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चुनावी बॉन्ड फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को असंवैधानिक करार देने वाले संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। समीक्षा याचिकाओं पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि “रिकॉर्ड को देखने पर कोई त्रुटि नजर नहीं आती। इसलिए समीक्षा याचिकाएं खारिज की जाती हैं।” पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया था। पीठ ने कहा था कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के चंदे का विवरण जानने के अधिकार से वंचित नहीं क‍िया जा सकता। राजनीतिक दलों को म‍िलने वाले चंदे को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के चंदे से अलग नहीं माना जा सकता। 15 फरवरी के अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को चुनावी बॉन्ड जारी करने पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया था। साथ ही भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर राजनीतिक दलों का विवरण प्रकाशित करने का आदेश दिया था। जिन्होंने अप्रैल 2019 से चुनावी बॉन्ड के माध्यम से योगदान प्राप्त किया है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की राय से न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने भी सहमति जतायी थी। पीठ ने कहा था कि, चुनावी प्रक्रिया में काले धन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से मतदाताओं के सूचना के अधिकार के उल्लंघन को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, पीठ ने कहा था कि, चुनावी बॉन्ड योजना चुनावी वित्तपोषण में “काले धन पर अंकुश लगाने का एकमात्र साधन नहीं है” और ऐसे अन्य विकल्प भी हैं जो उद्देश्य को काफी हद तक पूरा करते हैं। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने एक अलग लेकिन सहमति वाला फैसला लिखा। न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, “मैंने भी आनुपातिकता के मानकों को लागू किया है, लेकिन थोड़े अलग बदलावों के साथ। मेरे निष्कर्ष एक जैसे हैं।” समीक्षा याचिकाओं में से एक में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को “इस बात पर ध्यान दिए बिना रद्द कर दिया कि ऐसा करते हुए वह संसद पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहा है, तथा ऐसे मामले में अपने विवेक का प्रयोग कर रहा है जो विधायी और कार्यकारी नीति के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है।” हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिकाओं के साथ ही इन याचिकाओं को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने के आवेदन को भी खारिज कर दिया। इस साल अगस्त में, शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें चुनावी बॉन्ड का उपयोग करके चुनावी चंदे में कथित घोटाले की सेवानिवृत्त शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की देखरेख में विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच की मांग की गई थी। सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जब तक जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे पर पहले से ही एफआईआर दर्ज नहीं हो जाती, तब तक “क्विड प्रो क्वो” की जांच के लिए एसआईटी का गठन नहीं किया जा सकता है। साथ ही पीठ ने कहा कि कानून के सामान्य तरीके से याचिका में उठाए गए आरोपों का समाधान किया जा सकता है। गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया था कि, शीर्ष अदालत के निर्देश पर जारी चुनावी बॉन्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि अधिकांश बॉन्ड कॉरपोरेट द्वारा राजनीतिक दलों को सरकारों या प्राधिकारों से अनुबंध, लाइसेंस और पट्टे प्राप्त करने के लिए बदले में दिए गए हैं।

SC ने एक अप्रैल 2021 के बाद जारी 90,000 आईटी पुनर्मूल्यांकन नोटिसों की वैधता बरकरार, समझें मामला

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने आयकर विभाग को राहत देते हुए पुराने प्रावधानों के तहत एक अप्रैल 2021 के बाद राजस्व विभाग द्वारा जारी करीब 90,000 पुनर्मूल्यांकन नोटिस की वैधता बरकरार रखी है। शीर्ष अदालत ने  कई उच्च न्यायालयों के फैसलों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि कराधान व अन्य कानून (कुछ प्रावधानों में छूट और संशोधन) अधिनियम (टीओएलए) 2021 आयकर अधिनियम के तहत पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा नहीं बढ़ाएगा। टीओएलए को कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान आयकर अनुपालन की समय सीमा बढ़ाने के लिए लाया गया था। प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तीन संसदीय कानूनों आयकर अधिनियम, टीओएलए और वित्त अधिनियम के परस्पर प्रभाव से संबंधित दो कानूनी प्रश्नों पर विचार किया। शीर्ष अदालत ने इस सवालों पर गौर किया, ‘‘क्या टीओएलए तथा इसके तहत जारी अधिसूचनाएं एक अप्रैल 2021 के बाद जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस पर भी लागू होंगी और क्या जुलाई तथा सितंबर 2022 के बीच नई व्यवस्था की धारा 148 के तहत जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस वैध हैं।’’ प्रधान न्यायाधीश ने 112 पृष्ठों का फैसला लिखते हुए कहा, ‘‘हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक अप्रैल 2021 के बाद आयकर अधिनियम को प्रतिस्थापित प्रावधानों के साथ पढ़ा जाना चाहिए और यदि आयकर अधिनियम के प्रतिस्थापित प्रावधानों के तहत निर्दिष्ट कोई कार्रवाई या कार्यवाही 20 मार्च 2020 तथा 31 मार्च 2021 के बीच पूरी होनी है… तो टीओएलए एक अप्रैल 2021 के बाद भी आयकर अधिनियम पर लागू होता रहेगा।’’ पीठ ने कहा कि टीओएलए का प्रावधान ‘‘ आयकर अधिनियम की धारा 149 को केवल आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा में छूट देने तक ही सीमित है।’’ पुनर्मूल्यांकन नोटिस को चुनौती देते हुए विभिन्न उच्च न्यायालयों में 9,000 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं और करदाताओं के पक्ष में कई फैसले पारित किए गए। इसके बाद ही राजस्व विभाग को सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा था। केंद्र ने मार्च 2020 में कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रसार को रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी और टीओएलए लेकर आया था। 2021 के इस अधिनियम ने पूर्वव्यापी प्रभाव से ‘‘ निर्दिष्ट अधिनियमों के तहत कार्यों को पूरा करने या अनुपालन करने’’ की समय सीमा 20 जून 2020 तक बढ़ा दी। इसके बाद 24 जून 2020 को केंद्र ने टीओएलए के तहत एक अधिसूचना जारी की जिसमें निर्दिष्ट अधिनियमों के तहत कार्रवाई को पूरा करने या अनुपालन करने की समय सीमा 31 मार्च 2021 तक बढ़ा दी गई। शीर्ष अदालत ने आयकर विभाग की अपील स्वीकार कर ली। आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस 2013-14 से 2017-18 तक के कर निर्धारण वर्षों से संबंधित हैं। इसमें शामिल राशि हजारों करोड़ रुपये तक हो सकती है। पीठ को यह निर्धारित करना था कि क्या वैश्विक महामारी के दौरान विशिष्ट अधिनियमों के तहत समय सीमा में छूट देने वाले टीओएलए का लाभ पुनर्मूल्यांकन के लिए समय सीमा को नियंत्रित करेगा। बंबई, गुजरात और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों ने विभिन्न आधारों पर सभी पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द कर दिए थे। उनका मुख्य तर्क यह था कि नए प्रावधान अधिक लाभकारी थे और करदाताओं के अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए थे। इन उच्च न्यायालयों ने कहा था कि टीओएलए पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा नहीं बढ़ाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि एक अप्रैल 2021 के बाद आयकर अधिनियम के प्रतिस्थापित प्रावधान पूर्वव्यापी रूप से लागू होंगे, यहां तक कि पिछले मूल्यांकन वर्षों के लिए भी.. परिणामस्वरूप नई पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था को टीओएलए के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जिसने वैश्विक महामारी के कारण अस्थायी रूप से समय सीमा बढ़ा दी थी। वैश्विक महामारी से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए आयकर विभाग को 20 मार्च 2020 और 31 मार्च 2021 के बीच जारी किए गए नोटिस के लिए विस्तारित समय सीमा का लाभ उठाने की अनुमति दी गई। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि टीओएलए पुरानी पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था के संचालन को संशोधित धारा 149 में निर्दिष्ट समय-सीमा से आगे नहीं बढ़ा सकता। आयकर अधिनियम की धारा 149 करदाताओं को आयकर नोटिस जारी करने की समय-सीमा से संबंधित है। इसके तहत ‘‘ संबंधित कर समीक्षाधीन वर्ष के लिए धारा 148 के तहत कोई नोटिस जारी नहीं किया जाएगा।’’    

सुप्रीम कोर्ट ने SC और ST को मिलने वाले आरक्षण में उप-वर्गीकरण के अपने फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मिलने वाले आरक्षण में उप-वर्गीकरण के अपने फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने 1 अगस्त को ही इस संबंध में फैसला दिया था और कहा था कि यदि राज्य सरकारों को जरूरी लगता है कि एससी और एसटी कोटे के भीतर ही कुछ जातियों के लिए सब-कोटा तय किया जा सकता है। इसका एक वर्ग ने विरोध किया था और आंदोलन भी हुआ था। इसके अलावा याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इन पर ही शुक्रवार को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने विचार करने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 7 जजों की बेंच ने कहा कि उस फैसले में ऐसी कोई त्रुटि नहीं थी, जिस पर पुनर्विचार किया जाए। अदालत ने कहा, ‘हमने पुनर्विचार याचिकाओं को देखा है। ऐसा लगता है कि पुराने फैसले में ऐसी कोई खामी नहीं है, जिस पर फिर से विचार किया जाए। इसलिए पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया जाता है।’ जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम. त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा इस बेंच में शामिल थे। अदालत ने कहा कि याचिकाओं में कोई ठोस आधार नहीं दिया गया कि आखिर क्यों 1 अगस्त के फैसले पर कोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए। इन याचिकाओं पर अदालत ने 24 सितंबर को ही सुनवाई की थी, लेकिन फैसला आज के लिए सुरक्षित रख लिया था। इन याचिकाओं को संविधान बचाओ ट्रस्ट, आंबेडकर ग्लोबल मिशन, ऑल इंडिया एससी-एसटी रेलवे एम्प्लॉयी एसोसिएशन समेत कई संस्थाओं की ओर से दायर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 1 अगस्त को ही 6-1 के बहुमत से फैसला दिया था। इसमें राज्य सरकारों को एससी और एसटी कोटे के सब-क्लासिफिकेशन की मंजूरी दी गई थी। इसके तहत कहा गया था कि यदि इन वर्गों में किसी खास जाति को अलग से आरक्षण दिए जाने की जरूरत पड़ती है तो इस कोटे के तहत ही उसके लिए प्रावधान किया जाता है। अदालत के इस फैसले को दलितों और आदिवासियों के एक वर्ग ने आरक्षण विरोधी करार दिया था। वहीं एक वर्ग इसके समर्थन में भी आया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि दलितों में भी कई जातियां और इस वर्ग को समरूप नहीं माना जा सकता। इसलिए आरक्षण के लिए यदि किसी जाति को खास प्रावधान देने की जरूरत पड़ती है तो वह भी करना चाहिए।

स्वतंत्र SIT करेगी तिरुपति लड्डू प्रसाद मामले की जांच

Independent SIT will investigate Tirupati Laddu Prasad case Tirupati Laddu Row Hearing in Supreme Court: तिरुपति लड्डू प्रसाद मामले की जांच अब एक स्वतंत्र SIT करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार की तरफ से गठित SIT को लेकर उठ रहे सवालों के मद्देनजर नई जांची टीम का गठन किया है. इस जांच दल में 2 सीबीआई अधिकारी होंगे, 2 अधिकारी आंध्र प्रदेश पुलिस के होंगे और एक अधिकारी फूड स्टैंडर्ड एंड सेफ्टी अथॉरिटी यानी FSSAI का होगा. जांच की निगरानी सीबीआई निदेशक करेंगे. दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र तिरुपति बालाजी मंदिर में आंध्र प्रदेश की पिछली जगन मोहन रेड्डी सरकार के दौरान चढ़ाए जा रहे प्रसाद में मिलावट का आरोप लगा था. यह आरोप आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने लगाया था. उन्होंने कहा था कि प्रसाद में इस्तेमाल किए जा रहे घी में एनिमल फैट यानी पशुओं की चर्बी की मिलावट पाई गई है. इस बात के सामने आते ही लोगो में गहरी नाराजगी फैल गई थी. बाद में इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुई. सुनवाई के दौरान सीएम पर लगाया ये आरोप तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के करीबी रिश्तेदार वाई.वी. सुब्बा रेड्डी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका में इस बात पर सवाल उठाया गया कि चंद्रबाबू नायडू ने जांच पूरी होने से पहले ही राजनीतिक लाभ के लिए बयान दिया. उन्होंने कहा कि घी के जो 4 टैंकर नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के पास जांच के लिए भेजे गए थे, उन्हें प्रसाद बनाने में इस्तेमाल नहीं किया गया था. सॉलिसिटर जनरल ने राज्य सरकार की SIT को बताया उपयुक्त राज्य सरकार के निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि राज्य सरकार की तरफ से बनाई गई SIT को जांच करने दिया जाए या किसी दूसरी संस्था को यह ज़िम्मा दिया जाए. इसका जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकार के SIT में सभी बेदाग और अच्छे अधिकारी हैं. उन्हें जांच करने देना चाहिए. बेहतर जांच के लिए उनकी निगरानी का काम एक केंद्रीय वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंप देना चाहिए. कपिल सिब्बल ने किया सॉलिसिटर जनरल के सुझाव का विरोध वाई.वी. सुब्बा रेड्डी के लिए पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस सुझाव का विरोध किया. उनकी मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट अपनी तरफ से SIT का गठन करे. आखिरकार जस्टिस बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि वह एक SIT बना रहे हैं. इसमें 2 अधिकारी सीबीआई के होंगे, दो आंध्र प्रदेश पुलिस के होंगे और एक अधिकारी FSSAI का होगा. कोर्ट ने कहा कि SIT में आंध्र प्रदेश पुलिस के जो अधिकारी होंगे, उनका नाम आंध्र प्रदेश सरकार तय करेगी, FSSAI के अधिकारी का चयन FSSAI के अध्यक्ष करेंगे. कोर्ट का कहना था कि FSSAI खाद्य मिलावट के मामलों में विशेषज्ञ संस्था है. ऐसे में उसके एक अधिकारी की मौजूदगी से जांच बेहतर हो सकेगी. भविष्य में इस जांच से किसी को दिक्कत हो तो यहां वापस आ सकते हैं – सुप्रीम कोर्ट इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा कर दिया है. यानी भविष्य में सुप्रीम कोर्ट या राज्य सरकार के पास कोई रिपोर्ट नहीं आएगी. SIT स्वतंत्र जांच करेगी और जांच के आधार पर अगर किसी पर मुकदमा चलाने की जरूरत हुई, तो वह निचली अदालत में आरोप पत्र दाखिल करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर भविष्य में इस जांच को लेकर किसी को कोई समस्या होती है, तो वह वापस उसका दरवाजा खटखटा सकता है.

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया, मैरिटल रेप अपराध नहीं: केंद्र सरकार

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया है। केंद्र ने कहा कि यौन संबंध पति-पत्नी के बीच संबंधों के कई पहलुओं में से एक है, जिस पर उनके विवाह की नींव टिकी होती है। ये मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक केंद्र सरकार ने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक है। इसका समाज पर सीधा असर पड़ता है। इसके साथ ही केंद्र ने यह तर्क भी दिया कि अगर ‘वैवाहिक बलात्कार’ को भी अपराध घोषित किया जाता है, तो ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। संबंध को साबित करना चुनौतीपूर्ण केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि तेजी से बढ़ते और लगातार बदलते सामाजिक एवं पारिवारिक ढांचे में संशोधित प्रावधानों के दुरुपयोग से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि किसी व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होगा कि संबंध के लिए सहमति थी या नहीं। बलात्कार विरोधी कानून शादी में जीवनसाथी से उचित यौन संबंध की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन ऐसी अपेक्षाएं पति को अपनी पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देती हैं। केंद्र ने कहा कि बलात्कार विरोधी कानूनों के तहत किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दंडित करना असंगत हो सकता है। क्रूरता पर दंडात्मक कानून संसद ने पहले ही विवाहित महिला की सहमति को सुरक्षित रखने के लिए उपाय प्रदान किए हैं। केंद्र ने कहा कि इन उपायों में विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता करने पर दंडात्मक कानून शामिल हैं। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 कानून है, जो विवाहित महिलाओं की मदद कर सकता है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हत्या, रेप और आतंक के केस के आधार पर भी दोषी की किसी संपत्ति को तोड़ा जा नहीं सकती

नई दिल्ली देशभर में चल रहे बुलडोजर एक्शन के खिलाफ दाखिल जमीयत उलेमा ए हिंद की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच कर रही है. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई  पर रोक लगाते हुए कहा था कि सिर्फ सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण को हटाने की ही छूट होगी. इस मामले में यूपी, एमपी और राजस्थान की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता पेश हुए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में पूछा कि क्या दोषी करार देने पर भी किसी की संपत्ति तोड़ी जा सकती है? जिस पर एसजी तुषार ने कहा कि नहीं, यहां तक कि हत्या, रेप और आतंक के केस के आधार पर भी नहीं. मेरे कुछ सुझाव हैं, नोटिस को रजिस्टर्ड एडी से भेजा जाए. हम सबके लिए गाइडलाइन जारी करेंगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं, हम सब नागरिकों के लिए गाइडलाइन जारी करेंगे. अवैध निर्माण हिंदू, मुस्लिम कोई भी कर सकता है. हमारे निर्देश सभी के लिए होंगे, चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय के हों. बेशक, अतिक्रमण के लिए हमने कहा है कि अगर यह सार्वजनिक सड़क या फुटपाथ या जल निकाय या रेलवे लाइन क्षेत्र पर है, तो हमने स्पष्ट कर दिया है. अगर सड़क के बीच में कोई धार्मिक संरचना है, चाहे वह गुरुद्वारा हो या दरगाह या मंदिर, यह सार्वजनिक बाधा नहीं बन सकती. जस्टिस गवई ने कहा कि चाहे मंदिर हो, दरगाह हो,  उसे जाना ही होगा क्योंकि ⁠सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने हाल ही में यूपी, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई घटनाओं का हवाला देते हुए बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका में जमीयत ने अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया है। याचिका में सरकार को आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाने से रोकने की मांग की गई है. जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यदि  2 संरचनाओं में उल्लंघन हुआ है और केवल 1 के खिलाफ कार्रवाई की जाती है और आप पाते हैं कि पृष्ठभूमि में कोई अपराध है. यह समझौता करने योग्य या गैर समझौता करने योग्य अपराध हो सकता है. यदि आप शुरू में किसी व्यक्ति की जांच कर रहे हैं और आपको जल्द ही उसका आपराधिक इतिहास पता चलता है तो? दो गलतियां एक सही नहीं बनाती हैं. इस बारे में हमारी सहायता करें. न्यायिक निगरानी होनी चाहिए जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि इसके लिए कुछ समाधान तो खोजना ही होगा, कुछ न्यायिक निगरानी होनी चाहिए. एसजी तुषार मेहता ने कहा कि मैं यूपी, एमपी, राजस्थान की ओर से पेश हुआ हूं. हमने पहले भी कहा है. हमने यूपी मामले में पहले ही हलफनामा दाखिल कर दिया था कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है, किसी संपत्ति को गिराने का आधार नहीं हो सकता. नगर निगम कानून, नगर नियोजन नियमों का उल्लंघन होना चाहिए. साथ ही कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए. नोटिस जारी किए जाने चाहिए, पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. हम यह स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है या यहां तक ​​कि बलात्कार, हत्या या आतंकवाद में भी दोषी है, उसे गिराने का आधार नहीं माना जा सकता. कानून किसी खास धर्म के लिए नहीं… इस मामले में जो भी नियम बनाए जाएं, उन्हें पूरे भारत में लागू किया जाना चाहिए. ⁠जब ​​याचिकाकर्ता कहते हैं कि चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जा रहा है. मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, तो इसमें कुछ संवेदनशीलताएं शामिल हैं. अदालत को आरोपों से बाहर आना चाहिए और तय करना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत. जस्टिस गवई ने कहा कि हम सभी के लिए कानून बनाएंगे, किसी खास धर्म के लिए नहीं. अवैध निर्माणों को सभी धर्मों से अलग किया जाना चाहिए. नोटिस की सही सर्विस होनी चाहिए, पंजीकृत ए.डी. के माध्यम से नोटिस हो. नोटिस चिपकाने की यह प्रक्रिया चले, डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए. इससे अधिकारी भी सुरक्षित रहेंगे, हमारे पास भारत से पर्याप्त विशेषज्ञ है. एसजी ने कहा कि ऐसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बुलडोजर मामले बहुत कम होंगे, ये मामले दो फीसदी होंगे. लेकिन बिल्डरों से जुड़े इस तरह के मामले बहुत हैं. जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि जब तक नगर निगम के अधिकारी इन पर फैसला नहीं ले लेते, तब तक कोई अर्ध न्यायिक निगरानी भी नहीं है. ये मामला दो फीसदी का नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि साढ़े चार लाख मामले तोड़फोड़ के हैं. हिंदू-मुस्लिम की बात क्यों आती है? सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि हिंदू-मुस्लिम की बात क्यो आती है. वे हमेशा अदालत में जा सकते हैं  इसमें भेदभाव कहां है. जस्टिस विश्वनाथ ने कहा कि इसके लिए कुछ समाधान खोजना होगा. जैसे न्यायिक निरीक्षण किया जाए. इसपर SG ने कहा कोर्ट मीडिया में प्रचारित कुछ घटनाओं को छोड़कर इसके लिए एक सामान्य कानून बनाए जाने पर विचार करें. तुषार मेहता ने कहा कि मैं यूपी, एमपी, राजस्थान  की ओर से पेश हुआ हूं. हमने पहले भी कहा है, हमने यूपी मामले में पहले ही हलफनामा दाखिल कर दिया था कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है, किसी संपत्ति को गिराने का आधार नहीं हो सकता. ⁠नगर निगम कानून, नगर नियोजन नियमों का उल्लंघन होना चाहिए. ⁠साथ ही कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए. ⁠नोटिस जारी किए जाने चाहिए. ⁠पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. ⁠हम यह स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है या यहां तक ​​कि बलात्कार, हत्या या आतंकवाद में भी दोषी है, उसे गिराने का आधार नहीं माना जा सकता. तुषार मेहता ने आगे कहा कि⁠ जो भी नियम बनाए जाएं, उन्हें पूरे भारत में लागू किया जाना चाहिए. ⁠जब ​​याचिकाकर्ता कहते हैं कि चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जा रहा है. ⁠मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, तो इसमें कुछ संवेदनशीलताएं शामिल हैं. ⁠अदालत को आरोपों से बाहर आना चाहिए.⁠ तय करना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत.  ⁠जस्टिस गवई ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं. ⁠हम सभी के … Read more

बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, BJP शासित राज्यों को लगा झटका

Supreme Court bans bulldozer action, BJP ruled states get a shock

Supreme Court bans bulldozer action, BJP ruled states get a shock सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन पर रोक लगा दी है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि हमारी अनुमति के बिना कोई कार्रवाई नहीं हो। शीर्ष न्यायलय का यह आदेश उत्तर प्रदेश समेत सभी बीजेपी शासित राज्यों के लिए झटका है। यह रोक एक अक्टूबर तक के लिए लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सभी पक्षों को सुन कर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर देश भर में लागू होने वाले दिशा निर्देश बनाएगा। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में बुलडोजर से ध्वस्तीकरण कार्रवाई के खिलाफ दाखिल जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बुलडोजर एक्शन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया है। जस्टिस बीआर गवई ने साफ किया कि सड़क, फुटपाथ या रेलवे लाइन को रोककर किए गए अवैध निर्माण पर यह निर्देश लागू नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सभी पक्षों को सुन कर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर देश भर में लागू होने वाले दिशा निर्देश बनाएगा।

अरविंद केजरीवाल ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार

Will Arvind Kejriwal come out of jail? Appealed to the Supreme Court for bail

Will Arvind Kejriwal come out of jail? Appealed to the Supreme Court for bail दिल्ली ! अरविंद केजरीवाल ने अपनी सीबीआई गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. अरविंद केजरीवाल की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने जल्द सुनवाई की मांग की है. चीफ जस्टिस ने उनसे औपचारिक ईमेल भेजने को कहा है. ED वाले केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत दे रखी है. लेकिन CBI वाले केस में अभी तक उन्हें जमानत नहीं मिली है. दिल्ली हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी के खिलाफ केजरीवाल की याचिका खारिज कर दिया था. दिल्ली HC ने उन्हें जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट जाने को कहा था. पीएमएलए केस में मिल गई थी जमानत मनी लॉन्ड्रिंग यानी पीएमएलए केस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने जमानत दे दी थी. हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 जून को इस आदेश पर रोक लगा दी थी. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी, जहां से उन्हें 12 जुलाई को अंतरिम जमानत मिल गई थी. इस दौरान सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. इसके बाद से वो तिहाड़ जेल में ही बंद हैं. बता दें कि ईडी ने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली शराब नीति मामले में मनी लॉन्ड्रिंग केस में 21 मार्च को गिरफ्तार किया था. इसके बाद इसी केस में 26 जून को सीबीआई ने उन्हें अपनी हिरासत में ले लिया था.गौरतलब है कि CBI और ED ने दावा किया है कि वित्त वर्ष 2021-22 की शराब नीति में घोटाला हुआ है. केंद्रीय जांच एजेंसियों के अनुसार, शराब कारोबारियों को अनुचित फायदा पहुंचाने के लिए उनसे रिश्वत ली गई थी. दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी इस दावों को बार-बार खारिज करती है.

बिहार सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका, 65% आरक्षण आदेश पर रोक बरकरार

Shock to Bihar government from Supreme Court

Shock to Bihar government from Supreme Court, stay on 65% reservation order remains intact Bihar Reservation News: बिहार सरकार को सुप्रीम कोर्ट से सोमवार (29 जुलाई) को बड़ा झटका लगा है. बिहार में आरक्षण को बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने के खिलाफ पटना हाईकोर्ट का फैसला फिलहाल बना रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से मना कर दिया है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह सितंबर में मामले पर विस्तृत सुनवाई करेगा. पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के आरक्षण बढ़ाने के फैसले को रद्द कर दिया था. फिर राज्य सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के उस फैसले को रद्द किया था, जिसमें सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए पिछड़े वर्गों के आरक्षण में इजाफा किया गया था. बिहार सरकार ने पिछड़े वर्ग, एससी और एसटी समाज से आने वाले लोगों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए मिलने वाले आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी किया था. आरक्षण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर हुई थीं याचिकाएं बिहार सरकार की तरफ से जब आरक्षण की सीमा बढ़ाई गई थी तो इस संबंध में पटना हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं, जिसमें राज्य के फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई. हाईकोर्ट ने मार्च में इस संबंध में दायर रिट याचिकाओं के एक बैच पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. इसके बाद 20 जून को हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को बड़ा झटका देते हुए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में राज्य द्वारा निर्धारित 65 फीसदी आरक्षण सीमा को रद्द कर दिया. सबसे ज्यादा आरक्षण देने वाला राज्य बन गया था बिहार बिहार सरकार ने पिछले साल नवंबर में आधिकारिक तौर पर राज्य गजट में दो विधेयकों को नोटिफाई किया था. इसका मकसद पिछड़े और वंचित समाज के लोगों के आरक्षण की सीमा को बढ़ाना था. विधेयकों के साथ बिहार में उन बड़े राज्यों में शामिल हो गया, जहां सबसे ज्यादा आरक्षण दिया जा रहा था. आरक्षण सीमा को 65 फीसदी करने पर राज्य में कुल आरक्षण 75 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसमें 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को मिलने वाला रिजर्वेशन भी शामिल था.

यूपी सरकार का सुप्रीम कोर्ट को कांवड़ यात्रा पर सफाईनामा

UP government's clarification letter to Supreme Court on Kanwar Yatra

UP government’s clarification letter to Supreme Court on Kanwar Yatra उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कांवड़ यात्रा मार्गों पर दुकानों के बाहर नेमप्लेट लगाने को लेकर दिए गए अपने आदेश का बचाव किया है. नेमप्लेट लगाने के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं का विरोध करते हुए यूपी सरकार ने कहा कि उसका इरादा कांवड़ यात्रा को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से पूरा करवाना है. सरकार ने कहा कि दुकानों के नामों की वजह से पैदा होने वाले भ्रम को दूर करने के लिए ये निर्देश जारी किया गया था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तीन ऐसे सबूत भी पेश किए, जिनको आधार बनाकर नेमप्लेट लगवाने का फैसला किया गया. सरकार ने तस्वीरों के साथ कुछ ढाबों के उदाहरण दिए. जैसे ‘राजा राम भोज फैमिली टूरिस्ट ढाबा’ चलाने वाले दुकानदार का नाम वसीम है. ठीक ऐसे ही ‘राजस्थानी खालसा ढाबा’ का मालिक फुरकान है. इसी तरह से ‘पंडित जी वैष्णो ढाबे’ का मालिक सनव्वर है. इसकी वजह से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है. क्यों दिया यूपी सरकार ने नेमप्लेट लगाने का आदेश? यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह चाहती है कि नंगे पैर पवित्र जल ले जा रहे कांवड़ियों की धार्मिक भावना गलती से भी आहत न हो. इसलिए, दुकान के बाहर नाम लिखने का निर्देश दिया गया था. उसने बताया कि कावंड़ मार्ग पर खाने-पीने को लेकर गलतफहमी पहले भी झगड़े और तनाव की वजह बनती रही है. जिस वक्त ये फैसला लागू किया गया था, उस वक्त भी यूपी सरकार ने यही बातें कही थीं. उसका कहना था कि दुकानों के नाम भ्रम पैदा करते हैं. नेमप्लेट विवाद पर विपक्ष ने क्या कहा? विपक्ष ने यूपी सरकार के फैसले को विभाजनकारी बताया था. उसने इसे मुस्लिम विरोधी भी करार दिया था और कहा था इसका मकसद समाज को बांटना है. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने फैसले को संविधान विरोधी बताया था. उन्होंने कहा था, “हमारा संविधान हर एक नागरिक को गारंटी देता है कि उसके साथ जाति, धर्म, भाषा या किसी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा. उत्तर प्रदेश में ठेले, खोमचे और दुकानों के मालिकों के नाम का बोर्ड लगाने का विभाजनकारी आदेश हमारे संविधान, हमारे लोकतंत्र और हमारी साझा विरासत पर हमला है.” समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कहा था कि बीजेपी के लोग समाज में नफरत फैला रहे हैं. इसमें इन लोगों को कामयाबी नहीं मिलने वाली है. जनता ने इन्हें शून्य कर दिया है. कांवड़ यात्रा नेमप्लेट विवाद का मुद्दा संसद में भी गूंजा था, जहां विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया था कि इसके जरिए समाज को बांटा जा रहा है.

मुस्लिम महिला गुजारा भत्ता की हकदार, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि देश में सेकुलर कानून ही चलेगा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आज तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी महिलाएं सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। वह गुजारा भत्ता की हकदार हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि देश में सेकुलर कानून ही चलेगा। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन गॉर्ज मसीह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मुस्लिम महिला गुजारा भत्ता के लिए कानूनी अधिकार का इस्तेमाल कर सकती हैं। वो सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ये धारा सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। आपको बता दें कि अब्दुल समद नाम के एक मुस्लिम शख्स ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उसने दलील दी थी कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है। महिला को मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही चलना होगा। लेकिन कोर्ट ने ऐसे मामलों में सीआरपीसी की धारा 125 को प्राथमिकता दी। पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका लंबित रहने के दौरान कोई मुस्लिम महिला तलाकशुदा हो जाती है तो वह मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 का सहारा ले सकती है। पीठ ने कहा कि इस अधिनियम के तहत किए गए उपाय सीआरपीसी की धारा 125 के तहत उपाय के अतिरिक्त है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है जो मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है। हालांकि मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 द्वारा इसे निरस्त कर दिया गया और 2001 में कानून की वैधता को बरकरार रखा गया।  

लोगों को ये बात पता ही नहीं है कि देश में सहमति से सेक्स संबंध बनाने की उम्र अब 16 साल नहीं बल्कि 18 साल है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली लड़का और लड़की के बीच सहमति से सेक्स संबंध बनाने की उम्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट (SC) ने मंगलवार को बेहद अहम टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकतर लोगों को ये बात पता ही नहीं है कि देश में सहमति से सेक्स संबंध बनाने की उम्र अब 16 साल नहीं बल्कि 18 साल है। उच्चतम न्यायालय ने कहा, “आम जनता को इस बात की जानकारी नहीं है कि लड़की के साथ यौन संबंध बनाने की सहमति की उम्र 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है।” एमपी सरकार की याचिका खारिज बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति पीवी संजय कुमार की पीठ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पोस्को एक्ट) के तहत एक मामले में आरोपी को बरी करने के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार की अपील पर सुनवाई कर रही थी। हालांकि शीर्ष अदालत ने एमपी सरकार की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति खन्ना ने मामले का निपटारा करने से पहले टिप्पणी करते हुए कहा, “अभी भी इस बारे में जागरूकता नहीं है कि सहमति की आयु 16 से बढ़ाकर 18 कर दी गई है।” वर्ष 2012 में भारत में सहमति से विवाह करने की आयु सीमा को 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया गया था, जिसके बाद POSCO अधिनियम लागू हुआ और उसके बाद भारतीय दंड संहिता (IPC) में संशोधन किया गया। मुकदमा अक्सर पुरुष साथी के खिलाफ चलाया जाता है सहमति से सेक्स संबंध बनाने वाली लड़कियों से जुड़े POCSO मामलों में जब मुकदमे की कार्यवाही शुरू होती है तो कई समस्याएं आती हैं जिन्हें न्यायपालिका के कई सदस्यों द्वारा चिन्हित भी किया गया है। क्योंकि युवा लड़कियों के बीच सहमति से बनाए गए रोमांटिक और यौन संबंधों के कारण अक्सर पुरुष साथी के खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है। कई बार, जब तक मुकदमा शुरू होता है, तब तक दंपति शादीशुदा हो चुके होते हैं और उनके बच्चे भी हो चुके होते हैं, जिससे आगे और भी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। क्योंकि अगर उस को सजा दी जाती है तो इसका मतलब होगा कि महिला और बच्चे को खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने दिसंबर 2022 में कहा था कि अधिनियम के तहत सहमति की वर्तमान आयु ऐसे मामलों से निपटने वाले न्यायाधीशों के लिए कठिन प्रश्न खड़ी करती है, और इस मुद्दे को लेकर बढ़ती चिंता पर विधायिका को विचार करने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी ने भी उसी वर्ष की शुरुआत में यही राय व्यक्त की थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष केंद्र सरकार से यौन संबंध के लिए सहमति की आयु को घटाकर 16 वर्ष करने का आग्रह किया था, ताकि सहमति से यौन संबंध बनाने वाले “किशोरों के साथ हो रहे अन्याय” का निवारण किया जा सके। हालांकि, पिछले वर्ष सितंबर में न्यायमूर्ति रितु राज अवस्थी की अध्यक्षता में 22वें विधि आयोग ने यह विचार व्यक्त किया था कि सहमति की मौजूदा आयु 18 वर्ष से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।  

नीट-यूजी परीक्षा से संबंधित याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट आज नीट-यूजी परीक्षा को रद्द करने समेत उससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित कॉज लिस्ट के अनुसार, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच सोमवार को मामले की सुनवाई करेगी। केंद्र ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में नीट-यूजी परीक्षा रद्द करने का विरोध किया था। साथ ही कहा था कि पूरी परीक्षा रद्द करने से उन लाखों ईमानदार स्टूडेंट को नुकसान होगा, जिन्होंने इस वर्ष 5 मई को आयोजित परीक्षा में हिस्सा लिया था। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया, “अखिल भारतीय परीक्षा में किसी बड़ी गड़बड़ी के सबूत के अभाव में पूरी परीक्षा और पहले से घोषित परिणाम को रद्द करना तर्कसंगत नहीं होगा। बड़ी संख्या में छात्रों के हितों को भी खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए, जिन्होंने बिना किसी कथित अनुचित साधन को अपनाए परीक्षा दी है।” हलफनामे में कहा गया है कि धोखाधड़ी और कदाचार समेत अनियमितताओं के कथित मामलों के संबंध में सीबीआई जांच कर रही है। सीबीआई ने विभिन्न राज्यों में दर्ज मामलों को अपने हाथ में ले लिया है। केंद्र ने कहा कि वह सभी प्रतियोगी परीक्षाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि कुछ आपराधिक तत्वों के इशारे पर प्रतियोगी परीक्षा की गोपनीयता भंग की गई है, तो उनके साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने कहा, “सरकार परीक्षाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से करने और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। परीक्षा में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए संसद ने 12 फरवरी 2024 को पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 पारित किया। यह अधिनियम 21 जून 2024 को लागू किया गया है। अधिनियम के तहत पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) नियम, 2024 को भी 23 जून को अधिसूचित किया गया है।” हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक कोचिंग संस्थान की ओर से नीट-यूजी परीक्षा के आयोजन में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए रिट याचिका दायर करने पर आपत्ति जताई थी।

सामान्य यहूदियों की तरह सेना में अनिवार्य सेवा देना जरूरी, इजरायल की सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भड़के कट्टर यहूदी

तेल अवीव. इजरायल के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद कट्टरपंथी यहूदी भड़के हुए हैं और वे सड़कों पर उतर आए हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अब अति रूढ़िवादी यहूदियों को भी सामान्य यहूदियों की तरह सेना में अनिवार्य सेवा देनी होगी। इसके अलावा सरकार की तरफ से मिलने वाली विशेष सुविधाएं उन्हें नहीं दी जाएंगी। अब तक कट्टर यहूदियों के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि युवा हरेदी पुरुषों को भी सेना में भर्ती किया जाना चाहिए। अब येशिवा में पढ़ने वाले युवा इस फैसले के खिलाफ उतर आए हैं। उनका कहना है कि इससे उनके धार्मिक जीवन पर असर पड़ेगा और वे धर्म का पालन नहीं कर पाएंगे। उनका कहना है कि उनका आध्यात्मिक जीवन और पूजा-पाठ इजरायल की सुरक्षा के लिए जरूरी है। रिपोर्ट की मानें तो युवाओं को इस बात पर ऐतराज है कि अगर उन्हें सेना में जाना पड़ा तो उनको धार्मिक भक्ति के रास्ते से हटना पड़ेगा। ऐसे में उनकी आस्था कमजोर हो जाएगी जो कि देश के लिए भी खतरनाक साबित होगी। उनका कहना है कि इजरायली सेना को भी उनकी कोई जरूरत नहीं है। कट्टर यहूदी मानते हैं कि उनके धर्म को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि वे लोग धर्म का पालन करें और अन्य कामों में ज्यादा समय ना गवाएं। इजरायल में अति-रूढ़िवादी लोगों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा है। यानी यह इजरायल की जनसंख्या के 12 फीसदी के करीब है। अति रूढ़िवादी दलों का सत्ता में भी दखल रहता है। लंबे समय से ये दल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का साथ दे रहे हैं। कट्टर यहूदियों को टैक्स में भी छूट मिलती है। वहीं सामान्य यहूदी सेना में अनिवार्य सेवा भी देते हैं और टैक्स का भी भुगतान करते हैं। पहले भी इजरायल की संसद में एक विधेयक पारित हुआ था जिसके मुताबिक हरेदी युवाओं को आंशिक रूप से सेना में भर्ती किया जाना था। हालांकि यह कानून अब तक लागू नहीं हो पाया। इस कानून का हरेदी नेता विरोध करते हैं। येशिवा छात्रों को मिलती है छूट येशिवा छात्र वे होते हैं जो कि टोरा का अध्ययन करते हैं और यहूदी धर्म के नियमों का कट्टरता से पालन करते हैं। इन्हें सेना में जाने से छूट है। वहीं यह समूह हमेशा से ही बदलाव के खिलाफ रहा है। वहीं कट्टरपंथी यहूदियों का प्रदर्शन कई जगहों पर उग्र हो रहा है। कई  इलाकों में हिंसा और तोड़फोड़ भी हुई है। अब सवाल है कि बेंजामिन नेतन्याहू सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के सपोर्ट में कदम उठाएंगे या फिर राजनीतिक फायदे के लिए कोई और रास्ता निकालेंगे।

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