High Court cancels suspension of Patwari Anita Srivastava, reprimands government on wrong order
ग्वालियर – 23 सितंबर 2024 को मध्यप्रदेश High Court cancels suspension ने पटवारी अनीता श्रीवास्तव के निलंबन को अवैध ठहराते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की पीठ ने न केवल अनीता के पक्ष में फैसला सुनाया, बल्कि सरकार को आदेशों का गलत इस्तेमाल करने पर सख्त चेतावनी भी दी।

क्या है मामला?
अनीता श्रीवास्तव, जो कि 2006 से पटवारी पद पर कार्यरत हैं, को भितरवार के एसडीओ ने 29 अगस्त 2024 को निलंबित कर दिया था। अनीता ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि एसडीओ को उन्हें निलंबित करने का अधिकार नहीं है। मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 104(2) के अनुसार, केवल कलेक्टर ही पटवारी को निलंबित कर सकता है।
कोर्ट ने क्या कहा?
High Court cancels suspension कोर्ट ने इस मामले में सरकार को जमकर फटकार लगाते हुए कहा कि बिना अधिकार क्षेत्र के एसडीओ द्वारा जारी निलंबन आदेश न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग भी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में, जहां आदेश बिना कानूनी आधार के जारी किए जाते हैं, हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना जरूरी है।
न्यायमूर्ति अनिल वर्मा ने स्पष्ट किया कि “पटवारी का निलंबन या नियुक्ति का अधिकार केवल कलेक्टर के पास है, न कि एसडीओ के पास।” कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी अधिकारी के पास आदेश जारी करने का अधिकार नहीं होता, तो ऐसे आदेशों को अवैध घोषित करना जरूरी है।
पटवारी अनीता श्रीवास्तव के पक्ष में फैसला:
कोर्ट ने अनीता श्रीवास्तव का निलंबन आदेश तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया और राज्य सरकार को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार कानून के तहत कोई कार्रवाई करना चाहती है, तो वह सही प्रक्रिया का पालन करते हुए कर सकती है।
अनीता का बयान:
फैसले के बाद अनीता ने खुशी जताई और कहा, “यह जीत सिर्फ मेरी नहीं है, बल्कि उन सभी सरकारी कर्मचारियों की है जो अनुचित तरीके से निलंबित किए जाते हैं। कोर्ट ने मेरे साथ न्याय किया है और मैं इसके लिए आभारी हूं।”
सरकार के लिए सख्त संदेश:
इस फैसले ने न केवल अनीता श्रीवास्तव को न्याय दिलाया, बल्कि राज्य सरकार और उसके अधिकारियों को भी चेतावनी दी है कि बिना अधिकार और कानूनी आधार के आदेश जारी करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
निष्कर्ष:
यह फैसला पटवारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून से बाहर जाकर आदेश जारी करना प्रशासन के लिए महंगा साबित हो सकता है













