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बांधवगढ़ में घास खाते बाघ को देखकर हैरान हुए लोग, Viral हुआ Video

उमरिया मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व (Bandhavgarh Tiger Reserve) में पर्यटक उस और वक्त टाइगर सफारी के दौरान रोमांचित हो उठे. जब एक बाघ को घास खाते हुए देखा गया. ये नजारा देख सफारी का लुत्फ उठा रहे पर्यटकों ने कहा- अरे वाह…ये कैसे..? इसके बाद पर्यटकों के समूह से एक पर्यटक ने अपना कैमरा ऑन किया. इस सुंदर दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया. खितौली जोन में दिखा है ये बाघ दरअसल, वीडियो में बाघ घास खाते हुए दिखाई दे रहा है. अब ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. यह वीडियो (Video Viral) उस समय का है, जब पर्यटक बांधवगढ़ के खितौली जोन में सफारी का लुत्फ उठा रहे थे. एक मिनट 40 सेकंड के इस वायरल हो रहे वीडियो में बाघ बड़े आराम से घास खाते हुए दिख रहा है. हालांकि, बाघ का घास खाने का यह मामला कोई असामान्य विषय नहीं है, कुत्ते, बिल्ली, बाघ समेत ऐसे कई जानवर होते हैं, जो कभी-कभी घास खाते हैं. वो ऐसा तब करते हैं जब उन्हें पाचन क्रिया में परेशानी होती है. डायरेक्टर अनुपम सहाय से ने  वीडियो की पुष्टि की  उमरिया के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पदस्थ डायरेक्टर अनुपम सहाय से बात हुई थी तो उन्होंने इस वीडियो की पुष्टि की है और बाघ को हरी घास खाने पर कहा कि जब उन्हें पाचन क्रिया में समस्या होती है तो घास खाते हैं. बाघ भी खाता है घास वायरल हो रहा वीडियो पीलीभीत के टाइगर रिज़र्व का है. यहां पर आपको एक टाइगर दिखाई दे रहा है, ज सड़क के किनारे टहल रहा है. उसके ठीक सामने एक मरा हुआ अजगर पड़ा हुआ है. वो उसके पास से निकलकर सामने मौजूद घास खाने लगता है. उसे इस तरह से घास चलते हुए देखकर आप भी आश्चर्य में पड़ जाएंगे. आखिर बाघ खास कैसे खा सकता है, जबकि वो विशुद्ध तौर पर मांसाहारी जानवर है. अजगर ने कर दिया बुरा हाल इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर lucknowfeed नाम के अकाउंट से शेयर किया गया है. इसके साथ जानकारी दी गई है कि पीलीभीत टाइगर रिज़र्व के इस बाघ ने अजगर खा लिया था, जिसके बाद उसकी हालत खराब हो गई. उल्टी हुई लेकिन फिर भी ठीक नहीं लग रहा था. वीडियो पर कमेंट करते हुए कुछ लोगों ने बताया कि बाघ और कुत्ते भी कई बार पेट ठीक नहीं होने पर घास खाते हैं. वहीं कुछ यूज़र्स ने आश्चर्य जताया कि ये घास कैसे खा रहा है. घास चबाने से मिलता है राहत और पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि घास में फाइबर और कुछ विशेष पोषक तत्व होते हैं जो शेर और बाघ जैसे जानवरों के पाचन को बेहतर बनाते हैं। घास चबाना केवल एक आदत नहीं बल्कि एक स्वास्थ्य लाभकारी प्रक्रिया है। यह आदत उनके पेट के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए लाभकारी है। तनाव कम करने का प्राकृतिक तरीका विशेषज्ञों का मानना है कि घास चबाने का यह व्यवहार जानवरों को मानसिक राहत भी देता है। शेर और बाघ जैसे जानवरों का जीवन भी कई बार तनावपूर्ण हो सकता है खासकर जब वे अपने इलाके की सुरक्षा कर रहे होते हैं या अपने भोजन की तलाश में होते हैं। ऐसे में घास चबाना उनके लिए एक स्वाभाविक और कारगर तरीका है जिससे वे खुद को संतुलित और स्वस्थ महसूस करते हैं। बाघिन ने बहन के 3 शावकों को 4 साल पाला सीधी जिले के संजय दुबरी टाइगर रिजर्व की मौसी बाघिन T28 ने करीब चार साल बाद अपने पांच शावकों को खुद से अलग कर दिया है। 19 मई को इसके शावक दुबरी रेंज में अलग-अलग नजर आए। वैसे तो बाघ वंश की ये सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन T28 के मामले में ये बिल्कुल अलग है।

बुरहानपुर के शाहपुर वन परिक्षेत्र में मिला गर्भवती बाघिन का शव, पेट में तीन शावकों की हुई पुष्टि.

बुरहानपुर  जिले के शाहपुर वन परिक्षेत्र के चौंडी बीट क्रमांक 428 में गर्भवती बाघिन मृत अवस्था में मिली है. दरअसल बाघिन के पेट में 3 शावक पल रहे थे, पेट में पल रहे तीन शावकों की भी जान चली गई है. बाघिन का शव, 2-3 दिन पुराना बताया गया, फॉरेंसिक जांच में बाघिन के गर्भवती होने की पुष्टि हुई है. 10 दिन में होने वाला था प्रसव जानकारों के मुताबिक, बाघिन का प्रसव 7-10 दिन में संभावित था. डीएफओ के मुताबिक, बाघिन की उम्र ढाई से तीन साल है. फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद मौत के कारणों का खुलासा होगा. बता दें कि जिले में 1 साल में 3 बाघों की मौत हो चुकी हैं. ऐसे में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे है. जंगल में मिला बाघिन का शव बता दें कि, 2 मई की रात्रि को चौंडी के जंगल में मादा बाघ की मौत का मामला सामने आया है. सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई, जिसके बाद नई दिल्ली से एनटीसीए और भोपाल से मुख्य वन्य जीव अभिरक्षक की टीम भी मौके पर पहुंची. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर घटना स्थल निरीक्षण किया गया, आसपास से सेंपल जुटाए गए, साथ ही डॉग स्क्वाड की सहायता से घटना स्थल एवं उसके आस-पास छानबीन की कार्रवाई की गई है. डीएफओ विद्या भूषण सिंह ने बताया कि, ”बाघिन के शव का पोस्टमार्टम कराया गया, पोस्टमार्टम टीम में एनटीसीए के प्रतिनिधि डॉ प्रशांत देशमुख, पोस्टमार्टम विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. हमजा नदीम, वन्यजीव चिकित्सक डॉ हीरासिंह भंवर, पशु चिकित्सक डॉ अंजू अचाले, डॉ रविन्द्र मौजूद थे.” बाघिन के सभी अंग सुरक्षित डीएफओ ने कहा कि, ”पोस्टमार्टम के दौरान बाघिन के शरीर के सभी अंग सुरक्षित पाए गए हैं. बाघिन का अंतिम संस्कार खंडवा सीसीएफ रमेश गणावा, डीएफओ विद्या भूषण सिंह, एसडीओ अजय सागर, तहसीलदार गोविंद सिंह रावत सहित अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में किया गया.”

सूअरों से फलस की रक्षा के लिए खेत में गया था किसान, बाघ का बना शिकार

बालाघाट  वन परिक्षेत्र कटंगी के गोरेघाट सर्किल में एक किसान अपने खेत में बनी झोपडी में बैठा था। इसी दौरान शनिवार की अलसुबह साढ़े चार से पांच बजे के बीच बाघ ने किसान को अपना शिकार बना लिया। इस घटना के बाद से किसानों और पूरे गांव में दहशत बनी है। जानकारी के अनुसार, गांव गोरेघाट जंगल से लगा है। इस गांव के किसानों ने खेतों में रबी की फसल लगाई है। फसल को खाने जंगली सूअर रोजाना खेत में आ जाते हैं। इस वजह से किसान उन्हें भागने के लिए फटाखे फोड़ते है। पटाखे फोड़कर झोपड़ी में जाकर बैठ गया था ग्राम गोरेघाट निवासी किसान प्रकाश पिता तुकाराम पाने (58 वर्ष) ने रात तीन बजे जंगली सूअर को भागने के लिए पटाखे फोड़े और खेत की झोपड़ी में जाकर बैठ गया। सुबह होने पर वो घर नहीं पहुंचा, तो उसका पुत्र खेत में झोपडी तरफ जाकर देखा, लेकिन नहीं दिखाई दिया। आवाज लगाई, पर पता नहीं चलने पर झोपडी के आगे एक बंधी में बाघ उसके पिता को खाते दिखा। बाघ को देख वो उल्टे पर गांव में लौट आया और परिजन सहित आसपास में जानकारी दी। तभी सभी लोग मौके पर गए और बाघ को भगाने के लिए शोर मचाने लगे। बाघ ने किसान के शरीर के आधे पैर को खा लिया। जिसकी सूचना वन विभाग को दी गई, लेकिन वन विभाग 11 बजे तक मौके पर नहीं पहुंच पाया। 15 दिन से बाघ का मूवमेंट किसानों में बताया कि गोरेघाट से समीप में जंगल लगा है। बाघ 15 दिनों से खेत में विचरण कर रहा है। इसके एक सप्ताह पहले भी खेत में बैठे एक किसान ने इस बाघ को नजदीक से देखा था। उस समय गनीमत रही कि बाघ सोया था, नहीं तो बड़ी घटना हो सकती थी। बताया गया कि इतने दिनों में ग्राम गोरेघाट में बाघ ने पांच बकरियों का शिकार किया है। वन विभाग को मिली सूचना     गोरेघाट में एक किसान का बाघ ने शिकार किया है। इसकी सूचना मिलने पर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हमारा दल मौके पर पहुंच रहा है। मौके पहुंचने के बाद आगे की जांच की जाएगी। – बाबूलाल चढ़ार, वन परिक्षेत्र अधिकारी कटंगी।  

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघ के हमले में एक महिला की मौत, वन विभाग ने ग्रामीण जंगल के ज्यादा अंदर ना जाएं

उमरिया  बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पंपदा रेंज अंतर्गत कुशवाहा कोठिया गांव के पास बाघ के हमले में एक महिला की मौत हो गई है। सुबह 9 हुई इस घटना के बाद गांव के लोग आक्रोशित हो गए हैं। बताया गया है कि बाघ ने उस समय महिला पर हमला किया जब वह महुआ बीन रही थी। बाघ के हमले में मरने वाली महिला का नाम रानी सिंह पति ओमप्रकाश सिंह गोड़ उम्र 27 साल निवासी कुशमाहा कोठिया बताया गया है। घटना के समय महिला घर के बगल में सुबह 9 बजे महुआ बीन रही थी। इसी दौरान अचानक बाघ ने हमला कर दिया जिससे महिला की मौत हो गई। गांव के नजदीक बाघ बताया गया है कि जंगल के बीच बसे इस गांव के काफी नजदीक बाघ घूम रहा है। बाघ झाड़ियां में छिपा हुआ था और उसकी नजर आसपास थी। जब रानी महुआ बीनने के लिए झुकी तो बाघ ने उसे भी जानवर समझ लिया और उसके ऊपर हमला कर दिया। बाघ ने महिला की गर्दन दबोच ली, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई। महिला को चीखने चिल्लाने का भी अवसर नहीं मिल पाया। लेकिन आसपास मौजूद लोगों ने महिला पर बाघ को हमला करते हुए देख लिया था, जिससे उन लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। परिणाम स्वरूप बाघ महिला को मारने के बाद वहां से भाग गया। ग्रामीणों में दहशत गांव के इतने नजदीक बाघ के होने की वजह से ग्रामीणों में दहशत बनी हुई है। घटना के बाद आक्रोशित लोगों ने वन विभाग के अधिकारियों से सुरक्षा की व्यवस्था करने की मांग की है। गांव के लोगों का कहना है कि बाघ को यहां से हटाया जाए अन्यथा वह फिर किसी पर हमला कर सकता है। गांव के लोगों का कहना है कि इन दिनों महुआ गिर रहा है और ग्रामीण महुआ बीनने जाएंगे ही। क्योंकि वे वनोपज पर वह निर्भर हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाया है कि वह जंगल के ज्यादा अंदर ना जाएं। साथ ही वन विभाग के अधिकारियों ने सुरक्षा के लिए बाघ को जंगल के अंदर हांकने का आश्वासन भी दिया है।

गर्मी में पानी की कमी से बाघों के बीच वर्चस्व की जंग, जंगल की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा

उमरिया मध्य प्रदेश के जंगलों में गर्मी के मौसम के दौरान बाघों के बीच वर्चस्व की जंग और तेज हो जाती है। इस बार ऐसा न होने पाए, इसकी तैयारी में वन प्रबंधन जुटा हुआ है। इसके लिए जंगलों में समर अलर्ट घोषित किया गया है और जंगल की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मौसम में परिवर्तन के साथ न सिर्फ जंगल के स्वरूप में परिवर्तन होने लगता है, बल्कि वन्य प्राणियों के विचरण में भी परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि उनकी सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता होती है। पानी का संकट यूं तो जंगलों में पानी के संकट को दूर करने के लिए अब सोलर पावर पंप का उपयोग किया जाने लगा है। प्रदेश के छह टाइगर रिजर्व में करीब साढ़े तीन सौ सोलर पावर पंप के माध्यम से वाटर होल भरे जाते हैं। जबकि प्राकृतिक जल स्रोतों को भी संरिक्षत किया जाता है। इसके बाद भी पानी की कमी कहीं न कहीं गर्मी के दिनों में उत्पन्न हो जाती है और ज्यादा उम्र के बाघ पानी की तलाश में अपना क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इस दौरान उनका दूसरे बाघों से आमना-सामना हो जाता है। जंगल की आग महुआ का सीजन होने के कारण जंगल के बाहरी हिस्सों में गांवों के नजदीक अक्सर लोग आग लगा देते हैं। आग के कारण बफर जोन में सक्रिय बूढ़े और कमजोर बाघ उस स्थान को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। घने जंगल के अंदर पहुंचते ही फिर उनका सामना जवान और ताकतवर बाघों से होता है और इस तरह वर्चस्व की जंग शुरू हो जाती है। बांधवगढ़ में जंग बांधवगढ़ के खितौली रेंज में इन दिनों डी-वन बाघ सक्रिय हो गया है जो दूसरे बाघों को इस तरफ टिकने नहीं दे रहा है। छोटा भीम के घायल होने के बाद जब से उसे भोपाल के वन विहार शिफ्ट किया गया है, तबसे उसके संपूर्ण क्षेत्र में डी-वन का कब्जा हो चुका है। डी-वन इन दिनों अपनी प्राइम ऐज में है। ऐसे में बाघ लगातार अपनी टेरिटरी बढ़ाता है। हाल ही में इसी बाघ ने बाघिन तारा के दो शावकों को मौत के घाट उतार दिया था। यहां का एक दूसरा बाघ पुजारी भी अब लगभग दस साल का हो चुका है। स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में वर्चस्व की जंग तेज हो सकती है। रक्षा के लिए ये इंतजाम     जंगलों में गश्त बढ़ाई गई और सुरक्षा श्रमिकों की संख्या भी।     पानी की कमी नहीं होने पाए इसके इंतजाम पर रख रहे हैं नजर।     जीरो फायर मिशन के तहत जंगल में आग नहीं लगे इसके लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है।     जिन क्षेत्रों में बाघों की आपसी दूरी सामान्य से कम है वहां हाथी दल के माध्यम से नजर रखी जा रही है।  

शिवपुरी : माधव टाइगर रिजर्व में जल्द आएगा एक और टाइगर, ‘मादा टाइगर के लिए यह जंगल नया’

शिवपुरी  मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के माधव टाइगर रिजर्व में मादा बाघ को छोड़ा गया है। जब से वह पिंजरे से छूटी है तभी से वह जंगल में घूम रही है। पार्क सूत्रों ने बताया है कि मादा टाइगर पिछले 24 घंटे में जंगल के 15 किमी के क्षेत्र में भूरा खो से लेकर अन्य स्थानों पर घूमती रही। पार्क प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अभी मादा टाइगर के लिए यह जंगल नया है। वह पहले पूरे क्षेत्र को देखेगी और परखेगी। पार्क प्रबंधन ने इस नई बाघिन को एमटी-4 नाम दिया है। इसे पन्ना रिजर्व से लाया गया है। जंगल को समझ रही है बाघिन पार्क के अधिकारियों का कहना है कि अभी मादा टाईगर को जिस क्षेत्र में छोड़ा गया था। वह अभी उसी क्षेत्र में विचरण कर रही रही है। धीरे-धीरे वह जंगल को समझने के बाद अपना स्थायी आशियाना बनाएगी। अधिकारियों के अनुसार बाघिन किसी पानी किनारे वाली जगह पर आशियाना बनाएगी। बताया जा रहा है कि मादा टाईगर को शिवपुरी के माधव टाइगर रिजर्व के जंगल में छोड़ा गया। पहले तो वह कुछ देर तक टावर के आसपास रही। इसके बाद फिर उसने जंगल में इधर से उधर घूमना फिरना शुरू किया। सूत्रों की माने तो मादा टाइगर की लोकेशन मंगलवार सुबह भूरा खो के पास मिली। माधव टाईगर रिजर्व में जल्द आएगा एक और बाघ पार्क अधिकारियों का कहना है कि मादा टाइगर के बाद इसी सेलिंग क्लब वाले क्षेत्र में एक नर टाइगर भी छोड़ा जाना है। इसको लेकर पेंच टाइगर रिजर्व प्रबंधन से बात चल रही है। जैसे ही वह नर टाइगर को पकड़ लेंगे तो जल्द ही उसे माधव टाइगर रिजर्व में सेलिंग क्लब के पास छोड़ दिया जाएगा। फिर पार्क में बाघों की संख्या 6 से बढ़कर 7 हो जाएगी। इसके बाद बाघों की संख्या समय के साथ बढ़ेगी। जल्द आएगा एक और बाघ पार्क अधिकारियों का कहना है कि मादा टाइगर के बाद इसी सैलिंग क्लब वाले क्षेत्र में एक नर टाइगर भी छोड़ा जाना है। इसको लेकर पेंच टाइगर रिजर्व प्रबंधन से बात चल रही है। जैसे ही वह नर टाइगर को पकड़ लेंगे तो जल्द ही उसे माधव टाइगर रिजर्व में सैलिंग क्लब के पास छोड़ दिया जाएगा। फिर पार्क में बाघों की संख्या 6 से बढ़कर 7 हो जाएगी। इसके बाद बाघों की संख्या समय के साथ बढ़ेगी।  

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी का 9वें टाइगर रिजर्व के लिये माना आभार

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 10 मार्च को मध्यप्रदेश के 9वें टाइगर रिजर्व का शुभारंभ करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव इस ऐतिहासिक अवसर पर एक बाघ एवं एक बाघिन को टाइगर रिजर्व में छोड़ेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव टाइगर रिजर्व की 13 किलोमीटर लम्बी पत्थर की सेफ्टी वॉल का भी उद्घाटन करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का माधव राष्ट्रीय उद्यान को देश के 58वें और मध्यप्रदेश के 9वें टाइगर रिजर्व की सौगात प्रदान करने पर आभार जताया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि टाइगर रिजर्व बनने से वन्य-जीव संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और पर्यटन को नई ऊँचाई मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह मध्यप्रदेश को वन्य-जीव संरक्षण क्षेत्र में मिली एक बड़ी उपलब्धि है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि माधव राष्ट्रीय उद्यान ऐतिहासिक और प्राकृतिक दृष्टि से बेहद समृद्ध है। टाइगर रिजर्व घोषित होने से वन्य-जीवों के संरक्षण के साझा प्रयासों को और अधिक मजबूती मिलेगी। शिवपुरी स्थित माधव नेशनल पार्क अब प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व बन गया है। देश के 58वें और प्रदेश के 9वें टाइगर रिजर्व पर जताई प्रसन्नता प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि वन्य जीव प्रेमियों के लिए एक आश्चर्यजनक समाचार प्राप्त हुआ है। भारत वन्य जीव विविधता और वन्यजीवों के संरक्षण करने वाली संस्कृति से धन्य है। हम हमेशा हमारे वन्य प्राणियों की रक्षा करने और एक सतत् विकासशील ग्रह में जीवन कायम रखने में योगदान देने में सबसे आगे रहेंगे। 375 से अधिक वर्ग कि.मी. में फैला है टाइगर रिजर्व माधव टाइगर रिजर्व का आरक्षित वन क्षेत्र 32429.52 हेक्टेयर, संरक्षित वन क्षेत्र 2422.00 हेक्टेयर और राजस्व क्षेत्र 2671.824 हेक्टेयर है। इस प्रकार कुल क्षेत्र 37523.344 हेक्टेयर अथवा 375.233 वर्ग किलोमीटर है। टाइगर रिजर्व में अब बाघों की संख्या 7 हो जायेगी टाइगर रिजर्व में कुल बाघों की संख्या 5 है। इसमें 2 नर और 3 मादा शामिल हैं। बाघिन ने 2 शावकों को जन्म दिया है, जिनकी उम्र लगभग 8 से 9 माह है। सोमवार 10 मार्च को दो बाघ और छोड़े जाने से टाइगर रिजर्व में कुल बाघों की संख्या 7 हो जायेगी।  

माधव नेशनल पार्क मध्यप्रदेश का 9वाँ टाइगर रिजर्व घोषित, आदेश जारी

शिवपुरी माधव नेशनल पार्क शिवपुरी को मध्यप्रदेश का 9वाँ टाइगर रिजर्व घोषित किये जाने के आदेश राज्य शासन द्वारा 7 मार्च, 2025 को जारी कर दिये गये हैं। माधव नेशनल पार्क की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी। यह प्रदेश के पहले अधिसूचित होने वाले नेशनल पार्क में से एक है। माधव टाइगर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 1650 वर्ग किलोमीटर है। इसमें कोर एरिया का क्षेत्रफल 374 वर्ग किलोमीटर है और बफर एरिया का क्षेत्रफल 1276 वर्ग किलोमीटर है। माधव टाइगर रिजर्व घोषित होने से प्रदेश के वाइल्ड लाइफ टूरिज्म को और अधिक बढ़ावा मिलेगा। माधव राष्ट्रीय उद्यान में वर्ष 2023 को बाघ पुनर्स्थापना के लिये 3 बाघ, जिसमें 2 मादा एक नर अन्य टाइगर रिजर्व से लाये गये थे। नर बाघ सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से एवं मादा बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व और बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व से लाये गये थे। बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व से लायी गयी मादा ने 2 शावकों को जन्म दिया है, जिनकी उम्र लगभग 8 से 9 माह है। एनटीसीए भारत सरकार द्वारा 2 अतिरिक्त बाघ एक नर एक मादा लाने की स्वीकृति दी गयी है, जो 10 मार्च, 2025 को माधव टाइगर रिजर्व में छोड़े जायेंगे। इस प्रकार माधव टाइगर रिजर्व में कुल बाघों की संख्या में 5 बाघ, जिसमें 2 नर और 3 मादा शामिल हैं और 2 शावक, इस प्रकार कुल बाघों की संख्या 7 हो जायेगी। माधव टाइगर रिजर्व बनने से सम्पूर्ण क्षेत्र में वन्य-जीव एवं बाघों का संरक्षण बेहतर हो सकेगा। शिवपुरी स्थित माधव टाइगर रिजर्व ग्वालियर के बिलकुल करीब होने से पर्यटन के लिहाज से आदर्श लोकेशन है। माधव टाइगर रिजर्व में बाघ के अलावा तेंदुए, भेडिया, सियार, लोमड़ी, जगंली कुत्ता, जंगली सुअर, साही, अजगर, चिन्कारा और चौसिंगा आदि जानवर पाये जाते हैं। यहाँ कई प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से पीले पैर वाला बटेर, बाज आदि शामिल हैं। माधव टाइगर रिजर्व में कई प्राचीन मंदिर और स्मारक हैं। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। पर्यटन के क्षेत्र में वन्य-जीव सफारी और पिकनिक स्पॉट शामिल हैं। माधव टाइगर रिजर्व एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है, जो वन्य-प्रेमियों, प्रकृति-प्रेमियों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति रुचि रखने वाले लोगों के लिये एक आदर्श स्थल है। माधव टाइगर रिजर्व, पन्ना टाइगर रिजर्व एवं रणथम्बोर टाइगर रिजर्व के बीच स्थित है। इन दोनों के बीच यह टाइगर कॉरिडोर को और अधिक सुदृढ़ करता है। माधव टाइगर रिजर्व बनने एवं इसमें टाइगर की पुनर्स्थापना होने से यहाँ के सम्पूर्ण लैण्ड स्केप में बाघों की संख्या में सुधार होगा एवं जेनेटिक डॉयवर्सिटी बढ़ेगी। माधव टाइगर रिजर्व बनने से सम्पूर्ण क्षेत्र में पर्यटन को भरपूर बढ़ावा मिलेगा। कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीता पुनर्स्थापना से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है। माधव टाइगर रिजर्व कूनो राष्ट्रीय उद्यान से भी जुड़ा हुआ है। माधव टाइगर रिजर्व में बाघों की उपस्थिति एवं कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की मौजूदगी से सम्पूर्ण ग्वालियर-शिवपुरी-श्योपुर में पर्यटन बड़ी तेजी से बढ़ेगा, जिससे स्थानीय लोगों के लिये रोजगार के अवसर सृजित होंगे और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।    

गुजरात में दो साल में 286 शेरों और 456 तेंदुओं की हो गई मौत, राज्य में 674 एशियाई शेर

अहमदाबाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अंबानी की महत्वाकांक्षी परियोजना वनतारा का उद्घाटन किया और इसका दौरा किया। यहां पीएम मोदी वन जीवों के साथ तस्वीर भी खिचाते और शावक को दूध पिलाते नजर आए। लेकिन ठीक उसी दिन गुजरात विधानसभा में एक ऐसी रिपोर्ट पेश की गई जो जिसमें बताया गया कि राज्य में बीते दो साल में 286 शेरों की मौत हुई है। दरअसल, राज्य के वन मंत्री मुलुभाई बेरा ने मंगलवार को विधानसभा को यह जानकारी दी कि गुजरात में गत दो साल में कम से कम 286 शेरों की मौत हो गई, जिनमें 143 शावक भी शामिल हैं। इनमें से 58 शेरों की मौत अप्राकृतिक कारणों से हुईं।। बेरा ने प्रश्नकाल के दौरान वरिष्ठ कांग्रेस विधायक शैलेश परमार के एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि राज्य में दो वर्षों – 2023 और 2024 – में 140 शावकों सहित 456 तेंदुओं की भी मौत हुई है। दो साल में 286 शेरों की मौत राज्य विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले दो सालों में राज्य में 143 शावकों सहित 286 एशियाई शेरों की मौत हुई है। इनमें से 58 अप्राकृतिक मौतें थीं। इसके अलावा, इसी अवधि के दौरान 456 तेंदुए और तेंदुए के शावकों की मौत की सूचना मिली। 2023 में 58 वयस्क शेर और 63 शावकों की मौत हुई, जबकि 2024 में मृत्यु दर बढ़कर 85 वयस्क शेर और 80 शावक हो गई। तेंदुओं की मौतों में सरकार ने कहा कि 2023 में 71 शावकों सहित 225 तेंदुए मारे गए, जबकि 2024 में मृत्यु दर बढ़कर 231 हो गई, जिसमें 69 शावक शामिल थे। कुल मिलाकर, 153 तेंदुए की मौतें अप्राकृतिक थीं। विशेषज्ञ का चौंकाने वाला खुलासा टीओआई से बातचीत में एक एक वन्यजीव विशेषज्ञ ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आमतौर पर जब बड़ी बिल्लियों की बात आती है तो शावकों की मृत्यु की संख्या वयस्कों की मृत्यु से अधिक होती है। ऐसा नरभक्षण के कारण होता है। यहां तक कि शावकों के पहले तीन वर्षों तक जीवित रहने की संभावना बहुत कम है। यह लगभग 40 फीसदी है। चिंता का एक और मामला यह है कि वयस्क शेरों की मृत्यु 2023 से 2024 में 46 फीसदी बढ़ गई। विशेषज्ञ ने कहा कि इस मामले की जांच की जानी चाहिए क्योंकि इसका एक कारण किसी बीमारी का प्रकोप हो सकता है। उन्होंने कहा कि शावकों की उच्च मृत्यु दर आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि गिर में आमतौर पर एक बार में तीन शावक होते हैं। सरकार ने उठाए ये कदम अधिकारी ने कहा कि बड़ी बिल्लियों के जीव विज्ञानियों के अनुसार शेरों की आबादी में 20% तक की मृत्यु दर आमतौर पर स्वीकार्य है, लेकिन अगर यह इससे अधिक हो जाती है, तो यह चिंता का विषय है। सरकार ने अपने जवाब में कहा कि शेरों और अन्य जंगली जानवरों को बीमारी या दुर्घटना से संबंधित मामलों में तत्काल चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के लिए एक पशु चिकित्सा अधिकारी नियुक्त किया गया है, और एक समर्पित एम्बुलेंस सेवा भी मौजूद है। सरकार ने कहा कि अभयारण्य क्षेत्र से गुजरने वाली सार्वजनिक सड़कों पर स्पीडब्रेकर और साइनबोर्ड लगाए गए हैं। नियमित रूप से गश्त भी की जाती है, और अधिकारी वाहनों, हथियारों और वॉकी-टॉकी से लैस होते हैं। सरकार ने कहा कि चौकियों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और सासन में एक हाई-टेक निगरानी इकाई स्थापित की गई है। उन्होंने बताया कि 286 शेरों की मौत में से 121 की मौत 2023 में तथा 165 की मौत 2024 में हुई। गुजरात एशियाई शेरों का दुनिया में अंतिक प्राकृतिक आवास है। जून 2020 में की गई आखिरी गणना के अनुसार, राज्य में 674 एशियाई शेर हैं, जिनमें से मुख्य रूप से गिर वन्यजीव अभयारण्य में हैं। मंत्री ने चल रहे बजट सत्र के दौरान विधानसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि 2023 में 225 और 2024 में 231 तेंदुओं की मौत हुई। उन्होंने बताया कि 228 शेरों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई जबकि 58 मौतें अप्राकृतिक कारणों से हुईं, जैसे वाहनों की चपेट में आना या खुले कुओं में डूब जाना। बेरा ने बताया कि तेंदुओं में 303 मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं, जबकि 153 मौतें अप्राकृतिक कारणों से हुईं। वन मंत्री ने सदन को बताया कि राज्य सरकार ने शेरों की अप्राकृतिक मौतों को रोकने के लिए पशु चिकित्सकों की नियुक्ति और शेरों तथा अन्य जंगली जानवरों के समय पर उपचार के लिए एम्बुलेंस सेवा शुरू करने जैसे विभिन्न कदम उठाए हैं।

मध्यप्रदेश वन्यजीव संरक्षण में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा, माधव टाइगर अभयारण्य जल्द ही राज्य का 9वां टाइगर रिज़र्व बनेगा

शिवपुरी चंबल रीजन के शिवपुरी में मध्य प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व बनने जा रहा है. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि हमारे राज्य में बनने जा रहे एक नए टाइगर रिजर्व के लिए औपचारिकताएं भी लगभग पूरी हो चुकी हैं. CM यादव ने अपने एक बयान में कहा, मध्यप्रदेश वन्यजीव संरक्षण में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है. माधव टाइगर अभयारण्य जल्द ही राज्य का 9वां टाइगर रिज़र्व बनेगा, जिससे चंबल अंचल में वन्यजीवों की समृद्धि बढ़ेगी. बुधवार को कूनो में 5 और चीते छोड़े गए हैं. यह गर्व की बात है कि पहले छोड़े गए चीते न केवल शिकार कर रहे हैं, बल्कि कुशलता से जंगल में विचरण कर रहे हैं. प्रकृति और संतुलन की यह अनमोल झलक हमारे प्रदेश में दिख रही है. बता दें कि पिछले साल राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की तकनीकी समिति ने शिवपुरी जिले के माधव राष्ट्रीय उद्यान को मध्य प्रदेश के 9वें टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. एनटीसीए की तकनीकी समिति ने प्रस्तावित बाघ अभयारण्य का कोर क्षेत्र 375 वर्ग किलोमीटर, बफर क्षेत्र 1276 वर्ग किलोमीटर और कुल क्षेत्रफल 1751 वर्ग किलोमीटर होगा. समिति ने इस राष्ट्रीय उद्यान में एक नर और एक मादा बाघ को छोड़ने की भी मंजूरी दी है. मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को माधव नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व घोषित करने के लिए प्रस्ताव भेजा था. मध्यप्रदेश में हो जाएंगे 9 अभ्यारण्य माधव टाइगर रिजर्व के बाद मध्यप्रदेश में टाइगर रिवर्ज की संख्या 9 हो जाएगी. देश में लगभग 60 टाइगर रिजर्व हैं, इनमें से 9 मध्यप्रदेश में हैं. देश में सबसे ज्यादा टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश में हैं. पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ एल कृष्णमूर्ति बताते हैं कि, ”इस बाघ अभ्यारण्य का कोर क्षेत्र 375 वर्ग किलोमीटर का और बफर जोन 1276 वर्ग किलोमीटर और कुल क्षेत्रफल 1751 वर्म किलोमीटर का होगा.” 1958 में हुई माधव राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना माधव राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1958 में मध्यप्रदेश राज्य की स्थापना के बाद ही हो गई थी. यह क्षेत्र कभी ग्वालियर के महाराजाओं और मुगल बादशाहों का शिकारगाह हुआ करता था. ग्वालियर राजघराने द्वारा साल 1918 में मनिहार नदी पर बांध का निर्माण कर माधव तालाब बनाया गया था. यह इस पार्क का सबसे बड़ा जल क्षेत्र है. लाया जाएगा बाघ का जोड़ा माधव नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व बनने के बाद इस क्षेत्र में पर्यटन के मामले में काफी संभावनाएं बढ़ जाएंगी. इससे शिवपुरी क्षेत्र को विश्व स्तर पर पहचान मिलेगी. उधर माधव टाइगर रिजर्व में बाधों की संख्या बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. यहां जल्द ही एक बाघ का जोड़ा दिया जाएगा. इसमें एक नर और मादा होगा. अभी माधव टाइगर रिजर्व में तीन टाइगर और दो शावक हैं. वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, ”माधव टाइगर रिजर्व प्राकृतिक रूप से काफी संपन्न क्षेत्र हैं और यह क्षेत्र टाइगर के लिए प्राकृतिक आवास रहा है. इसलिए आने वाले समय में यहां टाइगर की संख्या में अच्छी बढ़ोत्तरी होगी.” कैसा है ये टाइगर रिजर्व? एनटीसीए की तकनीकी समिति ने प्रस्ताव दिया है कि बाघ अभयारण्य का कोर एरिया 375 वर्ग किलोमीटर, बफर एरिया 1276 वर्ग किलोमीटर तथा कुल क्षेत्रफल 1751 वर्ग किलोमीटर होगा. समिति ने राष्ट्रीय उद्यान में एक नर और एक मादा बाघ छोड़ने की भी स्वीकृति दी है. मुख्यमंत्री डॉ यादव के निर्देश पर माधव राष्ट्रीय उद्यान को बाघ अभयारण्य घोषित करने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को प्रस्ताव भेजा गया था.  

मध्यप्रदेश ने सबसे पहले लागू किया वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम

भोपाल मध्यप्रदेश, देश में वन और वृक्ष आवरण में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की संस्कृति वाला हमारा देश सम्पूर्ण जीव-जगत को भी अपना कुटुम्ब ही मानता है। हम सदियों से वनों, पहाड़ों और नदियों को पूजते चले आ रहे हैं। पूर्वजों की इस परंपरा को सहेजे जाने के लिए जैव-विविधता का संरक्षण आवश्यक है। आने वाली पीढ़ियों के लिये वन जीवन को सहेजकर रखना हमारी जिम्मेदारी है। मध्यप्रदेश कुल वन और वृक्ष आवरण 85 हजार 724 वर्ग किलोमीटर और वनावरण 77.073 वर्ग किलोमीटर के साथ देश का अग्रणी राज्य है। यहां वनों को प्रकृति ने अकूत सम्पदा का वरदान देकर समृद्ध किया है। प्रदेश में 30.72 प्रतिशत वन क्षेत्र है जो देश के कुल वन क्षेत्र का 12.30 प्रतिशत है। यहां कुल वन क्षेत्र 94 हजार 689 वर्ग किलोमीटर (94 लाख 68 हजार 900 हेक्टेयर) है। प्रदेश में 24 अभयारण्य, 11 नेशनल पार्क और 8 टाईगर रिजर्व हैं, जिसमें कान्हा, पेंच, बाँधवगढ़, पन्ना, सतपुड़ा और संजय डुबरी टाईगर रिजर्व बाघों के संरक्षण में लैंडमार्क बन गए हैं। बाघों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिये उठाए जा रहे महत्वपूर्ण कदम मध्यप्रदेश में बाघों की सुरक्षा और संरक्षण के लिये महत्वपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं। हाल ही में राजधानी भोपाल से सटे रातापानी अभयारण्य को प्रदेश का 8वां टाईगर रिजर्व घोषित कर दिया गया है। शिवपुरी के माधव वन्य जीव उद्यान को भी टाईगर रिजर्व घोषित के जाने की तकनीकी अनापत्ति जारी कर दी गई है, उम्मीद है कि शीघ्र ही यह प्रदेश का 9वां टाईगर रिजर्व बन जाएगा। रातापानी हमेशा से ही बाघों का घर रहा है। रायसेन एवं सीहोर जिले में रातापानी अभयारण्य का कुल 1272 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अधिसूचित है। टाईगर रिजर्व बनने के बाद कुल क्षेत्रफल में से 763 वर्ग किलोमीटर को कोर क्षेत्र घोषित किया गया है। यह वह क्षेत्र है, जहाँ बाघ मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र विचरण कर सकेंगे। शेष 507 वर्ग किलोमीटर को बफर क्षेत्र घोषित किया गया है। यह क्षेत्र कोर क्षेत्र के चारों ओर स्थित है। इसका उपयोग कुछ प्रतिबंधों के साथ स्थानीय रहवासी कर सकेंगे, इनकी आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है। रातापानी की अर्बन फॉरेस्ट से समीपता के कारण भोपाल को अब टाईगर राजधानी के रूप में पहचान मिलेगी। रातापानी के टाईगर रिजर्व बनने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय लोगों के लिये रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे। मध्यप्रदेश ने सबसे पहले लागू किया वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम मध्यप्रदेश ने देश में सबसे पहले वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम लागू किया। प्रदेश में वर्ष 1973 में वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम लागू किया गया था। प्रदेश के सतपुड़ा टाईगर रिजर्व को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की संभावित सूची में शामिल किया गया है। मध्यप्रदेश में सफेद बाघों के संरक्षण के लिये मुकुंदपुर में महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव व्हाइट टाईगर सफारी की स्थापना की गई है, इसे विश्वस्तरीय बनाया जा रहा है। वन्य जीव विशेषज्ञों ने सतपुड़ा टाईगर रिजर्व को बाघ सहित कई वन्य-जीवों के प्रजनन के लिए सर्वाधिक अनुकूल स्थान माना है, इसलिए यह इनके लिए आदर्श आश्रय स्थली है। पेंच टाईगर रिजर्व की ‘कॉलर वाली बाघिन’ के नाम से प्रसिद्ध बाघिन को सर्वाधिक 8 प्रसवों में 29 शावकों को जन्म देने के अनूठे विश्व-कीर्तिमान के कारण ‘सुपर-मॉम’ के नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह कान्हा टाईगर रिजर्व में पाए जाने वाले हार्ड ग्राउण्ड बारहसिंगा का संरक्षण भी देश ही नहीं दुनिया भर के लिए विशेष है। इसलिए मध्यप्रदेश में इसे राजकीय पशु का दर्जा दिया गया है। चीतों की पुनर्स्थापना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष रुचि एवं अथक प्रयासों के फलस्वरूप कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अफ्रीकी चीतों की पुनर्स्थापना की गई। अब इनका कुनबा बढ़ने भी लगा है, जो हमारे लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है। प्रधानमंत्री मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश को गौरवान्वित किया है। भारत में 13 हजार से भी अधिक तेंदुए हैं, जिसमें से 25 प्रतिशत तेंदुए मध्यप्रदेश में हैं। प्रदेश में तेंदुओं की संख्या 3300 से अधिक है। देश में तेंदुओं की आबादी में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि मध्यप्रदेश में यह वृद्धि 80 प्रतिशत आंकी गई है। घड़ियाल, गिद्धों, भेड़ियों, तेंदुओं और भालुओं की संख्या में भी मध्यप्रदेश देश में अग्रणी है। मध्यप्रदेश बाघों का घर होने के साथ ही तेंदुओं, चीतों, गिद्धों और घड़ियालों का भी आँगन है। दुर्लभ स्तनपायी मछली डॉल्फिन भी अत्यंत साफ-सुथरी चंबल में संरक्षित की जा रही है। इस तरह मध्यप्रदेश अन्य राज्यों की जैव-विविधता को सम्पन्न बनाने में भी अपना योगदान दे रहा है। वन्य जीव कॉरिडोर बनने से कम होगा मानव-वन्य जीव संघर्ष बाघ एवं तेंदुआ स्टेट का सम्मान मध्यप्रदेश को मिला हुआ है। हमारे प्रदेश में संरक्षित क्षेत्रों के अतिरिक्त खुले वनों में भी 30 प्रतिशत से अधिक बाघ विचरण कर रहे हैं। इससे मानव-वन्य जीव संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। मानव-वन्य जीव संघर्ष को कम करने के लिये विशेष वन्यजीव कॉरिडोर बनाये गये हैं। साथ ही 14 रीजनल रेस्क्यू स्क्वॉड और एक राज्य स्तरीय रेस्क्यू स्क्वॉड का गठन किया गया है। वन्य जीवों को मानव-वन्य जीव संघर्ष के लिए संवेदनशील क्षेत्रों से रेस्क्यू कर संरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ा जायेगा, जिससे वन्य जीवों का प्रबंधन एवं संरक्षण अधिक प्रभावी रूप से हो सकेगा। इन संघर्षों में प्रतिवर्ष औसतन 80 प्रतिशत जनहानि, 15 हजार पशु हानि होती है और 1300 नागरिक घायल होते हैं। मानव-वन्य जीव संघर्ष को कम करने के लिये शासन ने जनहानि के प्रकरणों में क्षतिपूर्ति राशि को 8 लाख से बढ़ाकर 25 लाख रुपये करने का निर्णय लिया है। इन प्रकरणों में लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत 30 दिवस के अंदर क्षति-पूर्ति राशि का भुगतान किया जाता है। प्रदेश में हाथियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एक एलीफेंट-टॉस्कफोर्स का गठन किया गया है। हाथी प्रबंधन के लिये योजना तैयार की जा रही है। इसमें एआई तकनीक के उपयोग से स्थानीय समुदायों की सहभागिता को भी प्रबंधन में सम्मिलत किया जा रहा है। हाथी विचरण क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों से स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है।  

रेस्क्यू में जुटी वन विभाग की टीम, राजस्थान-दौसा में सरिस्का से निकले बाघ ने तीन लोगों को किया घायल

दौसा। जिले के बांदीकुई इलाके में आज सुबह सरिस्का टाइगर रिजर्व से निकले एक बाघ ने तीन स्थानीय लोगों पर हमला कर दिया। घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल बन गया है। घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जानकारी के अनुसार सुबह करीब 9 बजे बांदीकुई के बैजुपाड़ा गांव में बाघ देखा गया। ग्रामीणों के अनुसार बाघ ने अचानक तीन लोगों पर हमला कर दिया। घायलों में विनोद मीना को गंभीर स्थिति में जयपुर रैफर किया गया है, जबकि उगा महावर को रैणी अस्पताल और बाबूलाल मीना को बांदीकुई उपजिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दौसा के डीएफओ (डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर) अजीत ऊंचौई ने बताया कि यह बाघ संभवतः सरिस्का अभ्यारण से लापता हुआ टाइगर है, जिसका ट्रैकिंग नंबर 2402 है। सरिस्का टाइगर रिजर्व की टीम को इस बारे में सूचना दे दी गई है और अलवर वन विभाग की टीम बाघ को पकड़ने के लिए मौके पर पहुंच रही है। घटना के बाद से बैजुपाड़ा और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। ग्रामीण बाघ को लेकर भयभीत हैं और अपने घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं। वन विभाग की टीम बाघ को सुरक्षित पकड़ने और गांव से दूर ले जाने की योजना बना रही है। साथ ही विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना दें। वन विभाग बाघ को पकड़ने के लिए विशेषज्ञों की मदद से ऑपरेशन चला रहा है।

रातपानी एमपी का 8वां टाइगर रिजर्व बन गया है. सरकार ने इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया

भोपाल मध्य प्रदेश के बड़ी खुशखबरी है. राज्य को एक और टाइगर रिजर्व मिल गया है. रातापानी प्रदेश का 8वां टाइगर रिजर्व होगा. सरकार ने इसका नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है. इस टाइगर रिजर्व में 90 बाघ हैं. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन ऑथोरिटी ने साल 2022 में रातापानी को टाइगर रिजर्व बनाने की मंजूरी दी थी. इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस साल जून में रातापानी को टाइगर रिजर्व के रूप में नोटिफाई करने के निर्देश दिए थे. सीएम यादव ने इसे पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में मील का पत्थर कहा है. जानकारी के मुताबिक, रातापानी टाइगर रिजर्व का फोरेस्ट एरिया 1271.465 स्क्वेयर किमी है. इसमें से 763.812 स्क्वेयर किमी कोर और 507.653 स्क्वेयर किमी बफर एरिया होगा. इस टाइगर रिजर्व में 3 हजार से ज्यादा जानवर हैं. इसमें 90 बाघ, 70 तेंदुए, 500 से ज्यादा सांभर, 600 से ज्यादा चीतल, 8 भेड़िये हैं. इसका कोर एरिया भोपाल, रायसेन और सीहोर में होगा. बता दें, इस टाइगर रिजर्व में 9 गांव शामिल होंगे. इसके बनने से गांववालों के अधिकारों में सरकार कोई बदलाव नहीं करेगी. इससे टूरिज्म बढ़ेगा, रोजगार पैदा होंगे. इसके अलावा केंद्र सरकार से बजट मिलने से एनिमल मैनेजमेंट और बेहतर होगा. इसके अलावा यहां ईको सिस्टम डेवलप होगा. इससे भी गांववालों को लाभ मिलेगा. रातापानी टाइगर रिजर्व बनने से मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की पहचान ही बदल जाएगी. लंबे समय से पेंडिंग था मामला यह फैसला काफी समय से लंबित था। 2008 में NTCA से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद भी राज्य सरकार ने टाइगर रिजर्व बनाने में देरी की थी। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से राज्य सरकार को अधिसूचना प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश देने का आग्रह किया था। उन्होंने इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष और बाघों की आबादी की रक्षा की जरूरत का हवाला दिया था। इस फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए अजय दुबे ने कहा कि मैं सरकार के फैसले से बहुत खुश हूं। इस अधिसूचना को खनन माफिया और क्षेत्र में निहित स्वार्थ रखने वाले लोग रोक रहे थे। रायसेन और सीहोर जिले में है स्थित रातपानी वन्यजीव अभ्यारण्य रायसेन और सीहोर जिलों में स्थित है। यह मध्य प्रदेश में बाघों के एक महत्वपूर्ण आवास का हिस्सा है। हाल के वर्षों में, सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला से बाघ इस अभ्यारण्य और आसपास के वन क्षेत्रों में आने लगे हैं। बाघों के इन इलाकों में आने के बाद, 2007 में राज्य सरकार ने रतपानी और सिंघोरी अभ्यारण्यों को टाइगर रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। 2008 में मिल गई थी मंजूरी NTCA ने 2008 में रिजर्व के लिए सैद्धांतिक मंज़ूरी दे दी थी। राज्य वन विभाग को रिजर्व की सीमाओं और कोर क्षेत्रों के लिए विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद, अंतिम अधिसूचना प्रक्रिया में कई देरी हुई। 2012 में, NTCA ने राज्य सरकार को रिमाइंडर जारी किए, जिसमें तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया था। देरी की वजह से बढ़ रहे थे बाघ और इंसानों के संघर्ष PIL में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि रतपानी टाइगर रिजर्व को अंतिम रूप देने में देरी के कारण बाघ-मानव संघर्ष में वृद्धि हुई है। बाघ भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों में भटक रहे हैं। अतिक्रमण और आवास क्षरण के कारण अभ्यारण्य के भीतर पर्याप्त शिकार की कमी ने इस स्थिति को और बदतर बना दिया है। 2011 में, स्थानीय रिपोर्टों ने भोपाल के बाहरी इलाके में बाघों और तेंदुओं की उपस्थिति पर प्रकाश डाला था। बढ़ती मांसाहारी आबादी का समर्थन करने के लिए ‘शिकार आधार’ की मांग की गई थी। संघर्ष तब एक दुखद मोड़ पर पहुंच गया जब 2012 में, एक बाघ भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में भटक गया और ग्रामीणों द्वारा उसे बेरहमी से मार डाला गया। NTCA ने तुरंत इस स्थिति का संज्ञान लिया, लेकिन राज्य द्वारा रिजर्व अधिसूचना को पूरा करने में विफलता ने इस क्षेत्र को असुरक्षित छोड़ दिया। बफर जोन में कई बुनियादी परियोजनाओं को मंजूरी दी इस मुद्दे को और जटिल बनाते हुए, मध्य प्रदेश के राज्य वन्यजीव बोर्ड (SWB) ने रिजर्व के प्रस्तावित बफर ज़ोन में कई बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंज़ूरी दे दी। इनमें कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट, 765kV ट्रांसमिशन लाइन और एक रेलवे लाइन शामिल हैं। ये मंजूरियां बाघों के आवास पर संभावित प्रभाव पर विचार किए बिना दी गई थीं। उच्च न्यायालय में दायर PIL ने इन मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया। अदालत से राज्य सरकार को तुरंत रिजर्व को अधिसूचित करने का निर्देश देने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं ने SWB द्वारा अनुमोदित परियोजनाओं को निलंबित करने की भी मांग की जो प्रस्तावित टाइगर रिजर्व के कोर और बफर क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। याचिका के जवाब में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि NTCA की वैधानिक मंज़ूरी और संरक्षण की ज़रूरत के बावजूद, राज्य के अधिकारियों ने अभ्यारण्य के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए पर्याप्त तेज़ी से काम नहीं किया। अदालत ने राज्य सरकार से टाइगर रिजर्व की अधिसूचना को अंतिम रूप देने के लिए तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया था। प्रबंधन एक चुनौती है उन्होंने कहा है कि अधिसूचना एक महत्वपूर्ण पहला कदम है, लेकिन अब असली चुनौती रिजर्व के प्रभावी प्रबंधन को सुनिश्चित करने में है। इसमें स्पष्ट सीमाएं स्थापित करना, शिकार को रोकना और वन्यजीव-अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों के साथ जुड़ना शामिल है। सीएम यादव ने कही ये बात इस टाइगर रिजर्व के बनने के बाद सीएम मोहन यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच और कुशल मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश ने पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक और मील का पत्थर स्थापित किया है. रायसेन जिले में स्थित रातापानी को अब प्रदेश का 8वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया है. यह निर्णय न केवल बाघों की सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को भी नई दिशा देगा.

रातापानी अभयारण्य टाइगर रिजर्व घोषित

भोपाल की पहचान टाइगर राजधानी के रूप में होगी रातापानी को प्रदेश का आठवाँ टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया रातापानी अभयारण्य टाइगर रिजर्व घोषित भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल और मार्गदर्शन पर 2 दिसम्बर, 2024 को रातापानी को प्रदेश का आठवाँ टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया है। राज्य शासन द्वारा इसकी अधिसूचना जारी कर दी गयी है। प्रस्तावित रातापानी टाइगर रिजर्व के कोर एरिया का रकबा 763.812 वर्ग किलोमीटर तथा बफर एरिया का रकबा 507.653 वर्ग किलोमीटर है। इस प्रकार टाइगर रिजर्व का कुल रकबा 1271.465 वर्ग किलोमीटर होगा। रातापानी टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र की सीमा के अंदर स्थित राजस्व ग्राम झिरी बहेड़ा, जावरा मलखार, देलावाड़ी, सुरई ढाबा, पांझिर, कैरी चौका, दांतखो, साजौली एवं जैतपुर का रकबा 26.947 वर्ग किलोमीटर राजस्व भूमि इन्क्लेव के रूप में बफर क्षेत्र में शामिल है। टाइगर रिजर्व में भौगोलिक रूप से स्थित, उक्त 9 ग्राम अभयारण्य की अधिसूचना में कोर क्षेत्र में शामिल नहीं हैं। रातापानी टाइगर रिजर्व बनने से टाइगर रिजर्व का सम्पूर्ण कोर क्षेत्र रातापानी टाइगर अभयारण्य की सीमा के भीतर है। इससे ग्रामीणों के वर्तमान अधिकार में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इससे स्थानीय ग्रामीणों को पर्यटन से नये रोजगार सृजित होंगे, जिससे आर्थिक लाभ होगा। टाइगर रिजर्व गठित होने से भारत सरकार के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण से बजट प्राप्त होने से वन्य-प्राणियों का और बेहतर ढंग से प्रबंधन किया जा सकेगा। इसके साथ ही स्थानीय ग्रामीणों को ईको टूरिज्म के माध्यम से लाभ प्राप्त होगा। टाइगर रिजर्व बनने से रातापानी को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलेगी तथा भोपाल की पहचान “टाइगर राजधानी’’ के रूप में होगी।  

ब्लड लाइन के बाघों की ब्रीडिंग से जन्म लेने वाले शावकों में प्रतिरोधी क्षमता अधिक होगी, अनुवांशिक बीमारियों से भी निजात मिलेगी

इंदौर  इंदौर शहर के कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय के बाघ का कुनबा सेहतमंद रहे इसलिए अब चिड़ियाघर प्रबंधन उनकी वंशावली में बदलाव करने जा रहा है। इसके लिए गोरेगांव चिड़ियाघर (महाराष्ट्र) से विशेष एनिमल एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत बाघ के जोड़े के बदले बाघ का ही एक जोड़ा लिया जाएगा। अलग-अलग ब्लड लाइन के बाघों की ब्रीडिंग से जन्म लेने वाले शावकों में प्रतिरोधी क्षमता अधिक होने के साथ ही अनुवांशिक बीमारियों से भी निजात मिलेगी। इससे बाघ अपनी 15-16 वर्ष की औसत आयु को अधिक बेहतर तरीके से व्यतीत कर पाएंगे। जिन प्राणियों की संख्या ज्यादा होती है, उन्हें भेजा जाता है हर बार यहां से उस प्रजाति के वन्य प्राणियों को अन्य स्थानों पर भेजा जाता है, जिनकी संख्या अधिक होती है। बदले में दूसरी प्रजाति के जानवर लाए जाते हैं, जिनकी संख्या यहां कम या नहीं होती है। इस बार बाघ के बदले बाघ लाने के पीछे वजह यह है कि एक ही वंशावली में ब्रीडिंग पर अंकुश लगना है। इसके लिए सेंट्रल जू ऑफ अथारिटी को चिट्टी भी लिखी गई है। इस कड़ी में 2025 में जू प्रबंधन पांच-छह प्रजातियों के अन्य वन्य प्राणियों को लाने का प्रयास करेगा। उल्लेखनीय है इंदौर के चिड़ियाघर से दूसरे राज्यों के चिड़ियाघर में एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत कई जानवर भेजे जाते हैं। बीते दिनों में शेर और बाघों के बच्चों ने जन्म लिया था, जिससे इन प्रजातियों का कुनबा बढ़ा। इसके बाद यहां पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या भी बढ़ गई। अच्छी देखरेख से बढ़ रहा शेर-बाघों का कुनबा     शेरों और बाघों की अच्छी देखरेख से चिड़ियाघरों में इनका कुनबा बढ़ा है। इनकी बेहतरी के लिए समय-समय पर कदम उठाए जाते हैं। अब इनकी वंशावली में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की गई है। रक्त रेखा (ब्लड लाइन) में बदलाव की कड़ी में पहले हम चीतल, सांभर लाए थे। साथ ही चंडीगढ़ से भी एक शेर लाया गया था। – डॉ. उत्तम यादव, प्रभारी, कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय रक्त रेखा में बदलाव आवश्यक     वन्य प्राणियों की अच्छी सेहत के लिए रक्त रेखा में बदलाव आवश्यक है। इससे जन्म लेने वाले वन्य प्राणियों की शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है। ऐसे में इनमें जैनेटिक बीमारियों का खतरा भी काफी हद तक कम होता है। इनकी अपनी औसत आयु से अधिक जीवन जीने की संभावना बढ़ती है। – डॉ. हेमंत मेहता, वेटरनरी हॉस्पिटल महू  

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