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समृद्धि के नये द्वार खोलेगा अष्ट महालक्ष्मी मंदिर

Ashta Mahalaxmi Temple will open new doors of prosperity  समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी सुख, संपत्ति और वैभव प्रदान करती हैं। माँ लक्ष्मी को धन, वैभव, संपत्ति, यश और कीर्ति की देवी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों एवं पुराणों में माँ लक्ष्मी के आठ स्वरूपों का वर्णन है, जिन्हें अष्ट महालक्ष्मी कहा जाता है। माँ के ये अष्ट स्वरूप अपने नाम और रूप के अनुसार समस्त दुःखों का नाश कर  सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। मान्यता है कि माँ लक्ष्मी की कृपा के बिना जीवन में समृद्धि और संपन्नता संभव नहीं है।  डॉ. केशव पाण्डेय सात मार्च गुरुवार का दिन आध्यात्मिक, धार्मिक एवं ग्रह-नक्षत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित होगा और भविष्य के लिए सुखद संकेत देने वाला रहेगा। कारण इस दिन प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद श्री अष्ट महालक्ष्मी मंदिर के पट आमजन के लिए खुल जाएंगे। आम हो या खास सभी वैभव की देवी महालक्ष्मी के द्वार धन और समृद्धि की मनौती मांग सकेंगे। ग्वालियर जिले की डबरा तहसील के जौरासी में करीब 15 करोड़ की लागत से भव्य एवं विशाल श्री अष्ट महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण किया गया है। ट्रस्ट हनुमान मंदिर जौरासी द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। जिसका उद्देश्य शनि और सूर्य की युति के चलते शहर में उत्पन्न हो रहे वास्तुदोष को दूर करना है।  श्री अष्ट महालक्ष्मी के अष्ट रूप यानी यह  आठ प्रकार के धन सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति में यह आठ धन अधिक या कम मात्रा में होते हैं। हम उन्हें कितना सम्मान करते हैं, उनका कैसे उपयोग करते हैं, हमारे ऊपर निर्भर है। इन आठ लक्ष्मी की अनुपस्थिति को-अष्ट दरीद्रता कहा जाता है। चाहे लक्ष्मी है या नहीं, नारायण को अभी भी अनुकूलित किया जा सकता है। नारायण दोनों के हैं – लक्ष्मी नारायण और दरिद्र नारायण! दरिद्र नारायण परोसा जाता है और लक्ष्मी नारायण की पूजा की जाती है। पूरे जीवन का प्रवाह दरिद्र नारायण से लक्ष्मी नारायण तक, दुख से समृद्धि तक, जीवन में सूखेपन से दैवीय अमृत तक जा रहा है।  आदि, धन, धान्य, गज, संतान, वीर, जय और विद्या ये महालक्ष्मी के अष्ट रूप हैं। पहले इनके प्रत्येक रूप की महिमा को वर्णन करते हैं।    आदि लक्ष्मी = श्रीमद्भागवत पुराण में माँ लक्ष्मी का पहला स्वरूप कहा गया है। इन्हें मूल लक्ष्मी या महालक्ष्मी भी कहा गया है। मान्यता है कि आदि लक्ष्मी माँ ने ही सृष्टि की उत्पत्ति की है। भगवान विष्णु के साथ जगत का संचालन करती हैं। आदि लक्ष्मी की साधना से भक्त को जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होती है।  धन लक्ष्मी = माँ लक्ष्मी का दूसरा स्वरूप है। इनके एक हाथ में धन से भरा कलश है तो दूसरे में कमल का फूल है। धन लक्ष्मी की पूजा करने से आर्थिक संकट दूर होता है। कर्ज से मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार माँ लक्ष्मी ने ये रूप भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिया था।  धान्य लक्ष्मी = यह माँ का तीसरा रूप है। संसार में धान्य या अनाज के रूप में वास करती हैं। धान्य लक्ष्मी को माँ अन्नपूर्णा का ही एक रूप माना जाता है।   गज लक्ष्मी = चतुर्थ रूप में गज लक्ष्मी हाथी के ऊपर कमल के आसन पर विराजमान हैं। माँ गज लक्ष्मी को कृषि और उर्वरता की देवी के रूप में पूजा जाता है। इनकी आराधना से संतान की प्राप्ति होती है। राजा को समृद्धि प्रदान करने के कारण इन्हें “राज लक्ष्मी“ भी कहा जाता है।  संतान लक्ष्मी = माँ के पंचम रूप को स्कंदमाता के रूप में भी जाना जाता है। इनके चार हाथ हैं तथा अपनी गोद में कुमार स्कंद को बालक रूप में लेकर बैठी हुई हैं। माना जाता है कि संतान लक्ष्मी भक्तों की रक्षा अपनी संतान के रूप में करती हैं।  वीर लक्ष्मी = माँं लक्ष्मी का यह छठवां रूप भक्तों को वीरता, ओज और साहस प्रदान करता है। वीर लक्ष्मी माँ युद्ध में विजय दिलाती है। अपने हाथों में तलवार और ढाल जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।  जय लक्ष्मी =  माँ के इस रूप को विजय लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी साधना से भक्तों के जीवन के हर क्षेत्र में जय-विजय की प्राप्ति होती है। जय लक्ष्मी माँ यश, कीर्ति तथा सम्मान प्रदान करती हैं।  विद्या लक्ष्मी माँ लक्ष्मी का यह आठवां रूप विद्या लक्ष्मी है। इनका रूप ब्रह्मचारिणी देवी के जैसा है। इनकी साधना से शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। विश्व विख्यात श्री विद्या साधक एवं जन्म कुंडली विशेषज्ञ श्रीजी रमण योगी महाराज “साइंटिस्ट बाबा” के मुताबिक नारायण लक्ष्य है और लक्ष्मी जी उन तक पहुँचने का एक साधन। उन्होंने आठ प्रकार के धन या अष्ट लक्ष्मी के बारे में विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि माता महालक्ष्मी की नजर जिस तरफ पड़ेगी उस क्षेत्र का विकास होगा। महालक्ष्मी देवी का आभा मंडल आस-पास के इलाकों में अपना प्रभाव छोड़ेगा। अष्टभुजाओं का प्रकाश टेकनपुर और डबरा में तीव्र गति से विकास कराकर समृद्धि के द्वार खोलेगा। कारोबार के  साथ ही पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जिससे लोगों को रोजगार मिलेगा। आय बढ़ने से जीवन स्तर में बदलाव आएगा और सुखद होगा।  पंडितों एवं त्योतिषाचार्यां की मानें तो ग्वालियर से 15 किलोमीटर दूर ऐंती पर्वत पर त्रेता युगीय शनि देव मंदिर है। कहा जाता है कि भगवान शनि देव उल्का पिंड के रूप में ऐंती पर्वत पर आए। जबकि गोला का मंदिर इलाके में सूर्य मंदिर स्थित है।  शनि-सूर्य की युति एक साथ होने से लोगों के जीवन पर खासा प्रभाव होता है। दोनों ही जीवन को पूर्णतः संघर्षमय बनाते हैं। जब यह युति लग्न, पंचम, नवम या दशम भाव की स्थिति में हो या फिर  दोनों में से कोई भी एक ग्रह इन भावों का कारक भी हो तो यह योग जीवन में विलंब लाता है। बेहद मेहनत के बाद समय बीत जाने पर सफलता मिलती है। क्योंकि सूर्य और शनि दोनों पिता-पुत्र होने पर भी परस्पर शत्रुता रखते हैं। वेसे भी प्रकृति की मान्यता है कि ज्ञान और अंधकार साथ मिलने पर शुभ प्रभाव अनुभूत नहीं होते हैं। ऐसे में ग्वालियर शहर में तो यह युति एक लंबे समय से बनती चली आ रही है। इस वजह से … Read more

महाशिवरात्रि के लिए फूलों से सजा महाकाल का दरबार, 750 कैमरों से रखेंगे हर आने जाने वाले पर नजर

Mahakal’s court decorated with flowers for Mahashivratri, will keep an eye on every visitor with 750 cameras महाशिवरात्रि महापर्व के पहले ही भगवान महाकाल के दरबार में फूलों से सजावट की गई है। मंदिर के मुख्य शिखर से लेकर गर्भगृह तक को फूलों से सजाया गया है। उज्जैन ! श्री महाकालेश्वर मंदिर में शिवनवरात्रि पर्व पर एक भक्त ने मंदिर के नंदी हॉल, गर्भ गृह के साथ बाहर ओंकारेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर और शिखर पर भी आकर्षक फूलों से सजावट करवाई है। शिवरात्रि के पहले नौ दिवसीय पर्व के दौरान बाबा महाकाल के दरबार में साज-सज्जा कराने वाले भक्त अपनी बारी आने का इंतजार करते हैं। रात से ही मंदिर में फूलों से सजावट का काम शुरू हो गया था। वहीं, मुख्य पर्व महाशिवरात्रि पर भी देशी-विदेशी फूलों के साथ विद्युत रोशनी कर सजावट करने का काम 7 मार्च से शुरू होगा। शिवरात्रि पर 15 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना श्री महाकालेवर मंदिर में इस बार महाशिवरात्रि पर श्रद्धालुओं के आगमन का रिकॉर्ड टूटेगा। संभावना है कि करीब 15 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचेंगे। मंदिर समिति और जिला प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए की जा रही व्यवस्थाओं को अब अंतिम रूप दिया जा रहा है। श्रद्धालु कहां से आएंगे और कहां से जाएंगे, इसके लिए रूट प्लान जारी कर दिया गया है। कुछ दिनों पहले ही प्रशासनिक अधिकारियों ने पार्किंग स्थल से महाकाल मंदिर तक व्यवस्थाओं का जायजा लिया था। बाबा के दर्शन के लिए जगह-जगह लगेगी मेगा स्क्रीन श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था के लिए लगाए गए बैरिकेड के साथ ही कुछ स्थानों पर मंच बनाए जाएंगे। यहां भजनों की प्रस्तुति दी जाएगी। सामान्य दर्शनार्थियों के प्रवेश द्वार पर मेगा स्क्रीन लगाई जाएगी, जिससे श्रद्धालु स्क्रीन पर भी बाबा महाकाल के दर्शन कर सकेंगे। इस बार सामान्य दर्शनार्थियों को महाकाल महालोक के मानसरोवर भवन से फैसेलिटी सेंटर से कार्तिकेय मंडपम से दर्शन कराएंगे। कैमरों के साथ ड्रोन से भी रखी जाएगी नजर दर्शनार्थियों की सुविधा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए मंदिर समिति और प्रशासन की ओर से करीब 750 सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से नजर रखी जाएगी। मंदिर समिति के सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल ने बताया कि मंदिर समिति और प्रशासन की ओर से लगने वाले करीब 750 सीसीटीवी कैमरों से पार्किंग स्थल से मंदिर तक नजर रखी जाएगी। भीड़ वाले क्षेत्र में ड्रोन कैमरे लगेंगे। सभी कैमरे मंदिर के श्री महाकाल लोक और फैसेलिटी सेंटर स्थित कंट्रोल रूम से अटैच रहेंगे। यहां पर मंदिर समिति व पुलिस और प्रशासन के अधिकारी नजर रख सकेंगे।

अमीरों के चक्कर में बेचारा गरीब पिसता ,हल्दी रस्म या फिजूल खर्ची

Haldi ritual or wasteful expenditure, the poor suffer for the sake of the rich. कमलेश अहिरवार ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां- बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं। हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं। साल 2020 से पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता था, लेकिन पिछले साल दो-तीन साल से इसका प्रचलन बहुत तेजी से ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ा है। पहले हल्दी की रस्म के पीछे कोई दिखावा नहीं होता था, बल्कि तार्किकता होती थी। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में आज की तरह साबुन व शैम्पू नहीं थे और ना ही ब्यूटी पार्लर था। इसलिए हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे-दुल्हन के चेहरे व शरीर से मृत चमड़ी और मेल को हटाने, चेहरे को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटा, दूध से तैयार उबटन का प्रयोग करते थे। ताकि दूल्हा-दुल्हन सुंदर लगे। इस काम की जिम्मेदारी घर-परिवार की महिलाओं की थी। लेकिन आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड, दिखावटी और मंहगी हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। दूल्हा दुल्हन के घर जाता है और पूरे वातावरण, कार्यक्रम को पीताम्बरी बनाने के भरसक प्रयास किये जाते हैं। यह पीला ड्रामा घर के मुखिया के माथे पर तनाव की लकीरें खींचता है जिससे चिंतामय पसीना टपकता है। पुराने समय में जहां कच्ची छतों के नीचे पक्के इरादों के साथ दूल्हा-दुल्हन बिना किसी दिखावे के फेरे लेकर अपना जीवन आनंद के साथ शुरू करते थे, लेकिन आज पक्के इरादे कम और दिखावा और बनावटीपन ज्यादा होने लगा है। आजकल देखने में आ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस शहरी बनावटीपन में शामिल होकर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, वन साइड हेयर कटिंग वाले या लम्बे बालों वाले सिगरेट का धुंआ उड़ाते दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के लिए रील बनानी है। बेटे के रील बनाने के चक्कर में बाप की कर्ज़ उतरने में ही रेल बन जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां-बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां-बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बच्चे (जिनकी शादी है) मां-बाप से कहते है आप कुछ नहीं जानते, आपको समझ नहीं है, आपकी सोच वही पुरानी अनपढ़ों वाली रहेगी, यह कहते हुए अपने माता-पिता को गंवारू, पिछड़ा, थे तो बौझ्अ बरगा हो कहते हैं। मैं जब भी यह सुनता हूं सोचने को विवश हो जाता हूं, पांव अस्थिर हो जाते हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि मेरा युवा व छोटा भाई-बहिन किस दिशा में जा रहे हैं। आज किसी को चींटी के पैरो के सूपरू की आवाज सुनने की फुर्सत नहीं है क्योंकि सब-के-सब फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर खुद को बढ़ा-चढ़कर कर परोसते हैं, दिखावटीपन को चासनी में आकंठ इसे हुए हैं। इसलिए व्यक्ति बाजारवाद की गिरफ्त में जल्दी आता जा रहा है और यह पूर्णतः बाजारवाद द्वारा आजाद की हुई नई-नवेली रस्म है. इसका गला यहीं पर घोट दो अन्यथा पीसना तय इस तरह की फिजूलखनों वाली रस्म को रोकने के समाचार पढ़ कर खुशी होती है लेकिन अपने घर, परिवार, समाज, गांव में ऐसे कार्यक्रम में शरीक होकर लुत्फ उम्र रहे हैं, फोटो खिचवाकर स्टेटस लगा रहे हैं। फिर तो वही बात हो गई कि तुझे रोकना तो चाहता हूं, मगर तू रूकना नहीं, मुझे तेरी महफिल में रोकना तो बाह रहे है मगर तू रुकना नहीं हमें महफिल में शरीक होना है, यानि कथनी और करनी में अंतर स्याह है।

गोस्वामी चौक तोरनवाड़ा में  शिवलिंग की हुई स्थपना 

Shivalinga established in Goswami Chowk Toranwada हरिप्रसाद गोहे आमला । ब्लाक मुख्यालय आमला से सटी ग्राम पंचायत तोरावाड़ा स्थित गोस्वामी चौक पर गोस्वामी परिवार द्वारा भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग, भगवान गणेश प्रतिमा एवं नंदी की प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापना की गई । प्राप्त जानकारी अनुसार तीन दिवशीय आयोजन में प्रतिदिन विविध धार्मिक आयोजन आयोजित किए गए । गुरुवार क्षेत्र के ख्याति प्राप्त महाराज गणेश गिरी पुत्र वरुण गिरी द्वारा विधिविधान से पूजा अर्चना कर तोरनवाड़ा के गोस्वामी चौक पर गोस्वामी परिवार द्वारा निर्मित मंदिर में शिवलिंग, नंदी एवं भगवान गणेश की सगमरमर से निर्मित मूर्ति की स्थापना की गई । गोस्वामी परिवार प्रमुख महाराज लखन गिर ने बताया परिवार की मनोकामना पूर्ण होने पर भगवान भोलेनाथ की विधिविधान से पूजा अर्चना कर शिवलिंग स्थापना की गई । महाराज भरत गिर ने बताया इस मौके पर विविध धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन आयोजित किया गया । महाराज खेमगीर, महाराज बबलू गोस्वामी ने बताया गुरुवार महा आरती उपरांत महा भोजन प्रसादी का वितरण किया गया। जिसमे बड़ी संख्या में भोले के भक्तो ने पहोंच प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ अर्जित किया ।

ब्रह्माकुमारीज की द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा से शिवमय हुआ आमला

Amla became Shiva-like due to Brahma Kumaris’ Dwadash Jyotirlinga Yatra. हरिप्रसाद गोहे आमला । अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रह्माकुमारीज के स्थानीय सेवा केंद्र द्वारा मंगलवार आमला नगर में विशाल एवं भव्य द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा का आयोजन किया गया । ब्रह्माकुमारीज के अनुयायियों द्वारा ब्रह्माकुमारीज केंद्र पर शिव ध्वज फहराकर शिवरात्रि पर्व मनाया बाद यात्रा निकाली गई । इस यात्रा के द्वारा इस धरा पर परमात्मा शिव के अवतरण का दिव्य संदेश दिया गया । यात्रा के द्वारा बताया गया कि कलयुग रूपी घोर रात्रि के समय परमात्मा शिव का इस धरा पर अवतरण होता है और वह अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर हमारे जीवन में ज्ञान प्रकाश से दिव्य गुण लाते हैं और जब मनुष्य गुणवान बन जाता है तो नई सतयुगी सृष्टि , स्वर्ग की सृष्टि में जाने की वह पात्रता धारण कर लेता है अर्थात मानव ही देव मानव बन जाता है देवता बन जाता है तथा परमात्मा इस पुरानी कलयुग की दुनिया को परिवर्तन कर नई सतयुग की दुनिया लाते हैं। ब्रह्मा कुमारीज ने इस यात्रा के द्वारा सभी का आह्वान किया है की इस सृष्टि पर अवतरित हो चुके परमात्मा को पहचान कर वे भी अपने संस्कारों के परिवर्तन से संसार परिवर्तन के इस देवी कार्य में सहयोगी बने और अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाएं । द्वादश ज्योतिर्लिंग का रथ बनाकर हुआ नगर भ्रमण ।यात्रा में परमात्मा शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग को रथ पर सजाकर सारे नगर का भ्रमण कराया गया। द्वादश ज्योतिर्लिंग में महाकालेश्वर, त्रयंबकेश्वर, घृष्णेश्वर, विश्वनाथ, बैद्यनाथ, रामेश्वरम, सोमनाथ,मल्लिकार्जुन आदि 12 ज्योतिर्लिंग को सजाकर यात्रा निकाली गई। इस यात्रा से आमला निवासी सभी शिव भक्तों ने बाबा भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए। यात्रा का नगर के विभिन्न स्थानों पर भव्य स्वागत भी हुआ। यात्रा ब्रह्माकुमारी की सेवा केंद्र से निकलकर शहर के मुख्य स्थान से होते हुए पुनः ब्रह्माकुमारी केंद्र पहुंची। यात्रा ने बोड़खी की और आमला के मुख्य मार्ग का भ्रमण किया तथा भक्तों को शिव बाबा के दर्शन कराए। मनाई 88वी त्रिमूर्ति शिव जयंतीसारनी से पधारी बी के सुनीता दीदी ने बताया कि परमात्मा शिव को इस धरा पर अवतरित हुए 88 वर्ष हो चुके है। वे साधारण मानव ब्रह्मा तन का आधार लेकर श्रृष्टि परिवर्तन का कार्य कर रहे है। निकट भविष्य में शीघ्र ही स्वर्गिक सृष्टि की स्थापना होने वाली है। इसके लिए परमात्मा हमे राजयोग सीखा रहे है। वही आमला सेवाकेंद्र संचालिका बी के हेमलता बहन ने बताया की ब्रह्माकुमारीज के सेवाकेंद्र पर निशुल्क राजयोग प्रशिक्षण दिया जाता हैं जिसे कोई भी व्यक्ति आके सिख सकता है ।

इस साल कब है होली? जानिए होलिका दहन का मुहूर्त और पूजा विधि

When is Holi this year? Know the auspicious time and worship method of Holika Dahan होली एक सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक त्योहार है। पूरे भारत में इसका अलग ही जश्न और उत्साह देखने को मिलता है। होली भाईचारे, आपसी प्रेम और सद्भावना का त्योहार है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंगों में सराबोर करते हैं। होली हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है। बसंत का महीना लगने के बाद से ही इसका इंतजार शुरू हो जाता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है और इसके अगले दिन होली मनाई जाती है। हिंदू धर्म के अनुसार होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। होली एक सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक त्योहार है। पूरे भारत में इसका अलग ही जश्न और उत्साह देखने को मिलता है। होली भाईचारे, आपसी प्रेम और सद्भावना का त्योहार है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंगों में सराबोर करते हैं। घरों में गुझिया और पकवान बनते हैं। लोग एक दूसरे के घर जाकर रंग-गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल होली की सही तारीख और शुभ मुहूर्त क्या है… पूर्णिमा तिथिफाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और इसके अगले दिन होली मनाई जाती है। इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 24 मार्च को सुबह 09 बजकर 54 मिनट से शुरू होगी। वहीं इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 25 मार्च को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर होगा। होलिका दहन 202424 मार्च को होलिका दहन है। इस दिन होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त देर रात 11 बजकर 13 मिनट से लेकर 12 बजकर 27 मिनट तक है। ऐसे में होलिका दहन के लिए आपको कुल 1 घंटे 14 मिनट का समय मिलेगा। कब है होली 2024?होलिका के अगले दिन होली मनाई जाती है, इसलिए इस साल 25 मार्च को होली है। इस दिन देशभर में धूमधाम से होली मनाई जाएगी। होलिका दहन पूजा की विधिहोलिका दहन की पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान करना जरूरी है।स्नान के बाद होलिका की पूजा वाले स्थान पर उत्तर या पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं।पूजा करने के लिए गाय के गोबर से होलिका और प्रहलाद की प्रतिमा बनाएं।वहीं पूजा की सामग्री के लिए रोली, फूल, फूलों की माला, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी,.मूंग, बताशे, गुलाल नारियल, 5 से 7 तरह के अनाज और एक लोटे में पानी रख लें।इसके बाद इन सभी पूजन सामग्री के साथ पूरे विधि-विधान से पूजा करें। मिठाइयां और फल चढ़ाएं।होलिका की पूजा के साथ ही भगवान नरसिंह की भी विधि-विधान से पूजा करें और फिर होलिका के चारों ओर सात बार परिक्रमा करें।

संत शिरोमणि गुरु रविदास जयंती विशेष प्रकाशन

Sant Shiromani Guru Ravidas Jayanti Special Publication Ravidas Jayanti 2024: गुरु रविदास जी का जन्म कब और कहां हुआ ? संत गुरु रविदास जी को प्रेम और करुणा की शिक्षाओं और समाज से जाति के भेदभाव को दूर करने के लिए जाना जाता है. हर साल माघ पूर्णिमा को रविदास जी की जयंती के रूप में मनाया जाता है.भारत के प्रसिद्ध संत रविदास को रैदास के नाम से भी जाना जाता है. रविदास ऐसे संत और कवि थे, जिनका भक्ति आंदोलन में अहम योगदान रहा. समाज विभाजन को दूर करने पर इन्होंने जोर दिया और व्यक्तिगत आध्यात्मिक आंदोलन के लिए एकता को बढ़ावा दिया. रविदास जी के जन्मदिन को ही हर साल रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है, जोकि आज शनिवार, 24 फरवरी 2024 को है. संत रविदास ईश्वर को पाने का केवल एक रास्ता जानते थे और वो है ‘भक्ति’. इसलिए उनका एक मुहावरा ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ वर्तमान में काफी प्रसिद्ध है. संत रविदास जी ने अपना सारा जीवन समाज सुधार कार्य, समाज कल्याण और समाज से जाति भेदभाव को दूर करने के कार्यों में समर्पित कर दिया. आइये जानते हैं गुरु रविदास जी का जन्म कब और कहां हुआ था? कब और कहां हुआ संत रविदास का जन्म संत गुरु रविदास एक महान कवि, दार्शनिक और समाज सुधारक थे. संत रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी क्षेत्र में माघ पूर्णिमा को 1377 में हुआ था. इसलिए हर साल माघ पूर्णिमा के दिन रविदास जयंती मनाई जाती है. लेकिन इनके जन्म को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं. इनकी माता का नाम कर्मा देवी और पिताजी का नाम संतोष दास था. संत रविदास का जन्म एक मोची परिवार में हुआ था और इनके पिता जूते बनाने का काम किया करते थे. रविदास जी बचपन से बहादुर और ईश्वर के भक्त थे. पंडित शारदानंद गुरु से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की. जैसे-जैसे रविदास जी की उम्र बढ़ने लगी भक्ति के प्रति इनकी रुचि भी बढ़ गई. आजीविका के लिए रविदास जी ने पैतृक काम को करते हुए भगवान की भक्ति में भी लीन रहे. चर्मकार कुल के होने के कारण वे जूते बनाया करते थे और अपने पैतृक कार्य में उन्हें आनंद भी मिलता था. वे अपना काम ईमानदारी, परिश्रम और पूरे लगन से करते थे. साथ ही लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा भी दिया करते थे. संत शिरोमणि गुरु रविदास कौन थे, समाज के लिए क्या है इनका योगदान भारत में कई संतों ने लोगों को आपसी प्रेम, सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब सिखाई. इन्हीं में एक थे संत रविदास, जिनका भक्ति आंदोलन और समाज सुधार में विशेष योगदान रहा. संत गुरु रविदास भारत के महान संतों में से एक हैं, जिन्होंने अपना जीवन समाज सुधार कार्य के लिए समर्पित कर दिया. समाज से जाति विभेद को दूर करने में रविदास जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. वो ईश्वर को पाने का एक ही मार्ग जानते थे और वो है ‘भक्ति’, इसलिए तो उनका एक मुहावरा आज भी बहुत प्रसिद्ध है कि, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’. रविदास जी का जन्म रविदास जी के जन्म को लेकर कई मत हैं. लेकिन रविदास जी के जन्म पर एक दोहा खूब प्रचलित है- चौदस सो तैंसीस कि माघ सुदी पन्दरास. दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास. इस पंक्ति के अनुसार गुरु रविदास का जन्म माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन 1433 को हुआ था. इसलिए हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है जोकि इस वर्ष 24 फरवरी 2024 को है. रविदास जी का जन्म 15वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक मोची परिवार में हुआ. उनके पिताजी जाति के अनुसार जूते बनाने का पारंपरिक पेशा करते थे, जोकि उस काल में निम्न जाति का माना जाता था. लेकिन अपनी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद भी रविदास जी भक्ति आंदोलन, हिंदू धर्म में भक्ति और समतावादी आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उजागर हुए. 15 वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा चलाया गया भक्ति आंदोलन उस समय का एक बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन था. समाज के लिए गुरु रविदास का योगदान संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी एक महान संत और समाज सुधारक थे. भक्ति, सामाजिक सुधार, मानवता के योगदान में उनका जीवन समर्पित रहा. आइये जानते हैं गुरु रविदास के महत्वपूर्ण योगदानों के बारे में- धार्मिक योगदान: भक्ति और ध्यान में गुरु रविदास का जीवन समर्पित रहा. उन्होंने भक्ति के भाव से कई गीत, दोहे और भजनों की रचना की, आत्मनिर्भरता, सहिष्णुता और एकता उनके मुख्य धार्मिक संदेश थे. हिंदू धर्म के साथ ही सिख धर्म के अनुयायी भी गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं. रविदास जी की 41 कविताओं को सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने पवित्र ग्रंथ आदिग्रंथ या गुरुग्रंथ साहिब में शामिल कराया था.सामाजिक योगदान: समाज सुधार में भी गुरु रविदास जी का विशेष योगदान रहा. इन्होंने समाज से जातिवाद, भेदभाव और समाजिक असमानता के खिलाफ होकर समाज को समानता और न्याय के प्रति प्रेरित किया.शिक्षा और सेवा: गुरु रविदास जी ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और अपने शिष्यों को उच्चतम शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया. अपने शिष्यों को शिक्षत कर उन्होंने शिष्यों को समाज की सेवा में समर्थ बनाने के लिए प्रेरित किया. मध्यकाल की प्रसिद्ध संत मीराबाई भी रविदास जी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि SAHARA SAMACHaar.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

आमला में होगा द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा का भव्य आयोजन

A grand event of Dwadash Jyotirlinga Yatra will be held in Amla. हरिप्रसाद गोहे आमला । महा शिवरात्रि के पावन शुभ अवसर को उत्सव का रूप देने इस बार विश्व विख्यात नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य शिक्षण संस्थान ब्रह्माकुमारीज के स्थानीय सेवा केंद्र बैतूल, सारणी, भौरा आदि स्थानों पर पूर्व में ब्रह्माकुमारीज के बैनर तले द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन यात्रा निकाली जा चुकी है । जिसमें श्रद्धालु शिव भक्तों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और भगवान भोलेनाथ के ज्योर्तिलिंग स्वरूप का दर्शन लाभ प्राप्त किया । उक्त आयोजित दर्शन यात्रा अंतर्गत आगामी दिनांक 27/04/2024 दिन मंगलवार को आमला स्थित स्थानीय ब्रह्मकुमारीज आश्रम के बैनर तले द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन यात्रा का आयोजन आयोजित किया जा रहा है । आमला ब्रह्मकुमारी सेवा आश्रम संचालिका बहन बीके हेमलता ने बताया अन्य सेवा केंद्रों की तरह आमला में भी दिनांक 27/02/2024 को द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन यात्रा निकाली जाएगी । यात्रा में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग को सजाकर नगर भ्रमण कराया जाएंगा । भ्रमण के दौरान शिव भक्त भगवान भोलेनाथ के बारह ज्योतिर्लिंग स्वरूपों का दर्शन कर सकेंगे । दर्शन यात्रा बैतूल रामनगर ब्रह्मकुमारीज सेवाकेंद्र से निकलकर शहर के सभी मुख्य मार्गो से होकर वापस आमला पहुंच आमला में दर्शन यात्रा भ्रमण करेंगी l सभी भक्तों से निवेदन रहेगा की अपने-अपने स्थान पर यात्रा का स्वागत करें तथा शिव ज्योतिर्लिंगम की पूजा अर्चना करते हुए ज्योतिर्लिंग दर्शन का लाभ अवश्य उठाएं ।

जय शिवाजी जय भवानी जय घोष से गुंजायमान हुआ अमला शहर

Amla city echoed with Jai Shivaji Jai Bhavani Jai Ghosh. हरिप्रसाद गोहे आमला । जय शिवाजी जय भवानी जय घोष से आज आमला शहर गुंजायमान रहा । सोमवार शिवाजी महाराज की जन्म जयंती के मौके पर क्षत्रिय लोनारी कुनबी समाज संगठन आमला के बैनर तले सामाजिक लोगों द्वार धूमधाम से शिवाजी जयंती मनाकर सामुहिक खुशी का इजहार किया गया । इस मौके सामाजिक संगठन द्वार महिला, पुरूष, बच्चो बुजर्गो की गरिमामय उपस्थिति में मगर के गोविंद कालोनी क्षेत्र स्थित हनुमान मंदिर से भव्य चल समरोह नगर के मुख्य मार्ग से निकाला । चल समरोह में सामाजिक संगठन से जुडे लोग आकर्षक वेशभूषा एवं परिधान धारण कर पहुंचे थे । इस मौके पर महिलाएं अपने हाथो में ध्वज लेकर चल रही थीं । साथ ही अपने अपने हाथों को उठाकर जय शिवाजी जय भवानी के जय घोष लगा रही थीं । वहीं युवा, बच्चें बाजे की धुन पर जमकर थिरक रहे थे । चल समरोह के दौरान सामाजिक बुजुर्गो द्वारा सामाजिक परंपरा का निर्वाहन करते हुऐ अपने हाथों में प्राचीन वाद्य यंत्रों को लेकर गीत,संगीत , भजन, कीर्तन करते पैदल चल रहे थे । चल समरोह में शिवाजी महाराज एवं भवानी की वेश भूषा में सजाई गई शानदार झाकी आयोजित चल समरोह में मुख्य आकर्षण का केंद्र रही । मिली जानकारी अनुसार चल समरोह का समापन बोडखी स्थित माथ नकर मैरिज लान में विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं सह भोज के साथ किया गया ।

धूमधाम से मनाई गई मां शेरावाली की 29 वी वर्षगांठ

29th anniversary of Maa Sherawali celebrated with pomp.The committee organized a huge bhandara, हरिप्रसाद गोहे आमला । नगर के बस स्टेंड क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध देवीधाम मां शेरावाली दरबार में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मंदिर समिति सदस्यों द्वारा धूमधाम से मंदिर की 29 वी वर्षगांठ मनाई गई । प्राप्त जानकारी अनुसार मंदिर समिति द्वारा मां शेरावाली दरबार मंदिर की वर्षगांठ के मौके पर शुक्रवार सुबह मातारानी की विशेष पूजा अर्चना कर दोपहर बाद विशाल महा भंडारे का आयोजन मंदिर परिसर में आयोजित किया था । जहां श्रद्धालू भक्त जनों ने बड़ी संख्या में पहुंच हलवा, पूरी सब्जी का प्रसाद ग्रहण किया । उक्त भंडारे का आयोजन देर शाम तक चलता रहा । रात्रि नव बजे से भव्य देवी जागरण का आयोजन मंदिर समिति द्वारा आयोजित किया गया था । कार्यक्रम को उत्सव का रूप देने इस बार बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से महाकाल सरकार कलाकार सनी अलबेला ने आमला पहुंच एक से बडकर भजन की प्रस्तुति देकर उपस्थित जन समुदाय को आनंदित किया । वहीं जबलपुर की प्रसिद्ध गायिका आरती मिश्रा,राधिका यदुवंशी छिंदवाड़ा ने शानदार देवी भक्ति भजनों की प्रस्तुति देकर लोगो को झूमने पर मजबूर कर दिया । जागरण देखने अपार जन सैलाब उमड़ा था कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा ।

तीन दिवसीय सरस्वती पूजन महोत्सव का रंगा रंग कार्यक्रम हुआ समापन 

The colorful program of the three-day Saraswati Puja Mahotsav concluded. हरिप्रसाद गोहे आमला । रेल्वे कालोनी आमला में प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी सरस्वती पूजन महोत्सव मनाया गया । तीन दिवसीय इस आयोजन में कई कार्यक्रम सम्पन्न हुए । आयोजन समिति के अध्यक्ष एसके सुमन,सचिव रविशंकर कुमार पटेल, कोषाध्यक्ष रितेश कुमार ओर उनकी टीम के कुशल संयोजन में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । प्रथम दिन मां सरस्वती जी की प्रतिमा की स्थापना लोकों ग्राउंड मंच पर हुई । पूजा अर्चना के साथ कार्यक्रम की शुरुवात हुई । कार्यक्रम स्थल पर सुंदरकांड का पाठ हुआ ओर शाम को रेलवे परिवार के बच्चो द्वारा सुंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी गई । बच्चो ने मनोहारी कार्यक्रम प्रस्तुत किए ।  दूसरे दिन कार्यक्रम स्थल पर महिला मंडल द्वारा हल्दी कुमकुम का कार्यक्रम हुआ । शाम को स्थानीय आर्केस्टा ग्रुप के कलाकारों द्वारा गीत संगीत का शानदार कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के सत्यप्रकाश सक्सेना टी आई थाना आमला उपस्थित थे । वही मुख्य अतिथि के तौर पर श्री मदन मोहन कटियार प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय वायु सेना स्थल आमला उपस्थित थे । कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक शानदार गीतों की प्रस्तुति ने लोगो का मन मोहा।सुमित महतकर के गाए गीत, राम आयेंगे आयेंगे पर लोग मंत्रमुग्ध हो गए।अपने उद्बोधन में प्राचार्य मदन मोहन कटियार ने कहा कि विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना का यह महोत्सव कई मायनों में श्रेष्ठ है अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोने के साथ साथ यह प्रतिभाओं को मंच भी प्रदान करता है । लोगो के आग्रह पर सत्य प्रकाश सक्सेना टी आई आमला ने सुमधुर गीत गाकर कार्यक्रम की श्रेष्ठता को बढ़ाया ।  जबलपुर से पधारी कलाकार ने लता मंगेशकर की आवाज में हुबहु गीत गाकर खूब तालियां बटोरी।वही प्रसिद्ध गायक रेलवे परिवार के विशाल आमले के गाए गीत ने शमा बांधा।वही आयोजन समिति के रितेश कुमार के बेहतरीन नृत्य ने सभी को झूमने पर मजबूर किया ।शानदार गीत ओर प्यारे नृत्य ने सभी को बांधे रखा । उपस्थित अतिथि श्री निरंजन जी थाना प्रभारी आर पी एफ आमला,ओमवती विश्वकर्मा पार्षद रेलवे कालोनी आमला, बी के सूर्यवंशी एस एस ई , बी आर साहू जी एल आई, पी के चौधरी एस एस ई इलेक्ट्रिक,संजीव कुमार,उमेश शाह, वाय आर घोटे,सतीश मीणा,अनिल पाल, डी के सागरे सहित अन्यअतिथियों के हस्ते पुरस्कार वितरण हुआ।बाद में सभी ने सहभोज का आनंद लिया।तीसरे दिन सरस्वती प्रतिमा को चल झांकी के माध्यम से आमला शहर में घूमाकर रेलवे बांध में विसर्जन किया गया। चल झांकी में लोक थिरकते हुए निकले।ढोल नगाड़ों की थाप पर सभ झूम उठे। कार्यक्रम को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष सुमन जी,सचिव रविशंकर कुमार पटेल,कोषाध्यक्ष रितेश कुमार जी,सहसचिव अजय कुमार,सहसचिव धरमपाल शर्मा,रामानुज कुमार,हेमंत कुमार,बबलू कुमार, सहित अन्य सदस्यों का सहयोग रहा।

1100 फीट लंबी चुनरी की जाएगी अर्पित, लोक निर्माण मंत्री होंगे शामिल

1100 feet long chunri will be offered Public Works Minister will be involved जबलपुर। पुण्य सलिला मां नर्मदा जी के प्राकट्योत्सव के पावन अवसर पर आज जबलपुर में कई भव्य कार्यक्रम होंगे। जगह-जगह मां नर्मदा की प्रतिमा रखी गई है। कई स्थानों पर भंडारे भी होंगे। मां नर्मदा जयंती पर लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी के साथ चुनरी यात्रा में शामिल होंगे। इस दौरान मां नर्मदा को 1100 फीट लंबी चुनरी भी अर्पित की जाएगी।  राकेश सिंह सुबह 11.30 बजे नर्मदा पूजन करेंगे, इसके उपरांत दोपहर 12 बजे उमाघाट में 1100 फीट लंबी चुनरी मां नर्मदा को अर्पित करेंगे। बताया जा रहा है कि नर्मदा जयंती के अवसर पर नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी दर्शन करने के लिए गौरीघाट पहुंच सकते हैं। जाने मां नर्मदा का इतिहास सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम… द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम… कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे… त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे। नर्मदा मां मात्र नदी ही नहीं हैं, बल्कि कंकर-कंकर में शंकर को प्रकट करने वाली हैं, अपने पावन तट पर आद्य जगतगुरु शंकराचार्य जी को सनातन संस्कृति को दिशा देने वाली रचनाओं की प्रेरणा प्रदान करने वाली हैं, साथ ही अन्नदाताओं को समृद्धि प्रदान करने वाली हैं। पवित्र नदियों में स्नान से पुण्य फल प्राप्ति की मान्यता है, जबकि मां नर्मदा के दर्शन से ही कहीं ज्यादा पुण्य मिल जाता है। कल-कल, छल-छल प्रवाहित अविरल धारा हमें जीवन, समृद्धि और खुशहाली देती है, साथ ही सतत आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी मिलती है। सहायक नदियों को समाहित करती मां नर्मदा आगे बढ़ती हैं और मानों संदेश देती हैं कि हम सभी को साथ लेकर चलें। मां नर्मदा की प्रेरणा से जब हम सृजन के लिए आगे बढ़ते हैं तो समाज का हर वर्ग साथ देने आता है। मध्यप्रदेश के अमरकंटक उद्गम कुंड से मां नर्मदा प्रवाहमान होती हैं, और विन्ध्य व सतपुड़ा के पहाड़ों, जंगलों को पार करते हुए ओंकारेश्वर से आगे बढ़कर गुजरात में प्रवेश करके खम्भात की खाड़ी तक जाती हैं। लगभग 1,312 किलोमीटर की यह यात्रा लोक कल्याण, सतत परिश्रम और समर्पण का संदेश देती है। यह यात्रा कब शुरू हुई, इसका अंदाजा भी लगाना संभव नहीं है। नर्मदा नदी ने प्रकृति को, मानव सभ्यता को और मध्य प्रदेश को इतना कुछ दिया है कि उसकी न गणना की जा सकती है, न कल्पना। यह संकल्प जरूर लिया जा सकता है कि हम भी मां नर्मदा की सेवा से अपना जीवन धन्य करें। नर्मदा घाटी में मानव सभ्यता का न केवल विकास हुआ है, बल्कि हमारे वैभवशाली इतिहास को समेटे नगरों ने भी आकार लेते हुए समृद्धि के प्रतिमान स्थापित किए हैं। महिष्मती (महेश्वर), नेमावर, हतोदक, त्रिपुरी, नंदीनगर, भीमबैठका आदि ऐसे कई प्राचीन नगर हैं, जहां उत्खनन में 2200 वर्ष पुराने प्रमाण मिले हैं। मां नर्मदा की सेवा के लिए कुछ बातों का ध्यान रखा जाए और अनुशासनात्मक जीवन शैली अपना लें, तो काफी बदलाव संभव है। नदी के जल को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए हम दूषित पदार्थों को नदी तक पहुंचने ही न दें, धार्मिक आस्था के नाम पर कोई भी अनुपयोगी वस्तु नदी में प्रवाहित न करें। यह नदी पहाड़ों और जंगलों में विशाल वृक्षों के जड़ों में संचित जल के माध्यम से पल्लवित हैं, ऐसे में हम अधिक से अधिक पौधारोपण करें, यह सेवा ही मां नर्मदा के प्रति कृतज्ञ होने के लिए पर्याप्त है। मां नर्मदा वर्ष पर्यंत हमें जीवन देने के लिए ही प्रवाहमय रहती हैं। मां नर्मदा के रौद्र रूप में भी सृजन की अद्भुत संभावना है। आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी द्वारा नर्मदाष्टक की रचना इसका प्रमाण है। कम उम्र में वेदांत और उपनिषद देने वाले आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी जन्म स्थान केरल से चलकर अमरकंटक के रास्ते पवित्र धरा मध्य प्रदेश पहुंचे थे। उन्होंने 16 साल की उम्र में वेदांत दर्शन की व्याख्या कर सहस्त्राधिक रचनाएं दीं। देश के चारों कोनों पर चार पीठों की स्थापना कर देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया। वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक देखें, तो मां नर्मदा के विस्तृत तट पर अनेक ऋषि, मुनि गणों ने विश्व कल्याण की कामना के साथ घोर तपस्या की और अपने तब को फलीभूत भी किया है। मां नर्मदा के पावन तट का एक-एक कण पुण्य प्रताप से ओजस्वी है। नर्मदा पुराण के अनुसार माँ नर्मदा को 13 नामों से जाना जाता है। जिनमे शोण, महानदी, मंदाकनी, महापुण्य प्रदा त्रिकुटा, चित्रोपला, विपाशा, बालवाहिनी, महार्णव विपाषा, रेवा, करभा, रुद्रभावा और एक जो हम सभी जानते है नर्मदा । अनेको पौराणिक ग्रंथो के अनुसार कई बार प्रलय से संसार का अंत हुआ और कई बार भगवान शिव ने संसार को पुनः स्थापित किया लेकिन माँ नर्मदा कभी क्षीण नहीं हुई। हर बार वह संसार की उत्पत्ति में भोलेनाथ के साथ रही और तब श्रृष्टि की पुनः रचना के बाद भोले नाथ ने उन्हें वरदान देते हुए कहा की तुम्हारे दर्शन से पाप रुपी रोगो से मनुष्यो को मुक्ति मिलेगी। सभी पापो को नष्ट करने वाली महानदी नर्मदा दक्षिण दिशा की और निकल गई। घोर महार्णव में दिखाई देने के कारण माँ महार्णव कहलाई।

सी आर एम एस रेलवे महिला टीम द्वारा हल्दी कुमकुम कार्यक्रम का आयोजन हुआ

Haldi Kumkum program was organized by CRMS Railway Women Team. हरिप्रसाद गोहे आमला । सींट्रल रेलवे मजदूर संघ आमला के तत्वाधान में आज हल्दी कुमकुम का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम का आयोजन रेलवे बैडमिंटन हाल रेलवे कालोनी आमला में संपन्न हुआ । कार्यक्रम में रेलवे कालोनी आमला के रेलवे परिवारों की महिलाओं ने एक से बढ़ कर एक मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी । सी आर एम एस की मीना करोले के कुशल संयोजन में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम में महिलाओं ने एक दूसरे को हल्दी कुमकुम लगाकर सौभाग्य का आशीर्वाद लिया । कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर श्रीमती ओमवती विश्वकर्मा पार्षद रेलवे कालोनी आमला उपस्थित थी । कार्यक्रम में रेलवे परिवार की महिलाओं ने बहुत ही अच्छे अच्छे सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी । सुंदर गीत गाकर ओर मनोहारी नृत्य प्रस्तुत कर सभी का मन मोहा । अतिथियों के हस्ते दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ । कार्यक्रम के अंत में आमंत्रित महिलाओ को उपहार भेंट कर सम्मानित किया गया । कार्यक्रम का कुशल संचालन भावना पंत ने किया स्वागत भाषण मीना करोले ने दिया ।आभार प्रदर्शन अनिता झा ने किया । कार्यक्रम में प्रमुख रूप से कु प्राची आनंद,अनिता साहू,भारती कुशवाहा,प्रेमलता,हेमलता,नेहा अरुण,श्रीमती निगम,रजनी पाल,प्रमिला चौधरी,श्रीमती पहाड़े,श्रीमती वर्मा,श्रीमती सिन्हा,विनीता पाटिल,श्रीमती शमा सहित बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थी । उल्लेखनीय है की सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ आमला द्वारा साल भर विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन किया जाता है उसी कड़ी में आज यह आयोजन सम्पन्न हुआ ।

पशुपतिनाथ मंदिर में महिलाओं ने किया हल्दी कुमकुम का आयोजन

Women organized Haldi Kumkum in Pashupatinath temple. हरिप्रसाद गोहे आमला । राष्ट्रीय राजपूत क्षत्रिय महासंघ महिला इकाई आमला के बैनर तले नगर के बंधा रोड़ स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में सामाजिक महिलाओं द्वारा सामूहिक हल्दी कुमकुम कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस मौके पर सर्व प्रथम सम्राट महाराणा प्रताप जी की छाया चित्र पर दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया बाद महिलाओं द्वारा एक दूसरे को हल्दी कुमकुम लगा शुभकामनाएं प्रेषित की । इस दौरान उपस्थित महिलाओं द्वारा अपने, अपने स्तर पर कार्यक्रम को संबोधित कर समाज उत्थान पर अपने विचार रखे । अंत में महिला इकाई आमला के पद पर आसीन महिलाओं द्वारा उदभोषण किया भोजन प्रशादी वितरण के बाद कार्यक्रम का समापन किया गया ।

पंचवटी हनुमान मंदिर अनदेखी के चलते खो रहा अपनी चमक

Panchavati Hanuman temple is losing its shine due to neglect लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र रहा, पंचवटी हनुमान मंदिर अनदेखी के चलते खो रहा अपनी चमकप्राचीन धरोवर सहेजने होने चाहिए प्रयास । हरिप्रसाद गोहे आमला । बीते लंबे अरसे से आमला की पहचान बना रहा पंचवटी मन्दिर अनदेखी के चलते आंसू बहा रहा है । गौरतलब हो की कभी शहर का एक धार्मिक स्थल पंचवटी हनुमान मंदिर की सुंदरता लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा करती थी।यहां की सुंदरता देखते ही बनती थी । लेकिन देख रेख के आभाव में यह धार्मिक स्थल अपनी चमक खोता नजर आ रहा है । ज्ञात हो कि राष्ट्रपति पुरुस्कार प्राप्त शिक्षक मोतीलाल पांडे जी द्वारा रामायण के पात्रों व हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को कड़ी मेहनत करके अपने हाथों से बनाया था, उनके अथक प्रयासों से आमला को एक भव्य स्थान मिला था आस्था व सुकून के पल बिताने के लिए यह बेहतर स्थल था, लेकिन जिम्मेदारो की लापरवाही के चलते ये स्थान अवस्था मे पहुँच गया । शोरगुल से दूर स्थित पंचवटी मन्दिर की तमाम प्रतिमाएं लोगो का ध्यान खिंचती है, जिनमे हनुमान जी की पर्वत उठाती मूर्ति, सुरसा के मुंह मे खड़े बजरंगबली, वनवास को जाते सियाराम-लक्ष्मण, शबरी के झूठे बेर खाते राम, बाली वध, लक्ष्मण रेखा एव शारदा माता के साथ अन्य आकर्षक व दिव्य मूर्तियां श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रही है, पर अन्य व्यवस्थाओ के अभाव में मन्दिर में आगन्तुको की कमी होने लगी है। अगर प्रशासन चुने हुए क्षेत्र के जन प्रतिनिधि थोड़ा सा प्रयास करें तो ये स्थान पुनः वही चमक दोबारा प्राप्त कर सकता है । लोगों की जन चर्चा अनुसार नगरपालिका अगर पंचवटी मंदिर को बढ़िया फेंसिंग कर कवर्ड करवा दे एवं लाइटिंग की पर्याप्त व्यवस्था, बैठने के लिए बेंच एवं बच्चो के लिए झूले व अन्य साधन की व्यवस्था करवा दी जाए, तो लोगो का यहां आना सार्थक हो जाएगा एवं उन्हें सुगम दर्शन के साथ सुकून से बैठने की जगह भी मिल जाएगी। स्वर्गीय पांडे जी द्वारा जिस भाव से कड़ी मेहनत कर पंचवटी की रचना की गई थी वो भाव हाल के वर्षों में लुप्त हो गया एवं पंचवटी मंदिर शहर से कट सा गया, एक दौर था जब शहरवासी बाहर से आये अपने मेहमानों को यहां आकर्षक मूर्तियां दिखाने लाया करते थे, वे दिन वापस आ सके इसके लिए नगरपालिका को पहल करनी होगी, जरा सी पहल से शहर की ये अमूल्य धरोहर पुनः अपना सौंदर्य प्राप्त कर सकती है ।

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