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आर्मी चीफ की चेतावनी: इस बार ऐसा जवाब देंगे कि पाकिस्तान का अस्तित्व खत्म हो जाएगा

Army Chief’s warning: This time we will give such a reply that Pakistan will cease to exist. नई दिल्ली। भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बीकानेर मिलिट्री स्टेशन सहित सीमावर्ती इलाकों का दौरा किया। यहां उन्होंने सैनिकों की तत्परता की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान को सख्त चेतावनी दी कि ऑपरेशन सिंदूर 1ण्0 में दिखाया गया संयम अब दोहराया नहीं जाएगा।जनरल द्विवेदी ने कहा कि इस बार हम कुछ ऐसा करेंगे कि पाकिस्तान को सोचना पड़ेगा कि क्या वह नक्शे में बने रहना चाहता है या नहीं। अगर पाकिस्तान नक्शे में बने रहना चाहता है, तो उसे राज्य प्रायोजित आतंकवाद बंद करना होगा। यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा संदेश है।जनरल उपेंद्र द्विवेदी बीकानेर पहुंचे तो सबसे पहले फ ॉरवर्ड एरिया का दौरा किया। यहां उन्होंने सैनिकों की ऑपरेशनल रेडीनेस चेक की। रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी इलाके में काम करने वाले सैनिकों की मुश्किलें जानकर वे प्रभावित हुए। उन्होंने वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व, पूर्व सैनिकों, सिविल अधिकारियों और जवानों से बात की।आतंकवाद पर कोई नरमी नहींउन्होंने सभी रैंकों के सैनिकों से कहा कि तकनीक को अपनाओ, ताकि हम हमेशा तैयार रहें। जनरल द्विवेदी ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर 1.0 में भारत ने बहुत संयम दिखाया था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इस बार हमारा जवाब ऐसा होगा कि पाकिस्तान को अपनी अस्तित्व पर सवाल उठाना पड़ेगा। अगर वह नक्शे में बने रहना चाहता है, तो आतंकवाद तुरंत बंद करेण् यह बयान सीमा पर तनाव को देखते हुए बहुत महत्वपूर्ण है। जनरल ने जोर देकर कहा कि भारत शांति चाहता है, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है। पूर्व सैनिकों को सम्मान: राष्ट्र निर्माण में योगदान की सराहनाजनरल द्विवेदी ने बीकानेर के पूर्व सैनिकों को भी सम्मानित किया। उन्होंने सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल केहेम सिंह शेखावत, लेफ्टिनेंट कर्नल बीरबल बिश्नोई, रिसालदार भंवर सिंह और हवलदार नाकत सिंह को राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि पूर्व सैनिक देश की रक्षा तैयारियों को मजबूत करते हैं। युद्धक्षेत्र में वर्चस्व बनाए रखने में मदद करते हैं।

सड़क हादसों के घायलों को बड़ी राहत: अब मिलेगा ₹1.5 लाख तक कैशलेस इलाज, राशि बढ़ाकर ₹2 लाख करने पर विचार

Big relief to road accident victims नई दिल्ली। सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी राहत की घोषणा की है। अब देशभर में सड़क हादसों में घायल लोगों का ₹1.5 लाख तक इलाज पूरी तरह कैशलेस होगा। यह स्कीम राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) की निगरानी में लागू की गई है। सरकार इस योजना की राशि को बढ़ाकर ₹2 लाख करने पर भी विचार कर रही है। सड़क परिवहन मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, यह सुविधा किसी भी सड़क पर हुई दुर्घटना में लागू होगी, चाहे वह राष्ट्रीय राजमार्ग हो या ग्रामीण मार्ग। गोल्डन ऑवर में मिलेगा फ्री इलाज:सड़क हादसे के बाद का पहला घंटा यानी ‘गोल्डन ऑवर’ इलाज के लिए सबसे अहम होता है। यही वह समय होता है जब समय पर इलाज न मिलने से कई लोगों की जान चली जाती है। इस योजना का मकसद जान बचाना और तत्काल इलाज सुनिश्चित करना है। इलाज का खर्च और प्रक्रिया: गडकरी की पहल:जनवरी 2024 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क हादसों पर चिंता जताते हुए कहा था कि सरकार कैशलेस इलाज योजना ला रही है। अब यह योजना देशभर में लागू कर दी गई है। हर साल 10 हजार करोड़ का अनुमानित खर्च:भारत में हर साल सड़क हादसों में 1.5 लाख से ज्यादा लोगों की जान जाती है। इलाज पर प्रति व्यक्ति औसतन ₹50,000 से ₹2 लाख का खर्च आता है। सरकार को इस योजना से हर साल करीब ₹10,000 करोड़ का खर्च उठाना पड़ सकता है, लेकिन इससे लाखों जानें बचाई जा सकेंगी।

मरीजों को झटका ! 1 अप्रैल से इतनी बढ़ जाएगी जरूरी दवाइयों की कीमत

cancer and diabetes and other essential medicines drugs to get costlier from 1apri अगर आप रोजाना दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, तो 1 अप्रैल से आपका दवा का खर्च बढ़ने वाला है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने आवश्यक दवाओं की कीमतों में इजाफा करने का फैसला किया है, जिससे आम आदमी की जेब पर असर पड़ेगा. 4 दिन बाद मरीजों को करोड़ों का झटका लगने वाला है. अगर आप नियमित रूप से दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, तो 1 अप्रैल से आपकी दवा की लागत बढ़ने वाली है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने आवश्यक दवाओं की कीमतों में इजाफा करने का फैसला किया है, जिससे आम आदमी की जेब पर असर पड़ेगा. दरअसल,सरकार ने दवाओं की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कई महत्वपूर्ण दवाओं को प्राइस कंट्रोल लिस्ट में शामिल किया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस पहल से मरीजों को हर साल लगभग 3,788 करोड़ रुपये की बचत होती है. हालांकि, अब इन नियंत्रित दवाओं के दाम बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. कितनी बढ़ सकती है कीमतरिपोर्ट्स के मुताबिक, कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और एंटीबायोटिक्स जैसी आवश्यक दवाओं की कीमतों में 1.7% तक की वृद्धि हो सकती है. यह बढ़ोतरी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा तय की जाती है, जो देश में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का काम करती है. इस कदम से दवा कंपनियों को राहत मिलेगी, क्योंकि उन्हें उत्पादन लागत में हो रही बढ़ोतरी से जूझना पड़ रहा था. हालांकि, मरीजों के लिए यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ बन सकता है, जिससे उनकी दवाओं पर होने वाला खर्च बढ़ जाएगा. आइए जानते हैं किन दवाईयों की कीमतें बढ़ जाएंगी. क्यों बढ़ रही हैं दवाओं की कीमतें?NPPA के अनुसार, दवाओं की कीमतों में यह बढ़ोतरी मुद्रास्फीति आधारित मूल्य संशोधन के कारण की जा रही है. हर साल सरकार आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक संशोधन करती है. इस बार थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में वृद्धि के चलते दवा कंपनियों को कीमतें बढ़ाने की अनुमति दी गई है. किन दवाओं के दाम बढ़ेंगे?जो दवाएं राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) में शामिल हैं, उनकी कीमतें बढ़ेंगी. इसमें एंटीबायोटिक्स, पेन किलर, हृदय रोग, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाएं शामिल हैं. सरकार के इस फैसले से जिन लोगों को नियमित रूप से दवाओं की जरूरत होती है, उनके मासिक खर्च में वृद्धि होगी. बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए मुश्किलें. कई वरिष्ठ नागरिक और क्रॉनिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को अधिक पैसे खर्च करने पड़ेंगे.हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे प्रीमियम दरें बढ़ने की संभावना है. पिछले साल भी बढ़े थे दामयह पहली बार नहीं है जब दवाओं की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं. 2023 में भी NPPA ने 12% तक की वृद्धि की थी, जिससे पहले से ही महंगाई से जूझ रहे लोगों को अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा था.

शहरों में बदलता परिदृश्य: कॉर्पोरेट में सक्रिय महिलाएँ, संघर्षरत पुरुष, क्या खड़ी होने वाली बड़ी समस्या?

Changing scenario in cities: Women active in corporate, men struggling, is a big problem arising? शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती रोजगार भागीदारी और पुरुषों में बेरोजगारी की बढ़ती दर, दोनों ही समाज के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत हैं. जहां एक तरफ महिलाओं ने पारंपरिक सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए अलग-अलग क्षेत्रों में अपने कदम मजबूत किए हैं, वहीं दूसरी तरफ पुरुषों के लिए रोजगार के अवसरों की कमी बढ़ती जा रही है. यह असंतुलन न सिर्फ परिवारों के भीतर आर्थिक संरचना को प्रभावित कर रहा है, बल्कि समाज में नए सामाजिक और मानसिक दबावों को भी जन्म दे रहा है. ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि आखिर शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के रोजगार में बढ़ रही भागेदारी का क्या कारण है और इस असंतुलन का भविष्य में हमारे समाज और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? क्या यह स्थिति समाज में नई समस्याओं को जन्म दे सकती है? क्या कहता है आंकड़ा हाल ही में ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (GLIM) के शोधकर्ताओं ने एक रिपोर्ट जारी की है. जिसके अनुसार साल 2023-24 में 20 से लेकर 24 साल की उम्र के बीच पुरुषों में बेरोजगारी की दर 10% देखी गई, जबकि महिलाओं में यही दर पुरुषों से कम यानी 7.5% देखा गया है. इसी तरह, 25-29 साल की उम्र में भी पुरुषों की बेरोजगारी दर 7.2% है, जो महिलाओं से ज्यादा है. बेरोजगारी का ये आंकड़ा दर्शाता है कि शहरी इलाकों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन पुरुषों के लिए यह अवसर घटते जा रहे हैं. ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (GLIM) के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पिछले कुछ सालों में शहरी भारत में महिलाओं का रोजगार 10% बढ़ा है. जबकि साल 2017-18 से लेकर 2023-24 तक, शहरी महिलाओं में रोजगार की दर 28% तक पहुंच गई है. दिलचस्प बात ये है कि इसी साल 40 साल और उससे ऊपर की उम्र वाली शहरी महिलाओं में रोजगार दर सबसे ज्यादा 38.3% दर्ज की गई. जिससे यह संकेत मिलता है कि महिलाएं अब बच्चों के बड़े होने के बाद अपने करियर पर ज्यादा ध्यान दे पा रही हैं. महिलाओं को नहीं है नौकरी की तलाश इसी रिपोर्ट के अनुसार भले ही देश में महिलाओं के लिए रोजगार के मौके बढ़ रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके भारत की 89 मिलियन से ज्यादा शहरी महिलाएं अभी भी नौकरी की तलाश में नहीं हैं. यह संख्या जर्मनी, फ्रांस या यूनाइटेड किंगडम की पूरी जनसंख्या से भी ज्यादा है. इसका मतलब है कि अभी भी लाखों महिलाएं कामकाजी जीवन में शामिल नहीं हो पाई हैं. इस स्थिति में सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर पुरुषों को पर्याप्त नौकरी के मौके नहीं मिलेंगे और महिलाएं बेहतर रोजगार के अवसरों का लाभ उठाएंगी, तो आने वाले समय में समाज में असंतुलन बढ़ सकता है. एक ओर जहां महिलाओं के लिए रोजगार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुरुषों की बेरोजगारी बढ़ने से समाज में तनाव और असंतोष का माहौल बन सकता है. महिला कर्मचारियों के लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम तैयार इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई कंपनियां महिला कर्मचारियों के लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम तैयार कर रही है, जैसे स्कूल और ऑफिस के घंटों को मिलाना और बच्चों के लिए चाइल्डकेयर की सुविधा देना. इसके अलावा ज्यादातर कंपनियां महिलाओं को घर से काम करने का विकल्प दे रही है, जिससे वे अधिक आराम से काम कर पा रही हैं, लेकिन घर से काम करने के दौरान नेटवर्किंग की समस्या भी खड़ी हो रही है, जिससे उनकी करियर ग्रोथ में रुकावट आ सकती है. इस शोध में यह भी बताया गया है कि अगर हम सिर्फ महिलाओं के रोजगार पर ध्यान देंगे और पुरुषों के रोजगार की चिंता नहीं करेंगे, तो भविष्य में इसे लेकर समाज में समस्याएं आ सकती हैं. इसलिए, महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए समान रूप से रोजगार के मौके बढ़ाने की जरूरत है, ताकि कोई भी समुदाय इससे प्रभावित न हो. पुरुषों में क्यों बढ़ रही है बेरोजगारी आजकल शहरी इलाकों में महिलाओं का रोजगार बढ़ रहा है, लेकिन पुरुषों के लिए बेरोजगारी एक बड़ी चिंता बन चुकी है. खासकर, जो पारंपरिक काम जैसे निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग और कम कौशल वाला काम करते है. इसका मतलब है कि पहले जो काम पुरुषों के लिए आम थे, अब उनमें नौकरी के मौके कम हो गए हैं. इसके अलावा, नई तकनीकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल ने पुरुषों के लिए और भी मुश्किलें पैदा की हैं. पहले जो लोग मैन्युअल (हाथ से काम करने वाले) या कम कौशल वाले काम करते थे, उनके लिए अब इन कामों की जगह मशीनों और रोबोट्स ने ले ली है. अब ये लोग अपनी नौकरी छूट जाने के खतरे से जूझ रहे हैं. शहरी इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर हो रही है क्योंकि यहां रोजगार के मौके कम हो गए हैं और युवा पुरुषों को नौकरी ढूंढने में कठिनाई हो रही है. इसे एक बड़ी समस्या के रूप में देखा जा सकता है, जिसका समाधान समय रहते करना जरूरी है. असंतुलन का क्या होगा समाज पर असर? अगर यह असंतुलन जारी रहता है तो इसका समाज और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है. पहले तो, यह पारिवारिक संरचनाओं को प्रभावित करेगा. पारंपरिक समाज में पुरुषों को कमाने वाले के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब महिलाएं भी कमाने वाली बन रही हैं. इससे परिवारों के भीतर भूमिकाओं में बदलाव आएगा और कई पुरुष इस बदलाव को स्वीकार करने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं. इसके अलावा, बेरोजगारी की बढ़ती दर से पुरुषों के बीच निराशा और मानसिक दबाव बढ़ सकता है. बेरोजगारी और आर्थिक तंगी के कारण अपराधों में वृद्धि हो सकती है और समाज में अस्थिरता पैदा हो सकती है. महिलाओं के बढ़ते रोजगार का प्रभाव पुरुषों पर महिलाओं के बढ़ते रोजगार का प्रभाव पुरुषों पर सीधा और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ रहा है. कुछ पुरुषों को यह बदलाव चुनौतीपूर्ण लग रहा है, क्योंकि पहले वे ही परिवार के मुख्य कमाने वाले होते थे. अब जब महिलाएं भी अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं, तो पारंपरिक भूमिका … Read more

टीम इंडिया चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में: ऑस्ट्रेलिया को 4 विकेट से सेमीफाइनल हराया

Team India in the final of Champions Trophy: Defeated Australia by 4 wickets in the semi-final विराट कोहली ने करियर की 74वीं फिफ्टी पूरी की है। टीम इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया को 4 विकेट से हराकर चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में जगह बना ली है। सेमीफाइनल में प्लेयर ऑफ द मैच बने चेज मास्टर विराट कोहली, जिन्होंने 84 रन की बेहद अहम पारी खेली। दुबई के इंटरनेशनल स्टेडियम में मंगलवार को खेले गए सेमीफाइनल में कोहली ने रन चेज में 3 बड़ी साझेदारियां भी कीं। उन्होंने श्रेयस अय्यर के साथ 91, अक्षर पटेल के साथ 44 और केएल राहुल के साथ 47 रन जोड़े। इन्हीं पार्टनरशिप ने रन चेज को आसान बनाया। आखिर में हार्दिक पंड्या ने तेजी से 28 रन बनाए और केएल राहुल ने छक्का मारकर जीत दिलाई। वे 42 रन बनाकर नाबाद लौटे। ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी की और 265 रन का टारगेट दिया। ऑस्ट्रेलिया से कप्तान स्टीव स्मिथ ने 73 और एलेक्स कैरी ने 61 रन बनाए। इंडियन बॉलर्स ने ऑस्ट्रेलिया को ऑलआउट कर दिया। मोहम्मद शमी ने 3, रवींद्र जडेजा और वरुण चक्रवर्ती ने 2-2 विकेट लिए।

विश्लेषण: प्रयागराज महाकुम्भ 2025 मेले में हुई त्रासदी के बाद उठ रहे हैं कई सवाल

Analysis: Many questions are being raised after the tragedy at the Prayagraj Maha Kumbh 2025 fair सम्पादकीय लेख भोपाल। यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ के समर्थक चाहे जितनी कोशिश कर लें, कुम्भ मेले में हुई त्रासदी के पीछे उनके प्रशासन की लापरवाही और कुप्रबंधन को छिपाया नहीं जा सकता। जैसे-जैसे नए विवरण सामने आ रहे हैं, हादसे की भयावहता बढ़ती ही जा रही है। यह भी पता चला है कि 29 जनवरी की सुबह पहली भगदड़ के बाद, कुछ ही घंटों के भीतर थोड़ी दूरी पर दूसरी भगदड़ भी हुई थी। इसके अलावा कुम्भ में कुछ मर्तबा आगजनी की घटनाएं भी हुई हैं, जिनमें सरकार द्वारा श्रद्धालुओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए दर्जनों आलीशान टेंट जलकर राख हो गए। आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या 30 बताई गई है। लेकिन मौनी अमावस्या के दिन स्नान के लिए जिस पैमाने पर भीड़ उमड़ी थी, उसके मद्देनजर यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कपड़ों, जूतों, कम्बलों और अन्य निजी सामानों के अवशेष हर जगह बिखरे पड़े थे, जो इस बात के जीवंत साक्ष्य थे कि भीड़ में कुचलने के भय से श्रद्धालु अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने पर मजबूर हो गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस त्रासदी के कुछ ही घंटों के भीतर एक्स पर अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त कर दी थीं, लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन बहुत समय तक यही दिखावा करता रहा कि कुछ हुआ ही नहीं है। इसके बाद मोदी ने यूपी सीएम से चार बार फोन पर बात की, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी एक्स पर पोस्ट किया, तब जाकर यूपी प्रशासन को अपनी चुप्पी तोड़ने और सच्चाई स्वीकारने के लिए मजबूर होना पड़ा। हादसे के पूरे 17 घंटे बाद, 29 जनवरी को शाम 7 बजे उन्होंने भगदड़ की जिम्मेदारी लेते हुए बयान जारी किया और ऐसी घटना दोबारा होने से रोकने के इंतजाम करने का वादा किया। उसके बाद से, यूपी सरकार ने भीड़ को सफलतापूर्वक प्रबंधित करने का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले दो वरिष्ठ अधिकारियों को ड्यूटी पर लगाया है, अतिरिक्त बल तैनात किए हैं और वाहनों और श्रद्धालुओं की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए नए सिरे से यातायात योजना बनाई है, लेकिन नुकसान पहले ही हो चुका था। जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने हादसे के बाद योगी के इस्तीफे की मांग की है और उन पर इस मामले में देश को गुमराह करने का आरोप लगाया। अन्य प्रमुख संतों और साधुओं ने सार्वजनिक रूप से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन माना जा रहा है कि कई लोग मन ही मन शंकराचार्य की भावनाओं को समर्थन करते हैं और वे इस बात से नाराज हैं कि मौनी अमावस्या का पवित्र दिन तीर्थयात्रियों के शवों से दागदार हो गया। शंकराचार्य ने कहा कि अगर उन्हें भगदड़ और उसके परिणामस्वरूप हुई मौतों के बारे में पता होता, तो वे मृतकों के लिए उपवास करते और आनुष्ठानिक रूप से तीर्थस्नान नहीं करते। यूपी के सीएम के रूप में आठ साल के अपने कार्यकाल में योगी ने खुद को हिंदुत्व के एक प्रखर चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया है। इससे न केवल उन्हें संघ का समर्थन मिला जिसने लोकसभा चुनावों में यूपी में भाजपा की करारी हार के बावजूद हर परिस्थिति में उनका साथ दिया बल्कि उन्हें खुद को देश भर में एक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित करने में भी मदद मिली। आज वे मोदी के बाद भाजपा के दूसरे सबसे लोकप्रिय प्रचारक हैं। लेकिन कुम्भ हादसे के बाद एक सक्षम प्रशासक के रूप में उनकी छवि को झटका लगा कुम्भ का निर्बाध आयोजन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की साख को मजबूत कर सकता था। किंतु प्रयागराज में हुए हादसे के बाद अब यूपी प्रशासन से सवाल पूछे जा रहे हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि यूपी की भाजपा में अंतर्कलह है। है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि वे कुम्भ शुरू होने से पहले और बाद में लगभग हर दूसरे दिन प्रयागराज का दौरा कर रहे थे, वे व्यक्तिगत रूप से वहां की व्यवस्थाओं की निगरानी कर रहे थे और इस पर बारीकी से नजर रखे हुए थे कि कुम्भ के प्रबंधन के लिए जो प्रशासनिक मशीनरी उन्होंने लगाई थी, वह सुचारु रूप से काम कर रही है या नहीं। बीवीआईपी के लिए विशेष व्यवस्था, उनकी गाड़ियों की अनियंत्रित आवाजाही और आम श्रद्धालुओं को नदी तक पहुंचने के लिए 20 किलोमीटर से अधिक पैदल चलना, खाने-पीने की चीजों की ऊंची लागत आदि को लेकर भी अनेक श्रद्धालुओं में गुस्सा है। दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समागम का निर्बाध आयोजन हिंदुत्व के प्रतीक और कुशल प्रशासक के रूप में योगी की साख को मजबूत करता, किंतु प्रयागराज में अफसरों की लापरवाही से हुए हादसे के बाद अब उनके नेतृत्व वाले प्रशासन से सवाल पूछे जा रहे हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि यूपी की भाजपा में अंतर्कलह है। 26 फरवरी को मेला समाप्त होने के बाद यूपी की राजनीति में बहुत कुछ देखने को मिल सकता है।

Cabinet:16300 करोड़ रुपये के खनिज मिशन को मंजूरी दी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने किया एलान

Cabinet: Mineral mission worth Rs 16300 crore approved, Union Minister Ashwini Vaishnav announced केंद्रीय मंत्रीमंडल ने 16,300 करोड़ रुपये के खनिज मिशन को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को इसका एलान किया। इसके साथ ही कैबिनेट ने सी श्रेणी के भारी गुड़ से उत्पादित इथेनॉल की एक्स-मिल कीमत 56.28 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 57.97 रुपये प्रति लीटर करने को मंजूरी दे दी है। सरकार की ओर से निर्धारित इथेनॉल की कीमतें 2022-23 इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (नवंबर-अक्तूबर) के बाद से नहीं बढ़ाई गई हैं। गन्ने के रस, बी-हैवी गुड़ और सी-हैवी गुड़ से उत्पादित इथेनॉल की वर्तमान दरें क्रमशः 65.61 रुपये, 60.73 रुपये और 56.28 रुपये प्रति लीटर हैं। कैबिनेट के फैसले से पहले चीनी कंपनियों के शेयरों में दिखा एक्शनइस बीच, चीनी और इथेनॉल से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में तेजी दिखी है। ईआईडी-पैरी, श्री रेणुका शुगर्स, बलरामपुर चीनी मिल्स और त्रिवेणी इंजीनियरिंग के शेयरों में दोपहर 1:10 बजे तक बीएसई सेंसेक्स पर 3.7%, 4.5%, 2.5% और 2.3% की बढ़त दर्ज की गई। सेंसेक्स 0.62% की बढ़त दिखी।

विपक्ष के 10 सांसद निलंबित, वक्फ बोर्ड संसदीय समिति की बैठक में हंगामे के बाद कार्रवाई

10 opposition MPs suspended, action taken after uproar in Waqf Board Parliamentary Committee meeting Waqf Board Parliamentary Panel: वक्फ संशोधन विधेयक 2024 पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की बैठक के दौरान जमकर हंगामा हुआ। इस घटनाक्रम के बाद शुक्रवार को 10 विपक्षी सांसदों को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया। निलंबित सांसदों के नाम कल्याण बनर्जी, मोहम्मद जावेद, ए राजा, असदुद्दीन ओवैसी, नासिर हुसैन, मोहिबुल्लाह, एम अब्दुल्ला, अरविंद सावंत, नदीमुल हक और इमरान मसूद शामिल हैं। बैठक के बाद तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने समिति के अध्यक्ष जगदम्बिका पाल की आलोचना की और कहा कि उन्होंने विपक्ष की आवाज को नजरअंदाज किया है। कल्याण बनर्जी ने जगदम्बिका पाल पर आरोप लगाया कि वे “जमींदारी” की तरह कार्यवाही चला रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। वहीं जेपीसी अध्यक्ष जगदम्बिका पाल ने कहा कि बैठक के दौरान विपक्ष के सांसद संसद की तरह हंगामा करने लगे। शोर मचाने के साथ ही अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भी किया। इसके बाद सांसद निशिकांत दुबे प्रस्ताव लाए, इसके बाद सांसदों को निलंबित किया गया है। क्या बोले निशिकांत दुबे?जगदंबिका पाल ने आगे कहा कि बैठक के एजेंडे में कोई बदलाव नहीं हुआ। हमने 34 बैठकें कीं, 250 डेलिगेशन को बुलाया… किसी भी जेपीसी ने इतने लोकतांत्रिक तरीके से काम नहीं किया है। वहीं सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि विपक्ष, विशेष रूप से ओवेसी जी का मानना ​​था कि जम्मू-कश्मीर का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं सुना गया और निर्वाचित प्रतिनिधियों को बुलाया जाना चाहिए था। आज की बैठक विपक्ष के सुझाव के आधार पर अध्यक्ष द्वारा स्थगित कर दी गई। मीरवाइज के सामने इन लोगों ने हंगामा किया, दुर्व्यवहार किया और संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ काम किया।

World Hindi Day 2025 : वैश्विक पटल पर हिन्दी की बढ़ती प्रतिष्ठा

हर साल 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य हिन्दी भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करना और इसकी महत्ता को उजागर करना है। World Hindi Day 2025 की थीम “हिन्दी: वैश्विक संवाद का सेतु” है, जो हिन्दी को एक अंतरराष्ट्रीय संवाद की भाषा के रूप में पहचान दिलाने की दिशा में एक और कदम है। इतिहास और महत्व: World Hindi Day 2025 की शुरुआत 10 जनवरी 2006 में हुई थी। यह दिन 1975 में नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन, दुनिया भर में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और इसके महत्व को लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हिन्दी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। 50 से अधिक देशों में इसे पढ़ाया जाता है और लगभग 60 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। 2025 में हिन्दी की भूमिका: इस वर्ष विश्व हिन्दी दिवस पर तकनीक, शिक्षा, और सांस्कृतिक संवाद के क्षेत्र में हिन्दी की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। डिजिटल युग में हिन्दी की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। सोशल मीडिया, ब्लॉगिंग, और कंटेंट क्रिएशन में हिन्दी की प्रमुखता ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वैश्विक मंच पर हिन्दी:-संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी:** संयुक्त राष्ट्र के कई मंचों पर हिन्दी में वक्तव्य दिए जा रहे हैं, जिससे इसकी प्रतिष्ठा बढ़ी है।-शिक्षा और तकनीक:** दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा को प्रमुख विषय के रूप में अपनाया जा रहा है।-सिनेमा और साहित्य:** हिन्दी सिनेमा और साहित्य ने वैश्विक दर्शकों को प्रभावित किया है। हिन्दी में अनुवादित साहित्य अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रहा है। भारत सरकार और हिन्दी का प्रचार-प्रसार: भारत सरकार ने हिन्दी के प्रचार के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें ई-हिन्दी पोर्टल, विश्व हिन्दी सम्मेलन, और विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी के शिक्षण को बढ़ावा देना शामिल है। विश्व हिन्दी दिवस के कार्यक्रम: 2025 में इस दिन को विशेष बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं: विश्व हिन्दी दिवस हमें हमारी मातृभाषा की शक्ति और महत्ता का एहसास कराता है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, पहचान और विश्व से जुड़ने का माध्यम है। 2025 में, हमें हिन्दी को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। आइए, इस दिन संकल्प लें कि हिन्दी को हर क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएंगे। “हिन्दी है हमारी पहचान, इसे बनाएं विश्व की शान!”

10 जनवरी को पूरे भारत में केंद्र सरकार का फूकेंगे पुतला… खन्नौरी बॉर्डर पर किसानों की महापंचायत में ऐलान

farmer protest khanauri border jagjit singh dallewal 10 january central govt effigy burning announcement खन्नौरी बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों ने आज हुई महापंचायत में केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन तेज करने का फैसला किया. किसानों ने ऐलान किया है कि वो 10 जनवरी को देशभर में केंद्र सरकार का पुतला फूकेंगे. इसके अलावा किसानों से आंदोलन में शामिल होने की भी अपील की गई है. पंजाब के खन्नौरी बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों की शनिवार को महापंचायत हुई. इसमें संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने 10 जनवरी को पूरे भारत में केंद्र सरकार का पुतला फूंकने का फैसला किया है. महापंचायत को आमरण अनशन पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने संबोधित भी किया. डल्लेवाल ने कहा कि आज आब सब दूर-दूर से चलकर आए हैं. मैं आप सभी से मिलना चाहता था. डल्लेवाल ने कहा कि ये लड़ाई मेरी नहीं है. ये सब ऊपर वाले की मर्जी से हो रहा है. ये शरीर ऊपर वाले ने दिया है. जैसा भगवान करवाना चाहते हैं वैसे ही अब हो रहा है. मुझे पुलिस उठाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन रात को हरियाणा-पंजाब से सैकड़ों नौजवान खन्नौरी बॉर्डर पर पहुंच गए. मुझे विश्वास है कि हम लड़ाई जीतेंगे. डल्लेवाल बोले- हम शांत नहीं बैठ सकते उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि ये कठिन काम है, लेकिन किसी काम को कठिन देखकर हम आराम से नहीं बैठ सकते हैं. हमारे किसान परिवारों के 4 लाख किसानों ने सुसाइड किया है. ये हम नहीं कह रहे बल्कि सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट है, लेकिन असलियत में 7 लाख किसान सुसाइड कर चुके हैं. हम किसान नेता हैं, हम लोगों ने ऐसा कुछ नहीं किया सुसाइड रुक सकें. किसान नेता ने सुप्रीम कोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि डल्लेवाल की लाइफ काफी महत्वपूर्ण, लेकिन जिन 7 लाख किसानों ने सुसाइड किया है वो भी हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण थे.उन 7 लाख किसानों के बच्चे के लिए हमें शहादत दे देनी चाहिए. जब हम दिल्ली से आंदोलन खत्म करके वापस आए थे तो दूसरे राज्यों के लोगों ने हमें उलाहना दिया कि पंजाब के संगठन वापस जा रहे हैं. आंदोलन तेज करने की अपील डल्लेवाल ने आगे कहा कि अब मैं दूसरे राज्यों के किसानों से कहता हूं कि अपने राज्यों में आंदोलन तेज कर दीजिए. एमएसपी सबको चाहिए. आप सब अपने-अपने गांवों से एक-एक ट्राली खन्नौरी बॉर्डर पर जरूर भेजें ताकि पुलिस आंदोलन को खत्म ना कर सके. हालांकि, महापंचायत को संबोधित करते हुए बीच में डल्लेवाल की तबीयत भी बिगड़ गई जिसके बाद भाषण को जल्दी खत्म करा दिया गया.

3 जनवरी से कांग्रेस शुरू करेगी ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’ अभियान, इस वजह से टला था कार्यक्रम

Congress will start ‘Jai Bapu, Jai Bhim, Jai Constitution’ campaign from January 3, due to this the program was postponed. कांग्रेस शुक्रवार को पूर्व निर्धारित ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’ अभियान का शुभारंभ करेगी। यह अभियान राज्यों, जिलों और ब्लॉक से शुरू होगा और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन मध्य प्रदेश के महू (वर्तमान में डॉ. आंबेडकर नगर) शहर में एक बड़ी जनसभा के साथ समाप्त होगा। डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के कारण टला था कार्यक्रमइस अभियान की शुरुआत पहले 27 दिसंबर को होनी थी। लेकिन 26 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के कारण इसे टाल दिया गया था। मनमोहन सिंह के निधन पर सात दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई थी। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा, कांग्रेस कार्यकारी समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में फैसला लिया गया था कि मनमोहन सिंह को सम्मान देने के लिए इस अभियान को एक हफ्ते के लिए स्थगित किया गया था। आंबेडकर की जन्मभूमि पर होगा अभियान का समापनउन्होंने कहा, यह भरोसा करना मुश्किल है कि वह (मनमोहन सिंह) अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन अब तीन जनवरी से यह अभियान फिर से शुरू किया जाएगा। इस अभियान का समापन डॉ. आंबेडकर की जन्मभूमि महू में 26 जनवरी को एक जनसभा के साथ होगा। 26 जनवरी को भारतीय संविधान को लागू हुए 75 साल भी पूरे हो रहे हैं। सीडब्ल्यूसी ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि कांग्रेस संविधान की सुरक्षा और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सिद्धांतों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस अभियान के तहत 27 दिसंबर को बेलगावी में एक रैली का आयोजन किया जाना था, लेकिन शोक के कारण इसे स्थगित कर दिया गया। ‘संविधान बचाओ राष्ट्रीय पदयात्रा’ भी शुरू करेगी कांग्रेसकांग्रेस के मुताबिक, 26 जनवरी 2025 से लेकर 26 जनवरी 2026 तक एक राष्ट्रीय पदयात्रा शुरू की जाएगी, जिसे संविधान बचाओ राष्ट्रीय पदयात्रा नाम दिया जाएगा। इस यात्रा में कांग्रेस के सभी नेता शामिल होंगे और यह यात्रा गांव-गांव और शहर-शहर जाएगी। इसके अलावा, कांग्रेस ने कहा कि अप्रैल 2025 के पहले हफ्ते में गुजरात में एआईसीसी की एक बैठक आयोजित की जाएगी।

कैसे हैं आपके प्रदेश के मुख्यमंत्री; किस पर कितने हैं केस दर्ज, कितनी है संपत्ति

how chief minister of your state how many cases registered against whom how much property there भारत के राजनीति में मुख्यमंत्री की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे न केवल राज्य के सबसे प्रभावशाली नेता होते हैं, बल्कि उनके खिलाफ चल रहे मामलों और उनकी संपत्ति भी चर्चा का विषय बनते हैं। how chief minister of your state हाल ही में लोकतांत्रिक सुधार संघ (ADR) और राष्ट्रीय चुनाव निगरानी (NEW) ने देशभर के 31 मुख्यमंत्रियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों और उनकी संपत्ति का विश्लेषण किया है। इस रिपोर्ट में यह सामने आया है कि कई मुख्यमंत्री गंभीर आपराधिक मामलों में घिरे हुए हैं, जबकि कुछ अपनी संपत्ति के मामले में काफी संपन्न हैं। क्या आपके राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई आपराधिक मामले दर्ज हैं? भारत में 31 मुख्यमंत्रियों में से 13 (42%) के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 10 (32%) मुख्यमंत्रियों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। यह आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारतीय राजनीति में कई मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले हैं, फिर भी वे सत्ता में बने रहते हैं। किन मुख्यमंत्रियों के खिलाफ कितने गंभीर आरोप हैं? तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंथ रेड्डी: इनके खिलाफ कुल 89 मामले दर्ज हैं, जिनमें से 72 गंभीर आपराधिक मामले हैं। ये मामले भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज किए गए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन: इनके खिलाफ 47 मामले हैं, जिनमें से 11 गंभीर आपराधिक मामले हैं। आरोपों में भ्रष्टाचार और जमीन कब्जाने के मामले शामिल हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू: इन पर कुल 19 मामले हैं, जिनमें 32 गंभीर IPC मामले हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते नायडू अक्सर विवादों में रहते हैं। कर्नाटका के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया: इन पर 13 मामले हैं, जिनमें 6 गंभीर IPC मामले शामिल हैं। भारत के मुख्यमंत्रियों की संपत्ति कितनी है? भारत के 31 मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति 52.59 करोड़ रुपये है। कुछ मुख्यमंत्री अरबों की संपत्ति के मालिक भी हैं। चंद्रबाबू नायडू (आंध्र प्रदेश): उनकी संपत्ति 931.83 करोड़ रुपये है।-पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश): उनकी संपत्ति 332 करोड़ रुपये से अधिक है।सिद्धारमैया (कर्नाटका): उनकी संपत्ति 51 करोड़ रुपये से अधिक है। क्या मुख्यमंत्री की संपत्ति आम नागरिक से कहीं अधिक होती है?मुख्यमंत्री की संपत्ति और आय आम नागरिक की तुलना में काफी अधिक होती है। उदाहरण के लिए, भारत में औसत राष्ट्रीय आय लगभग 1.85 लाख रुपये सालाना है, जबकि मुख्यमंत्री की औसत आय 13.64 लाख रुपये सालाना होती है, यानी उनकी आय लगभग सात गुना अधिक होती है। क्या मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई फाइनैंशियल स्कैंडल या कर्ज है? कुछ मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिनके पास बड़ी संपत्ति के साथ-साथ कर्ज भी है। उदाहरण के लिए: पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश): उनकी संपत्ति 332.56 करोड़ रुपये है, लेकिन उन्होंने 180.28 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। सिद्धारमैया (कर्नाटका): उनकी संपत्ति 51.94 करोड़ रुपये है, और उन्होंने 23.77 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। चंद्रबाबू नायडू (आंध्र प्रदेश): उनकी संपत्ति 931.83 करोड़ रुपये है, लेकिन उन्होंने 10.32 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। भारत में कितनी महिला मुख्यमंत्री हैं? भारत में महिला मुख्यमंत्री की संख्या बहुत कम है। रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ 2 महिला मुख्यमंत्री हैं, जो केवल 6% हैं। यह आंकड़ा भारतीय राजनीति में महिला नेतृत्व की कमी को दर्शाता है। भारत के मुख्यमंत्रियों की संपत्ति और उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले दर्शाते हैं कि राजनीति में बहुत सी जटिलताएँ होती हैं। हालांकि कुछ मुख्यमंत्री अपनी संपत्ति और पारदर्शिता के मामले में काफी अग्रणी हैं, वहीं कई ऐसे भी हैं जिनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं।

प्रयागराज महाकुंभ 2025: आध्यात्मिकता और संस्कृति का संगम

Prayagraj Mahakumbh 2025: Confluence of spirituality and culture प्रयागराज महाकुंभ 2025, भारतीय संस्कृति और धर्म का सबसे बड़ा उत्सव, 2025 में आयोजित होने जा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक विविधता और भारतीयता के अद्भुत दर्शन का प्रतीक भी है। महाकुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर स्नान करने आते हैं। महाकुंभ का महत्व महाकुंभ का आयोजन हर 12 वर्षों में प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में होता है। यह पर्व पवित्र नदियों के संगम पर होता है, जो मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार, अमृत मंथन की कथा से जुड़े इस आयोजन में स्नान, दान और तप का विशेष महत्व है। मुख्य तिथियां महाकुंभ 2025 के स्नान पर्व निम्नलिखित होंगे:मकर संक्रांति (14 जनवरी)पौष पूर्णिमा (25 जनवरी)मौनी अमावस्या (10 फरवरी)बसंत पंचमी (15 फरवरी)माघी पूर्णिमा (24 फरवरी)महाशिवरात्रि (8 मार्च) विभिन्न राज्यों से प्रयागराज आने का मार्ग उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत से: पश्चिम भारत से: दक्षिण भारत से: पूर्व और पूर्वोत्तर भारत से: यात्रा और सुविधाएंविशेष ट्रेन और बस सेवाएं: IRCTC और राज्य परिवहन विभाग विशेष कुंभ ट्रेन और बसें चलाएंगे।स्मार्ट कार्ड: कुंभ मेला क्षेत्र में डिजिटल पेमेंट और यात्रा के लिए स्मार्ट कार्ड उपलब्ध रहेगा।स्वास्थ्य और सुरक्षा: मेले में अस्थाई अस्पताल, एंबुलेंस और सुरक्षा बल तैनात किए जाएंगे। समापनप्रयागराज महाकुंभ 2025 एक ऐसा अवसर है जो न केवल आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, धर्म और एकता की झलक भी प्रस्तुत करता है। देश के किसी भी कोने से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। श्रद्धालु इस अवसर का लाभ उठाकर आत्मिक शांति और पुण्य लाभ अर्जित कर सकते हैं।

रुपये में डॉलर के मुकाबले सबसे बड़ी गिरावट, 46 पैसे टूटकर नए ऑल टाइम लो 85.73 पर पहुंचा

Biggest fall in rupee against dollar, fell by 46 paise and reached new all time low of 85.73. अमेरिकी मुद्रा के मजबूत होने और विदेशी पूंजी के निरंतर बाहर जाने के कारण शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 46 पैसे टूटकर नए ऑल टाइम लो 85.73 रुपये पर पहुंच गया। यह रुपये में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावअ है। विश्लेषकों के अनुसार, महीने के अंत और साल के अंत में भुगतान दायित्वों के लिए आयातकों की ओर से डॉलर की बढ़ती मांग के बीच डॉलर की मजबूती के कारण स्थानीय इकाई पर दबाव पड़ा। हालांकि, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और घरेलू इक्विटी बाजारों से सकारात्मक संकेतों ने भारतीय इकाई में गिरावट को सीमित कर दिया। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया कमजोर रुख के साथ 85.31 पर खुला और जल्द ही गिरकर 85.35 के अपने सर्वकालिक निम्नतम स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले बंद स्तर से 8 पैसे की गिरावट थी। रुपया गुरुवार को डॉलर के मुकाबले 12 पैसे टूटकर 85.27 के अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। इससे पहले दो कारोबारी सत्रों में इसमें 13 पैसे की गिरावट आई थी। इस बीच, छह मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत को मापने वाला डॉलर सूचकांक 0.04 प्रतिशत बढ़कर 107.93 पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी पर प्राप्ति बढ़ रही थी तथा 10 वर्षीय बांड 4.50 प्रतिशत के आसपास था। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 0.07 प्रतिशत बढ़कर 73.31 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। घरेलू शेयर बाजार में 30 शेयरों वाला प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 207.16 अंक यानी 0.26 प्रतिशत बढ़कर 78,679.64 अंक पर कारोबार कर रहा था। निफ्टी 88.50 अंक यानी 0.37 प्रतिशत बढ़कर 23,838.70 अंक पर था। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) गुरुवार को पूंजी बाजार में शुद्ध विक्रेता रहे और उन्होंने 2,376.67 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।

क्या है न्यायसंगत गुजारा भत्ता? सुप्रीम कोर्ट ने तय किए नए पैमाने, पति-पत्नी दोनों के लिए राहत

What is equitable alimony? Supreme Court sets new standards, relief for both husband and wife सुप्रीम कोर्ट के नए दिशानिर्देश के अनुसार, गुजारा भत्ता तय करते समय पहले ये देखा जाना चाहिए कि पति-पत्नी दोनों का समाज में क्या स्थान है, उनकी पृष्ठभूमि क्या है, उनके परिवार का क्या रुतबा है. नई दिल्ली ! यह बेहद दुखद है कि बेंगलुरू में 34 साल के अतुल सुभाष ने अपनी पत्नी के साथ तलाक, गुजारा भत्ता और अन्य मामलों को लेकर चल रहे कानूनी विवाद के चलते अपनी जान दे दी. उन्होंने मरने से पहले अपनी पत्नी पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने, पैसे ऐंठने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए. अतुल सुभाष ने अपने 24 पेज के सुसाइड नोट और 81 मिनट के वीडियो में आरोप लगाया कि वह पत्नी निकिता सिंघानिया को 40 हजार रुपये महीना गुजारा भत्ता के तौर पर दे रहे थे. फिर भी, पत्नी और उसके परिवार वाले सभी केस खत्म करने के लिए 3 करोड़ रुपये की रकम मांग रहे थे. इतना ही नहीं, बच्चे से मिलने के लिए 30 लाख रुपये की डिमांड की जा रही थी. अतुल सुभाष की आत्महत्या ने यह दिखाया है कि तलाक-गुजारा भत्ता के मामलों में कानूनी प्रक्रिया कितनी मुश्किल और तनावपूर्ण हो सकती है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में गुजारा भत्ता को लेकर अहम फैसला सुनाया है. यह मामला दुबई के एक बैंकर, उनकी पत्नी और बच्चे के बीच कानूनी विवाद से जुड़ा था. इस मामले में कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करते समय 8 बातों का ध्यान रखने के लिए कहा है. अब भारत की अदालतें गुजारा भत्ता के मामलों में इसी फैसले को आधार मानकर काम करेंगी. पहले जानिए क्या है पूरा विवाद यह मामला दुबई के एक बैंक के सीईओ का है जिनकी साल 1998 में शादी हुई और 2004 में उनका पत्नी से विवाद हो गया. इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई, जिसमें 20 साल तक यह बैंकर पारिवारिक अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक घूमता रहा. 2004 में बैंकर ने क्रूरता के आधार पर पत्नी से तलाक की अर्जी दायर की. इसके बाद पत्नी ने भी गुजारा भत्ता पाने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत याचिका दायर कर दी. यह केस 20 साल से अदालतों में घूम रहा है. परिवारिक अदालत से शुरू हुआ ये मामला पहले हाईकोर्ट में पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट. मुख्य सवाल यही है कि पत्नी को कितना गुजारा भत्ता मिलना चाहिए. फिर सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा मामला? 2015 में बैंकर ने सभी अदालती फैसलों का पालन करते हुए खुद से गुजारा भत्ता बढ़ा दिया. हालांकि, जब उनकी पत्नी ने और भी ज्यादा गुजारा भत्ता मांगना शुरू किया, तो उन्होंने विरोध किया. पति को यह मंजूर नहीं था कि यह रकम बार-बार बढ़ती रहे, खासकर जब उसकी अपनी भी आर्थिक स्थिति ठीक न हो और उसे अपने बच्चों की जिम्मेदारी भी निभानी हो. बैंकर के वकीलों के अनुसार, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 एक वयस्क बच्चे को गुजारा भत्ता देने की अनुमति नहीं देती है. मगर, पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 को चुनौती दी और अदालत से अपने और अपने वयस्क बेटे को स्थायी गुजारा भत्ता देने का समाधान मांगा. पत्नी का कहना था कि इस कानून के हिसाब से बच्चों के बड़े होने पर ज्यादा पैसे मिलने चाहिए. उनके बेटा हाल ही में ग्रेजुएट हुआ है और अभी भी उन पर निर्भर है, इसलिए और उन्हें भी ज्यादा पैसे चाहिए. बैंकर को इस बात पर सबसे ज्यादा एतराज था कि उसकी पत्नी हिन्दू मैरिज एक्ट के सेक्शन 26 का गलत इस्तेमाल करके ज्यादा पैसे मांग रही है. हालांकि वो पहले के फैसलों को मानता रहा था और गुजारा भत्ता बढ़ाने को भी तैयार था. यह पारिवारिक विवाद जब कानून का सवाल बन गया, तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने केस के सभी तथ्यों को ध्यान से समझा. उन्होंने मौजूदा कानून को भी ध्यान में रखा. सुप्रीम कोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा (2021) और उसके बाद के फैसलों में दिए गए सिद्धांतों को दोहराया है. फिर कोर्ट ने कुछ बातें बताईं जिनके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि गुजारा भत्ता देना जरूरी है या नहीं और अगर जरूरी है तो कितना. सुप्रीम कोर्ट के नए दिशानिर्देश के अनुसार, गुजारा भत्ता तय करते समय पहले ये देखा जाना चाहिए कि पति-पत्नी दोनों का समाज में क्या स्थान है, उनकी पृष्ठभूमि क्या है, उनके परिवार का क्या रुतबा है, ये सारी बातें शामिल हैं. कई बार सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण भी गुजारा भत्ता की राशि प्रभावित हो सकती है. साथ ही दोनों कितना कमाते हैं और उनकी कितनी संपत्ति है. अगर पति आर्थिक रूप से मजबूत होता है, तो उसे ज्यादा गुजारा भत्ता देने के लिए कहा जा सकता है. अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं और उनकी आय लगभग बराबर है, तो गुजारा भत्ता की राशि कम हो सकती है या फिर शायद किसी को गुजारा भत्ता देने की जरूरत ही नहीं पड़े. लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह सिर्फ एक कारक है. गुजारा भत्ता तय करते समय अदालत बाकी 7 कारकों पर भी विचार करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करते समय पति-पत्नी के जीवन स्तर को भी एक अहम कारक बताया है. गुजारा भत्ता तय करते समय अदालत यह भी देखेगी कि पति-पत्नी का समाज में क्या रुतबा है और वे कैसा जीवन जीते थे. उनके पास कितने मकान और गाड़ियां हैं, उनकी कीमत क्या है? उनका घर कितना बड़ा है, उसमें कितने एसी और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं हैं? उनके घर में कितने नौकर-चाकर काम करते हैं? वे कितनी बार छुट्टियां मनाने जाते थे, भारत में या विदेश में? अगर पति-पत्नी अमीर थे और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते थे, तो पत्नी को ज्यादा गुजारा भत्ता मिल सकता है ताकि वो भी वैसी ही जिंदगी जी सके. अदालत यह भी देखेगी कि पत्नी की उम्र क्या है, उसने कितनी पढ़ाई की है और क्या वो खुद कमा सकती है. अगर वह बेरोजगार है, तो उसे ज्यादा गुजारा भत्ता मिल सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा … Read more

यह भी आपके अधिकार: शादी वाली फोटो खोने पर फोटोग्राफर पर कर सकते हैं केस, मिलेगा मुआवजा

This is also your right: If you lose your wedding photos, you can file a case against the photographer and get compensation नई दिल्ली। शादी की तस्वीरें और वीडियो बहुत ज्यादा भावनात्मक महत्व रखते हैं। पीढ़ियों तक यादों को संजोकर रखने में इनका अमूल्य योगदान होता है। अब जबकि शादी की फोटोग्राफी के पैकेज लाखों में आने लगे हैं तो इस क्षेत्र में उपभोक्ता अधिकारों को समझना बहुत जरूरी हो गया है। कानूनी उपाय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(7) के तहत फोटोग्राफी सेवाओं को भाड़े पर लेने वाला कोई भी व्यक्ति उपभोक्ता है। धारा 2(11) में उस कमी को परिभाषित किया गया है, जिससे उपभोक्ता को नुकसान होता है। कानून ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह के लेन-देन को मान्यता देता है और शिकायत घटना के दो साल के भीतर उपभोक्ता आयोगों में इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज की जा सकती है। फोटोग्राफी सेवाएं अधिनियम की धारा 2(42) के तहत परिकल्पित “सेवाओं’ की परिभाषा के अंतर्गत आती हैं। अनुबंध संबंधी दायित्व उपभोक्ता मंच फोटोग्राफी सेवाओं में स्पष्ट अनुबंधों के महत्व पर जोर देते हैं। साक्षी कुमार बनाम राणा गुरतेज सिंह (2018) मामले में चंडीगढ़ राज्य आयोग ने कहा कि फोटोग्राफी अनुबंध में भले ही समय इतना मायने ना रखता हो, लेकिन फोटोग्राफरों को उचित समय के भीतर काम पूरा करना चाहिए। अनुबंध में स्पष्ट रूप से डिलीवरेबल्स (फोटो की संख्या, संपादन की जरूरत और डिलीवरी फॉर्मेट) का उल्लेख होना चाहिए। आयोग ने माना कि फोटो का चयन एक व्यक्तिगत मामला है और फोटोग्राफरों से उनके स्तर पर फोटो को शॉर्टलिस्ट करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्हें आमंत्रित लोगों का शादी वाले परिवार से जुड़ाव के बारे में पता नहीं होता। इस मामले में अगर फोटोग्राफर ने उचित प्रक्रिया का पालन किया और अनुबंध के अनुसार संपादित फोटो वितरित किए तो आयोग ने उनके अधिकारों की भी रक्षा की। डेटा लॉस और बैकअप एक बड़ी चिंता तकनीकी विफलताओं के कारण शादी की तस्वीरों का नुकसान होता है। सत्यम गुरुंग बनाम सैमडेन योल्मो (2024) मामले में जब एक फोटोग्राफर ने दावा किया कि बिजली गिरने से शादी की तस्वीरों वाली हार्ड डिस्क क्षतिग्रस्त हो गई थी तो पश्चिम बंगाल राज्य आयोग ने 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया। आयोग ने कहा कि कि पेशेवर फोटोग्राफरों को उपकरण और डेटा बैकअप के लिए उचित सुरक्षा उपाय करने शिकायतकर्ता को तकनीकी विफलताओं के दावों को विशेषज्ञ रिपोर्ट या फोरेंसिक विश्लेषण जैसे साक्ष्यों से साबित करना चाहिए। आयोग ने कहा कि पेशेवर फोटोग्राफर होने के नाते इस तरह के डेटा नुकसान को रोकने के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए थी। ऐसे मामलों में केवल अग्रिम राशि वापस करने से फोटोग्राफरों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। समय पर डिलीवरी जगदीश चंद्र शर्मा बनाम आर.के. वर्मा (2005) मामले में दिल्ली राज्य आयोग ने एक ऐसे मामले पर विचार किया, जिसमें फोटोग्राफर ने पांच साल तक शादी का एल्बम नहीं दिया था। आयोग ने कहा कि “किसी की बेटी के विवाह समारोह के फोटो एल्बम का भावनात्मक मूल्य होता है और इसकी अहमियत कभी भी खत्म नहीं हो सकती, क्योंकि यह आने वाले समय के लिए यादों को संजोए रखता है।’ फोटोग्राफर को एल्बम देने और लंबित भुगतान जब्त करने का निर्देश दिया गया। इसी तरह, पी. मुरलीकृष्णुडु बनाम वरिकल्ला श्रीनिवास (2016) मामले में जब फोटोग्राफर 85% अग्रिम भुगतान लेने के बावजूद वादा किए गए समय पर एल्बम देने में विफल रहा तो जिला फोरम ने ब्याज सहित राशि वापसी का आदेश दिया। गुणवत्ता मानक फोटोग्राफरों की जिम्मेदारी केवल तस्वीरों की क्वांटिटी से कहीं अधिक है। फोटोग्राफरों को वादा किए गए गुणवत्ता मानकों के अनुसार संपादित तस्वीरें देनी सत्यम गुरुंग मामले में गूगल ड्राइव के माध्यम से असंपादित फोटो साझा करने को पर्याप्त नहीं माना गया। आयोग ने नोट किया कि विवाह फोटोग्राफी अनुबंधों में क्वांटिटी और क्वालिटी दोनों मायने रखता है। अपने अधिकारों की रक्षा स्मृतियों को संजोने के महत्व के मद्देनजर उपभोक्ताओं को विस्तृत लिखित अनुबंध हासिल करना चाहिए, जिसमें डिलीवरेबल्स, समयसीमा और गुणवत्ता मानकों का उल्लेख किया गया हो। अनुबंध में बैकअप प्रक्रियाओं, संपादित फोटो की जरूरतों और तकनीकी विफलताओं के मामले में वैकल्पिक व्यवस्था का भी जिक्र होना चाहिए। उपभोक्ता को सभी कम्युनिकेशन और भुगतानों का रिकॉर्ड रखना चाहिए। उपभोक्ता आयोगों ने विवाह फोटोग्राफी मामलों में लगातार पर्याप्त मुआवजा दिया है। हालांकि मौद्रिक मुआवजा भावनात्मक नुकसान की पूरी तरह से भरपाई नहीं कर सकता, फिर भी यह कीमती यादों को खोने की पीड़ा को कम करने में मदद कर सकता है।

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