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बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में नई पहल, 4100 कुओं पर मुंडेर बनाए जाएंगे, जानवरों की सुरक्षा को दिया जोर

उमरिया उमरिया स्थित विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। जिला प्रशासन और टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने रिजर्व क्षेत्र के नौ परिक्षेत्रों में लगभग 4,100 खुले कुओं पर मुंडेर (सुरक्षा दीवार) बनाने का काम की शुरुआत हो गई है।  वन क्षेत्र और उससे सटे ग्रामीण इलाकों में स्थित इन खुले कुओं में अक्सर जंगली जानवर और कभी-कभी ग्रामीण भी गिर जाते हैं। धमोखर परिक्षेत्र सहित कई इलाकों से ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। हाल ही में जनवरी माह में धमोखर के रायपुर क्षेत्र में एक बाघ के कुएं में गिरने से मौत हो गई थी, जिसके बाद इस अभियान को और तेज किया गया। टाइगर रिजर्व के कोर और बफर दोनों क्षेत्रों में चिन्हित कुओं पर मुंडेर निर्माण का काम शुरू हो चुका है। अधिकारियों और कर्मचारियों की टीमें गांव-गांव जाकर बिना मुंडेर वाले कुओं का सर्वे कर रही हैं और प्राथमिकता के आधार पर निर्माण कार्य करा रही हैं। वन्यजीव फोटोग्राफर चेतन घारपुरे ने इस पहल को सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि बिना मुंडेर वाले कुओं में वन्य प्राणियों के साथ-साथ ग्रामीणों के गिरने का भी खतरा बना रहता है। कुओं पर मजबूत मुंडेर बनने से वन्यजीव और मानव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। जिला प्रशासन और टाइगर रिजर्व प्रबंधन का लक्ष्य है कि चिन्हित सभी कुओं पर चरणबद्ध तरीके से मुंडेर निर्माण पूरा कर पूरे क्षेत्र को वन्यजीवों और स्थानीय निवासियों के लिए सुरक्षित बनाया जाए।

स्वदेशी AI Sarvam ने दावेदारी की, इंटरनेट बिना भी करेगा काम और ग्लोबल AI को चुनौती

 नई दिल्ली  India AI Impact Summit के दौरान Sarvam AI का नाम तेजी से सामने आया है. वजह है कंपनी का नया प्लेटफॉर्म Sarvam Edge. इसे ऑन-डिवाइस AI के तौर पर पेश किया गया है. आसान शब्दों में कहें तो यह AI आपके मोबाइल और लैपटॉप पर बिना इंटरनेट के भी चल सकता है. मतलब हर सवाल या कमांड के लिए डेटा क्लाउड पर भेजने की जरूरत नहीं होगी. प्रोसेसिंग डिवाइस के अंदर ही होगी. यह आइडिया नया नहीं है, लेकिन भारत जैसे देश में यह काफी प्रैक्टिकल हो सकता है. यहां हर जगह तेज और स्टेबल इंटरनेट नहीं मिलता. ऐसे में ऑफलाइन या लो-इंटरनेट पर चलने वाला AI ज्यादा काम का साबित हो सकता है. Sarvam Edge क्या करता है और किसके लिए बना है Sarvam Edge का फोकस रोजमर्रा के बेसिक AI कामों पर है. जैसे वॉइस को टेक्स्ट में बदलना. टेक्स्ट को दूसरी भाषा में ट्रांसलेट करना. और कुछ लिमिटेड AI असिस्टेंट टास्क. कंपनी भारतीय भाषाओं पर ज्यादा काम कर रही है. इसलिए इसका इस्तेमाल उन यूजर्स के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है जो हिंदी या दूसरी लोकल लैंग्वेज में काम करते हैं. ऑन-डिवाइस होने का एक फायदा प्राइवेसी से जुड़ा है. यूजर का डेटा बाहर सर्वर पर नहीं जाता. सब कुछ फोन या लैपटॉप में ही प्रोसेस होता है. हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है. अगर डिवाइस पुराना है या कमजोर हार्डवेयर है तो परफॉर्मेंस और बैटरी पर असर पड़ सकता है. ChatGPT से तुलना, दोनों का अप्रोच अलग है ChatGPT क्लाउड पर चलने वाला बड़ा AI मॉडल है. यह इंटरनेट के जरिए काम करता है. इसकी ताकत यह है कि यह काफी जटिल सवालों को हैंडल कर सकता है. लॉन्ग कन्वर्सेशन कर सकता है. और कई टॉपिक्स पर डीप जवाब देता है. Sarvam Edge का अप्रोच अलग है. यह छोटे और हल्के मॉडल पर काम करता है. इसका मकसद हर तरह का जनरल AI बनना नहीं है. बल्कि कुछ खास टास्क को लोकल लेवल पर आसान बनाना है. जहां इंटरनेट नहीं है या स्लो है, वहां यह ज्यादा काम का हो सकता है. सीधी भाषा में कहें तो ChatGPT ज्यादा पावरफुल है, लेकिन Sarvam Edge ज्यादा प्रैक्टिकल कंडीशन को टारगेट करता है. दोनों का यूज-केस अलग है. Google Gemini से तुलना, स्केल और टारगेट में फर्क Google Gemini भी क्लाउड बेस्ड AI सिस्टम है. यह बड़े डेटा सेंटर पर चलता है. Gemini का फोकस मल्टीमॉडल AI पर है. यानी टेक्स्ट, इमेज और दूसरी चीजों को एक साथ समझना. यह हाई-एंड यूजर्स और कंपनियों के लिए ज्यादा डिजाइन किया गया है. Sarvam Edge यहां भी अलग रास्ता लेता है. इसका स्केल छोटा है. लेकिन टारगेट ज्यादा ग्राउंड लेवल यूजर हैं. खासकर वे लोग जो लोकल लैंग्वेज में काम करते हैं. और जिनके पास हर समय तेज इंटरनेट नहीं होता. इसलिए Gemini और Sarvam Edge को सीधा कंपटीटर कहना सही नहीं होगा. दोनों अलग जरूरतों को पूरा करते हैं. भारत के AI इकोसिस्टम में Sarvam की जगह भारत सरकार IndiaAI Mission के जरिए लोकल AI को बढ़ावा देने की बात कर रही है. Sarvam AI जैसे स्टार्टअप इसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं. इनका फोकस भारत के यूज-केस पर है. खासकर भाषा और एक्सेस से जुड़े मुद्दों पर. फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि Sarvam Edge भारत का ChatGPT बन गया है. अभी यह एक शुरुआती स्टेज का प्रोडक्ट है. असली तस्वीर तब साफ होगी जब ज्यादा लोग इसे अपने फोन और लैपटॉप पर इस्तेमाल करेंगे. और देखा जाएगा कि रियल लाइफ में यह कितना स्टेबल और काम का है. Sarvam AI का दावा, Gemini और ChatGPT से बेहतर कहां और क्यों Sarvam AI की टीम यह कह रही है कि उनके कुछ मॉडल भारत से जुड़े टास्क में Gemini और ChatGPT से बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं. यह दावा जनरल AI पर नहीं है. कंपनी खास टास्क की बात कर रही है. जैसे इंडियन लैंग्वेज टेक्स्ट पढ़ना. पुराने डॉक्युमेंट समझना. और OCR जैसे काम. Sarvam का कहना है कि इन केस में उनके मॉडल ज्यादा सही आउटपुट दे रहे हैं. खासकर तब जब इनपुट में हिंदी, दूसरी लोकल भाषाएं या हिंग्लिश हो. यह दावा कहां तक सही है और इसकी लिमिट क्या है यह समझना जरूरी है कि यह तुलना हर तरह के AI काम पर लागू नहीं होती. Sarvam के दावे कुछ लिमिटेड बेंचमार्क और उनके अपने टेस्ट पर बेस्ड हैं. यह नहीं कहा जा सकता कि Sarvam हर मामले में Gemini या ChatGPT से बेहतर है. जनरल सवाल-जवाब, लॉन्ग चैट या बड़े नॉलेज टास्क में ग्लोबल मॉडल अब भी ज्यादा आगे हैं. Sarvam का स्ट्रॉन्ग पॉइंट लोकल यूज-केस है. खासकर इंडियन लैंग्वेज और लोकल कंटेंट से जुड़े काम.

चारधाम जाने वालों के लिए नया नियम? रजिस्ट्रेशन शुल्क पर कमेटी करेगी निर्णय सिफारिश

देहरादून उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध चार धाम यात्रा (Char Dham Yatra) से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है. राज्य सरकार चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं से रजिस्ट्रेशन शुल्क लेने पर विचार कर रही है. इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसले से पहले डिटेल्‍ड अध्ययन के लिए कमेटी गठित कर दी गई है. गढ़वाल मंडल के कमिश्नर विनय शंकर पांडेय की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी अलग-अलग पक्षों से राय लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी. कमेटी यह तय करेगी कि शुल्क लिया जाए या नहीं और अगर लिया जाए तो उसकी रकम कितनी हो. आखिरी फैसला राज्य सरकार द्वारा लिया जाएगा. स्टेकहोल्डर्स से हुई विस्तृत बातचीत दरअसल, पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर मंथन चल रहा था. चारधाम यात्रा से जुड़े विभिन्न स्टेकहोल्डर्स जैसे होटल व्यवसायी, तीर्थ पुरोहित, स्थानीय व्यापारी और अन्य संबंधित पक्षों से अलग-अलग चरणों में बातचीत की गई. इन्हीं चर्चाओं के बाद रजिस्ट्रेशन शुल्क के प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से हरी झंडी मिली है. क्या है शुल्क लगाने के पीछे तर्क? सरकार की ओर से जो तर्क सामने आया है उसके मुताबिक, यात्रा के दौरान अवांछित तत्वों पर निगरानी मजबूत की जा सके. केवल गंभीर और वास्तविक श्रद्धालु ही यात्रा के लिए पंजीकरण कराएं. ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को ज्‍यादा सुव्यवस्थित और जिम्मेदार बनाया जा सके. भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी किया जा सके. इस मकसद के साथ शुल्‍क लगाने के बारे में विचार किया जा रहा है. हर वर्ष लाखों श्रद्धालु चारधाम यात्रा में शामिल होते हैं. अब ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी होने के बाद प्रशासन यात्रा प्रबंधन को और बेहतर बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है. कमेटी अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को सौंपेगी. इसके बाद ही यह तय होगा कि रजिस्ट्रेशन शुल्क लागू किया जाएगा या नहीं और उसकी दर क्या होगी?

पीएचडी एडमिशन और प्रोसेस में पारदर्शिता, सभी यूनिवर्सिटी को अनिवार्य रूप से कैलेंडर जारी करने का निर्देश

भोपाल   अब हर विश्वविद्यालय को यूजी-पीजी की तरह पीएचडी कैलेंडर भी अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा। इसका उद्देश्य है प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और छात्रों को समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराना। अब तक स्थिति यह थी कि कई विश्वविद्यालय पीएचडी की तारीखें, सीटों की संख्या और पात्रता शर्तें सार्वजनिक नहीं करते थे। कई बार सीटें होते हुए भी यह बताया जाता था कि उम्मीदवार नहीं मिले। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने यूजीपीजी की पीएचडी की जानकारी भी वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ विश्वविद्यालयों में पसंदीदा अभ्यर्थियों के लिए रास्ता आसान करने के आरोप भी लगते रहे हैं। जब प्रवेश प्रक्रिया की स्पष्ट समय-सीमा नहीं होती, तो इंटरव्यू, वेटेज और पात्रता के नियम भी मनमाने ढंग से लागू किए जाते थे। यही कारण है कि कई सरकारी विश्वविद्यालयों में पीएचडी सीटें खाली रह जाती हैं। कई विषयों में आधी से ज्यादा सीटें खाली बीयू में करीब 40 विषयों में पीएचडी की कुल 2,379 सीटें हैं। जुलाई में शुरू हुई प्रवेश प्रक्रिया के दौरान केवल नेट स्कोर को पात्र मानने की वजह से कई विषय में आधी से अधिक सीटें खाली रह गईं हैं। इसके लिए बीयू ने नवंबर में एक बार फिर अभ्यर्थियों को मौका दिया, लेकिन एंट्रेंस टेस्ट नहीं लिया। इस बार भी नेट क्वालिफाई को ही मौका दिया गया। स्थिति यह है कि किस विषय में कितनी सीटें खाली हैं स्थिति क्या है। यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। पीएचडी में नहीं चलेगा AI से कॉपी-पेस्ट! पीएचडी करने वाले स्टूडेंट्स को जानकारी के लिए बता दें कि बीते दिनों पहले यूनियन ग्रांट कमीशन (UGC) ने कई रिसर्च थीसिस को वापस किया है जिनमें AI से लिखा गया कंटेंट पाया गया। बिहार की एक यूनिवर्सिटी से दर्जनों छात्रों की पीएचडी थीसिस यूजीसी को भेजी थी, जिनमें ये गड़बड़ियां पाईं गई। यूनिवर्सिटी से भेजी गई रिसर्च थीसिस में यूजीसी के चेक करने पर 40 प्रतिशत से ज्यादा कंटेंट चोरी का पाया गया। यूजीसी ने इसको वापस कर दिया है। बताया गया है कि सबसे ज्यादा इंग्लिश भाषा में सबमिट हुई थीसिस में एआई कंटेंट पाया गया है। हिंदी में जमा की गईं थीसिस में ज्यादा गड़बड़ी नहीं पाई गईं हैं।

Indus Water Treaty पर सख्त कदम! भारत का फैसला, सरहद पार पानी पर लगेगी रोक?

नई दिल्ली बीते साल पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था. इसके साथ ही भारत ने सिंधु नदी तंत्र की नदियों के पानी को रोकने के लिए काम भी शुरू कर दिया था. इसके लिए भारत ने कई प्रोजेक्ट्स पर एक साथ काम शुरू किया था. इसी क्रम में रावी नदी पर बन रहे शाहपुर कांडी डैम का काम पूरा होने वाला है. इस डैम के बनने के बाद भारत से रावी नदी का अतिरिक्त पानी पाकिस्तान नहीं जाएगा. यह डैम पंजाब-जम्मू-कश्मीर बॉर्डर के पास बन रहा है. काफी लंबे समय से यह प्रोजेक्ट चल रहा था. इससे पाकिस्तान की परेशान और बढ़ने वाली है.  एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद अहमद राणा ने सोमवार को कहा कि इस साल 31 मार्च तक इस बांध का काम पूरा हो जाएगा. इस बांध के बनने के बाद सूखा प्रभावित कठुआ और सांबा जिले में सिंचाई की सुविधाएं विकसित हो सकेंगी. इस बांध के बनने के बाद पंजाब में पांच हजार हेक्टेयर और जम्मू क्षेत्र के कठुआ और सांबा में 32,172 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा विकसित होगी. इस सिंचाई परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने 485 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है. सिंधु जल संधि के दायरे में नहीं आती यह नदी राज्य के पूर्व सिंचाई मंत्री ताज मोहिदीन ने कहा कि यह बांध सिंधु जल संधि के दायरे में नहीं आता है, क्योंकि रावी नदी के पानी पर भारत का विशेष अधिकार है. हालांकि राणा ने कहा कि इस संधि को स्थगित किए जाने के बाद राज्य में बांध परियोजनाओं में तेजी आई है. 1960 के दशक में हुई इस संधि के तहत सतलुज, ब्यास और रावी नदी के पानी पर भारत को अधिकार मिला था, जबकि सिंधु, झेलम और चेनाब का पानी पाकिस्तान को देने की बात कही गई थी. पहलगाम हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित कर दिया था. संधि स्थगित होने बाद भारत नदियों के पानी को लेकर डेटा शेयर करना बंद कर दिया था. इसके साथ ही सिंधु तंत्र के पश्चिमी नदियों के पानी का इस्तेमाल बढ़ा देगा. मात्र 8 साल में बन गया बांध रिपोर्ट में कहा गया है कि रावी के पानी पर भारत का अधिकार है. बावजूद इसके बांध न होने से काफी पानी पाकिस्तान चला जाता था और पंजाब-जम्मू के इलाके सूखे रह जाते थे. इस बांध के बनने से बेकार होने वाले पानी का इस्तेमाल बढ़ेगा. इस प्रोजेक्ट को सबसे पहले नवंबर 2001 में मंजूरी मिली थी. लेकिन, दो राज्यों के बीच विवाद के कारण काम काफी दिनों तक रुका रहा. लंबी बातचीत के बाद सितंबर 2018 में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच सहमति बनी और उसके बाद काम शुरू हो सका. उसी साल यानी 6 दिसंबर 2018 को केंद्रीय कैबिनेट इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी. इसके बाद करीब आठ सालों में इस बांध का काम पूरा हो गया.

यमुना का पानी संदिग्ध: रिपोर्ट में सामने आए 13 माइक्रोप्लास्टिक प्रकार, स्वास्थ्य पर चिंता

नई दिल्ली  जिसे आप पानी समझकर पी रहे हैं वह पानी नहीं प्लास्टिक है.हाल ही में आई द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) की एक रिसर्च काफी डराने वाली है. टेरी की ओर से एक साल तक किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में दिल्ली से गुजरने वाली यमुना नदी, नलों से आने वाले भूजल, शहर के खुले नालों और बाढ़ क्षेत्र की मिट्टी में बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं. टेरी की स्टडी ऑन माइक्रोप्लास्टिक्स इन रिवर यमुना एंड ग्राउंडवॉटर इन दिल्ली (2024–25) बताती है कि शोधकर्ताओं ने दिल्ली के सभी 11 जिलों की विभिन्न जगहों से 88 नमूने लिए थे और उनकी जांच की थी, जिनमें से हर सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा काफी ज्यादा मिली है. इस स्टडी को दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने करवाया था. जिसके परिणाम काफी डराने वाले आए हैं. खबर के मुताबिक टेरी की ये रिपोर्ट पिछले साल के अंत में दिल्ली सरकार को सौंप दी गई थी. रिपोर्ट बताती है कि मौसम के अनुसार यमुना जल सहित बाकी जल स्त्रोतों में प्रदूषण का स्तर बदलता रहता है. जहां बारिश यानि मानसून से पहले यमुना नदी के पानी में बहाव और जल की आपूर्ति बढ़ने के कारण माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा देखी गई और मॉनसून के बाद यह कम हो जाती है क्योंकि यह गंदगी और प्लास्टिक आसपास की मिट्टी में फैल जाती है. माइक्रोप्लास्टिक क्या होती है? माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं जो पानी में मिले रहते हैं और दिखाई भी नहीं देते लेकिन अगर इस पानी को पीया जाता है तो यह कण अपने साथ जहरीले रसायनों को चिपका कर शरीर के अंदर ले जाते हैं और भारी नुकसान पहुंचाते हैं. माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा शरीर में पहुंचने के चलते काफी सारी गंभीर बीमारियां सामने आ सकती हैं. जांच में पाया गया कि करीब 95 फीसदी कण माइक्रोफाइबर (बहुत छोटे रेशे) थे. इससे अंदाजा लगाया गया कि घरों से निकलने वाला कपड़े धोने का पानी और कपड़ा उद्योग से निकलने वाला कचरा भी इस प्रदूषण का बड़ा कारण हो सकता है. सबसे खास बात है कि इस परीक्षण में पानी के अंदर 13 तरह के प्लास्टिक कण पाए गए, जिससे पता चलता है कि ये कण घरों के कचरे, फैक्ट्रियों के गंदे पानी और पैकेजिंग सामग्री जैसे कई स्रोतों से आकर मिल रहे हैं. मौसम के अनुसार बदला स्तर स्टडी कहती है कि मॉनसून में यानि मई–जून 2024 में यमुना के पानी में औसतन 6,375 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति घन मीटर मिले. जबकि दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 (मानसून के बाद) यह घटकर 3,080 कण प्रति घन मीटर रह गए. यानी लगभग 50 फीसदी की कमी देखी गई. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह कमी प्लास्टिक कम बनने से नहीं, बल्कि बारिश के कारण पानी बढ़ने से कण बह जाने और पतले पड़ने (डायल्यूशन) की वजह से हुई. मानसून के दौरान तेज बहाव कणों को नीचे की ओर बहा देता है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि नदी किनारे की मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा चार गुना से ज्यादा बढ़ गई. मानसून से पहले औसतन 24.5 कण प्रति किलो मिट्टी थे, जो बाद में बढ़कर 104.45 कण प्रति किलो हो गए.

छत्तीसगढ़ सरकार का किसानों को तोहफा: 1.5 लाख रुपये तक की योजना, आवेदन का आसान तरीका

रायपुर  छत्तीसगढ़ सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए राज्य बकरी उद्यमिता विकास योजना चला रही है। इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में बकरी पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि किसानों को रोजगार के साथ अतिरिक्त आय का जरिया मिल सके। योजना के अंतर्गत एक यूनिट में 13 बकरी और 2 बकरे दिए जाते हैं, जिसकी कुल लागत करीब 1.50 लाख रुपये तय की गई है। जांजगीर-चांपा जिले के पशु विकास विभाग के वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि इस योजना में पशु खरीद, बीमा और शुरुआती आहार तक का खर्च शामिल किया गया है, ताकि किसान शुरुआत से ही बकरी पालन का काम सही तरीके से कर सकें। योजना में क्या-क्या मिलेगा? योजना के तहत एक यूनिट में  कुल 15 पशु दिए जाते हैं। इसमें 13 बकरी (प्रति बकरी लगभग ₹7,500) ,2 बकरे (प्रति बकरा लगभग ₹12,000) ,पशुओं का बीमा – लगभग ₹7,500 तक शुरुआती चारा और देखभाल – ₹10,000 से ₹12,000 तक इस तरह पशु खरीद, बीमा और आहार मिलाकर पूरी यूनिट की लागत करीब ₹1.50 लाख बैठती है।  कितनी मिलेगी सब्सिडी? इस योजना में अनुदान (सब्सिडी) का भी प्रावधान है— सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग के किसानों को 25% तक सब्सिडी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को 33% तक सब्सिडी इस तरह किसान को अधिकतम करीब ₹50,000 तक की सरकारी सहायता मिल सकती है। कौन कर सकता है आवेदन? छत्तीसगढ़ का निवासी किसान पशुपालन में रुचि रखने वाले ग्रामीण युवा जिनके पास पशु रखने की जगह हो बैंक लोन लेने की पात्रता रखने वाले आवेदक कैसे करें आवेदन? जानिए पूरा प्रोसेस अपने नजदीकी पशु चिकित्सालय / पशु विकास विभाग कार्यालय में संपर्क करें योजना से जुड़ा आवेदन फॉर्म प्राप्त करें जरूरी दस्तावेज जमा करें – आधार कार्ड ,निवास प्रमाण पत्र ,जाति प्रमाण पत्र (यदि लागू हो) बैंक पासबुक विभाग द्वारा सत्यापन के बाद योजना का लाभ मिलेगा क्यों फायदेमंद है बकरी पालन योजना? कम लागत में शुरू होने वाला व्यवसाय ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का बढ़िया साधन दूध और पशु बिक्री से नियमित आमदनी सरकार की सब्सिडी से शुरुआती बोझ कम अगर आप खेती के साथ-साथ अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया ढूंढ रहे हैं, तो राज्य बकरी उद्यमिता विकास योजना आपके लिए शानदार मौका है।

India-US डील के लिए बड़ी तैयारी, अगले हफ्ते अमेरिका रवाना होगी टीम

नई दिल्‍ली     भारत और अमेरिका व्‍यापार समझौते (India US Trade Deal) को अंतिम रूप देने के लिए भारत की टीम अमेरिका के लिए अगले हफ्ते रवाना होने वाली है.वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने सोमवार को इसकी जानकारी दी. उन्‍होंने कहा कि इस दौरे के दौरान भारत के मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के लिए कानूनी समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अगले सप्ताह वाशिंगटन में एक टीम को लीड करेंगे. यह यात्रा 23 फरवरी को शुरू होने की संभावना है और डील पर साइन मार्च में होने की संभावना है.  इसी महीने की शुरुआत में भारत और अमेरिका ने एक संयुक्त बयान जारी कर अंतरिम व्यापार समझौते का ऐलान कर दिया था. अग्रवाल ने कहा कि संयुक्त बयान डील की रूपरेखा तय करता है. अब इस अंतरिम डील को कानूनी समझौते में बदला जाना बाकी है, जो दोनों पक्षों द्वारा साइन के बाद लागू हो जाएगा. अभी दोनों ही टीमों के बीच वर्चुअल तरीके से बातचीत चल रही है.  India-US Trade Deal व्यापार सौदा राजेश अग्रवाल ने कहा कि मार्च में समझौते को पूरा करने और हस्ताक्षर करने का प्रयास है. लेकिन इस पर कोई समय सीमा नहीं रखी है क्योंकि कानूनी समझौते को अंतिम रूप देने में भी कुछ चुनौतियां आ सकती हैं, जिसे दोनों पक्षों को सॉल्‍व करेंगे. जबकि वाशिंगटन ने पहले ही रूसी कच्चे तेल की खरीद के लिए भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ को समाप्त कर दिया है और भारतीय वस्‍तुओं पर रेसिप्रोकल टैरिफ 25 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया है.   रिपोर्ट के मुताबिक, एक अधिकारी ने कहा कि भारत कपास का बड़ा आयातक है और उसे इसकी ज्‍यादा आवश्‍यकता है, क्‍योंकि वह यूरोपीय संघ और अमेरिका के कपड़ों को के अधिक निर्यात पर नजर रखता है. कृषि, डिजिटल  व्यापार को लेकर  अधिकारी ने कहा कि  अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौतों ने भारत के कृषि क्षेत्र के लिए 400 अरब डॉलर का अवसर खोल दिया है.  दाल और डिजिटल टैक्‍स   अभी भारत का अमेरिका को कृषि निर्यात 2.8 बिलियन डॉलर है, जबकि आयात 1.5 बिलियन डॉलर है. कुल मिलाकर, भारत में कृषि वस्तुओं का आयात 35 अरब डॉलर का है, जबकि निर्यात का मूल्य 51-52 अरब डॉलर है. अधिकारी ने कहा कि संयुक्त बयान में दालें नहीं थीं.  अधिकारियों ने कहा कि दोनों पक्षों ने व्यापार सौदे की पहली किश्त में बातचीत में डिजिटल टैक्‍स, ईकॉमर्स या समकारी लेवी पर चर्चा नहीं की है.  गौरतलब है कि अभी भारत और अमेरिका के बीच फाइनल ट्रेड डील नहीं हुई है. यह सिर्फ अंतरिम समझौते का ऐलान किया गया है. भारत पर टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है. वहीं बहुत से प्रोडक्‍ट्स पर टैरिफ शून्‍य लागू है. अमेरिका भी भारत को बड़े लेवल पर समान बेचने वाला है. हालांकि स्‍पष्‍ट और पूरी डिटेल डील पर साइन होने के बाद ही आ सकती है.

योगी आदित्यनाथ की तारीफ में ऋतेश्वर महाराज, कहा—प्रदेश में कानून व्यवस्था मजबूत हुई

सतना  प्रसिद्ध कथावाचक और आध्यात्मिक गुरु संत ऋतेश्वर धारकुंडी आश्रम जाने से पूर्व सतना जिले की धर्मनगरी चित्रकूट पहुंचे है। उनके साथ भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह भी मौजूद रहे। चित्रकूट प्रवास के दौरान उन्होंने मीडिया से खुलकर बातचीत की और उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था, संतों के बीच चल रहे वैचारिक मतभेदों और देश के सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। वे यहां से सतना जिले के धारकुंडी आश्रम के लिए रवाना हुए, जहां उन्होंने ब्रह्मलीन परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। जमकर की CM योगी की तारीफ उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर बोलते हुए ऋतेश्वर महाराज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा योगी आदित्यनाथ एक संत-महंत भी हैं और एक कुशल प्रशासक भी। उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश को भयमुक्त वातावरण मिला है, इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता। एक सन्यासी जब सत्ता संभालता है, तो वह राजधर्म का पालन पूरी निष्ठा से करता है। ‘वादे वादे जायते बोध:’ हाल के दिनों में संतों के बीच विभिन्न मुद्दों पर चल रही बयानबाजी और मतभिन्नता पर ऋतेश्वर महाराज ने बहुत ही संतुलित और शास्त्र सम्मत जवाब दिया। उन्होंने संस्कृत के सूत्र ‘वादे वादे जायते बोध:’ का उदाहरण देते हुए कहा कि मैं इसे विवाद के रूप में नहीं, बल्कि वाद के रूप में देखता हूं। संवाद और चर्चा से ही तत्व का बोध होता है। अगर संतों के बीच किसी बात को लेकर मतभिन्नता है, तो उस मंथन से सनातन धर्म के लिए सुखद और सकारात्मक परिणाम ही निकलेंगे। यूजीसी को क्या बोले संत रितेश्वर यूजीसी के संदर्भ में पूछे गए सवाल और सामाजिक कानूनों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि देश का बहुसंख्यक समाज शांतिप्रिय है और एक गांव की तरह मिलजुल कर रहना चाहता है। उन्होंने कहा कि मैंने देखा है कि अगर कोई गलत फैसला आता है, तो समाज सामूहिक रूप से उसका विरोध करता है। मुझे विश्वास है कि जो लोग नीति-निर्धारक हैं, वे पुनर्विचार करेंगे। देश में ऐसा कोई कानून नहीं बनना चाहिए, जिससे समाज में विद्वेष पैदा हो या आपसी भाईचारा खंडित हो। धारकुंडी पहुंचकर दी श्रद्धांजलि चित्रकूट में अल्प प्रवास और दर्शन-पूजन के बाद संत ऋतेश्वर महाराज और बृजभूषण शरण सिंह का काफिला सतना के धारकुंडी आश्रम के लिए रवाना हो गया। वहां वे आश्रम के संस्थापक परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज के अंतिम दर्शन कर उनकी समाधि स्थल पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।  

गोरखपुर में धूमधाम से संपन्न हुई भव्य “शिव बारात”, हजारों श्रद्धालुओं ने लिया आशीर्वाद

The grand “Shiv Baraat” concluded with great pomp in Gorakhpur, thousands of devotees took blessings. विशेष संवाददाता : जितेन्द्र श्रीवास्तव / कैमरामैन अर्पिता श्रीवास्तव जबलपुर। गोरखपुर स्थित श्री शिव शक्ति महाकाल खाटू श्याम मंदिर में चार दिवसीय भव्य “शिव बारात” कार्यक्रम श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हो गया। 13 से 16 फरवरी 2026 तक चले इस धार्मिक आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम की शुरुआत संगीत एवं ढोल-डीजे के साथ हुई, जिसने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। 14 फरवरी को आयोजित हल्दी समारोह में श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भाग लिया। 15 फरवरी को शाम 6 बजे निकली शिव बारात मुख्य आकर्षण रही। भगवान शिव की आकर्षक झांकी, भव्य साज-सज्जा और भक्तों के जयकारों से पूरा गोरखपुर क्षेत्र गूंज उठा। 16 फरवरी को दोपहर 12 बजे चुनरी चढ़ाने की रस्म संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने श्रद्धा पूर्वक भाग लिया। इसके बाद दोपहर 3 बजे से विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन समिति ने बताया कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। स्थानीय नागरिकों और स्वयंसेवकों का विशेष सहयोग रहा। पूरे आयोजन के दौरान क्षेत्र में भक्ति और उल्लास का माहौल बना रहा। आयोजकों ने सभी श्रद्धालुओं, सहयोगियों और प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी ऐसे ही धार्मिक आयोजनों के सफल आयोजन का संकल्प दोहराया।

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