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उज्जैन :रविशंकर नगर से जयसिंहपुरा होते हुए नृसिंहघाट तक के मार्ग को 24 मीटर चौड़ा किया जा रहा, जिसके टेंडर हो चुके

उज्जैन नगर निगम ने रविशंकर नगर से जयसिंहपुरा होते नृसिंहघाट तिराहे तक के मार्ग चौड़ीकरण के चलते मंगलवार को प्रभावित होने वाले मकानों पर लाल निशान लगाए। मार्ग के करीब 171 मकानों को चिह्नित किया है। तीन चौराहे पर मौजूद 20 मकानों पर बाद में निशान लगाए जाएंगे।  सिंहस्थ-2028 के तहत निगम शहर के 6 मार्गों का चौड़ीकरण कर रहा है। इसी क्रम में रविशंकर नगर से जयसिंहपुरा होते हुए नृसिंहघाट तक के मार्ग को 24 मीटर (80 फीट) चौड़ा किया जा रहा है, जिसके टेंडर हो चुके हैं। महापौर के सामने जताया लोगों ने विरोध वार्ड भ्रमण के दौरान महापौर मुकेश टटवाल के सामने रविशंकर नगर के रहवासियों ने विरोध जताया। उनका कहना है कि 24 मीटर रोड़ चौड़ा होने से मकान का बड़ा हिस्सा टूट जाएगा। निगम 18 मीटर के मान से चौड़ीकरण करें। हालांकि रहवासियों को बताया गया कि मास्टर प्लान के मुताबिक ही मार्ग चौड़ा किया जा रहा है। तीन साल पूर्व स्मार्ट सिटी के माध्यम से मार्ग चौड़ा किए जाने का निर्णय लिया जा चुका है। 171 मकानों पर लगाए लाल निशान निगम ने चौड़ीकरण में प्रभावित होने वाले 171 मकानों पर लाल निशान लगाए। वहीं हरिफाटक ब्रिज, महाकाल लोक और जयसिंहपुरा चौराहे पर बने 20 मकानों को फिलहाल छोड़ दिया गया। यहां चौराहे विकास के चलते भूमि अधिग्रहण किया जाएगा। मकानों पर लगे लाल निशान के तहत कई मकान 25 फीट तक चौड़ीकरण की जद में आ रहे हैं। जोन 2 के भवन अधिकारी राजकुमार राठौर ने गाड़ी अड्डे चौराहे से लेकर शीतला माता मंदिर तक शेष मकान एवं दुकानों पर लाल निशान लगाए।

आउटर रिंग रोड प्रोजेक्ट के तहत भूमि अधिग्रहण को लेकर विरोध तेज, कांग्रेस ने की पदयात्रा शुरू

इंदौर आउटर रिंग रोड के लिए किए जा रहे सर्वे का विरोध करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ ने इसे रुकवा दिया था। अब कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाते हुए प्रभावित गांवों के किसानों तक पहुंचने के लिए पदयात्रा निकालने की योजना बनाई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी खुद इस यात्रा का नेतृत्व करेंगे और आठ दिनों तक इंदौर के प्रभावित क्षेत्रों में पदयात्रा करेंगे।   सर्वे को लेकर क्यों हुआ विरोध?   जब आउटर रिंग रोड का सर्वे किया जा रहा था, तब प्रभावित गांवों के किसानों ने इसका जबरदस्त विरोध किया। भारतीय किसान संघ ने किसानों के साथ मिलकर नेशनल हाईवे के अधिकारियों को किसी भी गांव में सर्वे करने से रोक दिया। यहां तक कि प्रशासन को कलेक्टर कार्यालय पर हुए धरने के बाद यह आश्वासन देना पड़ा कि जब तक मुख्यमंत्री से बातचीत नहीं हो जाती, तब तक सर्वे नहीं होगा। इस आश्वासन के बाद सर्वे कार्य पूरी तरह रोक दिया गया। अब कांग्रेस इस मुद्दे पर सक्रिय हो गई है और किसानों के बीच जाकर सरकार की नीतियों का विरोध कर रही है।  आउटर रिंग रोड और पूर्वी रिंग रोड के प्रभावित गांव   आउटर रिंग रोड प्रोजेक्ट के तहत धार जिले के पांच गांव, देपालपुर तहसील के 16 गांव और सांवेर तहसील के 18 गांव प्रभावित हो रहे हैं। इनमें से देपालपुर तहसील का 35 किलोमीटर और सांवेर तहसील का 37 किलोमीटर का हिस्सा इस परियोजना में शामिल है। जीतू पटवारी इन सभी गांवों में पदयात्रा करेंगे। इसके अलावा, पूर्वी रिंग रोड भी इस पदयात्रा का हिस्सा होगी। यह रोड पीर कराड़िया गांव से शुरू होकर नेटरेक्स तक फैली हुई है। इस क्षेत्र में चार केंद्र बनाए गए हैं, जहां हर सेंटर से 200 बीघा जमीन अधिग्रहित की जानी है। बेटमा खुर्द को भी एक केंद्र बनाया गया है। इस पूरे क्षेत्र की कुल लंबाई 77 किलोमीटर है, जिसे चार दिन में कवर किया जाएगा।   कैसा रहेगा पदयात्रा का कार्यक्रम? पदयात्रा को लेकर कांग्रेस ने विस्तृत शेड्यूल तैयार किया है।   – हर दिन सुबह नाश्ते के बाद पदयात्रा शुरू होगी।   – दिन में किसी गांव में रुककर भोजन किया जाएगा।   – शाम को जिस स्थान पर यात्रा रुकेगी, वहां पर सभा का आयोजन होगा।   – इस दौरान कांग्रेस के नेता किसानों से मिलकर सरकार के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाएंगे।   – जिला कांग्रेस अध्यक्ष सदाशिव यादव के अनुसार, यह यात्रा 10 मार्च तक तय की गई है और होली के बाद इसे आगे बढ़ाया जा सकता है।   किसानों को 15 गुना कम मुआवजा देने का आरोप कांग्रेस का आरोप है कि सरकार किसानों को उनकी जमीन की वास्तविक कीमत से 15 गुना कम मुआवजा देने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस नेता सदाशिव यादव का कहना है कि जिस गांव में सरकारी गाइडलाइन के अनुसार जमीन की कीमत 10 लाख रुपए प्रति एकड़ है, वहां की वास्तविक कीमत 1.5 करोड़ रुपए प्रति एकड़ है। इसके बावजूद सरकार केवल दोगुना मुआवजा देने की योजना बना रही है, जबकि भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार चार गुना मुआवजा मिलना चाहिए।   किसानों को पक्ष में लेने का प्रयास कांग्रेस इस पदयात्रा के जरिए किसानों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। पार्टी इस अभियान के जरिए सरकार पर दबाव बनाकर किसानों को उचित मुआवजा दिलाने की मांग करेगी।   समय बताएगा पदयात्रा का कितना असर होगा आउटर रिंग रोड प्रोजेक्ट को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। पहले भारतीय किसान संघ ने इसका विरोध करके सर्वे रुकवा दिया, और अब कांग्रेस ने पदयात्रा निकालकर इस मुद्दे को और गरमा दिया है। जीतू पटवारी की यह यात्रा किसानों को जागरूक करने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए की जा रही है। अब देखना होगा कि इस पदयात्रा का कितना असर पड़ता है और क्या किसानों को उनकी जमीन का उचित मुआवजा मिल पाता है या नहीं।

उमरिया में पंजीयन विभाग ने बनाया रिकॉर्ड, कोल ब्लॉक के एक ही दस्तावेज में मिला 17 करोड़ 53 लाख का राजस्व

उमरिया  जिले में एक जमीन की रजिस्ट्री से 17 करोड़ 53 लाख रुपए का राजस्व मिला है। यह रजिस्ट्री मध्य प्रदेश के इतिहास में सबसे बड़ी रजिस्ट्रियों में से एक हो सकती है। यह रकम उमरिया जिले के सालाना राजस्व लक्ष्य, जो कि 21 करोड़ रुपए है, का एक बड़ा हिस्सा है। यह रजिस्ट्री संपदा 2.0 के माध्यम से हुई है। इसमें उमरिया और शहडोल जिलों के पांच गांवों की लगभग 2000 हेक्टेयर जमीन 30 साल की लीज पर दी गई है। एमपी का छोटा सा जिला है उमरिया उमरिया, जो कि एक छोटा सा जिला है। इस जिला ने एक ही रजिस्ट्री से राजस्व संग्रह में बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में तो करोड़ों की रजिस्ट्रियां आम हैं। लेकिन उमरिया जैसे छोटे जिले के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। जहां जिले का सालाना लक्ष्य ही 21 करोड़ है, वहां एक ही दिन में 17 करोड़ 53 लाख की रजिस्ट्री होना आश्चर्यजनक है। संपदा 2.0 पोर्टल के जरिए हुई रजिस्ट्री सब रजिस्ट्रार आशीष श्रीवास्तव ने इस रजिस्ट्री की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि यह रजिस्ट्री संपदा 2.0 पोर्टल के माध्यम से हुई है। इसमें उमरिया जिले के तीन और शहडोल जिले के दो गांव शामिल हैं। कुल मिलाकर लगभग 2000 हेक्टेयर जमीन की 30 साल की लीज पर रजिस्ट्री हुई है। इससे सरकार को 17 करोड़ 53 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि यह उमरिया जिले के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने आगे कहा कि और जहां तक मैं समझता हूं कि शहडोल संभाग की सबसे बड़ी रजिस्ट्री है। जब उनसे प्रदेश में इतनी बड़ी रजिस्ट्री के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वहीं पूंछा गया कि प्रदेश में इतनी बड़ी रजिस्ट्री सुनने को नही मिली है तो बोले कि शहडोल संभाग में तो नहीं है लेकिन प्रदेश की जानकारी नहीं है। शहडोल संभाग के लिए है रेकॉर्ड यह रजिस्ट्री न केवल उमरिया जिले के लिए, बल्कि पूरे शहडोल संभाग के लिए भी एक रिकॉर्ड हो सकती है। संपदा 2.0 के लागू होने के बाद से यह प्रदेश की सबसे बड़ी एकल रजिस्ट्री भी हो सकती है। इससे उमरिया जिले का नाम प्रदेश भर में चर्चा में आ गया है। यह रजिस्ट्री भविष्य में जमीनों की रजिस्ट्री के लिए एक नया मानक स्थापित कर सकती है। इससे सरकार के राजस्व संग्रह में भी काफी मदद मिलेगी। यह एक मिसाल है कि कैसे छोटे जिले भी बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं।

रेलवे के नए नियम RAC यात्रियों को पैकेट बंद बेडरोल मिलेगा, जिसमें दो बेडशीट, एक कंबल, एक तकिया और तौलिया

भोपाल ट्रेनों के एसी कोच में आरएसी टिकट के साथ यात्रा करने वाले यात्रियों को रेलवे ने बड़ी सौगात दी है। रेलवे ने रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन (आरएसी) टिकट के नियमों में बदलाव कर इसको लागू कर दिया है। रेलवे के नए नियम के अनुसार अब ट्रेनों में आरएसी टिकट के साथ यात्रा करने वाले यात्रियों को एसी कोच में फुल बेडरोल की सुविधा रेल प्रशासन प्रदान करेगी। नए नियम से पहले तक होती थी ये परेशानी नए नियम से पहले तक आरएसी टिकट वाले यात्रियों को साइड लोअर बर्थ की आधी सीट पर यात्रा करनी पड़ती थी। किसी दूसरे व्यक्ति के साथ में सीट शेयर करनी होती थी। साथ ही एसी में आरएसी टिकट लेकर यात्रा करने वाले दो यात्री को मिला कर एक ही बेडरोल दिया जाता था। लेकिन अब यात्रियों को पूरी एक सीट, पूरे बेडरोल सेट के साथ मिलेगी। रेलवे के इस फैसले के बाद उन सभी यात्रियों को मदद मिलेगी, जो कि टिकट के लिए पैसा तो पूरा देते थे। मगर उनको आधी सीट ही मिलती थी। रेलवे के नए नियम के मुताबिक आरएसी यात्रियों को पैकेट बंद बेडरोल मुहैया कराएगा, जिसमें यात्रियों को दो बेडशीट, एक कंबल, एक तकिया और तौलिया शामिल होगा। पैसा पूरा, फिर भी आधी सुविधा: RAC टिकट वाले यात्री पूरे किराए का भुगतान करते हैं लेकिन उन्हें साइड लोअर बर्थ की आधी सीट पर सफर करना पड़ता है. हालांकि, अब इन यात्रियों को कंफर्म टिकट धारकों की तरह बेडरोल की सुविधा मिलेगी. कोच अटेंडेंट बर्थ पर पहुंचते ही बेडरोल उपलब्ध कराएगा. क्या कहते है अधिकारी: जागरण.कॉम के हवाले से जनसंपर्क अधिकारी (वाराणसी) अशोक कुमार ने बताया कि, “आरएसी यात्रियों को कंफर्म टिकट वालों की तरह सुविधा मिलेगी. कोच अटेंडेंट बर्थ पर पहुंचते ही बेडरोल उपलब्ध कराएगा. यह व्यवस्था यात्रियों की सुविधा और संतोष के लिए लागू की गई है.” अब मिलेगी ये सुविधाएं: अब प्रत्येक RAC यात्री को एक पैकेट बंद बेडरोल प्रदान किया जाएगा, जिसमें बेडशीट, पिलो, ब्लैंकेट, और तोलिया शामिल होंगे.     आरएसी यात्रियों को पूरी सुविधा: अब आरएसी (RAC) टिकट पर सफर करने वाले दोनों यात्रियों को अलग-अलग बेडरोल दिए जाएंगे, जिससे असुविधा और कहासुनी खत्म होगी.     ठंड से राहत: एसी कोच में ठंड से बचने के लिए पैकेट में शामिल सभी सामान (बेडशीट, पिलो, ब्लैंकेट, और तोलिया) मिलेगा.     कंफर्म टिकट के बराबर सेवा: आरएसी यात्री भी अब कंफर्म टिकट धारकों की तरह सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे. रेलवे को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर RAC यात्री तक बेडरोल सही समय पर पहुंचे, ताकि यह सुविधा सुचारू रूप से लागू हो सके. ह कदम आरएसी यात्रियों के अधिकारों और उनकी यात्रा को बेहतर बनाने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है.

मध्य प्रदेश की सात स्मार्ट सिटी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करके नागरिक सेवाओं में सुधार किया जाएगा

 भोपाल  भोपाल सहित प्रदेश की सात स्मार्ट सिटी में एआइ तकनीक से नागरिक सेवाएं बेहतर बनाई जाएंगी। भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर एवं सतना का चयन स्मार्ट सिटी के रूप में किया गया है। चिह्नित शहरों में सुशासन और नागरिक सेवाओं को सशक्त बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इन चयनित शहरों में इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (आईसीसीसी) और इंटेलिजेंट ट्रेफिक मैनेजमेंट सिस्टम (आईटीएमएस) को लागू किया गया है। रियलटाइम डाटा आईसीसीसी तकनीक स्मार्ट सिटी में नागरिक सेवाओं में डाटा संचालन और निर्णय लेने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आईसीसीसी और आईटीएमएस इन दोनों प्रणालियों में रियलटाइम में डाटा एकत्र कर त्वरित कार्रवाई करने की क्षमता है। इन प्रणालियों के जरिए स्मार्ट सिटी में जल आपूर्ति, अपशिष्ट प्रबंधन, स्ट्रीट लाइटिंग और सार्वजनिक सुरक्षा जैसी शहर की सेवाओं की लगातार निगरानी संभव है। नेशनल अर्बन डिजिटल मिशन में एआई को किया शामिल केंद्र सरकार ने नेशनल अर्बन डिजिटल मिशन (एनडीयूएम) में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को शामिल करने का निर्णय लिया है। आईसीसीसी तकनीक से स्मार्ट सिटी में अपशिष्ट संग्रह वाहनों की वास्तविक समय की ट्रैकिंग से समय पर कचरा निपटान और सफाई सुनिश्चित हो रही है। भविष्य में इन केंद्रों को स्वचलित अलर्ट स्वच्छता संबंधी मुद्दों को तुरंत निराकृत करने में भी सक्षम बनाया जाएगा। स्मार्ट सिटी में जल वितरण और रिसाव का पता लगाने वाली प्रणालियों को कंट्रोल रूम के माध्यम से निगरानी में रखा जा सकेगा। इससे पानी के अपव्यय को काफी हद तक कम करने और शहर में पानी की समान रूप से आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसी के साथ आईसीसीसी के माध्यम से स्मार्टग्रिड और स्ट्रीटलाइट आटोमेशन ऊर्जा की खपत को कम करने और विद्युत वितरण व्यवस्था को और दक्ष बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अपराध की रोकथाम और यातायात प्रबंधन में भी मिल रही मदद वर्तमान में इन सात स्मार्ट सिटी में आईसीसीसी के साथ एकीकृत निगरानी प्रणाली अपराध की रोकथाम और यातायात प्रबंधन में मदद कर रही है। स्मार्ट सिटी में आईटीएमएस द्वारा भीड़-भाड़ को कम करने, दुर्घटनाओं को कम करने और शहरी गतिशीलता को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम किए जा रहे हैं। इस प्रणाली के माध्यम से ट्रैफिक सिग्नल और रियल टाइम ट्रैफिक का विश्लेषण भी किया जा रहा है। सातों स्मार्ट सिटी में 303 स्थानों पर 2301 कैमरे लगाए गए हैं। पिछले तीन वर्षों में इस प्रणाली के माध्यम से करीब 27 लाख 25 हजार ई-चालान की कार्रवाईयां की गई हैं।

झाबुआ मेडिकल कॉलेजअगले तीन साल में शुरू होगा, पहले चरण में एमबीबीएस की मान्यता ली जाएगी

झाबुआ देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) का पहला मेडिकल कॉलेज झाबुआ में स्थापित किया जाएगा। विश्वविद्यालय ने इसके लिए 100 एकड़ जमीन चिह्नित कर ली है, और इस महीने के अंत तक जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। योजना के अनुसार, 2028-29 से मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई शुरू होगी। हालांकि, इससे पहले झाबुआ इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग में अगले सत्र से अस्थायी रूप से मेडिकल कॉलेज संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया है।   डीएवीवी की पिछली कार्यपरिषद बैठक में झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसके बाद जमीन की तलाश शुरू की गई। जिला अस्पताल से करीब 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में 100 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। डीएवीवी कुलपति और झाबुआ कलेक्टर के बीच इस जमीन को लेकर सहमति बन गई है। दावा किया जा रहा है कि यहां अगले तीन वर्षों में मेडिकल कॉलेज शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में एमबीबीएस कोर्स की मान्यता प्राप्त की जाएगी, और बाद में बीडीएस, आयुर्वेदिक तथा होम्योपैथी के कोर्स भी इसी कैंपस में जोड़े जाएंगे। झाबुआ में लंबे समय से मेडिकल कॉलेज खोलने की मांग की जा रही थी। यहां के स्थानीय लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए गुजरात के दाहोद जाना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज खुलने से स्वास्थ्य सुविधाओं में बड़ा सुधार होगा और लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिल सकेंगी।   1200 करोड़ होगी अनुमानित लागत   झाबुआ मेडिकल कॉलेज की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने पर विचार शुरू हो चुका है। इसकी अनुमानित लागत 1200 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इस परियोजना में राज्य सरकार से अनुदान मिलेगा, जबकि शेष राशि विश्वविद्यालय के बजट से खर्च की जाएगी। हालांकि, मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए झाबुआ इंजीनियरिंग कॉलेज के भवन को विकल्प के रूप में रखा गया है। इस भवन का उपयोग किया जाए तो मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए केवल 600 करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रस्ताव भेजा है कि यदि इंजीनियरिंग कॉलेज का भवन उपलब्ध हो जाता है, तो 2026-27 सत्र से ही मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई शुरू की जा सकती है। मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव पर विचार करने और इसे आरजीपीवी (राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय) को भेजने के निर्देश दिए हैं।   डीएवीवी की पिछली कार्यपरिषद बैठक में ही झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद वहां जमीन की तलाश शुरू हुई थी। जिला अस्पताल से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर डूंगरा लालू क्षेत्र में ही 100 एकड़ जमीन मिल गई है। डीएवीवी कुलपति व झाबुआ कलेक्टर के बीच इस जमीन को लेकर सहमति बन गई है। दावा किया जा रहा है कि यहां अगले तीन साल में मेडिकल कॉलेज शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में एमबीबीएस की मान्यता ली जाएगी। इसके बाद बीडीएस, आयुर्वेदिक और होम्योपैथी के कोर्स भी इसी कैंपस में चलाए जाएंगे। मालूम हो, झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी। अभी यहां के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दाहोद जाना पड़ता है। 1200 करोड़ आंकी जा रही है लागत झाबुआ मेडिकल कॉलेज की डीपीआर को लेकर भी मंथन शुरू हो गया है। इसकी अनुमानित लागत 1200 करोड़ आंकी जा रही है। इसमें राज्य शासन की ओर से अनुदान मिलेगा। बाकी राशि यूनिवर्सिटी के बजट से खर्च की जाएगी। हालांकि, शुरुआत के लिए विकल्प के तौर पर झाबुआ का इंजीनियरिंग कॉलेज भी रखा गया है। यहां 600 करोड़ से ही शुरुआत हो सकेगी। यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने सीएम डॉ. मोहन यादव को प्रस्ताव दिया कि अगर इंजीनियरिंग कॉलेज का भवन मिल जाए तो अगले सत्र (2026-27) से ही मेडिकल कॉलेज शुरू हो सकता है। सीएम यादव ने इसे लेकर आरजीपीवी को प्रस्ताव भेजने के लिए कहा है। कॉलेज के लिए इसी महीने से काम शुरू कर देंगे ^झाबुआ में 100 एकड़ से अधिक जमीन चिह्नित कर ली है। स्थानीय प्रशासन से इसकी सहमति मिल गई है। हमारी कोशिश है कि इसी माह नामांतरण की प्रक्रिया पूरी कर मेडिकल कॉलेज के प्रस्ताव पर काम शुरू कर दिया जाएगा। इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग मिलती है तो 2026 से ही एमबीबीएस कोर्स शुरू कर दिया जाएगा। – प्रो. राकेश सिंघई, कुलपति, देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी प्रशासन को जमीन पसंद आ गई है ^जिला अस्पताल से 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में जमीन यूनिवर्सिटी प्रशासन को पसंद आई है। एक और विकल्प इंजीनियरिंग कॉलेज के पास की 12 हेक्टेयर जमीन का भी है। यह मिल जाती है तो इस जगह को एजुकेशन हब के तौर पर विकसित किया जा सकता है। – नेहा मीणा, कलेक्टर, झाबुआ जल्द शुरू होगा कॉलेज का काम   देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई ने बताया कि झाबुआ में मेडिकल कॉलेज के लिए 100 एकड़ से अधिक जमीन चिह्नित कर ली गई है और स्थानीय प्रशासन से इसकी स्वीकृति भी मिल चुकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन की योजना है कि इस महीने के अंत तक जमीन का नामांतरण पूरा कर लिया जाए और मेडिकल कॉलेज के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए। अगर इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग मिल जाती है, तो 2026 से ही एमबीबीएस कोर्स शुरू कर दिया जाएगा।   झाबुआ प्रशासन ने दी हरी झंडी झाबुआ की कलेक्टर नेहा मीणा ने बताया कि जिला अस्पताल से 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में विश्वविद्यालय प्रशासन को जमीन पसंद आई है। इसके अलावा, इंजीनियरिंग कॉलेज के पास स्थित 12 हेक्टेयर जमीन का भी एक विकल्प है। यदि यह जमीन मिल जाती है, तो इस क्षेत्र को एक प्रमुख एजुकेशन हब के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस मेडिकल कॉलेज के निर्माण से झाबुआ और आसपास के क्षेत्रों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी और लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिल सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा लंबे समय से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिला अपने साथी पर रेप के आरोप नहीं लगा सकती क्योंकि यह सहमति से बना संबंध

नई दिल्ली  दो बालिगों में प्रेम संबंध। प्यार परवान चढ़ा। पुरुष बैंक अधिकारी तो महिला लेक्चरर। दोनों दो-चार नहीं, बल्कि 15-16 साल तक प्रेम संबंध में रहे। तमाम बार शारीरिक संबंध बनाए। फिर महिला ने एक दिन पुरुष पर शादी का झांसा देकर रेप का केस दर्ज करा दिया। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुरुष के खिलाफ चल रहे आपराधिक केस को रद्द करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह यकीन करना मुश्किल है कोई महिला शादी के झूठे वादे पर यकीन करके किसी से 16 साल तक संबंध बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला सहमति से संबंध या लिव-इन रिलेशनशिप का है जो बिगड़ गया तो रेप का केस दर्ज करा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला लंबे समय से लिव-इन में रह रही है, तो वो अपने पार्टनर पर सिर्फ शादी का झांसा देकर संबंध बनाने का आरोप नहीं लगा सकती। क्योंकि इतने लंबे समय बाद ये साबित करना मुश्किल है कि संबंध सिर्फ शादी के वादे के कारण ही बने थे। एक बैंक अफसर पर रेप का आरोप लगा था। उसकी लिव-इन पार्टनर, जो एक लेक्चरर हैं, ने कहा कि वो 16 साल तक उससे शादी के वादे के भरोसे संबंध बनाती रही। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने महिला की दलील नहीं मानी और बैंक अफसर के खिलाफ केस खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पढ़े-लिखे हैं और ये रिश्ता उनकी मर्जी से था। दोनों अलग-अलग शहरों में पोस्टिंग के दौरान भी एक-दूसरे के घर जाते थे। कोर्ट ने कहा कि ये एक प्रेम प्रसंग या लिव-इन रिलेशनशिप का मामला है जो बिगड़ गया। कोर्ट ने कहा, ‘यह विश्वास करना कठिन है कि शिकायतकर्ता लगभग 16 वर्षों की अवधि तक अपीलकर्ता की मांगों के आगे झुकती रही, बिना कभी कोई विरोध किए कि अपीलकर्ता शादी के झूठे वादे के बहाने उसका यौन शोषण कर रहा था। 16 वर्षों की लंबी अवधि, जिसके दौरान पार्टियों के बीच यौन संबंध निर्बाध रूप से जारी रहे, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त है कि रिश्ते में कभी भी बल या छल का तत्व नहीं था।’ साफ शब्दों में कोर्ट को लगा कि 16 साल तक बिना किसी विरोध के संबंध बनाना, ये दिखाता है कि इसमें जबरदस्ती नहीं थी। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में भले ही मान लिया जाए कि झूठा वादा किया गया था, लेकिन इतने लंबे समय तक संबंध जारी रहने से महिला की दलील कमज़ोर हो जाती है। महिला का कहना था कि वो इस गलतफहमी में थी कि आरोपी उससे शादी करेगा, लेकिन 16 साल तक बिना किसी सवाल के संबंध जारी रखना, इस दलील को कमजोर बनाता है। कोर्ट ने कहा कि इतने समय तक चुप रहना समझ से परे है। यदि वाकई धोखा हुआ था, तो इतने सालों तक रिश्ते क्यों निभाए गए? ये एक बड़ा सवाल है।  

मध्य प्रदेश में विधि एवं विधायी विभाग के कर्मचारियों को मिली पदोन्नति, आर्थिक लाभ, महाधिवक्ता कार्यालय के कर्मचारी भी शामिल

भोपाल  नौ वर्ष से मध्य प्रदेश में बंद पदोन्नतियों की राह विधि एवं विधायी विभाग ने खोल दी है। विभाग ने सवा सौ से अधिक कर्मचारियों को विभागीय भर्ती नियम के अनुसार वरिष्ठताक्रम में एक जनवरी 2024 से पदोन्नति के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी दे दिया। इसमें महाधिवक्ता कार्यालय के कर्मचारी भी शामिल हैं। ये पदोन्नतियां सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण को लेकर विचाराधीन प्रकरण में पारित होने वाले अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। इसी प्रक्रिया के आधार पर अब अन्य विभागों में भी सशर्त पदोन्नति दी जा सकती है। इसकी ही मांग कर्मचारी लंबे समय से कर रहे थे। मई 2016 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण नियम 2002 को निरस्त कर दिया था। सरकार ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों का मामला विचाराधीन है। इसके कारण पदोन्नतियां बंद थीं। हजारों कर्मचारी बिना प्रमोशन हुए रिटायर हजारों कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए। इसका रास्ता निकालने का सरकार ने बहुत प्रयास किया पर कभी एकराय नहीं बन पाई। इस बीच विधि एवं विधायी विभाग के कर्मचारियों ने पदोन्नति न मिलने पर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण नियम निरस्त हुए हैं न कि विभागीय भर्ती नियम। इसमें प्रविधान है कि एक निश्चित अवधि के बाद वरिष्ठताक्रम में उच्च पद पर पदोन्नत किया जाएगा। इसे ही आधार बनाते हुए हाई कोर्ट ने आरपी गुप्ता एवं अन्य विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन एवं अन्य के प्रकरण में पारित आदेश के अनुसार समिति बनाकर भर्ती नियम 2010 के प्रविधान के अंतर्गत नए पदों को सम्मिलित करते हुए पदोन्नति दी गई। साथ ही विभाग के प्रमुख सचिव नरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ये पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में लंबित आरक्षण से संबंधित प्रकरण के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। मंत्री समिति भी बनाई उधर, सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सरकार पदोन्नति का रास्ता निकालने को लेकर गंभीर है और काफी समय से प्रयास भी चल रहे हैं। मंत्री समिति भी बनाई गई और विधिक परामर्श भी लिया गया। कर्मचारी संगठनों से भी चर्चा की लेकिन एक राय नहीं बनी। अब सभी परिस्थितियों को देखते हुए आगामी कदम उठाए जाएंगे। बढ़ा हुए वेतन भी मिल जाएगा उधर, मंत्रालयीन अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक का कहना है कि पदोन्नति का सबसे बेहतर विकल्प समयमान वेतनमान देकर पदनाम दे दिया जाए तो सारी समस्या ही समाप्त हो जाएगी। इससे बढ़ा हुए वेतन भी मिल जाएगा और पदनाम भी बदल जाएगा। सामान्य प्रशासन विभाग विधिक अभिमत लेने के बाद इसे लेकर नौ मार्च 2020 को परिपत्र जारी किया था। यही व्यवस्था राज्य प्रशासनिक सेवा, वित्त सेवा सहित अन्य सेवाओं में लागू हो चुकी है।

ग्वालियर किला अब निजी हाथों में, इंडिगो एयरलाइंस से 5 साल का करार

Gwalior Fort is now in private hands, 5 year agreement with Indigo Airlines Gwalior Fort: नरेंद्र कुइया. लियर के किले को अब निजी हाथों में देने की तैयारी है। इसके लिए भोपाल में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में पर्यटन-संस्कृति विभाग ने इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड (इंडिगो एयरलाइंस) के साथ एमओयू किया है। इसमें आगा खान कल्चरल सर्विसेज फोरम (एकेसीएसएफ) को शामिल किया है। अभी 5 साल के करार में किले के संरक्षण और सौंदर्यीकरण होगा। बाद में पांच साल और बढ़ेगा। इसकी फंडिंग इंडिगो एयरलाइंस करेगी, एकेसीएसएफ संरक्षण करेगी। इनके संरक्षण का कार्य भी वे ही करते हैं। ग्वालियर दुर्ग पर एमओयू (MOU) के बाद की प्रक्रिया शुरू करने से पहले मप्र टूरिज्म(MP Tourism), इंडिगो एयरलाइंस (Indigo Airlines) और एकेसीएसएफ की 100 लोगों की टीम 7 मार्च को शाम 4 बजे किले पर पहुंचेगी। संरक्षण कार्य तो पहले से हो रहाइस एमओयू में ग्वालियर किले के वि₹म महल, कर्ण महल, गूजरी महल, जहांगीर महल, शाहजहां महल, हुमायू महल और जौहर कुंड सहित कई ऐतिहासिक संरचनाओं के दस्तावेजीकरण और संरक्षण करने की बात कही गई है। जबकि राज्य पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित स्मारकों के संरक्षण का कार्य पूर्व में भी किया गया है और वर्तमान में भी किया जा रहा है। राज्य पुरातत्व विभाग ने 2016-17 में करीब एक से डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर यहां संरक्षण कार्य किए थे। वहीं अब यहां लगभग 75 लाख रुपए से अधिक खर्च कर रिनोवेशन कार्य किए जा रहे हैं। साथ ही यहां पाथवे का निर्माण कार्य भी जारी है। ऐसे में निजी कंपनी से संरक्षण कार्य कराने की क्या जरूरत आन पड़ी है। एमओयू में ऐसे तथ्य● ग्वालियर किला कंजर्वेशन और इल्यूमिनेशन परियोजना बहुआयामी प्रयास।● पर्यटकों के लिए सुविधाजनक पहुंच मार्ग, सुविधाओं का विस्तार।● मौजूदा स्थानों का उपयोग कर कैफे व प्रदर्शनी स्थलों का विकास। तब विरोध पर रुका था होटल निर्माणग्वालियर किले पर बनी भीमसिंह राणा की छत्री पर शासन ने 2022-23 में होटल की योजना बनाई थी। जाट समाज के विरोध के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई थी। श्योपुर का किला, बलदेवगढ़ का किला, दतिया का राजगढ़ पैलेस राज्य पुरातत्व विभाग से असंरक्षित कर पर्यटन निगम को दिए थे। 50 लाख रुपए मासिक आयग्वालियर किले पर 50 लाख रु. मासिक आय ग्वालियर दुर्ग पर बने केंद्र-राज्य पुरातत्व विभाग के स्मारकों को देखने विदेशों से सैलानी आते हैं। मासिक आय 50 लाख तक है। विशेष दिनों में यह बढ़ जाती है। संरक्षण कार्य तो पहले से हो रहाइस एमओयू में ग्वालियर किले के विक्रम महल, कर्ण महल, गूजरी महल, जहांगीर महल, शाहजहां महल, हुमायू महल और जौहर कुंड सहित कई ऐतिहासिक संरचनाओं के दस्तावेजीकरण और संरक्षण करने की बात कही गई है। जबकि राज्य पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित स्मारकों के संरक्षण का कार्य पूर्व में भी किया गया है और वर्तमान में भी किया जा रहा है। राज्य पुरातत्व विभाग ने 2016-17 में करीब एक से डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर यहां संरक्षण कार्य किए थे। वहीं अब यहां लगभग 75 लाख रुपए से अधिक खर्च कर रिनोवेशन कार्य किए जा रहे हैं। साथ ही यहां पाथवे का निर्माण कार्य भी जारी है। ऐसे में निजी कंपनी से संरक्षण कार्य कराने की क्या जरूरत आन पड़ी है। ऐसे काम पहले भी हो चुके हैंनिजी कंपनियों को पुरातत्व संरक्षित स्मारकों की जानकारी नहीं होती। वे धरोहरों का संरक्षण कार्य कैसे कर सकती हैं। ऐसे काम पहले भी हो चुके हैं। ये सब मिलीभगत से होते हैं।

ऐसे फल और सब्जियां जो खुद बताते हैं कि मैं किस चीज के लिए फायदेमंद हूं…

Fruits and vegetables that tell me what they are good for… हमारी प्रकृति हमें वो सब कुछ देती है जिसकी हमारे शरीर को जरूरत होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ फल और सब्जियां अपने आकार और बनावट से यह संकेत देती हैं कि वे हमारे शरीर के किस अंग के लिए फायदेमंद हो सकती हैं? प्रकृति ने हमें जो भी दिया है, वह किसी न किसी रूप में हमारे शरीर के लिए लाभकारी है। जरूरत है तो बस इसे सही तरीके से समझने और अपने आहार में शामिल करने की!

रतलाम: शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का एक और मामला उजागर, टीचर ने छात्रा से मांगे 50 हजार रुपये

Ratlam: Another case of corruption exposed in the education department, teacher demanded 50 thousand rupees from a student रतलाम! मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिले के आलोट क्षेत्र में स्थित न्यू आर्यवीर सीनियर सेकंडरी स्कूल के एक शिक्षक प्रदीप सिंह को 12वीं कक्षा की एक छात्रा से 50 हजार रुपये मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने आरोपी टीचर को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे 6 मार्च तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। प्रैक्टिकल का रिजल्ट बिगाड़ने की धमकी आरोप के अनुसार, शिक्षक प्रदीप सिंह ने छात्रा को धमकाया कि अगर उसने पैसे नहीं दिए, तो उसका प्रैक्टिकल परीक्षा का रिजल्ट खराब कर दिया जाएगा और उसका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। इतना ही नहीं, आरोपी शिक्षक ने कथित रूप से छात्रा को उसके माता-पिता की जान से मारने की धमकी भी दी। छात्रा के परिजनों की शिकायत पर कार्रवाई पीड़िता की शिकायत के बाद परिजनों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, एक मार्च को छात्रा स्कूल की एक्सट्रा क्लास में गई थी, जहां टीचर प्रदीप सिंह ने उसे अलग बुलाकर पैसे लाने के लिए धमकाया। जब छात्रा ने घर आकर अपने माता-पिता से 50 हजार रुपये मांगे, तो उन्होंने कारण पूछा, जिस पर छात्रा ने पूरा मामला उजागर कर दिया। इसके बाद परिजनों ने तुरंत पुलिस से संपर्क किया। पुलिस जांच में जुटी शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया और उससे पूछताछ कर रही है। प्रारंभिक जांच में आरोपी पर लगे आरोप सही पाए गए हैं। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या आरोपी पहले भी इस तरह की हरकतों में शामिल रहा है। शिक्षा विभाग पर उठे सवाल इस घटना ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक शिक्षक, जो बच्चों को सही दिशा देने के लिए जिम्मेदार होता है, अगर इस तरह के अपराध में लिप्त पाया जाता है, तो यह पूरे शिक्षा तंत्र के लिए एक चिंता का विषय बन जाता है। इस मामले के उजागर होने के बाद अभिभावकों में भी भय और आक्रोश है। पुलिस जल्द ही पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट पेश करेगी और आरोपी शिक्षक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

एमपी गजब : बीईओ-क्लर्क ने मिल कर शिक्षा विभाग को लगाया 5 करोड़ का चुना: शिक्षकों का वेतन रिश्तेदारों के खातों में डाला, प्राचार्यों की मिलीभगत से फर्जीवाड़ा

MP Amazing: BEO-Clerk together defrauded the Education Department of Rs 5 crore: Teachers’ salaries were transferred to the accounts of relatives, fraud was committed in connivance with the principals भोपाल (कमलेश)। मध्यप्रदेश में शिक्षा विभाग के कर्मचारी भ्रष्टाचार करने के लिए पत्नियों और रिश्तेदारों के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका खुलासा शिक्षा विभाग की ही जांच में हुआ है। पिछले महीने रायसेन के सिलवानी बीईओ दफ्तर में 1 करोड़ के गबन के मामले में 26 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इनमें शिक्षा विभाग के कर्मचारी, प्राचार्य और रिटायर्ड प्राचार्य शामिल हैं। इनके अलावा जिन 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, वो इन कर्मचारियों की पत्नियां और रिश्तेदार हैं। ये एकलौता मामला नहीं है। 5 अन्य जिलों में भी गबन के ऐसे ही मामले सामने आए हैं, जिनमें पत्नियों और रिश्तेदारों के अकाउंट में भ्रष्टाचार की करीब 5 करोड़ की रकम ट्रांसफर की गई। 10 मार्च से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र में भी ये मामला उठ सकता है। आखिर किस तरह पत्नी और रिश्तेदारों के खातों से किया गया भ्रष्टाचार और इन मामलों में क्या एक्शन लिया गया, पढ़िए रिपोर्ट… अब जानिए, कैसे किया एक करोड़ का गबन रायसेन के जिला शिक्षा अधिकारी डीडी रजक के मुताबिक, ये पूरा हेरफेर साल 2018 से 2022 के बीच किया गया। सिलवानी विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पदस्थ क्लर्क चंदन अहिरवार इस गबन का मास्टरमाइंड है। चंदन के पास विकासखंड के अंतर्गत आने वाले हर स्कूल के शिक्षक की बैंक अकाउंट डिटेल होती थी। रजक बताते हैं कि 2022 तक शिक्षक और अतिथि शिक्षकों की सैलरी का भुगतान वेंडर के जरिए होता था। तब ऑफलाइन ट्रांजेक्शन भी हो जाता था। इसी का फायदा आरोपियों ने उठाया है। चंदन शिक्षक और अतिथि शिक्षकों के नाम के आगे अपने रिश्तेदार या पत्नी का बैंक अकाउंट दर्ज कर वेतन और मानदेय की राशि ट्रांसफर करता था। उसने पत्नी सुमन अहिरवार के बैंक अकाउंट में 37 लाख रुपए जमा कराए। इसी तरह इस गबन में शामिल बाकी लोगों ने भी करीब 58 लाख रुपए की रकम पत्नियों और रिश्तेदारों के अकाउंट में जमा कराई। प्राचार्यों की भी मिलीभगत, 3 रिटायर हो चुकेजिला शिक्षा अधिकारी डीडी रजक बताते हैं कि सरकार ने पहले स्कूल के प्राचार्यों को ही डीडीओ (आहरण एवं संवितरण) के अधिकार दिए थे। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि शिक्षकों को सैलरी के लिए संकुल कार्यालय पहुंचना पड़ता था। मगर, शिक्षा विभाग के कर्मचारी और प्राचार्यों ने मिलीभगत कर इस व्यवस्था को पलीता लगाया। रजक के मुताबिक, इस दौरान पांच स्कूलों के प्राचार्यों को डीडीओ की जिम्मेदारी दी गई थी। इनके साइन से ही रिश्तेदारों के खातों में ये राशि पहुंचाई गई। इसमें इनकी बराबर की भागीदारी है। गड़बड़ी सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर जांच की गई तो इनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराई गई है। अब जानिए, कैसे किया पूरा गबन पासवर्ड बांट दिया: नियमों के मुताबिक, डीडीओ अपना पासवर्ड किसी को साझा नहीं कर सकता। जांच में पाया गया कि डीडीओ ने अपना पासवर्ड कर्मचारियों को दे दिया। इसका इस्तेमाल कर कोषालय से पैसा निकाला गया। महीने की समीक्षा नहीं हुई: नियमानुसार हर महीने भुगतान की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि गड़बड़ियों का पता लगाया जा सके। सिलवानी बीईओ दफ्तर में ये प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। इससे ये पता नहीं चला कि सही व्यक्ति के खाते में पैसा पहुंचा या नहीं। ई-भुगतान का सत्यापन नहीं: हर महीने ये जांच होना चाहिए कि जो भी ऑनलाइन भुगतान किए हैं, वो सही बैंक अकाउंट में पहुंचे या नहीं। यहां इस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। असली दावेदारों का नाम गायब किया: जब किसी व्यक्ति को भुगतान किया जाता है, तो उसका नाम और बैंक खाता सरकारी डेटाबेस में दर्ज करना जरूरी होता है। जांच में पाया गया कि इस प्रक्रिया को भी नहीं अपनाया गया। बिल तैयार करने में लापरवाही: कोषालय संहिता 2020 के नियमों के अनुसार, बिल (देयक) बनाने की जिम्मेदारी क्रिएटर की होती है। उसे सॉफ्टवेयर में अपने पासवर्ड से लॉगिन कर भुगतान लेने वाले व्यक्ति का नाम, बैंक खाता नंबर दर्ज करना होता है। अप्रूवर इस बिल की जांच कर कोषालय में जमा करता है। जांच में पाया गया कि इस प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। स्वीकृति आदेश में अनियमितता: जब किसी भुगतान को स्वीकृत किया जाता है, तो उसके साथ स्वीकृति आदेश (Approval Order) संलग्न किया जाता है। लेकिन जांच में पाया गया कि कई मामलों में अलग-अलग भुगतान के लिए एक ही स्वीकृति आदेश का उपयोग किया गया। इसके अलावा, कई अधूरे स्वीकृति आदेश भी जारी किए गए और कुछ मामलों में आदेश अटैच ही नहीं किए गए। ऐसे पांच और मामलों की जांच की जा रही है रायसेन का ये अकेला मामला नहीं है। पिछले दो साल में गबन के ऐसे 5 और मामले हैं, जिनकी विभागीय जांच की जा रही है। इनमें भी विभागीय अधिकारी, शिक्षक और कर्मचारियों की मिलीभगत पाई गई है। छिंदवाड़ा: रिश्तेदार-पत्नी और बहन के खातों में 1 करोड़ 32 लाख ट्रांसफर छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव शिक्षा अधिकारी कार्यालय में 1.32 करोड़ रुपए के गबन का खुलासा जुलाई 2024 में हुआ था। जबलपुर वित्त विभाग की टीम ने सात दिन की जांच के बाद यह फर्जीवाड़ा पकड़ा। इस मामले में पूर्व बीईओ एमआई खान और चौरई संकुल के बाबू तौसिफ खान की मिलीभगत पाई गई। आरोपियों ने कोरोना में मृत कर्मचारियों की सहायता राशि भी हड़प ली और सरकारी धन को अपने रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर किया गया। वित्त विभाग की टीम को जुन्नारदेव में तकरीबन 1 करोड़ 44 लाख के घोटाले की आशंका थी। इसमें से 1 करोड़ 32 लाख की पुष्टि हो चुकी है। क्या हुआ: जिला शिक्षा अधिकारी गोपाल सिंह बघेल ने बताया कि आरोपियों पर एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। सभी को निलंबित कर दिया है। उनसे राशि वसूल करने की प्रक्रिया जारी है। ग्वालियर: अलग-अलग खातों में 47 लाख ट्रांसफर ग्वालियर के विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय डबरा में 2024 में 47 लाख रुपए के गबन का मामला सामने आया था। इस गड़बड़ी को भोपाल की ऑडिट टीम ने पकड़ा था। यह राशि सात अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई, जिनमें तत्कालीन … Read more

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