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सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त स्कीमों पर जताई नाराजगी, CJI ने सरकारों को दी सख्त चेतावनी

नई दिल्ली भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने फ्रीबीज बांट रहे राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि आखिर करदाता के अलावा इन योजनाओं का खर्च और कौन उठाएगा। उन्होंने का कि भोजन और बिजली के बाद अब सीधा कैश ट्रांसफर होने लगा है। साथ ही अदालत ने कहा है कि सरकार को रोजगार पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास पर अब कम खर्च किया जा रहा है। गुरुवार को सीजेआई ने कर्ज के बाद भी राज्यों की तरफ से मुफ्त में चीजें बांटने पर चिंता जाहिर की। उन्होंने सवाल किया, ‘आखिर करदाता नहीं, तो इन योजनाओं के लिए भुगतान कौन करेगा?’ सुप्रीम कोर्ट ने नकद बांटने और मुफ्त की सुविधाएं देने को लेकर वित्तीय समझदारी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने का कोर्ट का कहना है कि राज्यों को मुफ्त की रेवड़ियां या ‘डोल्स’ बांटने के बजाय रोजगार पैदा करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। सीजेआई ने चेताया है कि विकास पर अब कम खर्च किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘अगर आप मुफ्त खाना…, मुफ्त साइकिल…, मुफ्त बिजली देने लगेंगे… और अब तक सीधा कैश ट्रांसफर हो रहा है।’ सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा है कि कई राज्य राजस्व घाटे का सामना कर रहे हैं, लेकिन फिर भी कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार किए हुए हैं। कोर्ट का मानना है कि कर्मचारियों के वेतन और ‘मुफ्त की सुविधाओं’ का बोझ इतना बढ़ गया है कि वे विकास के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक साल में जुटाए गए राजस्व का 25 प्रतिशत हिस्सा…, इसे विकास में क्यों नहीं लगाया जा सकता? सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई कर रहा था। अदालत ने निगम को उपभोक्ता की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को मुफ्त बिजली देने का वादा करने के लिए फटकार लगाई। कोर्ट ने मुफ्त की सेवा के कल्चर की कड़ी आलोचना की। साथ ही कहा कि यह आर्थिक विकास में बाधा डालती है। क्या है फ्रीबीज वाला मामला? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट आज तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2024 के रूल 23 को चुनौती दी गई थी. इस याचिका पर सुनवाई के दौरान ही सीजेआई सूर्यकांत फ्रीबीज पर भड़क गए. उन्होंने तमिलनाडु के साथ-साथ अन्य राज्यों को भी इस मामले में अच्छे से सुना दिया. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड की उस याचिका पर आई, जिसमें सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया था, चाहे उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो. चलिए सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत ने क्या-क्या कहा?     सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले फ्रीबी कल्चर पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि अब ऐसे नीतियों पर फिर से विचार करने का समय आ गया है, क्योंकि इससे देश का आर्थिक विकास रुक जाता है. तमिलनाडु सरकार द्वारा चुनाव से पहले ‘फ्रीबी’ बांटने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया, ‘आप किस तरह की संस्कृति विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं?’     सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, ‘देश के ज्यादातर राज्य राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं, फिर भी वे विकास को नजरअंदाज कर इस तरह की मुफ्त चीजें बांट रहे हैं.’     पीठ ने कहा कि इस तरह की मुफ्त चीजों की बांटने से देश का आर्थिक विकास प्रभावित होता है और राज्यों को सभी को मुफ्त भोजन, साइकिल, बिजली देने के बजाय रोजगार के अवसर खोलने चाहिए.     हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके सरकार के नेतृत्व वाली पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है, जिसमें मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया है.     पीठ ने पूछा, “हम भारत में किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? यह समझ में आता है कि आप कल्याणकारी योजना के तहत उन लोगों को मुफ्त बिजली देना चाहते हैं जो बिजली का बिल चुकाने में असमर्थ हैं. लेकिन बिना यह फर्क किए कि कौन भुगतान कर सकता है और कौन नहीं, आप सबको बांटने लगते हैं. क्या यह तुष्टिकरण नीति नहीं है?’     पीठ ने पूछा कि बिजली दरें घोषित होने के बाद तमिलनाडु कंपनी ने अचानक मुफ्त बांटने का फैसला क्यों किया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘राज्यों को रोजगार के अवसर खोलने चाहिए. अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन, फिर मुफ्त साइकिल, फिर मुफ्त बिजली देने लगेंगे तो कौन काम करेगा और फिर काम करने की संस्कृति का क्या होगा?’     पीठ ने कहा कि राज्य विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय दो काम करते हैं- वेतन देना और इस तरह की मुफ्त चीजें बांटना.  

फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का विवाद समाप्त, मेकर्स ने टाइटल बदला, SC ने रखा समुदाय सम्मान का ख्याल

मुंबई  नीरज पांडे की अपकमिंग फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर कानूनी विवाद खत्म हो गया है. ब्राह्मण समाज और बाकी संगठनों से मिली आलोचनाओं के बाद फिल्ममेकर ने घूसखोर पंडत टाइटल वापस ले लिया है. उनकी इस पहल को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के खिलाफ दाखिला की गई याचिकाओं को बंद कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिल्ममेकर के पॉजिटिव रिस्पॉन्स को देखने के बाद इस विवाद को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए. कोर्ट ने कहा- हम आपके स्टैंड और फिल्म के टाइटल वापस लेने के फैसले की सराहना करते हैं. फिल्ममेकर की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि उनका कभी भी किसी समुदाय को अपमानित और उसे बदनाम करने का इरादा नहीं था.  कोर्ट में हुआ क्या दलीलें? फिल्ममेकर की तरफ से सीनियर वकील एन के कौल ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि हमने टाइटल पूरी तरह वापस ले लिया है. किसी समुदाय को अपमानित करने का कोई इरादा कभी नहीं था. ‘पंडत’ शब्द फिल्म के मेन कैरेक्टर के निकनेम से आया था. जिसमें दिखाया गया कैसे एक बुरा पुलिसवाला अच्छा पुलिस अफसर बनता है. ये क्राइम ड्रामा है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा– हम ‘पंडित्य’ और ‘पंडित’ शब्द समझते हैं. इसे ‘घूसखोर’ से जोड़ने पर गलत मैसेज जाता. एन के कौल– हमने टाइटल वापस ले लिया है. याचिकाकर्ता- टाइटल बदलना चाहिए. उन्होंने नया टाइटल तय नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट- उन्होंने कहा है कि टाइटल बदल रहे हैं. याचिकाकर्ता- मूवी के अंदर पंडित समुदाय को बदनाम करने वाला कोई कंटेंट नहीं होना चाहिए. एन के कौल– क्या आपने फिल्म देखी है? मूवी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती, ना अपमानित करती है. याचिकाकर्ता- उन्हें ऐसा ऐलान करना चाहिए कि इस फिल्म में कुछ भी अपमानित करने वाला नहीं होगा. एन के कौल– हमने कहा है कि टाइटल बदल दिया है. जस्टिस नागरत्ना- फिल्म अभी एडिटिंग स्टेज पर है. उन्होंने पॉजिटिवि जवाब दिया है. अब क्या बचा है आगे?? एन के कौल– मैं क्लियर करना चाहता हूं कि टाइटल पूरी तरह वापस ले लिया गया. नया टाइटल अभी फाइनल नहीं हुआ, लेकिन मेरा वादा है कि नया टाइटल पुराने जैसा नहीं होगा. याचिकाकर्ता- कंटेंट का क्या होगा? ट्रेलर में तो इस शब्द का इस्तेमाल होता हुआ दिख रहा है. सुप्रीम कोर्ट- वो टाइटल वापस ले रहे हैं. क्या आपने बिना नाम वाली कोई तस्वीर देखी है? एन के कौल– हमने मूवी का नाम बदल दिया है. फिल्म के खिलाफ कोई याचिका दायर कर रहा है. कहीं FIR हो रही है. इस उत्पीड़न पर रोक लगनी चाहिए. जस्टिस नागरत्ना- डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने हलफनामा दाखिल कर दिया है. वरिष्ठ वकील ने बताया कि टाइटल पूरी तरह वापस लेने के बाद ये मामला खत्म हो गया. हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया जाए. काउंसिल ने बताया कि याचिकाकर्ता की शिकायतों का समाधान हो गया है. मूवी का नया टाइटल पुराने विवादित नाम जैसा बिल्कुल नहीं होगा. बात करें मूवी की तो, इसमें मनोज बाजपेयी, अजय दीक्षित का रोल प्ले रहे हैं. वो एक ऐसा पुलिस अफसर है जो करप्ट है. फिल्म को रितेश शाह ने डायरेक्ट किया है और नीरज पांडे ने लिखा है. मूवी में नुशरत भरुचा, साकिब सलीम, कीकू शारदा अहम रोल में दिखेंगे. 

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: आदिवासी मतांतरण पर रोक, ग्राम सभाओं को मिले संवैधानिक अधिकार

 रायपुर  छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में मतांतरण को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने ग्राम सभाओं के अधिकारों को मजबूती दी है। 16 फरवरी 2026 को दिए गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘पेसा’ कानून के तहत ग्राम सभाओं को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा का पूर्ण अधिकार है। इस फैसले के बाद बस्तर से सरगुजा तक जनजातीय समाज को अपनी परंपराओं की सुरक्षा के लिए कानूनी आधार मिल गया है। मामला कांकेर जिले की उन ग्राम पंचायतों से जुड़ा था, जिन्होंने बाहरी धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया था। ग्रामीणों ने गांवों में सूचना पट्ट लगाकर इस संबंध में स्पष्ट संदेश भी दिया था। हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट की मुहर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पहले ही ग्राम पंचायतों के इस निर्णय को वैध माना था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखते हुए कहा है कि अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए ग्राम सभाओं द्वारा उठाए गए एहतियाती कदम पूरी तरह वैधानिक हैं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ग्राम सभाएं केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि वास्तविक स्वशासन की इकाई हैं। फैसले पर सियासी प्रतिक्रिया निर्णय के बाद प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ गई है। भाजपा के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने धर्म प्रचारकों से सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की बात कही। वहीं आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधीय पादप बोर्ड के चेयरमैन विकास मरकाम ने इसे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान की बड़ी जीत बताया। गांव-गांव जनजागरण अभियान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा और अन्य संगठनों ने गांवों में जनजागरण अभियान चलाने की तैयारी शुरू कर दी है। पूर्व मंत्री और जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत ने कहा कि अब जब सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम सभाओं के अधिकारों को मान्यता दे दी है, तो समाज को जागरूक कर परंपराओं की रक्षा सुनिश्चित की जाएगी। इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी बरी, वकील की दलील हुई सराही

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या के आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को  रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने ‘जांच में गड़बड़ी’ और अभियोजन पक्ष द्वारा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी सीरीज स्थापित करने में विफलता का हवाला देते हुए यह आदेश सुनाया। न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली वकील अंकिता शर्मा की तारीफ की। कोर्ट ने ‘सटीक तैयारी’ और जांच में आई बड़ी बाधाओं के बावजूद “कुशलतापूर्वक और उत्साह के साथ” मामले की पैरवी करने के लिए प्रशंसा की। वकील की तारीफ पीठ ने कहा, ‘हम सरकारी वकील की सराहना करना चाहेंगे, जिन्होंने हमारे अवलोकन के लिए संपूर्ण अभिलेखों-मूल भाषा और उनके अनुवाद सहित का संकलन तैयार करने का प्रयास किया।’ पुलिस पर उठाए सवाल हालांकि, शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ पुलिस की ‘गड़बड़ जांच’ की कड़ी आलोचना की। जिसके कारण छह साल की बच्ची की हत्या के मामले में कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाए, जहां असली अपराधी बिना सजा के बच गए और उसके सौतेले पिता को ‘महज अनुमानों’ के आधार पर जेल में डाल दिया गया। फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा, ‘हम इस बात से चकित हैं कि यदि जांच वकील की तैयारी के आधे स्तर की भी होती, तो उस बेचारी बच्ची के लापता होने और मृत्यु को लेकर रहस्य सुलझ सकता था। हम अपीलकर्ता के वरिष्ठ वकील द्वारा जांच के लचर रुख को प्रभावी ढंग से उजागर करने के प्रयासों की भी सराहना करते हैं।’ अपील को किया स्वीकार फैसले में रोहित जांगड़े की अपील को स्वीकार कर लिया गया, जिन्हें छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में डाल दिया गया था। निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। यह मामला छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में अक्टूबर 2018 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पांच अक्टूबर 2018 को रोहित जांगड़े और उनकी दूसरी पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। इसके बाद पत्नी अपने माता-पिता के घर चली गई। क्या था मामला आरोप था कि जांगडे अपनी सौतेली बेटी को मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गया। बच्ची लापता हो गई, लेकिन औपचारिक शिकायत 11 अक्टूबर को दर्ज कराई गई। उच्चतम न्यायालय ने मामले की पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी को 13 अक्टूबर, 2018 को गिरफ्तार किया गया था।

‘कैलासा’ पर सुप्रीम कोर्ट का तंज! असली देश को लेकर उठे सवाल, जज ने ली मजेदार चुटकी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में एक जमानत याचिका के दौरान अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई जब जस्टिस संदीप मेहता ने वानुअतु देश के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए उसकी तुलना भगोड़े नित्यानंद के ‘कैलासा’ से कर दी। जानिए क्या है पूरा मामला और क्यों खारिज हुई आरोपी की जमानत। मंगलवार को भारत के सुप्रीम कोर्ट में एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद हैरान करने वाला वाकया सामने आया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित एक वास्तविक देश वानुअतु के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। क्या है पूरा मामला? यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी) और 406 (विश्वासघात) के तहत आरोपी एक विदेशी नागरिक की जमानत याचिका से जुड़ा था। आरोपी खुद को वानुअतु का नागरिक बता रहा था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जब आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कोर्ट को बताया कि उनका मुवक्किल वानुअतु का रहने वाला है, तो जस्टिस मेहता ने आश्चर्य जताते हुए उनसे पूछा कि क्या वह कभी वहां गए हैं? कैलासा से की गई तुलना जस्टिस मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा- क्या आप वहां कभी गए हैं? ऐसा कोई देश नहीं है… यह देश ‘कैलासा’ जैसा है। गौरतलब है कि ‘कैलासा’ एक स्वयंभू हिंदू राष्ट्र है जिसे भगोड़े भारतीय गुरु नित्यानंद ने 2019 में बसाने का दावा किया था। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है। वहीं, इसके विपरीत वानुअतु एक वास्तविक संप्रभु राष्ट्र है, जो संयुक्त राष्ट्र (UN) और कॉमनवेल्थ का सदस्य है। भौगोलिक भ्रम और कोर्ट की टिप्पणी बहस के दौरान जब वकील सिद्धार्थ दवे से पूछा गया कि यह देश कहां है, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह कैरिबियन में कहीं है। हालांकि, भौगोलिक रूप से यह जानकारी भी गलत थी, क्योंकि वानुअतु दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है, न कि कैरिबियन में। कोर्ट को जब यह जानकारी दी गई कि आरोपी ने अलग-अलग समय पर कई पहचानों का इस्तेमाल किया है, तो जस्टिस मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा- हमें इस व्यक्ति पर शोध करने पर विचार करना चाहिए। अंततः आरोपी की जमानत याचिका पर कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए इसे वापस ले लिया गया और कोर्ट ने भी इसे खारिज कर दिया।  

चुनी हुई सरकार की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, हाईकोर्ट को दी चेतावनी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और सर्दियों के मौसम में दुर्गम क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स की समस्याओं पर विचार करते हुए चुनावों को 31 मई तक पूरा करने का निर्देश दिया है। चुनी हुई सरकार को काम नहीं करने दे रहा है हाईकोर्ट; सुप्रीम कोर्ट नाराज, चेतावनी भी दी हिमाचल प्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार को राहत देते हुए चुनावों के लिए समय सीमा को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है। अब यह चुनाव 31 मई, 2026 तक आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही हाईकोर्ट की दखलअंदाजी पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भी जताई। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार के फैसलों में बार-बार किए जा रहे हस्तक्षेप पर नाराजगी जताई। मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हाईकोर्ट निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने दे रहा है। सर्वोच्च अदालत ने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह के हस्तक्षेप को गंभीरता से लिया जाएगा। क्या कहा कोर्ट ने? सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की, लेकिन उसने हाईकोर्ट के उस फैसले का समर्थन किया जिसमें उसने सीमांकन प्रक्रिया का हवाला देकर चुनावों को टालने के हिमाचल सरकार के अनुरोध को खारिज कर दिया था। पीठ ने स्पष्ट करते हुए कहा, ”सीमांकन अभ्यास का लंबित होना चुनावों को स्थगित करने का आधार नहीं हो सकता।” इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक रूप से शहरी स्थानीय निकायों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के लिए समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है। चुनाव का नया कार्यक्रम और समय सीमा हिमाचल प्रदेश में लगभग 3,500 ग्राम पंचायतें, 90 पंचायत समितियां, 11 जिला परिषद और 71 शहरी स्थानीय निकाय हैं, जिनमें से अधिकांश के चुनाव इस वर्ष होने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की 30 अप्रैल की समय सीमा को बढ़ाकर 31 मई कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने नई समय सीमा निर्धारित की है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सभी प्रारंभिक कार्य जैसे कि सीमांकन, आरक्षण आदि 31 मार्च तक पूरे किए जाने चाहिए। पहले यह समय सीमा 28 फरवरी थी। चुनाव इसके बाद आठ सप्ताह के भीतर, यानी निश्चित रूप से 31 मई तक आयोजित किए जाने चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय विस्तार के लिए कोई और आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा। सर्दियों की चुनौतियां याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने बताया कि हाईकोर्ट ने 28 फरवरी की समय सीमा निर्धारित करते समय इस बात का ध्यान रखा था कि देशव्यापी जनगणना का काम 1 मई से शुरू हो जाएगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने कहा कि हाईकोर्ट को चुनाव की समय सीमा निर्धारित करते समय सर्दियों में दूरदराज के क्षेत्रों में पहुंचने की तार्किक कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और सर्दियों के मौसम में दुर्गम क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स की समस्याओं पर विचार करते हुए चुनावों को 31 मई तक पूरा करने का निर्देश दिया है।

कचरा प्रबंधन पर लापरवाही भारी: सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल नगर निगम को दिखाई सख्ती

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा है कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में बार-बार बदलाव करने से जमीनी हकीकत में तब तक सुधार नहीं होगा, जब तक अधिकारी आने वाले सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2026 के हिसाब से वेस्ट मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत नहीं करते। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने भोपाल नगर निगम द्वारा दायर उन अपीलों की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिनमें राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ, भोपाल द्वारा लगाए गए भारी पर्यावरणीय मुआवजे को चुनौती दी गई थी। ग्रीन ट्रिब्युनल ने अपने 31 जुलाई 2023 और 11 अगस्त 2023 के विवादित आदेशों के माध्यम से, नगर निकाय को क्रमशः 1.80 करोड़ रुपए और 121 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा देने का निर्देश दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में नगरपालिका अपशिष्ट प्रबंधन को नियंत्रित करने वाली विकसित हो रही वैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कहा कि नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन और संचालन) नियम, 2000 को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था, जिसे अब ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है, जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाला है, हालांकि जस्टिस मिथल की अध्यक्षता वाली पीठ ने जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन में मौजूद कमियों पर चिंता व्यक्त की। आदेश में कहा गया है, “अदालत का मानना है कि जमीनी स्तर पर कई कारकों के कारण वैधानिक तंत्र वांछित परिणाम नहीं दे रहा है।” नए नियमों की शुरुआत को “स्वागत योग्य कदम” बताते हुए शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि जब तक समय पर प्रारंभिक कार्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक नए नियमों की मात्र अधिसूचना पर्याप्त नहीं होगी। पीठ ने टिप्पणी की, “नए नियमों की शुरुआत एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रभावी तिथि से पहले आवश्यक कार्य पूरा कर लें, अन्यथा 2026 के नियम जमीनी हकीकत में सुधार नहीं ला पाएंगे।” पीठ ने पक्षकारों के वकीलों की बातों को विस्‍तार से सुनने के बाद अपीलकर्ता निगम को दोनों अपीलों में केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को पक्षकार प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का निर्देश देकर कार्यवाही के दायरे को व्यापक बनाने का प्रस्ताव रखा। इसमें निर्देश दिया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव, पंचायती राज मंत्रालय के सचिव, मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश के शहरी विकास और आवास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और मध्य प्रदेश के आवास और पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव को प्रतिवादी के रूप में जोड़ा जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया, “अपीलकर्ता को निर्देश दिया जाता है कि वह संशोधन करे और सुनवाई के अगले दिन या उससे पहले संशोधित कारण शीर्षक प्रस्तुत करे।” अपीलकर्ता के वकील को भारत संघ के केंद्रीय एजेंसी अनुभाग को अपील की प्रतियां सौंपने की अनुमति भी दी गई। मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी।”

चुनाव में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हिमाचल सरकार को दी अंतिम समयसीमा

हिमाचल सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को आंशिक राहत देते हुए राज्य में पंचायतीराज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की अंतिम समय-सीमा 31 मई 2026 तय कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि संशोधित कार्यक्रम के अनुसार पूरी चुनाव प्रक्रिया हर हाल में 31 मई तक पूरी की जाए और इसमें किसी तरह की अनिश्चित देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी। इसमें 30 अप्रैल 2026 तक चुनाव संपन्न कराने की समय-सीमा तय की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए चुनाव की अंतिम तारीख 31 मई कर दी, लेकिन यह भी साफ किया कि आरक्षण रोस्टर 31 मार्च 2026 तक हर हाल में अंतिम रूप देकर लागू किया जाए। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चित काल तक टाला नहीं जा सकता और प्रशासनिक कठिनाइयों के बावजूद तय समय-सीमा के भीतर चुनाव कराना राज्य की जिम्मेदारी है। राज्य सरकार ने क्या दलील दीं? सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि इस बार कड़ी सर्दी, भारी बर्फबारी, कई क्षेत्रों में सड़क संपर्क टूटने और दूरदराज जनजातीय इलाकों में आवागमन बाधित रहने के कारण जमीनी स्तर पर चुनाव की तैयारियां समय पर पूरी करना मुश्किल हो रहा था। सरकार ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा तय समय-सीमा में आरक्षण की कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं था। राज्य सरकार ने यह भी प्रश्न उठाया कि आपदा जैसी परिस्थितियों में आपदा प्रबंधन कानून के प्रावधानों के तहत चुनाव प्रक्रिया को सीमित अवधि के लिए स्थगित करने की कितनी अनुमति है। हालांकि अदालत ने राज्य की दलीलों को सीमित रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि संवैधानिक संस्थाओं के चुनाव तय समय के भीतर कराना अनिवार्य है और इन्हें अनिश्चित काल तक टालना उचित नहीं है।अदालत के इस आदेश के बाद अब ध्यान राज्य निर्वाचन आयोग पर रहेगा, जिसे संशोधित कार्यक्रम के अनुसार 31 मार्च तक आरक्षण प्रक्रिया पूरी करनी होगी और 31 मई 2026 तक पंचायत और नगर निकाय चुनाव संपन्न कराने होंगे। जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपी गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 को समाप्त हो चुका है। इसके बाद प्रदेश की ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों की जिम्मेदारी अस्थायी रूप से प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप दी गई है। राज्य सरकार ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी थी। इसके अनुसार एक फरवरी से पंचायतों की सभी शक्तियां प्रशासकों के पास हैं। कार्यकाल पूरा हो चुका है सरकार की अधिसूचना के अनुसार अधिकांश पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल पूरा हो गया है, हालांकि लाहौल-स्पीति जिले के केलांग उपमंडल की पंचायतों, चंबा जिले के पांगी उपमंडल की पंचायतों और कुल्लू जिले की चार ग्राम पंचायतों को फिलहाल इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। समय पर चुनाव न हो पाने के कारण यह अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई है। समितियों का गठन किया गया है राज्य सरकार ने पंचायतों के संचालन के लिए समितियों का गठन किया है। इनमें ग्राम पंचायत स्तर पर खंड विकास अधिकारी को अध्यक्ष और पंचायत सचिव को सदस्य सचिव बनाया गया है। पंचायत समितियों और जिला परिषदों में भी संबंधित वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को अध्यक्ष और अन्य अधिकारियों को सदस्य और सदस्य सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिससे प्रशासनिक और वित्तीय कार्य बिना बाधा जारी रह सकें।

SC का आदेश: ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले नाम बदलना अनिवार्य

नई दिल्ली  नेटफ्लिक्स की अगली फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का प्रोमो आने के बाद फिल्म विवादों में घिर गई. मनोज बाजपेयी स्टारर फिल्म के टाइटल पर इतना हंगामा मचा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा गया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म के टाइटल को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है और इस टाइटल से फिल्म के रिलीज पर रोक लगा दी. कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी समाज के एक वर्ग को इस तरह के नाम से क्यों बदनाम किया जा रहा है? इस टाइटल से फिल्म रिलीज नहीं होगी. हाईकोर्ट से भी मेकर्स को झटका लग चुका है. मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने फिल्म निर्माता नीरज पांडे को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में स्पष्ट रूप से यह बताया जाए कि फिल्म किसी भी समाज या समुदाय के किसी वर्ग का अपमान या अवमानना नहीं करती है. CBFC की भूमिका पर जताई नाराजगी सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि फिल्म की सामग्री को लेकर जो आपत्तियां सामने आई हैं, उन पर निर्माता पक्ष को अपनी स्थिति पारदर्शी ढंग से रखनी होगी. सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की भूमिका पर भी नाराजगी जताई. जजों ने सवाल किया कि जब फिल्म को प्रमाणपत्र दिया गया, तब क्या संभावित विवादित पहलुओं पर पर्याप्त विचार किया गया था. कोर्ट की टिप्पणी से यह संकेत मिला कि वह प्रमाणन प्रक्रिया की गंभीरता और जवाबदेही को लेकर संतुष्ट नहीं है. समुदाय विशेष का किया टारगेट याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म का शीर्षक और कुछ हिस्से विशेष समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं. वहीं निर्माता पक्ष का तर्क है कि फिल्म का उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करना है. 19 फरवरी को होगी अगली सुनवाई अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो 19 फरवरी को निर्धारित की गई है. माना जा रहा है कि तब तक निर्माता द्वारा दाखिल किया जाने वाला हलफनामा इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.

बंगाल SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट की फटकार, समयसीमा बढ़ी; पुलिस प्रमुख से मांगी रिपोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पश्चिम बंगाल के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) मामले पर सुनवाई हुई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के अन्य नेताओं की याचिकाओं पर यह सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में दस्तावेजों की पड़ताल और फाइनल वोटर लिस्ट की समयसीमा को 1 हफ्ते बढ़ाया। पहले फाइनल वोटर लिस्ट जारी करने की डेडलाइन 14 फरवरी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार सुनिश्चित करें कि उसकी ओर से उपलब्ध कराए गए 8505 ग्रुप बी के अधिकारी कल शाम 5 बजे तक निर्वाचन अधिकारी (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) को रिपोर्ट करें। ईसीआई चाहे तो अपने अधिकारियों की जगह इन अधिकारियों की सेवा ले सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि माइक्रो ऑब्जर्वर या ग्रुप बी के अधिकारियों की भूमिका सिर्फ ईआरओ को सहयोग करने की रहेगी। वोटर लिस्ट पर अंतिम फैसला ईआरओ ही लेंगे। चुनाव आयोग की ओर से कोर्ट को शिकायत की गई कि ऑब्जेक्शन फॉर्म जलाने वाले लोगों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है। कोर्ट ने इस पर राज्य के डीजीपी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि डीजीपी हलफनामा दाखिल करें। वहीं, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र उदय सिंह ने कहा कि नोटिस के जवाब पर चर्चा होनी चाहिए। शुरुआत में वकीलों की दलीलों में तालमेल न होने से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि सब एक साथ बोल रहे हैं और एक-दूसरे की बात काट रहे हैं, जिससे सुनवाई करना मुश्किल हो रहा है। इसके बाद ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दिवान ने दलीलें शुरू कीं। सीजेआई ने पिछली सुनवाई का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या ड्राफ्ट में 70 लाख मतदाताओं के नामों में स्पेलिंग मिसमैच है। साथ ही मैनपावर की कमी के कारण चुनाव आयोग को माइक्रो-ऑब्जर्वर्स लगाने पड़े थे। श्याम दिवान ने बताया कि राज्य सरकार ने 8,500 अधिकारियों की व्यवस्था कर ली है। सीजेआई ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या आपको इन अधिकारियों की सूची मिल गई है। आयोग के वकील ने कहा कि अभी तक कोई नाम नहीं मिला है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि 4 या 5 फरवरी को ही नाम भेजे जा सकते थे। दिवान ने कहा कि डेटा भेज दिया गया था और आयोग से पुष्टि मांगी गई थी, उसके बाद पूरा विवरण भेजा जाता। सीजेआई ने कहा कि राज्य सरकार को तुरंत सूची भेजनी चाहिए थी, कोर्ट के माध्यम से नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कहा कि आयोग ने कभी ग्रुप-बी अधिकारियों की मांग नहीं की थी। यह सुझाव कोर्ट से आया था, इसलिए विवरण जुटाने में समय लगा। दिवान ने दोहराया कि सूची सौंप दी गई है, लेकिन आयोग ने इनकार किया। सीजेआई ने ईमेल चेक करने को कहा और पूछा कि क्या सूची में नाम, पदनाम, संपर्क और क्षेत्र दिए गए हैं। सिंघवी ने कहा कि ईमेल भेज दिया गया है और क्या इन अधिकारियों को जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष रिपोर्ट करने के निर्देश दिए जाएं। दिवान ने कहा कि आयोग की मंजूरी के बाद नामों की सूची दी जाएगी। उन्होंने जोर दिया कि छोटी-मोटी विसंगतियों के कारण बड़े पैमाने पर नाम नहीं हटाए जा सकते। सीजेआई ने पूछा कि क्या पश्चिम बंगाल का कोई अधिकारी है, जिससे सवाल किए जा सकें। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान प्रधान सचिव मनोज पंत मौजूद हैं। पंत ने कहा कि 292 ईआरओ (ग्रुप-ए, एसडीएम रैंक) के नाम भेजे गए हैं। कुछ आईएएस भी हैं। कुल 8,525 सहायक ईआरओ हैं। सीजेआई ने हर विधानसभा क्षेत्र में एईआरओ की संख्या पूछी। पंत ने बताया कि सूची में 65 प्रतिशत ग्रुप-बी, 10-12 प्रतिशत ग्रुप-सी और बाकी ग्रुप-ए के अधिकारी हैं। इन्हें तैनात करने से पहले आयोग को सूचित किया गया था। सीजेआई ने पूछा कि क्या एईआरओ ईआरओ से वरिष्ठ होगा? राज्य ने कहा कि एईआरओ सहायता करता है। आयोग के वकील डीएस नायडू ने कहा कि ईआरओ अर्ध-न्यायिक अधिकारी होते हैं, इसलिए एसडीएम जैसे अनुभवी अधिकारियों की जरूरत थी। राज्य ने वेतन समानता पर आधारित सूची दी, लेकिन आयोग ने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग अर्ध-न्यायिक कार्य नहीं कर पाएंगे। सीजेआई ने कहा कि अनुपयुक्त ईआरओ और एईआरओ को नए सक्षम अधिकारियों से बदला जा सकता है। दिवान ने कहा कि बदलाव में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन छोटी विसंगतियों के लिए बड़े पैमाने पर नाम हटाने की अनुमति नहीं है। सीजेआई ने आयोग से कहा कि वे एईआरओ बदलने पर विचार करें। माइक्रो-ऑब्जर्वर्स मतदाताओं की आपत्तियों पर सलाह देते हैं, लेकिन निर्णय ईआरओ लेते हैं। आयोग ने कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स को 10 दिनों का प्रशिक्षण दिया गया और दस्तावेज जांच पूरी हो गई है। सीजेआई ने सुझाव दिया कि अगर ये अधिकारी कल सुबह शामिल होते हैं, तो उन्हें फाइलें देखने दें, जिससे निर्णय की गुणवत्ता बढ़ेगी। सुनवाई जारी है और कोर्ट ने सभी पक्षों से सहयोग की अपील की है ताकि वैध मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहें। वहीं, सीजेआई ने कहा कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को आसान बनाने और जताई गई चिंताओं का ध्यान रखने के लिए निम्नलिखित अंतरिम निर्देश जारी किए जाते हैं। राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि सभी 8,555 ग्रुप बी अधिकारी, जिनकी सूची आज सौंपी गई है, शाम 5 बजे तक जिला चुनाव अधिकारियों (डीआरओ) को रिपोर्ट करें। चुनाव आयोग (ईसीआई) के पास मौजूदा ईआरओ और एईआरओ को बदलने और योग्य पाए जाने पर अधिकारियों की सेवाओं का उपयोग करने का अधिकार होगा।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ममता बनर्जी को झटका, चीफ जस्टिस बोले—हर राज्य जिम्मेदारी निभाए

नई दिल्ली देश के कई राज्यों में चल रहे SIR के खिलाफ देश की शीर्ष अदालत में वकील बनकर पहुंचीं ममता बनर्जी को करारा झटका लगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने साफ कर दिया है कि SIR की प्रक्रिया में किसी तरह की रोक लगाने की मंजूरी नहीं दी जा सकती। इसमें कोई बाधा भी पैदा करने की परमिशन अदालत नहीं देगी। चीफ जस्टिस ने कहा कि सभी राज्यों को इस बात को समझ लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जो कुछ भी स्पष्टता चाहिए, वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी जाएगी।

नीट पीजी Cut Off पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, कम अंक पर जताई चिंता

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी 2025 के क्वालिफाइंग कटऑफ को शून्य और नेगेटिव वैल्यू किए जाने पर चिंता जताई है. SC का कहना है कि माइनस 40 क्राइटेरिया तय करना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. सीटें खाली रहने के कारण इस तरह का क्राइटेरिया सेट करना सही नहीं है. जजों ने जताई चिंता इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की बेंच कर रही थी. जजों ने कहा कि खाली सीटें बेकार नहीं जानी चाहिए, लेकिन सिर्फ कैंडिडेट्स की कमी के कारण कटऑफ इतना घटाना सही नहीं है. इससे एलिजिबिलिटी का जो क्राइटेरिया सेट किया जा रहा है, उसके कमजोर होने का डर है. याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सत्याम सिंह राजपूत थे. NBEMS ने घटाया था परसेंटाइल दरअसल, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने कुछ समय पहले NEET PG 2025 एडमिशन के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में बदलाव किया है. सीट खाली रह जाने का हवाला देते हुए NBEMS ने परसेंटाइल घटाया. NBEMS ने बताया था कि राउंड 2 काउंसलिंग पूरी हो गई है और उसके बाद भी सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों की 18,000 से ज्यादा PG सीटें खाली रह गई थीं. ऐसे में परसेंटाइल घटाया गया. EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 50 से घटाकर 7 परसेंटाइल कर दिया गया था. वहीं जनरल PwBD कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 45 की जगह केवल 5 परसेंटाइल का मानक तय किया गया था. इसके अलावा SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 40 से घटाकर शून्य (0) परसेंटाइल कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या-क्या हुआ? केंद्र सरकार की ओर से सीटें खाली रह जाने का तर्क दिया गया. इस पर SC ने कहा कि आखिरी बैलेंस बनाने के लिए मानकों को कितनी हद तक गिराया जा सकता है. जजों ने केंद्र के उस तर्क पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों को ढील के तहत दाखिला दिया जा रहा है, उनके पास पहले से MBBS की डिग्री है. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ MBBS होना पर्याप्त नहीं है. अगर वे NEET PG परीक्षा पास नहीं कर पाए हैं. कितनी हैं नीट पीजी की सीटें? इससे पहले देशभर के अलग-अलग हिस्सों में नीट परसेंटाइल घटाए जाने पर बवाल मचा था. भारत में हर साल करीब 2.4 लाख स्टूडेंट्स नीट पीजी परीक्षा देते हैं. इनमें से करीब 1 लाख स्टूडेंट्स पास होते हैं. फिलहाल देश में लगभग 80,000 नीट पीजी सीट्स हैं. समय-समय पर सीट में बदलाव होता रहता है. साल 2021 से 2025 सीटों की संख्या बढ़ाई गई है.

महा-सुनवाई में CJI और ममता बनर्जी के बीच बहस, SIR मामले पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर जारी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सीएम ममता बनर्जी ने खुद अदालत में अपनी बात रखने की कोशिश की. हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने बीच में ही उन्हें टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान पहले ही सभी दलीलें रख चुके हैं. बता दें कि इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी सोमवार को होगी. चुनाव आयोग पर ममता के आरोप बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने कहा कि वह न्याय के लिए अदालत आई हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने चुनाव आयोग को तमाम फैक्ट्स बताए थे, लेकिन उन्हें नहीं सुना गया. इस पर CJI ने साफ किया कि आपकी नई याचिका में कुछ नए मुद्दे जरूर हैं, लेकिन जो बातें आप कह रही हैं, वे आपके वकील पहले ही अदालत के सामने रख चुके हैं. वोटर्स के नाम हटाए जा रहे हैंः ममता बनर्जी सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने रवींद्रनाथ टैगोर की स्पेलिंग में बदलावों का जिक्र करते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात कही. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और राज्य में बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि फाइनल वोटर लिस्ट के लिए अब सिर्फ 11 दिन बचे हैं और यह प्रक्रिया 14 फरवरी तक पूरी होनी है, जबकि इस मामले की सुनवाई के लिए केवल चार दिन का समय बचा है. उन्होंने कहा कि राज्य में करीब 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ हैं और लगभग 3.26 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पाई गई है, जो कुल मतदाताओं का करीब 20 प्रतिशत है. श्याम दीवान ने मांग की कि चुनाव आयोग को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट’ में शामिल हर मतदाता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के बावजूद कई मामलों में केवल नाम, उम्र और लिंग दर्ज हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि मतदाता का नाम सूची से क्यों हटाया गया. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे वोटर लिस्ट में क्यों नहीं हैं. इस पर CJI ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक सामान्य सूचना नहीं है, बल्कि संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी दिए जा रहे हैं. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह समय कृषि और त्योहारों का है, ऐसे में कई लोग अपने गृह जनपद से बाहर हैं. CJI ने सवाल किया कि जब बंगाल में बीएलओ पर दबाव और मौतों की बातें सामने आ रही हैं, तो असम जैसे राज्यों में ऐसा क्यों नहीं हो रहा. ‘बंगाल को टारगेट किया जा रहा है’ ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में उन्हें खारिज किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब त्योहार और फसल कटाई का मौसम है और बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर हैं. इस दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सऐप कमीशन’ तक कह दिया. उन्होंने कहा, “इलेक्शन कमीशन… सॉरी, व्हाट्सऐप कमीशन यह सब कर रहा है. लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं. बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.” सुनवाई के अंत में CJI ने कहा कि अदालत समय बढ़ाने का निर्देश दे सकती है. उन्होंने ममता बनर्जी से कहा कि अदालत को उनके वकील श्याम दीवान की काबिलियत पर पूरा भरोसा है और उन्होंने अपने लिए श्रेष्ठ वकील चुने हैं. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को तय की है. CJI ने कहा कि चुनाव आयोग आज उठाए गए मुद्दों पर निर्देश लेकर अदालत के समक्ष आए. वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार को उपलब्ध ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची पेश करने को कहा गया है. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की ओर से अधिकारियों के प्रति ‘होस्टिलिटी’ को लेकर लिखित आशंका जताई गई है. अदालत में क्या-क्या हुआ, यहां देखें ECI के वकील: ‘मेरी इंस्ट्रक्शन यह थी कि सिर्फ स्पेलिंग की मामूली गलती पर नोटिस जारी नहीं किया जाएगा.’ CJI: ‘राज्य का एग्जीक्यूटिव हेड भी आज यहां मौजूद है. क्या यह संभव नहीं कि राज्य बंगला भाषा के विशेषज्ञ उपलब्ध कराए, जो समिति के साथ बैठकर स्थानीय उच्चारण और स्पेलिंग पर सलाह दें?’ ममता बनर्जी: ‘मैं इस पर सफाई दे सकती हूं, क्योंकि मैं उसी राज्य से हूं.’ CJI: ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि आप वहीं से हैं.’ ममता बनर्जी: ‘बेंच का धन्यवाद कि मुझे बोलने की अनुमति दी गई. ‘समस्या यह है कि वकील तब लड़ते हैं, जब सब कुछ खत्म हो चुका होता है. जब हमें न्याय नहीं मिलता, तब न्याय दरवाजों के पीछे रोता रहता है. मैंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया.’  ‘मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं. मैं एक बंधुआ मजदूर जैसी हूं. मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं, मैं एक साधारण नागरिक हूं.’ CJI: ‘पश्चिम बंगाल सरकार ने भी याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ वकील राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं—कपिल सिब्बल, गोपाल और श्याम दीवान. हमारी मदद के लिए सर्वश्रेष्ठ लीगल टीम मौजूद है. 19 जनवरी को जब मामला आया था, तब श्री सिब्बल ने पश्चिम बंगाल सरकार और नागरिकों की समस्याएं बहुत स्पष्टता से रखी थीं. सभी मुद्दे चिन्हित हो चुके हैं. हर समस्या का समाधान होता है. हमें यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी निर्दोष नागरिक बाहर न रह जाए. ‘सिर्फ तीन आधार ऐसे हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होगी— पहला, दोषसिद्ध व्यक्ति. दूसरा, जो राज्य या देश से बाहर जा चुके हैं. तीसरा, गैर-नागरिक.’  लेकिन बंगाल में नामों का उच्चारण अलग तरीके से होता है. आजकल AI-आधारित रिकॉर्डिंग हो रही है. ऐसी तकनीकी या भाषाई गलती के कारण किसी असली नागरिक को बाहर नहीं किया जाना चाहिए. ECI: ‘हमें अभी तक याचिका की कॉपी नहीं मिली है. हमें यह भी नहीं पता कि असली समस्या क्या है. हमें जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया जाए.’ CJI: ‘आपको कॉपी इसलिए नहीं दी गई क्योंकि यह मामला पहली … Read more

सुप्रीम कोर्ट ने कहा– व्हॉट्सऐप मेटा के साथ यूजर डेटा साझा न करे, प्राइवेसी को मिले संरक्षण

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 नई दिल्ली व्हाट्सएप और मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है. कोर्ट ने साफ किया कि डेटा शेयरिंग की ये प्रक्रिया भारतीय यूजर्स के निजता के अधिकार के खिलाफ है.  हालांकि, सीसीआई के वकील ने एनसीएलएटी (NCLAT) के कुछ निष्कर्षों पर आपत्ति जताई है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने व्हाट्सएप को निर्देश देते हुए कहा, ‘हम आपको मेटा के साथ एक भी जानकारी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे. हम आपको इस देश की नीतियों की गोपनीयता के साथ खेलने की इजाजत कतई नहीं देंगे.’  इस पूरे प्रकरण में कोर्ट के सामने तीन मुख्य अपीलें थीं, जो मेटा, व्हाट्सएप और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की ओर से दायर की गई थीं. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने इन अपीलों का पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान मेटा के वकील ने दलील दी कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक 213 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान पहले ही किया जा चुका है. मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सवाल सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़े सवाल उठाए और कंपनी को डेटा साझा करने से साफ मना कर दिया. CJI ने व्हाट्सएप की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपने इसे इतनी चालाकी से तैयार किया है कि इसे समझना नामुमकिन है. उन्होंने पूछा कि क्या देश का आम आदमी, जैसे घर में काम करने वाले नौकर, निर्माण मजदूर या छोटे विक्रेता, इस जटिल नीति को समझ पाएंगे? कोर्ट ने साफ कहा कि उपभोक्ताओं को इस ऐप की ‘लत’ लगा दी गई है और अब उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है. यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो रहा- SC सीजेआई ने कहा कि लोगों के डेटा का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है और अब तक लाखों यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो चुका है. इस दौरान मेटा के वकील अखिल सिबल ने दलील दी कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनुमति है. इस पर सीजेआई ने कहा, ‘अगर आपको डेटा का कोई हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे! सिर्फ इसलिए कि भारतीय उपभोक्ता मूक हैं और उनके पास आवाज नहीं है, आप उन्हें शिकार नहीं बना सकते.’ सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि व्हाट्सएप यूजर्स को सिर्फ दो ही विकल्प दे रहा है- ‘या तो पॉलिसी स्वीकार करो या ऐप का इस्तेमाल बंद कर दो.’ इस पर अदालत ने कहा कि बिहार के दूरदराज इलाकों या तमिलनाडु के गांवों में रहने वाले लोग, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, वे इस नीति के खतरनाक परिणामों को कभी नहीं समझ पाएंगे. डेटा शेयर करने की इजाजत से SC का साफ इनकार सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा, ‘जब तक आप हमें यह विश्वास नहीं दिला देते कि आपको ऐसा करने का कोई दैवीय अधिकार हासिल है, तब तक हम आपको डेटा शेयर करने की अनुमति नहीं देंगे.’  3 जजों की बेंच के सामने होगी अपीलों पर सुनवाई व्हाट्सएप के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी नीतियां दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों के स्टैंडर्ड्स के मुताबिक ही हैं. लेकिन इन दलीलों को सुनने को बाद सीजेआई ने बताया कि एनसीएलएटी के सामने जनवरी 2025 के आदेश की स्थिति अभी भी अहम है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है. अब इन अपीलों पर विस्तृत सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने भिंड के दो पत्रकारों की याचिका पर मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगा

Supreme Court 93

भिंड सुप्रीम कोर्ट ने भिंड के दो पत्रकारों की याचिका पर मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है. इन पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि रेत माफिया पर रिपोर्टिंग करने के कारण पुलिस थाने में उनके साथ मारपीट की गई. जस्टिस संजय करोल और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने पत्रकार शशिकांत गोयल और अमरकांत सिंह चौहान की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया जाए. इस पर अदालत ने कहा, “दूसरे पक्ष को जवाब देने का अवसर दिया जाए. राज्य को भी तथ्य प्रस्तुत करने दें.” कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया है. अब 9 जून को मामले में सुनवाई होगी. बीती 28 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने अमरकांत सिंह चौहान को सुरक्षा प्रदान की थी. पत्रकार चौहान ने दावा किया था कि भिंड के पुलिस अधीक्षक (SP) के कार्यालय में उनकी पिटाई की गई और अब उनकी जान को खतरा है. हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को मध्य प्रदेश निवासी और एक समाचार चैनल के भिंड ब्यूरो प्रमुख अमरकांत सिंह चौहान को दो महीने के लिए सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया था. बता दें कि पिछले महीने भिंड जिले के तीन पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि बीती 1 मई को पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में उनके साथ मारपीट या दुर्व्यवहार किया गया. हालांकि, एसपी असित यादव ने इन आरोपों का खंडन किया है. यूट्यूब चैनल संचालक प्रीतम सिंह राजावत, न्यूज पोर्टल संचालक शशिकांत गोयल और न्यूज चैनल के लिए कार्यरत अमरकांत सिंह चौहान ने जिला कलेक्टर को दी गई शिकायत में कहा कि 1 मई को उनके साथ मारपीट की गई. दलित पत्रकार को जातिसूचक गालियाँ, चप्पलों से पीटा पीड़ित पत्रकार शशिकांत गोयल ने बताया कि उन्हें 1 मई को एसपी डॉ. असित यादव के कार्यालय बुलाया गया था। वहां पहुंचते ही एसआई गिरीश शर्मा और सत्यबीर सिंह ने उनका नाम पूछा। जब उन्होंने अपना नाम “शशिकांत गोयल जाटव” बताया, तो दोनों पुलिसकर्मियों ने गाल पर चप्पलों से मारना शुरू कर दिया। “मैंने पूछा कि क्यों मार रहे हो, मेरी गलती क्या है? तो जवाब मिला – तू बहुत लिखने लगा है पुलिस के खिलाफ।” — शशिकांत ने कहा शशिकांत ने बताया कि उन्हें जबरन “जी सर” कहने को कहा गया। जब उन्होंने सवाल किया कि “सर जी” और “जी सर” में क्या फर्क है, तो उन्हें फिर पीटा गया और जातिसूचक गालियाँ दी गईं। पूरी घटना एसपी असित यादव की मौजूदगी में हुई। आठ पत्रकारों को बनाया गया निशाना मामले से जुड़ी जानकारी के अनुसार, करीब आठ पत्रकारों को पुलिसकर्मियों ने एसपी ऑफिस में बुलाकर पीटा था। इन सभी का ‘अपराध’ सिर्फ इतना था कि वे जिले में सक्रिय रेत माफिया और पुलिस की मिलीभगत पर लगातार रिपोर्टिंग कर रहे थे। दूसरे पीड़ित पत्रकार अमरकांत चौहान ने भी पुलिसकर्मियों की बर्बरता की पुष्टि की है। दोनों पत्रकारों ने कहा कि अब वे अपनी जान बचाने के लिए दिल्ली भागकर सुप्रीम कोर्ट पहुँचे हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने की निंदा प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को बताया कि पीड़ित पत्रकार बेहद सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं और अब उन्हें न्याय की आस सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा– “क्या हमें देशभर के अग्रिम जमानत के मामलों पर सिर्फ इसलिए विचार करना चाहिए क्योंकि इसमें एक पत्रकार शामिल है?” वहीं याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यह मामला एक आम अग्रिम जमानत याचिका से कहीं ज्यादा गंभीर है। इसमें राज्य की मशीनरी द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश की जा रही है।  

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