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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 21 जून को अत्याधुनिक तारामंडल का करेंगे लोकार्पण

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव योग दिवस 21 जून को “खगोल विज्ञान एवं भारतीय ज्ञान परम्परा” पर उज्जैन में राष्ट्रीय कार्यशाला का करेंगे शुभांरभ उज्जैन स्थित वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला, डोंगला में आयोजित होगी कार्यशाला अत्याधुनिक तारामंडल का करेंगे लोकार्पण उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शनिवार 21 जून को “खगोल विज्ञान एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला, डोंगला, उज्जैन में करेंगे। कार्यशाला में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और शिक्षाविद शामिल होंगे। इस दौरान अनेक शैक्षणिक एवं वैज्ञानिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। इनमें योग शिविर, शून्य छाया अवलोकन, साइंस शो, स्टेम वर्कशॉप, व्याख्यान एवं परिचर्चा प्रमुख हैं। कार्यशाला भारतीय खगोलशास्त्र की परंपरा और उसकी वैज्ञानिक प्रासंगिकता पर केंद्रित होगी। विशेषज्ञ भारतीय ज्ञान प्रणाली और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाएगा। कार्यशाला में खगोल विज्ञान के साथ-साथ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का प्रयास किया जायेगा। कार्यशाला का आयोजन म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्, भोपाल, विज्ञान भारती, आचार्य वराहमिहिर न्यास उज्जैन, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल एवं वीर भारत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव पद्मडॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर वेधशाला में शंकु यंत्र के माध्यम से शून्य छाया अवलोकन करेंगे। साथ ही आचार्य वराहमिहिर न्यास एवं अवादा फाउंडेशन द्वारा निर्मित अत्याधुनिक तारामंडल का लोकार्पण भी करेंगे। इस दौरान तारामंडल-शो का प्रदर्शन भी किया जायेगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव वेधशाला स्थित ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन-सत्र को संबोधित करेंगे। परिचर्चा सत्र में खगोल विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा होगी। उल्लेखनीय है कि आचार्य वराहमिहिर न्यास द्वारा अवादा फाउण्डेशन के आर्थिक सहयोग एवं डीप स्काई प्लेनेटेरियम, कोलकाता के तकनीकी सहयोग से आचार्य वराहमिहिर न्यास द्वारा ग्राम डोंगला में अत्याधुनिक डिजीटल तारामंडल की स्थापना की गई हैं। तारामण्डल की स्थापना का उद्देश्य ग्रामीण अंचल के आमजन एवं स्कूली बच्चों में खगोल विज्ञान संबंधी जानकारी एवं प्राकृतिक घटनाओं संबंधी जिज्ञासा शांत करना है। इस तारामण्डल में 8 मीटर व्यास के एफ.आर.पी. डोम में ई-विजन 4 के डिजीटल प्रोजेक्टर एवं डिजीटल साउण्ड सिस्टम लगाया गया हैं। इस वातानुकूलित गोलाकार तारामण्डल में 55 लोग एक साथ बैठकर आकाशीय रंगमंच की हैरतअंगेज और जिज्ञाशावर्धक ब्रह्मांड में होने वाली घटनाओं का रोमांचक अनुभव एवं आनन्द ले सकेंगे। इस तारामण्डल की लागत लगभग 1.6 करोड़ रूपयें हैं। वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला, डोंगला : मध्य भारत में खगोल विज्ञान अनुसंधान का अग्रणी केंद्र उज्जैन जिले के महिदपुर तहसील स्थित ऐतिहासिक ग्राम डोंगला से कर्क रेखा गुजरती है। प्राचीन काल से ही खगोल और ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। भारत की गौरवशाली ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2013 में मध्यप्रदेश शासन के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा ग्राम डोंगला में वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला की स्थापना की गई। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की परिकल्पना, भूमि चयन से लेकर निर्माण तक की प्रक्रिया में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का विशेष योगदान रहा है। इस वेधशाला की स्थापना में भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बैंगलोर और आर्यभट्ट प्रशिक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES), नैनीताल का तकनीकी सहयोग प्राप्त हुआ है। वेधशाला में 5 मीटर डोम में स्थापित 20 इंच का आधुनिक टेलीस्कोप अनुसंधान और खगोल वैज्ञानिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। यह सुविधा प्रदेश और देश के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों को खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन और अनुसंधान का मंच प्रदान कर रही है। यहाँ खगोल विज्ञान पर आधारित विंटर स्कूल का आयोजन होता है और “एक भारत श्रेष्ठ भारत” योजना के अंतर्गत अन्य राज्यों के विद्यार्थी भी इस वेधशाला का भ्रमण कर रहे हैं। हाल ही में इस टेलीस्कोप को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर के सहयोग से ऑटोमेशन की सुविधा प्रदान की गई है। यह नई शिक्षा नीति और राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति के अनुरूप एक ऐतिहासिक पहल है। इससे सुदूर अंचलों के विद्यार्थी भी ऑनलाइन माध्यम से वेधशाला से जुड़ सकेंगे। डोंगला में ही स्थापित पद्मडॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर वेधशाला, जो प्राचीन खगोलीय यंत्रों पर केन्द्रित है, इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान के समन्वय के रूप में डोंगला को “डोंगला मीन टाइम (DMT)” की अवधारणा के केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में यह प्रयास एक ऐतिहासिक पहल है। देश के वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद होंगे शामिल कार्यशाला में विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. शिवकुमार शर्मा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे, भारतीय ज्ञान प्रणाली भारत सरकार नई दिल्ली के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. गंटी एस. मूर्ति, राष्ट्रीय नवप्रर्वतन प्रतिष्ठान गांधीनगर के निदेशक डॉ. अरविंद रानाडे, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक डॉ. ब्रजेश पांडे, म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एन. पी. शुक्ला, डेक्कन विश्वविद्यालय पुणे के पूर्व कुलपति एवं सीएसआईआर भटनागर फेलो, सीसीएमबी हैदराबाद डॉ. वसंत शिंदे, आचार्य वराहमिहिर न्यास उज्जैन के अध्यक्ष हेमंत भवालकर, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज, मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक डॉ. अनिल कोठारी, अवादा फाउंडेशन की निदेशक श्रीमती रितु पटवारी तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वरिष्ठ वैज्ञानिक सहित अन्य प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद शामिल होंगे।  

इंदौर में हर घर का होगा डिजिटल पता, एक क्लिक से सारी मुश्किलें होगी हल, वार्ड 82 से इसी महीने होगी शुरुआत

इंदौर प्रदेश के सबसे स्वच्छ शहर के नगर निगम ने एक नई डिजिटल पहल की शुरुआत की है। इसके तहत शहर के हर घर को एक डिजिटल पता मिलेगा। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मंगलवार को सिटी बस कार्यालय के सभागार में एक बैठक आयोजित हुई।  डिजिटलाइजेशन की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इंदौर नगर निगम ने अब शहर में हर घर को डिजिटल पता देने की तैयारी कर ली है। अब शहर में हर घर को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान दी जाएगी। मकान के बाहर एक शीट चिपकाई जाएगी। इस पर एक खास क्यूआर कोड होगा। इस क्यूआर कोड को स्कैन करने पर उस मकान से जुड़ी संपत्ति कर, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, कचरा संग्रहण और अन्य सेवाओं की जानकारी मिलेगी। यह व्यवस्था वार्ड 82 में इस माह के अंत तक शुरू हो जाएगी। इसके बाद इसे चरणबद्ध तरीके से निगम के अन्य वार्डों में लागू किया जाएगा। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पिछले वर्ष के निगम बजट में शहर को डिजिटलाइज करने की बात कही थी। इसके बाद से इस बात की कोशिशें चल रही थीं। डिजिटलाइजेशन के अभियान के तहत निगम शहर में हर भवन के बाहर क्यूआर कोड लगाने जा रहा है। पहले चरण में वार्ड 82 में इसकी शुरुआत होगी। मकान के बाहर क्यूआर कोड लगा होने का फायदा निगम और भवन स्वामी दोनों को मिलेगा। कोई भी व्यक्ति क्यूआर कोड को स्कैन कर यह पता लगा सकेगा कि मकान का संपत्तिकर जमा है या नहीं, कचरा संग्रहण कर नियमित जमा हो रहा है या नही। इसी तरह से उक्त पते पर जारी किए गए प्रमाण पत्रों की जानकारी भी क्यूआर कोड से मिल सकेगी। निगम के राजस्व विभाग के अधिकारियों को क्यूआर कोड स्कैन करते ही भवन की जानकारी मिल जाएगी। उन्हें पुराने रिकार्ड साथ नहीं ले जाने पड़ेंगे। पूरे शहर में लागू करने की कोशिश होगी तेज बैठक के दौरान महापौर ने इंदौर नगर निगम के अधिकारियों को निर्देश दिया कि इस योजना को शीघ्र पूर्ण कर पूरे शहर में लागू किया जाए। इस डिजिटल पहल को डिजिटल इंडिया के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण कदम मानते हुए महापौर ने कहा कि यह शहरवासियों को पारदर्शी, सुलभ और स्मार्ट सेवाएं प्रदान करेगा। हर घर को मिलेगा डिजिटल पता महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा, “हमने जो ऐप तैयार किया है, उसके जरिए हर घर का डिजिटल पता सुनिश्चित किया जाएगा। इससे नागरिकों को नगर निगम से संबंधित सभी जानकारी एक ही जगह मिल सके। पहले प्रयास के रूप में, वार्ड 82 में इस योजना को लागू किया जाएगा और हम इसे शीघ्र पूरा करने का प्रयास करेंगे। महापौर ने यह भी बताया कि एप के माध्यम से नागरिक कचरा संग्रहण के लिए गाड़ी को बुला सकेंगे। एक रिक्वेस्ट भेजने पर निगम की टीम घर पर कचरा उठाने के लिए पहुंच जाएगी। हालांकि, कचरा उठाने के लिए शुल्क तय किया जाएगा, जो अभी निर्धारित नहीं किया गया है। मकानों के बाहर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे     हमने मकानों के बाहर क्यूआर कोड लगाने की तैयारी कर ली है। इस माह के अंत तक वार्ड 82 से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी। इसके बाद धीरे-धीरे पूरे शहर में मकानों के बाहर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे। निगम की यह पहल शहरवासियों को पारदर्शी, सुलभ और स्मार्ट सेवा प्रदान करेगी। जल्द ही हम एप के माध्यम से कचरा संग्रहण के लिए गाड़ी बुलाने की शुरुआत भी करेंगे। – पुष्यमित्र भार्गव, महापौर इंदौर  

महाकाल की नगरी उज्जैन में बन रहा महाकाल-संस्कृति वन, लगेंगे 30 हजार पौधे, योग-ध्यान केंद्र होगा तैयार

उज्जैन  PM मोदी की पहल पर गुजरात में स्थापित संस्कृति वन की तर्ज पर उज्जैन में भी एक भव्य महाकाल संस्कृति वन का निर्माण किया जा रहा है। यह वन 12 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होगा और इसे कोठी रोड पर बनाया जा रहा है। इस वन के निर्माण के साथ पर्यावरण और संस्कृति को एक साथ जोड़ा जाएगा, ताकि आने वाले लोग न केवल प्रकृति से जुड़ सकें, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी समृद्ध हो सकें। संस्कृति वन का निर्माण महाकाल संस्कृति वन को कुल 13 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया जा रहा है। इस वन में 30 हजार पौधे लगाए गए हैं, जिनमें औषधीय पौधों का भी समावेश है। यहां नीम, करंज, बरगद, सिंदूर, बेल, पाम, चंदन, बादाम और कदम जैसे पौधे लगाए गए हैं। यह वन केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के भी प्रतीक बनेगा। इस वन में योग केंद्र भी बनाया जाएगा, जहां लोग ध्यान और योग का अभ्यास कर सकेंगे। इसके अलावा, अवंतिका नगरी का इतिहास दर्शाने के लिए राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बत्तीसी का भी निर्माण किया जा रहा है। यह वन धार्मिक यात्रा के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन का एक अनूठा केंद्र बनेगा। महाकाल संस्कृति वन में कुल 8 ब्लॉक्स होंगे, जिनका नाम कालिदास वन, शांति वन, जैव विविधता वन, नवग्रह वाटिका, सिंदूर वाटिका, रुद्राक्ष वाटिका जैसे आकर्षक नामों से रखा जाएगा। विक्रम टीले और सिंहासन बत्तीसी उज्जैन के महाकाल संस्कृति वन में सम्राट विक्रमादित्य की भव्य सिंहासन बत्तीसी का दर्शन भी होगा। विक्रम टीला भी यहां विशेष रूप से सुसज्जित किया जा रहा है, जहां फूलों से सुसज्जित एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत किया जाएगा। यह दृश्य न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अनूठा होगा। स्थायी कुंभ सिटी का निर्माण उज्जैन सिंहस्थ कुंभ 2028 से पहले उज्जैन में एक स्थायी कुंभ सिटी का निर्माण किया जाएगा। 5,000 करोड़ रुपए की लागत से इस सिटी का निर्माण किया जाएगा, जिसमें इंटरकनेक्टेड चौड़ी सड़के, अंडरग्राउंड लाइटिंग, हॉस्पिटल, स्कूल, खूबसूरत चौराहे और सड़कों के बीच डिवाइडर जैसी सुविधाएं होंगी। यह स्थायी कुंभ सिटी सिंहस्थ कुम्भ के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक समृद्ध अनुभव प्रदान करेगी। सिंहस्थ से पहले एलिवेटेड ब्रिज की सौगात सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन को दो एलिवेटेड ब्रिज भी मिलेंगे, जिनकी मंजूरी मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दी है। ये ब्रिज नागपुर की तर्ज पर बनाए जाएंगे और इस सड़क मार्ग को चौड़ा करेंगे, जिससे तीर्थयात्रियों की यात्रा सुगम हो सकेगी। महाकाल संस्कृति वन के अन्य आकर्षण महाकाल संस्कृति वन में सप्त सागरों के आसपास 84 शिवलिंग स्थापित किए जाएंगे, जिनकी परिक्रमा की जा सकेगी। इसके अलावा, यहां फूल घाटी, विद्या वाटिका, कालिदास अरण्य, नक्षत्र वाटिका, और चरक वाटिका जैसे अनेक आकर्षक स्थान होंगे। इसके साथ ही, भगवान श्री कृष्ण की 64 कलाओं का भी यहां दर्शन किया जा सकेगा। भविष्य की योजनाएं और सुविधाएं महाकाल संस्कृति वन में कैफेटेरिया, पार्किंग, व्हीलचेयर और ग्रीन शेड जैसी सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी। इसके अलावा, वन में शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति भी सुनिश्चित की जाएगी। वन विभाग जल्द ही अहमदाबाद जाकर वहां के संस्कृति वन की स्टडी करेगा, ताकि यहां भी उसी मॉडल पर काम किया जा सके। धार्मिक पर्यटन को मिलेगा एक नया रूप  महाकाल संस्कृति वन उज्जैन का एक अद्भुत और अनूठा धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बनेगा। यह वन न केवल पर्यटकों को धार्मिक अनुभव प्रदान करेगा, बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी कार्य करेगा। इस वन के साथ उज्जैन में धार्मिक पर्यटन को एक नया रूप मिलेगा और यह स्थान तीर्थ यात्रियों के लिए एक प्रमुख आकर्षण बन जाएगा। उज्जैन का फिर से लौटेगा प्राचीन वैभव, मोहन यादव की इच्छानुसार महाकाल क्षेत्र के सभी गेटों का किया जाएगा जीर्णोद्धार. डॉ. मोहन यादव की मंशा के अनुरूप 2600 साल पुरानी परंपरा का वैभव अब महाकाल की नगरी उज्जैन में लौटने जा रहा है. प्राचीनकाल में बाबा महाकाल की नगरी में प्रवेश द्वार की परंपरा रही है. जिसका जीर्णोद्धार अब मुख्यमंत्री के निर्देशन में प्रशासन कराने जा रहा है. उज्जैन कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने इस बात की जानकारी देते हुए बताया कि प्राचीन समय में उज्जैन में जिस तरह के प्रवेश द्वारा हुआ करते थे, उसी तरह के द्वार फिर से बनाए जाएंगे. जिससे नगर में आने वाले पर्यटक महाकाल नगरी की प्राचीन परंपरा को जान सकेंगे. आइए जानते हैं ये द्वारा कैसे थे और इसका इतिहास क्या था. क्या कहते हैं इतिहास के जानकार? विक्रम विश्वविद्यालय में पुराविद प्रोफेसर डॉ. रमण सोलंकी बताते हैं कि “प्राचीन भारत में गोपुरम की परंपरा रही है. यह एक प्रकार का विशाकाय द्वार होता है. इसका अर्थ होता है ‘मंदिर का द्वार’. दक्षिण भारत के मंदिरों में ये आज भी मौजूद है. 2600 साल पहले उज्जैन एक राजधानी के रूप में हुआ करता था. यह 16 महाजनपदों में से एक अवंती महाजनपद की राजधानी थी, जिसके पहले राजा चंद प्रद्योत थे. उन्होंने अपने शासन काल में उज्जैन क्षेत्र में परिखाये और गोपुरम निर्माण करवाए, बाद में अशोक मौर्य जब राज्यपाल बनकर आए तो उन्होंने उनका जीर्णोद्धार करवाया.” राजा भोज ने बनवाया था चौबीस खंबा प्रवेश द्वार डॉ रमण सोलंकी आगे बताते हैं कि “सम्राट विक्रमादित्य ने अपने कार्यकाल में इस परंपरा को आगे बढ़ाया. इसके अलावा परमारों के सम्राट राजा भोज ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कई द्वारों का निर्माण कराया. राजा भोज द्वारा बनवाया गया चौबीस खंबा प्रवेश द्वार आज भी मौजूद है. इस पर देवी महामाया और देवी महालया विराजमान हैं. महाकाल के द्वारा का कराया जाएगा जीर्णोद्धार  मुगल शासक अकबर ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दानी गेट, सती गेट, केडी गेट बनवाए. अब मोहन यादव इन द्वारों के जीर्णोद्धार और निर्माण कराने जा रहे हैं. इससे 2600 साल पुरानी परंपरा का वैभव फिर से लौटेगा. इससे यहां आने वाले श्रद्धालु महाकाल नगरी के इस सुनहरे इतिहास को जान सकेंगे और देख सकेंगे.” करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है महाकाल का दरबार दरअसल, विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल का धाम लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का खास केंद्र है. मंदिर का इतिहास हजारों वर्षों पूर्व का बताया जाता है. ज्योतिर्लिंग होना मतलब स्वयंभू … Read more

ग्वालियर में बनी भगवान राम की 51 फीट ऊंची प्रतिमा, अब रायपुर में करेगी राम पथगमन के दर्शनार्थियों को मंत्रमुग्ध

रायपुर/ग्वालियर  भगवान श्रीराम की 14 वर्षों की वन यात्रा आज भी भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का अहम हिस्सा है। श्रीराम ने अयोध्या से लेकर श्रीलंका तक का मार्ग जंगलों में व्यतीत किया, जिन स्थानों से वे गुज़रे वे आज राम वन गमन पथ के रूप में श्रद्धा का केंद्र हैं। भारत सरकार इस पथ पर पड़ने वाले धार्मिक स्थलों को विकसित करने का कार्य कर रही है, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित 10 राज्यों के 248 स्थलों को सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से संवारा जा रहा है। रायपुर में लगेगी ग्वालियर में बनी मूर्ति अब इसी पथ पर ग्वालियर की भी महत्वपूर्ण भागीदारी दर्ज होने जा रही है। ग्वालियर के प्रसिद्ध मिंट स्टोन से बनी भगवान राम की 51 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा जल्द ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के निकट चंदखुरी में स्थापित की जाएगी। यह प्रतिमा वनवासी रूप में श्रीराम को दर्शाती है और इसे जाने-माने मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा और उनकी टीम ने तैयार किया है। 7 महीने पहले मिला था काम इस विशाल प्रतिमा को आकार देने का जिम्मा छत्तीसगढ़ सरकार ने करीब 7 महीने पहले दीपक विश्वकर्मा को सौंपा था। उनकी टीम के 25 कलाकारों ने दिन-रात मेहनत करके इसे मूर्त रूप दिया है। यह प्रतिमा पूरी तरह ग्वालियर मिंट स्टोन से बनी है। अलग-अलग खंडों को जोड़कर एक अद्भुत और सजीव आकृति तैयार की गई है। वनवासी स्वरूप में है प्रतिमा इस मूर्ति की विशेषता है कि यह भगवान राम को वनवासी स्वरूप में दर्शाती है। उनकी वेशभूषा, पुष्पहार, रुद्राक्ष की 108 माला, खड़ाऊ आदि सभी को अत्यंत सूक्ष्मता और सुंदरता से पत्थर में उकेरा गया है। मूर्तिकार ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से डिजाइन पहले से तय थी और उसी के अनुसार इसे तैयार किया गया। मूर्ति में शिवरीनारायण की छवि भी दिखेगी राम वनगमन पथ में 9 जगहों को चिन्हित किया गया था। इनमें से 7 जगहों चंदखुरी, शिवरीनारायण, सीतामढ़ी हरिचौका, राजिम, चंपारण, नगरी सिहावा, रामगढ़ में मूर्तियां लगाईं। रामाराम (सुकमा) और तुरतुरिया (बलौदा बाजार) में विकास कार्य किया गया है। चंदखुरी को छोड़कर बाकी 6 जगहों पर 25 फीट की मूर्ति स्थापित की गईं हैं। मूर्ति निर्माण में आईं चुनौती दीपक विश्वकर्मा के अनुसार, इस प्रतिमा का निर्माण अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। सबसे पहले विशाल पत्थर को काटकर ज़मीन पर बिछाया गया, फिर उसके ऊपर डिजाइन उकेरा गया। माप-तौल और ड्राइंग के बाद मूर्ति पर काम शुरू हुआ। इस प्रक्रिया में लगभग 60-70 टन मिंट स्टोन का उपयोग हुआ, लेकिन कटाई और तराशने के बाद प्रतिमा का कुल वजन लगभग 30-35 टन रह गया। इस भव्य प्रतिमा के निर्माण में लगभग 72 लाख रुपये की लागत आई है। इसे रायपुर ले जाकर स्थापित करने में अतिरिक्त 22-25 लाख रुपये का खर्च अनुमानित है। यानी कुल मिलाकर यह करीब 1 करोड़ रुपये की लागत से पूरी होगी। 25 कलाकारों ने 7 महीने में तैयार की मूर्ति छत्तीसगढ़ सरकार ने 7 महीने पहले दीपक विश्वकर्मा को इस मूर्ति को तैयार करने का जिम्मा सौंपा था. इस प्रतिमा को तैयार करने में दीपक विश्वकर्मा के साथ उनकी टीम के करीब 25 कलाकारों ने 7 महीने तक दिन रात मेहनत की है. इस पूरी प्रतिमा को ग्वालियर मिंट स्टोन से तैयार किया गया है. अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर इसे एक स्वरूप दिया गया है. इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रतिमा कैसी होनी चाहिए इसके बिंदु पहले ही बता दिए थे. ऐसे में उनके अनुसार ही इसे तैयार किया गया है. 60-70 टन मिंट स्टोन का इस्तेमाल इस प्रतिमा में राम की सुंदरता और वनवासी रूप को दर्शाने के लिए पुष्प हार को पत्थर में ही उकेरा गया है. साथ ही प्रमुख आकर्षण रुद्राक्ष की माला है, जिसे 108 पत्थरों से रूप दिया गया है. खड़ाऊ भी अत्यंत आकर्षक बनाए गए हैं. इस प्रतिमा को बनाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से दीपक को डिजाइन उपलब्ध कराया गया था. उसी डिजायन को दीपक ने पत्थर में हूबहू उकेरा है. इस प्रतिमा को तैयार करने के लिए 60-70 टन ग्वालियर मिंट स्टोन का इस्तेमाल किया गया. हालांकि, कांट छांट और प्रतिमा को स्वरूप देने में आधा पत्थर निकल गया फिर भी यह करीब 30 से 35 टन वजनी है. इससे पहले भी बनाई हैं प्रतिमाएं यह पहली बार नहीं है जब ग्वालियर में बनी राम प्रतिमा को राम वन गमन पथ पर स्थान मिला हो। इससे पहले भी दीपक विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई 25-25 फीट ऊंची दो प्रतिमाएं छत्तीसगढ़ में स्थापित की जा चुकी हैं। इन्हीं की गुणवत्ता और कलात्मकता को देखते हुए उन्हें 51 फीट ऊंची इस नई प्रतिमा का कार्य सौंपा गया। यह प्रतिमा राम वन गमन पथ पर अब तक लगाई गई 7 मूर्तियों में सबसे ऊंची है और जल्द ही इसकी स्थापना चंदखुरी में की जाएगी। यह न सिर्फ ग्वालियर के लिए गर्व की बात है, बल्कि धार्मिक पर्यटन के लिए भी एक बड़ा आकर्षण बनने जा रही है। चुनौतीपूर्ण रहा पत्थर से प्रतिमा का सफर भगवान राम की यह प्रतिमा अपने आप में अनोखी है और इसे बनाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. दीपक विश्वकर्मा ने बताया, “इस प्रतिमा का साइज अपने आप में चुनौती था. पहले मूर्ति के लिए पत्थर को काटा गया और उसे जमीन पर बिछाया गया. जिसके बाद इसकी ड्राइंग तैयार की गई. नाप तौल किया गया, क्योंकि डिजाइन के अनुसार 51 फीट की प्रतिमा बनाना आसान नहीं था, लेकिन पूरी टीम ने इसे सफलता पूर्वक पूरा किया.” दीपक ने यह भी बताया, “मूर्ति को पास कर दिया गया है और आने वाले एक हफ्ते में यह मूर्ति रायपुर के लिए रवाना हो जाएगी.” प्रतिमा पर 1 करोड़ होंगे खर्च जितनी भव्य और आकर्षक यह प्रतिमा है, उतना ही इसका खर्च भी है. 51 फीट ऊंची इस प्रतिमा को बनाने में करीब 72 लाख रुपए की लागत आई है. इसके बाद जब इसे रायपुर में लगाया जाएगा, तो वहां भी करीब 22-25 लाख रुपए का खर्च आएगा. यानी करीब एक करोड़ रुपए की लागत से राम वन गमन पथ पर ग्वालियर की यह प्रतिमा शोभा बढ़ाएगी. पहले भी लगाईं ग्वालियर में तैयार दो प्रतिमाएं ऐसा नहीं है कि यह पहली प्रतिमा है, जो राम वन गमन पथ … Read more

Wasteकी ताकत!CBG प्लांट से बदलने वाला है ग्वालियर का भविष्य, रोज़ बनेगा CNG और खाद

ग्वालियर  शहर में कचरे से निजात पाने और स्वच्छ वातावरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। नगर निगम ग्वालियर द्वारा प्रस्तावित मध्यप्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा वेस्ट आधारित सीबीजी (कंप्रेस्ड बायोगैस) प्लांट अब केदारपुर डंपसाइड पर स्थापित किया जाएगा। इस प्लांट को बनाने की लागत करीब 75 करोड़ रुपये होगी और इसे लगभग 5.5 हेक्टेयर भूमि पर तैयार किया जाएगा। प्रोजेक्ट को मिली स्वीकृति ग्वालियर नगर निगम के अपर आयुक्त मुनीष सिंह सिकरवार ने बताया कि सरकार से इस परियोजना को स्वीकृति मिल चुकी है और जल्द ही इसके निर्माण के लिए टेंडर जारी कर दिए जाएंगे। यह प्लांट शहर में हर दिन निकलने वाले 350 टन गीले और सूखे कचरे को प्रोसेस करेगा। इसमें से गीले कचरे से बायो सीएनजी गैस और खाद तैयार की जाएगी। प्लांट से प्रतिदिन करीब 9 टन बायो सीएनजी गैस का उत्पादन होगा, जिसका उपयोग नगर निगम के वाहनों में किया जाएगा और साथ ही इसे कमर्शियल रूप से भी बेचा जाएगा। इससे नगर निगम को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। सूखे कचरे के लिए बनेगा अलग प्लांट इसके अतिरिक्त, 277 टन सूखे कचरे के लिए भी अलग प्लांट लगाया जाएगा, जिससे प्लास्टिक और अन्य रीसायक्लिंग योग्य सामग्री का निष्पादन किया जाएगा। इस योजना से न केवल शहर को कचरे के ढेर से छुटकारा मिलेगा, बल्कि स्वच्छता अभियान को भी मजबूती मिलेगी। पहले इस प्लांट को चंदुआखुर्द डंपयार्ड में लगाया जाना था, लेकिन भूमि की कमी और स्थानीय विवादों के चलते स्थान बदलकर केदारपुर किया गया है। यह लैंडफिल्ड साईट अब धीरे-धीरे खाली हो रही है, जिससे यहां प्लांट निर्माण संभव हो सका। 2027 तक पूरा होगा प्रोजेक्ट यह परियोजना साल 2027 तक पूरी होने की संभावना है। साथ ही डबरा, दतिया और बमौर जैसे आस-पास के क्षेत्रों से भी कचरा लाकर यहां प्रोसेस किया जाएगा। इस सीबीजी प्लांट की स्थापना ग्वालियर को स्वच्छ और हरित शहर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। शासन से स्वीकृति, जल्द होंगे टेंडर ग्वालियर में मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा गोबर आधारित बायो सीएनजी प्लांट लगाया गया था, जिससे ना सिर्फ प्रतिदिन 100 टन गोबर का निष्पादन हो रहा बल्कि इससे बन रही 1 टन बायो सीएनजी निगम का राजस्व भी बढ़ा रही है. अब इंदौर के बाद प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा सीबीजी प्लांट भी ग्वालियर में स्थापित होने जा रहा है. ग्वालियर नगर निगम ने इसके लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा था और इस पर स्वीकृति भी मिल चुकी है. इस प्लांट में प्रतिदिन शहर से इकट्ठा किया 350 टीपीटी (टन प्रति दिन) सूखा और गीला कचरा से बायो सीएनजी गैस और खाद तैयार की जाएगी.  सूखे कचरे के लिए अलग से होगा एक प्लांट शहर में लगने वाले कचरे के ढेर से निजात पाने के लिए ये अच्छा विकल्प नगर निगम ने तैयार किया है. ग्वालियर नगर निगम के अपर आयुक्त मुनीष सिंह सिकरवार ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि, ”ये प्लांट सरकार द्वारा स्वीकृत किया गया है इसके साथ ही एक और प्लांट स्थापित किया जाएगा. जिसके जरिए प्रतिदिन 277 टीपीटी सूखा कचरा भी निष्पादित किया जाएगा. ये एक बहतरीन व्यवस्था होगी जिससे शहर में कचरे के जगह जगह लगने वाले ढेरों से छुटकारा मिलेगा और वातावरण साफ सुथरा होगा.” साढ़े 5 हेक्टेयर में बनेगा प्लांट इस प्लांट को तैयार करने के लिए नगर निगम को अच्छी खासी राशि खर्चनी पड़ेगी. अपर आयुक्त की माने तो इस प्लांट को बनाने में करीब 75 करोड़ रुपये की लागत आएगी. पहले वेस्ट बेस्ड सीबीजी प्लांट को तैयार करने के लिए निगम द्वारा चंदुआखुर्द डंप यार्ड में जमीन प्रस्तावित की गई थी. लेकिन यहां जमीन की कमी और स्थानीय विवादों के चलते बदलने का निर्णय किया गया और अब इसे केदारपुर डंपसाइड पर लगाने का निर्णय लिया गया. ये प्लांट लगभग 5.5 हेक्टेयर जमीन पर स्थापित किया जाएगा. क्योंकि ये लैंडफील्ड साइट अब खाली हो रही है. यहां का कचरा धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है. इसलिए इसी जमीन पर नया सीबीजी प्लांट स्थापित किया जाएगा.  आसपास के क्षेत्रों से भी लाया जाएगा कचरा केदारपुर डंप साइड पर लगने वाले इस प्लांट में हर दिन शहर के कचरे के साथ ही डबरा दतिया और बमौर क्षेत्र से भी कचरा लाया जाएगा. यहां गीला और सूखा कचरा अलग अलग किया जाएगा. गीले कचरे का उपयोग बायो गैस बनाने में होगा. इसके बाद जो वेस्ट मटेरियल बचेगा उससे खाद तैयार की जाएगी. माना जा रहा है की 350 टीपीटी (टन प्रति दिन) कचरे से हर दिन लगभग 9 टन बायो सीएनजी गैस तैयार होगी. जिसे नगर निगम के वाहनों में इस्तेमाल करने के साथ ही कमर्शियल तौर पर बेचा जाएगा. जिससे की नगर निगम को राजस्व भी प्राप्त होगा. साल 2027 तक तैयार होगा प्लांट ग्वालियर नगर निगम के अपर आयुक्त मुनीष सिंह सिकरवार के मुताबिक, ”यह प्लांट अभी पेपरवर्क स्तर पर है. आने वाले एक या दो हफ़्ते में इसके निर्माण के लिए टेंडर भी जारी होने वाले हैं. आने वाले दो से तीन साल में इसका निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा. ऐसे में यह प्लांट इस क्षेत्र में नई उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है.”

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