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फ्लू या हर्पीस इंफेक्शन का शिकार हुए हैं तो सालों बाद आप डिमेंशिया के रिस्क की गिरफ्त में आ सकते हैं: शोध

फ्लू (flu)ऐसा सीजनल इंफेक्शन है जो ज्यादातर लोगों को हो जाता है. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि फ्लू, हर्पीस (herpes) संक्रमण या रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट जैसे संक्रमण डिमेंशिया (dementia)के रिस्क को बढ़ा सकते हैं. जी हां, हाल ही में पब्लिश एक स्टडी में कहा गया है कि फ्लू और हर्पीस जैसे संक्रमण ब्रेन अट्रॉफी और डिमेंशिया से जुड़े हैं और अगर संक्रमण लगातार बने रहें तो डिमेंशिया के रिस्क बढ़ जाते हैं. इस स्टडी में उन जैविक कारकों का भी संकेत दिए गया जो न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज में योगदान करते हैं. नेचर एजिंग में छपी इस स्टडी में अल्जाइमर बीमारी और डिमेंशिया के बारे में एक उपयोगी डेटा प्रदान किया गया है. फ्लू और हर्पीस इन्फेक्शन से बढ़ सकता है डिमेंशिया अन्य स्टडी में पता चला है कि फ्लू के शॉट्स और शिंगल्स वैक्सीन के जरिए डिमेंशिया के रिस्क को कम किया जा सकता है. फ्लू और हर्पीस जैसे संक्रमण आगे जाकर स्ट्रोक और दिल के दौरे के भी कारण बन सकते हैं. स्टडी में कहा गया है कि कुछ गंभीर संक्रमण जैसे फ्लू, हर्पीस और सांस की नली का इन्फेक्शन मेंटल हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है. यहां तक कि छोटे मोटे इंफेक्शन भी दिमाग की सोचने और समझने की प्रोसेस को इफेक्ट कर सकते हैं. इससे दिमाग के व्यवहार करने का तरीका भी बदल सकता है. जबकि गंभीर संक्रमण दिमाग की क्षमता और इम्यून रिस्पांस के लिए कतई अच्छा नहीं है. स्टडी में कहा गया है कि ये सोचा जाना कि कोई संक्रमण न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज में बड़ी भूमिका निभा सकता है, फिलहाल संभव नहीं है लेकिन कोरोना महामारी के बाद इस बारे में सोचा जाने लगा है. वैस्कुलर डिमेंशिया का रिस्क बढ़ता है इस स्टडी में जिन संक्रमणों की जांच की गई, इनमें फ्लू, हर्पीस, रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और स्किन इंफेक्शन शामिल हैं. ये सभी ब्रेन लॉस यानी ब्रेन अट्रॉफी से जुड़े पाए गए हैं. स्टडी में कहा गया है कि ये संक्रमण तुरंत डिमेंशिया के खतरे को नहीं बढ़ाते हैं. इनके होने के सालों बाद डिमेंशिया और अल्जाइमर के जोखिम बढ़ जाते हैं. ये बढ़ा हुआ रिस्क वैस्कुलर डिमेंशिया से जुड़ा है. वैस्कुलर डिमेंशिया अल्जाइमर के बाद दूसरे सबसे बड़े मनोभ्रंश के रूप में पहचाना जाता है क्योंकि ये दिमाग में खून के रुकने से होता है. 

पाकिस्तान ने फिर चीन के सामने फैलाया हाथ, मांगा 110 अरब रुपये का नया लोन

इस्लामाबाद कंगाली में डूबे पाकिस्तान एक बार फिर खुद को बचाने के लिए चीन के दरवाजे पर खैरात मांगने पहुंच गया है। पाकिस्तान ने चीन से अतिरिक्त 10 अरब युआन (1.4 अरब डॉलर या 117.70 अरब भारतीय रुपये) का कर्ज देने की गुहार लगाई है। पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट ट्रिब्यून ने अपनी रिपोर्ट में इस बारे में जानकारी दी है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने वॉशिंगटन में चीन के वित्त मामलों के उप मंत्री लियानो मिन से मुलाकात की और चीनी पक्ष से मुद्रा विनिमय समझौते के तहत सीमा को बढ़ाकर 40 अरब युआन करने का अनुरोध किया। चीन के कर्ज जाल में फंस रहा पाकिस्तान ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, अगर चीन इस अनुरोध को स्वीकार कर लेता है तो कुल सुविधा लगभग 5.7 अरब डॉलर हो जाएगी। पाकिस्तान पहले ही अपना कर्ज चुकाने के लिए 30 अरब युआन (4.7 अरब डॉलर) की चीनी व्यापार सुविधा का उपयोग कर चुका है। अब वह इस सुविधा को अतिरिक्त 10 अरब युआन (1.4 अरब डॉलर) तक बढ़ाना चाहता है। मौजूदा 4.3 बिलियन डॉलर की सुविधा पाकिस्तानी केंद्रीय बैंक ‘स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान’ के विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा है, जो करीब 11 अरब डॉलर है। पहले भी खैरात मांग चुका है पाकिस्तान यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने इस तरह की मांग की है। नकदी संकट से जूझ रहे देश ने पहले भी कर्ज सीमा बढ़ाने की मांग की है, लेकिन चीन ने इस तरह की अपीलों को खारिज किया है। यहां ध्यान देने की बात है कि पाकिस्तान ने यह नया अनुरोध 4.3 अरब डॉलर की सुविधा को विस्तारित करने के दो सप्ताह बाद किया है। इस विस्तार को चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग की हाल की यात्रा के दौरान औपचारिक रूप दिया गया था, जिसमें पाकिस्तान की कर्ज चुकौती अवधि को 2027 तक बढ़ा दिया गया था। लोन चुकाने के लिए चाहिए लोन पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने नए अनुरोध की पीछे के कारणों को साफ नहीं किया है, लेकिन रिपोर्ट से पता चलता है कि पहले से चले आ रहे कुछ कर्जों की चुकौती को लेकर संकट के चलते देश अतिरिक्त वित्तीय सहायता के लिए मजबूर हुआ है। पाकिस्तान और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने लिए स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान और पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने दिसम्बर 2011 में द्विपक्षीय मुद्रा विनियम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 में 20 अरब युवान की प्रारंभिक सीमा को तीन वर्षों के लिए 30 अरब युवान तक बढ़ा दिया गया था। नवम्बर 2022 में तत्कालीन वित्त मंत्री इशाक डार ने अन्य कर्जों में देरी के कारण 10 अरब युआन की वृद्धि का अनुरोध किया था।

मोदी सरकार कब जारी कर सकती है PM Kisan Yojana की 19वीं किस्त? यहां जानें किसान

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना एक ऐसी योजना है जिसके जरिए करोड़ों किसानों को आर्थिक लाभ मिल रहा है। इस योजना को भारत सरकार चलाती है और देश का किसान इससे लाभान्वित हो रहा है। हर साल इस योजना के लिए करोड़ों रुपये जारी किए जाते हैं। जो किसान इस योजना के लिए पात्र होते हैं उन्हें भारत सरकार की तरफ से सालाना 6 हजार रुपये दिए जाते हैं। योजना के अंतर्गत अब तक कुल 18 किस्त के पैसे जारी हो चुके हैं और अब अगली बारी 19वीं किस्त की है। तो चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि ये किस्त कब जारी हो सकती है। आप अगली स्लाइड्स में 19वीं किस्त के बारे में जान सकते हैं… कितनी किस्त आ चुकी है?     पीएम किसान योजना के अंतर्गत अब तक 18 किस्त जारी हो चुकी हैं। बीती 5 अक्तूबर को 18वीं किस्त जारी की गई। इसका लाभ 9.4 करोड़ से अधिक किसान लाभार्थियों को मिला। डीबीटी के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में पैसे भेजे गए। कब जारी हो सकती है 19वीं किस्त?     किस्त के पैस देने के लिए एक नियम है जिसके अंतर्गत लगभग हर 4 महीने के अंतराल पर किस्त जारी की जाती है। ऐसे में अगर देखें तो पिछली किस्त (18वीं किस्त) 5 अक्तूबर 204 को जारी हुई। ऐसे में अगली किस्त (19वीं किस्त) का समय अगले चार महीने यानी जनवरी में जारी हो सकती है। हालांकि, अभी आधिकारिक तौर पर इसको लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है। ये काम जरूर करवा लें:-     अगर आप चाहते हैं कि आपको भी योजना के अंतर्गत मिलने वाले किस्त के 2 हजार रुपये मिले तो इसके लिए जरूरी है कि आप ई-केवाईसी करवा लें। जो किसान इस काम को नहीं करवाते हैं वे किस्त के लाभ से वंचित रह सकते हैं। इसलिए लाभ लेने के लिए ये काम जरूर करवा लें। 19वीं किस्त जारी होने की तारीख क्या है?     किस्त का लाभ लेने के लिए दूसरा काम है भू-सत्यापन। इस काम को करवाना भी बेहद जरूरी है। नियमों के तहत जो किसान इस काम को नहीं करवाते या करवाएंगे, वे किस्त के लाभ से वंचित रह जाएंगे     साथ ही अपने आधार कार्ड को अपने बैंक खाते से लिंक जरूर करवा लें क्योंकि अगर आप ये काम नहीं करवाते तो भी आपकी किस्त अटक सकती है।  

भारत में 2023 में सड़क हादसों के कारण 1,73,000 लोगों की मौत हुई: रिपोर्ट

नई दिल्ली भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौतों का आंकड़ा चिंताजनक है। 2023 में देश में 1,73,000 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा बैठे। इनमें से लगभग 55% मौतें केवल छह बड़े राज्यों – उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई हैं। राजस्थान में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा इजाफा देखा गया है, जहां 2022 की तुलना में 2023 में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 6% की वृद्धि हुई है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस बढ़ते हुए आंकड़े पर चिंता व्यक्त करते हुए शनिवार को अधिकारियों और इंजीनियरों से सड़क दुर्घटनाओं की जांच करने और सुधारात्मक कदम उठाने का आग्रह किया। सड़क हादसों में बुझ गए हजारों घरों के चिराग आंकड़ों से पता चलता है कि 2023 में इन छह राज्यों में 95,246 लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई, जबकि 2022 में यह संख्या 91,936 थी। हालांकि सड़क परिवहन मंत्रालय और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा अभी तक सड़क दुर्घटनाओं और मौतों पर रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की गई है, लेकिन यह ट्रेंड बताता है कि भारत द्वारा अगले छह वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को आधा करने की कोशिश के बावजूद यह समस्या कितनी गंभीर होती जा रही है। पिछले साल देश में कहां हुए सबसे अधिक सड़क हादसे दिल्ली में संयुक्त आयुक्त (यातायात) रह चुके पूर्व आईपीएस अधिकारी सत्येंद्र गर्ग ने बताया कि दुर्घटनाओं की उचित जांच और हस्तक्षेप से सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है। दिल्ली के यातायात मुद्दों से निपटने के दौरान मुझे इसका एहसास हुआ था। ज़्यादातर दुर्घटनाओं और मौतों को रोका जा सकता है। हादसों की जांच जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अधिकारियों को इस मानसिकता से बाहर निकलने की जरूरत है कि बड़े राज्यों में सड़कें और वाहन ज्यादा होने के कारण सड़क हादसों में होने वाली मौतों की संख्या भी ज्यादा होगी। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ और ड्राइविंग मैनुअल के लेखक नरेश राघवन का कहना है कि कानूनों को लागू करने के साथ-साथ ड्राइवरों को शिक्षित करने पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। वह कहते हैं कि याद रखें कि केवल पांच या छह नियमों को ही पुलिस यातायात नियमों को लागू कर सकती है। शेष 45 बुनियादी सड़क नियम लोगों/ड्राइवरों को सिखाने होंगे। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने शनिवार को सड़क और पुल निर्माण में उभरते रुझानों और तकनीकों पर एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले साल सड़क दुर्घटनाओं में हमने 1.73 लाख लोगों की जान गंवाई है और याद रखें कि हर साल मरने वाले लगभग 60% लोग 18-34 वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं। सड़क दुर्घटनाओं की सामाजिक-आर्थिक लागत हमारे सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3% है। कृपया इसे गंभीरता से लें। सड़क सुरक्षा के मुद्दों को संवेदनशीलता से निपटें, दुर्घटनाओं की जांच करें, खतरनाक जगहों को ठीक करें और मुद्दों का समाधान करें। हमने युद्धों में भी इतने लोगों को कभी नहीं खोया।

आज से शुरू हो रहे भारत के खिलाफ तीसरे टेस्ट में चोटिल विलियमसन नहीं खेलेंगे

मुंबई ग्रोइन इंजरी से जूझ रहे केन विलियमसन भारत के खिलाफ एक नवंबर से मुंबई में शुरू हो रहे तीसरे टेस्ट में भी नहीं खेलेंगे। न्यूजीलैंड क्रिकेट (एनजेडसी) ने कहा है कि इंग्लैंड के खिलाफ आगामी तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला में विलियमसन की फिटनेस सुनिश्चित करने के मद्देनजर वह तीसरे टेस्ट के लिए भारत नहीं जाएंगे। न्यूजीलैंड टीम के कोच गैरी स्टीड के हवाले से एनजेडसी ने कहा, “केन की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन इस समय वह हमारे साथ जुड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। इसलिए हमारे विचार में उन्हें अभी न्यूजीलैंड में रिहैब करना चाहिए ताकि वह इंग्लैंड के खिलाफा श्रृंखला के लिए तैयार हो सकें।” इंग्लैंड के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला क्राइस्टचर्च में 28 नवंबर से शुरू होने वाली है। विलियमसन को यह चोट श्रीलंका दौरे के दौरान लगी थी। जिसके चलते विलियमसन भारत के खिलाफ पहले दो टेस्ट मैचों का भी हिस्सा नहीं बन पाए थे।  

10 हाथियों की मौत से पार्क प्रबंधन पर उठे कई सवाल खड़े…?

Death of 10 elephants raises many questions on park management…? भोपाल। बांधवगाढ़ टाइगर रिज़र्व में 10 जंगली हथियो की मौत ने देश में हड़कंप मचा दिया पर प्रदेश सरकार गंभीर नहीं दिखाई नहीं देती नजर आ रही है। अपर मुख्य सचिव की अपने-पराए के आधार पर पोस्टिंग से लेकर वन सुरक्षा और इको समितिओं की निष्क्रिता पर सवाल उठने लगे हैं। अगर वन विभाग ने 26 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ में हुई हाथियों की मौत की घटना को गंभीरता से ले लिया होता तो शायद हाथियों को बचाया जा सकता था। हाथियों की मौत को लेकर सेवा निवृत मुख्य वन संरक्षक डॉ एसपीएस तिवारी पार्क प्रबंधन की कार्य शैली पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि बान्धवगढ़ में जंगली हाथी झारखंड के पलामू के जंगलों से कुसमी होते हुए संजय टाइगर रिज़र्व जो सीधी, सिंगरौली और छत्तीश गाढ़ में फैला है, बान्धवगढ़ में आये है और अनुकूल परिस्थियाँ पाकार स्थायी रूप से यहाँ स्थापित हो गए। वास्तव में पलामू से बान्धवगढ़ तक ग्रीन कॉरिडोर भी है। आज के स्थिति में 80 से 90 जंगली हाथी बांधव गढ़ में रह रहे है। बांधव गढ़ के पनपथा बफर जोन अंतर्गत ग्राम बकेली सलखनिया गांव के पास हाथियों की मौत के कारण का पता लगाने में पार्क प्रबंधन और वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट एवं डॉक्टर्स की टीम व्यस्त है। कारण जो भी हो, 10 जंगली हथियो की मौत ने पार्क प्रबंधन पर कई सवाल खड़े कर रहें है। डॉ तिवारी ने लिखा है कि मैं 1990 से 1995 तक उपवनमंडलाधिकारी मानपुर के हैसियत से पदस्थ था। तब पनपथा रेंज क्षेत्रीय रेंज था। तब भी यहां बाघों की अच्छी संख्या थी। पातौर ताला से मात्र 7 किमी की दूरी पर है। सलखनिया पातौर से लगा हुआ आदिवासी बाहुल्य गांव है , जहां मुख्यतया बैगा आदिवासी निवास करते है। पातौर और सलखनिया में वनसुरक्षा समिति गठित थी, जो बहुत ही सक्रिय थी और वन और वन्यप्राणी अपराधों को रोकने में सक्रिय भूमिका अदा करती थी । कोई छोटे-मोटे वन अपराध होने पर, गांव के लोग समिति की मीटिंग बुलाकर मावज़ा और अपराधी को सामाजिक रूप से बहिष्कृत भी करते थे। बैगा आदिवासी बहुत अंतर्मुखी होते है और वो तभी बाहरी व्यक्ति से खुल कर बात करते है जब वो समझ जाते है की ये अपने वाले है और हमारी भलाई के लिए है। अब यह सारा क्षेत्र अब बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में आ गया है अतः अब ये समितिया ईको समिति के रूप में परिवर्तित हो गई है। पातौर वन समिति तो वन सुरक्षा में इतनी सक्रिय थी कि तत्कालीन कलेक्टर शहडोल एसपीएस परिहार स्वयं कई बार समिति की मीटिंग में आये और बहुत सरे ग्राम विकास के कार्य भी करवाये। आख़िर ऐसा क्या हुआ कि 10 जंगली हाथी की मौत हो गई और पार्क प्रबंधन को पूर्व से हथियों के एक्टिविटी के बारे में जानकारी नहीं हो सकी। मौत का कारण तो अभी निश्चित नहीं हो पाया है परंतु यह बात प्रारंभिक रूप से मालूम हो रही है कि ज़हरीला पदार्थ खाने से मृत्यु हुई है। ऐसी भी आशंका जतायी जा रही है कि धान की फसल मी माहुर रोग लग गया था, उसके बचाव हेतु धान फसल में रसायन का छिड़काव किया गाया था, जिसे खाने से मृत्यु हुई होगी। अन्यथा जहर खुरानी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या इकोसमितिया निष्क्रिय हो गई..? क्या अधिकारी और कर्मचारी वहां के स्थानीय लोगों से संपर्क तोड़ चुके है। यदि इको समितियां सक्रिय होती तो गांव के लोग लोकल बीटगार्ड को ज़रूर बतलाते कि हाथी बीमार दिख रहे है। और शायद समय रहते इनका उपचार होता और 10 हाथी नहीं मरते। मुखबिर तंत्र का ह्रास एवं वन समितियों का निष्क्रिय होना ही इस असामयिक मृत्यु का मुख्य कारण समझ में आ रहा है। जनता को प्रबंधन से नहीं जोड़ा गयाप्रदेश में लगभग 15608 वन समितियों का गठन संयुक्त वन प्रबंधन के तहत हुआ है। 1051 इकोसमितियाँ है। इन समितियों की निरंतर बैठक एवं विकास तथा सुरक्षा राशि का इनके खाते में डाल कर स्थानीय जनता को रोज़गार देने का प्रावधान भी है परंतु कालांतर में इस विषय को ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। अज प्रदेश में 8 जंगली हथियो के मरने से वन एवं वन्य प्राणी प्रबंधन पर सवालिया निशान खड़ा होता है। ज़रूरत है, मृत्यु के कारण के तह तक जा कर इसे उजागर करे और भविष्य के लिए सीख ले। ताकि ऐसी घटना दोबारा ना घटे। जंगलों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन को मज़बूत कर वनसमितियों को सक्रिय करे।डॉ एस पी एस तिवारी आईएफ़एससेवा निवृत मुख्य वन संरक्षक एमपी भोपाल

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