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एक दशक में दूसरी बार भारतीय प्रधानमंत्री ने यात्रा के लिए भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया

नई दिल्ली  श्रीलंका की सफल यात्रा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत लौट आए हैं। थाईलैंड के बाद श्रीलंका पहुंचे पीएम मोदी का जोरदार स्‍वागत किया गया। इस दौरान श्रीलंका के राष्‍ट्रपति अनूरा कुमार दशनायके ने शनिवार को पीएम मोदी को देश का सर्वोच्‍च नागर‍िक सम्‍मान ‘श्रीलंका मित्र व‍िभूषण’ दिया। पीएम मोदी ने बौद्ध धर्मस्‍थलों का भी दौरा किया जिनका भारत से करीबी नाता रहा है। पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान एक दुर्लभ घटना घटी। पीएम मोदी ने श्रीलंका में अनुराधापुरम की अपनी यात्रा के लिए भारतीय वायुसेना के बेहद शक्तिशाली हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया। एक दशक में ऐसा दूसरी बार हुआ है जब भारतीय प्रधानमंत्री ने श्रीलंका के अंदर यात्रा के लिए भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया। बताया जा रहा है कि कभी तमिल विद्रोही गुट लिट्टे का गढ़ रहे श्रीलंका में सुरक्षा कारणों से पीएम मोदी के लिए यह फैसला लिया गया। यही नहीं पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका के अंदर कई आतंकी हमले भी हो चुके हैं। इसी खतरे को देखते हुए पीएम मोदी के लिए भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया गया। पीएम मोदी ने अनुराधापुरम में भारत के वित्‍तपोषण वाले कई रेलवे प्राजेक्‍ट का उद्घाटन किया। इसमें माहो- ओमानथाई लाइन और हाल ही में बनाया गया माहो- अनुराधापुरम खंड शामिल है। इसके अलावा माहो- अनुराधापुरम खंड के सिग्‍नल को भी दुरुस्‍त किया गया। पीएम मोदी ने क‍िया वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल वरिष्‍ठ पत्रकार येशी सेली ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि सुरक्षा कारणों से भारतीय हेलिकॉप्‍टर इस्‍तेमाल करने का यह फैसला लिया गया था। एक सूत्र ने कहा, ‘यह किसी राष्‍ट्राध्‍यक्ष के लिए ऐसी जगहों पर जिन्‍हें सुरक्षित नहीं माना जाता है, वहां पर अपनी सेना के हेलिकॉप्‍टर या विमान का इस्‍तेमाल करने में कुछ भी असामान्‍य नहीं है। इसके लिए काफी पहले ही हवाई क्लियरेंस ले लिया जाता है।’ उन्‍होंने कहा कि निश्चित रूप से भारतीय प्रधानमंत्री के इस हेलिकॉप्‍टर के लिए पहले ही मंजूरी ले ली गई होगी। दुनियाभर में हाल के वर्षों में राष्‍ट्राध्‍यक्षों के साथ कई ऐसी घटनाएं हुई हैं। माना जा रहा है कि इसी वजह से भी पीएम मोदी को किसी खतरे से बचाने के लिए भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया गया। प‍िछले साल 19 मई को ईरानी एयरफोर्स का एक हेलिकॉप्‍टर अजरबैजान की सीमा के पास क्रैश हो गया था और इसमें ईरान के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत हो गई थी। सूत्र ने कहा, ‘श्रीलंका में हालांकि हालात सुधर गए हैं लेकिन फिर भी हम खतरा नहीं उठा सकते हैं।’ माना जा रहा है कि उनका इशारा श्रीलंका के गृहयुद्ध की ओर था जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। पीएम मोदी ने एसपीजी के साथ अपनी लैंड रोवर में क‍िया सफर लिट्टे नेता प्रभाकरण की मौत के बाद तमिल हिंसक आंदोलन खत्‍म हो गया। लिट्टे के ही आत्‍मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौत हो गई थी। इससे पहले साल 2015 में जब पीएम मोदी श्रीलंका के अनुराधापुरम, जाफना और तलाईमनार की यात्रा पर गए थे तब उन्‍होंने भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्‍टर का इस्‍तेमाल किया था। पीएम मोदी की यात्रा को देखते हुए श्रीलंका की सरकार ने कुछ समय के लिए अनुराधापुरम के एयरफोर्स बेस को रविवार को इंटरनैशनल एयरपोर्ट घोषित कर दिया था ताकि भारतीय प्रधानमंत्री यहां से आसानी से स्‍वदेश रवाना हो सकें। पीएम मोदी अपनी खास लैंडरोवर कार से इस एयरपोर्ट पर पहुंचे थे जिसे खासतौर पर श्रीलंका पहुंचाई गई थी। पूरी सुरक्षा का जिम्‍मा एसपीजी कमांडो के हवाले था। यह शक्तिशाली कार हर तरह के हमले झेल सकती है।

राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रखना अवैध है, रद्द किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा 2023 में 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखने के कदम को अवैध और गलत करार दिया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने फैसला सुनाया कि विधानसभा द्वारा दोबारा पारित क‍िसी व‍िधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखने का अध‍िकार राज्यपाल के पास नहीं है। फैसले में कहा गया क‍ि राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रखना अवैध है, इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल ने सद्भावनापूर्वक कार्य नहीं किया। विधेयकों को उसी दिन राज्यपाल द्वारा स्वीकृत मान लिया गया था, जिस दिन उन्हें पुनः उनके समक्ष प्रस्तुत किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल के पास विधेयक को रोकने की कोई गुंजाइश नहीं है, साथ ही कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। उन्हें अनिवार्य रूप से मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करना होता है। इस वर्ष फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल (एजी) आर. वेंकटरमणी और तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि राज्यपाल ने खुद को वैध रूप से निर्वाचित राज्य सरकार के “राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी” के रूप में पेश किया है। तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद राज्यपाल ने अपने पास लंबित 12 में से 10 विधेयकों को उनकी सहमति के लिए वापस कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, “यदि राज्यपाल को प्रथम दृष्टया लगता है कि विधेयक में कुछ खामियां हैं, तो क्या उन्हें इसे राज्य सरकार के संज्ञान में नहीं लाना चाहिए? सरकार से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह राज्यपाल के मन में क्या है, यह जान सके? यदि राज्यपाल को व‍िधेयक में कुछ खामियां परेशान कर रही थीं, तो राज्यपाल को इसे तुरंत सरकार के संज्ञान में लाना चाहिए था और विधानसभा को विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए था।” पिछले साल नवंबर में, शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी पर सवाल उठाए थे।

पीएम मोदी ने कहा- दुबई ने भारत-यूएई व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

नई दिल्ली दुबई के क्राउन प्रिंस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के डिप्टी पीएम और रक्षा मंत्री शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक की। वह भारत की दो दिवसीय यात्रा पर मंगलवार को नई दिल्ली पहुंचे हैं। पीएम मोदी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दुबई के क्राउन प्रिंस महामहिम शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम से मिलकर खुशी हुई। दुबई ने भारत-यूएई व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह विशेष यात्रा हमारी गहरी दोस्ती की पुष्टि करती है और भविष्य में और भी मजबूत सहयोग का मार्ग प्रशस्त करेगी।” वहीं क्राउन प्रिंस ने एक्स पर लिखा, “आज नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करके खुशी हुई। हमारी बातचीत ने यूएई-भारत संबंधों की मजबूती की पुष्टि की, जो विश्वास पर आधारित है, इतिहास द्वारा आकारित है, तथा अवसरों, इनोवेशन और स्थायी समृद्धि से भरा भविष्य बनाने के साझा दृष्टिकोण से प्रेरित है।” दुबई के क्राउन प्रिंस के रूप में शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की यह पहली आधिकारिक भारत यात्रा है और उनके साथ कई मंत्री, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और एक उच्च स्तरीय व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी आया है। प्रधानमंत्री मोदी ने गणमान्य अतिथि के सम्मान में दोपहर के भोज का आयोजन किया और क्राउन प्रिंस ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ भी बैठकें कीं। इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने क्राउन प्रिंस का स्वागत किया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “दुबई के क्राउन प्रिंस और यूएई के डिप्टी पीएम और रक्षा मंत्री महामहिम शेख हमदान मोहम्मद का भारत की पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान स्वागत करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है। हमारे व्यापक सहयोग और जीवंत संबंधों के लिए उनकी सकारात्मक भावनाओं की सराहना करता हूं।” दिल्ली के बाद, क्राउन प्रिंस मुंबई का दौरा करेंगे और दोनों पक्षों के प्रमुख व्यापारिक नेताओं के साथ एक व्यापार गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे। इस बातचीत से भारत-यूएई आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग मजबूत होगा।

अमेरिका नहीं छोड़ा तो ट्रंप वसूलेंगे करोड़ों का जुर्माना, अवैध प्रवासियों पर एक और मार, ताबड़तोड़ एक्शन लिए

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार पद संभालने के बाद से ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलते हुए अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने के लिए ताबड़तोड़ एक्शन लिए हैं। ट्रंप प्रशासन ने ना सिर्फ हजारों प्रवासियों को सैन्य विमानों के जरिए डिपोर्ट कर दिया, बल्कि देश में उन पर कड़ी निगरानी भी रखी जा रही है। इस बीच ऐसी खबरें आई हैं कि ट्रंप जल्द ही प्रवासियों को लेकर एक और बड़ी घोषणा कर सकते हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी सरकार डिपोर्ट के आदेशों के बावजूद अमेरिका न छोड़ने वाले लोगों पर जुर्माना लगाने की तैयारी कर रही है। रॉयटर्स द्वारा समीक्षा किए गए दस्तावेजों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने निर्वासन आदेश के तहत प्रवासियों पर प्रतिदिन 998 डॉलर तक का जुर्माना लगाने की योजना बनाई है। इसके मुताबिक अगर प्रवासी, तय समय सीमा तक अमेरिका छोड़ने में विफल रहते हैं तो भुगतान न करने पर उनकी संपत्ति भी जब्त कर ली जाएगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस फैसले को अमल में लाने के लिए ट्रंप 1996 के एक कानून का सहारा ले सकते हैं। 1 मिलियन डॉलर तक का जुर्माना डोनाल्ड ट्रंप के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन योजनाओं पर चर्चा करने के लिए नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि ट्रंप प्रशासन यह जुर्माना पांच साल तक के लिए पूर्वव्यापी रूप से लागू कर सकती है। अगर यह योजना धरातल पर उतारी गई तो प्रवासियों पर 1 मिलियन डॉलर से अधिक का जुर्माना लगाया जा सकता है। होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने दी है चेतावनी इससे जुड़े सवालों के जवाब में यू.एस. होमलैंड सिक्योरिटी विभाग की प्रवक्ता ट्रिसिया मैकलॉघलिन ने एक बयान में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों को सेल्फ डिपोर्ट और देश छोड़ने के लिए एक मोबाइल ऐप का उपयोग करने की सलाह दी है। मैकलॉघलिन ने आगे कहा कहा, “अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे। उन्हें प्रति दिन 998 डॉलर का ​​जुर्माना भरना होगा।” विभाग ने 31 मार्च को एक सोशल मीडिया पोस्ट में जुर्माने की चेतावनी भी दी है।

एनफ्जूएंजा वायरस मिलने के बाद प्रदेशभर में अलर्ट जारी, अंतरराज्यकीय सीमाओं पर भी चौकसी बढ़ाई, मचा हड़कंप

उत्तराखंड उत्तराखंड चारधाम यात्रा के शुरू होने से पहले एक बहुत बड़ा अपडेट सामने आया है। केदारनाथ धाम रूट पर एक्वाईन एनफ्जूएंजा वायरस मिलने के बाद से हड़कंप मच गया है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के बाद अब कुमाऊं मंडल में भी अलर्ट जारी कर दिया गया है। एनफ्जूएंजा वायरस मिलने के बाद प्रदेशभर में अलर्ट जारी करने के साथ ही प्रदेश के अंतरराज्यकीय सीमाओं पर भी चौकसी बढ़ा दी गई है। वायरस की जांच से लेकर रोकथाम के लिए कड़े इंतजाम भी किए जा चुके हैं। क्वारंटीन सेंटर बनाने से लेकर पर्याप्त दवाओं की व्यवस्था की जा चुकी है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में अश्ववंशीय पशुओं में एक्वाईन एनफ्जूएंजा नामक संक्रामक बीमारी फैलने की आहट के बीच पशुपालन विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है। आपको बता दें कि यह वायरस मुख्यत: घोड़े, खच्चरों में फैलता वाला है। जो कि रोग, वायरल जुकाम की तरह लक्षण सामने आते हैं। पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ.रमेश नितवाल ने बताया कि एक्वाईन एनफ्जूएंजा को लेकर उत्तराखंड के गढ़वाल में अलर्ट पहले ही जारी हो चुका है। राहत भरी खबर यह है कि कुमाऊं मंडल में फिलहाल किसी भी अश्ववंशीय पशुओं वायरस का कोई केस सामने नहीं आया है। लेकिन, एहतियातन विभाग ने सावधानी बरतने को कहा है। पशुपालन के डॉ राजीव सिंह कहा कि सुरक्षा की दृष्टि से संदिग्धों अश्ववंशीय जानवरों के ब्लड सेंपल भी जरुरत पड़ने पर पशुपालन विभाग लेगा। कहा कि इस रोग से ग्रसित घोड़ों और खच्चरों के मांसपेशियों में दर्द, थकान व कमजोरी महसूस होती है। संक्रामक रोग की तरह यह बीमारी फैलती है। बताया कि अभी रूद्रप्रयाग में इसके एक दो केस सामने आए हैं। लंपी को समय पर हराने के बाद विभाग के लिए अब यह दूसरी मुसीबत आ खड़ी हुई है। हालांकि विभाग ने इसके लिए तैयारी कर रखी है। यात्रा रूट पर 12 अश्ववंशीय पशुओं में मिला था वायरस उत्तराखंड चारधाम यात्रा रूट पर रुद्रप्रयाग जिले में 12 अश्ववंशीय पशुओं में एनफ्जूएंजा वायरस मिला था। पशुओं में वायरस मिलने के बाद धामी सरकार अलर्ट मोड पर आ गई थी। वायरस मिलने के बाद पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने आला-अधिकारियों के साथ बैठक कर जरूरी दिशा-निर्देश दिए थे। वायरस की स्क्रीनिंग करने पर विशेषतौर से फोकस करने को कहा गया है। सरकार की ओर से सख्त निर्देश दिए हैं कि चारधाम यात्रा के दौरान किसी भी रोगग्रस्त घोड़े-खच्चर को ले जाने की अनुमति नहीं होगी। रुद्रप्रयाग में बनेंगे दो क्वारंटीन सेंटर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में दो क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं। वायरस की चपेट में आने वाले अश्ववंशीय पशुओं को क्वारंटीन किया जाएगा। आपको बता दें कि यह वायरस पशुओं में एक से दूसरे में बहुत ही तेजी के साथ फैलता है। उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों को भी अलर्ट रुद्रप्रयाग जिले में अश्ववंशीय पशुओं में वायरस की पुष्टि होने के बाद उत्तराखंड के बॉर्डर में अलर्ट जारी कर दिया गया है। विभाग की ओर से टीमें गठित कर अंतरराज्यकीय बॉर्डरों पर तैनात किया गया है। आपको बता दें कि चारधाम यात्रा के दौरान देश-विदेश से भारी संख्या में तीर्थ यात्री दर्शन करने को उत्तराखंड आते हैं। केदारनाथ और उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री धामों में घोड़े-खच्चरों से यात्रा करते हैं। मुक्तेश्वर में होगी सैंपलों की जांच उत्तराखंड के पांच जिलों के सभी घोड़े-खच्चरों के सीरोलोजिकल सैंपल लिए जाएंगे, जिनकी जांच इंडियन वेटरी रिसर्च इंस्टीट्यूट मुक्तेश्वर में कराई जाएगी। यदि कोई अश्ववंशीय पशु पॉजिटिव पाया जाता है तो उसे क्वारंटीन किया जाएगा। फिर 12 दिन बाद उसका सैंपल लेकर जांच कराई जाएगी। रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद ही यात्रा में तैनाती की अनुमति दी जाएगी। केदारनाथ-यमुनोत्री चारों धामों के कपाट खुलने की यह डेट उत्तराखंड में केदारनाथ, यमुनोत्री समेत चारों धामों के कपाट खुलने की तारीखों का ऐलान हो चुका है। रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम के कपाट 2 मई को खोले जाएंगे, जबकि यमुनोत्री धाम के कपाट 30 अप्रैल को खुलेंगे। चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट 4 मई, जबकि गंगोत्री धाम के कपाट 30 अप्रैल को खुलेंगे।

दो कट्टर दुश्मनों को एक मंच पर ले आया पाकिस्तान, खनिज शिखर सम्मेलन से अरबों डॉलर के निवेश की उम्मीद

इस्लामाबाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ अटैक और चीन समेत कई देशों से बढ़ते व्यापार युद्ध के बीच पाकिस्तान ने दो कट्टर दुश्मनों यानी अमेरिका और चीन को एक मंच पर ला खड़ा किया है। दरअसल, पाकिस्तान ने अपनी खानों और खनिज क्षेत्र में निवेश के लिए अमेरिका, चीन और सऊदी अरब के प्रतिनिधिमंडलों के साथ मंगलवार को इस्लामाबाद में एक शिखर सम्मेलन की शुरुआत की है, जिसमें अधिकारियों को अरबों डॉलर के निवेश की उम्मीद है। इस आयोजन का उद्देश्य पाकिस्तान के तांबा, सोना, लिथियम और अन्य खनिजों के विशाल भंडार को दुनिया के सामने लाना है। साथ ही लंबे समय से उपेक्षित इस क्षेत्र में निवेश के अवसरों को बढ़ावा देना है। पाकिस्तान खनिज निवेश मंच का उद्घाटन उप प्रधान मंत्री इशाक डार ने किया, जिन्होंने अपने संबोधन में कहा कि “पाकिस्तान रणनीतिक रूप से वैश्विक खनन महाशक्ति के रूप में उभरने की स्थिति में है।” उन्होंने कहा कि देश के पास दुनिया के सबसे बड़े अज्ञात भंडारों में से एक है और संभावित निवेशकों को प्रोत्साहन दे रहा है। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ और देश के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए। बलूचिस्तान में तांबे और सोने का सबसे बड़ा भंडार बता दें कि पाकिस्तान में खनिज संपदा का भंडार है, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े तांबे और सोने के भंडारों में से एक रेको डिक भी शामिल है, जो अशांत दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान का एक जिला है, जहां हाल के वर्षों में बलूच अलगाववादियों द्वारा सुरक्षा बलों और विदेशियों पर हमलों में वृद्धि देखी गई है। तेल और खनिज से समृद्ध बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है। यह देश के जातीय बलूच अल्पसंख्यकों का केंद्र है, जिनके सदस्यों का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा भेदभाव और शोषण का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान का कहना है कि उसने बलूचिस्तान में उग्रवाद को दबा दिया है, लेकिन प्रतिबंधित बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने पिछले महीने से ही हमले जारी रखे हैं। बीएलए ज़्यादातर सुरक्षा बलों और विदेशियों, खासकर चीनी नागरिकों को निशाना बनाता है जो बीजिंग के अरबों डॉलर के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्से के रूप में पाकिस्तान में हैं। बीएलए चाहता है कि सभी चीनी-वित्तपोषित परियोजनाओं पर रोक लगे और चीनी कर्मचारी पाकिस्तान छोड़ दें। पाकिस्तान का क्या प्लान? अब पाकिस्तान ने इस खनिज सम्मेलन के जरिए दो दांव चलने की कोशिश की है। पहला यह कि उसने यह दिखाने की कोशिश की है कि उसके लिए अमेरिका और चीन दोनों एक समान हैं और दोनों ही देशों के साथ वह व्यापारिक और राजनयिक संबंधों में मधुरता बनाए रखना चाहता है। दूसरा वह अशांत बलूचिस्तान प्रांत में स्थित इन खनिजों के उत्खनन का काम चीन, अमेरिका या सऊदी अरब को देना चाहता है। इसके जरिए वह अशांत बलूचिस्तान में न केवल विदेशी ताकतों और विदेशी परियोजनाओं को बढ़ावा देना चाहता है बल्कि खनिजों के दोहन से प्राप्त राजस्व से अपना खजाना भी भरना चाहता है क्योंकि पाकिस्तान के लिए अपने बल-बूते बलूचिस्तान प्रांत से खनिज संसाधनों का दोहन करना मुश्किल हो सकता है।

हज और उमराह मंत्रालय ने कहा- 29 अप्रैल विदेशी उमराह तीर्थयात्रियों के लिए मुल्क से विदा लेने का अंतिम दिन होगा

रियाद अभी हाल ही में सऊदी अरब ने भारत और पाकिस्तान समेत 14 देशों पर अस्थायी तौर पर वीजा बैन लगा दिया था ताकि उमराह करने वालों और हज तीर्थयात्रा करने वालों की अवैध भीड़ मक्का या देशभर में जमा नहीं हो। अब सऊदी अरब के हज और उमराह मंत्रालय ने घोषणा की है कि जिन लोगों को उमराह के लिए वीजा मिल चुका है, वे उमराह पूरी कर 29 अप्रैल तक अपने-अपने देश वापस चले जाएं। मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि 29 अप्रैल विदेशी उमराह तीर्थयात्रियों के लिए मुल्क से विदा लेने का अंतिम दिन होगा। मीडिया रिपोर्ट में आधिकारिक बयान के हवाले से कहा गया है कि मंत्रालय ने कहा, “इस वर्ष उमराह करने वालों के लिए सऊदी अरब में प्रवेश के लिए 13 अप्रैल आखिरी दिन निर्धारित किया गया है, जबकि 29 अप्रैल को तीर्थयात्रा की मियाद खत्म हो जाएगी। इस समय सीमा के बाद सऊदी अरब में रहने वाले तीर्थयात्रियों को देश के वीजा और तीर्थयात्रा नियमों का उल्लंघन करने वाला माना जाएगा।” उल्लंघन करने पर कितना जुर्माना मंत्रालय ने अपने बयान में जोर देकर कहा है कि अनुमत तिथियों के बाद यानी 29 अप्रैल के बाद अधिक समय तक सऊदी अरब में रुकना कानूनी उल्लंघन माना जाएगा और दोषी पाए जाने वाले विदेशियों पर सख्त दंड लागू किया जाएगा। बयान में कहा गया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों, कंपनियों और उमराह सेवा प्रदाताओं पर 100,000 सऊदी रियाल यानी 22.94 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। हज यात्रा से पहले की तैयारी सऊदी अरब ने यह कदम ऐसे वक्त उठाया है, जब वह वार्षिक हज यात्रा को आरामदायक बनाने की तैयारियों में जुटा है। सऊदी अरब का मकसद अवैध तीर्थयात्रियों को मक्का जाने से रोकना है। पिछले साल भारी भीड़ के कारण मक्का में भगदड़ मच गई थी, जिसमें 1200 लोगों की जान चली गई थी। इससे सऊदी अरब की प्रतिष्ठा दुनियाभर में धुमिल हुई थी। इसी को मद्देनजर रखते हुए सऊदी अरब ताबड़तोड़ फैसले ले रहा है। 18000 विदेशी गिरफ्तार एक दिन पहले ही सऊदी अरब ने करीब 18,407 ऐसे विदेशियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जो अवैध तरीके से वहां रह रहे थे। यानी वीजा अवधि खत्म होने के बाद भी वहां रह रहे थे। इन लोगों पर प्रवासन, श्रम और सीमा सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है। इन लोगों को 15 साल की जेल की सजा हो सकती है या करीब 2.30 करोड़ रुपये का जुर्माना हो सकता है या दोनों हो सकता है। कब से शुरू हो रही हज यात्रा सऊदी अधिकारियों ने सभी सर्विस प्रोवाइडर और हज यात्रा आयोजित कराने वाले संस्थानों को विदेशी तीर्थयात्रियों के प्रस्थान समयसीमा और रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन करने का निर्देश दिया है। बयान में कहा गया है कि अधिक समय तक रुकने वाले तीर्थयात्रियों की रिपोर्ट न करने पर इन संस्थानों पर भी अधिकतम दंड लगाया जाएगा। इस तरह के सारे कदम 4 जून से शुरू हो रहे हज यात्रा से ठीक पहले उठाए गए हैं।

यूएस में एक नया बिल पेश किया गया है जिसमें छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग ऑप्शन को खत्म करने का प्रस्ताव

वाशिंगटन अमेरिका से ऐसी खबर सामने आई है जिसने करीब 3 लाख भारतीय छात्रों को चिंता में डाल दिया है। दरअसल, यूएस में एक नया बिल पेश किया गया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) ऑप्शन को खत्म करने का प्रस्ताव है। यह सुविधा वर्तमान में STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स) के छात्रों को मिलती है, जिससे वे अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में 3 साल तक रहकर काम कर सकते हैं। अगर यह विधेयक पास हो जाता है तो छात्रों को पढ़ाई खत्म करने के तुरंत बाद देश छोड़ना होगा, जब तक कि वे H-1B वीजा हासिल नहीं कर लेते। यह फैसला ऐसे समय लिया जा रहा है जब ट्रंप सरकार की टैरिफ नीतियों के चलते कई देशों को तगड़ा झटका लगा है। इंडियन स्टूडेंट्स अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सबसे बड़ी आबादी का हिस्सा हैं। ओपन डोर्स रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 में यूएस में 11 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों में से 3.31 लाख भारतीय थे। ये छात्र मुख्य रूप से STEM कोर्सेस में पढ़ाई करते हैं और OPT के जरिए प्रोफेशनल अनुभव हासिल करते हैं। इससे H-1B वीजा पाने के लिए उनकी दावेदारी मजबूत हो जाती है। अब नए बदलाव से उनके करियर प्लान पर गहरा असर पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि यह कदम डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीतियों का हिस्सा है। उन्होंने चुनाव अभियान में मास डिपोर्टेशन और वीजा नियमों को कड़ा करने का वादा किया था। अमेरिका के बाद क्या होगा छात्रों का विकल्प नए प्रस्ताव से न केवल भारतीय छात्रों, बल्कि अन्य देशों के छात्रों पर भी असर पड़ेगा। जानकारों का कहना है कि इससे कई छात्र अब कनाडा और यूरोप जैसे वैकल्पिक देशों की ओर रुख कर सकते हैं, जहां 2025-26 के लिए भारतीय आवेदनों में 20% की बढ़ोतरी देखी जा रही है। इस खबर से छात्रों में घबराहट फैल गई है। कई छात्र अब जल्दी से H-1B वीजा के लिए आवेदन करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसकी लॉटरी प्रक्रिया और सीमित कोटा इसे मुश्किल बनाते हैं। अगर OPT खत्म होता है, तो भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका में पढ़ाई और करियर का सपना अधूरा रह सकता है। यह स्थिति भारत-अमेरिका के शैक्षिक और आर्थिक रिश्तों पर भी सवाल उठाती है।

डीके शिवकुमार के करीबी MLA का बड़ा दावा, दिसंबर से पहले कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह नया CM

बेंगलुरु गुजरात में जहां एक तरफ कांग्रेस के तमाम बड़े नेता राष्ट्रीय अधिवेशन में व्यस्त हैं, वहीं कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के एक करीबी विधायक ने यह दावा कर सनसनी मचा दी है कि दिसंबर से पहले राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की जगह कोई नया चेहरा ले लेगा। एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए कर्नाटक कांग्रेस के विधायक बसवराजू शिवगंगा ने मंगलवार को दावा किया कि राज्य को दिसंबर से पहले एक नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा। बसवराजू डीके शिवकुमार खेमे के एक प्रमुख नेता हैं। कांग्रेस नेता ने कहा, “जब कुर्सी खाली हो तो कोई भी मुख्यमंत्री बन सकता है। मैं पहले ही एक बार कह चुका हूं कि दिसंबर से पहले राज्य का सीएम बदल जाएगा।” कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष पद के लिए सतीश जारकीहोली के नाम को लेकर चल रही अटकलों पर शिवगंगा ने कहा कि इस पद पर किसी को भी नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल यह पद खाली नहीं है। बता दें कि डीके शिवकुमार ही फिलहाल कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार संभाल रहे हैं और लंबे समय से उनके इस पद से हटने की चर्चा भी होती रही है। फिलहाल केपीसीसी अध्यक्ष पद खाली नहीं उन्होंने कहा, “फिलहाल केपीसीसी अध्यक्ष पद खाली नहीं है। जब होगा, तब हम इस पर बात करेंगे। उस पद पर कोई भी आ सकता है। कोई भी प्रदेश अध्यक्ष बन सकता है, वह सतीश जारकीहोली हो सकते हैं या मैं हो सकता हूं या कोई और भी हो सकता है लेकिन फिलहाल केपीसीसी अध्यक्ष पद खाली नहीं है।” शिवगंगा की यह टिप्पणी ऐसे वक्त पर आई है, जब मुख्यमंत्री पद को लेकर सीएम सिद्धारमैया और उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच पिछले कुछ महीने से खींचतान की खबरें रही हैं। दूसरी तरफ पार्टी गुजरात में एक ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित कर रही है और सभी राज्य इकाइयों के नेताओं के साथ मिलकर भविष्य के रोडमैप पर चर्चा कर रही है। शिवगंगा का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ दिनों पहले ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री शिवकुमार राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर नई दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान से मुलाकात कर चुके हैं। दो-दो पदों पर काबिज हैं शिवकुमार बड़ी बात यह है कि डीके शिवकुमार फिलहाल दो प्रमुख पदों पर काबिज हैं। एक तो वह उपमुख्यमंत् हैं और दूसरा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक् भी हैं, जो पार्टी के “एक व्यक्ति, एक पद” सिद्धांत के खिलाफ है। सिद्धारमैया खेमे के कुछ नेता उनसे प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए दबाव बना रहे हैं। हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस आलाकमान ने शिवकुमार को कम से कम इस साल नवंबर-दिसंबर तक पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख के रूप में बने रहने की मंजूरी दे दी है। इसी से संभवत: कयासों का दौर शुरू हुआ है कि दिसंबर तक राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है।

पाकिस्तान स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद विदेशी प्रभाव में है, अपने ही देश पर क्यों भड़के पाक नेता

इस्लामाबाद मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) के संस्थापक नेता अल्ताफ हुसैन का 237वां संबोधन टिकटॉक पर प्रसारित हुआ। इसमें वह पाकिस्तान सरकार की कड़ी आलोचना करते नजर आए। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद विदेशी प्रभाव में है। अल्ताफ हुसैन ने पाकिस्तान की स्थिति पर गहरी चिंता जताई और इसे गुलामी का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान को एक आजाद मुल्क के तौर पर दुनिया में मान्यता मिली हुई है, लेकिन हकीकत में यह आज भी विदेशी ताकतों के प्रभाव में है। साथ ही, अंदरूनी तौर पर सत्तावादी हुकूमत के नीचे दबा हुआ है। यह 230 मिलियन गुलामों का देश है।’ अल्ताफ हुसैन ने कहा कि मैं इन गुलाम लोगों की गुलामी को खत्म करने और सच्ची आजादी के लिए जद्दोजहद कर रहा हूं। उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान की हालत ऐसी है कि इसे एक मजाक कहना भी गलत नहीं होगा। यह मुल्क अपने लोगों को आजादी देने में नाकाम रहा है।’ एमक्यूएम नेता ने अपने संबोधन में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप पर जोर देते हुए कहा, ‘यह मुल्क अपनी मर्जी से नहीं चलता। बाहर की ताकतें इसे कंट्रोल करती हैं। अंदरूनी तौर पर सैन्य और सत्ताधारी तबके ने इसे अपने कब्जे में रखा है।’ जिन्ना की मौत पर किया बड़ा दावा एमक्यूएम नेता ने दावा किया कि पाकिस्तान के संस्थापक कायदे-आजम मुहम्मद अली जिन्ना को धीरे-धीरे जहर देकर मारा गया। उन्होंने कहा कि पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का भी यही अंजाम हुआ। उन्होंने फातिमा जिन्ना के साथ हुए व्यवहार की भी निंदा की और कहा कि चुनावी धांधली, चरित्र हनन और जनरल अयूब खान की सैन्य तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उनकी हत्या हुई। वर्तमान घटनाओं पर बोलते हुए हुसैन ने विपक्षी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे व्यवहार की कड़ी आलोचना की। उन्होंने महिला प्रदर्शनकारी महरंग बलोच की गिरफ्तारी और बलूचिस्तान नेशनल पार्टी के अख्तर मेंगल के नेतृत्व में लंबे मार्च पर कार्रवाई को शर्मनाक बताया।

अदालत का काम यह नहीं है कि वह कैबिनेट की ओर से लिए गए फैसलों की जांच कराएं, ममता सरकार को SC से राहत

कोलकाता अदालत का काम यह नहीं है कि वह कैबिनेट की ओर से लिए गए फैसलों की जांच कराएं। शीर्ष अदालत ने कोलकाता हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए यह अहम टिप्पणी की है। अदालत ने ममता सरकार को राहत देते हुए यह फैसला दिया और कहा कि शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ की 25 हजार भर्तियां कराने के फैसले की सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है। उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि अतिरिक्त भर्तियों के लिए पद सृजित किया जाना गलत था और कैबिनेट के फैसले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। इसी पर शीर्ष अदालत ने कहा कि इस केस में सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही बेंच ने कहा कि अदालतों को कैबिनेट के फैसलों की जांच नहीं करानी चाहिए। यह उनका काम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने ही बीते सप्ताह पश्चिम बंगाल में 25 हजार शिक्षक एवं अन्य स्टाफ की भर्ती को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि इसकी प्रक्रिया दागी थी और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। हालांकि अब बेंच ने ममता बनर्जी सरकार को थोड़ी राहत भी दी है। अदालत ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया है, जिसके चलते ममता सरकार निशाने पर थी। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने कहा कि अदालत की भी अपनी सीमाएं हैं। वह ऐसे मामलों में जांच का आदेश नहीं दे सकती, जिसमें फैसला कैबिनेट की मीटिंग में हुआ हो। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर ममता बनर्जी ने कहा था कि मैं अदालत का सम्मान करती हूं, लेकिन फैसला स्वीकार्य नहीं है। यही नहीं ममता बनर्जी का कहना था कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश में व्यापम जैसा घोटाला हुआ था, लेकिन किसी को कोई सजा नहीं हुई। हमने तो पूर्व शिक्षा मंत्री को हटाया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आखिर व्यापम केस में कौन जेल गया था। यही नहीं ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि नीट परीक्षा में भी धांधली हुई थी। इसके अलावा उनका आरोप था कि भाजपा और सीपीएम ने मिलकर साजिश रची है ताकि बंगाल की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जाए। दरअसल मामला यह है कि पश्चिम बंगाल में 23 लाख अभ्यर्थियों ने शिक्षक भर्ती के लिए परीक्षा दी थी। 2016 में यह भर्ती निकली थी और 24,640 पदों के लिए नोटिफिकेशन जारी हुआ था।

वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हालात बेकाबू, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़प

कोलकाता पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर क्षेत्र में मंगलवार को वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हालात बेकाबू हो गए और पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़प हो गई। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर कानून के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे, जब उन्होंने सड़क जाम करने की कोशिश की तो पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, जिससे टकराव शुरू हो गया। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ की, उन्हें आग के हवाले कर दिया और पथराव भी किया। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। इस झड़प में कई लोग घायल हो गए, जिनमें कुछ पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। बताया जा रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने वक्फ संशोधन कानून को वापस लेने की मांग करते हुए जंगीपुर पीडब्ल्यूडी मैदान से विरोध मार्च निकाला था। जब यह भीड़ उमरपुर की ओर बढ़ी, तभी पुलिस ने उन्हें रोक दिया। पुलिस की इस कार्रवाई के विरोध में भीड़ उग्र हो गई और देखते ही देखते माहौल हिंसक हो गया। हिंसा यहीं नहीं रुकी। प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ पुलिस पर हमला किया, बल्कि बनियापुर और उमरपुर इलाकों में कई घरों और दुकानों में भी तोड़फोड़ की। हिंसा इतनी ज्यादा बढ़ गई कि पुलिस को तकरीबन आधे घंटे तक इलाके से पीछे हटना पड़ा। हालात पर काबू पाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है और इलाके में तनाव बरकरार है।  

वक्फ संशोधित कानून आज से देश में प्रभावी, अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

नई दिल्ली देश में आज से वक्फ संशोधन अधिनियम लागू हो गया है। केंद्र सरकार ने इसको लेकर अधिसूचना जारी कर दी है। जिसमें बताया कि वक्फ संशोधित कानून 8 अप्रैल से देश में प्रभावी कर दिया गया है। वक्फ संधोशन विधेयक को पिछले हफ्ते संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति से मंजूरी मिल गई थी। जिसके बाद आज से यह नया कानून प्रभावी होगा। सरकार ने जारी किया नोटिफिकेशन यह अधिसूचना भारत के राजपत्र (The Gazette of India) में प्रकाशित की गई है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, केंद्र सरकार ने संविधान प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए अधिनियम की धारा 1 की उपधारा (2) के तहत 8 अप्रैल 2025 को वह तारीख घोषित की है जिस दिन से वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के सभी प्रावधान प्रभावी हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में मिली कानून को चुनौती राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद वक्फ संशोधन विधेयक कानून बन चुका है। हालांकि, संसद के दोनों सदनों से पारित होते ही इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई है। अभी तक कई याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं जिनमें इसे संविधान के खिलाफ और धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताते चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में क्या दी है दलील? कानून के खिलाफ कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में सभी को धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन की आजादी मिली हुई है, जबकि इस नये कानून में मुसलमानों की इस आजादी में हस्तक्षेप होता है और सरकारी दखलंदाजी बढ़ती है। याचिकाओं में वक्फ बोर्ड के सदस्यों में गैर मुस्लिमों को शामिल करने का भी विरोध किया गया है। सरकार ने कोर्ट में दाखिल किया कैविएट वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में 15 अप्रैल को सुनवाई संभावित है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को शीर्ष अदालत में कैविएट दाखिल की है, ताकि बिना उसकी दलीलें सुने कोई आदेश पारित न किया जा सके। 5 अप्रैल को राष्ट्रपति ने दी थी मंजूरी अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, संसद से पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 मंगलवार यानी 8 अप्रैल से प्रभाव में आ गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 5 अप्रैल को विधेयक को अपनी मंजूरी दी थी। 10 से अधिक याचिकाएं दायर, कई बड़े नेता भी याचिकाकर्ता नए कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 10 से ज्यादा याचिकाएं दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), जमीयत उलमा-ए-हिंद, DMK, AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी व मोहम्मद जावेद, आप विधायक अमानतुल्लाह खान, RJD सांसद मनोज झा और फैज़ अहमद जैसे नाम शामिल हैं। अधिनियम को बताया गया अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला AIMPLB की याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम न सिर्फ मुस्लिम अल्पसंख्यकों को उनके धार्मिक ट्रस्ट व संपत्तियों के प्रशासन से वंचित करता है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। DMK और अन्य दलों ने जताई गहरी आपत्ति DMK ने अदालत में दी अपनी याचिका में कहा है कि तमिलनाडु के 50 लाख और देशभर के 20 करोड़ मुसलमानों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ओवैसी की याचिका में कहा गया है कि अन्य धर्मों के धार्मिक ट्रस्टों को जो संरक्षण मिला हुआ है, वह वक्फ ट्रस्टों से छीना जा रहा है—जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के खिलाफ है। जमीयत उलमा-ए-हिंद: यह संविधान पर सीधा हमला है जमीयत ने इसे “मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी पर सीधी चोट” बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से अधिनियम को रद्द करने की मांग की है। क्या कहते हैं कानून विशेषज्ञ? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, इसलिए यह सुनवाई अहम साबित हो सकती है।

सरकार की पालना योजना महिलाओं के लिए बनी सहारा, अब बेफिक्र होकर नौकरी पर जा सकती हैं माताएं

नई दिल्ली पालना योजना का उद्देश्य न केवल बच्चों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना है बल्कि यह योजना माताओं को भी अपनी नौकरी पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर प्रदान करती है खासकर उन कामकाजी महिलाओं को जिनके लिए बच्चों की देखभाल एक बड़ी चुनौती होती है। यह योजना महिलाओं के लिए एक सहारा बनकर सामने आई है जो अपने बच्चों की सही देखभाल और पोषण के साथ-साथ उनके लिए एक सुरक्षित वातावरण भी सुनिश्चित करती है। पालना योजना क्या है? पालना योजना मुख्य रूप से 6 महीने से 6 साल तक के बच्चों के लिए है। इस योजना के तहत बच्चों को सुरक्षित और संरक्षित वातावरण प्रदान किया जाता है जिसमें उनकी देखभाल, पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जाती हैं। खासतौर पर एकल परिवारों के लिए यह योजना काफी सहायक साबित हो रही है क्योंकि ऐसे परिवारों में बच्चों की देखभाल के लिए कोई अतिरिक्त मदद नहीं होती है और इस कारण महिलाओं को अपनी नौकरी छोड़ने की नौबत आती है। पालना योजना का उद्देश्य पालना योजना का मुख्य उद्देश्य 6 महीने से 6 साल तक के बच्चों के लिए एक सुरक्षित, संरक्षित और पोषक वातावरण प्रदान करना है। इसके तहत बच्चों को क्रेच सेवाएं, पोषण सहायता, स्वास्थ्य जांच, संज्ञानात्मक विकास और टीकाकरण की सेवाएं मिलती हैं। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य उन माताओं की मदद करना है जिनके पास बच्चों के लिए उपयुक्त देखभाल की व्यवस्था नहीं होती। इससे वे बिना किसी चिंता के अपनी नौकरी पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं। क्या सुविधाएं मिलती हैं? पालना योजना के तहत बच्चों के लिए क्रेच सुविधा प्रदान की जाती है जहां उन्हें एक सुरक्षित और संरक्षित वातावरण मिलता है। साथ ही 3 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए विभिन्न शैक्षिक गतिविधियाँ और खेलों का आयोजन किया जाता है ताकि उनका मानसिक और शारीरिक विकास हो सके। वहीं 3 से 6 साल के बच्चों के लिए प्री-स्कूल शिक्षा, पोषण, विकास निगरानी, स्वास्थ्य जांच और नियमित टीकाकरण की सुविधाएं दी जाती हैं। पालना योजना का महत्व पालना योजना केवल बच्चों की देखभाल के लिए ही नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी एक बड़ा सहारा बन गई है। कामकाजी महिलाएं अपनी नौकरी के साथ-साथ अपने बच्चों की देखभाल को लेकर चिंतित रहती हैं और यह योजना उन्हें इस चिंता से मुक्ति देती है। इस योजना के जरिए सरकार कामकाजी महिलाओं को बच्चों की देखभाल में मदद देकर समाज में समावेशिता और समानता की नींव रखने की कोशिश कर रही है। इसके अंतर्गत महिलाओं को डे-केयर सेवाएं प्रदान की जाती हैं जो उन्हें अपने करियर और बच्चों की देखभाल के बीच संतुलन बनाने में मदद करती हैं। वहीं कहा जा सकता है कि पालना योजना न केवल बच्चों के लिए बल्कि महिलाओं और समग्र समाज के लिए एक बड़ा कदम साबित हो रही है।  

बांग्लादेश में गाजा समर्थकों ने ढाका में मचाया तांडव, पुलिस ने हिंसा के मामलों में 49 लोगों को गिरफ्तार किया

नई दिल्ली बांग्लादेश की राजधानी ढाका समेत विभिन्न शहरों में  गाजा के समर्थन में विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस दौरान कई जगहों पर हिंसा हुई थी। पुलिस ने हिंसा के मामलों में 49 लोगों को गिरफ्तार किया है। घटना के संबंध में अब तक 49 लोग गिरफ्तार अंतरिम सरकार के प्रेस विभाग ने मंगलवार को एक बयान में कहा, ‘इन घटनाओं के संबंध में अब तक 49 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और दो मामले दर्ज किए गए हैं। आगे की जांच चल रही है और इन निंदनीय कृत्यों के लिए जिम्मेदार लोगों को न्याय के दायरे में लाया जाएगा।’ बांग्लादेश के विभिन्न शहरों में सोमवार को ये प्रदर्शन गाजा में फलस्तीनियों पर हो रहे क्रूर हमलों का विरोध करने के लिए एक वैश्विक अभियान के तहत किए गए थे। छात्रों ने कक्षाओं और परीक्षाओं का बहिष्कार कर प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। प्रदर्शनों के आयोजकों ने लोगों से इजरायली सामान का बहिष्कार करने का आह्वान किया था।

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