी के मुताबिक दिल्ली में पराली प्रदूषण की वजह से ‘एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन’ (एआरआइ) ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले बच्चों और बुजुर्गों में ज्यादा होता है। प्रदूषण का स्तर उच्च होने के कारण दिल्ली वासियों की जीवन प्रत्याशा में लगभग साढ़े छह साल की कमी आई है। पराली जलने से कार्बन मोनो आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड, मीथेन, पाली सायक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इन प्रदूषकों के प्रसार से ‘स्माग’ का एक मोटा आवरण निर्मित होता है, जिससे ब्रोंकाइटिस, तंत्रिका और हृदय संबंधी, यहां तक कि कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्या का समाधान केवल सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को जागरूक बनाना होगा। किसान कम अवधि वाली धान की प्रजातियां लगाएं, जिससे पराली जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, और अगली फसल के लिए पराली विघटन को पर्याप्त समय मिल जाए। पिछले वर्ष हरियाणा सरकार ने धान की सीधी बिजाई के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया था, जिससे 30 सितंबर तक वहां की मंडियों में आठ लाख टन धान बिकने आया था। इससे इतर, धान की कम अवधि वाली प्रजातियों, जैसे पीआर-126, पीबी 1509 आदि बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। ‘हैप्पी सीडर’ का प्रयोग किया जाए, जिसमें पराली का बंडल बनकर ऊपर आ जाता है, गेहूं की बुवाई हो जाती है और पराली का बंडल पलवार के रूप में खेत पर बिछ जाता है। इसके अलावा ‘पैलेटाइजेशन’ को अपनाया जा सकता है। इसमें पुआल को सुखाकर गुटिका के रूप में बदल दिया जाता है, उसे कोयले के साथ मिलाकर थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों में ईंधन की तरह प्रयोग करते हैं। इससे एक ओर जहां कोयले की बचत होती है, वहीं दूसरी ओर कार्बन उत्सर्जन में कटौती होती है। ‘गौठान’ छत्तीसगढ़ का एक नवीन प्रयोग है। इसमें पांच एकड़ सरकारी भूमि में दान की गई पराली एकत्र कर गाय के गोबर और प्राकृतिक एंजाइम मिला कर जैविक खाद बनाई जाती है। पराली को ‘कंप्रेस्ड बायो गैस प्लांट’ (सीबीजीपी) में भेज दिया जाए तो ईंधन तैयार हो जाता है। दिल्ली के … Read more

SC में NEET पर NTA के ख‍िलाफ श‍िकायतों की बौछार, दोबारा परीक्षा कराने की मांग

नईदिल्ली  नीट यूजी 2024 परीक्षा को लेकर मेडिकल फील्ड में खलबली मची हुई है. परीक्षा में धांधली को लेकर छात्र एनटीए पर तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं. 67 टॉपर्स, ग्रेस मॉर्क्स, एक ही सेंटर से कई टॉपर्स होने की वजह से एनटीए शक के घेरे में खड़ा हो गया है. सुप्रीम कोर्ट में एनटीए के खिलाफ कई याचिका दायर हो चुकी हैं, जिसके जवाब में एनटीए अपना पक्षा भी समाने रख चुका है और अब जांच कमेटी भी बिठा दी गई है. इसी बीच आंध्र प्रदेश से एक और याचिक दायर कर दी गई है. अंडर ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स में दाखिले के लिए राष्ट्रीय प्रवेश सह पात्रता परीक्षा (NEET) के घोषित परिणामों में विसंगतियों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है. नई याचिका में NEET-UG 2024 के नतीजों को वापस लेने और नई परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है. यह याचिका तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मूल निवासी अब्दुल्ला मोहम्मद फैज और डॉ. शेख रोशन मोहिद्दीन द्वारा दायर की गई है, जो इन राज्यों में छात्रों के लिए काम करते हैं और ग्रेस मार्क्स देने में विसंगतियों का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि 718 और 719 के उच्च अंक लाना असंभव हैं. याचिका में कही गईं ये बातें याचिका में कहा गया है कि एक विशेष केंद्र से 67 छात्रों को पूरे 720 अंक मिले. “छात्रों को दिए गए ग्रेस मार्क्स के लिए कोई परिभाषित तर्क नहीं है और साथ ही छात्रों को दिए गए ग्रेस मार्क्स के अनुसार कोई सूची साझा नहीं की गई है. इसके अलावा, ग्रेस मार्क्स देने का कारण समय की बर्बादी है. परीक्षा से पहले इस बारे में छात्रों का बताया भी नहीं गया था. एक सवाल के दो जवाब को लेकर आंसर की पर जताई थी आपत्ति याचिका में आगे कहा गया है कि एनटीए द्वारा जारी एक आखिरी उत्तर कुंजी ने उम्मीदवारों को दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुने, लेकिन 13,000 से अधिक छात्रों ने इस आधार पर कुंजी को चुनौती दी कि किताब में ऐसी जानकारी थी जो एक अलग उत्तर बताती है. जांच के बाद यह सामने आया कि दोनों उत्तर सही हैं. इसके बाद जिन कैंडिडेट्स ने दोनों में से कोई भी एक उत्तर चुना, उन्हें अंक दे दिए गए. याचिका में कहा गया कि प्रवेश परीक्षाओं में नकल करने से योग्यता और समान अवसरों के सिद्धांतों को नुकसान पहुंचता है, जो सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देने और समाज में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है. यह उन लोगों के पक्ष में असमानता को बढ़ावा देता है जो लीक हुए परीक्षा पत्रों के लिए भुगतान कर सकते हैं या धोखाधड़ी में शामिल हो सकते हैं, जबकि उन लोगों को नुकसान पहुंचाता है जो सफल होने के लिए अपनी कड़ी मेहनत और योग्यता पर भरोसा करते हैं और यह पूरे समाज को भी प्रभावित करता है. मेडिकल फील्ड में लापरवाही मंजूर नहीं य़ाचिका में आगे कहा गया कि मेडिकल फील्ड में साइंटिस्ट और स्पेशिलिस्ट की जरूरत होती है. परीक्षा पास करने के लिए नकल या अनुचित साधनों का उपयोग करने से योग्यता की कमी हो सकती है, जिससे संभावित रूप से रोगियों के स्वास्थ्य और जीवन को खतरा हो सकता है. शीर्ष अदालत में दायर की गई सभी याचिकाओं में 5 मई की परीक्षा से प्रश्नपत्र लीक होने की शिकायतों का आरोप लगाया गया है. 17 मई को शीर्ष अदालत ने नोटिस जारी किया था, लेकिन परिणामों की घोषणा पर रोक नहीं लगाई थी. एक हफ्ते में आएगा एनटीए का फैसला इस बीच, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) ने फैसला किया है कि एक उच्चस्तरीय समिति उन 1,600 छात्रों की शिकायतों का विश्लेषण करेगी जो पहले ही नीट 2024 में शामिल हो चुके हैं. नीट 2024 पेपर लीक पर भी केंद्र सरकार का जवाब आया है. प्रेस वार्ता के दौरान हायर एजुकेशन सेक्रेटरी ने कहा कि सिर्फ सवाई माधोपुर में पेपर लेकर छात्रों के केंद्र से बाहर आने का मामला आया था. उसी समय वहां परीक्षा रोक दी गई और दोबारा नए पेपर के साथ एग्जाम लिया गया था. सिर्फ 6 केंद्रों पर दिक्कतें आई हैं. अन्य सभी जगह बिना किसी गड़बड़ी के नीट परीक्षा पूरी हुई थी. पेपर लीक जैसी कोई घटना नहीं हुई है. वहीं, एनटीए ने परीक्षा की जांच के लिए एक कमेटा का गठन किया. कमेटी एक हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सब्मिट करेगी.  

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