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RTI खुलासा: पिछले 14 महीनों में 149 मौतें, तेंदुओं के लिए क्यों कब्रगाह बनता जा रहा MP; सामने आई यह बड़ी वजह

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RTI reveals why MP is turning into a graveyard for leopards, with 149 deaths in the last 14 months

भोपाल ! भारत में सबसे ज्यादा तेंदुए मध्यप्रदेश में पाए जाते हैं और इसी वजह से इसे तेंदुओं का प्राकृतिक आवास भी कहा जाता है। लेकिन हाल ही में सामने आए एक चिंताजनक आंकड़े ने देश के वन्यजीव प्रेमियों को चिंता में डाल दिया है। दरअसल सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी से पता चला है कि बीते 14 महीनों में राज्य में कुल 149 तेंदुओं की जान जा चुकी है। यह आंकड़ा जनवरी 2025 से लेकर मार्च 2026 तक का है।

खास बात यह है कि इन मौतों के पीछे की सबसे बड़ी वजह तेंदुओं का शिकार होना नहीं है, में बल्कि इन मौतों का बड़ा कारण सड़क हादसे रहे हैं। वहीं वन विभाग ने मौतों के इन आंकड़ों को सामान्य बताया है और उसका कहना है कि तेंदुओं के मामले में चार प्रतिशत की मृत्यु दर स्वीकार्य सीमा के भीतर है।

31 प्रतिशत मौतों के पीछे सड़क हादसे वजह

तेंदुओं की मौत की जानकारी पाने के लिए RTI कार्यकर्ता अजय दुबे ने आवेदन लगाया था। जिसके जवाब में उन्हें बताया गया कि जनवरी 2025 से इस साल मार्च तक के 14 महीनों में मध्य प्रदेश में 149 तेंदुओं की मौत हुई। इनमें से 31 प्रतिशत मौतें सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुईं। डेटा के अनुसार इनमें से भी 19 मौतें हाईवे पर हुईं। वहीं बुढ़ापा और बीमारी जैसे प्राकृतिक कारणों के कारण 24 प्रतिशत मौतें हुईं, जबकि 21 प्रतिशत मौतें वन्यजीवों के बीच आपसी संघर्ष के कारण हुईं।

8 तेंदुओं की जान करंट लगने की वजह से गई

आंकड़ों के अनुसार शिकार और बदले की भावना के कारण लगभग 14 प्रतिशत तेंदुओं की जानें गई। 8 लेपर्ड की मौत बिजली का झटका लगने से हुई, फिर चाहे वह जानबूझकर लगाया गया हो या गलती से लगा हो, जबकि दो जानवर फंदों में फंसकर मारे गए। इसके अलावा लगभग नो प्रतिशत मामलों में, मौत का कारण पता नहीं चल पाया।

तेंदुओं की लिए कब्रिस्तान बन रहा MP- RTI कार्यकर्ता

इस RTI को लगाने वाले एक्टिविस्ट अजय दुबे मौतों के इन आंकड़ों को भयावह बता रहे हैं, उनका कहना है कि ये आंकड़े एक गंभीर सच्चाई है। उन्होंने कहा, ‘टाइगर स्टेट (MP) तेंदुओं के लिए एक कब्रिस्तान बन गया है। NTCA (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी) के प्रोटोकॉल को लागू करने में सिस्टम की नाकामी और सुरक्षित रास्तों की कमी उन्हें खत्म कर रही है।’

वन विभाग ने कहा- 4% का आंकड़ा सामान्य

उधर वन विभाग इन मौतों को सामान्य बता रहा है। इस बारे में प्रतिक्रिया देते हुए वन विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक (वन्यजीव) एल. कृष्णमूर्ति ने कहा कि राज्य में तेंदुओं की मृत्यु दर को कम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि ‘तेंदुए आकार में छोटे होते हैं और आसानी से दिखाई नहीं देते, इसलिए वे पूरे राज्य में फैले हुए हैं। वे अक्सर इंसानी बस्तियों के करीब पाए जाते हैं।’

आगे उन्होंने कहा कि ‘मौतों के आंकड़े को कम करने के लिए हम योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं ओर नई सड़कों पर जानवरों के लिए सुरक्षित निकलने के रास्ते बनाने (एनिमल पैसेज), चेतावनी के संकेतक लगाने और नियमित गश्त करने जैसे उपाय लागू कर रहे हैं।’ साथ ही उन्होंने आगे कहा, ‘हम सड़कों के पास पानी के स्रोत न बनाने की भी सलाह दे रहे हैं, क्योंकि जानवर अक्सर पानी की तलाश में सड़कों की ओर आ जाते हैं और दुर्घटनाओं का शिकार बन जाते हैं।’

बिग कैट फैमिली में 10 से 20 प्रतिशत मौतें सामान्य

एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ‘करीब 4,000 तेंदुओं में से 149 की मौत होना केवल 4 प्रतिशत का नुकसान है, जबकि बिल्ली परिवार में सालाना 10 से 20 प्रतिशत तक की मृत्यु दर को स्वीकार्य माना जाता है।’

बता दें कि फरवरी 2024 में जारी आंकड़ों के अनुसार देश में तेंदुओं की सबसे ज्यादा संख्या मध्य प्रदेश में है। उस वक्त मध्य प्रदेश में 3,907 तेंदुए थे। इससे पहले साल 2018 में राज्य में 3,421 तेंदुए थे। मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक का नंबर आता है।

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