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US हिंसा-ट्रम्प ने लॉस एंजिलिस 2000 नेशनल गार्ड्स और भेजे, बिगड़े हालात पर सरकार का बड़ा एक्शन

लॉस एंजेलिस  कैलिफोर्निया में इमिग्रेशन और सीमा शुल्क प्रवर्तन के कदमों के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए ट्रंप प्रशासन ने लॉस एंजिल्स में नेशनल गार्ड को तैनात किया। हालांकि, ट्रंप  के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही है। वहीं, ट्रंप ने कहा कि उन्होंने कैलिफोर्निया में नेशनल गार्ड की तैनाती करके ‘बहुत बढ़िया फैसला’ लिया है। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में कहा, अगर हमने ऐसा नहीं किया होता, तो लॉस एंजिल्स पूरी तरह से नष्ट हो गया होता। ट्रंप ने यह संकेत भी दिया कि वह कैलिफोर्निया के गवर्नर की गिरफ्तारी का समर्थन करेंगे। इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने एलान किया है कि अमेरिकी सेना अस्थायी रूप से लॉस एंजिल्स में लगभग 700 मरीन तैनात करेगी, जब तक कि अधिक संख्या में नेशनल गार्ड सैनिक वहां नहीं पहुंच जाते।  नाम न बताने की शर्त पर एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि जब तक नेशनल गार्ड के और सैनिक घटनास्थल पर नहीं पहुंच जाते, तब तक एक बटालियन को अस्थायी ड्यूटी पर भेजा जाएगा। पिछले चार दिनों से प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। देश में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को निर्वासित करने की नीतियों के खिलाफ इस प्रदर्शन को डेमोक्रेट्स पार्टी का भी साथ मिल रहा है। ट्रंप पर दर्ज होगा मुकदमा:  गैविन न्यूसम इसी बीच राज्य के नेशनल गार्ड का नियंत्रण अपने हाथ में लेने और उसे लॉस एंजिल्स की सड़कों पर तैनात करने के ट्रंप के फैसले को कैलिफोर्निया के अधिकारी अदालत में चुनौती देंगे। कैलिफोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसम ने सोमवार को एक्स पर पोस्ट किया,”यह बिल्कुल वही है जो ट्रंप चाहते थे। उन्होंने आग भड़काई और अवैध रूप से नेशनल गार्ड को संघीय बनाने का काम किया। हम उन पर मुकदमा करने जा रहे हैं।” ट्रंप सरकार ने उतारे आर्मी के लगभग 700 मरीन वहीं, लॉस एंजेलिस में स्टोर की लूट तस्वीर बताती है कि हालात कितने खराब हैं। अब सिर्फ नेशनल गार्ड्स से काम नहीं चल रहा है। लिहाजा ट्रंप सरकार ने अब यूएस आर्मी के लगभग 700 मरीन को लॉस एंजेलिस की सड़कों पर उतार दिए हैं। ये मरीन कैलिफोर्निया के मरीन कॉर्प्स एयर ग्राउंड कॉम्बैट सेंटर के दस्ते से हैं। ट्रंप द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन पर डेमोक्रेट्स द्वारा उनका राजनीतिक विरोध हो रहा है, जो मरीन बटालियन की तैनाती से और ज्यादा बढ़ेगा। ये मरीन, नेशनल गार्ड्स के साथ मिलकर काम करेंगे। गवर्नर ने ट्रंप के फैसले को लेकर कड़ी निंदा की लॉस एंजिल्स में हो रहे विरोध प्रदर्शन का यह चौथा दिन था। यहां माइग्रेंट्स को कैद में रखे जाने वाले एक डिटेंशन सेंटर के सामने कई लोगों का जमावड़ा हो गया। कई लोगों ने आग लगाकर कई गाड़ियों को उसके हवाले कर दिया। शहर के हाइवे को भी जाम कर दिया। वहीं, पुलिस ने प्रदर्शन करने वालों पर आंसू गैस के गोले छोड़े। वहीं, इन सबके बीच कैलिफोर्निया राज्य ने नेशनल गार्ड और मरीन की तैनाती के खिलाफ ट्रंप प्रशासन पर मुकदमा दायर किया है। इससे पहले कैलिफोर्निया के गवर्नर ने बताया था कि अब नेशनल गार्ड सैनिकों को तैनात किया जा रहा है। ट्रंप के इस फैसले की गवर्नर ने कड़ी निंदा की है।  

खुलासा :बाइडेन शासन के दौरान आतंकी समूहों को भी करोड़ों डॉलर की मदद दी गई

न्यूयॉर्क अमेरिकी कांग्रेस ने आतंकवादी-नामित समूहों के साथ USAID के कथित संबंधों पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि बाइडेन शासन के दौरान आतंकी समूहों को भी करोड़ों डॉलर की मदद दी गई. दरअसल ट्रंप द्वारा खर्चे में कटौती करने के लिए DOGE (Department of Government Efficiency) नाम का अलग मंत्रालय बनाया गया है. DOGE ने कहा था कि वो USAID के तहत दुनिया के देशों को दिए जाने वाले 723 मिलियन डॉलर की रकम को खत्म कर रहा है. यानी कि अब ऐसी कोई भी रकम इन देशों को नहीं मिलेगी. हमास को 2 बिलियन डॉलर आतंकी समूहों को बाइडेन शासन के दौरान मिली मदद को लेकर DOGE और अमेरिकी संघीय कर्मचारियों पर गठित कमेटी के समक्ष सुनवाई हुई.  इस दौरान हुई गवाही के अनुसार, बाइडेन प्रशासन के तहत 7 अक्टूबर, 2023 से USAID द्वारा हमास की मदद के लिए 2 बिलियन डॉलर से अधिक भेजे गए थे. लश्कर को भी मदद रिपोर्टों के अनुसार, USAID ने एक भारत-विरोधी संगठन को भी वित्तीय मदद प्रदान की थी जिसे अमेरिकी सरकार ने आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया है. इसने पाकिस्तान में स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के मुखौटे संगठन फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन (FIF) को वित्तीय सहायता प्रदान की थी. लश्कर वहीं आतंकी संगठन है जिसने 26/11 के मुंबई हमले को अंजाम दिया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए और 300 से अधिक घायल हुए थे. DOGE पहले ही दावा कर चुकी है कि USAID ने जांच के दायरे में होने के बावजूद फाउंडेशन को समर्थन देना जारी रखा था.

ट्रंप के बढ़ते दबदबे से निपटने की चुनौती, अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के नए अध्यक्ष बने केन मार्टिन

वाशिंगटन। अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने शनिवार को मिनेसोटा में पार्टी के नेता केन मार्टिन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। इसके बाद अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ते दबदबे को रोकने और डेमोक्रेटिक पार्टी में फिर से मतदाताओं का विश्वास कायम करने की जिम्मेदारी केन मार्टिन के कंधों पर आ गई है। केन मार्टिन, डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के अध्यक्ष पद पर जैमी हैरिसन की जगह लेंगे, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के बाद फिर से इस पद की जिम्मेदारी संभालने से इनकार कर दिया था। मार्टिन ने पार्टी में बड़े बदलावों के दिए संकेत डेमोक्रेट पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद केन मार्टिन ने ट्रंप और सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी को चुनौती देते हुए कहा कि ‘हम आ रहे हैं। यह एक नई डेमोक्रेटिक पार्टी है।’ केन मार्टिन ने पार्टी में बड़े बदलाव करने का संकेत दिया है। साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी की हार की समीक्षा करने की भी बात कही। डेमोक्रेट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव वॉशिंगटन में हुआ, जहां डेमोक्रेट नेशनल कमेटी के 400 से ज्यादा सदस्य इकट्ठा हुए। कामकाजी वर्ग पर फोकस करने का किया वादा केन मार्टिन ऐसे समय डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष चुने गए हैं, जब पार्टी की लोकप्रियता में लगातार कमी आ रही है। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार, सिर्फ 31 फीसदी मतदाता ही डेमोक्रेट पार्टी को पसंद करते हैं, जबकि 43 प्रतिशत ने रिपब्लिकन पार्टी को अपनी पसंद बताया। अध्यक्ष पद के चुनाव में केन मार्टिन ने विस्कॉन्सिन से अध्यक्ष पद के दावेदार बेन विकलर को आसानी से हरा दिया। केन मार्टिन ने देश के कामकाजी वर्ग को फिर से पार्टी के साथ जोड़ने, देशभर में डेमोक्रेटिक पार्टी के संगठन को मजबूत करने का वादा किया है। साथ ही अल्पसंख्यक समूहों के प्रति डेमोक्रेट पार्टी के समर्पण से पीछे न हटने की बात भी कही। गौरतलब है कि साल 2011 के बाद डेमोक्रेट पार्टी का नेतृत्व करने वाले केन मार्टिन पहले श्वेत नेता बन गए हैं।

यूएस: एच-1 बी वीजा, डोनाल्ड ट्रंप का बना सर दर्द , एलन मस्क ने किया समर्थन

US: H-1B visa, Donald Trump’s headache, Elon Musk supported अमेरिका में एच-1बी वीजा को लेकर बहस जारी है। ट्रंप समर्थक इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं, वहीं ट्रंप के करीबी उद्योगपति एलन मस्क ने एच-1बी वीजा का समर्थन किया है। अब इस बहस में अमेरिका के वरिष्ठ और प्रभावशाली सांसद बर्नी सैंडर्स भी शामिल हो गए हैं। बर्नी सैंडर्स ने मस्क पर आरोप लगाया है कि वह एच-1बी वीजा का समर्थन सिर्फ विदेशों से सस्ते कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए कर रहे हैं। एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां विदेशों से कुशल कर्मचारियों को नौकरी पर रख सकते हैं। ‘श्रम लागत कम करना चाहते हैं मस्क’ बर्नी सैंडर्स लंबे समय से कर्मचारियों के अधिकारों के समर्थक रहे हैं। गुरुवार को एक बयान में कहा कि एच-1बी वीजा कुशल कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए नहीं है बल्कि सस्ते कर्मचारियों को नौकरी पर रखने और श्रम लागत कम करने के लिए है। बर्नी सैंडर्स ने दावा किया कि इस वीजा के जरिए अमेरिकी अरबपतियों को फायदा हो रहा है और टेस्ला जैसी कंपनियां कुशल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशों, जैसे भारतीय कर्मचारियों को नौकरी दे रही हैं। बर्नी सैंडर्स ने मांग की कि एच-1बी वीजा में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि अमेरिकी कर्मचारियों को इसका नुकसान न झेलना पड़े। अमेरिकी सांसद ने कहा कि मस्क की कंपनी में बीते साल करीब साढ़े सात हजार अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया, जबकि एच-1बी वीजा धारक कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाला गया। एलन मस्क ने एच-1बी वीजा का किया था समर्थन गौरतलब है कि एलन मस्क एच-1बी वीजा के समर्थक हैं और उन्होंने इसका समर्थन करते हुए कहा था कि अमेरिका में कुशल कर्मचारियों की कमी है और इस कमी को पूरा करने के लिए एच-1बी वीजा जरूरी है। मस्क ने कहा कि कई इंजीनियर्स इस वीजा के जरिए अमेरिका आए और उन्होंने अमेरिका के विकास में अहम योगदान दिया। मस्क के इस दावे पर भी बर्नी सैंडर्स ने पलटवार किया और कहा कि टेस्ला में कई एच-1बी वीजा धारक अकाउंटेंट और मैकेनिकल इंजीनियर हैं और ये उच्च प्रशिक्षित कर्मचारियों की श्रेणी में नहीं आते हैं। ट्रंप समर्थक भी कर चुके हैं इसका विरोध उल्लेखनीय है कि बीते दिनों ट्रंप समर्थक लॉरा लूमर और स्टीव बैनन आदि ने एच-1बी वीजा का विरोध किया था और दावा किया कि इससे अमेरिकी लोगों की नौकरियां छिन रही हैं। इस पर मस्क ने एच-1बी वीजा का समर्थन किया। डोनाल्ड ट्रंप ने भी मस्क का समर्थन करते हुए एच-1बी वीजा को जारी रखने की बात कही थी।

बाइडेन के बेटे पर ‘यू टर्न’ से उठे गंभीर सवाल, अदाणी पर आरोप लगाने वाले अमेरिकी न्याय विभाग की खुली पोल

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने बेटे को टैक्स चोरी और अवैध तरीके से बंदूक रखने के मामलों में आधिकारिक रूप से माफी दी है। दोनों ही मामले में हंटर बाइडेन को दोषी करार दिया गया था। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस हैरान करने वाले कदम से राजनीतिक बिरादरी के भीतर से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। इसके साथ ही अदाणी ग्रुप के खिलाफ अभियोग को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप ने इस कदम को ‘न्याय की विफलता’ करार दिया है। जो बाइडेन ने जून में कहा था कि वह न तो अपने बेटे को माफ करेंगे और न ही उसकी सजा कम करेंगे। बाइडेन की तरफ से अपने बेटे को माफी देना, एक बड़ा यू टर्न माना जा रहा है। इसने अमेरिकी न्याय विभाग के ‘निष्पक्ष’ कामकाज को सवालों के घेरे में ला दिया है। बाइडेन ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि उनके बेटे के खिलाफ मामले राजनीति से प्रेरित थे जिन्हें उनको और हंटर को ‘तोड़ने’ के लिए आगे बढ़ाया गया था। इस बीच, अमेरिकी सत्ता के गलियारों में इस बात पर तीखी बहस शुरू हो गई है कि क्या न्याय विभाग को राजनीतिक ताकतें नियंत्रित करती हैं। व्यापक रूप से माना जा रहा है कि न्याय विभाग की ओर से अदाणी पर लगाए गए अभियोग के पीछे भी निवर्तमान बाइडेन सरकार की राजनीति है। कई राजनीतिक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद, अदाणी के खिलाफ अभियोग को भी वापस लिया जा सकता है। वकील और अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ के कड़े आलोचक कश्यप पटेल ने अमेरिकी कानून प्रवर्तन और खुफिया एजेंसियों में व्यापक बदलाव की मांग की है। उन्होंने कहा, ‘न्याय विभाग में सभी लोग बस अपनी अगली पदोन्नति की तलाश में हैं।’ पटेल को ट्रंप ने अगले एफबीआई निदेशक के रूप में नामित किया है। यह न्याय विभाग ही था जिसने प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) के साथ मिलकर अदाणी समूह के अध्यक्ष गौतम अदाणी और समूह के अन्य अधिकारियों पर रिश्वतखोरी के आरोप लगाए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति के बेटे हंटर बाइडेन को दोषी ठहराया गया, जबकि गौतम अदाणी, सागर अदाणी और वरिष्ठ कार्यकारी विनीत जैन को न्याय विभाग और एसईसी की ओर से केवल आरोपित किया गया। न्याय विभाग ने एक सार्वजनिक बयान में कह चुका है, “जब तक दोषी साबित नहीं हो जाते, तब तक प्रतिवादी निर्दोष हैं।” न्याय विभाग और एसईसी ने अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (एजीईएल) के प्रमुख अधिकारियों गौतम अदाणी, सागर अदाणी और विनीत जैन के खिलाफ न्यूयॉर्क जिला न्यायालय में अभियोग और दीवानी शिकायत दर्ज की थी। हालांकि, अदाणी ग्रुप ने आरोपों का खंडन करते हुए इसे ‘निराधार’ बताया और कहा कि वह अपने बचाव के लिए कानूनी सहारा लेगा।

क्यूबा में पहुंचा रूसी युद्धक जहाजों का बेड़ा, परमाणु पनडुब्बी कजान भी शामिल

हवाना  छह दशक से भी ज्याद समय बीत चुका है जब अमेरिका और तत्कालीन सोवियत यूनियन इतिहास में परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़े थे। दुनिया उस घटना को क्यूबा संकट के नाम से जानती है। आज जब रूस की परमाणु पनडुब्बी कजान अमेरिका के दरवाजे पर मौजूद क्यूबा में पहुंची तो दुनिया को एक बार फिर से उस संकट की याद दिला दी है। रूस के युद्धक जहाज फ्रिगेट एडमिरल गोर्शकोव के नेतृत्व में रूसी युद्धक जहाजों का बेड़ा युद्धाभ्यास के लिए क्यूबा के बंदरगाह पर पहुंचा है, जो यहां 5 दिनों तक रहेगा। इसमें रूस की परमाणु पनडुब्बी कजान भी शामिल है। रूसी टेलीग्राम चैनलों ने दावा किया है कि रूसी परमाणु पनडुब्बी कजान गाइडेड मिसाइल से लैस है। बेड़े की अगुवाई कर रहे एडमिरल गोर्शकोव को रूस के सबसे आधनिक युद्धपोत में गिना जाता है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, गोर्शकोव कैलिबर मिसाइल के साथ ही नवीनतन हाइपरसोनिक मिसाइल जिरकान से भी लैस है। कजान और गोर्शकोव के अलावा रूसी बेड़े में फ्लीट ऑयल टैंकर पाशिन और टग निकोले चिकर भी शामिल है। परमाणु हथियारों की मौजूदगी से इनकार हालांकि, क्यूबा के अधिकारियों ने ये साफ किय है परमाणु पनडुब्बी कजान समेत बेड़े के जहाज पर परमाणु हथियार नहीं हैं। क्यूबा के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ‘किसी भी जहाज पर परमाणु हथियार नहीं है, इसलिए इनके देश में रुकने से क्षेत्र को कोई खतरा नहीं है।’ इन दावों के बावजूद रूसी जहाजों का अमेरिकी जलक्षेत्र से महज कुछ किमी की दूरी से गुजरना महत्वपूर्ण है। खासतौर पर जब पुतिन ने धमकी दी है कि वे अपने शक्तिशाली हथियारों को उन देशों और क्षेत्रों में तैनात करेंगे जहां से पश्चिमी देशों को निशाना बनाया जा सके। क्या है क्यूबा मिसाइल संकट? क्यूबा मिसाइल संकट शीत यु्द्ध के दौरान अमेरिका और तत्कालीन सोवियत यूनियन के बीच एक बड़ा टकराव था, जिसने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया था। यह संकट 1962 में शुरू हुआ था, जो एक महीने से ज्यादा समय तक चला था। तब सोवियत संघ ने इटली और तुर्की में अमेरिकी मिसाइल की तैनाती के जवाब में परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल क्यूबा में तैनात कर दी थी। इसने अमेरिका के ऊपर बड़ा खतरा ला दिया था। अगर इन मिसाइलों को क्यूबा से लॉन्च किया जाता तो कुछ ही मिनटों में अमेरिका के अधिकांश हिस्से को निशाना बना सकती थीं। दिलचस्प बात ये है कि आज जिस यूक्रेन पर हमले को लेकर रूस और अमेरिका टकराव के रास्ते पर हैं, वह उस समय सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था।

अमेरिका यूक्रेन को एक और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली भेजेगा

अमेरिका : वर्ष 1971 से लापता विमान का मलबा वर्मोन्ट की चैम्पलेन झील में मिला अमेरिका यूक्रेन को एक और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली भेजेगा यूएसआईएसपीएफ ने प्रधानमंत्री मोदी को तीसरे कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं दी वर्मोन्ट/वाशिंगटन  वर्मोंन्ट में 53 वर्ष पहले पांच लोगों को ले जा रहा एक निजी विमान लापता हो गया था, जिसका मलबा चैम्पलेन झील से बरामद किया गया है। विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी। यह वाणिज्यिक विमान 27 जनवरी 1971 को बर्लिंगटन हवाई अड्डे से रोड आइलैंड के प्रोविडेंस के लिए उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद लापता हो गया था। विमान में जॉर्जिया विकास कंपनी कजन प्रॉपर्टीज के तीन कर्मचारी और चालक दल के दो सदस्य सवार थे। कंपनी के कर्मचारी बर्लिंगटन में एक विकास परियोजना पर काम कर रहे थे। शुरुआत में जब खोज की गयी तो 10 सीट वाले इस विमान का मलबा नहीं मिला और विमान के लापता होने के बाद चार दिनों तक झील जमी रही। विमान का पता लगाने के लिए कम से कम 17 बार खोज अभियान चलाया गया। खोजकर्ता गैरी कोजाक और एक टीम ने पिछले महीने पानी के भीतर एक रिमोट से संचालित वाहन का उपयोग कर झील में उसी जगह विमान का मलबा पाया, जहां रेडियो कंट्रोल टॉवर ने विमान के लापता होने से पहले उसे आखिरी बार ट्रैक किया था। जूनिपर द्वीप के निकट 200 फुट (60 मीटर) पानी में मिले विमान के मलबे की सोनार तस्वीरें ली गईं। कोजाक ने सोमवार को कहा, ”इन सभी सबूतों के साथ, हम 99 फीसदी पूरी तरह से आश्वस्त हो चुके हैं।” उन्होंने कहा कि विमान का मलबा मिलने से पीड़ित लोगों के परिवारों को थोड़ी राहत और उनके कई सवालों के जवाब मिलेंगे। पायलट जॉर्ज निकिता की संबंधी बारबरा निकिता ने मंगलवार को ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ से एक साक्षात्कार में कहा, ”विमान का मलबा मिलना एक सुखद अहसास है लेकिन यह उतना ही दिल को झकझोर कर रख देने वाला अहसास भी है| हम जानते हैं कि क्या हुआ था। हमने कुछ तस्वीरें देखी हैं।”     अमेरिका यूक्रेन को एक और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली भेजेगा  रूस के शक्तिशाली हमलों से जूझ रहे उत्तरपूर्वी खार्किव क्षेत्र में जवाबी हमलों के लिए हवाई सुरक्षा संबंधी मदद मांग रहे यूक्रेन को अमेरिका एक और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली देगा। दो अमेरिकी अधिकारियों ने  यह जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। अमेरिका की ओर से यूक्रेन को दी जाने वाली यह दूसरी पैट्रियट प्रणाली होगी। इस निर्णय की हालांकि सार्वजनिक रूप से घोषणा नहीं की गई है। इस निर्णय के बारे में सबसे पहले ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने खबर दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने पिछले महीने के अंत में अमेरिका से पैट्रियट प्रणाली मांगी थी। मिसाइल प्रणाली भेजने का यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों के रक्षा विभाग से जुड़े नेता यूक्रेन की सुरक्षा आवश्यकताओं पर अपनी मासिक बैठक की तैयारी में जुटे हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन बृहस्पतिवार को ब्रसेल्स में बैठक की मेजबानी करेंगे।   यूएसआईएसपीएफ ने प्रधानमंत्री मोदी को तीसरे कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं दी  नरेन्द्र मोदी को लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने पर बधाई देते हुए अमेरिका के एक प्रमुख भारत-केंद्रित व्यापार समूह ने मंगलवार को कहा कि मंत्रियों को सौंपे गये नये विभागों से ऐसा प्रतीत होता है कि नीति और सुधार एजेंडा पहले की तरह ही जारी रहने वाला है। मोदी ने रविवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की अगुवाई करते हुए रिकॉर्ड तीसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। ‘यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक एंड पार्टनरशिप फोरम’ (यूएसआईएसपीएफ) के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुकेश अघी ने शपथ ग्रहण समारोह के एक दिन बाद कहा, ”मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने और राजग सरकार का नेतृत्व करने पर बधाई देता हूं।” उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों के कुछ ही दिनों के भीतर शपथ ग्रहण से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार जल्द ही काम शुरू करने वाली है। उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार होने के बावजूद, जिस तरह से विभागों का बंटवारा किया गया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि नीति और सुधार एजेंडा पहले की तरह ही दजारी रहने वाला है। उन्होंने कहा, ”इससे न केवल निवेशकों का डर कम होगा बल्कि उनमें निवेश की भावना को भी बढ़ावा मिलेगा।”    

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