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महाशिवरात्रि पर आध्यात्मिक एकता का संदेश विश्व पटल पर हुआ प्रसारित

ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ और सिद्धपीठों से प्रसाद अर्पण की परंपरा हुई प्रारंभ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को साकार करने की दिशा में बड़ा कदम वाराणसी,  महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास, वाराणसी द्वारा एक अद्वितीय और अभिनव आध्यात्मिक पहल का शुभारंभ किया गया है। इस पहल के अंतर्गत भगवान श्री विश्वेश्वर महादेव के श्रीचरणों में देश-विदेश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों, सिद्धपीठों, शक्तिपीठों और प्राचीन तीर्थस्थलों से पावन प्रसाद, पूजित वस्त्र, रज, पवित्र जल तथा श्रद्धा उपहार अर्पित किए जाने की परंपरा प्रारंभ की गई है। इस आध्यात्मिक समन्वय का उद्देश्य संपूर्ण सनातन समाज को एक सूत्र में पिरोते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को मूर्त रूप प्रदान करना और वैश्विक आध्यात्मिक एकात्मता को सुदृढ़ करना है। 62 मंदिरों से अब तक पहुंची पावन भेंट इस क्रम में, शनिवार तक श्री काशी विश्वनाथ धाम में देश-विदेश के कुल 62 मंदिरों से पावन भेंट और प्रसाद प्राप्त हो चुके हैं। इन मंदिरों में तमिलनाडु से भक्त मंडली, श्री रत्नगिरिस्वरर मंदिर चेन्नई, श्री अनंता पद्मनाभा स्वामी मंदिर चेन्नई, तेन सबनायाकर मंदिर कोविलूर, अरुल्मिगु वामनपुरफेश्वरर तिरुमणिकुझी, अरुल्मिगु द्रौपथी अम्मन मंदिर, अरुल्मिगु रीना विमोशनर तिरुकांडीश्वरम्, अरुल्मिगु तिरु सनगरी काली अम्मन वझापेट, अरुल्मिगु भूलोगा नाथर नेल्लिकुप्पम, अरुल्मिगु भूमिनाथ ईश्वरर वैटिपक्कम, श्री मदुरै वीरन मंदिर, अरुल्मिगु कुमारा गुरु परमस्वामी एस कुमारापुरम, अरुल्मिगु वेधा अरुल्पुरीश्वर कंदरकोट्टई, अरुल्मिगु सबनायगर कीरापालयम, अरुल्मिगु काशी विश्वनाथर गेडिलम नदी, सीयूओ, अरुल्मिगु विरुथा गिरिश्वरर तिरुकांडीश्वरम्, अरुल्मिगु अमृत लिंगेश्वर पेरिया, अरुल्मिगु मार्गबंधु तिरुकांडीश्वरम्, अरुल्मिगु नादन पाथेश्वरर तिरुकांडीश्वरम्, अरुल्मिगु सिंगारणाथर कोंगरायनूर शामिल हैं। श्री कृष्ण जन्मस्थान, श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड समेत कई मंदिरों से आए उपहार इसी प्रकार, मथुरा से श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, जम्मू कश्मीर से श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड जम्मू, मलेसिया से श्री महा मरिअम्मन मंदिर, अरुल्मिगु श्री राजाकलियम्मन ग्लास मंदिर, श्री कंदस्वामी कोविल, श्री वीरा मुनिस्वरर मंदिर, श्री नगराथर शिवन मंदिर, अरुल्मिगु बालथंडायुथपानी मंदिर, श्री कुंज बिहार मंदिर भी इस आध्यात्मिक अभियान में सहभागी बने हैं। काशी के प्रमुख मंदिरों से भी सहभागिता वाराणसी से सप्तमात्रिका सिद्धपीठ श्री बड़ी शीतलाधाम शीतलाघाट, काशी त्रिलोचन महादेव मंदिर, सिद्ध पीठ बड़ी काली जी मंदिर कालिका गली, श्री बड़ा गणेश मंदिर लोहटिया, श्री केदारेश्वर मंदिर केदार घाट, श्री ओम कालेश्वर मंदिर कोयला बाजार, श्री कालभैरव मंदिर भैरोनाथ, विन्ध्यवासिनी, दशाश्वमेध, तुलजा देवी, दशाश्धमध्येश्वर, जमेश्वर, प्राचीन रुद्रसरोवर, श्री श्रीयन्त्रराज, श्री दक्षिणी आदि शीतला बुढ़ीय माई, कपिलधारा पंचकोशी, शूलटंकेश्वर, प्रयागघाट, रामेश्वर पंचकोशी, महिषासुर मां मंदिर, लोलार्क कुंड, बैजनाथ मंदिर बैजनत्था, श्री चन्द्रेश्वर मंदिर केदारघाट, श्री लोलार्क कुंड मंदिर भदैनी, श्री अन्नपूर्णा मंदिर विश्वनाथ गली, श्री महालक्ष्मी मंदिर लक्सा, श्री बटुक भैरव मंदिर कमच्छा, श्री कामख्या मंदिर कमच्छा, अन्य प्रमुख मंदिर काशी और विशालाक्षी मंदिर काशी से भी पावन भेंट प्राप्त हुई है। देश-विदेश के अन्य तीर्थस्थलों की सहभागिता उत्तराखंड से श्री केदारनाथ, मुंबई से लाल बाग के राजा और श्री सिद्धिविनायक मंदिर, गुजरात से द्वारकाधीश मंदिर, श्रीलंका से श्री ऐश्वर्या लक्ष्मी मंदिर कोलंबो तथा राजस्थान से नाथद्वारा मंदिर उदयपुर से भी पावन प्रसाद और भेंट काशी विश्वनाथ धाम पहुंच चुकी है। पवित्र सामग्री में जल, रज, वस्त्र और पुष्प शामिल इन भेंटों में विभिन्न तीर्थस्थलों का पवित्र जल, मंदिरों में पूजित पुष्पमालाएं, रज, चंदन, वस्त्र तथा अन्य पूजनीय सामग्री सम्मिलित है। यह संपूर्ण प्रक्रिया सनातन परंपरा की आध्यात्मिक एकता का सजीव प्रतीक बनकर सामने आई है। कूरियर और प्रतिनिधियों के माध्यम से जारी है क्रम इसके अतिरिक्त, अनेक मंदिरों से प्रसाद कूरियर माध्यम से प्रेषित किया जा रहा है, जबकि कुछ प्रतिष्ठित मंदिरों के प्रतिनिधि स्वयं पावन भेंट लेकर धाम में पधारने वाले हैं। इस प्रकार, यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर संपूर्ण राष्ट्र और विश्व के विविध तीर्थों के मध्य भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सेतु के रूप में स्थापित हो रहा है। आध्यात्मिक एकात्मता का वैश्विक संदेश मंदिर न्यास की यह अभिनव पहल सनातन संस्कृति में निहित पारिवारिक समरसता, आध्यात्मिक बंधुत्व और सांस्कृतिक अखंडता के संदेश को व्यापक रूप से प्रसारित कर रही है। महाशिवरात्रि के दिव्य अवसर पर प्रारंभ की गई यह परंपरा न केवल काशी की आध्यात्मिक गरिमा को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करती है, बल्कि समस्त सनातन आस्थाओं को एकात्म भाव से जोड़ते हुए धार्मिक सद्भाव और आध्यात्मिक समन्वय के नए अध्याय का उद्घाटन कर रही है। निश्चय ही, यह पहल राष्ट्र और विश्व के विविध तीर्थस्थलों को एक आध्यात्मिक सूत्र में संगठित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायी कदम सिद्ध हो रही है।

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