Files not handed over, orders disobeyed: Disciplinary action against Cooperative Inspector Headquarters, charge sheet issued
- सहकारिता विभाग में स्थापना कक्ष में संजीव गुप्ता के नेतृत्व में कार्य कर रहा सिंडिकेट

विशेष संवाददाता जितेन्द्र श्रीवास्तव
सहकारिता विभाग में विभागीय कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी जिसके माध्यम से क्लर्क पद पर कार्यरत कर्मचारी सहकारी निरीक्षक बनाए गए थे।इस परीक्षा को कराने से लेकर मूल्यांकन परिणाम और कर्मचारियों के चयन को लेकर विभागीय कमेटी भी बनी थी।किंतु मुख्य रूप से यह कार्य स्थापना कक्ष का था ।स्थापना अधीक्षक संजीव गुप्ता के चहेते क्लर्क सौरभ राजपूत को इस परीक्षा में निर्धारित 100 में से 90 अंक मिल जाते है।परीक्षा का स्तर भी बेहद साधारण था सरल प्रश्न पूछे गए थे।मूल्यांकन करने वालों ने चिन्हित लोगों को उदारता पूर्वक नंबर दिए।नतीजतन सौरभ राजपूत जैसे लोग सहकारी निरीक्षक बन गए।सौरभ राजपूत को पूर्व पंजीयक मनोज सरेयाम द्वारा संदिग्ध कार्य प्रणाली के कारण कारण बताओ नोटिस भी जारी किया जा चुका है।स्थापना कक्ष में संजीव गुप्ता के सिंडिकेट के मुख्य गुर्गे के रूप में काम करने वाले सौरभ राजपूत की फाइल कारण बताओ के बाद दबा दी गई।फाइलों को दबा देने की शैली सहकारिता विभाग में बहुत पुरानी है।वर्षों से जमे संजीव गुप्ता का लेन देन करने वाले सौरभ राजपूत एक अकेला उदाहरण नहीं है गिरोह बनाकर संजीव गुप्ता स्थापना कक्ष में कार्य कर रहा है।स्वयं संजीव गुप्ता के संबंध में पूर्व पंजीयक आलोक सिंह साहब ने एस बी आई हाउसिंग समिति में इसके विरुद्ध अंकित किया था सस्पेंड किया जाय ।मगर उसकी फाइल भी दबा दी जा चुकी है।स्थापना उपायुक्त और संयुक्त आयुक्त आखिर क्यों पूर्व पंजीयक सहकारिता के आदेशों की अवहेलना कर रहे है यह चर्चा का विषय बना हुआ है।प्रदेश के जिलों में कार्यरत कर्मचारियों की वेतन वृद्धि रोकने पदोन्नति रोकने लेन देन के उपरांत लोगों को उपकृत करने का यह खेल दस सालों से चल रहा है।सूत्रों के अनुसार वर्तमान पंजीयक एवं आयुक्त सहकारिता मनोज पुष्प को इसकी भनक लग चुकी है और वे जल्दी ही बड़ी कार्यवाही करने वाले है।
सहकारिता विभाग में प्रशासनिक लापरवाही और आदेशों की अवहेलना का गंभीर मामला सामने आया है। सहकारी निरीक्षक मुख्यालय श्री सौरभ राजपूत (दस्तावेज़ानुसार नाम) के विरुद्ध संयुक्त आयुक्त सहकारिता (प्रशासन) मुख्यालय द्वारा औपचारिक आरोप पत्र एवं आरोप विवरण पत्र जारी कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
आरोप पत्र के अनुसार 3 मई 2024 को कार्यालयीन आदेश के तहत श्री राजपूत का प्रशासन शाखा से अंकेक्षण शाखा में स्थानांतरण किया गया था। इसके बावजूद उन्हें निर्देशित किया गया था कि वे समस्त निस्तारित प्रकरणों का चार्ज एवं अभिलेख तत्काल संबंधित अधिकारियों को सौंपें, लेकिन बार-बार निर्देशों के बावजूद उन्होंने न तो अभिलेख सौंपे और न ही चार्ज ट्रांसफर किया।

सूत्रों के मुताबिक 25 सितंबर 2024 को कारण बताओ सूचना पत्र जारी किया गया, फिर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पुनः निर्देश दिए गए कि श्रीमती राखी राठौर (सहायक ग्रेड-03) तथा बाद में श्री अजय सिंह को समस्त अभिलेख और प्रकरण सौंपे जाएं, लेकिन यह प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई।

दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि इस लापरवाही के कारण प्रशासनिक कार्य प्रभावित हुए और डिजिटल अभिलेखों व शासकीय निस्तारण कार्यों में हेर-फेर व छेड़छाड़ की आशंका भी सामने आई है। इससे कार्यालयीन व्यवस्था और कार्य संचालन पर प्रतिकूल असर पड़ा।
विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि संबंधित अधिकारी द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही, उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता बरती गई, जो कि मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के नियम-03 का स्पष्ट उल्लंघन है। इस आधार पर प्रकरण को मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत दंडनीय माना गया है।

अब संबंधित अधिकारी को निर्धारित समय सीमा में अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो उनके विरुद्ध आगे की कड़ी विभागीय कार्रवाई तय मानी जा रही है।
यह मामला सहकारिता विभाग में प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।









