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हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन को राजसात करने का अधिकार अब जिले के कलेक्टर को नहीं

जबलपुर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच ने वाहन को राजसात करने के कलेक्टर के अधिकार वाले आदेश को असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर दिया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा हैं कि वाहन को राजसात करने का अधिकार अब जिले के कलेक्टर (Collector) को नहीं बल्कि संबंधित ट्रायल कोर्ट (Trial Court) को होगा। दो याचिकाओं पर दिया फैसला सागर के राजेश विश्वकर्मा और तेंदूखेड़ा के रामलाल झारिया के द्वारा हाईकोर्ट (High Court) में याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट की फुल बेंच के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत, जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस विवेक जैन ने सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है। याचिकाकर्ता (Petitioner) की ओर से एडवोकेट विवेक रंजन पांडे, जयंत नीखरा, संजीव नीखरा ने कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखा। कलेक्टर को थे वाहन राजसात के अधिकार सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे (Advocate Vivek Ranjan Pandey) ने कोर्ट को बताया कि आबकारी (Excise) अधिनियम 1915 की धारा 47(ए) के तहत वाहन को राजसात करने का अधिकार कलेक्टर को है। इसी तरह गोवंश अधिनियम (Cattle Act) 2004 में दिए इस प्रावधान को भी चुनौती दी थी। इसमें भी अपराध में शामिल वाहन को राजसात का अधिकार कलेक्टर (Collector) को था। अलग-अलग बेंच में लगे इन मामलों को कई बार उठाया गया, जिसके बाद फुल बेंच को यह केस रेफर किया गया।

हाई कोर्ट ने कहा- नर्मदा तट के दोनों ओर 300 मीटर के क्षेत्र में निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा, यह क्षेत्र खुला रखा जाएगा

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने विगत छह वर्ष से विचाराधीन नर्मदा मिशन और समर्थ गऊ चिकित्सा केंद्र की जनहित याचिका पर अंतिम आदेश सुना दिया है। जिसमें साफ किया गया है कि नर्मदा तट के दोनों ओर 300 मीटर के क्षेत्र में निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा। यह 300 मीटर का क्षेत्र खुला रखा जाएगा। कोर्ट ने संशोधित विकास योजना 2021 का गंभीरता से पालन सुनिश्चित करने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। इस मामले में 27 फरवरी को उभयपक्षों की बहस पूरी होने के साथ ही सुरक्षित किया गया आदेश शनिवार, एक मार्च को बाहर आया। हाई कोर्ट ने इससे पूर्व भी एक जनहित याचिका पर 13 दिसंबर, 2013 को महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था, जिसमें व्यवस्था दी थी कि नर्मदा तट के दोनों ओर 300 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक रहेगी। अवैध निर्माण किए गए हैं नर्मदा मिशन और समर्थ गऊ चिकित्सा केंद्र की ओर से 2019 में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि नर्मदा तट के प्रतिबंधित क्षेत्र में बहुत से अवैध निर्माण किए गए हैं। कई निर्माण जारी हैं। याचिका में कहा गया कि मास्टर प्लान 2021 में नर्मदा तट से नदी के उच्चतम बाढ़ स्तर तक के 300 मीटर दायरे में कोई भी निर्माण नहीं होगा। वहीं राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने नर्मदा तट से दोनों ओर 300 मीटर के क्षेत्र में निर्माण प्रतिबंध किया था। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि सरकार ने पांच अक्टूबर, 2015 को अधिसूचना जारी कर यह स्पष्ट किया था कि नर्मदा नदी के तटीय क्षेत्र के दोनों ओर 300 मीटर, परियट के दोनों ओर 100 मीटर तथा गौर नदी के दोनों ओर 50 मीटर खुला क्षेत्र (नो कंस्ट्रक्शन जोन) रखा जाएगा। इस अधिसूचना के आधार पर विकास योजना 2021 तैयार की गई है। खुले क्षेत्र में सामाजिक वानिकी, लैंडस्केप, गार्डन, पार्किंग, पंप हाउस और वाचमैन हाउस बनाने की छूट रहेगी। दरअसल, यह जनहित याचिका लंबित रहने के दौरान यह तथ्य रेखांकित हुआ था कि जबलपुर के तिलवारा घाट अंतर्गत प्रतिबंधित क्षेत्र में एक धर्म विशेष का निर्माण प्रस्तावित है। वर्ष 2019 में केंद्र की ओर से अंडरटेकिंग दी गई थी हाई कोर्ट के आदेश के बिना कोई निर्माण नहीं किया जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया हैं कि विकास योजना के अंतर्गत इस बात का सत्यापन कर लें कि उक्त प्रस्ताव प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे में है या उससे बाहर है। यह प्रक्रिया दो सप्ताह में पूरी करें।

जासूसी के आरोप से बाइज्जत बरी एक व्यक्ति को अपर जिला जज के तौर पर नियुक्त करने हाईकोर्ट ने दिया आदेश

प्रयागराज/कानपुर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जासूसी के आरोप से बाइज्जत बरी एक व्यक्ति को अपर जिला जज के तौर पर नियुक्त करने का राज्य सरकार को निर्देश दिया है। पाकिस्तान के लिए जासूसी करने और राजद्रोह के दो मुकदमों में आरोपी रहे इस व्यक्ति को निचली अदालत द्वारा बरी कर दिया गया था। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को अपर जिला जज (उच्च न्यायिक सेवा काडर के तहत) के पद पर नियुक्ति पत्र 15 जनवरी 2025 तक जारी करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता ने 2017 में उच्च न्यायिक सेवा परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की थी। प्रदीप कुमार नाम के व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश पारित करते हुए न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति डी. रमेश की पीठ ने कहा, ”याचिकाकर्ता को दो आपराधिक मामलों में ‘बाइज्जत बरी’ कर दिया गया था और दोनों ही मामलों में आरोपों में कोई सत्यता नहीं पाई गई।” अदालत ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता का आचरण सत्यापन कराने और सभी औपचारिकताएं पूरी कर 15 जनवरी 2015 तक नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा (सीधी भर्ती) परीक्षा, 2016 के लिए आवेदन किया था जिसमें उसने अपने खिलाफ चले दो मुकदमों (एक जासूसी और दूसरा राजद्रोह) और उन मुकदमों में छह मार्च 2014 को बरी किए जाने का उल्लेख किया था। ये मुकदमे कोतवाली, कानपुर नगर में वर्ष 2002 में दर्ज किए गए थे। याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और उसे सफल घोषित किया गया। इसके बाद 18 अगस्त 2017 को उच्च न्यायालय ने चयनित अभ्यर्थियों की सूची राज्य सरकार को भेजी और नियुक्ति की सिफारिश की। हालांकि, याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया। अदालत ने छह दिसंबर के अपने आदेश में कहा, ”इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ता को जासूसी के गंभीर आरोप का सामना करना पड़ा और राज्य सरकार के लिए इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी था। लेकिन दूसरी तरफ इस आपराधिक मुकदमे में याचिककर्ता को ‘बाइज्जत बरी’ कर दिया गया जहां आरोप में कोई सच्चाई नहीं पाई गई।” अदालत ने यह भी कहा, ”याचिकाकर्ता ने किसी विदेशी एजेंसी के लिए काम किया हो, यह निष्कर्ष निकालने के लिए राज्य सरकार के पास कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। वह खुफिया एजेंसियों के राडार पर था, इस बात का कोई मतलब नहीं है।” प्रदीप कुमार और उनका परिवार कानपुर के मेस्टन रोड इलाके में रहता है। ‘पीटीआई-भाषा’ द्वारा संपर्क किए जाने पर परिवार ने इस विषय पर बात करने से यह कहते हुए मना किया कि ‘प्रदीप यहां नहीं हैं।’

हाईकोर्ट ने दिल्ली स्थित हिमाचल भवन को कुर्क करने के आदेश दिए, सुक्खू सरकार को लगा झटका

शिमला हिमाचल की सुक्खू सरकार को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने दिल्ली स्थित हिमाचल भवन को कुर्क करने के आदेश दिए हैं। यह आदेश सेली हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर की गई अनुपालना याचिका पर सुनवाई के बाद जारी किए गए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि कंपनी को अपनी बकाया राशि वसूलने के लिए हिमाचल भवन को नीलाम करने की अनुमति दी जाए। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अजय मोहन गोयल ने यह आदेश 64 करोड़ रुपये के बकाये को लेकर दिया। दरअसल यह राशि कंपनी को ब्याज सहित राज्य के ऊर्जा विभाग से मिलनी थी, जो अब तक नहीं दी गई है। हाईकोर्ट ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव को आदेश दिया है कि वे यह तथ्यात्मक जांच करें कि किस अधिकारी या अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह राशि अभी तक जमा नहीं की गई। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि दोषी अधिकारियों से इस ब्याज की राशि व्यक्तिगत रूप से वसूलने का आदेश दिया जाएगा। हाईकोर्ट ने मामले की जांच के लिए 15 दिनों की समयसीमा निर्धारित की है और अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर 2024 तारीख तय की है। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस बात की भी स्पष्ट जानकारी देने के लिए कहा है कि किस वजह से बकाया राशि का भुगतान अब तक नहीं हुआ है, जबकि इसे कई साल पहले वसूल किया जाना चाहिए था। यह मामला वर्ष 2009 से जुड़ा हुआ है, जब राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने सेली हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी लिमिटेड को लाहौल स्पीति में 320 मेगावाट के बिजली प्रोजेक्ट का आवंटन किया था। इसके तहत कंपनी को बीआरओ द्वारा सड़क निर्माण कार्य उपलब्ध कराया गया था। सरकार ने समझौते के तहत कंपनी को जरूरी मूलभूत सुविधाएं देने का वादा किया था, ताकि परियोजना समय पर पूरी हो सके। हालांकि, बाद में कई विवादों के चलते कंपनी ने 2017 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी थी, जिसके बाद यह मामला कानूनी दांव-पेचों में उलझ गया था। कंपनी का आरोप है कि सरकार इस परियोजना के लिए मूलभूत सुविधाएं देने में नाकाम रही। राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि अभी उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी नहीं पढ़ी है। उन्होंने कहा कि अपफ्रंट प्रीमियम 2006 की ऊर्जा नीति के तहत तय किया जाता है। आर्बिट्रेशन का फैसला चिंताजनक है और सरकार फैसले का अध्ययन करेगी। भाजपा ने सरकार पर साधा निशाना इस बीच, हिमाचल भवन की नीलामी के फरमान ने राज्य की सत्तारूढ़ सुक्खू सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। फिलहाल यह मुद्दा विपक्ष के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनता दिख रहा है। हिमाचल प्रदेश भाजपा ने हाईकोर्ट से फैसला आने के बाद कांग्रेस सरकार पर जमकर निशाना साधा है। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल भवन जो राज्य का गौरव है, वह आज कुर्क किए जाने के कगार पर है। यह प्रदेश के लिए अत्यंत शर्मनाक घटना है। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार ने राज्य की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है तथा हिमाचल अब नीलामी के दौर में है। वहीं भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने भी प्रदेश सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। सरकार अपना पक्ष कोर्ट में नहीं रख पा रही है, इसलिए हिमाचल भवन को अटैच करने के आदेश दिए गए हैं। यह सरकार की विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ कमरे में जाती है, तो मतलब यह नहीं कि महिला सेक्स के लिए तैयार है: बॉम्बे हाईकोर्ट

मुंबई बलात्कार से जुड़े एक केस में बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत का कहना है कि अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ होटल के कमरे में जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसने यौन संबंध बनाने के लिए सहमति दे दी है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें आरोपी के खिलाफ रेप केस को बंद कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने क्या कहा जस्टिस भरत पी देशपांडे की बेंच ने कहा, ‘इस बात में कोई शक नहीं है कि यह दिखाने के लिए सामग्री है कि आरोपी और शिकायतकर्ता ने होटल रूम बुक किया था। हालांकि, इसे यौन संबंध बनाने के लिए पीड़िता की तरफ से सहमति देना नहीं माना जा सकता…। अगर यह मान भी लिया जाए कि पीड़िता आरोपी के साथ रूम में गई थी, लेकिन इसे किसी भी तरह से यौन संबंध के लिए उसकी सहमति नहीं माना जा सकता है।’ क्या था मामला मार्च 2020 में आरोपी गुलशेर अहमद ने कथित तौर पर विदेश में नौकरी की पेशकश की थी। कथित तौर पर उसने मीटिंग के बहाने से महिला को होटल के कमरे में बुला लिया। खास बात है कि महिला और पुरुष दोनों ने मिलकर रूम बुक किया था। बाद में पीड़िता ने आरोप लगाए कि कमरे में जाते ही आरोपी ने उसे मारने की धमकी दी और फिर रेप कर दिया। बार एंड बेंच के अनुसार, पीड़िता का कहना है कि आरोपी के बाथरूम जाने पर वह रूम से भाग गई और पुलिस को खबर कर दी। इसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। मामला जब ट्रायल कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने यह कहकर आरोपी को जाने दिया कि चूंकि महिला इच्छा से कमरे में गई थी, तो उसने सेक्स के लिए सहमति दे दी थी। अब हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज ने गलती की है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज ने पीड़िता के बगैर किसी विरोध के कमरे में जाने और रूम में जो हुआ, उसकी सहमति देने के दो अलग अलग पहलुओं को मिला दिया। कोर्ट ने यह भी पाया कि होटल के कर्मचारियों ने भी पूरी बात बताई है, जो पीड़िता के बयान से मिलती है। कोर्ट ने आरोपी के उस दावे को भी खारिज कर दिया कि दोनों ने साथ लंच किया और महिला को रूम में जाने में भी कोई परेशानी नहीं थी तो इसका मतलब है कि वह सेक्स के लिए सहमत थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी के खिलाफ केस जारी रखा है।

नगर निगम चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त, इतनी देर में करवाने होंगे इलेक्शन

जालंधर कुछ सप्ताह पहले पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को निर्देश जारी किए थे कि 15 दिन के भीतर निगम चुनाव का शेड्यूल जारी किया जाए। राज्य सरकार ने यह आदेश नहीं माने और सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में चली गई जहां आज इस याचिका पर सुनवाई हुई। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को निरस्त करते हुए आदेश जारी किए हैं कि पंजाब सरकार 2 सप्ताह के भीतर निगम चुनाव संबंधी शेड्यूल जारी करे और अगले 8 सप्ताह के भीतर यह निगम चुनाव करवाए जाएं। एक प्रकार से पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से झटका लगा है क्योंकि ‘आप’ सरकार फरवरी में होने जा रहे दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद निगम चुनाव करवाने का इरादा किए बैठी थी। अब भी पंजाब में निगम चुनाव जनवरी में होते हैं या दिल्ली विधानसभा के चुनाव के बाद, यह देखने वाली बात होगी।

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