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भर्ती प्रक्रिया पर सवाल: जीरो मार्क्स वालों की नियुक्ति पर राजस्थान हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है। मामला सरकारी नौकरियों में क्लास IV कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा है, जहां आरक्षित वर्ग के लिए कट-ऑफ अंक जीरो के करीब रखे गए थे। जस्टिस आनंद शर्मा ने इस स्थिति को बेहद हैरान करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि भले ही नौकरी छोटे पद की हो, लेकिन सरकार को भर्ती के लिए एक न्यूनतम मानक जरूर रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा, जो शख्स परीक्षा में शून्य या उससे भी कम नंबर लाता है, वह सरकारी काम करने के लायक कैसे हो सकता है? कोर्ट ने साफ किया कि नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भर्ती में न्यूनतम मानक सुनिश्चित करे, ताकि चयनित उम्मीदवार अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन कर सकें। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।

हीट अलर्ट: राजस्थान में अगले तीन दिन बढ़ेगा तापमान, पश्चिमी जिलों में सतर्कता

जयपुर पश्चिमी हवाओं के गर्म और शुष्क रुख ने सीमावर्ती इलाकों में तपिश को और तेज कर दिया है। राज्य में अधिकतम तापमान लगभग 40 डिग्री तक जा पहुंचा है। बुधवार को बाड़मेर में सर्वाधिक अधिकतम तापमान लगभग 39 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। जयपुर, अजमेर, चूरू और उदयपुर में भी पारा 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहा। तेज धूप लोगों को कर रही परेशान दिन के समय तेज धूप लोगों को परेशान कर रही है, हालांकि रात में तापमान गिरने से हल्की ठंडक बनी हुई है। कई शहरों में न्यूनतम तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से कम रिकॉर्ड हो रहा है। जयपुर मौसम विज्ञान केंद्र का अनुमान है कि आने वाले दो-तीन दिनों में तापमान और बढ़ सकता है। खासकर पश्चिमी राजस्थान में गर्म हवाएं चलने की चेतावनी जारी की गई है। बाड़मेर सबसे गर्म कोटपूतली-बहरोड़ क्षेत्र में भी बुधवार को आसमान साफ रहा और पूरे दिन धूप का असर दिखा। पिछले 24 घंटों में राज्य के अधिकांश हिस्सों में मौसम शुष्क और साफ रहा। उदयपुर, श्रीगंगानगर, कोटा, जोधपुर, जैसलमेर, जयपुर, चूरू, बीकानेर और अजमेर में अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। बाड़मेर सबसे गर्म रहा, जहां तापमान 38.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वहीं, सवाई माधोपुर में भी तेज धूप के चलते तापमान 31 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। शाम में तापमान 15 डिग्री नीचे दिन की तेज गर्मी के बाद शाम होते ही मौसम में कुछ राहत मिल रही है। रात के समय कई जगहों पर तापमान 15 डिग्री से नीचे चला जाता है। पाली में सबसे ठंडी रात दर्ज की गई, जहां न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रहा। फतेहपुर (सीकर) में 11 डिग्री और करौली में 11.4 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ। पाकिस्तान से आने वाली गर्म हवाएं बढ़ा रही गर्मी   मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, गुजरात और पाकिस्तान से सटे Arabian Sea में बना एंटी साइक्लोन उच्च दबाव की स्थिति पैदा कर रहा है। इस प्रणाली में हवाएं घड़ी की दिशा में घूमते हुए नीचे की ओर आती हैं, जिससे आसमान साफ रहता है और सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं। साथ ही पाकिस्तान की ओर से आने वाली गर्म हवाएं राजस्थान में प्रवेश कर रही हैं, जिसके कारण प्रदेश के साथ गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी तापमान बढ़ रहा है।

सरकारी नौकरी पर विवाद, राजस्थान हाईकोर्ट ने एग्जाम में शून्य अंक पाने वालों को नौकरी देने पर जताई आपत्ति

जयपुर  राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि उसने रिज़र्व कैटेगरी के तहत क्लास IV सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए कट-ऑफ मार्क्स ज़ीरो क्यों तय किए हैं. कोर्ट ने यह सवाल विनोद कुमार बेटे प्यारेलाल बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सुनवाई के दौरान पूछी है. इस हालात को चौंकाने वाला बताते हुए, जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि यह सरकारी नौकरी में बेसिक स्टैंडर्ड बनाए रखने को लेकर चिंता पैदा करता है। ‘सरकारी कर्मचारी को बेसिक काम तो ठीक से आना ही चाहिए’ कोर्ट ने कहा, ‘अपॉइंटिंग अथॉरिटी के तौर पर, राज्य से उम्मीद की जाती है कि वह रिज़र्व कैटेगरी के लिए भी भर्ती में मिनिमम स्टैंडर्ड पक्का करे, ताकि चुने गए उम्मीदवार बेसिक काम ठीक से कर सकें, चाहे वे क्लास-IV कर्मचारी ही क्यों न हों. जो व्यक्ति लगभग ज़ीरो या नेगेटिव मार्क्स लाता है, उसे सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह आदेश एक रिट पिटीशन पर दिया जिसमें कहा गया था कि हाल ही में एक सरकारी डिपार्टमेंट में क्लास-IV एम्प्लॉई के लिए एक रिक्रूटमेंट प्रोसेस में, कुछ रिज़र्व्ड कैटेगरी के लिए कट-ऑफ मार्क्स 0.0033 जितने कम थे। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।  

बीकानेर कोर्ट पर बम धमकी का मेल, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने शुरू की जांच

बीकानेर बीकानेर शहर के न्यायालय परिसर में गुरुवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी भरा ई-मेल मिलने की सूचना सामने आई। धमकी की जानकारी मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अमला तुरंत सक्रिय हो गया और एहतियातन पूरे कोर्ट परिसर को खाली करवाया जाने लगा। ई-मेल के जरिए मिली धमकी मिली जानकारी के अनुसार किसी अज्ञात व्यक्ति ने ई-मेल भेजकर बीकानेर कोर्ट परिसर को बम से उड़ाने की धमकी दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और सुरक्षा के मद्देनजर परिसर में मौजूद अधिवक्ताओं, पक्षकारों और कर्मचारियों को बाहर निकलने के निर्देश दिए गए। मौके पर पहुंची एडीएसपी घटना की सूचना पर एडीएसपी चक्रवती सिंह राठौड़ भी मौके पर पहुंचे और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। वहीं बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय पुरोहित ने सभी अधिवक्ताओं और न्यायिक कर्मचारियों को तुरंत अदालत परिसर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियों ने चलाया तलाशी अभियान अजय पुरोहित ने कहा कि अदालत परिसर को बम से उड़ाने की धमकी मिली है, इसलिए सभी लोग तत्काल परिसर खाली कर दें। साथ ही जो अधिवक्ता अभी तक कोर्ट नहीं पहुंचे हैं, उन्हें भी फिलहाल अपने घरों में ही सुरक्षित रहने की सलाह दी गई है। धमकी के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पूरे परिसर में सघन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है और मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है।

जब होली श्मशान में मनाई जाती है: भीलवाड़ा की परंपरा जहाँ मौत के बीच उड़ती है राख, नहीं गुलाल

भीलवाड़ा जहां देशभर में धुलंडी पर रंग और गुलाल उड़ते हैं, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा में होली की एक अनोखी और दार्शनिक परंपरा निभाई जाती है। यहां रंगों से नहीं, बल्कि चिता की भस्म से होली खेली जाती है वह भी आधी रात को श्मशान में। पिछले 17 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा अब शहर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। यह आयोजन शहर के पंचमुखी मोक्षधाम स्थित प्राचीन मसानिया भैरवनाथ बाबा मंदिर में होता है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत काशी के मणिकर्णिका घाट की तर्ज पर की गई थी, जहां जीवन और मृत्यु का दर्शन एक साथ होता है। होलिका दहन की रात लगभग सवा 11 बजे बाबा भैरवनाथ की पालकी मंदिर से निकलती है। ढोल-नगाड़ों, शंखनाद और जयकारों के बीच शोभायात्रा पंचमुखी मोक्षधाम के श्मशान क्षेत्र की ओर बढ़ती है। करीब सवा 12 बजे पालकी चिता स्थल पर पहुंचती है, जहां कंडों की विशेष होली जलाई जाती है। इसके बाद परिजनों की अनुमति से एकत्र की गई चिता की भस्म को गुलाल की तरह हवा में उड़ाया जाता है और श्रद्धालु बाबा भैरवनाथ के साथ भस्म की होली खेलते हैं। श्मशान की नीरवता के बीच जब “बोलो बाबा भैरवनाथ की जय” के जयकारे गूंजते हैं, तो वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। मंदिर के पुजारी रवि कुमार के अनुसार, “यह परंपरा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के भय को समाप्त करने के लिए है। राख हमें याद दिलाती है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। इसलिए यहां की होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भस्म की होली खेलने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है, नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं और मानसिक बल मिलता है। यही कारण है कि इस अनूठे आयोजन में शामिल होने के लिए लोग पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते हैं। इस आयोजन में केवल भीलवाड़ा ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। महिलाएं, बच्चे और युवा सभी श्रद्धा भाव से इसमें भाग लेते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी के मणिकर्णिका घाट के बाद देश में भीलवाड़ा ऐसा दूसरा स्थान माना जाता है, जहां चिता भस्म से होली खेली जाती है। यही वजह है कि यह आयोजन अब धार्मिक पर्यटन का केंद्र भी बनता जा रहा है। जहां ब्रज की लट्ठमार होली और राजस्थान की कोड़ा-मार होली प्रसिद्ध हैं, वहीं भीलवाड़ा की यह श्मशान होली अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। यहां रंगों की चकाचौंध नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम सत्य का साक्षात्कार होता है। राख से सना शरीर और गूंजते जयकारे यह संदेश देते हैं कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के संतुलन का भी पर्व है।

लोकप्रेम की अमर कथा: हीर–रांझा, लैला–मजनूं और 250 साल से मंचित जयपुर तमाशा

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जयपुर राजस्थान की राजधानी जयपुर लोक एवं प्रदर्शन आधारित कलाओं का प्रमुख केंद्र रही है। ग्रामीण अंचलों में जन्मी अनेक लोक कलाएं यहां संरक्षण और निरंतर मंचन के कारण परिष्कृत रूप में विकसित हुईं। पर्यटन नगरी होने के कारण बड़ी संख्या में लोक कलाकार यहां आकर बसे, जो देश-विदेश से आने वाले सैलानियों के सामने अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। कालबेलिया और घूमर जैसे लोकनृत्य भी इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। इन्हीं परंपराओं के बीच जयपुर तमाशा, जिसे जयपुरी ख्याल भी कहा जाता है, एक विशिष्ट लोकनाट्य विधा के रूप में पहचाना जाता है। शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय और लोक संगीत के संगम से सजी यह रंगशैली अभिनय, गायन और नृत्य का प्रभावशाली संयोजन प्रस्तुत करती है। पिछले लगभग 250 वर्षों से इसका मंचन ब्रह्मपुरी स्थित खुले रंगमंच ‘अखाड़ा’ में किया जा रहा है। परंपरागत रूप से होली, अमावस्या और रामनवमी जैसे अवसरों पर इसका विशेष आयोजन होता है। 18वीं सदी से चली आ रही परंपरा तमाशा की शुरुआत 18वीं शताब्दी में आगरा के आसपास काव्यात्मक संवाद शैली के रूप में हुई। बाद में तत्कालीन शासक सवाई जसवंत सिंह कलाकारों को जयपुर लेकर आए और उन्हें ब्रह्मपुरी में बसाया। यहां भट्ट परिवार के बंशीधर भट्ट के संरक्षण में इस कला ने अपना विशिष्ट स्वरूप ग्रहण किया। तमाशा की कथाएं प्रेम, सामाजिक समरसता और धार्मिक सह-अस्तित्व के संदेश पर आधारित होती हैं। ‘हीर-रांझा’ और ‘लैला-मजनूं’ जैसी अमर प्रेम गाथाओं के साथ-साथ ‘तमाशा गोपीचंद’, ‘जोगी जोगन’, ‘रूपचंद गांधी’, ‘जुत्थान मियां’ और ‘छैला पनिहारी’ जैसी प्रस्तुतियां भी मंचित की जाती हैं। इन रचनाओं को भूपाली, आसावरी, जौनपुरी, मालकौंस, दरबारी, बिहाग, सिंध काफ़ी, भैरवी, कलिंगड़ा और केदार जैसे रागों में प्रस्तुत किया जाता है, जो इसकी संगीतात्मक गरिमा को और समृद्ध बनाते हैं। सौहार्द और समरसता का संदेश तमाशा की कहानियों में सामाजिक एकता का संदेश प्रमुखता से उभरता है। ‘रांझा-हीर’ कथा में नायक रांझा प्रेम की प्राप्ति के लिए अजमेर शरीफ दरगाह स्थित सूफी संत मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आशीर्वाद लेने जाता है। यह प्रसंग सांप्रदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक माना जाता है। विशिष्ट वेशभूषा और रंगशैली तमाशा की वेशभूषा इसकी अलग पहचान है। कलंगी, गोतेदार भगवस्त्र, सिंगी और सेली जैसे पारंपरिक आभूषण मंचन को आकर्षक बनाते हैं। कई बार कलाकार काल्पनिक वेशभूषा और दृश्यावली का वर्णन भी संवादों के माध्यम से करते हैं, जिससे दर्शकों की कल्पना शक्ति सक्रिय होती है और प्रस्तुति का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। बदलते समय के साथ तालमेल करीब ढाई सौ वर्षों में इसकी मूल संरचना भले ही सुरक्षित रही हो, लेकिन कहानी कहने की शैली में समय के साथ परिवर्तन आया है। आधुनिक तकनीक, प्रकाश व्यवस्था और समसामयिक घटनाओं के संदर्भ भी अब मंचन में शामिल किए जाने लगे हैं। यही कारण है कि जयपुर तमाशा आज भी जीवंत, प्रासंगिक और दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है। होली जैसे उत्सवों पर जब परकोटे में यह मंचन होता है, तो हीर-रांझा और लैला-मजनूं की प्रेम गाथाएं एक बार फिर जयपुर की सांस्कृतिक धरोहर को सजीव कर देती हैं।

दिग्गज नेताओं को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी, पंचायत चुनाव में जीत का BJP ने बनाया फॉर्मूला

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जयपुर. राजस्थान में ‘गांव की सरकार’ चुनने का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। प्रदेश की 14 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में होने वाले चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी बिसात बिछा दी है। बता दें कि सत्ता और संगठन ने मिलकर एक ऐसी ‘सीक्रेट रणनीति’ तैयार की है, जिसका मकसद न केवल जीत हासिल करना है, बल्कि विपक्ष के किलों को भी ढहाना है। अब बस इंतजार है तो राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावी तारीखों के औपचारिक एलान का। राठौड़, चतुर्वेदी और तिवाड़ी संभालेंगे मोर्चा बीजेपी ने इस बार पंचायत चुनावों की जिम्मेदारी अपने सबसे अनुभवी और रणनीतिकार नेताओं को सौंपी है। पार्टी ने जिला परिषद और पंचायत चुनाव समितियों के नाम फाइनल कर लिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, इन प्रमुख नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। इन नेताओं ने ही परिसीमन और पुनर्गठन को लेकर पार्टी की सिफारिशें तैयार की हैं। ताकि चुनावों में बीजेपी को अधिकतम भौगोलिक और राजनीतिक लाभ मिल सके। राजेंद्र राठौड़ (पूर्व नेता प्रतिपक्ष): जमीनी राजनीति के माहिर खिलाड़ी। अरुण चतुर्वेदी (अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग): संगठन और सत्ता के बीच समन्वय के विशेषज्ञ। घनश्याम तिवाड़ी (राज्यसभा सांसद): नीतिगत और कानूनी बारीकियों के जानकार। CM भजनलाल शर्मा का ‘संभाग प्लान’ मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद इन चुनावों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने सभी संभागों के प्रमुख नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। इन बैठकों का एकमात्र एजेंडा पंचायत चुनाव 2026 था। मुख्यमंत्री का जोर इस बात पर है कि सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधा मतदान केंद्र तक पहुंचे। विस्तारकों ने टटोली जनता की नब्ज रणनीति बनाने से पहले बीजेपी ने हर विधानसभा स्तर पर ‘विस्तारक’ तैनात किए थे। इन विस्तारकों का काम केवल पार्टी के कार्यक्रम चलाना नहीं था, बल्कि जमीन पर जनता की नाराजगी और उम्मीदों को समझना था। विस्तारकों की ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर ही प्रत्याशियों के चयन और प्रचार के मुद्दों का खाका खींचा गया है। अगले महीने बज सकता है चुनावी बिगुल राज्य निर्वाचन आयोग ने फाइनल वोटर लिस्ट जारी कर दी है। इस बार 4.02 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। प्रदेश की 41 जिला परिषदों, 457 पंचायत समितियों और 14,403 ग्राम पंचायतों में अगले महीने चुनाव होने की पूरी संभावना है। कार्यकाल का गणित: कब-कहां होंगे चुनाव? वर्तमान में 12 जिला परिषदों और 130 पंचायत समितियों का कार्यकाल अभी बाकी है, जो अलग-अलग चरणों में पूरा होगा। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही चुनाव आयोग कार्यक्रम जारी करेगा, वैसे ही प्रभारी और उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी जाएगी। 5 सितंबर तक: 6 जिला परिषद और 78 पंचायत समितियों का समय पूरा होगा। 29 अक्टूबर तक: 2 जिला परिषद और 22 पंचायत समितियों का कार्यकाल खत्म होगा। 22 दिसंबर तक: 4 जिला परिषद और 30 पंचायत समितियों का कार्यकाल पूरा होगा।

टूटी झोपड़ी से IAS तक का सफर, चाय बेचने वाले पिता के बेटे ने रचा इतिहास

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जयपुर कहते हैं अगर इरादे मजबूत हों तो हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, रास्ता निकल ही आता है। यह बात सच साबित करते हैं देशल दान चरण, जिन्होंने बेहद साधारण परिवार से निकलकर देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा पास की और आईएएस बनने का सपना पूरा किया। उनकी कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर देशल दान चरण मूल रूप से राजस्थान के सुमलाई गांव से आते हैं। उनका परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था। उनके पिता कुशल दान चरण एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे। इसी दुकान की कमाई से दस लोगों का परिवार चलता था। घर की हालत ऐसी थी कि रोजमर्रा के खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता था। कई बार बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए पिता को कर्ज लेना पड़ता था। लेकिन उन्होंने कभी भी बच्चों को पढ़ाई छोड़कर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया। उनका मानना था कि शिक्षा ही वह रास्ता है जो गरीबी से बाहर निकाल सकता है। पिता का विश्वास बना सबसे बड़ी ताकत देशल के पिता हमेशा कहते थे कि हालात चाहे जैसे हों, पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए। घर में पैसों की कमी थी, लेकिन सपनों की नहीं। यही सोच बच्चों के अंदर भी बैठ गई। कम संसाधनों में पढ़ाई करना आसान नहीं था। न अच्छे कोचिंग संस्थान, न सुविधाएं, न पढ़ाई का माहौल। लेकिन देशल ने ध्यान भटकने नहीं दिया। उन्होंने अपनी पढ़ाई पर पूरा फोकस रखा और हर परिस्थिति को चुनौती की तरह लिया। परिवार पर टूटा बड़ा दुख, फिर भी नहीं डगमगाए जब देशल दसवीं कक्षा में थे, तब उनके परिवार पर एक बड़ा दुख आ पड़ा। उनके बड़े भाई, जो नौसेना में थे, एक पनडुब्बी दुर्घटना में शहीद हो गए। इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर दिया। घर का माहौल बदल गया। दुख, जिम्मेदारियां और आर्थिक दबाव सब एक साथ आ गए। लेकिन इसी समय देशल ने ठान लिया कि अब उन्हें अपने परिवार को संभालने के लिए कुछ बड़ा करना है। उन्होंने इस दर्द को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया। इंजीनियर बनने का सपना और पहली बड़ी सफलता देशल का सपना इंजीनियर बनने का था। उन्होंने जेईई मेन परीक्षा की तैयारी शुरू की। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने खुद पर भरोसा रखा और पहले ही प्रयास में परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली। इसके बाद उन्हें भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान जबलपुर में दाखिला मिला। यह उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था। गांव से निकलकर एक प्रतिष्ठित संस्थान तक पहुंचना उनके संघर्ष का पहला फल था। यहां से बदला सोचने का नजरिया इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान देशल ने महसूस किया कि वह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ बड़ा करना चाहते हैं। यहीं से उनके मन में सिविल सेवा में जाने का विचार आया। उन्होंने तय किया कि अब लक्ष्य होगा देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में जाना। यह रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा को देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षा माना जाता है। यूपीएससी की तैयारी, अनुशासन और धैर्य की परीक्षा यूपीएससी की तैयारी केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि धैर्य, मानसिक मजबूती और लगातार मेहनत की मांग करती है। देशल ने बिना किसी शोर-शराबे के, बिना दिखावे के, चुपचाप तैयारी शुरू की। उन्होंने अपनी दिनचर्या सख्त बनाई। समय का पूरा उपयोग किया। कमजोर विषयों पर ज्यादा मेहनत की और लगातार खुद को बेहतर बनाते रहे। उनकी रणनीति साफ थी, कम संसाधन हैं तो मेहनत दोगुनी करनी होगी। संघर्ष से निकली सफलता की कहानी देशल दान चरण ने यह साबित कर दिया कि सफलता किसी बड़े शहर, अमीर परिवार या महंगी कोचिंग की मोहताज नहीं होती। अगर लक्ष्य साफ हो और मेहनत ईमानदार हो, तो एक चाय बेचने वाले का बेटा भी आईएएस बन सकता है। उनकी कहानी सिर्फ परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है जो एक पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई पर रखा, और उस बेटे की जिसने उस विश्वास को सच कर दिखाया।

छात्र बोले- रास्ते में रंग लगाया तो परीक्षा में आएगी दिक्कत, राजस्थान में 4 मार्च को 8वीं-12वीं का पेपर

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जयपुर/नौगांवा. इस बार दो दिन के होली, धूलण्डी उत्सव ने न केवल आमजन को असमंजस में डाल रखा है, बल्कि हजारों छात्रों के लिए भी ये दोहरी चुनौती बन गया है। गौरतलब है कि चंद्र ग्रहण और पंचांग गणना के कारण कुछ लोग इस बार धुलंडी 4 मार्च को मना रहे हैं। जबकि होलिका दहन 2 मार्च को होगा। 4 मार्च को राजस्थान बोर्ड की कक्षा 8वीं और कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं निर्धारित हैं, जिसके कारण परीक्षा दे रहे हजारों छात्रों और अभिभावकों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य सरकार ने 2 और 3 मार्च को होली/होलिका दहन के अवकाश घोषित किए हैं, लेकिन 4 मार्च को छुट्टी नहीं है। बोर्ड के परीक्षा कार्यक्रम के अनुसार कक्षा 12वीं की परीक्षाएं 12 फरवरी से 11 मार्च तक चल रही हैं और 4 मार्च को सुबह की पारी में इतिहास, बिजनेस स्टडीज, एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री, केमिस्ट्री आदि विषयों के पेपर हैं। इसी दिन कक्षा 8वीं की तृतीय भाषा की भी परीक्षा है। ऐसे में धूलण्डी के दौरान बच्चे किस तर परीक्षा केन्द्रों पर परीक्षा देने पहुंचेंगे। अभिभावकों का कहना है कि धूलण्डी पर चौक, चौराहों पर लोग होली खेल रहे होंगे, ऐसे में परीक्षा देने वाले बच्चों को परीक्षा केन्द्र जाते समय कोई रंग लगा देगा, तो उसकी परीक्षा में व्यवधान पडे़गा। परीक्षा की तिथि में बदलाव की मांग इसे लेकर अभिभावकों और छात्रों में रोष है और विभाग से परीक्षा की तिथि में बदलाव की मांग कर रहे है। शिक्षा विभाग के जानकारों का मानना है कि त्योहार और बोर्ड परीक्षा के टकराव से छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि परीक्षा शेड्यूल विभाग ओर से तय किया गया है, ऐसे में कोई भी निर्देश विभाग की ओर से मिलेगा तो उसकी पालना की जाएगी। इनका कहना है निदेशालय ओर से परीक्षा कार्यक्रम पूर्व में ही तय किया जा चुका है। विभाग के उच्चाधिकारियों के जो निर्देश होंगे उनकी पालना की जाएगी। ओमप्रकाश, प्राचार्य डाइट अलवर बोर्ड ओर से निर्धारित टाइम टेबल के अनुसार परीक्षा आयोजित की जा रही है। परीक्षा तिथि में कोई बदलाव के निर्देष उच्चाधिकारियों के मिलेगें तो उसकी पालना की जाएगी। महेश मेहता, जिला शिक्षा अधिकारी अलवर

फोरलेन रोड का किया भूमि पूजन, सांवलिया सेठ की राह होगी और आसान

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जयपुर. मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और मेवाड़–मालवा के हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था के केंद्र श्री सांवलिया सेठ के दर्शन अब और भी आसान होंगे। रविवार को धीनवा स्थित खेल मैदान में आयोजित समारोह के दौरान बहुप्रतीक्षित निंबाहेड़ा–मंगलवाड़ फोरलेन सड़क निर्माण कार्य का विधि-विधान से भूमि पूजन कर शुभारंभ किया गया। श्रीकल्लाजी वेदपीठ के बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भूमि पूजन संपन्न कराया। मंच पर मौजूद रहे जिले के दिग्गज समारोह में क्षेत्रीय विधायक श्रीचंद कृपलानी के साथ चित्तौड़गढ़ विधायक चंद्रभान सिंह आक्या, चित्तौड़गढ़ भाजपा जिलाध्यक्ष रतनलाल गाडरी, प्रतापगढ़ जिलाध्यक्ष महावीर सिंह कृष्णावत, पूर्व विधायक अशोक नवलखा, निवर्तमान जिला प्रमुख गब्बर सिंह अहीर और निवर्तमान प्रधान बगदीराम धाकड़ मंचासीन रहे। साथ ही भाजपा जिला महामंत्री रघु शर्मा, एसटी मोर्चा प्रदेश मंत्री अमर सिंह रावत, नगर अध्यक्ष कपिल चौधरी, कनेरा मंडल अध्यक्ष जुगलकिशोर धाकड़, छोटीसादड़ी के पूर्व नपा अध्यक्ष श्यामसुंदर अग्रवाल, पूर्वी मंडल अध्यक्ष विक्रम कुमावत, पश्चिम मंडल अध्यक्ष लोकेश धाकड़ और क्षत्रिय महासभा के नारायण सिंह बडौली ने भी शिरकत की। प्रशासनिक अधिकारियों में आरएसआरडीसी के डीजीएम आरके माहेश्वरी, प्रोजेक्ट डायरेक्टर लालचंद वर्मा और उपखंड अधिकारी विकास पंचौली उपस्थित रहे। पिछली सरकार ने केवल घोषणाएं की: कृपलानी विधायक श्रीचंद कृपलानी ने कहा कि इस फोरलेन का शिलान्यास मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने किया था। हालांकि तकनीकी कारणों से कार्य में कुछ देरी हुई, लेकिन अब काम पूरी गति से शुरू हो चुका है। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पिछली सरकार ने इस सड़क को लेकर केवल घोषणाएं कीं, जबकि धरातल पर काम वर्तमान भाजपा सरकार ने शुरू करवाया है। कृपलानी ने नगर परिषद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भी निराधार बताया। विकास की बनेगी आधारशिला विधायक चंद्रभान सिंह आक्या ने इस प्रोजेक्ट को क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विकास की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि इस मार्ग के बनने से न केवल यातायात सुरक्षित होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी। चर्चा का विषय : घर में होकर भी कार्यक्रम से दूर रहे मंत्री दक विकास की इस बड़ी सौगात के बीच राजनीतिक गलियारों में अनुपस्थिति की चर्चा जोरों पर रही। यह फोरलेन सड़क सहकारिता मंत्री गौतम दक के गृह क्षेत्र से गुजरती है और उनके विधानसभा क्षेत्र के लोगों को इसका सीधा लाभ मिलना है। मंत्री दक का कार्यक्रम में शामिल न होना कौतूहल का विषय बना रहा। सूत्रों के अनुसार, मंत्री दक उस समय अपने निवास पर जनसुनवाई कर रहे थे। वहीं सांसद सीपी जोशी भी अंतिम समय में किसी अपरिहार्य कारण से कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके। क्षेत्र में चर्चा रही कि आखिर गृह क्षेत्र के इतने बड़े प्रोजेक्ट के शुभारंभ से मंत्रीजी ने दूरी क्यों बनाए रखी?

भीषण गर्मी की दस्तक: राजस्थान में दिन–रात बढ़ी तपिश, लोगों की मुश्किलें बढ़ीं

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जयपुर राजस्थान में तापमान लगातार बढ़ रहा है और अब दिन के साथ-साथ रातें भी गर्म होने लगी हैं। प्रदेश के ज्यादातर शहरों में न्यूनतम तापमान सामान्य से 2 से 7 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया जा रहा है। बाड़मेर में रात का तापमान 23 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो इस समय के लिहाज से ज्यादा है। पश्चिमी जिलों में तेज धूप के कारण लोग दिन के समय बाहर निकलने से बच रहे हैं। मौसम केंद्र मौसम केंद्र जयपुर के अनुसार राज्य में अगले एक सप्ताह तक मौसम शुष्क रहेगा। साथ ही आने वाले दो से तीन दिनों में तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे गर्मी का असर और तेज होगा। रविवार को पूरे प्रदेश में आसमान साफ रहा और सुबह से शाम तक तेज धूप देखने को मिली। पिछले 24 घंटों में बाड़मेर में सर्वाधिक अधिकतम तापमान 36.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। इसके अलावा जोधपुर में 35.1, फतेहपुर (सीकर) में 35.5, जैसलमेर में 34.7, बीकानेर में 34.4, फलोदी में 34.6, चित्तौड़गढ़ में 34.6, करौली में 33.3, जालोर में 33.5, दौसा में 33.4, नागौर में 33.2, चूरू में 33.6, कोटा में 33.4, पिलानी में 33.7, वनस्थली में 33.6, भीलवाड़ा में 33 और जयपुर में 32.2 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया। रात के तापमान में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई शहरों में न्यूनतम तापमान 20 डिग्री के आसपास पहुंच गया है। बाड़मेर के अलावा जवाई डैम (पाली) में 20.6, जैसलमेर में 20, जालोर में 20.7, फलोदी में 19.8, बीकानेर में 18.9, कोटा में 18.8 और जयपुर में 18 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज हुआ। इन सभी स्थानों पर रात का तापमान सामान्य से 2 से 7 डिग्री अधिक रहा। मौसम केंद्र जयपुर के निदेशक राधेश्याम शर्मा के अनुसार होली के बाद प्रदेश में गर्मी और तेज होने की संभावना है। अगले कुछ दिनों में दिन और रात दोनों के तापमान में 2 से 3 डिग्री तक वृद्धि हो सकती है, जिससे लोगों को और अधिक गर्मी का सामना करना पड़ेगा।

वाल्व फेल होते ही बढ़ा खतरा, दौसा में गैस टैंकर रिसाव पर जयपुर रेस्क्यू टीम की त्वरित कार्रवाई

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दौसा दौसा जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 48 पर बीती रात गैस से भरे टैंकर में रिसाव की सूचना से हड़कंप मच गया। घटना कैलाई बस स्टैंड के पास हुई, जब गुजरात से उत्तर प्रदेश जा रहा टैंकर कालाखोह के पास किसी अज्ञात वाहन से साइड में टकरा गया। टकराव से रोटो गेज वाल्व क्षतिग्रस्त हो गया और गैस रिसने लगी। चालक को इस रिसाव की जानकारी नहीं थी, लेकिन एक वाहन चालक ने कंट्रोल रूम को सूचना दी। सूचना मिलते ही प्रशासन सक्रिय हो गया। सिकंदरा पुलिस ने टोल प्लाजा से पहले टैंकर को रोककर करीब 300 मीटर दूर कैलाई देवनारायण मंदिर के पास एक खेत में खड़ा करा दिया। उपखंड अधिकारी सिकराय नवनीत कुमार, नायब तहसीलदार डोण्ढीराम मीना, थाना प्रभारी अशोक कुमार सहित अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे। एहतियात के तौर पर फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस भी तैनात की गईं। विज्ञापन जैविक और रासायनिक खतरे को देखते हुए जयपुर से सेफ्टी टेक्निकल टीम को बुलाया गया। टैंकर में करीब साढ़े 17 टन गैस भरी हुई थी। टीम ने मौके पर पहुंचकर क्षतिग्रस्त वाल्व को सुरक्षित रूप से बंद किया, जिससे संभावित बड़ी दुर्घटना टल गई। इसके बाद टैंकर को जयपुर स्थित आईओसी प्लांट ले जाकर गैस खाली कराई गई। सेफ्टी अधिकारी निखिल शर्मा ने बताया कि अज्ञात वाहन से टकराने के कारण वाल्व में लीकेज हुआ था, जिसे समय रहते नियंत्रित कर लिया गया। देर रात अफरा-तफरी के बीच प्रशासन की सतर्कता और तकनीकी टीम की तत्परता से सड़क मार्ग सुचारु रूप से चालू कर दिया गया। इस घटना में किसी प्रकार की हताहत की सूचना नहीं मिली।

होली के दिन चंद्र ग्रहण: श्रीनाथजी मंदिर नाथद्वारा में दर्शन समय में बदलाव, पहले जान लें अपडेट

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राजसमंद पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय की प्रधानपीठ नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी की हवेली में 3 मार्च 2026, फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पड़ रहे चंद्र ग्रहण के कारण होली एवं डोल उत्सव के सेवा क्रम में परिवर्तन किया गया है। तिलकायत राकेश महाराज की आज्ञा अनुसार मंगलवार को होने वाले चंद्र ग्रहण को देखते हुए विशेष व्यवस्था की गई है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 3 मार्च को प्रातः 3 बजे शंखनाद होगा और उसी दिन डोल उत्सव का आयोजन किया जाएगा। चंद्र ग्रहण का स्पर्श सायं 3:20 बजे से होगा तथा मोक्ष 6:47 बजे रहेगा। ग्रहण काल 3:20 बजे से 6:48 बजे तक रहेगा। इस कारण डोल उत्सव के बाद ग्रहण क्रम की सेवा ही संपन्न होगी। युवाचार्य विशाल बावा ने बताया कि पुष्टिमार्गीय परंपरा में डोल उत्सव का मुख्य आधार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है और सामान्यतः उत्सव इसी नक्षत्र में मनाया जाता है। किंतु शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार यदि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन किसी क्षेत्र में चंद्र ग्रहण दृश्य हो, तो नक्षत्र की अपेक्षा पूर्णिमा तिथि को प्रधानता दी जाती है। जहां ग्रहण दिखाई देता है, वहां डोल उत्सव पूर्णिमा के दिन ही मनाया जाता है। चूंकि प्रधानपीठ श्रीनाथद्वारा में चंद्र ग्रहण दृश्य होगा, इसलिए यहां डोल उत्सव 3 मार्च 2026 को ही आयोजित किया जाएगा। जिन क्षेत्रों में ग्रहण दृश्य नहीं होगा, वहां 4 मार्च 2026 को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में डोल उत्सव मनाया जाएगा। दर्शन व्यवस्था इस प्रकार रहेगी     प्रातः मंगला, श्रृंगार और ग्वाला दर्शन नहीं खुलेंगे।     डोल के तीसरे-चौथे राजभोग दर्शन लगभग 10:30 बजे होंगे।     उत्थापन, भोग, संध्या आरती और शयन दर्शन नहीं खुलेंगे।     ग्रहण का सूतक लगने के कारण राजभोग का सखड़ी प्रसाद गौशाला भेजा जाएगा।     उत्सव के पश्चात ग्रहण क्रम की सेवा होगी।     ग्रहण से संबंधित प्रमुख समय     ग्रहण का वेध: प्रातः 3:52 बजे     ग्रहण का स्पर्श: सायं 3:20 बजे     मध्य/गौदान: सायं 5:04 बजे     मोक्ष: सायं 6:47 बजे     चंद्रोदय: सायं 6:42 बजे     पर्वकाल: 3 घंटे 27 मिनट     दृश्यपर्व: 4 मिनट 26 सेकंड

सरकार का बड़ा निर्णय: माउंट आबू, जहाजपुर और कामां—नाम बदलने के पीछे की ऐतिहासिक वजहें

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जयपुर राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रतीकों की राजनीति की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए तीन प्रमुख नगरों के नाम बदलने की घोषणा की है। विधानसभा में विनियोग विधेयक पर उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि माउंट आबू का नाम ‘आबू राज’, जहाजपुर का ‘यज्ञपुर’ और कामां का ‘कामवन’ किया जाएगा। सरकार के अनुसार यह निर्णय स्थानीय मांग, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखकर लिया गया है। इससे पहले भी भजनलाल सरकार में पिछली सरकार की जगहों और कई योजनाओं के नाम बदले जा चुके हैं। इस घोषणा के बाद इन स्थानों के एतिहासिक और सांस्कृतिक आधार को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माउंट आबू (अर्बुद पर्वत) का बहुआयामी इतिहास सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू अरावली पर्वतमाला का सर्वोच्च भाग है। प्राचीन ग्रंथों में इसे अर्बुद पर्वत कहा गया है। स्कन्द पुराण के अर्बुद खंड में इसका उल्लेख मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह ऋषियों की तपोभूमि रहा है। कथा है कि ऋषि वशिष्ठ ने यहां यज्ञ किया, जिसके अग्निकुंड से प्रतिहार, परमार, सोलंकी और चौहान वंश उत्पन्न हुए और इन्हें अग्निकुल राजपूत कहा गया।   अचलगढ़ क्षेत्र में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर को भी पवित्र माना जाता है। मध्यकाल में यह क्षेत्र परमार वंश और बाद में देवड़ा चौहानों के अधीन रहा। महाराणा कुम्भा ने अचलगढ़ किला का पुनर्निर्माण कराया, जिससे इसका सामरिक महत्व बढ़ा। माउंट आबू जैन स्थापत्य कला के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित हुए। 1031 ईस्वी में विमल शाह द्वारा निर्मित विमल वसाही मंदिर और 1230 ईस्वी में वास्तुपाल-तेजपाल द्वारा निर्मित लूण वसाही मंदिर अपनी संगमरमर नक्काशी के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। औपनिवेशिक काल में इसकी जलवायु के कारण अंग्रेजों ने इसे राजपूताना एजेंसी का मुख्यालय बनाया और इसे स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित किया। जहाजपुर (यज्ञपुर) की प्राचीन और मध्यकालीन विरासत भीलवाड़ा जिले में स्थित जहाजपुर का संबंध भी प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जोड़ा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका प्राचीन नाम यज्ञपुर या यज्ञपुरी माना जाता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की तक्षक नाग द्वारा मृत्यु के प्रतिशोध में यहां सर्पसत्र यज्ञ कराया था, जिससे इसका नाम यज्ञपुर पड़ा। समय के साथ यह नाम अपभ्रंश होकर जहाजपुर प्रचलित हुआ।   मध्यकाल में जहाजपुर मेवाड़ राज्य का एक महत्वपूर्ण दुर्ग-नगर बना। यहां का किला ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और दूर से देखने पर विशाल जहाज जैसा प्रतीत होता है, जिससे इसके वर्तमान नाम की व्याख्या भी की जाती है। राणा कुम्भा के शासनकाल में इस दुर्ग का महत्व बढ़ा।

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त तय: 2 या 3 मार्च किस दिन जलेगी होलिका और कब उड़ेंगे रंग

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जयपुर होली को लेकर लोगों में उत्साह चरम पर है। बाजारों में रंग-बिरंगे गुलाल सज चुके हैं, दफ्तरों में छुट्टियों की गिनती शुरू हो गई है और युवाओं में होली पार्टियों का उत्साह साफ नजर आ रहा है। इसी बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बार होली कब मनाई जाएगी। होलिका दहन और दुलंडी की तारीखों को लेकर अलग-अलग मत सामने आने से लोगों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस भ्रम को दूर करते हुए ज्योतिषाचार्य शास्त्री भवानी शंकर शर्मा ने शास्त्रीय आधार स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि होलिका दहन के लिए शास्त्रों में प्रदोष काल में व्यापिनी पूर्णिमा तिथि का होना अनिवार्य माना गया है। उनके अनुसार सोमवार, 2 मार्च को चतुर्दशी तिथि शाम 5 बजकर 38 मिनट तक रहेगी, इसके बाद पूर्णिमा तिथि प्रारंभ हो जाएगी। चूंकि 2 मार्च को प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए शास्त्रों के अनुसार उसी दिन होलिका दहन करना उचित होगा। उन्होंने बताया कि 2 मार्च की रात भद्रा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों में भद्रा की ‘पूंछ’ में होलिका दहन को शुभ माना गया है। यह शुभ मुहूर्त रात 1 बजकर 25 मिनट से 2 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में विधि-विधान से होलिका दहन करने को शास्त्रसम्मत बताया गया है। शास्त्री शर्मा ने स्पष्ट किया कि 3 मार्च को होलिका दहन नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि नहीं रहेगी। साथ ही 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 30 मिनट से शाम 6 बजकर 45 मिनट तक चंद्रग्रहण भी रहेगा, जिसके कारण उस दिन होलिका दहन अशुभ माना गया है। इसलिए शास्त्रसम्मत निर्णय यही है कि होलिका दहन 2 मार्च की रात किया जाए और दुलंडी यानी रंगों की होली 3 मार्च, मंगलवार को मनाई जाए। विधि-विधान पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि फाल्गुन मास की प्रतिपदा को होलिका का डंडा रोपित किया जाता है और पूर्णिमा के दिन विधिवत दहन किया जाता है। अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिन ‘होला अष्टक’ कहलाते हैं, जिन्हें शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि कई स्थानों पर होलिका दहन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, जहां विधि-विधान और प्रह्लाद की परंपरा की अनदेखी की जाती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि होलिका दहन केवल लकड़ी जलाने का कर्मकांड नहीं, बल्कि बुराई के त्याग और अच्छाई के संकल्प का प्रतीक पर्व है। अतः सभी को शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार ही इस पर्व को मनाना चाहिए।

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