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DK कैंप का दावा- ‘2.5 साल का फॉर्मूला था तय, सिद्धारमैया ने वादा किया था’

बेंगलुरु कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर चल रही अटकलों के बीच एक बार फिर मुख्यमंत्री पद का मुद्दा सतह पर आ गया है. DK शिवकुमार कैंप के विधायक बसवराज शिवगंगा ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री DK शिवकुमार के बीच 2.5-2.5 साल का पावर-शेयरिंग समझौता हुआ था. बसवराज शिवगंगा ने साफ शब्दों में कहा कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को लेकर किसी भी बयान को तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, जब तक वो कांग्रेस हाईकमान की ओर से ना आया हो. उन्होंने यथींद्रा के बयानों को भी हल्के में लेने की बात कही. शिवगंगा ने कहा, हाईकमान के अलावा किसी के बयान को गंभीरता से मत लीजिए. कम से कम मेरे बयान को तो गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि मैं एक विधायक हूं और मुख्यमंत्री चुनने में मेरा वोट है. यथींद्रा के पास ऐसा कोई वोट नहीं है. मीडिया को तय करना है कि किसके बयान को तवज्जो देनी है. उन्होंने आगे दावा किया कि उन्हें यह संदेश मिला है कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच 2.5 साल का फॉर्मूला वास्तव में तय हुआ था. शिवगंगा के मुताबिक, सिद्धारमैया ने इस पावर शेयरिंग व्यवस्था का वादा किया था. इस बीच, DK शिवकुमार के समर्थन में एक और विधायक सामने आ गए हैं. मंगलुरु से कांग्रेस विधायक अशोक राय ने खुले मंच से DK शिवकुमार को लेकर बड़ा बयान दिया है. अशोक राय ने कहा कि DK शिवकुमार छह महीने के भीतर मुख्यमंत्री के रूप में मंगलुरु लौटेंगे. मंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान अशोक राय ने DK शिवकुमार के साथ मंच साझा करते हुए कहा, हम छह महीने में इस कांग्रेस भवन का निर्माण पूरा कर लेंगे और जब आप मुख्यमंत्री बनकर आएंगे, तब इसी भवन का उद्घाटन करेंगे. अशोक राय का यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर पहले से ही अंदरूनी खींचतान की खबरें सामने आ रही हैं. एक के बाद एक विधायकों के बयान पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही असहमति को सार्वजनिक रूप से उजागर कर रहे हैं. हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अब तक किसी भी तरह के पावर शेयरिंग फॉर्मूले या नेतृत्व परिवर्तन को लेकर आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है. कांग्रेस हाईकमान लगातार यह दोहराता रहा है कि सरकार स्थिर है और मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई बदलाव तय नहीं है.

सिद्धारमैया और DK के बीच खींचतान के बीच कांग्रेस में तीसरा मोर्चा उभरने की संभावना, विधायक जुटे बैठकें करने

बेंगलुरु कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के खेमों के बीच रस्साकशी करीब एक साल से चल रही है। शिवकुमार गुट का कहना है कि सिद्धारमैया ने सीएम बनने से पहले आधे कार्यकाल को लेकर वादा किया था और बाद में वह कुर्सी छोड़ने वाले थे। लेकिन सिद्धारमैया गुट इससे इनकार करता रहा है। इसे लेकर मामला हाईकमान तक भी पहुंच चुका है और हालात संभालने के कई बार प्रयास हो चुके हैं। यही नहीं कई बार ऐसी चर्चाएं भी छिड़ी हैं कि सिद्धारमैया अपने किसी करीबी नेता को मुख्यमंत्री बनाकर हट सकते हैं। इस बीच कांग्रेस में सत्ता के लिए तीसरा मोर्चा खुलता दिख रहा है। बेंगलुरु में एससी, एसटी और लिंगायत समुदाय के विधायकों की बैठकें हुई हैं। इन लोगों की इच्छा है कि उनके समुदाय के किसी नेता को सीएम का पद मिले या फिर कैबिनेट में फेरबदल की स्थिति में ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद मिल जाएं। लिंगायत विधायकों की बैठक सोमवार रात को उद्योग मंत्री एमबी पाटिल की लीडरशिप में हुई। इसके अलावा एससी-एसटी वर्ग के विधायकों की बैठक होम मिनिस्टर जी. परमेश्वर के घर पर मंगलवार की शाम को हुई। नवंबर और दिसंबर में सिद्धारमैया एवं शिवकुमार खेमे के बीच कई बैठकें हुई थीं। तब से फिलहाल स्थिति जस की तस थी, लेकिन विधायकों की फिर से शुरू हुई बैठकों ने हलचल मचा दी है। कुछ सूत्रों का कहना है कि ये मीटिंगें इसलिए हुई हैं ताकि अपने समुदाय की ताकत दिखाकर हाईकमान को दबाव में लाया जा सके। वहीं कांग्रेस के ही कुछ सूत्रों का कहना है कि एमबी पाटिल और जी. परमेश्वर दोनों ही सिद्धारमैया खेमे के ही हैं। ऐसी स्थिति में यह बैठकें शायद शिवकुमार खेमे को जवाब के तौर पर भी हो सकती हैं ताकि उनके दबाव को कम किया जा सके। दरअसल शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय के नेता हैं, जो राज्य की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। लेकिन सबसे बड़ी संख्या लिंगायतों की है और एक समूह के तौर पर देखा जाए तो एससी और एसटी समुदाय की भी अच्छी संख्या है। ऐसे में इन दोनों वर्गों के विधायकों की बैठकें करके शिवकुमार को बैकफुट पर लाने की कोशिश है। एमबी पाटिल ने कहा कि हमारी यह बैठक किसी मकसद से नहीं थी बल्कि रूटीन बैठक थी। उन्होंने कहा कि इस बैठक का मतलब सत्ता परिवर्तन या फिर पर्सनल एजेंडा नहीं था। उन्होंने कहा कि लिंगायत तो राज्य का सबसे बड़ा वर्ग हैं। उनके 34 विधायक हैं। विधायकों का कहना था कि सरकार में लिंगायत समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। चर्चाएं इस बात की भी तेज हैं कि सिद्धारमैया खुद हटने की स्थिति में अपने किसी करीबी को कमान देना चाहते हैं। ऐसे में ये बैठकें उसके लिए शक्ति प्रदर्शन या फिर सहमति बनाने की कोशिश है।

कर्नाटक में मुस्लिम ठेकेदारों को 4% आरक्षण लाने की तैयारी, सिद्धारमैया का कदम अल्पसंख्यक समर्थन जुटाने का

बेंगलुरु कर्नाटक सरकार मुस्लिम ठेकेदारों को सरकारी निर्माण कार्यों में 4% आरक्षण देने का प्रस्ताव फिर से लाने वाली है। लगभग एक साल पहले इसी तरह का प्रस्ताव विवादों और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों के बीच वापस ले लिया गया था। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस कदम से अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) का समर्थन जुटाना चाहते हैं। अहिंदा कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक है। इधर सिद्धारमैया के इस प्रस्ताव पर सियासत गरमाने लगी है। बीजेपी ने कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। सरकार कर्नाटक ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट्स एक्ट, 1999 में संशोधन करने की योजना बना रही है। यह संशोधन विधानसभा के मौजूदा बजट सत्र में लाया जाएगा। इसके जरिए आरक्षण लागू किया जाएगा। वित्त विभाग ने इसका खाका तैयार कर लिया है। कानून और संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने कथित तौर पर संशोधन को मंजूरी दे दी है। कर्नाटक में ठेकेदारों को कितना कोटा? कर्नाटक में अभी एससी और एसटी ठेकेदारों के लिए 24%, ओबीसी वर्ग-1 के लिए 4% और ओबीसी वर्ग-2A के लिए 15% आरक्षण है। इन सबको मिलाकर कुल 43% कांट्रेक्ट आरक्षित होते हैं। अगर प्रस्तावित 4% मुस्लिम कोटा वर्ग-2B के तहत लागू होता है, तो सरकारी ठेकों में कुल आरक्षण 47% हो जाएगा। साथ ही, कांट्रेक्ट की अधिकतम सीमा दोगुनी होकर 2 करोड़ रुपये हो जाएगी। 2013-18 के कार्यकाल में सिद्धारमैया ने शुरू किया था आरक्षण अपने पहले कार्यकाल (2013-18) में, सिद्धारमैया ने सरकारी ठेकों में एससी/एसटी ठेकेदारों के लिए आरक्षण शुरू किया था। इस साल की शुरुआत में, दो ओबीसी वर्गों को भी ऐसा ही लाभ दिया गया था। बेस्टा, उप्पारा और दलित ईसाई जैसे समुदाय वर्ग-1 में आते हैं, जबकि कुरुबा, इडिगा और 100 से अधिक अन्य समुदाय वर्ग-2A का हिस्सा हैं। सिद्धारमैया खुद कुरुबा समुदाय से आते हैं। बीवाई विजयेंद्र ने साधा निशाना कर्नाटक सरकार के इस फैसले से वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के ठेकेदार नाराज हैं। उन्हें ऐसा कोई आरक्षण नहीं मिलता। भाजपा ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है। उसने इसे असंवैधानिक और तुष्टिकरण की राजनीति का उदाहरण बताया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बी वाई विजयेंद्र ने कहा, ‘हम धर्म के आधार पर समाज को बांटने वाली कांग्रेस सरकार की नीति का विरोध करते हैं। कांग्रेस सिर्फ मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक मानती है, और अन्य वास्तव में हाशिए पर रहने वाले समुदायों को नजरअंदाज करती है। मुसलमानों के पास पहले से ही शिक्षा और रोजगार में आरक्षण है, जो संविधान के खिलाफ है। अब, उन्हें सरकारी ठेकों में 4% आरक्षण देना तुष्टिकरण की राजनीति का चरम है। अगर यह सभी अल्पसंख्यकों के लिए होता, तो हमें कोई आपत्ति नहीं होती।’ कर्नाटक विधानसभा में उठेगा मुद्दा विजयपुरा के विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल ने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार पूरी तरह से अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इस तरह का आरक्षण संविधान विरोधी है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय संविधान के निर्माता बीआर आंबेडकर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के खिलाफ थे। यतनाल ने आरोप लगाया कि सरकार संविधान और उसके बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ जा रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि वे इस मुद्दे को कर्नाटक विधानसभा के मौजूदा सत्र में उठाएंगे। इसको लेकर सरकार की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। ‘सत्ता का दुरुपयोग’ कर भाजपा विधायक वाई. भरत शेट्टी ने कहा कि यह कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा है। पार्टी अपने वोट बैंक को खुश करने की कोशिश कर रही है। उनकी तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ही राज्य की कानून-व्यवस्था की बलि चढ़ गई है। अब वे एक कदम और आगे बढ़ गए हैं। अल्पसंख्यक ठेकेदारों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण की नीति तुष्टिकरण की राजनीति का एक उच्च स्तर है, साथ ही यह सत्ता का दुरुपयोग है। इस प्रस्ताव पर बहस जारी है और आगे क्या होता है यह देखना होगा। क्या यह प्रस्ताव विधानसभा में पास हो पाएगा? क्या कोर्ट में इसकी चुनौती दी जाएगी? इन सब सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि कर्नाटक की राजनीति में यह एक गरमागरम मुद्दा बना रहेगा।

सिद्दारमैया ने अपनी पत्नी के मुडा की जमीन लौटाने के फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा- उन पर इस विवाद का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा

बेंगलुरु कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने अपनी पत्नी पार्वती के मैसूरु में जब्त की गई संपत्ति के मुआवजे के रूप में दिए गए भूखंडों को वापस करने के फैसले पर आश्चर्य व्यक्त किया है और कहा है कि उन पर (पार्वती पर) इस विवाद का बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है। श्री सिद्दारमैया ने खुलासा किया कि हालांकि उनका इरादा मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) में प्लॉट आवंटन में घोटाले के आरोपों से लड़ने का था, लेकिन उनके चार दशक लंबे राजनीतिक करियर में पार्वती की कोई भूमिका नहीं होने के मद्देनजर जमीन छोड़ने का फैसला अप्रत्याशित रूप से आया। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उनकी पत्नी विपक्षी दलों द्वारा रचित राजनीतिक साजिश का शिकार बन गई हैं। उन्होंने कहा, “राज्य के लोग यह भी जानते हैं कि विपक्षी दलों ने झूठी शिकायत की और मेरे खिलाफ राजनीतिक नफरत पैदा करने के लिए मेरे परिवार को विवाद में घसीटा।” उन्होंने कहा कि परिणामस्वरूप उनकी पत्नी को मानसिक यातना सहनी पड़ी है। एमयूडीए जमीन घोटाले के आरोप का विरोध करने के अपने दृढ़ संकल्प के बावजूद श्री सिद्दारमैया ने अपनी पत्नी के फैसले को स्वीकार किया और उसका सम्मान किया, साथ ही विवाद के कारण उन पर पड़े भावनात्मक बोझ पर अफसोस जताया। भूमि की प्रस्तावित वापसी ने राजनीतिक तूफान को और बढ़ा दिया है तथा विपक्षी दलों ने कर्नाटक में आगामी चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पर अपने हमले तेज कर दिए हैं।  

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