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MP HC का बड़ा आदेश: सरकारी दफ्तरों में अब खुद सुलझेंगे कर्मचारियों के सर्विस विवाद, सीधे लाभ में आएंगे 6 लाख कर्मचारी

इंदौर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों (Service Matters) को लेकर राज्य सरकार को एक बेहद अहम और कड़ा सुझाव दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ट्रांसफर, प्रमोशन, इंक्रीमेंट और वरिष्ठता जैसे छोटे-छोटे मामलों के लिए कर्मचारियों को अदालत आने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। जस्टिस विनय सराफ की एकल पीठ ने सरकार को ‘इन-हाउस डिस्प्यूट रिसोल्यूशन सिस्टम’ (विवाद समाधान प्रणाली) विकसित करने के निर्देश दिए हैं। चीफ सेक्रेटरी को आदेश: 50 हजार मामलों का बोझ होगा कम हाई कोर्ट में वर्तमान में कर्मचारियों से जुड़े 50,000 से अधिक मामले लंबित हैं। जस्टिस सराफ ने मंडला के वन रक्षकों की वरिष्ठता से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस आदेश की प्रति मुख्य सचिव (Chief Secretary) को भेजने के निर्देश दिए हैं।     याचिकाकर्ता 30 दिन के भीतर सक्षम अधिकारी को अपना आवेदन दें।     सरकार और संबंधित विभाग इस पर 45 दिन के भीतर अनिवार्य रूप से फैसला लें। 6 लाख कर्मचारियों के लिए ‘राहत’ का फॉर्मूला यदि सरकार इस सुझाव पर अमल करती है, तो प्रदेश के करीब 6 लाख नियमित अधिकारी-कर्मचारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट के सुझाव के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं…     डेजिग्नेटेड ऑफिसर: हर विभाग में एक नामित अधिकारी हो जो विवादों को सुने।     निष्पक्षता: पारदर्शिता के लिए जरूरत पड़ने पर रिटायर्ड जिला जजों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।     बचत: इससे न केवल अदालतों का बोझ कम होगा, बल्कि सरकार और कर्मचारियों का समय व पैसा भी बचेगा। ‘अदालतों में आ गई है सर्विस मामलों की बाढ़’ सुनवाई के दौरान जस्टिस सराफ ने चिंता जताते हुए कहा कि हाई कोर्ट में इन दिनों सर्विस मामलों की बाढ़ आ गई है। उन्होंने कहा, “अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच सीधे संवाद की कमी के कारण छोटे-छोटे विवाद भी कोर्ट तक पहुंच रहे हैं। यह सरकार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ़ाता है और कर्मचारियों को मानसिक पीड़ा देता है।” कोर्ट का मानना है कि आपसी संवाद और विभागीय स्तर पर सशक्त प्रणाली से अधिकांश केसों का समाधान बिना मुकदमेबाजी के संभव है।

उच्च न्यायालय ने पत्नी की बिना सहमति ली गई व्हाट्सएप चैट साक्ष्य के रूप में मंजूर

ग्वालियर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच व्हाट्सएप पर हुई बातचीत को पारिवारिक मामलों में सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। भले ही ये बातचीत बिना किसी एक पार्टनर की मर्जी के हासिल की गई हो। जस्टिस आशीष श्रोती ने ये फैसला एक महिला की याचिका पर दिया। महिला ने फैमिली कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने महिला के पति को तलाक के मामले में व्हाट्सएप चैट पेश करने की इजाजत दी थी। कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक मामलों को सुलझाने के लिए किसी भी सबूत को माना जा सकता है, भले ही वो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत मान्य न हो। ये है मामला ये मामला एक पति-पत्नी से जुड़ा है। उनकी शादी दिसंबर 2016 में हुई थी और अक्टूबर 2017 में उनकी एक बेटी हुई। बाद में पति ने तलाक के लिए अर्जी दी। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने उसके साथ क्रूरता की और उसका किसी और के साथ संबंध है। अपने आरोपों को साबित करने के लिए, पति ने व्हाट्सएप मैसेज पेश किए। उसने बताया कि ये मैसेज उसने पत्नी के फोन में एक हिडन एप्लीकेशन के जरिए निकाले थे। इन चैट से लग रहा था कि पत्नी का किसी और के साथ अफेयर है। पत्नी ने लगाई थी याचिका इसके जवाब में, पत्नी ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 9 के तहत याचिका दायर की। उसने कहा कि वो अपने पति के साथ रहना चाहती है। उसने व्हाट्सएप चैट के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई। पत्नी का कहना था कि ये चैट उसकी प्राइवेसी का उल्लंघन है, जो उसे आर्टिकल 21 के तहत मिली है। उसने ये भी कहा कि ये सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का भी उल्लंघन है। पत्नी के वकील ने कुछ पुराने फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कोर्ट ने गैरकानूनी तरीके से हासिल किए गए पर्सनल कम्युनिकेशन को सबूत के तौर पर मानने से इनकार कर दिया था। पत्नी की आपत्तियों को किया खारिज लेकिन हाई कोर्ट ने पत्नी की आपत्तियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 14 के तहत, कोर्ट किसी भी ऐसे मटेरियल को स्वीकार कर सकते हैं जो पारिवारिक विवादों को सुलझाने में मदद करे। भले ही वो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत मान्य न हो। जस्टिस श्रोती ने कहा कि फैमिली कोर्ट सबूतों के नियमों में थोड़ी ढील देते हैं। क्योंकि पारिवारिक मामले निजी और संवेदनशील होते हैं। वहीं, जस्टिस श्रोती ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अगर कोई सबूत गैरकानूनी तरीके से भी हासिल किया गया है, तो भी उसे माना जा सकता है अगर वो मामला से जुड़ा हुआ है और असली है। कोर्ट ने माना कि प्राइवेसी का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन ये पूरी तरह से नहीं है। इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के साथ संतुलित करना होगा। जस्टिस श्रोती ने कहा कि जब आर्टिकल 21 के तहत दो अधिकार आपस में टकराते हैं- प्राइवेसी और निष्पक्ष सुनवाई- तो निष्पक्ष सुनवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आर्टिकल 122 का भी जिक्र किया कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 का भी जिक्र किया। ये धारा आम तौर पर पति-पत्नी के बीच बातचीत को सुरक्षित रखती है, लेकिन अगर पति-पत्नी के बीच कानूनी विवाद है तो ये लागू नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली, बॉम्बे और राजस्थान जैसे कई हाई कोर्ट ने पारिवारिक मामलों में डिजिटल रिकॉर्ड के इस्तेमाल का समर्थन किया है। सबूत की अभी जांच होगी जस्टिस श्रोती ने ये भी साफ किया कि सबूत को स्वीकार करने का मतलब ये नहीं है कि वो साबित हो गया है। सबूत को अभी भी वेरिफाई करना होगा। उन्होंने फैमिली कोर्ट को कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी। जैसे कि सबूत की सच्चाई की पुष्टि करना, जरूरत पड़ने पर इन-कैमरा सुनवाई करना और मर्यादा बनाए रखना। कोर्ट ने ये भी कहा कि गैरकानूनी तरीके से हासिल किए गए सबूत को स्वीकार करने से उस व्यक्ति को सिविल या क्रिमिनल कार्रवाई से सुरक्षा नहीं मिलती है। फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा कोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के अप्रैल 2023 के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि सबूत को स्वीकार करने के लिए ये जरूरी है कि वो मामला से जुड़ा हुआ हो, न कि उसे कैसे हासिल किया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सबूत को रोकने से फैमिली कोर्ट एक्ट के मकसद के खिलाफ होगा।

शीर्ष न्यायालय ने कहा अनुकंपा नियुक्ति को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए

जयपुर  अनुकंपा नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मंगलवार को शीर्ष न्यायालय ने एक से ज्यादा घर और कई एकड़ जमीन वाले एक युवक को पिता के बाद नौकरी देने से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता उसके पिता के निधन के बाद अनुकंपा नियुक्ति चाह रहा था। शीर्ष न्यायालय पहले भी यह कहता रहा है कि अनुकंपा नियुक्ति को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही ऐसी नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों का जरूरी मानदंडों को पूरा करना अनिवार्य है। अदालत ने याचिकाकर्ता रवि कुमार जेफ के पिता सेंट्रल एक्साइज में प्रधान आयुक्त थे। अगस्त 2015 में उनका निधन हो गया था। अब रवि ने CGST और सेंट्रल एक्साइज (जयपुर जोन) राजस्थान में मुख्य आयुक्त के कार्यालय में अनुकंपा नियुक्ति की मांग की है। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस मनमोहन ने याचिका खारिज कर दी है। खास बात है कि याचिकाकर्ता के पिता दो घर, 33 एकड़ जमीन और 85 हजार रुपये परिवार को मासिक पेंशन छोड़ गए हैं। राजस्थान हाईकोर्ट और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्युनल की तरफ से रवि की अनुकंपा नियुक्ति की याचिका को खारिज कर दिया था। उन्होंने डिपार्टमेंट के इस दावे को बरकरार रखा कि परिवार के पास सुविधाओं के साथ रहने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। खबर है कि विभागीय समिति ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए 19 आवेदकों के नाम पर विचार किया था, जिनमें से सिर्फ 3 को पात्र माना गया। विभाग का कहना है कि अनुकंपा नियुक्ति को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे रोजगार के दावों पर सिर्फ वहां विचार किया जाता है, जहां परिवार मुश्किलों का सामना कर रहा हो। समिति ने कहा, ‘दिवंगत सरकारी कर्मचारी के परिवार में पत्नी और उनके बेटा-बेटी हैं। बेटा और बेटी दोनों ही बेरोजगार है और शादी नहीं हुई है। परिवार के पास गांव में एक घर है, 33 एकड़ कृषि भूमि है, जयपुर में HIG घर है…। परिवार को 85 हजार रुपये मासिक पेंशन मिल रही है। परिवार की मासिक आय उनकी आजीविका के साथ सामाजिक दायित्वों के लिए पर्याप्त नजर आ रही है।’

आरोपी पर पत्नी की अदला-बदली, रेप और गैंगरेप के आरोप, हाईकोर्ट ने कहा- जमानत देना सही नहीं

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे शख्स को जमानत देने से इनकार किया है जिस पर पत्नी को ‘पार्टनर स्वैप’ के लिए मजबूर करने का आरोप है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर अपनी पत्नी की तस्वीर लगा उसके साथ सेक्स का ऑफर दिए जाने का भी आरोप है। कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपी को जमानत नहीं दी कि यह ‘सामान्य वैवाहिक विवाद के आरोपों’ का केस नहीं है।  रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस गिरीश कथपालिया जिस शख्स की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे उस पर बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, शारीरिक शोषण, क्रूरता और आपराधिक धोखाधड़ी जैसे आरोप हैं। 9 जून को दिए आदेश में कोर्ट ने कहा, ‘FIR में लगाए गए आरोप रूढ़िवादी वैवाहिक विवाद के नहीं हैं। कोर्ट ने महिला के इस आरोप पर विचार किया कि उसका देवर उसे गलत तरीके से छूकर उसका यौन उत्पीड़न करता था। महिला ने जब इसकी शिकायत अपने पति से की तो उसने उसे इस अपमान को अनदेखा करने के लिए कहा। अदालत ने एफआईआर का हवाला दिया, ‘जिसमें दर्ज किया गया था कि पति “ब्लेड से उसके हाथों को चोट पहुंचाता था और घायल हाथों से उसे रसोई का काम करवाता था” और साथ ही “उस पर पत्नी की अदला-बदली के लिए सहमत होने का दबाव बनाने लगा था और इस उद्देश्य के लिए, वह उसे एक होटल में ले गया जहां उसके दोस्तों ने उसके साथ छेड़छाड़ की, इसलिए वह भाग गई”। उस व्यक्ति पर महिला की फर्जी इंस्टाग्राम आईडी बनाने और “उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करने” के अलावा “लोगों को पैसे के लिए उसके साथ यौन संबंध बनाने के लिए उकसाने” का भी आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने कहा कि “गंभीर आरोपों” के अलावा, महिला ने बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के अपराधों का आरोप लगाते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष अपना बयान भी दर्ज कराया। अदालत ने कहा कि इसके अलावा, ऐसा प्रतीत होता है कि इससे पहले, जब अग्रिम जमानत दी गई थी, तो आरोपी ने अभियोक्ता से संपर्क किया था और टेक्स्ट चैट का आदान-प्रदान किया था, जिसकी प्रतियां रिकॉर्ड में हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण होगा कि उन टेक्स्ट चैट को आरोपी ने एक नए सिम कार्ड के माध्यम से एक काल्पनिक नाम के तहत बनाया था, लेकिन जांच में, उक्त सिम उसके नाम पर पंजीकृत पाया गया।”

‘अगर मां कमाती भी हो, बच्चे ही परवरिश के लिए पैसे देना पिता की ही जिम्मेदारी’, हाईकोर्ट का अहम फैसला

नई दिल्ली  दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए महिलाओं और बच्चों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है। इसके तहत दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि मां ज्यादा कमाती है तो क्या हुआ, बच्चे की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी पिता पर होगी। पिता को पूरा खर्च देना होगा। दरअसल, एक तलाकशुदा व्यक्ति ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसकी पूर्व पत्नी हर महीने 75 से 80 हजार रुपये प्रति माह कमाती है, इसलिए अपने दो बच्चों की परवरिश का वित्तीय बोझ बराबर-बराबर बांटना चाहिए। पिता की मांग को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। फिर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही पूर्व पत्नी नौकरीपेशा हो और प्रति माह 75 से 80 हजार रुपये कमाती हो लेकिन दो बच्चों के भरण-पोषण की पूरी वित्तीय जिम्मेदारी पिता पर होनी चाहिए, जो लगभग 1.75 लाख रुपये प्रति माह कमाता है। हाईकोर्ट ने केवल आय के आधार पर खर्च को 50:50 विभाजित करने की पिता की मांग को खारिज कर दिया। न्यायालय ने दोहराया कि भरण-पोषण में न केवल बुनियादी जरूरतें शामिल होनी चाहिए, बल्कि शिक्षा, सह-पाठयक्रम गतिविधियां और बच्चे की गरिमा बनाए रखना भी शामिल होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि बच्चे का भरण-पोषण मुख्य रूप से गैर-संरक्षक माता-पिता का कर्तव्य है, खासकर अगर वह माता-पिता आर्थिक रूप से मजबूत हो। मां दोहरी भूमिका निभाती है: हाईकोर्टन्यायालय ने मां की दोहरी भूमिका को व्यापक रूप से स्वीकार किया। एक कार्यरत पेशेवर और एकमात्र देखभालकर्ता के रूप में, वह भावनात्मक और तार्किक बोझ उठाती है जो उसे वित्तीय दायित्व से बचाने के लिए काफी है। उच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी को दो काम करने पड़ते हैं, एक कार्यालय के लिए और दूसरा कार्यालय के बाद बच्चे की देखभाल के लिए। इसे मौद्रिक शब्दों में नहीं आंका जा सकता।  

नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति के बाद पीड़िता का इनकार

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकलपीठ के समक्ष पूर्व निर्देश के पालन में मेडिकल रिपोर्ट पेश की गई। विशेषज्ञ डाक्टरों ने अवगत कराया कि आठ माह का गर्भपात कराने से बच्चे व पीड़ित को खतरा हो सकता है। यह सुनते ही नाबालिग व उसके अभिभावकों ने गर्भपात से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए पीड़ित को गर्भ जारी रखने की अनुमति दे दी। दरअसल, हाई कोर्ट की 20 फरवरी, 2025 की गाइडलाइन के अंतर्गत यदि कोई नाबालिग रेप पीड़िता 24 हफ्ते (करीब छह महीने) से ज्यादा गर्भवती हो, तो गर्भपात के लिए हाई कोर्ट से मार्गदर्शन लेना होगा। यह आदेश सभी जिम्मेदार विभागों को दिया गया था। इसके बाद बालाघाट जिला निवासी बच्ची के गर्भपात की अनुमति के लिए बालाघाट जिला अदालत ने हाई कोर्ट को पत्र लिखा था। बेंच ने इस पत्र को याचिका मानकर सुनवाई की। कोर्ट ने नौ जून को मेडिकल टीम गठित कर आठ माह के गर्भपात से होने वाले नुकसान के बारे में बताने को कहा था। बच्ची व उसके अभिभावकों को भी आठ माह के गर्भपात की जटिलताओं से अवगत कराने को कहा गया था। गुरुवार को मेडिकल टीम की ओर से रिपोर्ट पेश की गई। बताया गया कि पूर्णकाल तक गर्भ धारण करना बच्ची के मानसिक व शारिरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालेगा। आठ माह का गर्भपात किया जा सकता है, किन्तु इसमें बच्ची व उसके गर्भस्थ शिशु की जान को खतरा है। गर्भपात की दशा में पीड़ित के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्ट में बताया गया कि इस जानकारी के बाद पीड़ित व उसके अभिभावक गर्भपात के लिए सहमत नही हैं। रिपोर्ट के अवलोकन के बाद हाई कोर्ट ने पीड़ित और उसके अभिभावकों को उनकी इच्छानुसार गर्भ पूर्ण करने के लिए स्वतंत्रता दे दी। इधर कमेटी बनाकर दस्तावेजों की जांच करने के दिए निर्देश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकलपीठ ने गढ़ा बाजार के अतिक्रमणों के विरुद्ध जारी कार्रवाई के मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। इसके अंतर्गत एक कमेटी बनाकर याचिकाकर्ता की भूमि से संबंधित दस्तावेजों की जांच के निर्देश दे दिए। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती कब्जा तोड़ने की कार्रवाई पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कार्रवाई के पूर्व याचिकाकर्ता को सुनवाई का पूरा अवसर देने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता गढ़ा बाजार निवासी महेंद्र कुमार कोष्टा की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता को निवासरत भूमि उसके पूर्वजों द्वारा प्राप्त हुई है। उनका परिवार वर्ष 1935 में वहां पर निवास करता आ रहा है। विगत दिवस नगर निगम ने याचिकाकर्ता को अतिक्रमण हटाने का नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता ने अपने मकान में बने छज्जे, टीन शेड आदि को हटा लिया। कुछ दिन बाद नगर निगम द्वारा मकान के एक हिस्से को तोड़ने हेतु पुनः चिह्नित कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से भूमि के कब्जा तथा अधिकार के सभी दस्तावेज कोर्ट में पेश किए। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद ननि को एक कमेटी बनाकर दस्तावेजों की वैधानिकता की जांच करने के निर्देश दिए।

चेक बाउंस मामले में मोहाली कोर्ट ने सुनाया फैसला, अरुणाचल प्रदेश के BJP विधायक समेत तीन को 2 साल की जेल

मोहाली अरुणाचल प्रदेश के एक मौजूदा विधायक और तीन अन्य को चेक बाउंस मामले में मोहाली के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रथम अभय राजन शुक्ला की अदालत ने दो साल के कारावास की सजा सुनाई. अरुणाचल प्रदेश के सागली से भाजपा विधायक रायतु तेची और टीके इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को चेक बाउंस मामले में यह सजा सुनाई गई है. कोर्ट ने तीनों पर कुल ₹5.55 करोड़ का जुर्माना भी लगाया है. यह मामला जीटीसी-एम-ट्रेड्ज एलएलपी से खरीदी गई निर्माण सामग्री के लिए जारी किए गए ₹50 लाख मूल्य के चेक बाउंस होने से जुड़ा है. कानूनी नोटिस के बावजूद आरोपियों ने कोई जवाब नहीं दिया था. मोहाली के जेएमआईसी अभय राजन शुक्ला की अदालत ने दोषियों द्वारा कानून की अवहेलना का हवाला देते हुए नरमी बरतने की याचिका खारिज कर दी, हालांकि कोर्ट ने उन्हें उच्च अदालत में अपील के लिए जमानत दे दी. दोषियों में शामिल 60 वर्षीय रायतु तेची पापुम पारे जिले के सागली विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक हैं, जिन्हें 2024 के अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में निर्विरोध चुना गया था. शिकायतकर्ता कुलविंदर सिंह ग्रेवाल के वकील इजविंदर सिंह गिल ने कहा कि चेक दो बार बाउंस हुए- पहली बार 25 फरवरी, 2020 को और फिर उसी साल 31 मार्च को- बैंक ने ‘इंसफिशिएंट फंड’ का हवाला दिया. उसके बाद भेजे गए कानूनी नोटिस के बावजूद, आरोपियों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला. मुकदमे के दौरान बचाव पक्ष ने नरमी बरतने की अपील की और कहा कि आरोपी वरिष्ठ नागरिक हैं और पहली बार अपराध कर रहे हैं. हालांकि, शिकायतकर्ता के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि अन्य लोगों को इसी तरह का आचरण करने से रोकने के लिए अधिकतम सजा दी जाए. अपने फैसले में न्यायाधीश अभय राजन शुक्ला ने कहा, ‘दोषियों ने देश के कानून के प्रति घोर उपेक्षा दिखाई. ऐसे अनुचित कृत्यों के प्रति नरम रुख अपनाने से हमारे समाज में अराजकता को और बढ़ावा मिलेगा, जो पहले से ही एक गंभीर दौर से गुजर रहा है.’ अदालत ने कहा कि मामले के लंबित रहने के दौरान दोषियों द्वारा पहले ही भुगतान की गई और शिकायतकर्ता द्वारा स्वीकार की गई कोई भी राशि मुआवजे में से काट ली जाएगी.  

नाबलिग रेप पीड़िता मामले पर हाईकोर्ट सख्त: कहा– सिर्फ गर्भपात की मंजूरी नहीं, लापरवाह अफसरों पर भी हो कार्रवाई

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने साढ़े 7 माह की गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता के मामले की सूचना देने में लापरवाही के मामले में राज्य सरकार को आवश्यक विवरण के साथ केस डायरी पेश करने के निर्देश दिए हैं, जिससे नाबालिग के गर्भपात तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई पर निर्णय लिया जा सके. जस्टिस अमित सेठ ने याचिका पर सोमवार को सुनवाई के दौरान पेश किये गये दस्तावेजों का अवलोकन करते हुए बालाघाट सीएमएचओ को पीडित के संबंध में स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश जारी किए. याचिका पर अगली सुनवाई 12 जून को होगी. बालाघाट जिला अदालत ने लिखा हाई कोर्ट को पत्र बता दें कि बालाघाट जिला अदालत ने दुष्कर्म पीड़ित 14 वर्षीय लड़की के गर्भपात की अनुमति के लिए हाई कोर्ट को पत्र लिखा था. हाई कोर्ट को ये पत्र 26 मई को प्राप्त हुआ. पत्र के साथ सिविल सर्जन की रिपोर्ट में दुष्कर्म की रिपोर्ट थाने में कब दर्ज हुई, इसका कोई उल्लेख नहीं था. इससे पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था ” दुष्कर्म पीड़िता के गर्भवती होने के संबंध में गर्भपात के लिए हाई कोर्ट ने 20 फरवरी 2025 को पारित आदेश में गाइडलाइन निर्धारित की है. दुष्कर्म के कारण पीड़ित के गर्भवती होने की सूचना थाना प्रभारी द्वारा आवश्यक रूप में संबंधित न्यायालय को प्रदान की जाएगी. नाबालिग पीड़िता 24 हफ्ते (करीब 6 महीने) से ज्यादा गर्भवती हो, तो गर्भपात के लिए हाई कोर्ट से मार्गदर्शन लेना होगा. यह आदेश सभी जिम्मेदार विभागों को दिया गया था.” आवश्यक विवरण के साथ केस डायरी पेश करें एकलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है “सभी आवश्यक विवरण और केस डायरी के साथ रिपोर्ट पेश करें कि किन परिस्थितियों में नाबालिग लड़की को साढ़े 7 महीने का गर्भ समाप्त करने में देरी हुई. रिपोर्ट अगली सुनवाई या उससे पहले दाखिल की जाए, जिससे नाबालिग लड़की के गर्भ को समाप्त करने के लिए उचित निर्देश जारी किए जा सकें और लापरवाही करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके.”

भिंड में पत्रकारों की थाने में पिटाई का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने MP सरकार को भेजा नोटिस, मांगा जवाब

भिंड भिंड जिले के दो पत्रकारों की कथित पिटाई का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने मामले में भिंड एसपी को भी पक्षकार बनाने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जून को होगी। मामला भिंड के पत्रकार शशिकांत जाटव और अमरकांत सिंह चौहान से जुड़ा है। दोनों ने चंबल नदी में रेत माफिया के अवैध कारोबार की खबरें प्रकाशित की थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी बात से नाराज होकर भिंड पुलिस ने उन्हें एसपी कार्यालय में बुलाकर मारपीट की और धमकाया। हालांकि, एसपी असित यादव ने इन आरोपों का खंडन किया है। इसके बाद खुद को जान का खतरा बताते हुए दोनों पत्रकार अपना घर छोड़कर दिल्ली आए और सुप्रीम कोर्ट व दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 28 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने अमरकांत सिंह चौहान को सुरक्षा प्रदान की थी। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को दो महीने के लिए उन्हें सुरक्षा देने के निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि जान का खतरा है तो कोर्ट उनकी रक्षा करेगा, लेकिन पहले तीन पहलुओं पर स्पष्टीकरण देना होगा—(1) दोनों को जान का खतरा कैसे साबित होता है, (2) याचिकाकर्ता मध्यप्रदेश हाईकोर्ट क्यों नहीं गए और (3) पहले से लंबित दिल्ली हाईकोर्ट में मामला क्यों नहीं रखा गया? पत्रकारों की ओर से वकील वारिशा फराजत ने कोर्ट को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की ओर से जारी बयान और 27 मई को मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना भिंड एसपी को पक्षकार बनाए उन पर आरोप लगाना अनुचित है। इसके बाद वकील ने माफी मांगते हुए एसपी को पक्षकार बनाने की सहमति दी।  

जस्टिस संजीव सचदेवा को मिल सकती है MP हाईकोर्ट की कमान

जबलपुर  जस्टिस संजीव सचदेवा एमपी हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की है। वे एक्टिंग चीफ जस्टिस हैं। 3 नए जज मिले हाईकोर्ट को 3 नए जज मिले हैं। जबलपुर के अपर महाधिवक्ता अमित सेठ, ग्वालियर के अधिवक्ता दीपक खोत व पवन द्विवेदी जज बनाए गए। हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2022 को नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे थे। कॉलेजियम ने जांच की। जनवरी 24 को तीनों नाम केंद्र को भेजे। 3 नए जज आने से हाईकोर्ट में 35 जज हो जाएंगे। कर्नाटक, पटना, गुवाहाटी, झारखंड हाईकोर्ट में सीजे नियुक्ति के नामों की सिफारिश केंद्र को भेजी है। जस्टिस संजीव सचदेवा का जन्म 7 अप्रैल 1964 को हुआ था। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री प्राप्त की और वर्ष 1989 में वकालत शुरू की। वर्ष 2013 में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। बाद में वे स्थायी न्यायाधीश बने और 2024 में उनका तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में किया गया। वर्तमान में वे जबलपुर हाईकोर्ट में प्रशासनिक न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।

SC ने यौन शिक्षा में सुधार और POCSO मामलों की रियल-टाइम ट्रैकिंग के सुझावों पर केंद्र सरकार से राय मांगी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को सरकार को निर्देश दिया कि वह बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों से निपटने के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर POCSO कोर्ट बनाए। कोर्ट ने कहा कि कई राज्यों ने स्पेशल POCSO कोर्ट बनाए हैं, लेकिन तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में केस पेंडेंसी के चलते और ज्यादा कोर्ट बनाए जाने की जरूरत है। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के मामलों के लिए स्पेशल कोर्ट कम होने के कारण मामले की जांच करने के लिए डेडलाइन का पालन नहीं हो पा रहा है। कोर्ट ने पॉक्सो केस के लिए निर्धारित डेडलाइन के अंदर ट्रायल पूरा करने के अलावा निर्धारित अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट और एमिकस क्यूरी वी गिरी और सीनियर एडवोकेट उत्तरा बब्बर को POCSO कोर्ट की स्थिति पर राज्यवार डीटेल देने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उसने “बाल बलात्कार की घटनाओं की संख्या में खतरनाक वृद्धि” को हाइलाइट करते हुए एक्शन लिया था। कोर्ट ने राज्य सरकारों से उन जिलों में दो कोर्ट बनाने को कहा जहां POCSO अधिनियम के तहत बाल शोषण के पेंडिंग मामलों की संख्या 300 से ज्यादा है। कोर्ट ने कहा POCSO एक्ट के तहत 100 से ज्यादा FIR वाले हर जिले में एक कोर्ट बनाने के जुलाई 2019 के निर्देश का मतलब था कि डेजिगनेटेड कोर्ट केवल कानून के तहत ऐसे मामलों से निपटेगा। पहले जानिए क्या है पॉक्सो एक्ट भारत में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए पॉक्सो एक्ट, 2012। अगर कोई 18 साल से कम उम्र का यौन शोषण करता है तो उसे इस कानून के तहत सजा मिलती है। बच्चों को गलत तरीके से छूना, उन्हें गलत तरीके से छूने के लिए कहना, या उनके साथ यौन संबंध बनाना, बच्चों को अश्लील चीजें दिखाना, उन्हें वेश्यावृत्ति या पोर्नोग्राफी में शामिल करना, या इंटरनेट पर उनसे गलत बातें करना भी बाल यौन शोषण (CSA) है। पॉक्सो एक्ट के तहत पुरुष और महिला आरोपी दोनों के खिलाफ एक्शन लिया जा सकता है। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट का हाल बहरहाल, इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्श फंड (ICPF) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में CSA के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन इन मामलों को निपटाने की रफ्तार बहुत धीमी है। इसी वजह से भारत सरकार ने अक्टूबर 2019 में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने योजना शुरू की। इसके तहत, देश भर में 1,023 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) बनाए गए हैं। ये कोर्ट CSA के मामलों की तेजी से सुनवाई करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में FTSC को 1 अप्रैल, 2023 से 31 मार्च, 2026 तक जारी रखने की मंजूरी दी है। इस पर कुल 1952.23 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड (ICPF) की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में पॉक्सो एक्ट के तहत मामलों को निपटाने की क्या स्थिति है। पूरे देश में, 2022 में सिर्फ 3% मामलों में ही दोषियों को सजा मिली। मतलब 2,68,038 मामलों में से सिर्फ 8,909 मामलों में ही आरोपियों को दोषी पाया गया। हर FTSC ने 2022 में औसतन सिर्फ 28 पॉक्सो मामलों का निपटारा किया। 2022 में, हर पॉक्सो मामले को निपटाने में औसतन 2.73 लाख रुपये खर्च हुए। इसी तरह, हर सफल सजायाफ्ता पॉक्सो मामले पर सरकारी खजाने से औसतन 8.83 लाख रुपये खर्च हुए। अगर कोई नया मामला नहीं आता है, तो भी भारत को 31 जनवरी, 2023 तक लंबित पॉक्सो मामलों के बैकलॉग को खत्म करने में लगभग नौ (9) साल लगेंगे। अभी 2.43 लाख पॉक्सो मामले पेंडिंग हैं। इसलिए, यह बहुत जरूरी है कि हर जिले में स्थिति का दोबारा आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर नए ई-पॉक्सो कोर्ट बनाए जाएं। योजना के अनुसार, सभी 1,023 स्वीकृत फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट को तुरंत पूरी तरह से चालू किया जाना चाहिए। ट्रायल की समय-सीमा तय की जाए रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित के लिए न्याय की लड़ाई लोअर कोर्ट में सजा होने के बाद भी खत्म नहीं होती है। यह लड़ाई तब तक जारी रहती है जब तक कि अपील की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। इसलिए, अपील/ट्रायल के समय को तय किया जाना चाहिए ताकि जल्द न्याय मिल सके। इस संबंध में नीतियां बनाई जानी चाहिए, और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर समयबद्ध ढांचे बनाए जाने चाहिए ताकि लंबित पॉक्सो मामलों का निपटारा तेजी से हो सके। विशेष अदालतें स्थापित करने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने 16 दिसंबर, 2019 को एक विस्तृत आदेश पारित किया था। इसमें राज्य सरकारों को पॉक्सो एक्ट, 2012 के तहत मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने के निर्देश दिए गए थे। यह 25 जुलाई, 2019 के आदेश के क्रम में था, जिसमें सभी राज्यों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया था कि हर जिले में 60 दिनों के भीतर एक विशेष पॉक्सो अदालत स्थापित की जाए, जिसमें 100 से अधिक पॉक्सो मामले लंबित हैं। कानून और न्याय मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर कार्रवाई की और जनवरी 2020 में बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के मामलों के त्वरित निपटान के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) की योजना लेकर आया. इस योजना में FY 2021-22 के अंत तक पूरे भारत में बलात्कार और पॉक्सो मामलों के त्वरित निपटान के लिए 389 एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट (EPC) सहित 1,023 FTSC स्थापित करने की परिकल्पना की गई थी। इस विश्लेषण के माध्यम से, इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड (ICPF) पॉक्सो एक्ट के तहत मामलों और शिकायतों के संबंध में भारत की स्थिति पर प्रकाश डालता है। इस व्यापक कानून के बनने के एक दशक बाद भी, पीड़ितों और उनके परिवारों की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं, जिन्हें पहले के कानूनों द्वारा पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया था। हालांकि, जिस गति से मामलों को निपटाया जा रहा है, वह बहुत निराशाजनक है। केस बैकलॉग की चौंकाने वाली स्थिति रिपोर्ट में केस बैकलॉग की एक चौंकाने वाली प्रवृत्ति का पता चला। … Read more

HC ने 31 सप्ताह की गर्भवती नाबालिग को दी प्रसव की अनुमति, दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के लिए पॉलिसी बनाने के आदेश

जबलपुर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 31 सप्ताह की गर्भवती नाबालिग को बच्चे को जन्म देने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने यह फैसला नाबालिग और उसके माता-पिता की बच्चे को जन्म देने की इच्छा को ध्यान में रखते हुए दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को नाबालिग को सभी जरूरी चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने और बच्चे के जन्म के बाद उसकी देखभाल करने का भी निर्देश दिया है। जस्टिस विनय सराफ की पीठ ने दिया आदेश साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा है कि MTP (Medical Termination of Pregnancy) अधिनियम मेडिकल बोर्ड को गर्भावस्था की समाप्ति पर राय बनाते समय गर्भवती की शारीरिक और भावनात्मक भलाई का भी मूल्यांकन करने की अनुमति देता है। जस्टिस विनय सराफ की अवकाशकालीन एकलपीठ ने यह आदेश दिया। सुनवाई में कोर्ट ने की अहम टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि MTP अधिनियम मेडिकल बोर्ड को सुरक्षा प्रदान करता है, जब वे गर्भावस्था की समाप्ति के बारे में सद्भावपूर्वक राय बनाते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड को अपनी राय बनाते समय सिर्फ MTP अधिनियम के मानदंडों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें गर्भवती महिला की शारीरिक और भावनात्मक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड को अपनी राय और परिस्थितियों में किसी भी बदलाव के लिए ठोस कारण बताने चाहिए। गर्भावस्था की समाप्ति के मामलों में गर्भवती महिला की सहमति सबसे महत्वपूर्ण है। नाबालिग के साथ हुआ था दुराचार यह मामला मंडला जिले के खटिया थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने एडीजे (अतिरिक्त जिला जज) कोर्ट को जानकारी दी थी कि एक नाबालिग लड़की के साथ दुराचार हुआ है और वह गर्भवती है। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया था कि नाबालिग के पेट में पल रहा भ्रूण 29 सप्ताह और 6 दिन का है। डॉक्टरों ने कहा था कि अगर गर्भपात किया जाता है तो नाबालिग की जान को खतरा हो सकता है। इसके बाद एडीजे कोर्ट ने इस मामले को हाईकोर्ट में भेजा था। पीड़िता और माता-पिता ने जताई थी इच्छा हाईकोर्ट में नाबालिग और उसके माता-पिता ने एक पत्र पेश किया। उस पत्र में उन्होंने गर्भावस्था जारी रखने और बच्चे को जन्म देने की इच्छा जताई थी। कोर्ट ने कहा कि स्त्री रोग विशेषज्ञ ने भी राय दी है कि भ्रूण 29 सप्ताह से अधिक का है। इसलिए, गर्भपात करने से नाबालिग की जान को खतरा हो सकता है। राज्य सरकार वहन करेगी बच्चे का खर्च कोर्ट ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि नाबालिग को बच्चे को जन्म देने के लिए डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम के माध्यम से सभी उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया से संबंधित सभी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। गर्भावस्था के दौरान, बच्चे के जन्म के समय और उसके बाद डॉक्टरों द्वारा सभी आवश्यक देखभाल और सावधानी बरती जाएगी। प्रसव के बाद नाबालिग की देखभाल की जाएगी और राज्य सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह स्थापित मानदंडों के अनुसार बच्चे की देखभाल करे। 12 तक की पढ़ाई रहेगी फ्री कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बच्चे को कक्षा 12 तक मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बच्चे के वयस्क होने तक उसे सभी चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ित और बच्चे का नाम किसी भी तरह से उजागर नहीं किया जाएगा। राज्य सरकार को उठाने चाहिए कदम कोर्ट ने राज्य सरकार को यौन उत्पीड़न, बलात्कार या अनाचार से बचे बच्चों के लिए भोजन, आश्रय, शिक्षा और सुरक्षा की सुविधाएं प्रदान करने के लिए एक नीति बनाने पर विचार करने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग और उसके माता-पिता प्रसव के बाद बच्चे को गोद देना चाहते हैं, तो राज्य सरकार को इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कानूनी प्रावधानों के अनुसार आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अब गवाह कोर्ट में गवाही दे सकेंगे, कई बार दूर तक जाने की परेशनी से निजात मिल सकेगी

भोपाल अदालतों में गवाहों की पेशी में कई बार केस में देरी की परेशानी अब बीते जमाने की बात होने वाली है. केंद्र सरकार की न्यायश्रुति योजना के तहत मध्य प्रदेश में पुलिस अब करीब 2000 स्थान चिन्हित कर वहां वीडियो कॉन्फ्रेसिंग रूम बनाने की तैयारी में है. दरअसल, यह देखा गया है कि कई बार सिर्फ गवाहों की गैर-मौजूदगी की वजह से अदालत को केस की अगली सुनवाई के लिए तारीख देनी होती है. ज्यादातर ममलों में यह वह गवाह होते हैं जिनकी पुलिस इन्वेस्टिगेशन में अहम भूमिका होती है. जैसे- प्रत्यक्षदर्शी, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर, केस से जुड़े आईओ (इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर) या मेडिकल ऑफिसर. वहीं, कई बार केस से जुड़े ऐसे अधिकारीयों या कर्मचारियों का ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन कोर्ट की सुनवाई के दौरान गवाही में सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ कहने के लिए उन्हें उसी शहर या इलाके की कोर्ट में आना होता है, जहां कार्यरत रहने के दौरान उन्होंने केस में योगदान दिया हो. लेकिन देखा गया है कि कई बार अलग-अलग कारणों से यह गवाह कोर्ट समय पर नहीं पहुंच पाते और कोर्ट को अगली तारीख देनी पड़ती है, जिससे सुनवाई में अनावश्यक देरी होती है और केस लंबा खींचता जाता है. अब केंद्र सरकार इसी समस्या को दूर करने के लिए न्यायश्रुति योजना के तहत पुलिस थानों और एसपी कार्यालय, सीएसपी कार्यालय और एसडीओपी कार्यालय में वीडियो कांफ्रेंसिंग रूम बनाने के लिए फंड देने वाली है. पुलिस कमिश्नर प्रणाली वाले भोपाल और इंदौर शहर में एसीपी कार्यालय में इसकी व्यवस्था की जाएगी. इस योजना के तहत स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो साउंडप्रूफ केबिन तैयार करेगा, जहां वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए यह गवाह कोर्ट में गवाही दे सकेंगे और सिर्फ गवाही देने के लिए उन्हें कई बार दूर तक जाने की परेशनी से निजात मिल सकेगी.  

हाईकोर्ट में रिटायर्ड लेक्चरर की दायर की गई अवमानना याचिका पर सुनवाई, DEO- BEO के खिलाफ वांरट

ग्वालियर  ग्वालियर हाईकोर्ट में स्कूल शिक्षा विभाग के रिटायर्ड लेक्चरर द्वारा दायर की गई अवमानना याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और जिला शिक्षा अधिकारी के साथ ही BEO को 05-05 हजार जमानती वारंट से तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को होगी। दरअसल स्कूल शिक्षा विभाग के रिटायर्ड लेक्चर भारत सिंह सिकरवार के एडवोकेट आरबीएस तोमर ने साल 2023 में अवमानना याचिका दायर की गई थी, जिसमें कोर्ट को बताया गया था कि 2020 में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वार्षिक इंक्रीमेंट की गणना का आदेश दिया था, ताकि उनकी पेंशन का पुनः निर्धारण किया जा सके। 6 साल बीतने के बाद भी हाईकोर्ट के सिंगल बेंच के आदेश का पालन नहीं किया गया। ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि अवमानना याचिका पर सुनवाई के बाद 28 नवंबर 2023 को नोटिस हुआ। जिसके अनुपालन प्रतिवेदन के लिए 3 सप्ताह का समय भी दिया गया। तब से लेकर अब तक दो बार पुनर्विचार याचिका दायर की गई, जिसे खारिज किया गया। ऐसे में कोर्ट ने कहा कि 6 साल बीतने के बाद भी आदेश का पालन अभी तक नहीं किया जा सका है, बल्कि हर बार समय मांगा जाता रहा है। ऐसी स्थिति में लगता है कि अधिकारी आदेश का पालन करने में गंभीर नहीं है। लिहाजा कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, जिला शिक्षा अधिकारी अजय कटियार और BEO मंजू सिंह को 05-05 हजार के जमानती वारंट से तलब किया है।

हाईकोर्ट ने कविता रैकवार की पार्षदी पुनः बहाल करने के आदेश दिए

जबलपुर  मध्य प्रदेश के जबलपुर से भाजपा की महिला पार्षद कविता रैकवार के पार्षदी शून्य करने के मामले में नया मोड़ आ गया है। हाईकोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर के आदेश को रद्द करते हुए कविता रैकवार की पार्षदी पुनः बहाल करने के आदेश दिए हैं। दरअसल 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर अभय वर्मा ने भाजपा की महिला पार्षद कविता रैकवार की पार्षदी सिर्फ इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी है। आपको बता दें कि संभागीय कमिश्नर ने यह आदेश भोपाल की उच्च स्तरीय जांच कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर सुनाया था। एक दिन पहले ही उच्च स्तरीय आदेश को हाई कोर्ट कर चुका था खारिज 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर के आदेश के पहले यानी की 28 अप्रैल को हाई कोर्ट भोपाल की उच्च स्तरीय जांच को खारिज कर चुका था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह से किसी के आरोप मात्र लगा देने से किसी का जाति प्रमाण पत्र फर्जी नहीं हो जाता। हाई कोर्ट ने इसमें कहा था कि आप इस मामले में पहले जांच कर ले और जांच में जो बिंदु निकले उस आधार पर आगे की कार्रवाई की जाए। लेकिन 28 तारीख को हाई कोर्ट का फैसला आया और उसके एक दिन बाद ही संभागीय कमिश्नर ने भोपाल की उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कविता रैकवार की पार्षदी रद्द कर दी। जिसके बाद कविता रैकवार ने मामले को दोबारा हाईकोर्ट में चुनौती दी।   हाईकोर्ट ने एक बार फिर से मामले की सुनवाई करते हुए कहा की जब पिछले आदेश में ही यह बात क्लियर हो चुकी थी, कि किसी के आरोप मात्र के आधार आप किसी का जाति प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया जा सकता। फिर दोबारा क्यों इस मामले की जांच नहीं कराई गई और कैसे महिला की पार्षदी रद्द कर दी गई। हाई कोर्ट ने दोबारा महिला की पार्षदी बहाल करने के निर्देश दिए। हाई कोर्ट में इस मामले में की टिप्पणी हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि जांच कमेटी का ये दायित्व बनता है कि वो जिस पर आरोप लगाए गए है उससे सुबूत न मांगते हुए आरोप लगाने वाले से सबूत मांगे जाने चाहिए। लेकिन यहां उल्टी गंगा बह रह रही है। कोर्ट ने कहा कि महिला पार्षद ने सक्षम अधिकारी के समक्ष ही दस्तावेज जमा करवाकर कास्ट सर्टिफिकेट बनवाया होगा। जब महिला ने दस्तावेज जमा किए होंगे तो सक्षम अधिकारी द्वारा उसकी जांच करके ही यह सर्टिफिकेट जारी हुआ होगा। फिर ऐसे में कैसे उस सक्षम अधिकारी की कलम को बिना जांच के ही खारिज किया जा सकता है। क्या है पूरा मामला दरअसल 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर अभय वर्मा ने जबलपुर से भाजपा से महिला पार्षद कविता रैकवार की पार्षदी सिर्फ इसलिए शून्य कर दी थी क्योंकि महिला पर फर्जी तरीके से जाति प्रमाण पत्र बनाने का आरोप लगा था। जबलपुर के वार्ड क्रमांक 24 हनुमानताल वार्ड  पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला के लिए आरक्षित था, जहां से साल 2022 के नगर निगम चुनाव में बीजेपी की कविता रैकवार चुनाव जीती थी। चुनाव जीतने के बाद किसी ने कविता रैकवार के जाति प्रमाण पत्र को लेकर शिकायत कर दी थी। शिकायत में कहा गया था कि कविता रैकवार सामान्य वर्ग से आती है, लेकिन उसने ओबीसी का फर्जी सर्टिफिकेट बना चुनाव लड़ा था। शिकायत पर भोपाल की उच्च स्तरीय कमेटी ने जांच कर महिला से उसके ओबीसी होने की सबूत मांगे और उसके बाद उसके सर्टिफिकेट को ही फर्जी बता दिया। इसी आधार पर संभागीय कमिश्नर ने महिला की पार्षदी को शून्य कर दिया। दरअसल कविता रैकवार महाराष्ट्र की रहने वाली है और उनकी शादी जबलपुर में हुई थी जो कि ओबीसी वर्ग से आते हैं। लेकिन शिकायतकर्ता कहना है की कविता रैकवार के पति ओबीसी से है लेकिन कविता रैकवार सामान्य वर्ग से आती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश को महिलाओं का संवैधानिक अधिकार बताया, अब तीसरे बच्चे के जन्म पर भी पूरा मातृत्व अवकाश मिलेगा

नई दिल्ली देशभर की कामकाजी महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राहत भरा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने  साफ किया कि मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) केवल सामाजिक न्याय या सद्भावना का विषय नहीं, बल्कि महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है. अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक सरकारी शिक्षिका को तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) देने से इनकार कर दिया गया था. जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि मातृत्व अवकाश का मकसद महिला कर्मचारियों को सामाजिक न्याय दिलाना है ताकि वे बच्चे को जन्म देने के बाद न केवल जीवित रह सकें, बल्कि अपनी ऊर्जा दोबारा प्राप्त कर सकें, शिशु का पालन-पोषण कर सकें और अपने कार्यकौशल को बनाए रख सकें. तमिलनाडु की एक महिला सरकारी कर्मचारी के उमादेवी की अर्जी पर जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह आदेश पारित किया है. महिला ने पुनर्विवाह के बाद बच्चे को जन्म दिया था. लेकिन उसके महकमे के आला अधिकारियों ने उसे मातृत्व अवकाश से वंचित रखने का आदेश दिया, जिसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. कोर्ट ने तमिलनाडु की एक सरकारी महिला कर्मचारी की याचिका पर यह फैसला सुनाया. महिला का अपनी दूसरी शादी से एक बच्चा था. महिला को यह कहकर मैटरनिटी लीव नहीं दी गई थी कि उसके अपनी पहली शादी से पहले से ही दो बच्चे थे. तमिलनाडु राज्य में नियम है कि मातृत्व लाभ केवल पहले दो बच्चों के लिए ही होगा. याचिका में महिला ने कहा था कि पहली शादी से पैदा हुए बच्चों को लेकर भी उन्हें मैटरनिटी लीव का लाभ नहीं मिला था. उनके वकील केव मुथुकुमार ने कहा कि उन्होंने दूसरी शादी के बाद ही सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था. बता दें कि मातृत्व अवकाश से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में मातृत्व लाभ अधिनियम में संशोधन कर 12 सप्ताह की छुट्टी को बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया था. सभी महिला कर्मचारियों कोपहले और दूसरे बच्चे के लिए मैटरनिटी लीव दी जाती है. बच्चा गोद लेने वाली माताएं भी 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं. यह बच्चे को सौंपे जाने की तारीख से शुरू होता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में मातृत्व अवकाश के अधिकार पर जोर दिया है. एक मामले में यह कहा गया है कि मातृत्व अवकाश सभी महिला कर्मचारियों का अधिकार है, चाहे उनकी नौकरी कैसी भी हो.

न्यायाधीश अपने विदाई समारोह में ही नहीं गए बल्कि 11 फैसले सुनाए, शनिवार को लास्ट डे रहेगा, आज आखिरी कार्यदिवस था

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है। जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए। जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है।

अदालत ने आदेश में कहा पत्नी के पास पति से अलग रहने का कोई ठोस कारण नहीं, भरण-पोषण की हक़दार नहीं

इंदौर कुटुंब न्यायालय ने एक महिला की तरफ से लगाई गई भरण-पोषण की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पत्नी के पास अपने पति से अलग रहने का कोई पर्याप्त वैधानिक कारण नहीं है. इसलिए वह भरण-पोषण पाने की अधिकारी नहीं है. हालांकि धीरेंद्र सिंह की कोर्ट ने अवयस्क बच्चों को भरण-पोषण दिए जाने के आदेश दिए हैं. अधिवक्ता डॉ. रूपाली राठौर ने कहा कि अदालत ने अपने फैसले में एक तरह ये माना कि पत्नी स्वयं का भरण पोषण करने में सक्षम नहीं है और पति अपनी पत्नी का भरण पोषण करने में उपेक्षा कर रहा है. लेकिन दूसरी तरफ़ ये भी माना कि पत्नी के पास अपने पति से अलग रहने का कोई पर्याप्त वैधानिक कारण नहीं है. महिला ने मई 2022 में पति के खिलाफ थाने में दर्ज कराई थी शिकायत बताया कि सुलोचना(परिवर्तित नाम) का विवाह सन 2013 में अमन(परिवर्तित नाम) से हुआ था. सन 2022 में सुलोचना ने पति के खिलाफ विवाह के बाद से ही कम दहेज लाने को लेकर ताने मारना, पांच लाख रुपये दहेज की मांग करना, गाली-गलौच व मारपीट करना, डिलीवरी का खर्चा उठाने से मना करने, घर से निकालने को लेकर मई 2022 में पुलिस थाने में शिकायत की. जिसके आधार पर पत्नी ने स्वयं और बच्चों के लिए पति से भरण-पोषण की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय, इन्दौर में याचिका लगाई. पति की और से जवाब पेश करते हुए वकील कृष्ण कुमार कुन्हारे ने कोर्ट को बताया कि पत्नी ने झूठे आधारों पर केस लगाया था. कोर्ट में पत्नी के बयानों एवं पति के वकील के द्वारा पत्नी से पूछे गये सवाल-जवाब के दौरान महत्वपूर्ण बातें उजागर हो गईं. कोर्ट ने माना कि पत्नी खुद और अवयस्क बच्चे का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है कुटुंब न्यायालय ने अपने फैसले में यह तो माना कि पत्नी खुद और अवयस्क बच्चे का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है. और पति भरण -पोषण करने में उपेक्षा कर रहा है. लेकिन माननीय न्यायालय में अपने फैसले में यह भी कहा कि पत्नी ने 2013 में शादी के पश्चात कोई शिकायत नहीं की. पत्नी ने सिर्फ मई 2022 में मामले की शिकायत दर्ज कराई. मई 2022 के पूर्व पत्नी द्वारा प्रताड़ना की कोई रिपोर्ट क्यों नहीं की गई. महिला द्वारा इसका स्पष्टीकरण नहीं देने पर कोर्ट ने विवाह के बाद पैसों के लिए उसको परेशान करने के बयानो को संदेहास्पद माना. ये महत्वपूर्ण फैसला उनके लिए नजीर है जो बिना पर्याप्त वैधानिक कारण पति से अलग रहती हैं और कोर्ट में ख़ुद के भरण-पोषण के लिए गलत आधार पर केस लगाती हैं.

प्रेम संबंध खराब होने के बाद अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा-HC

जबलपुर  मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में पदस्थापना के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) के खिलाफ दुष्कर्म व दहेज एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर को हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने आदेश में कहा है “दो साल तक चले संबंध के बाद पीड़िता ने शिकायत दर्ज करवाई. पीड़िता शिक्षित है और सरकारी कर्मचारी है. प्रेम संबंध खराब होने के कारण कथित अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा.” युवती रिश्वत के केस में फंसी तो शादी से इंकार पन्ना निवासी मनोज सोनी की तरफ से दायर याचिका में कहा गया “वर्ष 2015 में उसके परिवार ने आरोप लगाने वाली युवती के साथ शादी का प्रस्ताव रखा. उसने 14 फरवरी 2018 को युवती को सगाई की अंगूठी पहनाई. लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि युवती के खिलाफ रिश्वत लेने का आपराधिक प्रकरण दर्ज है तो उसने शादी से इंकार कर दिया. इसके बाद युवती ने उसके खिलाफ पन्ना जिले के अजयगढ़ थने में दुष्कर्म व दहेज एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करवा दी.” दहेज मांगने के साक्ष्य नहीं मिले एफआईआर में युवती ने आरोप लगाया “शादी का वादा कर उसके साथ जबरन संबंध बनाए और दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर शादी से इनकार कर दिया.” सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने कहा “प्रेम संबंध खराब के होने के कारण दुष्कर्म के कथित अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना गैरकानूननी है. प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दहेज की मांग के संबंध में भी विश्वसनीय साक्ष्यों का अभाव है. स्पष्ट है कि युवती द्वारा अनावश्यक रूप से उत्पीड़न करने का प्रयास किया गया.” रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ बनेगी एसआईटी रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न मामले की जांच में लापरवाही पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की 3 सदस्यीय विशेष जांच टीम के गठित करने आदेश जारी किये हैं. जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने आदेश में कहा है “एसआईटी की अध्यक्षता आईजी स्तर के अधिकारी करेंगे और इसमें एसपी स्तर की महिला अधिकारी को शामिल किया जाएगा. समिति में जबलपुर जिले से किसी को शामिल नहीं किया जाएगा. एकल पीठ ने डीजीपी को 3 दिन के भीतर एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया है.” मीटिंग के दौरान अश्लील इशारे करने का आरोप गौरतलब है कि जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय में पदस्थ एक महिला अधिकारी ने कुलपति राजेश कुमार वर्मा के खिलाफ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत पर कार्रवाई न होने पर पीड़ित महिला अधिकारी ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी. याचिका में कहा गया है “21 नवंबर 2024 को बैठक के दौरान कुलपति ने अपने कार्यालय में अभद्र हरकतें की. उन्होंने सबके सामने अनुचित टिप्पणियां और इशारे किए. उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत कुलपति कार्यालय से घटना वाले दिन की सीसीटीवी फुटेज मांगे, लेकिन उपलब्ध नहीं कराए गए.” याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता आलोक बागरेचा ने किया.

SC ने मोहन सरकार के उस आदेश को “अवमाननापूर्ण” करार देते हुए रद्द कर दिया, जाने क्या है मामला

भोपाल नौकरशाहों के बीच कामकाज के मूल्यांकन के विवाद का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पटाक्षेप कर दिया। चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया। इसमें भारतीय वन सेवा (IFS) अफसरों की वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट (ACR) भरने का अधिकार आइएएस अफसरों को देने का 2024 में जारी किया था। कोर्ट ने कहा एपीसीसीएफ के पद तक एसीआर उसके वरिष्ठ को भरनी चाहिए।  केवल पीसीसीएफ के संबंध में रिपोर्टिंग प्राधिकरण वह व्यक्ति होगा, जिसे वह रिपोर्ट करता है या उससे सीनियर है। आवश्यक हो तो जिला प्रशासन द्वारा वित्तपोषित कार्यों के कार्यान्वयन के संबंध में उनके प्रदर्शन की एक अलग शीट पर अपनी टिप्पणियां दर्ज कर सकते हैं। इस पर भी विचार वरिष्ठ आइएफएस के सीनियर अधिकारी ही करेंगे। पत्रिका ने प्रमुखता से उठाया था मुद्दा श्रेष्ठता को लेकर छिड़े विवाद को पत्रिका ने प्रमुखता से उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले की सुनवाई में मौखिक टिप्पणी की थी कि आइएएस अधिकारी आइपीएस और आइएफएस अधिकारियों पर श्रेष्ठता दिखाना चाहते हैं। राज्य के आदेश को आइएफएस एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। एमपी सरकार ने किया आदेश का उल्लंघन बेंच ने दोहराया कि उसके आदेश को केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने सही तरीके से समझा था, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार ने कोर्ट के पूर्व आदेशों का उल्लंघन करते हुए आदेश जारी किया। हालांकि अवमानना की कार्यवाही को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस फैसले तक पहुंचने के लिए एमिकस क्यूरी एडवोकेट के परमेश्वर व सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के प्रयासों की सराहना की।

न्यायालयों में तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को एक की जगह अब दो सप्ताह का अवकाश

जबलपुर मध्य प्रदेश में कार्यरत न्यायालयीन कर्मचारियों के अच्छी खबर है, जबलपुर उच्च न्यायालय ने सभी न्यायालयों में पदस्थ तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के ग्रीष्मकालीन अवकाश में वृद्धि की है, उच्च न्यायालय ने इसके लिए अलग अलग आदेश जारी किये हैं मध्य प्रदेश के न्यायालयों में काम करने वाले कर्मचारियों  के लिए अभी तक एक सप्ताह के ग्रीष्मकालीन अवकाश की सुविधा प्रदान की गई थी यानि न्यायालयों में ग्रीष्मकालीन अवकाश की अवधि में कर्मचारी एक सप्ताह का अवकाश ले सकता था लेकिन अब इसमें बदलाव करते हुए वृद्धि की गई है। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को एक की जगह अब दो सप्ताह का अवकाश   हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि  05 जुलाई 2018 की कंडिका-4 में दिए आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए, जिला स्थापना एवं कुटुम्ब न्यायालय की स्थापना पर कार्यरत ऐसे कर्मचारी जिनका वेतनमान छठवे वेतन आयोग के अनुसार ग्रेड-पे रुपये 3600/- एवं उससे अधिक है, ऐसे कर्मचारियों को एक सप्ताह के स्थान पर अब दो सप्ताह का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता हैं एवं रुपये 3600/- ग्रेड पे से कम वेतनमान प्राप्त करने वाले समस्त कर्मचारियों को (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को छोड़कर) एक सप्ताह के स्थान पर 10 दिवस का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अवकाश में भी वृद्धि इसी तरह उच्च न्यायालय ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अवकाश में भी वृद्धि की है, कोर्ट ने अपने आदेश में बताया कि समस्त नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारीगण, उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश जबलपुर द्वारा 17 मई 2025 को दिए गए आवेदन को स्वीकार करते हुए मुख्यपीठ जबलपुर ने 09 मई 2025 को दिए आदेश मेंआंशिक संशोधन करते हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को स्वीकृत 1 सप्ताह के ग्रीष्मकालीन अवकाश को बढ़ाकर 10 दिवस का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता है।

बच्चा होने के 7 महीने बाद विधवा महिला ने लिखाई दुष्कर्म की रिपोर्ट, हाईकोर्ट ने किया खारिज

जबलपुर  बच्चा पैदा होने के सात महीने बाद विधवा महिला द्वारा युवक पर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया. इस मामले को हाईकोर्ट जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने खारिज कर दिया. मामले में जो तथ्य सामने आए उन्हें ध्यान में रखते हुए एफआईआर को निरस्त करने के आदेश दिए गए. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि भौतिक परिस्थितियों पर विचार करते हुए ऐसा नहीं माना जा सकता है कि दोनों के बीच विवाह के झूठे वादे के आधार पर संबंध बने थे. दोनों पति-पत्नी की रहते थे और एक बच्चे को जन्म दिया है. भरण-पोषण व अन्य राहत का दावा करने के लिए महिला उचित कार्यवाही कर सकती है. पति की मौत के बाद बने संबंध दरअसल, जबलपुर निवासी आवेदक की ओर से याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि महिला की शिकायत पर अधारताल थाने में उसके खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया है. एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता महिला की आयु 32 साल है और उसके पति की मृत्यु साल 2021 में हो गई थी. पति का दोस्त होने के कारण आवेदक का महिला के घर में आना जाना था और मोबाइल पर बातचीत होने लगी. पति की मृत्यु के लगभग तीन महीने बाद मई 2021 में दोनों ने शादी करने का फैसला किया और इस तरह दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए और दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे. शिकायतकर्ता महिला ने बताया कि इस संबंध से वह गर्भवती हो गई और उसने बच्चे को जन्म दिया, लेकिन आवेदक ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया. शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि शादी का झूठा आश्वासन देकर आवेदक पिछले तीन वर्षों से उसका शारीरिक शोषण कर रहा है. लंबे समय तक सहमति से बने संबंध, ये दुष्कर्म नहीं महिला की शिकायत पर आवेदक युवक की ओर से तर्क दिया गया कि उसने कभी शादी का कोई झूठा वादा नहीं किया. उसने बताया कि दोनों के बीच आपसी सहमति से वर्षों तक संबंध स्थापित रहे. कोर्ट में तर्क दिया गया कि परिस्थितियों को देखकर स्पष्ट है कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक या दो बार शारीरिक संबंध विकसित हुए हों. दोनों के बीच संबंध कई वर्षों तक जारी रहे. इतने लंबे समय के बाद अगर ऐसी शिकायत दर्ज की जाती है, तो वह दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता है. हाईकोर्ट के आदेश में सुप्रीमकोर्ट का हवाला एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि मौजूदा तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर संबंध को विवाह के झूठे वादे पर विकसित होना नहीं माना जा सकता है. ऐसे आरोपों को कार्रवाई शुरू करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. ऐसे आरोप पक्षों के बीच संबंधों में कड़वाहट के कारण हो सकते हैं. इस तरह बिना किसी ठोस सबूत के आपराधिक अभियोजन शुरू नहीं किया जा सकता है. एकलपीठ ने एफआईआर को निरस्त करते हुए महिला को आगे स्वतंत्रता प्रदान की है, कि वह जीवन यापन भत्ते आदि के लिए अपना पक्ष रख सकती है. क्या है मामला जबलपुर निवासी वीरेंद्र वर्मा ने उसके ऊपर दर्ज हुए केस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। उसने बताया कि अधारताल थाने में उसके खिलाफ बलात्कार की एफआईआर दर्ज की गई है। याचिका में कहा गया था कि एफआईआर के अनुसार शिकायत करने वाली महिला की आयु 32 साल है। उसके पति की साल 2021 में मृत्यु हो गयी थी। पति का दोस्त होने के कारण आवेदन का महिला के घर आना जाना था और मोबाइल पर बातचीत प्रारंभ हो गयी। सहमति से साथ रहने का लिया फैसला पति की मृत्यु के लगभग तीन महीने बाद आवेदन के उसके समक्ष शादी का प्रस्ताव भी रखा। दोनों ने सहमति से मई 2021 में शादी करने का निर्णय लिया था। इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए। दोनों पति-पत्नी की तरह लंबे समय तक साथ रहे और इस दौरान एक बच्चे का जन्म हुआ, जो लगभग सात माह का है। लेकिन आवेदक ने शादी करने से इनकार कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि शादी का झूठा आश्वासन देकर कई सालों से उसका शारीरिक शोषण करता रहा। महिला ने दर्ज कराई एफआईआर शिकायतकर्ता महिला ने शारीरिक शोषण करने का आरोप लगाते हुए उसके खिलाफ जनवरी 2025 में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। आवेदक की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने शादी का कोई झूठा वादा नहीं किया। उसने बताया कि दोनों के बीच आपसी सहमति से वर्षों तक संबंध स्थापित रहे। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों को देखकर स्पष्ट है कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक या दो बार शारीरिक संबंध विकसित हुए हों। दोनों के बीच संबंध कई वर्षों तक जारी रहे। इतने लंबे समय के बाद अगर ऐसी शिकायत दर्ज की जाती है, तो वह दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने इस तर्क से खारिज की याचिका एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर संबंध को विवाह के झूठे वादे पर विकसित होना नहीं माना जा सकता है। ऐसे आरोपों को कार्रवाई शुरू करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। पक्षों के बीच संबंधों में कड़वाहट के कारण ऐसा हो सकते हैं। इस तरह बिना किसी ठोस सबूत के आपराधिक अभियोजन शुरू नहीं किया जा सकता है। एकलपीठ ने एफआईआर को निरस्त करते हुए महिला को उक्त स्वतंत्रता प्रदान की है।

विवादित टिप्पणी करने वाले मंत्री विजय शाह के खिलाफ आज SC में सुनवाई, कोर्ट के रुख पर BJP की निगाहें

भोपाल  मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री विजय शाह (Vijay Shah Controversial Remark) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कर्नल सोफिया पर विवादित बयान देने के बाद से वो कानूनी चंगुल में फंस गए हैं। आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनावई होनी है। विजय शाह ने कर्नल सोफिया (Colonel Sophia Qureshi) पर विवादित टिप्पणी की तो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विजय शाह के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया। विजय शाह ने जब इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसपर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फटकार बीते दिन सीजेआई बीआर गवई ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। साथ ही उन्होंने मंत्री कुवंर विजय सिंह को भी जमकर फटकार लगाई। मंत्री विजय शाह ने सुप्रीम कोर्ट से अर्जेंट हियरिंग की मांग की थी, जिसे ठुकराते हुए आज (16 मई) की तारीख दे दी गई थी। विजय शाह को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-     राज्य के कैबिनेट मंत्री जैसे संवैधानिक पद पक बैठे व्यक्ति को बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। आपसे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती है। आप मंत्री होकर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या यह आपको शोभा देता है? जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई FIR बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद एमपी सरकार में मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफिया को ‘आतंकवादियों की बहन’ कहा था। उनके इस बयान पर सख्त रुख अपनाते हुए एमपी हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 152, 196 (1)(b) और 197(1)(c) के तहत केस दर्ज करने का आदेश दिया था। विजय शाह ने मांगी माफी मामला गंभीराने के बाद मंत्री विजय शाह ने अपने बयान पर माफी भी मांगी थी। उनका कहना था कि मैं सपने में भी कर्नल सोफिया के बारे में गलत नहीं सोच सकता। सोफिया ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर देश की सेवा की है। मैं उन्हें सलाम करता हूं। अगर जोश में मेरे मुंह से कुछ गलत निकल गया हो तो उसके लिए मैं माफी चाहता हूं। इस्तीफे का बन रहा है दबाव विजय शाह का यह बयान सियासी गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है। एमपी सरकार पर विजय शाह को मंत्री पद से हटाने का दबाव बन रहा है। खबरों की मानें तो मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने विजय शाह से मुलाकात की थी। मगर, उन्होंने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया है। अब सबकी नजर आ सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज का ऑडिट करने की बात कही

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि कुछ जज जरूरत से ज्यादा ब्रेक लेते हैं। कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज का ऑडिट करने की बात कही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ कई शिकायतें मिल रही हैं। अब यह देखने का समय है कि उन पर कितना खर्च हो रहा है और वे कितना काम कर रहे हैं। ‘हाई कोर्ट के जज ले रहे बहुत ब्रेक’ सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज पर टिप्पणी की। जस्टिस कांत ने कहा कि यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘कुछ जज बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ जज बेवजह कॉफी ब्रेक लेते हैं, कभी यह ब्रेक तो कभी वह ब्रेक। हम हाई कोर्ट के जजों के बारे में बहुत सारी शिकायतें सुन रहे हैं। यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। हाई कोर्ट के जजों का प्रदर्शन कैसा है? हम कितना खर्च कर रहे हैं और आउटपुट क्या है? यह उच्च समय है कि हम एक प्रदर्शन ऑडिट करें।’ झारखंड हाई कोर्ट से जुड़ा है मामला यह टिप्पणी चार लोगों की याचिका पर आई। इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि झारखंड हाई कोर्ट ने 2022 में एक आपराधिक अपील पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह अपील सजा और आजीवन कारावास के खिलाफ थी, लेकिन फैसला नहीं सुनाया गया। उनके वकील फौजिया शकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद हाई कोर्ट ने 5 और 6 मई को फैसला सुनाया। फैसले में चार में से तीन लोगों को बरी कर दिया गया। आखिरी मामले में अलग-अलग फैसला आया और इसे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेज दिया गया। याचिकाकर्ता को जमानत मिल गई। शकील ने कहा कि फैसले के बाद भी बरी किए गए लोगों को जेल से रिहा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने फैसले में यह नहीं बताया कि आदेश कब सुरक्षित रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई और झारखंड सरकार के वकील को दोपहर के भोजन के ब्रेक से पहले उन्हें तुरंत रिहा करने के लिए कहा। कोर्ट ने मामले को दोपहर 2 बजे के बाद पोस्ट कर दिया। वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दोषियों को रिहा कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट से रिहाई के आदेश नहीं मिलने के कारण देरी हुई। ‘फैसले सुनाने की समयसीमा का पालन करना होगा’ बेंच ने कहा कि इस अदालत द्वारा पहले निर्धारित फैसले सुनाने की समयसीमा का पालन करना होगा। इसके साथ ही, इस अदालत द्वारा प्रस्तावित तंत्र का भी पालन करना होगा। बेंच ने रजिस्ट्री को हाई कोर्ट से डेटा एकत्र करने और मामले को जुलाई में पोस्ट करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि पहले जो समय तय किया गया था, फैसले सुनाने के लिए, उसका पालन करना होगा। कोर्ट एक तरीका भी बताएगा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके। कोर्ट ने रजिस्ट्री को कहा कि वह सभी हाई कोर्ट से जानकारी जुटाए और मामले को जुलाई में फिर से सुनेगा।  

प्रदेश के लाखों पेंशनर्स को 1 मई 2023 से 7% ब्याज के साथ एक वेतनवृद्धि सहित सभी अनुषांगिक लाभों का भुगतान 6 सप्ताह में जाए

इंदौर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पक्ष में राहतकारी आदेश दिए हैं। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत व जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने कहा है कि पेंशनर्स को 1 मई 2023 से 7% ब्याज के साथ एक वेतनवृद्धि सहित सभी अनुषांगिक लाभों का भुगतान 6 सप्ताह में जाए। 2024 में पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर दायर की गई थी याचिका पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन, भोपाल के अध्यक्ष आमोद सक्सेना और नर्मदापुरम के दिनेश कुमार चतुर्वेदी ने 2024 में याचिका दायर की। कोर्ट को बताया कि सेवानिवृत्ति की आयु पूरी करने से पहले वे सभी एक वार्षिक वेतन वृद्धि पाने के हकदार हैं। हाई कोर्ट से पेंशनर्स को मिली बड़ी राहत हाई कोर्ट ने इस मामले में पेंशनर्स (MP Pensioners) को राहत देते हुए अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया कि वित्तीय लाभ केवल 1 मई 23 से 7% ब्याज के साथ दिया जाएगा। वहीं ये लाभ पेंशनर्स को तय की गई समय सीमा के अंदर ही दिया जाना चाहिए। बता दें कि कोर्ट के इस फैसले से एमपी के लाखों पेंशनर्स को राहत मिल गई है।

MP हाइकोर्ट ने INC और एमपी नर्सिंग काउंसिल के अफसरों को किया तलब

 जबलपुर नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता में हुए फर्जीवाड़े मामले में लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन की जनहित याचिका के साथ सभी अन्य नर्सिंग मामलों की सुनवाई हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच में  जस्टिस संजय द्विवेदी और जस्टिस अचल कुमार पालीवाल के समक्ष हुई, जिसमें इंडियन नर्सिंग काउंसिल की सचिव और एमपी नर्सिंग काउंसिल के रजिस्ट्रार व चेयरमैन को हाई कोर्ट में हाजिर होने के आदेश दिए है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आवेदन पेश कर कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के तीन बार आदेश देने के बावजूद इण्डियन नर्सिंग काउंसिल और एमपी नर्सिंग काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारी मान्यता से जुड़े पूरे रिकॉर्ड पेश नहीं कर रहे हैं, आरोप लगाया गया कि वे दोषियों को बचाने के उद्देश्य से हाई कोर्ट के आदेश की लगातार अवहेलना कर रहे हैं जिस कारण से उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाये। काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारियों को अगली सुनवाई में हाजिर होने के निर्देश हाई कोर्ट ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करना और रिकॉर्ड पेश नहीं कर दोषियों को बचाने का एक प्रयास करना, न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने के समान है इसलिए काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारियों को अगली सुनवाई में हाई कोर्ट के समक्ष पेश होकर इस मामले में स्पष्टीकरण देना होगा कि आख़िर हाई कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया? HC के निर्देश पर गठित कमेटी की भूमिका पर सवाल   याचिकाकर्ता ने एक अन्य आवेदन पेश कर हाई कोर्ट को बताया कि नर्सिंग मामलों हेतु हाई कोर्ट द्वारा गठित उच्च स्तरीय कमेटी के द्वारा 30 अपात्र कॉलेजों के छात्रों को दूसरे कॉलेजों में ट्रांसफ़र कर दिया गया है और इसके लिए कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है और ना ही छात्रों को मनपसंद कॉलेजों को चुनने का विकल्प दिया गया । 31 मई तक अंतिम कार्यवाही का प्रतिवेदन हाई कोर्ट में सौंपने के आदेश इस मामले में हाई कोर्ट ने नर्सिंग काउंसिल को आदेश दिया है कि सभी अनसुटेबल कॉलेजों के छात्रों को पारदर्शीपूर्ण तरीक़े से छात्रों को विकल्प चुनने का अवसर देते हुए सुटेबल कॉलेजों में ट्रांसफ़र किया जाए साथ ही इस पूरी प्रक्रिया से नोडल अधिकारी को दूर रखा जाये। हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिए हैं कि चूँकि कमेटी को हाई कोर्ट के द्वारा सौंपे गये कार्य संपन्न हो चुके हैं इसलिए अब कमेटी को 31 मई तक अंतिम कार्यवाही का प्रतिवेदन हाई कोर्ट में सौंपना होगा।

HC ने टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर संचालित आरा मशीनों को हटाने के निर्देश किए जारी

जबलपुर मध्यप्रदेश के विश्वप्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर जबलपुर उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर संचालित सभी आरा मशीनों और अन्य काष्ठ आधारित उद्योगों को हटाने के निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश उमरिया निवासी सीमांत रैकवार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया गया है। याचिका में कहा गया था कि उमरिया शहर के विनायक टाउन क्षेत्र में संतोष गुप्ता नामक व्यापारी द्वारा संचालित आरा मशीन से न केवल ध्वनि और वायु प्रदूषण फैल रहा है, बल्कि यह वन क्षेत्र के समीप नियमों का उल्लंघन कर संचालित हो रही है। सीमांत रैकवार ने इसकी शिकायत वन विभाग और जिला प्रशासन से की थी, लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई न होने के कारण उन्होंने उच्च न्यायालय की शरण ली। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि न केवल संबंधित आरा मशीन नियमों का उल्लंघन कर रही है, बल्कि इस प्रकार के अन्य काष्ठ उद्योग भी बफर जोन के भीतर चल रहे हैं, जो पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देशित किया कि टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर स्थापित सभी आरा मशीनों और काष्ठ उद्योगों की जांच कर 90 दिनों के भीतर उन्हें बंद किया जाए। इसके साथ ही वन विभाग, पार्क प्रबंधन और जिला प्रशासन को कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय ने इस मामले में वन विभाग की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप जंगलों को समाप्त करना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे।” यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि वन संरक्षण को लेकर न्यायपालिका कितनी गंभीर है। यह आदेश भारत सरकार द्वारा 16 नवंबर 2016 को जारी नोटिफिकेशन के आधार पर दिया गया है, जिसमें टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध के स्पष्ट निर्देश हैं। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी और उनके सहायक रुद्र प्रताप द्विवेदी ने प्रभावशाली पैरवी की।  

CM ने लॉयर्स चैंबर और मल्टीलेवल पार्किंग का किया भूमिपूजन, 117 करोड़ की लागत से होगा निर्माण

जबलपुर हाईकोर्ट में 117 करोड़ की लागत से लॉयर्स चेम्बर और मल्टी लेवल पार्किंग बनेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को उच्च न्यायालय परिसर में प्रोजेक्ट का भूमिपूजन किया। मुख्यमंत्री(CM Mohan Yadav) ने कहा कि अधिवक्ताओं की वर्षों पुरानी मांग आज पूरी हो रही है। इससे न केवल पार्किंग की दिक्कतें कम होगी बल्कि अधिवक्ताओं को बैठने की समुचित व्यवस्था हो सकेगी। ये रहे मौजूद भूमिपूजन कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी, जस्टिस एससी शर्मा तथा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत, हाईकोर्ट जज संजीव सचदेवा, संजय द्विवेदी, जस्टिस विवेक कुमार जैन, महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन एवं एडवोकेट्स बार एसोसिएशन से भी अन्य न्यायाधीश उपस्थित रहे। चार मंजिला होगी पार्किंग अधिवक्ताओं में इस परियोजना को लेकर खासा उत्साह देखा गया। चार मंजिला बनने वाली मल्टी लेवल पार्किंग के ऊपर के फ्लोर्स पर लायर्स चेम्बर्स की सुविधा होगी। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट में करीब 6 हजार अधिवक्ता कार्यरत हैं। इनको वाहनों की पार्किंग और बैठने को लेकर समस्या से जूझना पड़ता है। लंबे समय से चेम्बर्स और पार्किंग की मांग की जा रही थी। सर्किट हाउस में की मुलाकात मुख्यमंत्री डॉ. यादव सुबह साढ़े दस बजे डुमना एयरपोर्ट पहुंचे। वे सीधे सर्किट हाउस पहुंचे। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों से मझौली और पाटन के दौरे की तैयारियों के संबंध में चर्चा भी की। हाईकोर्ट परिसर में कार्यक्रम में शामिल होने के बाद मुख्यमंत्री रीवा के लिए रवाना हुए।

इरादा एक जैसा तो गैंगरेप में सभी बराबर के दोषी… सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैंगरेप में किसी एक के भी सेक्सुअल एक्ट (penetrative act) पर सभी को दोषी माना जाएगा, अगर उन्होंने एक मंशा से अपराध को अंजाम दिया। कोर्ट ने गैंगरेप के दोषियों की सजा को बरकरार रखा। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी नहीं कि हर आरोपी ने पेनेट्रेटिव एक्ट किया। भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(g) के तहत अगर गैंगरेप का मामला है, तो एक के भी कृत्य पर सभी को दोषी ठहराया जा सकता है, अगर उन्होंने कॉमन इन्टेंशन के तहत काम किया हो। यह साझा मंशा इस धारा में अंतर्निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका इस मामले में अभियोजन पक्ष ने यह आरोप लगाया था कि उन्होंने पीड़िता का अपहरण कर उसे अवैध रूप से बंधक बनाया और उसका रेप किया। याची ने दलील दी कि उन्होंने खुद कोई सेक्सुअल एक्ट नहीं किया, इसलिए उन्हें गैंगरेप का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। इसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की दलील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विश्वनाथन के लिखित फैसले में कहा गया कि घटनाक्रम से स्पष्ट है कि पीड़िता का अपहरण, उसे गलत तरीके से कैद करना और उसका बयान कि उसके साथ यौन हमला किया गया, ये सभी फैक्ट धारा 376(2)(g) के तत्वों को साफ सिद्ध करते हैं। क्या था मामला? घटना जून 2004 की है, जब पीड़िता एक विवाह समारोह से लौट रही थी। तभी उसका अपहरण कर लिया गया और उसे कई स्थानों पर अवैध रूप से रखा गया। पीड़िता ने अपने बयान में बताया कि जलंधर कोल और अपीलकर्ता राजू नाम के दो लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। सरकारी वकील ने 13 गवाह पेश किए, जिनमें पीड़िता, उसके पिता और जांच अधिकारी शामिल थे। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को गैंगरेप, अपहरण और अवैध बंदीकरण के आरोप में दोषी ठहराया। राजू को आजीवन कारावास और जलंधर कोल को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद राजू सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जलंधर कोल ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में केवल जलंधर कोल द्वारा बलात्कार का उल्लेख होने के बावजूद, पीड़िता ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा है कि राजू ने भी बलात्कार किया था। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही यह मान लिया जाए कि राजू ने बलात्कार नहीं किया, तब भी वह सामूहिक बलात्कार के लिए दोषी होगा यदि उसने साझा मंशा के तहत अन्य आरोपी के साथ कार्य किया हो। कोर्ट ने प्रमोद महतो बनाम बिहार राज्य (1989) के मामले का हवाला देते हुए कहा कि “ऐसे मामलों में यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक आरोपी द्वारा बलात्कार के पूर्ण कृत्य का स्पष्ट प्रमाण हो। यदि उन्होंने एकसाथ कार्य किया हो और पीड़िता के साथ दुष्कर्म की मंशा में सहभागी हों, तो सभी दोषी होंगे।” SC/ST एक्ट से राहत, लेकिन IPC धाराएं बरकरार हालांकि, कोर्ट ने राजू पर एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, क्योंकि यह साबित नहीं हो सका कि अपराध पीड़िता की जाति के आधार पर किया गया था। कोर्ट ने पाटन जमाल वली बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले का हवाला देते हुए कहा कि जाति और अपराध के बीच स्पष्ट कारण संबंध होना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता के प्रारंभिक बयान और बाद के बयान में कुछ अंतर होने के बावजूद उसकी समग्र गवाही विश्वसनीय है। पीठ ने कहा, “साक्ष्यों में छोटे-मोटे विरोधाभास उसकी विश्वसनीयता को कम नहीं करते। पीड़िता की गवाही में भरोसा किया जा सकता है, भले ही उसमें कोई प्रत्यक्ष समर्थन न हो।” “टू-फिंगर टेस्ट” को फिर बताया अमानवीय कोर्ट ने इस मामले में “टू-फिंगर टेस्ट” के उपयोग पर भी चिंता जताई और इसे एक बार फिर “अमानवीय और अपमानजनक” करार दिया। कोर्ट ने कहा, “किसी महिला का यौन इतिहास पूर्णतः अप्रासंगिक है… यह पितृसत्तात्मक और लिंगभेदी सोच है कि किसी यौन रूप से सक्रिय महिला की गवाही पर संदेह किया जाए।” हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने IPC की सभी धाराओं में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सह-आरोपी जलंधर कोल को 10 साल की सजा मिलने के मद्देनजर, राजू की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 साल का कठोर कारावास कर दिया। 2004 का है मामला यह मामला मध्यप्रदेश के कटनी का है। एक लड़की 26 अप्रैल 2004 को एक शादी में गई थी, वहीं से उसे अगवा कर लिया गया था। इस मामले में दो को गिरफ्तार किया गया। सेशन कोर्ट ने दोनों के खिलाफ 25 मई 2005 को गैंग रेप और अन्य धाराओं में आरोप तय किए और बाद में दोनों को दोषी करार दिया गया। हाई कोर्ट ने दोनों की सजा कन्फर्म की और फिर मालमा सुप्रीम कोर्ट आया।

हजारों वर्ष पुराने मुड़िया बौद्ध मठ के रास्ते से अतिक्रमण हटाने के HC ने कलेक्टर को दिए निर्देश

जबलपुर जबलपुर के गोपालपुर के पास स्थित मौर्यकालीन प्राचीन बौद्ध मठ के पहुंच मार्ग से अतिक्रमण हटाने के लिए हाईकोर्ट ने जबलपुर कलेक्टर को अंतरिम आदेश जारी किए हैं। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने यह आदेश उस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए, जिसमें मठ से जुड़े रास्ते पर अतिक्रमण कर आवाजाही बंद करने की शिकायत की गई थी। याचिका बौद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया के रीजनल हेड सुखलाल वर्मा और अखिल भारतीय कुशवाहा महासभा के प्रदेश अध्यक्ष दादा बैजनाथ कुशवाहा की ओर से दायर की गई थी। इसमें कहा गया है कि लम्हेटा घाट स्थित मुड़िया बौद्ध मठ हजारों वर्ष पुराना मौर्यकालीन बौद्ध स्थल है। इसके पास की 32 एकड़ शासकीय भूमि पर कथित रूप से भूमाफियाओं ने कब्जा कर लिया है और मठ तक पहुंचने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है। याचिका में उल्लेख किया गया कि 27 जनवरी 2021 को तत्कालीन कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने मप्र टूरिज्म बोर्ड को पत्र भेजकर मठ के विकास के लिए बजट स्वीकृति का अनुरोध किया था। इससे पहले 15 जून 2012 को म.प्र. शासन के पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय विभाग ने इस स्थल को प्राचीन स्मारक घोषित करने की अधिसूचना जारी की थी। 1 अप्रैल 2015 को इस स्थल को अंतिम रूप से संरक्षित स्मारक घोषित करने का अनुरोध भी संस्कृति विभाग को भेजा गया, लेकिन अब तक शासन स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अतिक्रमण के खिलाफ स्थानीय स्तर पर पत्राचार और धरना-प्रदर्शन भी हुए, लेकिन जब कार्रवाई नहीं हुई, तो यह याचिका दाखिल की गई। याचिका में मप्र शासन के प्रमुख सचिव (राजस्व), प्रमुख सचिव (पुरातत्व), प्रमुख सचिव (धार्मिक न्यास), सचिव (पर्यटन एवं संस्कृति विभाग), कलेक्टर जबलपुर, एसडीओ (राजस्व), तहसीलदार, नगर निगम अधिकारी भेड़ाघाट और निजी पक्षों रीता सेंगर, गुंजन नंदा, सोनिया नारंग व आरडीएम केयर इंडिया प्रा. लि. के मैनेजिंग डायरेक्टर अंगददीप सिंह नारंग को अनावेदक बनाया गया है।  

मेडिकल छात्र को एमपी हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली, मूल दस्तावेज अब लौटाएगा कॉलेज

जबलपुर  हॉस्टल में हुई गतिविधियों के कारण डिप्रेशन में आकर मेडिकल छात्र मनोरोगी हो गया है। इसकी वजह से छात्र ने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी है। अब कॉलेज प्रबंधन ओरिजनल दस्तावेज वापस लौटाने के एवज में तीस लाख रुपए की मांग कर रहा है । एमपी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगल पीठ ने याचिका पर सुनवाई की है। साथ ही याचिकाकर्ता छात्र को ओरिजनल दस्तावेज वापस लौटाने के आदेश जारी किए हैं। भोपाल में लिया था एडमिशन दरअसल, अहमदाबाद गुजरात निवासी डॉ मीत यादव की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि उसने साल 2023 में पीपुल्स डेंटल अकादमी भोपाल में बीडीएस सीट में दाखिला लिया था। हॉस्टल में हुई गतिविधियों के कारण वह डिप्रेशन में चला गया था। डिप्रेशन बढ़ने के कारण वह मनोरोगी हो गया है। याचिका के याचिकाकर्ता के मेडिकल दस्तावेज भी पेश किए। माता-पिता का साथ रहना जरूरी याचिकाकर्ता की स्थिति ऐसी है कि माता-पिता का उसके साथ रहना आवश्यक है। माता-पिता के साथ नहीं रहने पर वह आत्मघाती कदम उठा सकता है। वहीं, याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संधी ने युगलपीठ को बताया कि हॉस्टल में हुए अनैतिक गतिविधियों के कारण याचिकाकर्ता की ऐसी स्थिति हुई है। मजबूरन छोड़नी पड़ी सीट दरअसल, वकील ने कहा है कि उसे मजबूरन मेडिकल सीट छोड़नी पड़ी थी। बीडीएस की सीट छोडने पर कॉलेज प्रबंधन द्वारा शिक्षा संबंधित ओरिजनल दस्तावेज वापस लौटाने के एवज में तीस लाख रुपए की मांग कर रहा है। कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि दाखिले के समय उसने बॉन्ड साइन किया था। जिसकी शर्त के अनुसार मेडिकल सीट बीच में छोड़ने के एवज पर तीस लाख रुपए का भुगतान करना होगा। मेडिकल सीट छोड़ने के एवज में छात्रों से तीस लाख रुपए लेने के मामला लोकसभा में उठाया गया था। नेशनल मेडिकल कमीशन ने इस पॉलिसी पर पुनर्विचार करने के निर्देश मध्य प्रदेश सरकार को दिए थे। मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2025 से उक्त पॉलिसी को समाप्त करने का निर्णय लिया है। सरकार द्वारा गलत पॉलिसी निर्धारित की गयी थी कि पूर्व में दाखिला लेने वाले छात्रों पर उसे कैसे लागू किया जा सकता है। याचिकाकर्ता की स्थिति ऐसी है कि माता-पिता का उसके साथ रहना आवश्यक है। माता-पिता के साथ नहीं रहने पर वह आत्मघाती कदम उठा सकता है। युगल पीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए उक्त निर्देश जारी किए। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अंतिम निर्णय के याचिका के अधीन रहेगा।

‘क्या आप सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना चाहते हैं?’ पहलगाम हमले पर जनहित याचिका पर सुनवाई से SC का इनकार

नई दिल्ली पूरे देश में इस समय पहलगाम आतंकी हमले को लेकर आक्रोश है। इस बीच इस हमले की न्यायिक जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। न्यूज एजेंस पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने वाले को फटकार लगाते हुए कहा कि न्यायाधीश आतंकवाद मामलों की जांच के विशेषज्ञ नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका दायर करने वालों को फटकार लगाते हुए सवाल किया कि क्या वे सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना चाहते हैं? उन्हें ऐसे मुद्दों को न्यायिक क्षेत्र में नहीं लाने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि इस मुश्किल वक्त में देश का प्रत्येक नागरिक आतंकवाद से लड़ने के लिए एकजुट है।  जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पहलगाम आतंकवादी हमले की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर करने वाले वकीलों की कड़ी आलोचना की। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, “जिम्मेदार बनो। देश के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है। क्या यही तरीका है… प्लीज ऐसा मत करो। कब से कोई रिटायर्ड हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज ऐसे मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञ बन गया है? हम कुछ भी नहीं सुन रहे हैं।” जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा, “यह वह महत्वपूर्ण समय है जब देश का हर नागरिक आतंकवाद से लड़ने के लिए हाथ मिला रहा है। ऐसी कोई प्रार्थना न करें जिससे किसी का मनोबल गिरे। मामले की संवेदनशीलता देखिए।” ‘सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना चाहते हैं’ पीठ ने कहा, “इस महत्वपूर्ण समय में देश के हर नागरिक ने आतंकवाद से लड़ने के लिए हाथ मिलाया है. क्या आप इस तरह की जनहित याचिका दायर करके सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना चाहते हैं. इस तरह के मुद्दे को न्यायिक क्षेत्र में न लाएं.” याचिकाकर्ता फतेह कुमार साहू और अन्य को जनहित याचिका वापस लेने के लिए कहा गया. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे इस मुद्दे की संवेदनशीलता को समझें और अदालत में ऐसी कोई अपील न करें, जिससे सुरक्षा बलों का मनोबल गिरे. ‘आदेश पारित करने को न कहें’ पीठ ने याचिकाकर्ताओं में से एक से कहा, “आप रिटायर सुप्रीम कोर्ट के जज से जांच करने के लिए कह रहे हैं. वे जांच के विशेषज्ञ नहीं हैं, बल्कि वे केवल निर्णय दे सकते हैं और किसी मुद्दे पर निर्णय ले सकते हैं. हमें आदेश पारित करने के लिए न कहें. आप जहां जाना चाहते हैं, जाएं. बेहतर होगा कि आप वापस चले जाएं.” जनहित याचिका में केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. पहलगाम हमले में 26 पर्यटकों की मौत बता दें कि 22 अप्रैल को आतंकवादियों ने अनंतनाग जिले के पहलगाम के ऊपरी इलाकों में स्थित एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल बैसरन में गोलीबारी की, जिसमें 26 लोग मारे गए. मरने वालों में अधिकतर दूसरे राज्यों से आए पर्यटक थे – इस घटना ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा दिया है. किसने दायर की थी पिटीशन जनहित याचिका कश्मीर के रहने वाले मोहम्मद जुनैद ने दायर की थी। याचिकाकर्ताओं में फतेश कुमार साहू और विकी कुमार का भी नाम है। याचिका में ये भी कहा गया है कि केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार कश्मीर में पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। पहलगाम में आतंकियों ने धर्म पूछकर गोली मारी थी कश्मीर के पहलगाम स्थित बायसरन घाटी में 22 अप्रैल को आतंकी हमला हुआ था। इसमें 26 पर्यटक मारे गए थे। इसमें एक नेपाल का टूरिस्ट भी शामिल था। आतंकियों ने पर्यटकों का धर्म पूछकर गोली मारी थी। हमले की जिम्मेदारी पहले द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी, हालांकि बाद में इससे मुकर गया था। पहलगाम हमला मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) कर रही है। NIA ने मामले में 27 अप्रैल को जम्मू में केस दर्ज किया था। चश्मदीद ने बताया था, 22 अप्रैल को क्या हुआ था… आतंकी हमले में महाराष्ट्र के संतोष जगदाले भी मारे गए थे। जगदाले अपनी पत्नी और बेटी के साथ पहलगाम घूमने गए थे। साथ में एक महिला रिश्तेदार भी थी। आतंकियों ने तीनों महिलाओं को छोड़ दिया। जगदाले की बेटी असावरी ने न्यूज एजेंसी PTI को बताया था- हम पांच लोगों का ग्रुप था। इसमें मेरे माता-पिता भी शामिल थे। हम पहलगाम के पास बैसरन घाटी में थे, तभी गोलीबारी की आवाज सुनी। देखा कि पुलिस के कपड़े पहने कुछ लोग गोलियां चला रहे हैं। असावरी ने कहा, ‘हम सभी पास के एक टेंट में छिप गए। 6-7 अन्य लोग भी आ गए। हम सभी गोलीबारी से बचने के लिए जमीन पर लेट गए, पहले लगा कि यह आतंकवादियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच कोई मुठभेड़ है। तभी एक आतंकी हमारे टेंट में आ गया। उसने मेरे पिताजी को बाहर आने के लिए कहा। साथ ही पीएम मोदी के लिए कुछ गलत शब्दों का इस्तेमाल किया। फिर उन्होंने मेरे पिता से एक इस्लामी आयत (शायद कलमा) पढ़ने को कहा। जब वे नहीं पढ़ पाए तो उन्हें तीन गोलियां मार दीं, एक सिर पर, एक कान के पीछे और एक पीठ में। मेरे चाचा मेरे बगल में थे। आतंकवादियों ने उन्हें चार से पांच गोलियां मारीं।’

कलेक्टर-एसपी पर सख्त हुआ हाईकोर्ट, शपथ पत्र में मांगा जवाब, ये है मामला…

सिवनी सिवनी जिले के धूमा क्षेत्र में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा काे क्षतिग्रस्त करने के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जिले के कलेक्टर, एसपी और एसएचओ धूमा को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में शपथ पत्र के साथ जवाब मांगा है। यह घटना फरवरी 2025 की है। मामले में स्थानीय व्यक्ति ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। जिसमें उसने कोर्ट को बताया कि प्रतिमा तोड़ने की शिकायत की गई थी, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सिवनी निवासी जितेंद्र अहिरवार की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने कोर्ट में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि धूमा थाना अंतर्गत एक गांव में 10-11 फरवरी की रात कुछ लोगों ने डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा में तोड़फोड़ की, अगले ही दिन धूमा पुलिस थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई गई, लेकिन आज तक आरोपी पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं। पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने की बजाय जर्जर मूर्ति को किसी अज्ञात स्थान में रख दिया और वहां पर नई प्रतिमा लाकर रख दी। अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने कोर्ट को बताया कि- जो नई मूर्ति लगाई गई है वह किसके द्वारा लाई गई, कहां से लाई गई और किस मद से उसमें पैसा खर्च किया है यह जानकारी नहीं दी गई। याचिकाकर्ता ने इस मामले को लेकर लगातार सिवनी कलेक्टर, एसपी सहित अन्य अधिकारियों से जाकर शिकायत की, लेकिन किसी ने भी संतोषजनक जवाब नहीं दिया। हाई कोर्ट को यह भी बताया गया कि सिवनी पुलिस प्रतिमा तोड़ने वालों की ना ही जांच कर रही है और ना ही उनके खिलाफ कार्यवाही। घटना को ढाई महीने से ज्यादा समय हो गया है, लेकिन आज तक पुलिस ने एक भी आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर पाई। हाईकोर्ट को यह भी बताया गया था कि पुलिस उल्टा याचिकाकर्ता को ही परेशान कर रही है कि कार्यवाही को लेकर दबाव न बनाया जाए। जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने सिवनी कलेक्टर, एसपी और एसएचओ धूमा को नोटिस जारी कर 7 दिन में जवाब मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 7 मई को होगी। हाईकोर्ट ने सिवनी एसपी को यह भी निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई में शपथ पत्र प्रस्तुत करते हुए यह बताएं कि इस मामले में अभी तक क्या कार्यवाही की गई है। हाईकोर्ट ने कार्रवाई का पूरा ब्यौरा भी पुलिस से मांगा है।  

हाउसिंग बोर्ड की खुली जमीन पर नगर निगम, लोक स्वास्थ्य विभाग का कार्यालय तथा आंगनवाड़ी केन्द्र स्थापित कर दिया गया, HC ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए

भोपाल मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड ने कॉलोनी बनाते समय सार्वजनिक उपयोग के लिए खुली जमीन छोड़ी थी। खुली जमीन पर सरकारी विभाग ने अतिक्रमण कर अपने कार्यालय खोल लिए हैं। जिसे चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगल पीठ ने याचिका की सुनवाई के बाद यथास्थिति के आदेश जारी करते हुए अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। भोपाल निवासी निसार खान की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के द्वारा ऐशबाग एरिया में कॉलोनी बनाई गई थी। कॉलोनी बनाए जाने के दौरान लोगों के सार्वजनिक उपयोग के लिए खुली जमीन छोड़ी गई थी। कॉलोनी को बाद में नगर निगम को स्थानांतरित कर दिया गया था। याचिका में आरोप लगाते हुए कहा गया था कि हाउसिंग बोर्ड ने एमआईजी श्रेणी के मकान वाले क्षेत्र में लगभग 12 हजार वर्ग फीट जमीन को सार्वजनिक उपयोग हेतु खुला छोड़ा गया था। सार्वजनिक उपयोग के लिए छोडी गई जमीन पर नगर निगम तथा लोक स्वास्थ्य विभाग का कार्यालय तथा आंगनवाड़ी केन्द्र स्थापित कर दिया गया है। इसके अलावा नगर निगम द्वारा वेस्ट डम एरिया बनाने का प्रस्ताव बना रहा है। याचिका में कहा गया था कि नियमानुसार आंगनवाड़ी तथा लोक स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय के लिए सरकार जमीन उपलब्ध करती है। नियमानुसार छोड़ी गई जमीन पर सरकारी विभाग द्वारा अतिक्रमण कर कार्यालय स्थापित किए गए हैं। युगलपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद उक्त आदेश जारी किए। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता केके अग्निहोत्री व अधिवक्ता अनमोल चौकसे ने पैरवी की।

भोपाल में मुस्लिम युवकों ने पहचान छिपा हिंदू लड़कियों से रेप, वकीलों ने आरोपियों को पीटा

भोपाल भोपाल में पहचान छिपाकर समुदाय विशेष के युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों से रेप और ब्लैकमेल की वारदात सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है। इस घटना को लेकर लोगों के आक्रोश का अंदाजा सोमवार को हुई एक घटना से लगाया जा सकता है। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सोमवार को जब पुलिस दो आरोपियों को जीप में बैठाकर जिला न्यायालय परिसर से ले जा रही थी तभी गुस्साए वकीलों की भीड़ ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए उन पर हमला बोलते हुए पीट दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्य बार काउंसिल के सह-अध्यक्ष राजेश व्यास ने बताया कि वकील, खासकर युवा, इस घटना से नाराज हैं। वकील इस घटना को लेकर आक्रोशित हैं। वे अनुशासित तरीके से विरोध कर रहे हैं। यह संघर्ष जारी रहेगा और अगर ऐसी घटनाएं दोबारा हुईं तो आरोपियों पर कार्रवाई की जाएगी। वहीं एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपियों में से एक सैफ अली को बचा लिया गया। सैफ को सुरक्षित ले जाया गया। दूसरे आरोपी को भगवा कपड़े में ले जाए जाने के बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा कि पुलिस ने उसे यह कपड़ा नहीं दिया था। यह भी हो सकता है उसने खुद को ढकने के लिए वाहन में पड़े इस कपड़े को ले लिया हो। पुलिस की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, भोपाल के एक निजी कॉलेज की तीन लड़कियों के साथ आरोपियों पहचान छिपाकर दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया। आरोपियों ने बाद में इन लड़कियों को ब्लैकमेल किया। आरोपियों में से एक फरहान अली उर्फ ​​फराज कॉलेज का पूर्व छात्र है। उसने दो साल पहले अपनी पहचान छिपाकर नाबालिग लड़कियों में से एक से दोस्ती की। उसने कथित तौर पर उसके साथ दुष्कर्म किया। आरोपी ने पीड़िता का वीडियो बनाया और फिर उसे ब्लैकमेल किया। उसके दो दोस्तों ने भी इसी तरह अन्य लड़कियों को फंसाया। यह सनसनीखेज वारददात 18 अप्रैल को तब सामने आई जब पहली पीड़िता ने बाग सेवनिया पुलिस स्टेशन का रुख किया। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे और उसकी सहेलियों को अपने दोस्तों से मिलने के लिए मजबूर किया। आरोपियों ने उसका यौन शोषण किया और उसे ब्लैकमेल किया। आरोपियों ने अन्य लड़कियों के साथ भी दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया और विडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया। पुलिस सूत्रों की मानें तो जांच आगे बढ़ने पर पीड़िताओं और आरोपियों की संख्या बढ़ सकती है। जिला अस्पताल में हिंदू संगठनों का प्रदर्शन इससे पहले, सोमवार को ही आरोपियों को कोर्ट में पेश करने से पहले मेडिकल जांच के लिए जिला अस्पताल लाया गया था. इस दौरान हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने अस्पताल में जमकर हंगामा किया. उन्होंने आरोपियों के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए उन्हें जनता के हवाले करने की मांग की. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त बल तैनात किया और प्रदर्शनकारियों को शांत करने की कोशिश की. क्या है पूरा मामला? यह सनसनीखेज मामला 18 अप्रैल 2025 को तब सामने आया, जब एक पीड़िता ने बागसेवनिया पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई. उसने आरोप लगाया कि फरहान अली उर्फ फराज ने उसे अपने दोस्तों से मिलवाने के लिए मजबूर किया, जिन्होंने उसका यौन शोषण किया और ब्लैकमेल किया. पुलिस के अनुसार, फरहान कॉलेज का पूर्व छात्र है और उसने दो साल पहले अपनी पहचान छिपाकर एक नाबालिग लड़की से दोस्ती की थी. फिर रेप किया. यही नहीं, पीड़िता का वीडियो बनाया और उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. फरहान के दो दोस्तों, साहिल और साद ने भी इसी तरह अन्य लड़कियों को अपने जाल में फंसाया. पुलिस ने बताया कि तीनों आरोपियों के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (BNS), और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है. जांच में फरहान के फोन से कई अश्लील वीडियो बरामद हुए, जिनमें कम से कम 10-15 लड़कियों के वीडियो होने की बात सामने आई है. जांचकर्ताओं का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर पीड़ितों और आरोपियों की संख्या बढ़ सकती है. अजमेर रेप कांड से तुलना यह मामला 1992 के कुख्यात अजमेर रेप कांड की याद दिलाता है, जहां 100 से ज्यादा स्कूली छात्राओं को ब्लैकमेल कर उनका यौन शोषण किया गया था. भोपाल मामले में भी आरोपियों ने वीडियो बनाकर पीड़िताओं को ब्लैकमेल किया और उन्हें अपने दोस्तों से मिलवाने के लिए मजबूर किया. कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें जबरदस्ती नशा कराया गया, मांस खिलाया गया और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया.  सियासी बवाल इस मामले ने भोपाल में सामाजिक तनाव को जन्म दिया है. बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस घटना को ‘द केरल स्टोरी” फिल्म जैसी साजिश करार देते हुए आरोपियों को सार्वजनिक सजा देने की मांग की है. वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि राज्य में ‘जिहाद या लव जिहाद’ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आरोपियों को सख्त सजा दी जाएगी. कांग्रेस ने भी इस मामले की निंदा की है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है.

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि नर्सिंग परीक्षा तिथियों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाए

जबलपुर प्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों में फर्जीवाड़े को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नर्सिंग परीक्षाओं को घोषित समय सारिणी के अनुसार ही आयोजित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी एवं न्यायमूर्ति ए.के. पालीवाल की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि परीक्षा तिथियों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाए। याचिका लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रदेश में कई नर्सिंग कॉलेज नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं। कोर्ट को बताया गया कि कॉलेजों की जांच प्रक्रिया के चलते पिछले कुछ वर्षों में परीक्षाएं लगातार टलती रही हैं और कई बार घोषित तारीखों को रद्द या संशोधित भी किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को भारी असुविधा हुई है। उल्लेखनीय है कि घोषित कार्यक्रम के अनुसार नर्सिंग परीक्षाएं 28 और 29 अप्रैल को आयोजित की जानी हैं। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्र कॉलेजों के छात्रों के लिए विशेष परीक्षा आयोजन के मुद्दे पर न्यायालय आगे सुनवाई करेगा। हाई लेवल कमेटी की भूमिका समाप्त हाईकोर्ट ने पहले सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की थी, जिसका उद्देश्य सीबीआई जांच में दोषी पाए गए कॉलेजों की कमियों की सुनवाई कर उन्हें ‘सूटेबल’ अथवा ‘अनसूटेबल’ की श्रेणी में सूचीबद्ध करना था। अब कोर्ट ने इस कमेटी की भूमिका समाप्त कर दी है। मध्यप्रदेश नर्सिंग काउंसिल ने नए सत्र की मान्यता प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी कॉलेजों को अब विधिवत आवेदन प्रस्तुत कर मान्यता के लिए पुनः प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिस पर आवश्यक जांच के बाद निर्णय लिया जाएगा। याचिका की सुनवाई के दौरान शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक बागरेचा और विशाल बघेल ने पक्ष रखा। अगली सुनवाई 9 मई को निर्धारित की गई है।  

केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन एक्ट पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया, धार्मिक अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं…

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन एक्ट पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में सरकार ने कानून का बचाव करते हुए यानी इसे सही ठहराते हुए कहा है कि पिछले 100 साल से वक्फ बाई यूजर को केवल पंजीकरण के आधार पर मान्यता दी जाती है ना कि मौखिक रूप से. केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि वक्फ मुसलमानों की कोई धार्मिक संस्था नहीं बल्कि वैधानिक निकाय है. वक्फ संशोधन कानून के मुताबिक मुतवल्ली का काम धर्मनिरपेक्ष होता है न कि धार्मिक. ये कानून चुने गए जनप्रतिनिधियों की भावनाओं को दर्शाता है. उन्होंने ही बहुमत से इसे पारित किया है. केंद्र सरकार ने कोर्ट में वक्फ को लेकर जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें कहा गया है कि संसद द्वारा पारित कानून को संवैधानिक रूप से वैध माना जाता है, विशेष रूप से संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों और संसद में व्यापक बहस के बाद बना हुए कानून को. केंद्र ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह अभी किसी भी प्रावधान पर अंतरिम रोक नहीं लगाए. इस संशोधन कानून से किसी भी व्यक्ति के वक्फ बनाने के धार्मिक अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं होता. केवल प्रबंधन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इस कानून में बदलाव किया गया है. बता दें कि इस बिल को पारित करने से पहले संयुक्त संसदीय समिति की 36 बैठकें हुई थीं और 97 लाख से ज्यादा हितधारकों ने सुझाव और ज्ञापन दिए थे. समिति ने देश के दस बड़े शहरों का दौरा कर जनता के बीच जाकर उनसे उनके विचार जाने थे.  

निशिकांत दुबे के बयान पर बढा विवाद, SC बोला आपको हमारी अनुमति की नहीं, आपको अटॉर्नी जनरल से मंजूरी लेनी होगी

नई दिल्ली बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के सुप्रीम कोर्ट पर दिए बयान से बवाल मचा है. सोमवार को दुबे के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान वकील ने कहा, इस कोर्ट के बारे में और CJI के खिलाफ बयान दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निशिकांत दुबे के बयानों का भी उल्लेख किया गया. इस पर जस्टिस बीआर गवई ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं? इस पर वकील ने कहा, मैं अवमानना ​​का केस दर्ज करवाना चाहता हूं. जस्टिस गवई ने दोटूक जवाब दिया और कहा, तो आप इसे दाखिल कीजिए. आपको हमारी अनुमति की जरूरत नहीं है. आपको अटॉर्नी जनरल से मंजूरी लेनी होगी. इससे पहले अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा की तरफ से CJI और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पत्र लिखा गया था. इस याचिका में निशिकांत के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की गई थी. पत्र में कहा गया था कि दुबे द्वारा देश के सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ दिए गए सार्वजनिक बयान अपमानजनक और भड़काऊ हैं. ये बयान झूठे, लापरवाह और दुर्भावनापूर्ण हैं, और ये आपराधिक अवमानना ​​के बराबर हैं. ये बयान न्यायपालिका को डराने, सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने और संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को बदनाम करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है. दुबे ने शीर्ष अदालत को निशाना बनाते हुए कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट को ही कानून बनाना है तो संसद एवं विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना पर निशाना साधते हुए उन्हें देश में ‘सिविल वॉर’ के लिए जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि बीजेपी ने दुबे के बयान से खुद को अलग कर लिया। लेकिन कानून के जानकार इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के तौर देख रहे हैं। बहरहाल, इस मामले में सुप्रीम का रुख चाहे जो भी हो, लेकिन शीर्ष कोर्ट के अवमानना के मामले पहले भी सामने आए हैं जिसमें कोर्ट ने एक्शन लिया। आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के पांच हाई प्रोफाइल मामले कौन से हैं? 1. बाबा रामदेव मामला (2024) बाबा रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद ने एलोपैथी और आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ कई विवादित विज्ञापन दिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें विज्ञापन और बयान रोकने का आदेश दिया। रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया और निगेटिव विज्ञापन देना जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अवमानना का नोटिस जारी किया। रामदेव और बालकृष्ण ने अदालत में बिना शर्त माफी मांगने का हलफनामा दाखिल किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। 2. प्रशांत भूषण मामला (2020) सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और सोशल एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने जुलाई 2020 में ट्विटर पर दो ट्वीट किए। एक में उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बिना हेलमेट और मास्क के हार्ले डेविडसन बाइक पर बैठे हुए दिखाया और लिखा कि जब देश में लॉकडाउन था, तब CJI छुट्टी पर हैं। दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा कि पिछले 6 वर्षों में भारत की शीर्ष कोर्ट ने लोकतंत्र को कमजोर करने में भूमिका निभाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और प्रशांत भूषण के खिलाफ क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्यवाही शुरू की। प्रशांत भूषण ने माफी मांगने से इनकार कर दिया और कहा कि यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वास बनाए रखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को दोषी पाया और ₹1 जुर्माना लगाया। प्रशांत भूषण ने बाद में जुर्माना भर दिया। 3. विजय माल्या मामला (2017) विजय माल्या किंगफिशर एयरलाइंस और कई बैंकों से लिए गए हजारों करोड़ रुपये के कर्ज़ विवाद के बाद भारत से भाग गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि माल्या किसी भी तरह की संपत्ति का हस्तांतरण नहीं करेंगे। इसके बावजूद, माल्या ने अपने बच्चों के बैंक अकाउंट में 40 मिलियन डॉलर ट्रांसफर कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने विजय माल्या को जानबूझकर आदेश की अवहेलना करने का दोषी माना। कोर्ट ने माल्या को अवमानना का अपराधी करार दिया था। 4. जस्टिस सी. एस. कर्णन मामला (2017) कलकत्ता हाई कोर्ट के तत्कालीन जज सी.एस. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाए और अदालत के समन को नज़रअंदाज़ किया। सुप्रीम कोर्ट ने सात सीनियर जजों की बेंच गठित कर कर्णन के खिलाफ अवमानना की सुनवाई की। कर्णन लगातार कोर्ट में पेश नहीं हुए और सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बयान देते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 6 महीने जेल की सजासुनाई। 5. अरुंधति रॉय मामला (2002) प्रसिद्ध लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में बयान देते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की, जिसमें नर्मदा डैम परियोजना को हरी झंडी दी गई थी। उन्होंने एक लेख और प्रेस वक्तव्य में कहा कि कोर्ट ने गरीबों के अधिकारों की अनदेखी की है। सुप्रीम कोर्ट ने अरुंधति रॉय के बयान को ‘न्यायपालिका की अवमानना’ माना और उन्हें तलब किया। रॉय ने अपने बयान पर खेद नहीं जताया और अपने विचारों को सही बताया। कोर्ट ने अरुंधति रॉय को एक दिन जेल और ₹2000 जुर्माना की सजा दी। पत्र में CJI से बयानों का स्वतः संज्ञान लेने और आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया गया था.

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आपसी रजामंदी से तलाक के बाद भी पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण

बिलासपुर  पति पत्नी आपसी सहमति से तलाक ले रहे है तो भी पति को पत्नी का भरण पोषण देना होगा। ये फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने तलाक और भरण पोषण के मामले में सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब तक तलाकशुदा पत्नी की दूसरी शादी नहीं हो जाती, वह भरण-पोषण की हकदार होती है। यह पति की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी पूर्व पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे। इस आदेश के साथ ही कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति के बाद भी पति को भरण-पोषण के लिए भत्ता देना होगा। हाईकोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पति की याचिका को खारिज कर दी है। पीड़िता ने लगाई थी याचिका दरअसल, मुंगेली जिले के एक युवक और युवती की शादी 12 जून 2020 को हुई थी। कुछ ही समय बाद उनके बीच विवाद शुरू हो गया। जिसके बाद महिला ने आरोप लगाया कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है और घर से निकाल दिया गया है। 27 जून 2023 को महिला ने मुंगेली के फैमिली कोर्ट में 15,000 प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग करते हुए परिवाद दायर की। उसने बताया कि उसका पति ट्रक ड्राइवर है और खेती से भी सालाना दो लाख रुपए की कमाई होती है। प्रतिमाह 3000 गुजारा भत्ता देने फैमिली कोर्ट का आदेश युवक ने कोर्ट में दावा किया कि पत्नी बिना कारण ससुराल छोड़ चुकी है। जिसके बाद दोनों का आपसी सहमति से तलाक 20 फरवरी 2023 को हो चुका है। इसलिए वह किसी भी तरह से भत्ता देने का हकदार नहीं है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैमिली कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में महिला को प्रतिमाह 3,000 रुपए भरण-पोषण देने का आदेश दिया। फैमिली कोर्ट के आदेश को दी चुनौती, याचिका खारिज युवक ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि महिला ने दूसरी शादी कर ली है और अब भत्ते की हकदार नहीं है। इसके समर्थन में प्रकाश ने एक कथित पंचनामा और कवरिंग लेटर दाखिल किया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे कानूनी रूप से अप्रासंगिक बताया, क्योंकि वह अभिप्रमाणित नहीं है। जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि, तलाकशुदा पत्नी, जब तक वह पुनर्विवाहित नहीं हो जाती, वह भरण-पोषण की हकदार होती है।

मध्य प्रदेश में अब जमानत मिलने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई, अब अपराधियों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी

इंदौर  मध्य प्रदेश में अब जमानत मिलने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है. अब अपराधियों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट समेत सभी खंडपीठ के लिए फार्मेट जारी किया है. हाईकोर्ट में अब जमानत याचिका लगाने वाले संबंधित व्यक्ति को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी भी कोर्ट के सामने रखनी पड़ेगी. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश से जुड़े जमानत के मामलों में यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है. 1 मई से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी. जमानत देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर समेत इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ को जमानत याचिका या अलग-अलग तरह के मामलों की सुनवाई करने को लेकर एक फॉर्मेट जारी किया है. इसके चलते जिस भी व्यक्ति को किसी मामले में सजा हो गई है या फिर वह जमानत या अग्रिम जमानत को लेकर कोर्ट के समक्ष याचिका लगता है, तो उसे अपने पिछले आपराधिक रिकॉर्ड की पूरी जानकारी जमानत याचिका के साथ कोर्ट के सामने प्रस्तुत करनी होगी. इसके बाद कोर्ट उस पूरे मामले में सुनवाई कर तय करेगा कि जमानत दी जाए या नहीं. अपराधियों को ऐसे मिल जाता था फायदा अभी तक जो भी व्यक्ति अग्रिम जमानत, जमानत या सजा पर रोक के लिए याचिका कोर्ट के सामने प्रस्तुत करता है तो कोर्ट संबंधित थाना पुलिस को निर्देश जारी कर उनसे संबंधित जानकारी मांगती है. जिसके चलते पुलिस कई बार इस तरह की जानकारी कोर्ट के समक्ष तय समय में उपलब्ध नहीं करवा पाती है. जिसका फायदा संबंधित आरोपी को हो जाता है और उसे कई बार आसानी से जमानत मिल जाती है. ऐसे में कई अपराधी ऐसे भी होते हैं जिनके पिछले आपराधिक रिकॉर्ड में गंभीर मामले दर्ज होते हैं. इंदौर के कुख्यात गुंडे को मिल गई थी जमानत बता दें कि पिछले दिनों इंदौर के एक कुख्यात गुंडे हेमंत यादव पर तकरीबन एक दर्जन से अधिक प्रकरण दर्ज थे लेकिन पुलिस ने हेमंत यादव से संबंधित जानकारियां कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं की. जिसके चलते उसे आसानी से सजा के एक मामले में जमानत मिल गई. इस तरह की घटनाओं को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर समेत इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ को नए फॉर्मेट पर सुनवाई करने के आदेश दिए हैं. 1 मई से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी. यह व्यवस्था लागू होने के बाद कुख्यात आरोपियों को हाईकोर्ट से आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी.

मध्यप्रदेश में 9 साल बाद भी स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी नहीं होने पर हाईकोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया

 जबलपुर मध्यप्रदेश में 9 साल बाद भी स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी नहीं होने पर हाईकोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है। हाईकोर्ट ने तुरंत टेंडर जारी कर कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी के निर्देश दिए हैं। शासन की ओर से 6 मई को टेंडर खोलने की अंडरटेकिंग दी गई है। मेडिकल एजुकेशन विभाग के प्रमुख सचिव और मध्य प्रदेश लोक स्वास्थ्य सेवा निगम के एमडी कोर्ट में हाजिर हुए। पिछली सुनवाई में हाइकोर्ट ने स्वास्थ्य सेवा निगम के एमडी और चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव को तलब किया था। बता दें कि 84 करोड रुपए मिलने के बाद भी 9 साल में जबलपुर स्थित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में उपकरण नहीं आ पाए है। तीन बार टेंडर बुलाकर निरस्त कर दिया गया था। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की बैंच में सुनवाई हुई हैं। अब 13 मई को मामले की अगली सुनवाई होगी। जबलपुर निवासी एडवोकेट विकास महावर ने मामले में याचिका लगाई है। याचिका में जबलपुर स्थित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में पर्याप्त साधन नहीं होने की बात कही है। याचिका में कहा गया उपकरण के अभाव में पीड़ितों को पर्याप्त इलाज नहीं मिल पा रहा है। खरीदी के लिए 84 करोड़ रुपए मिलने के बाद खरीदी नहीं की गई। उपकरण खरीदी के लिए साल 2016 में 84 करोड़ रुपए मिले थे। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से बताया गया था कि तकनीकि कारण से दो-तीन बार टेंडर प्रक्रिया को निरस्त किया गया है। उपकरण खरीदी मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के द्वारा की जानी है। युगलपीठ ने मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के एमडी को अनावेदक बनाने के निर्देश याचिकाकर्ता को दिए थे। टेंडर किन कारणों से निरस्त किये गये थे, इस संबंध में जानकारी प्रदान करने लिए स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के एमडी को युगलपीठ ने व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया था। याचिका की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर युगलपीठ को बताया कि पूर्व में जारी टेंडर में एक-दो प्रतिभागी ने हिस्सा लिया था। जिसके कारण उन्हें निरस्त किया गया है। तकनीकी बोली 29 अप्रैल को खोली जानी है, जिसमें जबलपुर केन्द्र के लिए उपकरण एवं मशीन भी जोड़ दी गई है। लोक स्वास्थ्य सेवा निगम के प्रबंध निदेशक की तरफ से बताया गया कि टेंडर 6 मई को खोलना संभव हो पाएगा। युगल पीठ ने सुनवाई के बाद अपने आदेश में उक्त बोली में अंतिम निर्णय लेने के आदेश जारी करते हुए अगली सुनवाई 13 मई को निर्धारित की गई है।

ग्वालियर : हाईकोर्ट ने नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त विवेक कुमार सिंह का गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया

ग्वालियर ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त विवेक कुमार सिंह का गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है। यदि 5 मई को उपस्थित नहीं होते हैं तो उनको गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करना होगा। लोकायुक्त पुलिस ने नगर निगम के जल प्रदाय घोटाले में दोषमुक्त हुए आरोपियों के खिलाफ अपील दायर की है, जिसमें 8 आरोपी उपस्थित हो गए, लेकिन तत्कालीन नगर निगम आयुक्त उपस्थित नहीं हुए हैं। कोर्ट ने तीन आरोपियों को सजा सुनाई विशेष सत्र न्यायालय ने 29 नवंबर 2021 को नगर निगम के जल प्रदाय विभाग में हुए घोटाले के मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने तीन आरोपियों को सजा सुनाई। तत्कालीन निगमायुक्त विवेक सिंह, केके श्रीवास्तव, आरके बत्रा, कुशलता शर्मा, हरि सिंह खेनवार, सत्येंद्र सिंह भदौरिया, मोहित जैन, सुनील गुप्ता, रजत जैन को दोषमुक्त कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है। हाईकोर्ट ने अपील सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है, नोटिस जारी कर आरोपियों को तलब किया है। लोकायुक्त पुलिस के अधिवक्ता सुशील चतुर्वेदी ने बताया कि विचारण न्यायालय ने साक्ष्य व गवाही को नहीं देखा है। निगमायुक्त ने अपने अधिकारों का हस्तांतरण कर दिया था, लेकिन उनके संज्ञान में पूरा मामला था। इस पूरे घोटाले में वह भी जिम्मेदार है। विचारण न्यायालय ने फैसला देने में गलती की है। इसे निरस्त किया जाए। क्या है मामला दरअसल नगर निगम के जल प्रदाय विभाग में 2004-05 में 2 करोड़ रुपए से अधिक व्यय किया गया। 1805 नस्तियां बनाई गई। इन नस्तियों में 1.69 करोड़ रुपए भुगतान शेष पाया गया। इसकी शिकायत सुधीर कुशवाह ने लोकायुक्त में की। पुलिस ने इस मामले की जांच की तो जल प्रदाय विभाग में घोटाला सामने आया। अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज कर तत्कालीन निगमायुक्त विवेक सिंह सहित 12 आरोपियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित अन्य धाराओं में केस दर्ज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किये, यदि कोई नवजात शिशु चोरी होता है तो अस्पतालों का लाइसेंस रद्द

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी नवजात बच्चे को हॉस्पिटल से चुराया जाता है तो सबसे पहले उस अस्पताल का लाइसेंस सस्पेंड होना चाहिए. कोर्ट ने यह टिप्पणी दिल्ली- एनसीआर में नवजात बच्चों की तस्करी के गैंग के पर्दाफाश से जुड़ी खबर पर संज्ञान लेते हुए की. सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के बच्चों की तस्करी के मामले में आदेश सुनाया और दिल्ली में इस गैंग के पकड़े जाने की घटना का जिक्र किया है. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली गैंग के पर्दाफाश की घटना अपने आप मे हतप्रभ कर देने वाली है और कोर्ट के दखल की जरूरत है. कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से इस बारे में स्थिति जांच रिपोर्ट भी तलब की है. कोर्ट ने पुलिस से पूछा है कि दिल्ली के अंदर और बाहर से सक्रिय इस तरह के बच्चा चोर गिरोहों से निपटने के लिए उनकी ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं? कोर्ट ने स्वतः संज्ञान के मामले पर अगली सुनवाई 21 अप्रैल को तय कर दी है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच अस्पतालों से बच्चा चोरी करने वाले गिरोह से जुड़े एक मामले में जमानत को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सभी आरोपियों को निचली अदालत में सरेंडर करने को कहा. साथ ही सीजेएम वाराणसी और एसीजेएम वाराणसी को निर्देश दिया कि दो सप्ताह के भीतर सत्र न्यायालय में मामले दर्ज किया जाए और एक सप्ताह के भीतर चार्ज फ्रेम किया जाए. इसके अलावा इस मामले से जुड़े कुछ आरोपी फरार हैं तो उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट गैर जमानती वारंट जारी किया जाए. साथ ही कोर्ट ने तस्करी किए गए बच्चों को RTE के तहत स्कूल में भर्ती कराया जाता है और उन्हें शिक्षा प्रदान करना जारी रखता है. ट्रायल कोर्ट बीएनएसएस और यूपी राज्य कानून के तहत मुआवजे के संबंध में आदेश पारित करने के लिए भी निर्देश दिया. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट को बाल तस्करी के मामलों में लंबित मुकदमे की स्थिति की जानकारी लेने का निर्देश देते हुए कहा कि लंबित मुकदमों को छह महीने में परीक्षण पूरा करने और मामलों के प्रतिदिन सुनवाई के आधार पर किए जाएंगे. कोर्ट ने यह भी कहा कि हमारे द्वारा जारी निर्देशों को लागू करने में बरती गई किसी भी ढिलाई को गंभीरता से लिया जाएगा और उसे अवमानना के रूप में माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बाल तस्करी के मामलों से निपटने के तरीके को लेकर यूपी के प्रशासन की आलोचना की और ऐसे अपराधों को रोकने के लिए राज्यों को सख्त दिशा-निर्देश दिए. बेंच ने निचली अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया. साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि किसी नवजात की तस्करी होती है तो अस्पतालों के लाइसेंस निलंबित कर दिए जाएं. शीर्ष अदालत ने कहा, देश भर के हाई कोर्ट को बाल तस्करी के मामलों में लंबित मुकदमों की स्थिति के बारे में जानकारी देने का निर्देश दिया जाता है. इसके बाद 6 महीने में मुकदमे को पूरा करने और दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने के निर्देश जारी किए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें तस्करी करके लाए गए एक बच्चे को उत्तर प्रदेश के एक दंपत्ति को सौंप दिया गया था जो बेटा चाहते थे. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी थी. आरोपियों की जमानत रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले से निपटने के तरीके को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों को फटकार लगाई. बेंच ने कहा, आरोपी को बेटे की चाहत थी और उसने 4 लाख रुपये में बेटा खरीद लिया. अगर आप बेटे की चाहत रखते हैं तो आप तस्करी किए गए बच्चे को नहीं खरीद सकते. वो जानता था कि बच्चा चोरी हुआ है. शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने जमानत आवेदनों पर ऐसी कार्रवाई की, जिसके कारण कई आरोपी फरार हो गए. अदालत ने कहा, ये आरोपी समाज के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं. जमानत देते समय हाई कोर्ट से कम से कम यह अपेक्षित था कि वो हर सप्ताह पुलिस थाने में उपस्थिति दर्ज कराने की शर्त लगाता. पुलिस सभी आरोपियों का पता लगाने में विफल रही. सरकार की खिंचाई करते हुए जजों ने कहा, हम पूरी तरह से निराश हैं… कोई अपील क्यों नहीं की गई? कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई. ‘अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होगा’ बाल तस्करी के मामलों को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई नवजात शिशु चोरी होता है तो अस्पतालों का लाइसेंस रद्द कर दिया जाना चाहिए. अदालत ने आदेश दिया, यदि किसी अस्पताल से नवजात शिशु की तस्करी की जाती है तो पहला कदम ऐसे अस्पतालों का लाइसेंस निलंबित करना होना चाहिए. यदि कोई महिला अस्पताल में बच्चे को जन्म देने आती है और बच्चा चोरी हो जाता है, तो पहला कदम लाइसेंस निलंबित करना होना चाहिए. बेंच ने चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा. इसे न्यायालय की अवमानना ​​माना जाएगा.  

CG हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, संविदा कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता

बिलासपुर  संविदा कर्मियों के लिए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है. कोर्ट ने आदेश दिया कि केवल संविदा कर्मचारी होने के आधार पर मातृत्व अवकाश (Maternity leave) का वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्टाफ नर्स को अवकाश अवधि का वेतन देने के निर्देश दिए हैं. न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने राज्य प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता द्वारा दायर मातृत्व अवकाश के वेतन संबंधी दावा पर तीन माह के भीतर नियमानुसार निर्णय लें. न्यायालय ने कहा कि मातृत्व और शिशु की गरिमा के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है. इसे प्रशासनिक अधिकारियों की इच्छा पर निर्भर नहीं किया जा जा सकता. कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा मातृत्व अवकाश वेतन की मांग पर नियमानुसार तीन माह के माह के भीतर निर्णय लिया जाए. याचिकाकर्ता राखी वर्मा, जिला अस्पताल कबीरधाम में स्टाफ नर्स के रूप में संविदा पर कार्यरत हैं. उन्होंने 16 जनवरी 2024 से 16 जुलाई 2024 तक मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था. इसे स्वीकृत कर लिया गया. उन्होंने 21 जनवरी 2024 को एक कन्या को जन्म दिया और 14 जुलाई 2024 को पुनः ड्यूटी ज्वाइन की. इसके बावजूद, उन्हें मातृत्व अवधि का वेतन नहीं दिया गया. इससे उन्हें और उनके नवजात को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा. उन्होंने 25 फरवरी 2025 को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को वेतन की मांग का आवेदन प्रस्तुत किया. कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 2010 के नियम 38 के अंतर्गत मातृत्व अवकाश एक विधिक अधिकार है, जो संविदा कर्मचारियों पर भी समान रूप से लागू होता है. याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व में दिए गए कोर्ट के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें संविदा कर्मचारियों को मातृत्व लाभ दिये जाने की पुष्टि की गई थी. उन्होंने यह भी तर्क रखा कि वेतन न देना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि यह स्थायी व अस्थायी कर्मचारियों के मध्य अनुचित भेदभाव को जन्म देता है. राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता संविदा पर नियुक्त थीं और उन्हें स्थायी कर्मचारियों की भांति लाभ प्राप्त करने का अधिकार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य मातृत्व की गरिमा की रक्षा करना है, ताकि महिला व उसके बच्चे का पूर्ण व स्वस्थ विकास हो हो सके. संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मातृत्व का अधिकार और प्रत्येक बच्चे के पूर्ण विकास का अधिकार भी सम्मिलित है.सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है. और इसे केवल नियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखा जा सकता. कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा अवकाश नियम, 2010 के नियम 38 एवं अन्य लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार शासन को विचार करने और आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन माह के भीतर इस संबन्ध में उपयुक्त निर्णय पारित करने के निर्देश दिए.

दुष्कर्म पीड़िता के नाम की तरह दुष्कर्म के आरोपी का नाम क्यों नहीं गुप्त रखते: MP हाई कोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने राज्य शासन से पूछा कि दुष्कर्म पीड़िता के नाम की तरह दुष्कर्म के आरोपी का नाम क्यों नहीं गुप्त रखते। शासन को चार सप्ताह में हर हाल में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही साफ शब्दों में हिदायत दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो 15 हजार रुपये जुर्माने के साथ ही जवाब स्वीकार किया जाएगा। यह राशि हाई कोर्ट विधिक सहायता कमेटी में जमा कराई जाएगी। इसे लैंगिक भेदभाव बताया गया याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी डॉ. पीजी नाजपांडे व डॉ. एमए खान की ओर से अधिवक्ता अजय रायजादा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आपराधिक नियम के अंतर्गत दुष्कर्म पीड़िता का नाम गुप्त रखने का प्रविधान है। ऐसा करना लैंगिक भेदभाव है, जो कि संविधान की मंशा के विपरीत है। कानून में यह कहा गया है कि जब तक आरोप साबित नहीं हो जाता, तब तक आरोपी निर्दोष होता है। ऐसे गंभीर प्रकरणों में आरोपी का नाम सार्वजनिक करने से उसकी छवि प्रभावित होती है। सार्वजनिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है याचिका में कहा गया कि फिल्मी हस्ती मधुर भंडारकर जैसे कई ऐसे नाम हैं, जो ऐसे आरोपों से बरी हुए हैं, लेकिन सार्वजनिक प्रतिष्ठा धूमिल हो गई। इसीलिए याचिका के जरिए मांग की गई है कि उक्त अधिनियम के तहत ट्रायल पूरी होने तक दुष्कर्म के मामलों में आरोपी का नाम भी गुप्त रखा जाए।

’90 दिनों के भीतर बिल पर फैसला लेना जरूरी’, पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट का राज्यपाल के मामले में फैसला शुक्रवार को ऑनलाइन अपलोड हो गया है। इस फैसले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से उनके विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना चाहिए। शीर्ष अदालत की तरफ से तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि की तरफ से राष्ट्रपति के विचार के लिए रोके गए और आरक्षित किए गए 10 विधेयकों को मंजूरी देने और राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए सभी राज्यपालों के लिए समयसीमा निर्धारित की थी। फैसला करने के चार दिन बाद, 415 पृष्ठों का निर्णय शुक्रवार को रात 10.54 बजे शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। देरी पर राज्य को देनी होगी जानकारी शीर्ष अदालत ने कहा कि हम गृह मंत्रालय की तरफ से निर्धारित समय-सीमा को अपनाना उचित समझते हैं… और निर्धारित करते हैं कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से उनके विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है। इस अवधि से परे किसी भी देरी के मामले में, उचित कारणों को दर्ज करना होगा और संबंधित राज्य को सूचित करना होगा। राज्यों को भी सहयोगात्मक होना चाहिए और उठाए जा सकने वाले प्रश्नों के उत्तर देकर सहयोग करना चाहिए और केंद्र सरकार द्वारा दिए गए सुझावों पर शीघ्रता से विचार करना चाहिए।’ अनुच्छेद 200 का किया गया जिक्र जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने 8 अप्रैल को राष्ट्रपति के विचार के लिए दूसरे चरण में 10 विधेयकों को आरक्षित करने के फैसले को अवैध और कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण करार देते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा था कि जहां राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है और राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति नहीं देते हैं, तो राज्य सरकार के लिए इस न्यायालय के समक्ष ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार खुला रहेगा। संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को अपने समक्ष प्रस्तुत विधेयकों पर अपनी सहमति देने, सहमति नहीं देने या राष्ट्रपति के विचार के लिए उसे आरक्षित रखने का अधिकार देता है।

सिवनी मालवा में मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म कर हत्या मामले में कोर्ट नेफैसला सुनाया और बच्ची को केवल 88 दिन में न्याय दिला दिया

सिवनी मालवा . सिवनी मालवा स्थित नयापुरा में 6 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म कर हत्या मामले में कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया और बच्ची को केवल 88 दिन में न्याय दिला दिया। महिला जज ने आरोपी को फांसी सजा सुनाई। इस घटना ने रिकॉर्ड करते हुए महज् 88 दिन में फैसला सुना दिया और आरोपी पर 3 हजार रुपए जुर्माना और बच्ची के माता-पिता को 4 लाख रुपए का प्रतिकर स्वरूप दिए जाने का आदेश दिया। बच्ची को सोता हुआ ले गया था आरोपी 2 जनवरी 2025 की रात एक 6 वर्षीय मासूम के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना सामने आई है। आरोपी अजय बाडिवा, जिसे धुर्वे के नाम से भी जाना जाता है, उसने इस वारदात को अंजाम दिया। वह पीड़ित बच्ची के मामा के घर में पलंग के नीचे सो रहा था, जहां बच्ची आई हुई थी। जब बच्ची की मां और मामा ने उसे घर से भगा दिया, तो वह रात में फिर से घर में घुस आया और सोती हुई बच्ची को जंगल में ले गया। वहां उसने नहर किनारे बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और उसकी हत्या कर दी। जिला अभियोजन अधिकारी राजकुमार नेमा ने इस मामले की जानकारी दी है। 2 जनवरी की रात घर में सो रही बच्ची को आरोपी अजय बाडिवा (धुर्वे) जंगल में ले गया था। नहर किनारे दुष्कर्म किया और मुंह दबाकर उसकी हत्या कर दी। जिला अभियोजन अधिकारी राजकुमार नेमा ने बताया 2 जनवरी 2025 को बच्ची अपने मामा के घर आई थी। आरोपी उसी घर में पलंग के नीचे सो रहा था, जिसे बच्ची की मां और मामा ने भगा दिया था। अजय जाते-जाते कहकर गया कि एक लड़की मुझे दे दो। इसके बाद बच्ची को मां ने सुला दिया। कुछ देर बाद बच्ची को आरोपी उठाकर ले गया। जंगल में ले जाकर दुष्कर्म किया और हत्या कर दी। बच्ची की मां ने आरोपी पर शंका जताई थी। पुलिस ने उसी रात आरोपी को गांव से गिरफ्तार किया। उसने दुष्कर्म कर हत्या करना कबूल किया। जज ने फैसले में बच्ची के दर्द पर कविता भी लिखी… शासन की ओर से पक्ष विशेष लोक अभियोजक मनोज जाट ने रखा। सिवनीमालवा के अधिवक्ताओं ने आरोपी का केस नहीं लड़ने का ऐलान किया था। आरोपी को फांसी की सजा दिलाने लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। जज की कविता… हां, फिर एक निर्भया 2 और 3 जनवरी की थी वो दरमियानी रात जब कोई नहीं था मेरे साथ। इठलाती, नाचती छः साल की परी थी, मैं अपने मम्मी-पापा की लाडली थी। सुला दिया था उस रात बड़े प्यार से मां ने मुझे घर पर, पता नहीं था नींद में मुझे ले जाएगा।। “वो” मौत का साया बनकर। जब नींद से जागी तो बहुत अकेली और डरी थी मैं, सि​सकियां लेकर मम्मी-पापा को याद बहुत कर रही थी मैं। न जाने क्या-क्या किया मेरे साथ, मैं चीखती थी, चिल्लाती थी, लेकिन किसी ने न सुनी मेरी आवाज़। थी गुड़ियों से खेलने की उम्र मेरी, पर उसने मुझे खिलौना बना दिया। “वो” भी तो था तीन बच्चों का पिता, फिर मुझे क्यों किया अपनों से जुदा। खेल-खेलकर मुझे तोड़ दिया, फिर मेरा मुंह दबाकर, मसला हुआ झाड़ियों में छोड़ दिया। हां मैं हूं निर्भया, हां फिर एक निर्भया, एक छोटा सा प्रश्न उठा रही हूं जो नारी का अपमान करे क्या इंसाफ निर्भया को मिला वह मुझे मिल सकता है। -तबस्सुम खान, विशेष न्यायाधीश जज ने लिखी बच्ची के दर्द पर कविता बताया जा रहा है कि बच्ची की मां और मामा ने आरोपी अजय को भगा दिया था, लेकिन वो जाते-जाते कहकर गया था कि लड़की मुझे दे दो। इसके बाद बच्ची को मां ने सुला दिया और कुछ देर बाद बच्ची को आरोपी उठाकर ले गया और जंगल में ले जाकर दुष्कर्म किया कर हत्या कर दी। बच्ची की मां ने आरोपी पर शंका जताई थी। पुलिस ने उसी रात आरोपी को गांव से गिरफ्तार किया। उसने दुष्कर्म कर हत्या करना कबूल किया। जज ने फैसले में बच्ची के दर्द पर कविता भी लिखी… शासन की ओर से पक्ष विशेष लोक अभियोजक मनोज जाट ने रखा। सिवनी मालवा के अधिवक्ताओं ने आरोपी का केस नहीं लड़ने का ऐलान किया था। आरोपी को फांसी की सजा दिलाने लोगों ने प्रदर्शन भी किया था।

हाईकोर्ट ने कहा है सरकार किसी कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट को बिना कानूनी प्रावधान के नहीं ले सकती

रायपुर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार किसी कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट को बिना कानूनी प्रावधान के नहीं ले सकती। यह फैसला जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार इसे ‘प्रशासनिक निर्देशों’ के नाम पर भी नहीं ले सकती। कोर्ट ने यह फैसला राजकुमार गोनेकर नाम के एक दिवंगत सरकारी कर्मचारी के मामले में दिया। गोनेकर की पेंशन से 9.2 लाख रुपए की वसूली के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया। पेंशन कोई दान नहीं जस्टिस गुरु ने अपने फैसले में कहा कि ग्रेच्युटी और पेंशन कोई दान नहीं हैं। कर्मचारी इन्हें अपनी लंबी, लगातार, वफादार और बेदाग सेवा से कमाता है। यह एक कर्मचारी का हक है और यह उसकी संपत्ति है। वहीं, जस्टिस गुरु ने संविधान के अनुच्छेद 300-A का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति के इस अधिकार को कानून के उचित प्रक्रिया के बिना नहीं छीना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट का हिस्सा बिना किसी कानूनी प्रावधान के और प्रशासनिक निर्देश के तहत लेने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है। वसूली के आदेश को रद्द कर दिया इसके साथ ही कोर्ट ने यह फैसला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के रहने वाले राजकुमार गोनेकर के मामले में दिया। गोनेकर की पेंशन से 9.2 लाख रुपए की वसूली के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया। गोनेकर के वकील ने कोर्ट को बताया कि गोनेकर को 29 मार्च 1990 को सहायक निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में 2000 में उन्हें उप निदेशक के पद पर पदोन्नत किया गया। हालांकि, ग्रेडेशन लिस्ट में कुछ सुधारों के कारण, उन्हें सहायक निदेशक के पद पर पदावनत कर दिया गया। कोर्ट के आदेश के बाद, उन्होंने उप निदेशक के रूप में काम किया और 31 जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हो गए। गबन का लगा था आरोप अपनी सेवा के दौरान, गोनेकर को गबन के आरोप का नोटिस मिला। उन्होंने अपने जवाब में आरोपों से इनकार किया और कहा कि उन्होंने कानून के अनुसार काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद, 13 दिसंबर 2018 को उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उन्होंने 25 जनवरी 2019 को अपना जवाब दाखिल किया और फिर से आरोपों का खंडन किया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि गोनेकर की पेंशन से 9.23 लाख रुपए की वसूली का आदेश इन तथ्यों पर ठीक से विचार किए बिना और उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया गया था। राज्य ने इसका विरोध किया और कहा कि प्रक्रिया का पालन किया गया था। राज्य ने यह भी कहा कि गोनेकर का जवाब मिलने और सरकार द्वारा राशि वसूलने की अनुमति दिए जाने के बाद ही कार्रवाई की गई थी। HC ने कहा कि मूल याचिकाकर्ता, गोनेकर की मृत्यु 20 जून 2024 को हो गई थी। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को याचिका में शामिल किया गया। राज्यपाल के पास है अधिकार कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9 का हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि राज्यपाल के पास पेंशन रोकने या वापस लेने या सरकार को हुए नुकसान की वसूली का आदेश देने का अधिकार है। यह तब हो सकता है जब पेंशनर को विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में गंभीर कदाचार या लापरवाही का दोषी पाया जाए। कोर्ट ने पहले के फैसलों का उल्लेख किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन में कटौती करने से पहले सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करने के महत्व पर जोर दिया था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करता है। HC ने निष्कर्ष निकाला कि नियम 9 के अनुसार, पेंशन से वसूली का आदेश तभी दिया जा सकता है जब कर्मचारी को विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में दोषी पाया जाए। गोनेकर को दोषी पाए जाने का कोई सबूत नहीं था। केवल कारण बताओ नोटिस और उनके जवाब थे। इसलिए, वसूली के आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता। 45 दिनों के भीतर राशि लौटाने के निर्देश कोर्ट ने आदेश दिया कि गोनेकर की पेंशन से काटी गई राशि 45 दिनों के भीतर उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को वापस कर दी जाए।

महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं, यह उनका अधिकार है :HC

प्रयागराज यदि महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं। यह उनका अधिकार है और पुलिस को उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी होगी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अलग-अलग मजहबों से ताल्लुक रखने वाले महिला पुरुष के लिव इन में रहने के मामले में यह फैसला सुनाया है। अदालत ने यह फैसला महिला और पुरुष के एक साल 4 महीने के बच्चे की अर्जी पर दिया। बच्चे के माता-पिता का धर्म अलग है और दोनों ही 2018 से साथ रह रहे हैं। याचिका में बच्चे की ओर से कहा गया कि मेरी मां संबंधित व्यक्ति के साथ रह रही है क्योंकि उनके पहले पति की मौत हो गई थी। अब वे दोनों साथ हैं और उनसे ही मेरा जन्म हुआ है। ऐसी स्थिति में उनका साथ रहना मेरे लिए जरूरी है। इस पर जस्टिस शेखर सर्राफ और जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की बेंच ने कहा, ‘हमारे विचार से संविधान में जो पैरेंट्स की परिभाषा है, उसके तहत दो वयस्क लोग साथ रह सकते हैं। भले ही उन लोगों की शादी न हुई हो।’ दरअसल याचिका में कहा गया कि महिला और युवक को परेशान किया जा रहा है, लेकिन पुलिस ने अब तक एफआईआर भी दर्ज नहीं की है। इस पर अदालत ने संभल के एसपी को आदेश दिया कि एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। इसके अलावा बेंच ने कहा कि यदि ये दोनों पुलिस के पास पहुंचते हैं तो उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। उनके बच्चे को भी जरूरी सिक्योरिटी मिलनी चाहिए। बेंच ने कहा कि पुलिस को हमारे फैसले के अनुसार ही काम करना होगा। दरअसल इस मामले में महिला का आरोप है कि उसके ससुराल पक्ष की ओर से धमकियां मिल रही हैं। उन्हें कई बार मारने-पीटने का प्रयास भी किया गया, लेकिन प्रशासन ने कोई ऐक्शन नहीं लिया। इसके अलावा पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पति की मौत के बाद शुरू हुआ लिव इन और बच्चे का जन्म अर्जी में कहा गया कि पति की मौत के बाद महिला नए रिश्ते में आई और अब लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है। इसी रिलेशनशिप के दौरान बच्चे का जन्म हुआ। अब बच्चे के आधार पर ही महिला और पुरुष ने साथ रहने का अधिकार मांगा है। इसके अलावा धमकी देने वालों से सुरक्षा दिलाने की भी गुहार की है। इस मामले में हाई कोर्ट का यह फैसला कई अन्य मसलों के लिए भी नजीर बन सकता है।

प्रदेश में स्वीकार नहीं होगा दूसरे राज्यों का ‘जाति प्रमाण-पत्र’, हाईकोर्ट का फैसला

इंदौर  किसी अन्य राज्य से जारी जाति प्रमाण-पत्र मध्यप्रदेश में उस जाति से जुड़े लाभ के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। न ही अन्य राज्य के जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर मप्र में किसी तरह की पात्रता उसे मिलती है। मप्र हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रुसिया की खंडपीठ ने ये अहम फैसला सुनाया।  वर्ष 2015 में उज्जैन नगर निगम महापौर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। यहां महापौर पद के लिए प्रीति गेहलोद ने नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने नामांकन के साथ राजस्थान से जारी अनुसूचित जाति वर्ग का प्रमाणपत्र लगाया था। इसे निर्वाचन अधिकारी ने अमान्य करते हुए उनका फॉर्म निरस्त कर दिया था। इस पर उन्होंने उज्जैन जिला न्यायालय में याचिका लगाई थी। कोर्ट ने निर्वाचन अधिकारी के फैसले को सही बताते हुए उसे खारिज कर दिया था। इस पर गेहलोद ने हाईकोर्ट में अपील की थी। नहीं मिलेगी सुविधा तर्क दिया था कि चूंकि बैरवा जाति राजस्थान और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में अनुसूचित जाति वर्ग में है, इसलिए उनका जाति प्रमाण-पत्र सही नहीं मानना गलत निर्णय है। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 2014 में जारी आदेश के आधार पर ये बात मानी कि आरक्षण सुविधा उसी राज्य में उपलब्ध होगी, जहां से जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि मप्र द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र के अभाव में मप्र में आरक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। इस आधार पर कोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सही बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने OBC वर्ग के 27 फीसदी रिजर्वेशन के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी

भोपाल  मध्य प्रदेश में लंबे समय से ओबीसी को आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। इस पर अब बड़ी खबर सामने आई है। एमपी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लागू रहेगा सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट के फैसले को सही माना है। साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में लगाई स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी है। दरअसल, साल 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया था। विधानसभा में इसका विधेयक पास हो गया। 2 सितंबर 2021 के दिन सामान्य प्रशासन विभाग ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का सर्कुलर जारी कर दिया। हालांकि इसके साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। हाईकोर्ट ने निरस्त की चुनौती वाली याचिका यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से लगाई याचिका में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2025 को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद इस संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। इस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा कि 27 फीसदी ओबीसी को आरक्षण लागू होने में मध्य प्रदेश में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ इस मामले में हाईकोर्ट भी यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज कर चुका है। हाईकोर्ट ने 28 जनवरी को दो याचिकाएं खारिज की थीं। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण के सर्कुलर को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में लगी एसएलपी खारिज कराने के लिए ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन ने अपना पक्ष दमदारी से रखा। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज होने के साथ ही एमपी में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया है। आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ की याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई में मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पक्ष प्रस्तुत करने कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं हुआ। इससे सरकार द्वारा मामले को जानबूझकर लटकाने की कोशिश करने की आशंका उत्पन्न हुई। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज कर दिया बल्कि ये भी साफ कर दिया है कि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने मामले की सुनवाई की। एडवोकेट वरुण ठाकुर एवं एडवोकेट रामकरण ने ओबीसी महासभा की ओर से पक्ष रखा। ओबीसी महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में यह केस लड़ने के लिए समुदाय ये एक-एक रुपए एकत्रित किए थे। ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण एमपी में कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया गया था। 2019 में लिए गए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका लगाई गई थी जिसे खारिज कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह एसएलपी यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन द्वारा दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एमपी हाईकोर्ट के आदेश को उचित बताते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण में कोई न्यायिक अड़चन नहीं हैं। गौरतलब है कि फरवरी माह में ही एमपी हाईकोर्ट जबलपुर के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैथ और न्यायाधीश विवेक जैन की युगलपीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण के कानून का पालन करने का आदेश दिया था। पीठ ने यह भी कहा था कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। वायरल हुआ पूर्व सीएम कमलनाथ का बयान मध्यप्रदेश में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए यह स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर कोई रोक नहीं हैं। उन्होंने आगे लिखा कि अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में 2019 में मैंने प्रदेश के ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का कानून बनाया था। उसके बाद से बनी भाजपा की सरकार असंवैधानिक रूप से षडयंत्र रचकर लगातार ओबीसी को आरक्षण से वंचित कर रही है। पहले माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण देने वाले क़ानून पर कोई रोक नहीं है। बीजेपी को अब मध्य प्रदेश के ओबीसी समाज से माफी मांगनी चाहिए और तत्काल प्रभाव से प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण देना चाहिए।

भोज विश्वविद्यालय में नियुक्तियों के मामले में HC ने नियुक्तियां कीं निरस्त का दिए आदेश

भोपाल मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में की गई नियुक्तियों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मनमानी और दूषित करार देते हुए निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश श्री सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने चयनित अभ्यर्थियों के पक्ष में जारी एकलपीठ के आदेश को रद्द करते हुए नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। मध्य प्रदेश शासन और भोज मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा दायर अपील में कहा गया था कि वर्ष 2015 में प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर समेत अन्य पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन चयन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं। अपील में यह भी बताया गया कि चयन समिति में संबंधित विषयों के विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया था, बल्कि अन्य विषयों के विशेषज्ञों से चयन कराया गया, जो नियमों के खिलाफ था। इसके अलावा, चयन समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया। अपील में यह भी उल्लेख किया गया कि अभ्यर्थियों के शैक्षणिक दस्तावेजों की न तो ठीक से जांच की गई और न ही उनका निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया। अंकों के कई कॉलम बिना किसी स्पष्टीकरण के खाली छोड़ दिए गए थे। साक्षात्कार में कुछ अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक देकर अन्य अधिक योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी की गई, जिससे चयन प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है। इसके साथ ही, विज्ञापनों में महिलाओं और दिव्यांगों के लिए आरक्षण का उल्लेख नहीं किया गया था और न ही आरक्षण रोस्टर उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार तैयार किया गया था। इन अनियमितताओं के कारण चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया था। इसके विरुद्ध चयनित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर एकलपीठ ने उनके पक्ष में राहतकारी आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की गई थी।

उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश घोषित करेंगे अपनी संपत्ति, ‘सभी जज पब्लिक करेंगे अपनी संपत्ति का ब्योरा’

नई दिल्ली  न्यायपालिका में पारदर्शिता और लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने पदभार ग्रहण करने के दौरान ही अपनी संपत्ति का ब्योरा पब्लिक करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से यह फैसला 1 अप्रैल को की गई फुल कोर्ट मीटिंग में लिया गया है। इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया और यह भावी जजों पर भी लागू होगा। जजों ने यह भी कहा कि संपत्तियों से जुड़ी जानकारी सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी। हालांकि, वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक होगा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर कहा गया है, ‘सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक आधार पर होगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना समेत सुप्रीम कोर्ट के 30 जजों ने अपनी संपत्ति का घोषणा पत्र कोर्ट में दिया है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत वरिष्ठ वकील आदिश अग्रवाल ने समाचार न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत करता हूं जिसमें जजों को अपनी संपत्ति आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित करने को कहा गया है। इसकी वजह से जनता का भरोसा बहाल होगा, जो पिछली घटनाओं के कारण थोड़ा कम हुआ है। मुझे उम्मीद है कि हाई कोर्ट के जज भी इसका अनुसरण करेंगे। इससे न्यायपालिका में पारदर्शिता और विश्वास सुनिश्चित होगा। जबकि 1977 में इसी तरह के प्रस्ताव पर विचार किया गया था, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था।’ जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े विवाद के बाद में आया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल साफ किया कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के तौर पर अपना नया पदभार संभालने के बाद कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा जाएगा। बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पहले जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश की थी। कॉलेजियम ने साफ किया कि यह ट्रांसफर उनके खिलाफ चल रही जांच से बिल्कुल अलग है। कमेटी ने पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज किए पिछले हफ्ते सीजेआई खन्ना ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों की कमेटी का गठन किया है। टॉइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आयोग ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा और कुछ अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का बयान दर्ज किया है। ऐसा माना जा रहा है कि अरोड़ा ने आयोग को बताया कि स्टोर रूम एक गार्ड रूम से सटा हुआ था, जहां सीआरपीएफ के जवान तैनात थे और स्टोर रूम को बंद रखा जाता था। अरोड़ा ने आयोग को यह भी बताया कि उन्होंने 15 मार्च को शाम करीब 4.50 बजे सुप्रीम कोर्ट को घटना के बारे में सूचित किया था। उन्होंने आयोग को बताया कि जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने दिल्ली हाई कोर्ट के नाम से रजिस्टर फोन नंबर से पीसीआर कॉल की थी और सचिव ने कहा कि उन्हें जज के आवास पर मौजूद एक नौकर ने आग के बारे में सूचित किया था।

रीवा गैंगरेप केस :नवविवाहित महिला से हुई थी हैवानियत; गैंगरेप के आठों दरिंदो को उम्रकैद

रीवा  रीवा जिला न्यायालय ने एक बहुचर्चित गैंगरेप के मामले में 8 आरोपियों को कठोर सजा से दंडित करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. 6 माह पहले नवदंपती को बंधक बनकर आरोपियों ने गैंगरेप की हैवानियत की थी. इस अपराध को अदालत ने जघन्य माना. सभी आरोपियों को आजीवन कारावास के साथ 2 लाख 30 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया है. पूरा मामला नवदंपती से हुई हैवानियत से जुड़ा हुआ है. रीवा जिले के गुढ़ थाना इलाके में 21 अक्टूबर 2024 को एक नवदंपति भैरव बाबा की पहाड़ी स्थित मंदिर के दर्शन कर लौट रहा था. तभी आरोपियों ने पति-पत्नी को बंधक बना लिया. आरोपी घटनास्थल पर शराब पार्टी कर रहे थे. आरोपियों ने नवदंपती के साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी देकर महिला से गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया था. वारदात को अंजाम देने की बाद सभी आरोपी फरार हो गए थे. जानकारी मिलते ही पुलिस ने 8 आरोपियों पर BNS 70(1), 127(2), 115, 190, 351(3), 238 का मामला दर्ज किया. पुलिस की अलग-अलग टीमों ने आरोपियों की धरपकड़ के लिए कई जगह दबिश देकर सभी आरोपियों को हिरासत में लिया. लोक अभियोजक अधिवक्ता विकास द्विवेदी ने बताया कि इस मामले को फास्ट ट्रैक में चलाया गया था. 6 महीने के अंदर जिला न्यायालय में चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश पदमा जाटव की अदालत ने तथ्य प्रमाणित पाए जाने के बाद गैंगरेप के सभी 8 आरोपी रामकिशन, गरुड़ कोरी, राकेश गुप्ता, सुशील कोरी, रजनीश कोरी, दीपक कोरी, राजेंद्र कोरी और लवकुश कोरी आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. साथ ही प्रत्येक आरोपियों को 2 लाख 30 हजार के अर्थदंड से भी दंडित किया है. इन्हें आखिरी सांस तक जेल की सलाखों के पीछे रहना होगा.

राजस्थान: हाईकोर्ट ने सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन पर लगाई फटकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने भजनलाल सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि राज्य में पंचायत चुनाव आखिर कब कराए जाएंगे? जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं।  दरअसल, जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि 4 फरवरी 2025 के आदेश की पालना करते हुए पंचायत चुनाव का स्पष्ट शेड्यूल प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 7 अप्रैल 2025 तय की है। याचिकाकर्ता ने सरकार के जवाब को बताया अपूर्ण याचिकाकर्ता गिरिराज सिंह देवंदा की ओर से पेश अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने अदालत में आपत्ति जताई कि सरकार ने पिछले आदेशों के बावजूद पंचायत चुनावों की कोई स्पष्ट समय-सीमा तय नहीं की है। उन्होंने कहा कि सरकार को कोर्ट के आदेश का अनुपालन करना चाहिए था, लेकिन इसके हलफनामे में किसी निश्चित चुनाव कार्यक्रम का उल्लेख नहीं किया गया। सरकार ने चुनाव स्थगित करने के लिए दिए तीन तर्क राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में प्रस्तुत अपने जवाब में चुनाव स्थगन को उचित ठहराने के लिए तीन प्रमुख कारण बताए हैं। पहला तो ये कि प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव एक साथ कराने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जो यह अध्ययन करेगी कि एक साथ चुनाव कराने से धन, श्रम और समय की कितनी बचत होगी और इससे स्थानीय निकायों को कैसे सशक्त किया जा सकता है। वहीं, दूसरा तर्क बताया कि पिछली सरकार ने कई नए जिले बनाए थे, जिनमें से 9 जिलों को वर्तमान सरकार ने समाप्त कर दिया। अब पूरे प्रदेश में पंचायतों का पुनर्गठन और नगरीय निकायों का परिसीमन किया जा रहा है, इसलिए चुनावों को अभी स्थगित किया गया है। इसके अलावा सरकार का कहना है कि उसने राजस्थान पंचायत राज अधिनियम, 1994 की धारा 95 के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की है। यह प्रावधान वैकल्पिक है, जिससे सरकार यह तय कर सकती है कि प्रशासकों की नियुक्ति कैसे की जाए। बताते चलें कि हाईकोर्ट का रुख अब और सख्त हो सकता है, क्योंकि सरकार ने पूर्व आदेशों का स्पष्ट अनुपालन नहीं किया है। यदि अगली सुनवाई 7 अप्रैल को सरकार चुनावों की कोई निश्चित तिथि प्रस्तुत नहीं करती, तो कोर्ट द्वारा कड़ा रुख अपनाया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप- संविधान का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं के वकील प्रेमचंद देवंदा का कहना है कि राज्य सरकार ने 16 जनवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी कर 6,759 पंचायतों के चुनाव स्थगित कर दिए, जो संविधान के अनुच्छेद 243ई, 243के और राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 की धारा 17 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई और ग्रामीण संस्थाओं को अस्थिर कर दिया है और राज्य में ग्राम पंचायतों के चुनाव रोककर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया है। सरपंचों को प्रशासक बनाने का फैसला विवादों में सरकार ने जनवरी में चुनाव कराने की जगह मौजूदा सरपंचों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया। पंचायतों में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरपंचों की सहायता हेतु एक प्रशासकीय समिति गठित की गई, जिसमें उप सरपंच और वार्ड पंच सदस्य शामिल होंगे। यह मॉडल भाजपा शासित मध्य प्रदेश की तर्ज पर लागू किया गया है, जहां पहले भी इसी तरह से सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। हालांकि, इस फैसले के बाद विपक्ष और पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों ने कड़ी आपत्ति जताई है।

एमपी हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में आरोपी की मां को मन सह-आरोपी, जाने काया कहा

भोपाल भोपाल रेप के एक मामले पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस फैसले में उकसावे की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही कोई महिला रेप की आरोपी नहीं हो सकती लेकिन वह रेप के लिए उकसाने की आरोपी हो सकती है। ऐसे में रेप के लिए उकसाने वाली महिला को आईपीसी की धारा 109 के तहत बलात्कार के लिए उकसाने के अपराध में दोषी ठहराया जा सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि यह पूरा मामला भोपाल के छोला मंदिर इलाके का है। इसमें रेप की वारदात को अंजाम देने वाला आरोपी के साथ उकसाने के मामले में उसकी मां और भाई के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। वर्ष 2022 में दर्ज करवाया रेप का मामला पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 में भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता ने शिकायत में बताया कि उसके पड़ोसी ने उसके परिवार में शादी का प्रस्ताव रखा था। उसी पर सहमति देने के लिए वह उनके घर गई थी। युवक की मां और उसके भाई ने उसे जबरन आरोपी के कमरे में भेज दिया, जहां उसने पीड़िता के साथ संबंध बनाए। पीड़िता ने बताया कि सगाई के बाद कई बार आरोपी ने उसके साथ संबंध बनाए और उसके बाद शादी करने से इनकार कर दिया। आरोपी की मां पर रेप के लिए उकसाने का आरोप पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि आरोपी की मां ने कहा था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है। पीड़िता के अनुसार, पहली बार आरोपी ने 8 जुलाई 2021 को अपने घर पर पीड़िता का रेप किया था। रेप के लिए उकसावे को बताया अपराध मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रेप मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल और जस्टिस प्रशांत गुप्ता ने अपने निर्णय में कहा है कि भले ही कोई महिला रेप नहीं कर सकती लेकिन आईपीसी धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने का अपराध कर सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी धारा 376 एक पुरुष से शुरू होती है। लेकिन अपराध केवल एक पुरुष द्वारा नहीं किया जा सकता। इसलिए आईपीसी की धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने के लिए महिला को दोषी ठहराया गया है। इसके साथ ही जानबूझकर अपराध में सहायता करने को आईपीसी धारा 107 के तहत परिभाषित करते हुए महिला और पुरुष दोनों रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया। पीड़िता का आरोप पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 को भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी. उसने आरोप लगाया था कि आरोपी अभिषेक गुप्ता ने शादी का झांसा देकर उसके साथ रेप किया. इतना ही नहीं, आरोपी की मां और भाई भी इस घटना में शामिल थे. पीड़िता के अनुसार, 8 जुलाई 2021 को पहली बार उसे आरोपी के घर बुलाया गया, जहां उसके साथ रेप किया गया. सगाई के बाद भी आरोपी ने कई बार शारीरिक संबंध बनाए और फिर शादी से मुकर गया. पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी की मां ने उसे समझाया था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है. MP हाईकोर्ट का रुख हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेप के लिए उकसाने वाले भी उतने ही दोषी हैं, जितना कि मुख्य आरोपी. इस आधार पर आरोपी की मां और भाई पर भी कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और साफ किया कि रेप के मामलों में उकसाने वालों के खिलाफ भी कठोर दंड दिया जाएगा. हाईकोर्ट में आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती बता दें कि पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने धारा 376 (बलात्कार), 376 (2) (एन), 190, 506 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी पाया था। सरकारी वकील सीएम तिवारी ने बताया की आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिसमें आरोपी के साथ कोर्ट ने परिवार के लोगों भी रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया है औरयाचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं

सुप्रीम कोर्ट का आदेश, पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पत्रकारों की स्वतंत्रता को मिला संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अहम है। नई दिल्ली  पत्रकारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी भी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इस अधिकार के तहत किसी भी पत्रकार को सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सरकार के खिलाफ बोलने या नीतियों पर सवाल उठाने के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, “स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि सरकार की आलोचना करने पर पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाएगा तो इससे प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। सरकार को आलोचना सहन करने की क्षमता विकसित करनी होगी।” पत्रकारों की स्वतंत्रता पर सकारात्मक संदेश सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि सरकार की आलोचना करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इस अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। भारतीय प्रेस परिषद (PCI) ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। PCI ने कहा कि यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करेगा और पत्रकारों को बिना डर के सच को सामने लाने की प्रेरणा देगा। राजनीतिक हलकों में हलचल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम बताया है। वहीं, सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा है कि वे इस फैसले का सम्मान करते हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की रणनीति तैयार करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता को नया आयाम देगा। इससे पत्रकारों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जनहित के मुद्दों को उठाने का हौसला मिलेगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह संरक्षण न केवल लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करेगा, बल्कि सरकार को भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा।

SC ने HC के देश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार का प्रयास नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित आदेश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का स्वत: संज्ञान लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है. जस्टिस भूषण आर गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि हमें एक जज द्वारा ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग करने के लिए खेद है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने हाईकोर्ट के आदेश को देखा है. हाईकोर्ट के आदेश के कुछ पैराग्राफ जैसे 24, 25 और 26 में जज द्वारा संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाता है. ऐसा भी नहीं है कि फैसला जल्द में लिया गया है. इस मामले में सुनवाई पूरी होकर निर्णय रिजर्व होने के 4 महीने बाद निर्णय सुनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मां ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. उसकी याचिका को भी इसके साथ ही जोड़ा जाए. उससे दोनों पर साथ सुनवाई आगे बढ़ेगी. दरअसल,  इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई. जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज की कुछ टिप्पणियों पर रोक लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल और अटॉर्नी जनरल को सुनवाई के दौरान कोर्ट की सहायता करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र, उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी करते हैं. कोर्ट ने कहा कि हम दो हफ्ते बाद मंगलवार को इस पर सुनवाई करेंगे. इलाहाबाद कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना, और पाजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता. फैसला देने वाले जज जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 11 साल की लड़की के साथ हुई इस घटना के तथ्यों को रिकॉर्ड करने के बाद यह कहा था कि इन आरोप के चलते यह महिला की गरिमा पर आघात का मामला तो बनता है. लेकिन इसे रेप का प्रयास नहीं कह सकते. पहले क‍िया था इनकार इससे पहले नाबालिग लड़की के साथ रेप की कोशिश से जुड़े फैसले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया था. याचिका में जजमेंट के उस विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि ‘इस केस में पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना,और पजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता’. याचिका में क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित में सुप्रीम कोर्ट से जजमेंट के विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि कोर्ट केन्द्र सरकार/ हाई कोर्ट रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दे कि वो फैसले के इस विवादित हिस्से को हटाया जाए। इसके साथ ही याचिका में मांग की गई थी कि जजों की ओर से की जाने वाली ऐसी विवादित टिप्पणियों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट अपनी ओर से दिशानिर्देश जारी करें। क्यों की खारिज समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय इस पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील ने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” योजना का हवाला देते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं, तो न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर अपने मामले पेश करने वाले वकीलों को “लेक्चरबाजी” नहीं करनी चाहिए। इसके बाद न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। क्या है मामला यह फैसला पवन और आकाश नामक दो लोगों से जुड़े एक मामले पर आया है, जिन्होंने कथित तौर पर नाबालिग के स्तनों को पकड़ा, उसके पायजामे का नाड़ा फाड़ दिया और उसे एक पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। शुरुआत में, उन पर आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि उनका कृत्य बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के रूप में योग्य नहीं था, बल्कि यह गंभीर यौन हमले के कम गंभीर आरोप के अंतर्गत आता है, जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (बी) और पोक्सो अधिनियम की धारा 9 (एम) के तहत दंडनीय है।  

अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन कपल हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत तलाक ले सकते हैं?

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सोमवार को अपने एक फैसले के जरिये स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन समुदाय हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के दायरे में बरकरार है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणियों के साथ इंदौर के फैमिली कोर्ट के एक अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के आठ फरवरी के बहुचर्चित फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने जैन समुदाय के 37 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर और उसकी 35 वर्षीय पत्नी के आपसी सहमति से तलाक लेने की अर्जी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने किया था खारिज अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा था कि जैन समुदाय को 2014 में अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद इस धर्म के किसी अनुयायी को ‘‘उसके धर्म से विपरीत मान्यताओं वाले किसी धर्म’’ से संबंधित व्यक्तिगत कानून का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में अपील दायर करके चुनौती दी थी। अपील पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस संजीव एस. कलगांवकर ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अपील मंजूर कर ली। इस मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा? हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के इस निष्कर्ष को ‘‘गंभीर रूप से अवैध’’ और ‘‘स्पष्ट तौर पर अनुचित’’ करार दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान जैन समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते हैं। बेंच ने अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को निर्देश भी दिया कि वह जैन समुदाय के दम्पति की तलाक की याचिका पर कानून के अनुसार कार्यवाही करें। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देने के लिए 11 साल पहले जारी की गई अधिसूचना किसी भी मौजूदा कानून के प्रावधानों को न तो संशोधित या अमान्य करती है, न ही इन प्रावधानों का स्थान लेती है। बेंच ने कहा कि भारतीय संविधान के संस्थापकों और विधायिका ने अपने साझा विवेक के जरिये हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में रखकर एकता के सूत्र में पिरोया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि जैन समुदाय के दम्पति के मौजूदा मामले में फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त अपर प्रधान न्यायाधीश के लिए कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विरुद्ध अपने विचार और धारणाएं प्रस्तुत करने का कोई अवसर नहीं था। बेंच ने यह भी कहा कि अगर फैमिली कोर्ट ने इस सवाल पर विचार किया था कि जैन समुदाय के लोगों पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं, तो वह इस मामले को हाई कोर्ट भेजकर अदालत की राय जान सकता था। यह है मामला इंदौर फैमिली कोर्ट के सामने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरफ से तलाक की याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की शादी 2017 में हुई थी। साल 2024 में दंपती ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम (हिंदू मैरिज एक्ट) की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की मांग की। महिला ने अपने पति के खिलाफ क्रूरता का आरोप लगाया था। हालांकि, सुनवाई में कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका वापस कर दी कि वर्ष 2014 में जैन समाज अल्पसंख्यक हो चुका है ऐसे में हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत अब जैन समाज इसका लाभ नहीं ले सकता। फैमिली कोर्ट ने कहा कि 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अधिसूचना जारी कर चुकी है। इस धर्म के अनुयायियों को अब हिंदू विवाह अधिनियम के तहत राहत पाने का कोई अधिकार नहीं है। जैन समुदाय परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 7 के तहत अपने वैवाहिक विवादों को समाधान के लिए पेश करने के लिए स्वतंत्र है।

सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, जिससे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा, अतिक्रमण के कारण राज्यमार्ग की चौड़ाई हुई कम

जबलपुर  सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किये जाने के कारण राजमार्ग की चौड़ाई कम होने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. मामले में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की डबल बेंच ने बुरहानपुर कलेक्टर को याचिकाकर्ता के दावे की जांच कर चार सप्ताह में अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए हैं. बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे ने दायर की है याचिका बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया है कि बुरहानपुर-अमरावती मार्ग पर डायफूडिया ग्राम की शासकीय भूमि पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है. जिसकी वजह से राजमार्ग की चौड़ाई काफी कम हो गई है और राहगीरों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायाल का स्पष्ट आदेश है कि अतिक्रमणकारियों को किसी प्रकार का बिजली कनेक्शन न दिया जाए. इसके बावजूद बिजली कंपनी ने अतिक्रमणकारियों को बिजली कनेक्शन दे दिए हैं. इस संबंध में जिला कलेक्टर व बिजली कंपनी के अधिकारियों से शिकायत की गई थी. शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है. जिला कलेक्टर होते हैं जिला स्तर पर गठित सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ के चेयरमैन युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अतिक्रमण संबंधी मामले के लिए जिला स्तर पर सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) का गठन किया गया है, जिसके चेयरमैन जिला कलेक्टर होते हैं. युगलपीठ ने कलेक्टर को निर्देश दिया है वह आवेदक के अभ्यावेदन पर जांच करें और यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो उसे चार सप्ताह के भीतर हटाएं. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता धर्मेन्द्र सोनी ने पैरवी की.

हाई स्कूल शिक्षक भर्ती को लेकर HC का बड़ा फैसला, 2 महीने के अंदर होगी टीचरों की भर्ती!

जबलपुर  मध्य प्रदेश में हाई स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा 2018 को दोबारा कराने के निर्देश हाईकोर्ट ने दिए हैं। हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकार को नियमों को संशोधन कर दोबारा भर्ती करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि पद नहीं है तो अतिरिक्त पद क्रिएट कर याचिकाकर्ताओं की भर्ती की जाए। 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश बता दें कि हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग को 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए। दरअसल,हाई स्कूल शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में SC, ST, OBC और हैंडिकैप्ड को कोई भी छूट नहीं दी गई थी। जबकि ऐसा प्रावधान नियमों में था। इसी को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। नियमों का उल्लंघन इसके अलावा याचिका में ये भी आरोप लगाया गया था कि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को शैक्षणिक योग्यता में छूट नहीं दी गई थी जो कि संविधान और संबंधित नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। याचिका में यह भी कहा गया कि NCT के नियमों का उल्लंघन किया गया है। जिनके अनुसार 2011 से पहले पास होने वाले उम्मीदवारों के लिए 45% अंक का प्रावधान है जबकि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को 5% की छूट दी जानी चाहिए।

बिलासपुर कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे , बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा

बिलासपुर प्रदेश में संचालित इंटर सिटी बसों और सिटी बसों के मामले में  हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। शासन ने बताया कि सभी रूट्स पर किराया राउंड फिगर में कर दिया गया है। डीबी ने शासन को सिटी बसों की वर्तमान स्थिति की जानकारी देने के भी निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि बिलासपुर में सिटी बसों की जर्जर स्थिति और प्रदेश में चल रही अंतर नगरीय बस सेवा की खराब हालत पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। इसके बाद से जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू कर दी गई थी। काफी पहले हुई सुनवाई में कोर्ट ने पूछा था कि खटारा होती जा रही बसों को लेकर शासन क्या कर रहा है? शासन की ओर से कहा गया था कि केंद्र से ई-बसें बहुत बड़ी संख्या में आ रहीं हैं, इससे खस्ताहाल बसों की समस्या नहीं रह जाएगी। कोर्ट ने इस बात की पूरी जानकारी देने को कहा था कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे हैं। बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा गया था। सोमवार को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि पूर्व में न्यायालय ने राउंड फिगर में जाने का निर्देश दिया था। शासन ने उस पर अमल करते हुए सभी बसों का किराया राउंड फिगर में कर दिया है। इससे अब किसी भी रूट पर किराया दशमलव में नहीं होगा और यात्रियों को भी परेशानी नहीं होगी। डिवीजन बेंच ने शासन से कहा कि अभी सिटी बसों की स्थिति क्या है, इसमें कितनी सही और कितनी जर्जर हैं, इसकी जानकारी अगली सुनवाई में दें।

मदद प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को प्रबंधन सरकार की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते

 इंदौर  अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को स्कूल प्रबंधन शासन की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने माहेश्वरी हायर सेकंडरी स्कूल की अपील निरस्त कर दी। मामला जीवविज्ञान संकाय के शिक्षक एसके व्यास का है। नवंबर 1974 में उन्हें स्कूल में उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिली थी। वर्ष 1991 में उन्हें शासन के नियमों के तहत लेक्चरर पद पर पदोन्नति दे दी गई। नौकरी से हटा दिया था व्यास को यह पदोन्नति मप्र अशासकीय शिक्षण संस्था अधिनियम के तहत दी गई थी। वर्ष 2005 में स्कूल ने अचानक व्यास को यह कहते हुए नौकरी से हटा दिया कि स्कूल में कक्षा 11वीं और 12वीं में जीवविज्ञान संकाय में कोई एडमिशन नहीं हुआ है, इसलिए स्कूल को उनकी आवश्यकता नहीं है। स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की व्यास ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। वर्ष 2007 में इसका निराकरण करते हुए कोर्ट ने व्यास को दोबारा नियुक्ति के आदेश दिए, लेकिन स्कूल ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील कर दी। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह की युगलपीठ ने स्कूल की अपील को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्कूल प्रबंधन ने बगैर शासन से अनुमति प्राप्त किए शिक्षक को नौकरी से हटाया, यह सही नहीं है।

अगर कोई व्यक्ति किसी की आय पर निर्भर था, तो वह मुआवजा पाने का अधिकारी होगा, चाहे वह रिश्ते में कोई भी हो- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क हादसे में मुआवजा मृतक पर आर्थिक तौर पर निर्भर हर मेंबर को मिलेगा। इस मामले में कानूनी रिप्रेजेंटेटिव की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती है। जो लोग आर्थिक तौर पर मृतक पर निर्भर थे उन्हें दावेदारों की कैटिगरी से बाहर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने हाल के फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी प्रतिनिधि वह व्यक्ति होता है जो सड़क दुर्घटना में किसी शख्स की मृत्यु के कारण पीड़ित होता है और यह जरूरी नहीं कि केवल पत्नी, पति, माता-पिता या संतान ही हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal – MACT) ने मुआवजा प्रदान करते समय मृतक के पिता और बहन को आश्रित नहीं माना था। MACT ने माना कि मृतक के पिता उनकी आय पर निर्भर नहीं थे और चूंकि पिता जीवित थे, इसलिए छोटी बहन को भी आश्रित नहीं माना जा सकता था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने MACT के इस फैसले को बरकरार रखा जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द करते हुए माना कि निचली अदालतों ने अपीलकर्ताओं को मृतक का आश्रित मानने से इनकार करके गलती की थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा केवल पति-पत्नी, माता-पिता या बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी व्यक्तियों तक विस्तार होता है जो मरने वाले के कारण प्रभावित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा राशि 17 लाख 52 हजार 500 तय कर दी। क्या है मामला? ग्वालियर में 25 सितंबर 2016 को 24 साल के धीरज सिंह तोमर ऑटो में जा रहे थे। ड्राइवर तेज रफ्तार से ऑटो चला रहा था। लापरवाही के कारण ऑटो दुर्घटनाग्रस्त हो गया और धीरज की मौके पर ही मृत्यु हो गई। एमएसीटी ने मामले में कुल 9,77,200 मुआवजे भुगतान का आदेश दिया गया। मृतक के परिजनों को यह रकम भुगतान किए जाने का निर्देश दिया। लेकिन साथ ही कोर्ट ने मृतक के पिता और बहन को दावेदार नहीं माना और अन्य दावेदारों को यह रकम दिए जाने को कहा गया था। यह फैसला आगे का रास्ता तय करेगा सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं जिनमें मृतक के पिता और बहन को मृतक का आश्रित माना और उन्हें मुआवजा प्रदान किया। यह फैसला भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं में मुआवजा केवल मृतक के पारंपरिक उत्तराधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सभी लोगों को मिलेगा जो उसकी आय पर निर्भर थे।  

हाईकोर्ट ने किया बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण, मां के साथ बेटियां तो अवैध हिरासत नहीं

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने कहा कि बेटियां अपनी मां के साथ हैं, तो अवैध हिरासत नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने साफ किया कि यह प्रकरण अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का है। राजधानी भोपाल अंतर्गत नवीन नगर निवासी लोकेश पटेल ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष से रूपेश चौरसिया सहित अन्य ने पत्नी नेहा पटेल व दो नाबालिग बेटियों को बंधक बना लिया है। लिहाजा, मुक्त कराया जाए। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान भोपाल पुलिस को दोनों नाबालिग बेटियों को पेश करने के निर्देश दिए थे। पुलिस ने दोनों नाबालिग बेटियों को उनकी मां के साथ न्यायालय में पेश किया। पत्नी नेहा ने हाई कोर्ट को बताया कि कुछ व्यक्तिगत मुद्दों के कारण वह याचिकाकर्ता पति के साथ रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने खुद ही दोनों बेटियों के साथ पति का घर छोड़ दिया है। वह अपने पति के घर नहीं जाना चाहती हैं। हाई कोर्ट ने अनावेदक पत्नी के जवाब को रिकॉर्ड में लेते हुए अपने आदेश में कहा कि यह अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का मामला है। याचिकाकर्ता को वैवाहिक मुद्दों के लिए कानून के अनुसार उचित कार्यवाही की स्वतंत्रता है।

हाईकोर्ट का आदेश बिना मान्यता के छात्रों को एडमिशन देने वाली यूनिवर्सिटी-कॉलेज पर केस दर्ज करो

जबलपुर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंट्रल लॉ कॉलेज के छात्रों को मान्यता न होने के चलते बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन ना होने के मामले में अब कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी गाज गिर सकती है। हाईकोर्ट ने इसे छात्रों के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए भोपाल कमिश्नर को जांच के लिए आदेशित किया है। बार काउंसिल में एनरोलमेंट ना होने का मामला जबलपुर हाईकोर्ट में व्योम गर्ग,रागिनी गर्ग, शिखा पटेल एवं अन्य के ने स्टेट वॉर काउंसिल में होने वाले स्टूडेंट्स के एनरोलमेंट नहीं किए जाने पर याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया कि स्टेट वॉर काउंसिल और यूनिवर्सिटी ने एफिलेटेड कॉलेज से लॉ की डिग्री प्राप्त किए जाने के बावजूद भी एनरोलमेंट नहीं किए। साथ ही याचिकार्ताओं ने हाईकोर्ट से मामले में दखल दिए जाने की गुहार लगाई। कोर्ट के द्वारा पिछली सुनवाई के दौरान लगाई गई थी फटकार इस याचिका में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने राज्य सरकार को याचिका में मौजूद कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी समेत उन सभी कॉलेजों पर जो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं उन पर कार्रवाई कर उसकी रिपोर्ट को अगली सुनवाई में पेश करने के निर्देश दिए गए थे। जिस पर राज्य सरकार के द्वारा रिपोर्ट पेश नहीं किए जाने पर कोर्ट ने फटकार लगाई। राज्य सरकार में उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना का नोटिस भी कोर्ट ने जारी किया। राज्य सरकार ने अपना पल्ला झाड़ा इस याचिका में हुई पूर्व की सुनवाई में सभी प्रतिवादियों की ओर से जवाब दाखिल किया गए। जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कॉलेज(सेंट्रल इंडिया लॉ कॉलेज) के द्वारा मान्यता शुल्क न दिए जाने की वजह से उसे मान्यता नहीं दिए जाने की बात कही गई है। जिस पर सरकार की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि इस पूरे मामले में संबंधित यूनिवर्सिटी के द्वारा गलती की गई है। यूनिवर्सिटी ने कॉलेज का वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया। जिस पर यूनिवर्सिटी ने यह तर्क दिया गया की बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा 2021-22 के लिए जारी कॉलेज की सूची में इस कॉलेज को व्यक्तिगत तौर पर अमान्य नहीं बताया गया था। कोर्ट ने बताया एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर अमान्य घोषित नहीं होने की वजह से इसे पोर्टल पर अपलोड किया गया और कॉलेज के द्वारा खुद को एफिलेटेड बताते हुए बच्चों के एडमिशन किए जाने का जवाब कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट के द्वारा सभी तर्कों के आधार पर इस पूरे मामले को एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर माना। हालांकि फिर भी राज्य की तरफ से खुद को गलत ना ठहराते हुए मामले से पल्ला झाड़ता की कोशिश की गई। चीफ जस्टिस की बेंच ने की सुनवाई इस याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने की। जिसमें सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए कि नियम अनुसार नए कॉलेजों को प्रोविजनल मान्यता 3 सालों के लिए एवं रेगुलर कॉलेज को यह मान्यता 5 सालों के लिए दी जा सकती है। इसके बाद भी वार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कई मामलों में 20 साल बाद भी पूर्वाधार पर मान्यता दी गई है। जिसे कोर्ट ने छात्रों के साथ सीधी तौर पर धोखाधड़ी बताया। उच्च शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में वीसी के माध्यम से प्रस्तुत हुए उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुपम राजन को भी कोर्ट ने फटकार लगाई। भोपाल कमिश्नर को जांच के आदेश कोर्ट ने कहा कि अब तक आप लोग क्या कर रहे थे। इसके साथ ही को कोर्ट ने भोपाल कमिश्नर को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए हैं और इस जांच में बार काउंसिल को भी भोपाल कमिश्नर की पूरी सहायता करने साथ ही जांच की रिपोर्ट को कोर्ट के समक्ष दो हफ्तों में पेश किए जाने के निर्देश जारी करते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की गई है। इसके बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है।

राजस्थान :हाईकोर्ट का फैसला, 13 साल की रेप पीड़िता को मिला गर्भपात का अधिकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने 13 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत दे दी है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि पीड़िता को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया तो उसे जीवन भर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी. इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जस्टिस सुदेश बंसल की अदालत ने महिला चिकित्सालय सांगानेर (जयपुर) की अधीक्षक को निर्देश दिया है कि मेडिकल बोर्ड गठित कर गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भ्रूण जीवित मिलता है तो उसे जिंदा रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी और उसका पालन-पोषण राज्य सरकार के खर्च पर होगा. वहीं, अगर भ्रूण जीवित नहीं पाया जाता है तो उसकी डीएनए रिपोर्ट के लिए टिश्यू को संरक्षित किया जाएगा. 13 साल की रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत पीड़िता की वकील सोनिया शांडिल्य ने बताया कि पीड़िता 27 हफ्ते 6 दिन की गर्भवती थी और उसके माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे. उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि इससे पहले भी देश में ऐसे कई मामलों में गर्भपात की अनुमति दी गई है, यहां तक कि 28 हफ्ते की गर्भवती पीड़िताओं को भी कोर्ट ने राहत दी है. पीड़िता के माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे पिछली सुनवाई में कोर्ट ने तीन विशेषज्ञों की मेडिकल रिपोर्ट मंगवाई थी, जिसमें बताया गया था कि गर्भपात में जोखिम जरूर है, लेकिन इसे किया जा सकता है. कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 का हवाला देते हुए कहा कि बलात्कार के कारण हुए गर्भ से पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंचेगी. इसलिए गर्भपात की अनुमति दी जाती है.

मध्य प्रदेश में 62 प्रजाति के पेड़ काटने पर जबलपुर हाईकोर्ट का बैन

जबलपुर  हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने 62  प्रजातियों के पेड़ों की कटाई और परिवहन के लिए प्रदान की गई छूट को निरस्त कर दिया है. चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत,जस्टिस एस ए धर्माधिकारी और जस्टिस विवेक जैन की लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि साल 2015 में जारी विवादित अधिसूचना और साल 2017 में किए गए संशोधन वन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है. इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 48-ए का उल्लंघन करते हैं. लार्जर बेंच ने विवादित अधिसूचना तथा उसमें किये गये संशोधन को निरस्त करते हुए ट्रांजिट पास नियम 2000 में छूट प्राप्त सभी पेड़ों की प्रजातियों पर तत्काल प्रभाव से लागू की जाये. लार्जर बैंच ने पेड़ों की कटाई को लेकर पुष्पा फिल्म समेत कई उदाहरण देते हुए कार्यपालिका को कड़ी फटकार लगाई. आम आदमी से समन्वय स्थापित करने के लिए वन विभाग ने साल 2015 और 2017 में 62 प्रजातियों पर टीपी की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। इसके बाद से मध्य प्रदेश में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चल रही थी। सड़क किनारे खेतों में खड़े आम, बबूल, शू-बबूल, इमली, जामुन, अमरूद सहित अन्य प्रजातियों के पेड़ों को धड़ल्ले काटा जा रहा था। साल 2024 में अवैध रूप से पेड़ काटने के 10 हजार 688 प्रकरण दर्ज हुए हैं। साल 2023 में 50 हजार 180 प्रकरण दर्ज हुए थे। यह स्थिति तब है। जब हाईकोर्ट साल 2019 में 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर स्थगन दे चुका है। जिस पर अब फैसला आया है। स्थगन के दौरान नहीं दिया ध्यान 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर 5 साल पहले स्थगन आया था, पर वन विभाग के अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तभी तो अभी तक सड़क किनारे या दूरदराज के इलाकों में निजी भूमि पर खड़े पेड़ों को काटा जा रहा था। अकेले भोपाल की बात करें तो आरा-मशीनों पर रोज 50 गाड़ियां लकड़ी आती हैं। प्रदेश के अन्य शहरों में भी ऐसे ही हालात हैं। 10 हजार के जुर्माने पर छोड़ रहे इस मामले में हालत यह है कि, पहले तो मैदानी वन अधिकारी और कर्मचारी लकड़ी परिवहन करने वालों को पकड़ ही नहीं रहे और जिन्हें पकड़ते हैं। उनका 10 हजार रुपए का चालान बनाकर छोड़ देते हैं। जबकि ऐसे मामलों में वाहन में मौजूद लकड़ी के बाजार मूल्य की दो गुनी राशि लेने का प्रावधान है। हाईकोर्ट में 2 लोगों ने की थी याचिका दायर गढ़ा जबलपुर निवासी विवेक कुमार शर्मा और एक अन्य की तरफ से दायर अलग-अलग याचिका में कहा गया था कि प्रदेश सरकार ने सितम्बर 2015 में जारी अधिसूचना के माध्यम से वृक्षों की 53 प्रजातियों को हटाने के अलावा मध्य प्रदेश परिवहन (वनोपज) नियम, 2000 के नियम 4(2) का प्रावधान भी हटा दिया गया है. जिसके परिणामस्वरूप निजी भूमि पर स्थित वृक्षों को काटने या परिवहन करने के लिए कोई अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है. लोगों के द्वारा उपयोग के लिए अधिक वृक्षों को काटने से पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ेगा. पर्यावरण संतुलन बिगड़ने से मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्कपाद बनाम भारत संघ के मामले में जारी आदेश के विपरीत है. लार्जर बेंच ने फैसले में पुष्पा फिल्म का किया जिक्र लार्जर बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए पुष्पा फिल्म का जिक्र किया. बेंच ने कहा कि “फिल्म पुष्पा में व्यापारियों और सिंडिकेट को उजागर किया है. जो आंध्र प्रदेश के शेषाचलम के घने हरे-भरे जंगलों में लाल चंदन के अवैध परिवहन, व्यापार और बिक्री में लगे हुए हैं. तस्करों और व्यापारियों का सिंडिकेट इतना प्रभाव और दबदबा बनाने लगता है कि पुलिस ,वन विभाग, नीति निर्माताओं और अंततः विधायकों तक शासन का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रह जाता. यह दर्शाता है कि कैसे वन उपज के अवैध व्यापार का परिवहन कर माफिया घने जंगलों में घुस सकता है और राज्य मशीनरी के साथ मिलीभगत करके जंगल की प्राकृतिक संपदा को लूट सकता है. कार्यपालिका वन उपज के ऐसे विक्रेताओं के प्रभाव और दबदबे के आगे झुक जाती है.” ‘एक जलाशय दस कुएं के समान और दस पुत्र एक पेड़ के समान’ लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा कि “1 जलाशय 10 कुएं के समान होते हैं और 10 जलाशय 1 पुत्र के समान होते हैं और 10 पुत्र 1 पेड़ के समान होता है. लार्जर बेंच ने 2019 से 2023 तक की एफएसआई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में 420 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध कमी आई है.” ‘ऐसे ही पेड़ कटे तो 50 साल में आधा वन क्षेत्र हो जाएगा खत्म’ इस आंकड़े में अति सघन वन क्षेत्र में 363 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि और इसी अनुपात में लगभग 630 वर्ग किलोमीटर की भारी और तीव्र कमी और मध्यम सघन वन एवं खुले वन क्षेत्र में लगभग 104 वर्ग किलोमीटर की कमी शामिल है. जिससे शुद्ध आंकड़ा 420 वर्ग किलोमीटर हो जाता है. ये आंकड़े इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि हर वर्ष वन क्षेत्र तेजी से कम हो रहे है. मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में कमी इसी गति से होती रही तो अगले 50 वर्षों में अधिसूचित वनों से वर्तमान वन क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा मिट जाएगा. ‘कोर्ट ने कहा इंदौर वन विभाग के पत्रों ने चौंकाया’ वर्तमान मामलों के 1500 से ज्यादा पेजों में दस्तावेज रिकॉर्ड का हवाला देते हुए लार्जर बैंच ने अपने आदेश में कहा है कि “पर्यावरणविद राजवीर सिंह हुरा और एनजीओ पर्यावरण प्रहरी के पदाधिकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जिसमें पेश किये गये दस्तावेजों ने हमें चौंका दिया. दस्तावेज में इंदौर के वन प्रभाग के अधिकारियों और वन विभाग के भीतर आंतरिक रूप से आदान-प्रदान किए गए पत्राचार शामिल हैं. वन संरक्षक इंदौर द्वारा अप्रैल 2017 में वन मंडल अधिकारी, इंदौर को संबोधित पत्र में बड़े पैमाने पर हरे-भरे और फलों से लदे पुराने पेड़ों की अवैध कटाई और इंदौर की मंडी में भारी मात्रा में उनके व्यापार का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा यह भी कहा गया कि रोजाना लगभग 100-150 वाहन बाजारों में 1000-1500 टन लकड़ी और वन उपज अवैध रूप लेकर पहुंच रहे हैं. … Read more

हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया, शहडोल संभाग आयुक्त को लगाई फटकार

जबलपुर.  मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. इतना ही नहीं उमरिया की रहने वाली माधुरी तिवारी के जिला बदर करने का आदेश भी निरस्त कर दिया है. दरअसल, जिला बदर करने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसके साथ ही शहडोल संभागायुक्त को भी फटकार लगाई है. पूरा मामला 2024 का है. दरअसल, उमरिया कलेक्टर ने माधुरी तिवारी के खिलाफ जिला बदर का आदेश जारी किया गया था. बताया जा रहा है कि माधुरी पर 6 आपराधिक मामले दर्ज थे. इनमें से 2 धारा 110 के तहत थे. फिर 2 मामले मारपीट और 2 एनडीपीएस से जुड़ा केस था. हालांकि किसी भी मामले में महिला को सजा नहीं हुई थी. फिर जिला बदर के आदेश को माधुरी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. कोर्ट ने क्यों रद्द किया आदेश जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकल बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई. इसके बाद कोर्ट ने जिला बदर का आदेश भी निरस्त कर दिया है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शहडोल संभागायुक्त अपने विवेक का प्रयोग करें. डाक घर की ओर से काम नहीं करें. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि कलेक्टर ने एसएसओ के बयान के आधार पर आदेश जारी कर दिया था. जांच में सामने आया कि माधुरी को 1 एनडीपीएस के केस में महज 1 दूसरे आरोपी के बयान के आधारपर फंसाया गया था. उनके कब्जे से कोई प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं किया गया था. इतना ही नहीं एसएचओ ने भी माना कि महिला से किसी का कोई विवाद नहीं था. इतना ही नहीं पाली के किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा था कि माधुरी के यहां रहने से उन्हें कोई खतरा है. फिर हाईकोर्ट ने कलेक्टर और संभाग आयुक्त के आदेश को गलत बताया. फिर कलेक्टर पर जुर्माना भी लगाने का निर्देश दिया.

आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ी मुश्किलें, गिरफ्तारी वारंट जारी, कोर्ट के आदेशों का नहीं किया पालन

जबलपुर  आईएएस अधिकारी और मध्य प्रदेश लोकशिक्षण संचनालय की कमिश्नर शिल्पा गुप्ता की मुश्किलें बढ़ गईं हैं. कन्टैंप्ट ऑफ कोर्ट के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया है. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को 23 मार्च को कम्प्लाइंस रिपोर्ट के साथ कोर्ट में हाजिर होने के निर्देश दिए हैं. दरअसल जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता को 4 महीने पहले याचिकाकर्ताओं को शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन उन्होने कोर्ट के इस आदेश का पालन करना तो दूर अपना जवाब भी नहीं दिया. हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती परीक्षा में आरक्षित वर्ग के मैरिटोरियस उम्मीदवारों को उनकी चॉइस फिलिंग के मुताबिक शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन शिक्षा विभाग ने उन्हें ट्राइलब वैलफेयर विभाग में ही बरकरार रखा. ऐसे में उम्मीदवारों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनवाई की. आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ीं मुश्किलें कोर्ट को बताया गया कि आईएएस शिल्पा गुप्ता के खिलाफ हाईकोर्ट में कंटैंप्ट ऑफ कोर्ट के करीब 200 मामले लंबित हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि वो अदालत के आदेशों का पालन नहीं करतीं. ऐसे में हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ 10 हजार रुपयों का जमानती गिरफ्तारी वारेंट जारी कर दिया. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को ये आदेश दिया है कि वो 23 मार्च को कोर्ट के आदेश का पालन करने की रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट में हाजिर रहें.

60 साल के व्यक्ति ने पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट व जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई

भोपाल एक 60 साल के व्यक्ति ने अपनी पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट करने और जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई है। यह मामला फैमिली कोर्ट में चल रहा है। 30 साल से शादीशुदा यह जोड़ा पिछले 10 सालों से अलग रह रहा है। व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहता है, जबकि पत्नी अपनी तीन बेटियों और दामाद के साथ रहती है। दोनों घर आदमी के नाम पर हैं। 1995 में हुई इस शादी में अक्सर झगड़े होते रहते थे। आदमी सरकारी फैक्ट्री में काम करता था और पत्नी पापड़ बनाती थी। पत्नी और बच्चों ने घर से निकाल दिया एक दिन झगड़े के बाद पत्नी और बच्चों ने आदमी को घर से निकाल दिया। उनका कहना था कि शराब पीकर वह मारपीट और गाली-गलौज करता है। दो घर होने की वजह से वह आदमी अपनी मां के साथ दूसरे घर में रहने लगा। इसके बावजूद पत्नी और बच्चे उस पर नजर रखते थे। पत्नी ने अपने दामाद को बुर्का और सैंडल पहनाकर पति की जासूसी करने भेजा। पड़ोसियों ने दामाद को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले करने से पहले उसकी पिटाई कर दी। तलाक का केस दायर किया इस जासूसी की घटना के बाद आदमी ने तलाक का केस दायर कर दिया। फैमिली कोर्ट काउंसलर शैल अवस्थी इस केस को देख रही हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पहले वह तलाक के बारे में नहीं सोच रहा था। वह अपनी बुजुर्ग मां के साथ खुशी से रह रहा था। पत्नी ने पति से गुजारा भत्ता भी मांगा है। लंबे समय से चल रहा झगड़ा आदमी और उसकी पत्नी के बीच लंबे समय से अनबन चल रही थी। रोजमर्रा के झगड़ों ने उनके रिश्ते को कमजोर कर दिया था। शराब पीकर मारपीट करने का आरोप गंभीर है। पत्नी और बच्चों ने उसे घर से निकाल दिया।

हाईकोर्ट ने सूचना आयुक्त पर ठोका जुर्माना

जबलपुर जबलपुर में सूचना आयुक्त पर HC ने ठोंका 40 हजार रुपये का जुर्माना. आवेदक को 2 लाख 38 हजार की जानकारी मुफ्त देने के आदेश. हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना आयुक्त सरकार के एजेंट के रूप में काम ना करे. भोपाल के फ़िल्म मेकर नीरज निगम की याचिका पर HC ने दिया आदेश. आवेदक को 30 दिनों के अंदर नही दी गई थी RTI की जानकारी. 30 दिनों के बाद जानकारी के बदले आवेदक से मांगे गए थे 2 लाख 38 हजार रुपये. HC के आदेश के बाद भी सूचना आयुक्त ने ख़ारिज कर दी थी RTI अपील.

हाई कोर्ट ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये

जबलपुर  हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये हैं. युगलपीठ ने इसके अलावा वरिष्ठता सूची को संशोधित करते हुए याचिकाकर्ता महिला जज को सभी उचित लाभ दिए जाने के निर्देश भी जारी किए. सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट पर विवाद मामले के अनुसार वर्तमान में नीमच में पदस्थ महिला न्यायाधीश ने साल 2013 में हाई कोर्ट जबलपुर में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया “सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट की प्रतीक्षा सूची में वह पहले स्थान में थी. वह अनुसूचित जाति वर्ग की उम्मीदवार थी. अनुसूचित जाति वर्ग के दो अन्य वर्ग के अभ्यर्थियों को चयन किया गया. इस कारण पात्र होने के बावजूद उसका चयन नहीं हुआ.” इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया. हाई कोर्ट के आदेश पर महिला की नियुक्ति हाई कोर्ट के आदेश पर महिला को साल 2009 में नियुक्ति प्रदान की गयी. नियुक्ति प्रदान करने के बाद उन्हें वरिष्ठता व वेतन का लाभ नहीं मिला. युगलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए आदेश में कहा “यह निर्विवाद है कि रामसुजन वर्मा और रामानुज सोंधिया अनुसूचित जनजाति वर्ग नहीं थे. इसके बावजूद उनका चयनित अनुसूचित जाति वर्ग में किया गया. याचिकाकर्ता पद के लिए पात्र थी परंतु उनका चयन नहीं हुआ. गलत रूप से चयनित दोनों व्यक्ति को बाद में हटा दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में याचिकाकर्ता की कोई गलती नहीं थी.” महिला जज को अन्य लाभ भी देने के निर्देश युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश जारी करते हुए बकाया वेतन का 50 प्रतिशत राशि का भुगतान 4 सप्ताह में करने के आदेश जारी किए. इसके अलावा युगलपीठ ने संशोधित वरिष्ठता सूची जारी करते हुए वरिष्ठता के आधार पर सभी लाभ देने के भी आदेश जारी किये. याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर ने पैरवी की.

आदेश के बाद नहीं किया आरआरसी का निष्पादन, भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानतीय वारंट जारी

भोपाल /जबलपुर  मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है. साथ ही व्यक्तिगत रूप से तलब किया है. हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवा सके. एकलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई 12 मार्च को निर्धारित की है. आदेश के बाद भी बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई नहीं याचिकाकर्ता प्रताप भानु सिंह की तरफ से दायर अवमानना याचिका में कहा गया “रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण मध्य प्रदेश ने कलेक्टर भोपाल के माध्यम से 23,26,363 रुपये प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत ब्याज के साथ बिल्डर के खिलाफ आरसीसी अक्टूबर 2020 में जारी की थी. कलेक्टर भोपाल द्वारा 3 साल का समय गुजर जाने के बावजूद बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया गया.” इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की. कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा हाई कोर्ट ने जुलाई 2023 में कलेक्टर भोपाल को 3 माह में आरसीसी का निष्पादन करवाने के आदेश जारी किये थे. हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल ने निर्धारित समय सीमा में आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया. इस कारण अवमानना याचिका दायर की गयी. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अवमानना याचिका फरवरी 2024 में दायर की गयी थी. हाई कोर्ट के आदेश बावजूद कलेक्टर भोपाल ने आरआरसी के निष्पादन करने की कार्रवाई नहीं की. एकल पीठ ने भोपाली कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति के लिए जमानती वारंट जारी किया. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता कपिल दुग्गल तथा अधिवक्ता ध्रुव वर्मा ने पैरवी की.

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा एमपी हाईकोर्ट का फैसला, कहा- गवाह की कोई न्यूनतम उम्र नहीं

भोपाल /नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चे की गवाही भी किसी अन्य गवाह की तरह ही मान्य है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला खास इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की बच्ची की गवाही को आधार बनाया, जिसने अपनी मां की हत्या होते देखी थी। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि गवाह के लिए कोई न्यूनतम उम्र नहीं होती और बच्ची के बयान को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह 7 साल की है। मां की हत्या, बच्ची की गवाही से पिता को उम्रकैद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के बयान की जांच सावधानी से करनी चाहिए क्योंकि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने एमपी हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने बच्ची के बयान को खारिज कर दिया था और आरोपी को बरी कर दिया था। गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं- SC सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एविडेंस एक्ट में गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं है। इसलिए, बच्ची की गवाही को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर बच्चा गवाही देने के लिए सक्षम है, तो उसकी गवाही किसी अन्य गवाह की तरह ही मानी जाएगी। लेकिन, अदालत को बच्चे के बयान की जांच बहुत ध्यान से करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चे जल्दी बहकावे में आ सकते हैं। ‘बच्ची की गवाही को सिरे से खारिज नहीं कर सकते’ सर्वोच्च कोर्ट ने आगे कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि छोटी-सी गलती पर बच्चे की गवाही को खारिज कर दिया जाए। बल्कि, बच्चे के बयान को बहुत सावधानी से परखा जाना चाहिए। इस मामले में, सर्वोच्च कोर्ट ने बच्ची की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए उसके पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक मिसाल का काम करेगा। ये निर्णय बच्चों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों की आवाज भी सुनी जाए और उन्हें न्याय मिले। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में बच्चों की भूमिका को मजबूत करता है।

दिल्ली पुलिस के SHO CL मीणा की वकीलों ने पिटाई की, पुरानी रंजिश का मामला

नई दिल्ली  राजधानी दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में  सुबह दिल्ली पुलिस के SHO की पिटाई होने की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैली। मगर अधिकारिक तौर पर मामले में किसी ने कुछ नहीं कहा। यहां तक की पीड़ित खुद भी कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। सबसे पहले अपने पाठकों को बताने जा रहा है कि आखिरकार उस दिन कोर्ट में हुआ क्या था। सान्ध्य टाइम्स संवाददाता के हाथ इस मामले में दर्ज हुई एफआईआर की कॉपी लगी है। जिसमें SHO की आपबीती दर्ज है। SHO मारपीट में जमीन पर गिरे एफआईआर के मुताबिक, 54 वर्षीय पीड़ित इंस्पेक्टर सीएल मीणा इन दिनों सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के कमला मार्केट थाने में तैनात हैं। सोमवार सुबह वह साल 2014 में शकरपुर थाने में दर्ज हुए धोखाधड़ी के एक मामले में सुनवाई पर आए थे। कोर्ट नंबर 32 में सुनवाई के बाद वह करीब 11:30 बजे वापस लौट रहे थे। आरोप है कि वह अभी कोर्ट कॉम्प्लेक्स बिल्डिंग, पोस्ट ऑफिस के सामने पहुंचे ही थे कि तभी उन्हें आरोपी वकील और उसके साथियों ने घेर लिया। मुख्य आरोपी उनका हाथ खींचकर उन्हें घसीटने लगा और कहने लगा आज हम तुझे छोड़ेंगे नहीं। इसके बाद सभी ने SHO को लात-घूंसे मारने शुरू कर दिए। इस दौरान कई वकील उन्हें घेरे खड़े रहे। वकीलों ने पिटाई कर उनकी वर्दी तक फाड़ दी। SHO जमीन पर गिर गए। फिर भी आरोपी रुके नहीं। आरोपी ने पर्स भी छीना आरोपी उन्हें पीटते रहे और गालियां देते रहे। मुख्य आरोपी ने उनका पर्स भी छीन लिया। जिसमें पीड़ित का आधार कार्ड, सीजीएचएस कार्ड, दिल्ली पुलिस का आईडी कार्ड और करीब सात हजार रुपये कैश थे। पीड़ित के दोनों मोबाइल भी वहां गिर गए। अब कुछ और वकील आए और उन्होंने SHO को भीड़ से बचाकर कोर्ट के गेट नंबर-4 से बाहर किया। एक वकील ने उनके दोनों मोबाइल लौटाए। वकील ने बोला, ये उसे जमीन पर पड़े मिले थे। इसके बाद SHO ने पुलिस कंट्रोल रूम को कॉल की। हेडगेवार अस्पताल में मेडिकल करवाया और फिर थाने में जाकर आरोपियों के खिलाफ शिकायत दी। जिस पर मुख्य आरोपी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई। SHO से पुरानी रंजिश वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि SHO की आरोपियों से कोई पुरानी रंजिश है। किसी गाड़ी को लेकर इनके बीच थाने में बहसबाजी हुई थी। उसी का बदला लेने के लिए मारपीट की गई। गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ है। मगर उन धाराओं में सात साल से कम सजा होने का प्रावधान है। इस कारण आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पुलिस बार को आरोपी के खिलाफ शिकायत देगी। वहीं इस पूरे मामले पर पीड़ित SHO से बातचीत करने का प्रयास किया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि मैं कुछ नहीं बोल पाउंगा।

अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है : हाई कोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसे तब तक व्यभिचार नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह किसी और मर्द के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाती है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने कहा कि व्यभिचार तभी होता है जब शारीरिक संबंध होते हैं। पति ने कोर्ट में दावा किया था कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करत है। ऐसे में वह मेंटिनेंस की हकदार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (5) और सीआरपीसी की धारा 125 (4) में कहा गया है कि अगर पत्नी पर व्यभिचार के आरोप सही साबित होते हैं तब ही उसे गुजारे भत्ते से वंचित किया जा सकता है। कोर्ट ने फैसले में कहा, व्यभिचार साबित करने के लिए शारीरिक संबंधों को सबित करना जरूरी है। अगर पत्नी किसी से प्यार करती है और शारीरिक संबंध नहीं रखती है तो इसे व्यभिचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। बता दें कि फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि पति को हर महीने 4 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देना होगा। पति वॉर्ड बॉय की तौर पर का करता था और महीने में 8 हजार उसकी इनकम है। पति ने हाई कोर्ट में याचिका फाइल की और दावा किया कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करती थी। कोरक्ट ने कहा कि सेक्शन 24 के तहत आदेश के बाद पत्नी को पहले से ही 4 हजार का गुजारा भत्ता मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अस्पताल से दिया गया सैलरी सर्टिफिकेट वेरिफाइ नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा, सैलरी सर्टिफिकेट पर इसे जारी करने का स्थान और तारीख ही नहीं दी गई है। ऐसे में कोर्ट के लिए यह निर्णय करना मुश्किल है कि यह सर्टिफिकेट सही है या फर्जी है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया था कि वह एक सक्षम व्यक्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कम इनकम इस बात का आधार नहीं हो सकता कि वह मेंटिनेंस नहीं देगा। अगर पति को पता था कि वह उसकी रोजाना की जरूरत भी नहीं पूरी कर सकता तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। उसे पत्नी की जिम्मेदारी उठाने के लिए कमाना चाहिए था। पति ने यह भी दावा किया था कि उसकी पत्नी ब्यूटी पार्लर चलाती है। कोर्ट ने कहा कि पति को 4 हजार रुपये का मासिक गुजारा भत्ता देना ही होगा।

राहत : हाईकोर्ट ने दी EWS के अभ्यर्थियों को 5 साल की छूट, अब 45 साल तक के अभ्यर्थी कर सकते हैं आवेदन

जबलपुर  मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों के पक्ष में राहतकारी आदेश जारी किया है। डबल बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2024 में उन्हें आयु सीमा में 5 साल की छूट प्रदान करने के अंतरिम आदेश दिया है। रीवा निवासी ने दायर की थी याचिका रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी और अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था। रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी। आरक्षित ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गयी है। याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी थी। क्या है EWS में उम्र की सीमा का मामला? दरअसल, रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी व अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था. रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी. वहीं ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गई थी. आयू सीमा में छूट की मांग याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अधिवक्ता धीरज तिवारी और ईशान सोनी ने तर्क दिया गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है। ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए। डबल बेंच ने सुनवाई पश्चात उक्त ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहतकारी अंतरिम आदेश जारी किए। युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तारीख 11 फरवरी है। कोर्ट के फैसले के बाद 45 की उम्र तक के ईडब्ल्यूएस अभ्यर्थी फॉर्म भर सकेंगे। कोर्ट में दिए गए ये तर्क याचिका में कहा गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है. याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई थी. याचिका में राहत चाही गई थी कि ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए. हजारों EWS कैंडिडेट्स को होगा फायदा युगल पीठ ने सुनवाई के बाद अपने अंतरिम आदेश में ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा में पांच साल की छूट प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं. इस आदेश के बाद 45 वर्ष तक के EWS कैंडिडेट भी शिक्षक चयन परीक्षा में शामिल हो सकेंगे, जिससे हजारों कैंडिडेट्स को फायदा होगा. युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता धीरज तिवारी व ईशान सोनी ने पैरवी की.

HC से IPS जीपी सिंह को राहत, अब केंद्रीय एजेंसी की जांच को निरस्त करने का आदेश दिया

 बिलासपुर. हाईकोर्ट ने आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ केंद्रीय एजेंसी की उस प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) को निरस्त करने का आदेश दिया है, जिसमें उन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। इसके साथ ही हाईकोर्ट चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र अगवाल की डिवीजन बेंच ने पहले जारी किए गए दोनों नोटिस को भी रद्द कर दिया है।बता दें कि नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने जीपी सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आईपीएस जीपी सिंह पर राजद्रोह और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया, तब उन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने अपनी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर संपत्ति बनाई है। इसी मामले में एसीबी के अलावा नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने धनशोधन अधिनियम के तहत आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ ईसीआईआर दर्ज किया था, जिसके बाद उन्हें नोटिस जारी कर उनकी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर अर्जित की गई संपत्ति का ब्यौरा मांगा था। जीपी सिंह ने राज्य सरकार की तरफ से दर्ज आपराधिक प्रकरणों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आय से अधिक संपत्ति सहित अन्य सभी मामलों को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली द्वारा दर्ज ईसीआईआर को निरस्त करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी।

कौन से कानून के तहत सीएम के कार्यक्रम में निगमायुक्त डीजल भरवाए? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सवाल

जबलपुर  मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री का सम्मान कार्यक्रम जबलपुर में रखा गया था, जिसमें बसों के डीजल का मामला कोर्ट पहुंच गया है. दरअसल, सीएम के सम्मान कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित की गई बसों में भरे गए डीजल का अबतक भुगतान नहीं किया गया है, जिसके बाद एक पेट्रोल पंप संचालक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. सीएम के कार्यक्रम के लिए 6 लाख का डीजल दरअसल, जबलपुर के आईएसबीटी बस स्टैंड के पास स्थित पेट्रोल पंप के संचालक सुगम चंद्र जैन ने ये याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया था कि 3 जनवरी 2024 को मुख्यमंत्री के सम्मान कार्यक्रम का आयोजन जबलपुर में किया गया था. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम के खाद्य अधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से आकर निर्देश दिए थे. उन्होंने कहा था कि निगमायुक्त ने उक्त निर्देश दिए थे. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में लगभग 6 लाख रु का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था. बिल भुगतान कराने के लिए की कई बार की मांग अगस्त 2024 में याचिकाकर्ता ने बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया. इसके अलावा कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान के संबंध में आदेश जारी किए गए थे, पर भुगतान नहीं हुआ. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से पूछा कि अधिग्रहित बस में डीजल भरने के लिए प्रशासन की ओर से पीओएल जारी किया गया था या नहीं? याचिकाकर्ता ने इसपर जवाब दिया कि सिर्फ मौखिक आदेश जारी किए गए थे. बिना पीओल कैसे भर दिया बसों में डीजल? एकलपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश में कहा है कि बिना किसी प्राधिकरण के याचिकाकर्ता ने बसों में कैसे डीजल भरा? इसके साथ ही कोर्ट ने संयुक्त कलेक्टर, जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से एसोसिएशन व उसके सदस्य को पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कलेक्टर से मांगा जवाब कोर्ट ने इसके अलावा कलेक्टर से जवाब मांगा है कि किस कानून में यह लिखा है कि निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री की रैली में लगी बसों में डीजल भरवाए? एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि प्रथम दृष्टया यह सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर गोलमाल का मामला प्रतीत हो रहा है. इस संबंध में एकलपीठ ने जिला कलेक्टर को हलफनामे में जवाब पेश करने के आदेश जारी किए हैं. एकलपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पैरवी की. पेट्रोल पंप से भरवाया गया छह लाख का डीजल याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आइएसबीटी बस स्टैंड के समीप याचिकाकर्ता का पेट्रोल पंप है। मुख्यमंत्री के सम्मान में तीन जनवरी, 2024 को जबलपुर में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम आयुक्त ने खाद्य अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से भेजा था। अधिग्रहित बसों में लगभग छह लाख रुपये का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था। डीजल का भुगतान न होने के कारण उन्होंने निगमायुक्त से संपर्क किया। निगमायुक्त द्वारा बताया गया कि संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी के कार्यालय की ओर से बसों में डीजल भरवाने कहा गया था। याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं याचिकाकर्ता ने अगस्त, 2024 को बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया। इसके बाद कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान करने के संबंध में लिखित निर्देश दिए गए थे। शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त ने पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने का निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में जिला कलेक्टर शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें। इसके अलावा यह भी बताएं कि किस कानून में निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में लगी बसों में डीजल भरवाए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा।

SC ने बांग्लादेशियों उनके देश भेजने के बजाय सुधार गृहों में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने भारत में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर सवाल उठाया है। अदालत ने इन्हें उनके देश भेजने के बजाय पूरे भारत के सुधार गृहों में लंबे समय तक हिरासत में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस बात पर बल दिया कि जब किसी अवैध बांग्लादेशी प्रवासी को पकड़ा जाता है और विदेशी अधिनियम 1946 के अंतर्गत उसे दोषी ठहराया जाता है, तो उसकी सजा पूरी होने के तुरंत बाद उसे निर्वासित किया जाना चाहिए। पीठ ने पूछा कि विदेशी अधिनियम के अंतर्गत अपनी सजा पूरी करने के बाद फिलहाल कितने अवैध आप्रवासियों को विभिन्न सुधार गृहों में हिरासत में रखा गया है? शीर्ष अदालत ने लगभग 850 अवैध प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर चिंता व्यक्त की। एससी ने 2009 के परिपत्र के खंड 2 (v) का पालन करने में सरकार की विफलता पर सवाल उठाया, जो निर्वासन प्रक्रिया को 30 दिनों में पूरा करने का आदेश देता है। न्यायालय ने इस बात पर भी केंद्र से ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से क्या कदम अपेक्षित हैं। ‘सजा पूरी होने के बाद सुधार गृहों में कैद’ माजा दारूवाला बनाम भारत संघ का मामला 2013 में कलकत्ता उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में भेजा गया था। यह मामला मूल रूप से 2011 में शुरू हुआ जब एक याचिकाकर्ता ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला, जिन्हें उनकी सजा पूरी होने के बाद भी पश्चिम बंगाल सुधार गृहों में कैद रखा गया था। शीर्ष अदालत में स्थानांतरित होने से पहले कलकत्ता एचसी ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया था। पीठ ने कहा कि ये प्रथाएं मौजूदा दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं, जो तेजी से निर्वासन प्रक्रियाओं की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 फरवरी को होगी।

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया

सिंगरौली मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया है। इनमें सिंगरौली कलेक्टर, SDM देवसर, सरई तहसीलदार और नायब तहसीलदार (सर्किल खनुआ) शामिल हैं। हाइकोर्ट ने एक सप्ताह में सभी अधिकारियों से हलफनामा पेश करने को कहा है। अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक के माध्यम से दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जबलपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत और न्यायाधीश विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया है। ये है पूरा मामला इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में पैरवी कर रहे अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक ने बताया कि ईएमआईएल बंधा कोल माइंस ने पचौर बंधा सहित कुछ अन्य गांवों के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए लामीदह में जिस शासकीय भूमि को चिन्हित किया है उस भूमि पर कई दर्जन आदिवासी समाज के लोग निवासरत हैं जिन्हें  प्रशासन के द्वारा बिना मुआवजा दिए जबरन हटाया जा रहा है। अधिवक्ता ब्रहमेंद्र पाठक की ओर से पूर्व में इस मामले में दायर जनहित याचिका में दिए गए तर्क को सही मानते हुए उच्च न्यायालय ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए चिन्हित की गई सिंगरौली जिले की लामीदह गांव की शासकीय भूमि में निवासरत लोगों को हटाने की कार्यवाही पर रोक लगाते हुए कलेक्टर को 4 सप्ताह के भीतर मामले का निराकरण करने के लिए निर्देशित किया था।

भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट से जुड़ेगा मामला, सुनवाई अब सीजेआई करेंगे

धार  हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर चल रहे विवादों की सभी कार्यवाही पर रोक लगाने का फैसला सुनाया था। इस हालिया फैसले के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने  आदेश दिया कि एमपी के धार जिले में भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर पर चल रही कानूनी लड़ाई को पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाए और सुना जाए। इस मामले में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई कर रही है। पिछले साल अप्रैल में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को साइट का सर्वेक्षण करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि बिना उसकी अनुमति के सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए। इसने एएसआई को परिसर में ऐसी कोई भी खुदाई नहीं करने का भी निर्देश दिया, जिससे संरचना के चरित्र में बदलाव हो सकता है। सुनवाई में ये हुई चर्चा सुनवाई की शुरुआत में, जस्टिस हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि इस मामले को पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इन याचिकाओं में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने किसी भी पूजा स्थल के स्वामित्व और शीर्षक को चुनौती देने वाले नए मुकदमे दायर करने या अगले आदेश तक विवादित धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण का आदेश देने पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था। वकील के तर्क पर क्या बोली पीठ? हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह विवाद पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित नहीं है और उन्होंने न्यायालय से मामले की सुनवाई कर निर्णय देने का आग्रह किया। पीठ ने संकेत दिया कि यदि वह मामले की सुनवाई करती है, तो उसके आदेश का उल्लंघन करने के लिए अवमानना नोटिस जारी करना होगा। न्यायालय ने कहा कि याचिका के साथ दायर की गई तस्वीरों से पता चलता है कि उसके आदेश के बावजूद खुदाई की गई और पक्षों को पहले अवमानना नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह मुख्य न्यायाधीश से निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दे। यह है विवाद 11वीं शताब्दी का यह स्मारक हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का केंद्र है। हिंदुओं का मानना है कि यह देवी वाग्देवी का मंदिर है, जो देवी सरस्वती का अवतार हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। 11 मार्च को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एएसआई को छह सप्ताह में भोजशाला परिसर का ‘वैज्ञानिक सर्वेक्षण’ करने का निर्देश दिया था।

मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबर निराधार: हाई कोर्ट

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश एस.के. कैत के आधिकारिक बंगले से मंदिर हटाए जाने के दावे वाली खबरों का खंडन किया है। प्रशासन ने यह साफ किया है कि ऐसी खबरें पूरी तरह से आधारहीन, झूठी और गुमराह करने वाली हैं। कोर्ट ने इसे न्याय के काम में दखल मानते हुए गलत कहा है, मीडिया और लोगों से ऐसी बातें न फैलाने की अपील भी की है। यह भी कहा है कि ऐसी बातें न्यायपालिका की इज्जत को ठेस पहुंचाने की कोशिश है। मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबरें झूठी इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल धर्मिंदर सिंह ने एक बयान में मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाई जाने वाली खबरों को झूठा ठहराया है। उन्होंने बताया है कि लोक निर्माण विभाग ने भी पुष्टि की है, की मुख्य न्यायाधीश की आवास पर कोई भी मंदिर नहीं था। इस तरह की अफवाहें और खबरें सिर्फ और सिर्फ जनता को गुमराह करने की कोशिश करती हैं, और न्यायपालिका की छवि को खराब करने के लिए फैलाई जा रही है। हाई कोर्ट ने अपने बयान में कहा है कि न्यायपालिका के खिलाफ झूठी और गुमराह बातें फैलाने का प्रयास न केवल कानून व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के बंगले के अंदर मंदिर की खबरें झूठी, भ्रामक और निराधार, रजिस्ट्रार जनरल ने किया खंडन रिपोर्ट्स का खंडन इन निराधार रिपोर्ट्स का सिर्फ और सिर्फ एक ही उद्देश्य लगता है, और वह है न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना। जबकि हमारी न्यायपालिका निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ न्याय देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसी तरह अदालत ने मीडिया संगठनों और आम जनता से अपील की है कि वे ऐसी अपमानजनक और झूठी जानकारी को फैलाने से बचें और न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने में मदद करें।

हाईकोर्ट में अहमदााबद पूर्व सैनिक ने लगाई गुहार, इस्कॉन मंदिर के कुछ पुजारियों पर लगाए गंभीर आरोप

अहमदाबाद  एक पूर्व सैनिक ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके अपनी बेटी की कस्टडी की मांग की है। सेवानिवृत्त सैनिक पिता ने कोर्ट में कहा है कि मेरी बेटी सरखेज-गांधीनगर हाईवे पर स्थित इस्कॉन मंदिर के पुजारियों के कब्जे में है। पुजारियों ने उसे कथित तौर पर ब्रेनवॉश किय है। उसे राेज ड्रग्स दिया जाता है। पूर्व सैनिक की अपील पर गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद पुलिस को नोटिस जारी करके लड़की को हाजिर करने को कहा है। पिता का आरोप है कि बेटी पिछले छह महीने लापता हो गई थी। याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक ने कहा है कि बेटी को जान होने की आशंका भी व्यक्त की है। ब्रेनवॉश करने का आरोप याचिकाकर्ता पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण आवेदन की सुनवाई के दौरान कोर्ट में कहा कि मेरी बेटी नियमित रूप से दर्शन और पूजा-भक्ति के लिए एसजी हाईवे पर प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर जाती थी। उसी दौरान वह इस्कॉन मंदिर के उक्त पुजारियों के संपर्क में आई। इसी दौरान इस्कॉन मंदिर के पुजारियों ने पूरी तरह से ब्रेनवॉश किया और उसे प्रभावित किया। पिता ने आरोप लगाया है कि इसके बाद बेटी मंदिर के पुजारी के साथ 23 तोला सोना और 3.62 लाख रुपये नकद लेकर घर से भाग गई। पहले दिया शादी का आदेश पिता का आरोप है मंदिर के पुजारी सुंदर मामा ने याचिकाकर्ता की बेटी की शादी अपने एक शिष्य से करने का आदेश दिया था। हालांकि याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्हें अपनी बेटी की शादी अपने समाज में करनी है। उसके बाद उन्हें धमकियां मिलीं और अंततः उनकी बेटी को मथुरा से एक शिष्य के साथ भगा दिया गया। पिता का आरोप है कि पुजारी कहते थे कि वह कृष्ण रूप हैं। 600 लड़कियां गोपियां हैं। याचिकाकर्ता पिता ने यह भी आरोप लगाया कि इस्कॉन मंदिर में लड़कियों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है और धर्म के नाम पर उन पर अत्याचार किया जा रहा है। परिवार से टूट जाता है मोह पूर्व सैनिक ने याचिका में कहा है कि सुंदर मामा सहित पुजारी मंदिर में आने वाले भक्तों का इस हद तक ब्रेनवॉश करते हैं कि गुरु माता-पिता से अधिक महत्वपूर्ण हैं और मंदिर में रहने वाली 600 लड़कियाँ गोपियाँ हैं और उन्हें यह मानने के लिए मजबूर किया जाता है कि वे कृष्ण रूप हैं। पिता का आरोप है कि उनकी बेटी मंदिर के पुजारी अवैध हिरासत और कारावास में हैं। बेटी को नियमित रूप से ड्रग्स और मारिजुआना दिया जा रहा है। पिता का आराेप है कि बार-बार शिकायत करने और गुहार लगाने के बावजूद पुलिस द्वारा उनकी बेटी को ढूंढने के लिए कोई प्रभावी प्रयास नहीं किया। पुलिस को हाईकोर्ट की नोटिस पिता की याचिका पर सुनवाई करने के बाद हाईकोर्ट की जस्टिस संगीता और जस्टिस संजीव ठाकर की पीठ ने राज्य सरकार, शहर के पुलिस आयुक्त, मेघानीनगर पुलिस स्टेशन के पीआई को नोटिस जारी करके कहा है कि लड़की को हाईकोर्ट में पेश किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इसके अलावा इस्कॉन मंदिर के प्रबंधन से जुड़े लोगों को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले में आगे की सुनवाई 9 जनवरी को तय की गई है। इस्कॉन की तरफ से इस मामले में कोई भी बयान जारी नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनसीआर क्षेत्र में राजस्थान के हिस्से में भी पटाखों पर पूर्ण बैन होना चाहिए

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की तरह ही यूपी और हरियाणा को पटाखे पर पूर्ण बैन लगाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएस ओका की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पटाखे पर बैन तभी प्रभावी हो सकेगा, जब एनसीआर राज्यों में भी इसी तरह का बैन लागू किया जाए। कोर्ट में दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि पटाखे पर पूरे साल के लिए बैन किया है। कोर्ट ने कहा कि एनसीआर इलाके में आने वाले राजस्थान के हिस्से में भी इसी तरह का बैन होना चाहिए। हम फिलहाल उत्तर प्रदेश और हरियाणा को निर्देश देते हैं कि दिल्ली द्वारा 19 दिसंबर, 2024 को लगाए गए प्रतिबंध की तरह वे भी प्रतिबंध लागू करें। कोर्ट में एमसी मेहता की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त आदेश पारित किया। जस्टिस ओका की अगुवाई वाली बेंच दिल्ली और एनसीआर में एयर पल्यूशन से निपटने के उपाय को लेकर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पटाखों पर साल भर के लिए बैन, जीआरएपी और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के अमल को लेकर विचार हुआ। दिल्ली सरकार का क्या पक्ष? दिल्ली सरकार की ओर से सीनियर वकील शादान फरासत ने अदालत को बताया कि दिल्ली में पटाखों के निर्माण, स्टोरेज और बिक्री के साथ वितरण और उपयोग पर व्यापक बैन लगाया गया है। लेकिन ये उपाय तभी प्रभावी हो सकेंगे, जब एनसीआर राज्य भी ऐसे बैन लगाएं। क्योंकि इन राज्यों से पटाखे दिल्ली में लाए जा सकते हैं। अदालत को बताया गया कि राजस्थान के एनसीआर इलाकों में पटाखों पर पूर्ण बैन लगाया गया है। साथ ही, हरियाणा में ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की इजाजत दी गई है। अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 5 के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए, दिल्ली सरकार ने एनसीटी दिल्ली में सभी प्रकार के पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री, ऑनलाइन मार्केटिंग प्लैटफॉर्म के माध्यम से डिलिवरी और फोड़ने पर तत्काल प्रभाव से पूरे वर्ष के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। अदालत ने कहा कि एक बार के लिए हम सुझाव देते हैं कि दिल्ली मॉडल का पालन किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2025 को होगी, जिसमें पटाखों के प्रतिबंध पर अतिरिक्त निर्देशों पर विचार किया जाएगा। क्या है मामला सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध लागू करने में कमी पर चिंता व्यक्त की थी। 12 दिसंबर को कोर्ट ने दिल्ली सरकार और एनसीआर राज्यों को पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री, वितरण, और उपयोग पर पूरे वर्ष के लिए प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि यह प्रतिबंध वायु और ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है। पहले कोर्ट ने यह भी कहा था कि कोई भी धर्म प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को बढ़ावा नहीं देता और नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को ध्यान में रखते हुए प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का आह्वान किया था।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अंकिता और हसनैन के अंतरधार्मिक विवाह को वैध करार दिया, विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह करने का अधिकार

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने  एक प्रेमी जोड़े को अंतरधार्मिक विवाह करने की इजाजत दे दी है। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत जोड़े को विवाह करने की अनुमति दी है। बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि दोनों की शादी बिना किसी विवाद के संपन्न कराई जाए। शादी के बाद उन्हें एक महीने तक सुरक्षा मुहैया कराई जाए। इसके बाद पुलिस अधीक्षक उनकी सुरक्षा के संबंध में विचार कर निर्णय लें। इंदौर की एक युवती और जबलपुर के एक पुरुष ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि उन्होंने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह के लिए कलेक्टर जबलपुर कार्यालय में आवेदन किया था। हालांकि, युवती के पिता ने हाईकोर्ट में सिंगल जज बेंच के आदेश को रोकने के लिए अपील दायर की थी, जिसमें 12 नवंबर को उन्हें शादी करने की अनुमति दी गई थी और युवती को अपने फैसले पर विचार करने के लिए शेल्टर होम में रहने के लिए भी कहा गया था। अपील में कहा गया था कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत की गई शादी मुस्लिम एक्ट के तहत मान्य नहीं होगी। मुस्लिम समाज में अग्नि और मूर्ति की पूजा करने वालों से शादी मान्य नहीं है। मुस्लिम एक्ट में चार शादियों को मान्यता दी गई है, जबकि हिंदू मैरिज एक्ट में सिर्फ एक शादी को मान्यता दी गई है। अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शादी पर रोक लगा दी थी। डिवीजन बेंच ने गुरुवार को अपील पर सुनवाई के बाद इसे खारिज कर दिया और अपने आदेश में कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 के तहत हर जोड़े को धर्म, जाति या समुदाय से अलग विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है। हाईकोर्ट ने कहा, “पर्सनल लॉ एक्ट विशेष विवाह अधिनियम पर बाध्यकारी नहीं है। विवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। विवाह का विरोध करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। पुलिस को शादी के एक महीने बाद तक सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा के संबंध में निर्णय लेने का आदेश दिया गया है।” इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मैरिज रजिस्ट्रार को बिना किसी देरी या बाधा के विवाह की कार्यवाही आगे बढ़ाने का भी निर्देश दिया।

हाई स्कूल शिक्षक भर्ती पर जबलपुर हाईकोर्ट 19 दिसंबर को करेगा अगली सुनवाई

जबलपुर मध्यप्रदेश में हाई स्कूल शिक्षक भर्ती पर जबलपुर हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार 2 दिनों में भर्ती नियमों में सुधार करे। साथ ही कोर्ट कोर्ट को सूचित भी करे। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्रदेश में करीब 18 हजार हाई स्कूल शिक्षकों के रिक्त पदों में से 12 हजार पदों पर नियुक्तियां की गईं हैं लेकिन इनमें उम्मीदवारों के सेकेंड डिवीजन क्राईटेरिया को लेकर बड़ा विरोधाभास है। कोर्ट ने कहा-काउंसिलिंग नए सिरे से करवाई जानी चाहिए मामले में सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने राज्य सरकार को सेकेंड डिवीजन मार्क्स क्राईटेरिया का नियम 2 दिनों के भीतर सुधारकर कोर्ट को सूचित करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि ऐसे उम्मीदवार जिन्हें क्राइटेरिया के मुताबिक मिनिमम मार्क्स होने पर भी सिलेक्ट नहीं किया गया, क्या उन्हें बचे हुए पदों पर भर्ती किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो 50 फीसदी से कम मार्क्स वाले सभी उम्मीदवारों की भर्ती रद्द कर हाईस्कूल शिक्षक भर्ती की काउंसिलिंग नए सिरे से करवाई जानी चाहिए। मामले पर अगली सुनवाई 19 दिसंबर को तय कर दी है। इसलिए लगाई गई थी याचिका दरअसल, शिक्षा विभाग ने 448 ऐसे उम्मीदवारों को सेकेंड डिवीजन मानकर भर्ती किया है जिनके ग्रेजुएशन में मार्क्स 45 से 50 फीसदी के भीतर हैं। दूसरी तरफ ऐसे कई उम्मीदवार हैं जिन्हें थर्ड डिवीजन मानकर भर्ती नहीं किया है। जबकि ग्रेजुएशन में उनके भी मार्क्स 45 से 50 फीसदी के बीच हैं। एनसीटीई यानी नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन के नियमों के मुताबिक उम्मीदवारों की एलिजिबिलिटी यानी पात्रता, ग्रेजुएशन में सेकेंड डिवीजन तय की गई थी, लेकिन कई यूनिवर्सिटी 45 से 50 फीसदी अंक लाने वालों को सेकेंड डिवीजन तो कई यूनिवर्सिटी थर्ड डिवीजन मानती हैं। ऐसे में जब शिक्षा विभाग ने अंकों की जगह सिर्फ मार्क शीट में सेकेंड या थर्ड डिवीजन देखकर भर्तियां की हैं तो पूरी भर्ती प्रक्रिया सवालों में है।

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में जूनियर नहीं बनेंगे डीन, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इंदौर राजधानी भोपाल और प्रदेश के 18 मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती को लेकर चल रहे विवाद में हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने साफ तौर पर कहा कि किसी सीनियर प्रोफेसर को जूनियर के तहत काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट का सरकार से सवाल     दरअसल, हाई कोर्ट ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लिए वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश पांडे को डीन नियुक्त करने का आदेश भी दिया। दरअसल, डॉ. पांडे की डीन पद पर सीधी भर्ती को चुनौती देने वाली याचिका पर 10 दिसंबर को सुनवाई हुई थी। इस मामले में जस्टिस शुक्ला ने सरकार से पूछा कि डॉ. पांडे से जूनियर प्रोफेसर डॉ. अशोक यादव को डीन का प्रभार क्यों सौंपा गया, जबकि सरकार कोई ठोस जवाब या दस्तावेज पेश नहीं कर पाई। हाई कोर्ट ने वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश पांडे को एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर का डीन नियुक्त करने का आदेश भी दिया। दरअसल, प्रो. डॉ. वेद प्रकाश पांडे की इंदौर में डीन के पद पर सीधी भर्ती से नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर 10 दिसंबर को सुनवाई हुई। इसमें जस्टिस शुक्ला ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि डॉ. पांडेय से जूनियर डॉ. अशोक यादव को किस आधार पर डीन का प्रभार सौंपा गया। कोर्ट ने यह पाया कि सरकार ने कोई तथ्य या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। अन्य मेडिकल कॉलेजों की सुनवाई 7 जनवरी को सरकार के वकील ने तर्क दिया कि प्रोफेसरों की गोपनीय रिपोर्ट डीन नहीं, बल्कि कमिश्नर व संचालक लिखते हैंं। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज पेश नहीं दे सके। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब 7 जनवरी तक मांगे हैं। अन्य मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती के मामलों की सुनवाई भी इसी दिन निर्धारित की गई है। 7 जनवरी को फिर सुनवाई वहीं इस पर सरकार के वकील ने तर्क दिया कि डीन की गोपनीय रिपोर्ट कमिश्नर और संचालक लिखते हैं, न की प्रोफेसर। हालांकि, इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब 7 जनवरी तक देने को कहा है, और अन्य मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती से जुड़े मामलों की सुनवाई भी उसी दिन होगी।

हाईकोर्ट ने सुनाई ख़ास सजा, दोषी युवक को रोपने होंगे स्वदेशी प्रजाति के 50 पौधे

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने न्यायालय के विरुद्ध अनर्गल टिप्पणी वाली पोस्ट इंटरनेट मीडिया पर डालने के आपराधिक अवमानना प्रकरण में आरोपित युवक को दोषी पाते हुए सजा बतौर 50 स्वदेशी प्रजाति के पौधे रोपने के आदेश दिए हैं। इसके लिए 15 दिन की समय-सीमा निर्धारित की है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा है कि वन विभाग के अनुविभागीय अधिकारी आरोपित को बताएंगे कि वह कहां पर किस प्रजाति के पौधे लगा सकता है। इसके साथ ही युवक को चेतावनी दी कि वह भविष्य में ऐसी गलती न दोहराए। मुरैना जिले के संबलगढ़ न्यायालय का मामला प्रकरण मुरैना जिले के संबलगढ़ न्यायालय द्वारा हाई कोर्ट को भेजे गए पत्र से संबंधित था। इसमें अवगत कराया गया था कि राजस्थान के जयपुर जिले के त्रिवेणी नगर निवासी आरोपित राहुल साहू के विरुद्ध प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अभिषेक कुमार के न्यायालय में भरण-पोषण का मामला विचाराधीन था। राहुल की पत्नी पूजा राठौर वादी है। सात मई, 2024 को पूजा ने न्यायालय को सूचित किया कि राहुल ने उसके और न्यायालय के विरुद्ध अनर्गल टिप्पणी वाली पोस्ट सोशल मीडिया पर अपलोड की है। पूजा ने उस पोस्ट का साक्ष्य भी न्यायालय में प्रस्तुत किया। युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा न्यायालय ने इस जानकारी को अभिलेख पर लेकर आरोपित राहुल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया, लेकिन न तो आरोपित की ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया और न ही वह उपस्थिति हुआ। इस रवैये को पर आपराधिक अवमानना प्रकरण चलाने के लिए न्यायालय ने हाई कोर्ट को पत्र भेज दिया। प्रकरण हाई कोर्ट में सुनवाई में आया तो कोर्ट रूम में उपस्थित अधिवक्ता आदित्य संघी से युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा। अधिवक्ता ने कहा कि सुझाव दिया कि आरोपित की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसे सुधारात्मक रूप से प्रतीकात्मक सजा दी जा सकती है। इसके अंतर्गत समाज सेवा करना बेहतर होगा। मसलन, भंवरताल पार्क में पौधारोपण कराया जाए। हाई कोर्ट को यह सुझाव पसंद आया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आदेश जारी कर 11 जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के तबादले कर दिए

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने देर रात आदेश जारी कर 11 जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के तबादले कर दिए हैं। इसके साथ ही साथ जजों के फैमिली कोर्ट के खाली पदों में भी ट्रांसफर हुए हैं। यह तबादला भारत के संविधान के अनुच्छेद 235 और मध्य प्रदेश सिविल कोर्ट अधिनियम, 1958 की धारा 8 की उपधारा (1) के तहत दिए गए अधिकारों का प्रयोग करते हुए किया गया है। इस आदेश के तहत कुल 18 जजों का तबादला किया गया है। इन जजों को मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रिक्त पदों पर पदस्थापित किया गया है, जिसमें 11 डिस्ट्रिक्ट जज और 7 फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज शामिल हैं। जिला सेशन कोर्ट में इन जजों का हुआ तबादला     अयाज मोहम्मद, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पन्ना को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर तबादला किया गया।     नवीर अहमद खान, अध्यक्ष, मध्य प्रदेश राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल, भोपाल को VIII जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, हरदा नियुक्त किया गया।     सुरेखा मिश्रा, XIII जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर से III जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, विदिशा बनाई गईं।     रघुवेंद्र सिंह चौहान, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अमरपतन (सतना) को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सोनकच्छ (देवास) भेजा गया।     शिप्रा पटेल, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अस्था (सीहोर) को XXI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर के रिक्त पद का दायित्व सौंपा गया।     शिवलाल केवट, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सांवर (इंदौर) को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जैसिंहनगर (शहडोल) बनाया गया।     उषा तिवारी, अतिरिक्त न्यायाधीश, प्रथम जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जावरा (रतलाम) के न्यायालय से जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नसरुल्लागंज (सीहोर) भेजा गया।     उमेश कुमार पटेल, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अस्था (सीहोर) अब XXX जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर कोर्ट संभालेंगे।     कपिल सोनी, IV जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, खरगोन (मंडलेश्वर) से XV जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, ग्वालियर बने हैं।     श्वेता तिवारी, XXI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जबलपुर को V जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,के प्रभार के साथ रतलाम भेजा गया।     विजय कुमार पांडेय (जूनियर), III जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, शहडोल अब II जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सिरोंज (विदिशा) बनाए गए हैं। फैमिली कोर्ट में रिक्त पदों पर 7 प्रिंसिपल जजों की पदस्थापना की गई है     रामा जयंत मित्तल, विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी (पी.ए.) अधिनियम, सीधी अब माया विश्वालाल की जगह अतिरिक्त प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, इंदौर होंगी।     मनोज कुमार लढिया, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, निवास, जिला मंडला अब फैमिली कोर्ट, अनूपपुर के प्रिंसिपल जज होंगे।     अरविंद कुमार (जैन) जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, छतरपुर को फैमिली कोर्ट, रायसेन का प्रिंसिपल जज बनाया गया है।     अरुण प्रताप सिंह, XVI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जबलपुर अब फैमिली कोर्ट, उमरिया के प्रिंसिपल जज होंगे।     रामा जयंत मित्तल, अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, इंदौर को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, इंदौर बनाया गया है।     अवधेश कुमार (गुप्ता), प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, डिंडोरी अब प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, शाजापुर होगा।     मुन्नालाल राठौर को जिला सेशन जज निवारी टीकमगढ़ से डिंडोरी फैमिली कोर्ट का प्रिंसिपल जज बनाया गया है।

जन्मदिन की पार्टी में हंगामा करने चार युवकों को अनूठी सजा दी गई। प्रतिबंधात्मक कार्रवाई

इंदौर  जन्मदिन की पार्टी में हंगामा करने चार युवकों को अनूठी सजा दी गई। प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में एसीपी कोर्ट में पेश हुए चारों से चार घंटे साफ-सफाई करवाई गई। जमानती धाराओं में प्रकरण दर्ज होने के कारण युवक थाने से जमानत पर छूट गए थे। द्वारकापुरी थाना अंतर्गत परिवहन नगर में सोमवार रात दो पक्षों में झगड़ा हुआ था। चंदननगर में रहने वाले रिजवान, रेहान, अमान और शिब्बू एक युवती की जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे और आधी रात को हंगामा किया। रहवासियों द्वारा आपत्ति लेने पर युवकों ने चाकू और डंडों से हमला कर दिया। वाहनों में की थी तोड़फोड़ रहवासियों ने आरोप लगाया कि दो व चार पहिया वाहनों में भी तोड़फोड़ की गई। हिंदू संगठन के सक्रिय होने के बाद पुलिस ने प्रकरण दर्ज किया, लेकिन कमजोर धाराओं के कारण जमानत मिल गई। पुलिस ने रिजवान, रेहान, अमान और शिब्बू पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की और एसीपी कोर्ट के माध्यम से जेल भेज दिया। जमानत न होने पर आरोपितों के स्वजन एसीपी के समक्ष पहुंचे और रिहाई की अपील की। दोपहर को एसीपी ने सशर्त जमानत दी। एसीपी ने पाबंद करते हुए आदेश दिया कि उन्हें कार्यालय में हाजिरी देना होगी। इसके बाद आरोपितों ने चार घंटे तक परिसर में साफ-सफाई की। चारों तरफ झाड़ू भी लगाई और घास काटी। लसूड़िया थाना क्षेत्र में गुरुवार रात दो नशेड़ी युवकों की शामत आ गई। युवतियों के साथ अश्लील हरकत करने पर भीड़ ने उनकी सार्वजनिक रूप से पिटाई कर दी। घटना का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर बहुप्रसारित हो रहा है। भीड़ की पिटाई से युवकों के कपड़े तक फट गए। हालांकि शिकायत नहीं मिलने के कारण पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस के मुताबिक घटना गुरुवार देर रात स्कीम-78 में ब्रोडेड कैफे के समीप की है। नशे की अवस्था में दो युवकों 21 वर्षीय नीरज गुलसईया और 19 वर्षीय आयुष सिंह सोलंकी दोनों निवासी रघुनंदन बाग कालोनी ने युवतियों का हाथ पकड़ लिया। अभद्रता देखकर लोग इकट्ठा हो गए अपशब्दों का प्रयोग किया और विवाद करने लगे। युवतियों से अभद्रता करते हुए देखकर लोग इकट्ठा हो गए और युवकों को पकड़ लिया। जैसे ही युवतियों ने चप्पल से पिटाई शुरू की, भीड़ भी हाथ साफ करने में जुट गई। लोगों ने दोनों को सड़क पर लेटाकर खूब पीटा। आरोपित नशे में थे और भाग भी नहीं पा रहे थे। युवतियों ने बताया युवक उनके आगे आकर गिरे थे। चोट का पूछा तो उनसे ही अभद्रता करने लग गए। टीआई तारेश सोनी के मुताबिक दोनों युवकों को गिरफ्तार कर लिया है।

लेफ्टिनेंट कर्नल पर शोषण का आरोप लगाने वाली महिला मेजर को कोर्ट से राहत नहीं, जानें-क्या है पूरा मामला

 जबलपुर मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की जबलपुर हाई कोर्ट (Jabalpur High Court) पीठ ने शोषण के आरोप लगाने वाली महिला मेजर की याचिका को खारिज कर दिया. महिला मेजर को कोर्ट से किसी तरह की राहत मिलती हुई नजर नहीं आ रही है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और उसके नतीजे याचिकाकर्ता के खिलाफ हैं. ऐसे में अदालत इसमें कोई दखल नहीं देगी. महिला मेजर ने दायर की थी ये याचिका महिला मेजर ने अपनी याचिका में कहा था कि 2020 में उनकी पोस्टिंग सीओडी में हुई थी. जनवरी 2021 से 8 नवंबर 2021 तक एडवांस मटेरियल मैनेजमेंट कोर्स के दौरान वहां तैनात लेफ्टिनेंट कर्नल ने अभद्र टिप्पणियां की और अनुचित व्यवहार करते हुए उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की थी. उनका कहना था कि उनकी शिकायत करने पर भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई. समिति ने दिया था ये फैसला महिला मेजर ने अपनी याचिका में शिकायत की थी कि 7 अप्रैल 2021 की शाम एक परीक्षा के दौरान, जब फैकल्टी रूम में केवल लेफ्टिनेंट कर्नल मौजूद थे, उन्होंने फिर से याचिकाकर्ता के साथ अनुचित बातें की. इसके बाद महिला ने आंतरिक शिकायत समिति को घटना की जानकारी दी. जांच के बाद 31 दिसंबर 2021 को समिति ने महिला मेजर को ही दोषी ठहराते हुए जांच के आदेश दिए थे. कोर्ट ने महिला की याचिका की खारिज इस पूरे मामले की चार्जशीट को याचिकाकर्ता महिला ने आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली. इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा. यहां सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष डिप्टी सॉलिसिटर जनरल पुष्पेंद्र यादव ने रखा. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने महिला मेजर की याचिका खारिज कर दी और किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया.    

पूर्व IAS अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर को HC से मिली बड़ी राहत, रायपुर सेंट्रल जेल में ट्रांसफर का आदेश

बिलासपुर  पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर को रायपुर सेंट्रल जेल से अन्य जेल ट्रांसफर करने का विशेष न्यायाधीश का फैसला हाईकोर्ट ने पलट दिया है। जेल अधीक्षक रायपुर के आवेदन पर विशेष अदालत ने दोनों को कांकेर और अंबिकापुर जेल शिफ्ट कर दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच में हुई सुनवाई में अदालत से दोनों को वापस रायपुर सेंट्रल जेल ट्रांसफर करने के निर्देश दिए हैं। 2 हजार करोड़ के शराब घोटाले मामले में पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर को ईडी ने गिरफ्तार किया था। तब से दोनों रायपुर सेंट्रल जेल में बंद है। उन पर रायपुर जेल में वीआईपी सुविधाएं लेने का आरोप है। इसके अलावा सिंडिकेट बनाकर जेल में शांति भंग का भी आरोप दोनों पर लगा कर रायपुर जेल अधीक्षक ने विशेष न्यायाधीश ईडी निधि शर्मा की अदालत में आवेदन दिया था। आवेदन के आधार पर दोनों को अलग-अलग कांकेर और जगदलपुर जेल शिफ्ट करने का आदेश दिया गया था। आदेश के बाद दोनों को वहां शिफ्ट कर दिया गया था। आदेश को दोनों ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें उन्होंने बताया था कि उनके मामले की सुनवाई रायपुर में चल रही है इसलिए पेशी में उन्हें उपस्थित होना पड़ता है और उनके अधिवक्ता भी रायपुर जेल में उनसे वकील मुलाकात करते हैं साथ ही उनका परिवार भी रायपुर में निवास रथ है जिससे परिवार के लोगों को भी जेल में मिलने में सुविधा होती है। जेल अधीक्षक के आवेदन पर रायपुर विशेष न्यायाधीश ने बगैर उनके पक्ष सुने एकपक्षीय आदेश जारी किया गया है। सुनवाई के बाद जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच ने दोनों को तत्काल रायपुर जेल शिफ्ट करने के निर्देश दिए। आबकारी घोटाला मामले में आरोपी अनवर ढेबर को अंबिकापुर और अनिल टुटेजा को कांकेर जेल शिफ्ट किया गया था, जबकि ए.पी. त्रिपाठी को जगदलपुर जेल भेजा गया था। कस्टम मिलिंग घोटाले के आरोपी मार्कफेड के पूर्व एमडी मनोज सोनी को दंतेवाड़ा जेल और कोयला घोटाले के मुख्य सरगना सूर्यकांत तिवारी को जगदलपुर जेल ट्रांसफर किया गया था।

मुस्लिम कानून के तहत, ससुर को अपने मृत बेटे की विधवा को गुजारा भत्ता देने की जरूरत नहीं – हाईकोर्ट

भोपाल  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ससुर की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है और बड़ी टिप्पणी की है. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने दोहराया है कि मुस्लिम कानून के तहत, ससुर को अपने मृत बेटे की विधवा को वित्तीय सहायता करने की जरूरत नहीं है. ऐसा करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और सत्र अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता ससुर को उसकी मृत्यु के बाद अपनी बहू को मासिक गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था. शिवपुरी की अदालत ने ससुर के खिलाफ दिया था फैसला दरअसल, शिवपुरी की एक अदालत ने आदेश दिया था कि ससुर अपनी विधवा बहू को हर महीने 3000 रुपये का गुजारा भत्ता देंगे. पूरा मामला शरीफ बनाम इशरत बानो का है. इशरत की शादी साल 2011 में 14 जून को हुई थी. साल 2015 में 30 जून को शरीफ की मौत हो गई. इसके बाद इशरत ने अपने ससुर बशीर खान के खिलाफ शिवपुरी की मजिस्ट्रेट कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत केस दर्ज कराया. बहू ने मांगे थे 40 हजार रुपए प्रतिमाह इशरत ने अपने ससुर से 40 हजार रुपये हर महीने गुजारा भत्ता देने की मांग की थी. साल 2021 में 9 फरवरी को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अपने फैसले में बशीर खान को अपनी विधवा बहू को 3,000 रुपये हर महीने देने को कहा. इसके बाद बशीर खान ने एडीजे कोर्ट में अपील की, जहां 2022 में 21 जनवरी को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया. इसके बशीर खान हाईकोर्ट पहुंचे. बशीर के वकील अक्षत जैन ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक एक पिता को अपने बेटे की विधवा को भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. क्या कहता है हिंदू मैरिज एक्ट हालांकि हिंदू मैरिज एक्ट में यह कानून ठीक उलटा है. एक्ट के तहत विधवा बहू अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है. लेकिन इसके लिए कुछ शर्त भी हैं. जैसे कि विधवा बहू अपनी कमाई या संपत्ति से अपना भरण-पोषण ना कर पाती हो. विधवा बहू के पास कोई संपत्ति ना हो. विधवा बहू के पति, पिता या माता की संपत्ति हो. विधवा बहू का कोई बेटा या बेटी हो. हिंदू महिला को दूसरी शादी के बाद भी संपत्ति का हक इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुताबिक अगर विधवा बहू अपने ससुराल में नहीं रहती है तो भी वह ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है. इसके अलावा आपको बता दें कि हिंदू विधवा महिला यदि दूसरी शादी भी कर लेती है तो उसका अपने पहले पति की संपत्ति का पूरा अधिकार होगा. कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया था. कोर्ट का कहना था कि अगर कोई विधवा महिला दोबारा शादी करती है तो अपने मृत पति के संपत्ति से उसका हक खत्म नहीं होगा.

मनमानी फीस वसूली और फर्जी पुस्तकों के मामले में हाईकोर्ट ने सरकार को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का दिया आदेश

जबलपुर प्रशासन द्वारा मनमानी फीस वसूली और फर्जी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की जांच में सख्त कार्रवाई न किए जाने के मामले में आधा दर्जन निजी स्कूल प्रबंधनों ने जबलपुर हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष शासन की ओर से स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई। युगलपीठ ने रिपोर्ट को संतोषजनक नहीं पाया और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता रॉयल सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लिटिल किंगडम, स्मॉल वंडर्स, नचिकेता हायर सेकेंडरी स्कूल, स्टेम फील्ड इंटरनेशनल सहित अन्य निजी स्कूल प्रबंधनों की ओर से दायर अपील में कहा गया है कि मनमानी फीस वृद्धि और फर्जी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की जांच जबलपुर जिला प्रशासन द्वारा की जा रही है। पूर्व में कई स्कूल प्रबंधनों के खिलाफ मामले दर्ज कर प्राधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। स्कूल प्रबंधन जांच में सहयोग करने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें आशंका है कि दीवाली अवकाश के दौरान प्रशासन उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकता है। युगलपीठ ने याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान आरोपी स्कूल संचालकों और स्टाफ के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई न करने के आदेश दिए थे। युगलपीठ ने याचिकाकर्ता स्कूल प्रबंधन को निर्देशित किया है कि वे जिला समिति की जांच में पूरा सहयोग करें और अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत करें। साथ ही युगलपीठ ने जिला प्रशासन से कार्रवाई के संबंध में जवाब मांगा था। प्रशासन की रिपोर्ट को संतोषजनक न पाते हुए युगलपीठ ने उक्त आदेश जारी किए। याचिका पर अगली सुनवाई 13 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने पैरवी की।

हिंदू युवती-मुस्लिम युवक की शादी के मामले में हाई कोर्ट की अंतरिम रोक, DGP-कलेक्टर को भेजा नोटिस

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हिन्दू-मुस्लिम कपल को झटका दिया है। हाई कोर्ट ने एकलपीठ के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी जिसमें एक हिंदू युवती और मुस्लिम युवक की शादी की अनुमति दी गई थी। इस मामले पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत, जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने इस मामले प्रदेश के डीजीपी, जबलपुर के कलेक्टर, मैरिज ऑफिसर और एसपी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। दरअसल, एकल पीठ के आदेश के खिलाफ युवती के पिता इंदौर निवासी हीरालाल राठौर ने डिवीजन बेंच में अपील पेश की। अपीलाकर्ता ओर से अधिवक्ता अशोक ललवानी ने दलील दी कि युवक ने लड़की का ब्रेनवॉश कर दिया है। उसे ‘लव-जिहाद अभियान’ के तहत निशाना बनाया गया है। उन्होंने कहा कि युवती को उसके परिवार वालों से मिलने नहीं दिया जा रहा है। यह दलील भी दी गई कि मुस्लिम लॉ के तहत मूर्ति पूजक या अग्नि की पूजा करने वाले से शादी अवैध कहलाती है। 22 अक्टूबर को इंदौर की हिंदू युवती अंकिता और जबलपुर के मुस्लिम युवक हसनैन अंसारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा की मांग की थी। दोनों की ओर से कोर्ट में कहा गया था कि वे दोनों एक-दूसरे को पिछले 4 साल से जानते हैं। पिछले एक साल से वे लिव-इन में रह रहे हैं और अब दोनों शादी करना चाहते हैं। दोनों ने पुलिस सुरक्षा की मांग की है। युवती का कहना है कि परिवार वाले उसे जबरन अपने साथ ले जाना चाहते हैं और दोनों की जान को खतरा है। एकलपीठ ने युवती को 11 नवंबर तक शास्त्री ब्रिज स्थित राजकुमारी बाई बाल निकेतन भेजने के निर्देश दिए थे। वहीं युवक को फिलहाल किसी अज्ञात स्थान पर रखने और स्थिति अनुकूल होने पर उसके घर भेजने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि इस दौरान दोनों एक दूसरे से संपर्क नहीं करेंगे। कोर्ट ने कहा था कि 12 नवंबर को युवती को नारी निकेतन से मैरिज रजिस्ट्रार के यहां ले जाएं और शादी के पहले उसके बयान दर्ज कराएं।

नशीली सिरप की तस्करी करने वाले आरोपियों को न्यायालय ने कड़ी सजा सुनाई, 10 -10 साल सश्रम कारावास

रीवा रीवा शहर में नशीली सिरप की तस्करी करने वाले आरोपियों को न्यायालय ने कड़ी सजा सुनाई है। आरोपी शहर में नशीली प्रतिबंधित सिरप की सप्लाई करते थे। नशे की खेप लाने के लिए कार का इस्तेमाल करते थे।  फिर शहर के कबाड़ी मोहल्ले स्थित अपने गोदाम से नशे का नेटवर्क संचालित करते थे। मामले में आरोपियों को सजा विशेष सत्र न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट केशव सिंह की अदालत से सुनाई गई है। लोक अभियोजन ने बताया कि नशा तस्कर इरशाद खान और अनुराग त्रिपाठी को 10-10 साल की सजा सुनाई गई है। इसके साथ ही एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इरशाद लंबे समय से नशा तस्करी में जुड़ा हुआ था, पुलिस ने इसके घर में भी एक बार छापा मारा था। जहां से भारी मात्रा में नशीली कफ सिरप तहखाने से बरामद हुई थी। पुलिस को सूचना मिली थी 25 मई 2023 को कुछ लोग नशे की खेप लेकर रीवा के करहिया मार्ग से होकर लाडली लक्ष्मी मार्ग के रास्ते रीवा शहर में प्रवेश करेंगे। पुलिस ने लाड़ली लक्ष्मी मार्ग पर चेकिंग अभियान शुरू किया। वहां पुलिस को एक अल्टो कार आती हुई नजर आई। पुलिस ने कार की चेकिंग की कार के दौरान अंदर से 2160 सीसी नशीली कफ सिरप बरामद की। पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत मामले को कोर्ट में पेश किया। जहां सुनवाई के बाद दोनों आरोपी अनुराग त्रिपाठी और इरशाद को 10 साल की सजा सुनाई। एक लाख रुपए का जुर्माना ना अदा करने पर अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। वर्तमान में जिस तरीके से पूरा रीवा शहर में नशा छाया हुआ है। उसको देखकर माना जा रहा है यह नशे के खिलाफ एक बड़ा प्रहार है।

‘LMV लाइसेंस धारक 7500 KG तक वजन वाले ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने का अधिकार ‘, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली वाणिज्यिक वाहन चालकों को राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि हल्के मोटर वाहन (एलएमवी) का लाइसेंस धारक व्यक्ति 7,500 किलोग्राम तक वजन वाले परिवहन वाहन चला सकता है। प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का फैसला बीमा कंपनियों के लिए एक झटका है। बीमा कंपनियां उन दावों को खारिज कर देती थीं, जो एक विशेष वजन के परिवहन वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं से संबंधित होते थे और चालक कानूनी शर्तों के अनुसार उन्हें चलाने के लिए अधिकृत नहीं थे। पीठ के लिए सर्वसम्मति से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय ने कहा कि ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जो यह दर्शाते हों कि देश में सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि के लिए एलएमवी लाइसेंस धारक जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि एलएमवी लाइसेंस धारक, जो अधिकतम समय वाहन चलाते हैं, न्यायालय से जवाब मांग रहे हैं और उनकी शिकायतों को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति रॉय के अलावा पीठ में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा, न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। पीठ ने 21 अगस्त को इस जटिल कानूनी मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जब केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी थी कि मोटर वाहन (एमवी) अधिनियम, 1988 में संशोधन के लिए विचार-विमर्श ‘‘लगभग पूरा हो चुका है।’’ शीर्ष अदालत ने केंद्र से कानून में संशोधन की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करने को कहा। पीठ ने उस कानूनी पहलू का समाधान किया कि क्या हल्के मोटर वाहन (एलएमवी) का लाइसेंस धारक व्यक्ति 7,500 किलोग्राम तक वजन वाले परिवहन वाहन चलाने का भी हकदार है। इस मुद्दे ने एलएमवी लाइसेंस धारकों द्वारा चलाए जा रहे परिवहन वाहनों से जुड़े दुर्घटना मामलों में बीमा कंपनियों की तरफ से दावों के भुगतान को लेकर विभिन्न विवादों को जन्म दिया है। बीमा कम्पनियां आरोप लगाती रही हैं कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) और अदालतें हल्के मोटर वाहन ड्राइविंग लाइसेंस के संबंध में उनकी आपत्तियों की अनदेखी करते हुए उन्हें बीमा दावों का भुगतान करने के लिए आदेश पारित करते हैं।  बीमा कम्पनियों ने कहा कि बीमा दावा विवादों पर निर्णय करते समय अदालतें बीमाधारक का पक्ष लेती हैं।    

सहकारी बैंक अब बीमा राशि और वाद व्यय के तौर पर एक-एक लाख किसानों चुकाने होंगे

 खरगोन  खरगोन का जिला सहकारी बैंक किसानों का समूह बीमा करने के बाद दावे के भुगतान के समय मुकर गया। उसने जिस बजाज एलियांज बीमा कंपनी से पॉलिसी ली थी, उसने भी किसानों को अपात्र बताकर राहत देने से इन्कार कर दिया। 26 किसानों ने 13 वर्ष तक कानूनी लड़ाई हासिल कर न्याय हासिल किया है। राज्य उपभोक्ता आयोग ने सहकारी बैंक और बीमा कंपनी दोनों को आदेश दिया है कि वे किसानों को बीमा राशि और वाद व्यय के तौर पर एक-एक लाख रुपये का भुगतान करें। यह है मामला। किसानों की ओर से पैरवी कर रही अधिवक्ता मोना पालीवाल ने बताया कि वर्ष 2006-07 में खरगोन के जिला सहकारी बैंक ने कृषक समूह बीमा योजना के तहत बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा किया था। इसके लिए किसानों के खाते से 563 रुपये का प्रीमियम काटा गया। यह बीमा पॉलिसी प्रतिवर्ष ऑटो रिन्युअल थी। इसके तहत यह उल्लेख था कि खातेदार किसानों के लिए जारी बीमा पॉलिसी 18 वर्ष से 59 वर्ष तक के आयु वालों खातेदार किसानों के लिए जारी की गई थी। इस दौरान अगर किसी किसान की मृत्यु हो जाती है तो उसके नॉमिनी को 75 हजार रुपये की बीमा राशि का भुगतान किया जाना था। वर्ष 2007 में भीकनगांव के सेल्दा गांव निवासी बीमित किसान रामलाल यादव की मौत हो गई। परिवार ने बैंक के पास बीमित राशि के लिए दावा किया। लेकिन बैंक ने कोई भुगतान नहीं किया। इस बीच कई बीमित किसानों की मौत के बाद बीमा दावे का भुगतान लटकाया गया। 2011 में किसानों के वारिसों ने जिला उपभोक्ता आयोग में मामला दायर कर बीमा राशि की मांग की। 2023 में जिला उपभोक्ता आयोग ने किसानों का दावा खारिज कर दिया। उनके आदेश में कहा गया कि बैंक ने अपात्र होने की वजह से किसानों का प्रीमियम बीमा कंपनी को भेजा ही नहीं था। ऐसे में उनका बीमा नहीं हुआ। किसानों ने उन्हें अपात्र ठहराने का विरोध भी नहीं किया था। ऐसे में उनको बीमित नहीं माना जा सकता। इस फैसले के खिलाफ किसान राज्य उपभोक्ता आयोग पहुंचे थे। बैंक और बीमा कंपनी का यह बहाना था सुनवाई के दौरान जिला सहकारी बैंक का कहना था कि कृषक समूह बीमा पॉलिसी 18 से 59 वर्ष तक के किसानों के लिए थी। जिन किसानों का बीमा दावा आया है, वे 59 वर्ष की सीमा पार कर चुके थे। वहीं बीमा कंपनी का कहना था कि बैंक ने उनको दावेदारों का प्रीमियम भेजा ही नहीं था। इसलिए वे उनको भुगतान करने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। इन दस्तावेजों से मजबूत हुआ किसानों का पक्ष     – सितम्बर 2008 में बैंक ने बीमा कंपनी को एक पत्र लिखकर लंबित दावों के निपटारे का अनुरोध किया था। इस पत्र में 52 किसानों की सूची थी, जिनकी मृत्यु के बाद भुगतान रुका हुआ था। इस सूची में किसानों का नाम था।     – बैंक ने किसानों की उम्र 59 वर्ष से अधिक होने के आधार पर अपात्र बताया था, लेकिन बैंक उनकी उम्र का कोई प्रमाण नहीं दे पाया, जिसके आधार पर उसने उन्हें उम्र सीमा पार कर लेना तय किया।     – 2012 में बैंक ने एक किसान को दिये लिखित जवाब में कहा था कि बीमा कंपनी ने क्लेम नहीं भेजा है। उसके मिलते ही बीमा राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। इससे साबित हुआ कि बैंक ने बीमा भेजा था।     – बीमित किसानों ने प्रीमियम कटने की रशीद, बैंक से हुए पत्राचार और मृत्यु प्रमाणपत्र आदि पेश किये। चार प्रतिशत ब्याज की दर से भुगतान का आदेश मामले की सुनवाई के बाद राज्य उपभोक्ता आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष एके तिवारी और सदस्य श्रीकांत पांडेय ने जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश अमान्य कर दिया। उन्होंने किसानों के पक्ष में निर्णय सुनाया और 26 किसानों द्वारा ली गई ऋण राशि 7500 रुपयों को चार प्रतिशत ब्याज की दर से दो महीने के भीतर भुगतान का आदेश दिया। इसके साथ ही तीन हजार रुपये की क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया।

पत्नी की हत्या के मामले में उसके पति को आजीवन कठोर कारावास

 खंडवा  खंडवा जिले के ग्रामीण अंचल में अपनी पत्नी की दराती से हत्या करने वाले पति को अब आजीवन जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ेगा। खालवा थाना क्षेत्र में हुई इस घटना में आरोपी को अपर सत्र न्यायाधीश, तहसील हरसूद ने ढाई साल पुराने इस मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही उसे 1,000 रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया गया है। खंडवा जिले के हरसूद तहसील न्यायालय ने पत्नी की हत्या करने वाले दुलीचंद पिता कैलाश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दुलीचंद, जो सिरपुर थाना खालवा का निवासी है, ने अपनी पत्नी को पेट और हाथ में दराती मारकर उसकी हत्या कर दी थी। उसे भारतीय दंड संहिता (भादवि) की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा दी गई है। इस मामले में अभियोजन की ओर से पैरवी सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी अनिल चौहान ने की थी। पति ने पेट पर किया था वार अभियोजन अधिकारी अनिल चौहान ने बताया कि मृतका ने मृत्यु पूर्व दिए गए बयान में कहा था कि वह ग्राम सिरपुर में रहकर घरेलू कामकाज के साथ मजदूरी करती थी। 16 मई की रात को वह अपने परिवार के साथ खाना खाकर सो रही थी। उसके सास-ससुर अगले कमरे में सो रहे थे और वह अपने पति दुलीचंद और अपनी बेटी के साथ अंदर के कमरे में सो रही थी। इस दौरान उसके दो बच्चे मौसी के घर इंदौर गए हुए थे। उसी रात करीब 8:45 बजे उसके पति ने दराती से उसके पेट पर वार किया। इसके अलावा, उसने उसके बाएं हाथ की कोहनी, दाहिने कंधे और गले के पास भी दराती से वार किया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं। वह चिल्लाई, तो उसके सास-ससुर अंदर आए और उन्होंने पुलिस को सूचना दी। मृतका ने बताया कि उसका पति पहले भी उससे विवाद करता था और उस रात उसने उसे जान से मारने की कोशिश की। चोटों के कारण बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात के खिलाफ अपने विचार रखे थे, HC ने दे दी 29 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत

मुंबई बॉम्बे हाई कोर्ट ने 14 साल की एक रेप पीड़िता को मेडिकल बोर्ड के ओपीनियन के खिलाफ 29 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत दे दी है। जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात के खिलाफ अपने विचार रखे थे। जस्टिस सारंग कोटवाल और नीला गोखले की बेंच ने कहा, पीड़िता की सुरक्षा और इच्छा किसी अन्य चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बता दें कि पीड़िता की प्रेग्नेंसी 24 सप्ताह की सीमा को पार कर चुकी थी। इसके बाद पीड़िता की मां ने हाई कोर्ट का रुख किया। पीड़िता के मां-बाप दिहाड़ी मजदूर हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि एक जानने वाले शख्स ने ही जुलाई में उसके साथ रेप किया था। 1 अक्टूबर को भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धारा और पॉक्सो के तहत केस दर्ज किया गया था। उस वर्क वह 27 हफ्ते की प्रेग्नेंट थी। 9 अक्टूबर को डॉक्टरों के बोर्ड ने पाया कि 19.1 हफ्ते के बाद भ्रूण में कोई समस्या नहीं थी। बोर्ड ने कहा कि अगर नाबालिग का गर्भपात किया जाता है तो उसके स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। ऐसे में फिजिकली और मेंटली फिट रहने के लिए गर्भपात करवाना सही नहीं है। वहीं पीड़िता की मां के वकील ने कोर्ट में कहा कि प्रेग्नेंसी पूरी होने में अभी 8 से 9 सप्ताह का वक्त है। ऐसे में संभव है कि बच्चा स्वस्थ और जीवित पैदा हो। उन्होंने पैदा होने वाले बच्चे को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि उसके स्वस्थ्य रहने की भी संभावना कम है। जजों ने इस बात पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि अगर प्रेग्नेंसी बनाए रखने से पीड़िता के स्वास्थ्य को खतरा है तो गर्भपात सही है। कोर्ट ने यह भी देखा कि पीड़िता गरीब परिवार से है और अभी बच्चे की परवरिश भी उसके लिए मुश्किल काम है। ऐसे में वह भी गर्भपात करवाने के ही पक्ष में है। जजों ने कहा, पीड़िता की सुरक्षा सबसे बड़ा निर्णायक बिंदु है। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिए हैं कि अगर बच्चा जिंदा पैदा होता है तो उसकी परवरिश का इंतजाम किया जाए और फिर किसी को गोद दे दिया जाए।

ट्रांसपोर्ट कंपनी पर कोर्ट ने लगाया एक करोड़ से अधिक राशि का जुर्माना

भोपाल दिसंबर 2018 में इंदौर भोपाल हाईवे पर एक निजी बस ने स्कॉर्पियो गाड़ी को टक्कर मारी थी. इस हादसे में गाड़ी में सवार महिला व बाल विकास परियोजना के अधिकारी रंजीत धर्मराज की मौके पर मौत हो गई थी. जिसके बाद परिजनों ने न्याय के लिए न्यायलय का रुख किया था. अब 5 साल बाद इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है. कंपनी परिजनों को एक करोड़ से अधिक राशि का करें भुगतान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश खंडेलवाल ने सुनवाई के दौरान कहा कि रंजीत धर्मराज महिला व बाल विकास विभाग में परियोजना अधिकारी के पद पर पदस्थ थे और अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से इंदौर से भोपाल जा रहे थे. इसी दौरान रास्ते में सोनकच्छ के पास वर्मा ट्रेवल्स की बस ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी. इस हादसे में उनकी मौके पर ही मौत हो गई. इस मामले में कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए परिजनों को एक करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि देने के नोटिस जारी किया है. न्यायालय ने कहा कि गलती बस का संचालन कर रही निजी कंपनी की है. इस स्थिति में क्षतिपूर्ति के रूप में बीमा कंपनी परिजनों को भुगतान करें. बिना परमिट इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी निजी कंपनी की बस बता दें कि जब अधिकारी रंजीत धर्मराज की स्कॉर्पियो गाड़ी को वर्मा बस ने टक्कर मारी थी, उस दौरान बस में परमिट नहीं था और परमिट के इस बस का संचालन किया जा रहा था. इतना ही नहीं रूट परमिट ना होने के बाबजूद ये बस इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी.

धार कलेक्टर सहित दो अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी …

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले के कलेक्टर प्रियांक मिश्र और जिला पंचायत के मुख्य तत्कालीन कार्यपालन अधिकारी शृंगार श्रीवास्तव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर यह आदेश जारी किया गया है। इस मामले में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रसन्ना भटनागर ने बताया कि याचिकाकर्ता मिथुन चौहान ग्राम पंचायत नालछा जिला धार में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर पदस्थ था। 25 फरवरी 2017 को स्वास्थ खराब होने के कारण वह एक दिन कार्य पर उपस्थित नहीं हो सका। एक दिन की अनुपस्थिति को कदाचरण बताते हुए, बिना जांच किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए उसे हटा दिया गया। हाईकोर्ट में लगाई थी रिट याचिका उक्त आदेश को चुनौती देते हुए ग्राम रोजगार सहायक ने अपील प्रस्तुत की, लेकिन अपील भी निरस्त कर दी गई। जिसके बाद उसने 2019 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में रिट याचिका प्रस्तुत की। इसके बाद हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए 22 अगस्त 2023 को उसकी सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त कर दिया गया था। इसके साथ ही यह आदेश भी दिया गया कि ग्राम रोजगार सहायक को 50 प्रतिशत पिछले वेतन सहित वापस नौकरी पर रखा जाए। हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया इस आदेश को चुनौती देते हुए शासन के द्वारा अपील प्रस्तुत की गई, लेकिन 3 जुलाई 2024 को अपील भी निरस्त हो गई। अपील निरस्त होने के बाद भी हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका प्रस्तुत की जिसमें दिनांक 20 सितंबर 2024 को शासन को यह निर्देश दिए कि वह आदेश का पालन करें। इसके साथ ही 4 अक्टूबर 2024 को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें। इसके बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया और न ही उक्त दोनों अधिकारी हाईकोर्ट में उपस्थित रहे। इसलिए न्यायालय द्वारा कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए गए हैं।

कोर्ट ने अधिवक्ता से पूछा अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके, लिफाफा खोलकर क्यों पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल ने अवमानना प्रकरण पर सुनवाई करते हुए ओपन-कोर्ट में अपनी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रशासनिक अधिकारी छह माह में भी आदेश का पालन नहीं करा सकते तो पद से त्यागपत्र दे दें। कोर्ट ने यह कटाक्ष गृह विभाग के तत्कालीन एसीएस और वर्तमान में जीएडी के एसीएस संजय दुबे पर किया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि 14 अक्टूबर तक आदेश का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया तो अनावेदक अधिकारी अवमानना कार्रवाई के लिए तैयार रहें। यदि उन्हें आदेश अनुचित लगे तो अपील करने स्वतंत्र होंगे। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को नियत की गई है। ऑर्डर शीट अभी नहीं आई अवमानना याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी विजय पुंज की ओर से अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने पक्ष रखा। उन्होंने अवगत कराया कि फिलहाल इस मामले की ऑर्डर-शीट बाहर नहीं आई है। किंतु ओपन कोर्ट में जताई गई नाराजगी उल्लेखनीय है। पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए कोर्ट ने मौखिक आदेश में साफ कर दिया है कि अवमानना याचिकाकर्ता की पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए। दरअसल, हाई कोर्ट ने मार्च में पुंज की याचिका पर सुनवाई करते हुए राहतकारी आदेश पारित किया था। कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए लेकिन छह माह बीतने के बावजूद राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता यह तर्क दे रहे हैं कि मामले में कैबिनेट से समन्वय किया जाना है इसलिए देरी हो रही है। इस दलील को गंभीरता से लेकर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी कर दी कि ऐसे अधिकारी को इस्तीफा दे देना चाहिए जो छह माह बीतने के बावजूद कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए हैं। 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहा अवमानना याचिकाकर्ता अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने अवगत कराया कि अवमानना याचिकाकर्ता पुंज इसी वर्ष 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। लिहाजा, राज्य शासन के वकील की ओर से एक माह की मोहलत मांगना बेमानी है। यह सुनते ही कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता से पूछा आप कारण बताइए कि क्यों आपके अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके अवमानना याचिकाकर्ता के प्रकरण में लिफाफा खोलकर पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे हैं।

सनातन और योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की थी आपत्तिजनक टिप्पणी, हाईकोर्ट ने कहा-नहीं होगी FIR निरस्त

जबलपुर भगवान राम, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और हिंदू धर्म के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक इंस्टाग्राम पोस्ट के मामले में मोहम्मद बिलाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मोहम्मद बिलाल ने सतना के एक पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294, 153ए, 295ए और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1) और 3(2) के तहत उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी। बिलाल ने अपनी याचिका में दावा किया था कि कुछ लोगों ने दो दिन पहले उसका इंस्टाग्राम अकाउंट हैक कर लिया और आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड कर दिया। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की सिंगल जज बेंच ने कहा, “एफआईआर से यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता से पूछा था कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट क्यों अपलोड की गई है। यह बताने के बजाय कि वह पोस्ट उसका अकाउंट हैक करके किसी और ने अपलोड की है, उसने (याचिकाकर्ता) शिकायतकर्ता को गाली देना और अपमानित करना शुरू कर दिया और उसकी धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाई।” पिछले महीने के हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया था, “याचिकाकर्ता का यह आचरण दर्शाता है कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर किसी और द्वारा आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने का बचाव गलत है। चूंकि याचिकाकर्ता ने खुद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने की बात स्वीकार की है, इसलिए उसे शिकायतकर्ता के साथ जिस तरह से प्रतिक्रिया की गई, उस तरह से प्रतिक्रिया करने का कोई अधिकार नहीं है।” जस्टिस अहलूवालिया ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इस पर इस समय विचार नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया है कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संबंधित एफआईआर में संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है, हस्तक्षेप करने का कोई मामला नहीं बनता है।

हाईकोर्ट ने कहा कोविड से मौत पर नहीं मिला परिवार को क्लेम, सरकार ने निगम के सहायक दरोगा को अपात्र बताया, ब्याज समेत मुआवजा देने के आदेश

इंदौर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कोविड के दौरान नगर निगम में कार्यरत कर्मचारी की मृत्यु के मामले में उसकी पत्नी को मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। योजना के अंतर्गत मिलने वाली राशि पर शासन को बैंक दर से ब्याज भी देना होगा। मामला निगमकर्मी जगदीश करोसिया का है। 10 जुलाई 2020 को नगर निगम ने उन्हें सुपरवाइजर के रूप में नियुक्ति दी थी। उनके जिम्मे कोरोना संक्रमित क्षेत्र में सैनिटाइजर इत्यादि से छिड़काव करवाने की जिम्मेदारी थी। काम के दौरान 29 अगस्त 2020 को उनकी कोरोना से मृत्यु हो गई। यह भी पढ़ें जगदीश की पत्नी अलका ने शासन को आदेश देकर मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ दिए जाने की गुहार लगाई, लेकिन डिप्टी रिलीफ कमिश्नर ने नियमों का हवाला देते हुए इस आवेदन को निरस्त कर दिया। उनका कहना था कि वे योजना के लिए पात्र नहीं हैं। इस पर एडवोकेट आयुष अग्रवाल के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने शासन को आदेश दिया कि वह जगदीश की पत्नी को योजना का लाभ दे। कोर्ट ने योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि पर बैंक दर से ब्याज भी दिलवाया है। कर्बला मैदान मामले में हाई कोर्ट में दायर हुई अपील कर्बला मैदान मामले में 13 सितंबर को आए जिला न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपील दायर हुई है। यह अपील पंच मुसलमान कर्बला मैदान कमेटी लालबाग रोड इंदौर की ओर से दायर हुई है। अपील में निगमायुक्त, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड भोपाल और अन्य को पक्षकार बनाया गया है। गौरतलब है कि 13 सितंबर को पंद्रहवें जिला न्यायाधीश नरसिंह बघेल ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि नगर निगम इंदौर कर्बला मैदान की खसरा नंबर 1041 की 6.70 एकड़ जमीन का स्वामी है। उक्त अपील इसी फैसले को चुनौती देते हुए दायर की गई है।

पति की हत्या के आरोप में 12 साल से जेल में बंद पत्नी को ओडिशा हाईकोर्ट ने बरी कर दिया

भुवनेश्वर  पति की हत्या के आरोप में 12 साल से जेल में बंद पत्नी को ओडिशा हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। महिला को निचली अदालत ने पति की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसलो को न्याय का दुरुपयोग बताते हुए फैसला पलटा दिया है। हाईकोर्ट ने 64 साल की हो चुकी महिला को बरी कर दिया है। साथ ही निचली अदालत को उसले फैसले पर फटकार भी लगाई है। बता दें कि सुनिता मुंडारी नामक यह महिला 64 साल की हो चुकी हैं। आरोपी पक्ष के अनुसार 28 नवंबर, 2011 को सुंदरगढ़ के झिरपानी गांव में सुनीता ने अपने पति मंगल पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी थी। राउरकेला की एक सत्र अदालत ने 20 दिसंबर, 2014 को उसे दोषी ठहराया था। सुनीता ने उसी साल हाईकोरट में में अपील की थी। गुरुवार को जस्टिस एस के साहू और चित्तरंजन दास की HC बेंच ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी सुनीता के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत को लगाई फटकार बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद हालात यह निष्कर्ष निकालने के लिए पूरी कड़ी नहीं जोड़ते कि महिला ने ही अपराध किया था। बेंच ने कहा कि निचली अदालत के फैसले जायज़ नहीं हैं। अपीलकर्ता के पक्ष में मौजूद बातों को नरअंदाज किया गया है और इस तरह यह न्याय का दुरुपयोग है। महिला की रिहाई के आदेश दिए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत निचली अदालत द्वारा सुनीता को दी गई सज़ा को रद्द करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया। बेंच ने कहा कि निचली अदालत बिना किसी सीधे सबूत के इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि सुनीता ने हत्या की है। बेंच ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में हमेशा यह खतरा बना रहता है कि अनुमान या संदेह कानूनी सबूत की जगह ले सकते हैं।

HC ने आइसक्रीम डिब्बे में कनखजूरा पाए जाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का दिया निर्देश, जानें पूरा मामला

नई दिल्ली दिल्ली उच्च न्यायालय ने नोएडा की एक महिला को अमूल की आइसक्रीम के डिब्बे में कनखजूरा मिलने के आरोप वाला अपना पोस्ट हटाने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति मनमीत पी एस अरोड़ा ने अमूल ब्रांड के तहत उत्पादों का विपणन करने वाले गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ की ओर से दायर वाद पर सुनवाई करते हुए ग्राहक पर अगले आदेश तक सोशल मीडिया मंच पर इस तरह की सामग्री पोस्ट करने और अपलोड करने पर रोक लगाई है। दरअसल सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर 15 जून को दीपा देवी ने एक तस्वीर साझा की थी जिसमें कथित तौर पर अमूल की आइसक्रीम के डिब्बे के अंदर एक कनखजूरा दिखाई दे रहा है। महिला ने यह आइसक्रीम एक ऐप के माध्यम से मंगवाई थी। वाद दाखिल करने वाली कंपनी ने उच्च न्यायालय में तर्क दिया कि यह दावा झूठा और गलत है क्योंकि उसके कारखाने में पैक किए गए आइसक्रीम के डिब्बे में कोई भी बाहरी सामान चाहे वह कीड़ा ही क्यों न हो, मौजूद होना बिल्कुल असंभव है। अदालत ने यह आदेश चार जुलाई को पारित किया। इसमें कहा गया कि ग्राहक वर्तमान कार्यवाही में आज भी मौजूद नहीं है और उसके असहयोग वाले रवैए ने कंपनी के मामले को बल दिया है। आदेश में कहा गया कि ग्राहक को अदालती कार्यवाही में भाग लेने और अपने सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए दावे को सही साबित करने का अवसर दिया गया था लेकिन उन्होंने ‘उपस्थित नहीं होने को तरजीह दी’ और जांच के लिए आइसक्रीम का डिब्बा भी कंपनी को नहीं दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी तीन दिन में सोशल मीडिया पोस्ट नहीं हटाता तो कंपनी ‘एक्स’ को अपने मंच से इसे हटाने के लिए कह सकती है। वाद दाखिल करने वाली कंपनी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील दलाल और वकील अभिषेक सिंह ने अपनी दलील में कहा कि कंपनी मामले की जांच के लिए तैयार थी और उसने 15 जून को ग्राहक से संपर्क भी किया था लेकिन उन्होंने अधिकारियों को आइसक्रीम का डिब्बा उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था।    

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