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बजट 2026 में नारी कल्याण: लखपति दीदी, शी मार्ट्स और गर्ल्स हॉस्टल से बदलेगी महिलाओं की तस्वीर

नई दिल्ली. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2026-27 का बजट पेश किया। हर बार की तरह इस बार भी वित्त मंत्री के पिटारे में महिलाओं के लिए कुछ खास सौगात देखने को मिली। तो आइए जानते हैं इस बार बजट में महिलाओं के लिए क्या-कुछ खास था? लखपति दीदी योजना केंद्र सरकार ने लखपति दीदी योजना को जारी रखने की भी घोषणा की है। इस योजना के तहत महिलाओं से जुड़े स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक का ब्याज रहित लोन दिया जाता है, जिससे वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकें। इस लोन पर महिलाओं को सरकारी सब्सिडी भी मिलती है। ‘शी मार्ट्स’ की घोषणा केंद्र सरकार की लखपति दीदी योजना की सफलता के बाद वित्त मंत्री ने ‘शी मार्ट्स’ (She MARTS) की घोषणा की है। ये मार्ट्स स्वयं सहायता उद्यमियों की ओर से संचालित किया जाएगा और रीटेल आउटलेट के रूप में ऑपरेट करेगा। केंद्र सरकार की इस नई स्कीम का उद्देश्य महिला उद्यमियों की पहुंच बड़ी बाजार तक सुनिश्चित करना है। इसके तहत महिलाएं न सिर्फ अपना खुद का ब्रांड बना सकेंगी, बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा सकेंगी। इससे स्थानीय स्वयं सहायता समूह भी मजबूत होंगे। गर्ल्स हॉस्टल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने छात्राओं को भी बजट में शानदार सौगात दी है। उन्होंने हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल खोलने की घोषणा की है। देश के लगभग 700 से ज्यादा जिलों में छात्राओं के रहने के लिए गर्ल्स हॉस्टल की नींव रखी जाएगी।  

अब गैजेट खरीदना होगा आसान? सरकार के फैसले से मोबाइल से लेकर AC तक हो सकते हैं सस्ते

नई दिल्ली बजट 2026 में अनाउंट किए गए Semiconductor Mission 2.0 का असली फायदा यही है कि भारत की टेक्नोलॉजी विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी। इसका सीधा मतलब है कि देश में गैजेट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स सस्ते हो सकते हैं। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 से ये सब होगा सस्ता वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को बजट 2026 पेश किया और इसमें स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देते हुए India Semiconductor Mission 2.0 को 40,000 करोड़ रुपये का समर्थन मिला है। इसका सीधा मतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक्स में लगने वाले सेमीकंडक्टर चिप अब भारत में बनाए जाएंगे। सीधा मतलब है कि फोन से लेकर होम अप्लायंसेज तक अगले कुछ साल में सस्ते होने वाले हैं और इनकी कीमतें गिरेंगी। आप नीचे देख सकते हैं कि किन चीजों की कीमत में गिरावट देखने को मिल सकती है।   इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और कारें आज की कारों और खासकर EV में दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों चिप्स इस्तेमाल होती हैं। पिछले कुछ सालों में चिप की कमी के कारण गाड़ियां महंगी हुईं और वेटिंग बढ़ी है। देश में ऑटोमोटिव-ग्रेड चिप्स बनने से सप्लाई स्टेबल होगी और लागत घटेगी। लंबे समय में इससे EV की कीमत और मेंटिनेंस कॉस्ट कम हो सकती है।   इलेक्ट्रॉनिक्स और होम अप्लायंसेज टीवी, फ्रिज, AC, वॉशिंग मशीन, आज हर अप्लायंस ‘स्मार्ट’ हो चुका है और इन स्मार्ट फीचर्स के लिए माइक्रोचिप्स जरूरी हैं। लोकल सेमीकंडक्टर सप्लाई मिलने पर कंपनियों का खर्च घटेगा, जिसका असर स्मार्ट टीवी, इन्वर्टर AC और एनर्जी-एफिशिएंट अप्लायंसेज की कीमतों पर दिख सकता है।   स्मार्टफोन और टैबलेट स्मार्टफोन में प्रोसेसर, कैमरा, नेटवर्क और बैटरी मैनेजमेंट, सब कुछ चिप्स पर निर्भर करता है। अभी ये चिप्स ज्यादातर बाहर से मंगाई जाती हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है। ये चिप्स भारत में बनने लगती हैं, तो मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट घटेगी। इसका फायदा सबसे पहले बजट और मिड-रेंज स्मार्टफोन में दिख सकता है। लैपटॉप, राउटर और स्मार्ट गैजेट्स लैपटॉप, Wi-Fi राउटर, स्मार्टवॉच और IoT डिवाइस कई तरह की चिप्स के साथ काम करते हैं। अभी इन्हें इंपोर्ट करना पड़ता है, जिससे कीमतें बढ़ती हैं। Semiconductor Mission 2.0 में चिप पैकेजिंग और टेस्टिंग पर भी जोर है, जिससे इन गैजेट्स की लागत कम हो सकती है। ऐसे में पहले एंट्री-लेवल लैपटॉप और नेटवर्किंग डिवाइसेज को फायदा मिलेगा। मेडिकल और हेल्थकेयर डिवाइसेज BP मशीन, ECG, ऑक्सीमीटर और कई डायग्नोस्टिक टूल्स भी चिप्स पर चलते हैं। देश में चिप्स बनने से मेडिकल डिवाइस का प्रोडक्शन सस्ता होगा और इलाज से जुड़े टूल्स अफऑर्डेबल बन सकते हैं। पावर, सोलर और चार्जिंग सिस्टम स्मार्ट मीटर, सोलर इन्वर्टर, EV चार्जर और पावर कंट्रोल सिस्टम में सेमीकंडक्टर बड़ी भूमिका निभाते हैं। Mission 2.0 के साथ पावर-चिप्स को बढ़ावा मिलने से ऊर्जा और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत कम हो सकती है, जिसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा।

इलाज भी सस्ता, रोजगार भी: दवाइयों पर राहत के साथ टेक्सटाइल पार्क और हैंडलूम योजना का ऐलान

नई दिल्ली.  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट 2026-27 पेश कर रही है। उनके भाषण पर पूरे भारत की नजर टिकी है। बजट से आम नागरिक, व्यवसायी, हेल्थ सेक्टर, शेयर मार्केट को उम्मीदें है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाषण की शुरुआत में कहा, इस बजट में ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूत बजट पर फोकस है। इसके अलावा इस साल के बजट में युवा शक्ति पर फोकस है। वित्त मंत्री ने कहा, “सरकार के कदमों से 7 प्रतिशत का विकास और गरीबी कम करने में मदद मिली है। भारत को वैश्विक बाजारों से एकीकृत होना होगा।” वित्त मंत्री ने कहा, “आर्थिक विकास को सतत और तेज बनाए रखना सरकार का पहला कर्तव्य है।” बजट में किन बातों को विशेष महत्व? मैन्युफैक्चरिंग में तेजी चैंपियन एमएसएमई का निर्माण इन्फ्रास्ट्रक्चर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा स्वास्थ्य सेवा के लिए रणनीति क्या है मुख्य घोषणाएं? 2025 में रेअर परमानेंट मैग्नेट स्कीम शुरू की गई थी। इसमें आगे बढ़ते हुए खनिज संपन्न राज्यों की मदद की जाएगी। पांच राज्यों में रेयर अर्थ मिनरल के डेडिकेटेड कॉरिडोर बनेगा। इसके अलावा EMS PLI स्कीम का आवंटन 20 हजार से बढ़ाकर 40 हजार करोड़ किया जाएगा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन – उपकरण और सामग्री उत्पादन, सप्लाई चेन मजबूत करने के लिए आईएसएम 2.0 शुरू किया जाएगा। 5 साल में बायोफार्मा में 10 हजार करोड़ रुपए का निवेश होगा दुर्लभ खनिज के लिए कॉरिडोर बनेगा     आंध्र, केरल, तमिलनाडु और ओडिशा में कॉरिडोर बनेगा     कैंसर, डायबिटीज की दवाइयां सस्ती होगी     टेक्सटाइल पार्क की स्थापना का एलान     महात्मा गांधी हैंडलूम योजना शुरू करेंगे     वस्त्र उद्योग सेक्टर में भी रिफॉर्म करेंगे     इससे बुनकरों को फायदा होगा डिफेंस के लिए क्या घोषणा?  रक्षा सामग्री (जैसे हथियार) खरीद के लिए 219306.47 करोड़ रुपये। पिछले बजट (2025-26) में 180000 करोड़ का प्रावधान किया गया था, जिसे संशोधित कर 186454.20 करोड़ किया गया है। सर्विस सेक्टर के लिए हाई‑पावर्ड स्थायी समिति की घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘मैं ‘Education to Employment and Enterprise’ नाम की एक हाई‑पावर्ड स्टैंडिंग कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखती हूं, जो सर्विस सेक्टर को ‘विकसित भारत’ का मुख्य ड्राइवर बनाने के लिए जरूरी उपायों की सिफारिश करेगी। सरकार का टारगेट है कि 2047 तक भारत का सर्विस सेक्टर में वैश्विक हिस्सा 10% तक पहुंचे। इनकम टैक्स कानूनों, टैक्स कलेक्शन को लिए कई घोषणाएं नया इनकम टैक्स एक्ट 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा। FY27 के लिए अनुमानित Non‑debt receipts 36.5 लाख करोड़ रुपये होगा। वहीं Net tax receipts 28.7 लाख करोड़ रुपये होगा। वित्त मंत्री ने कहा है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए TCS रेट घटाया गया. यह 5% से घटाकर 2% किया जाएगा। रिटर्न संशोधन (Revised Returns) का समय बढ़ाया गया. नाममात्र फीस देकर रिवाइज रिटर्न फाइल करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।  

इन्फ्रा बूम 2026: सड़क-रेल-मेट्रो को रिकॉर्ड फंडिंग, ₹12.20 लाख करोड़ कैपेक्स से तेज होगा छोटे शहरों का विकास

नई दिल्ली. यूनियन बजट 2026 (Union Budget 2026) में सरकार ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि देश की ग्रोथ की रफ्तार इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर ही तेज की जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया है कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ कर दिया गया है। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं। कैपेक्स (Capex) यानी सरकार द्वारा किया जाने वाला वह खर्च, जो सड़क, रेलवे, मेट्रो, एयरपोर्ट, हाउसिंग और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी लंबे समय की विकास परियोजनाओं पर होता है। इसका मतलब है कि जितना ज्यादा कैपेक्स (Capex) होगा, उतना ज्यादा रोजगार, निवेश और आर्थिक गतिविधियां भी बढेंगी। वित्त मंत्री ने बताया कि पिछले एक दशक में पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 2014-15 में यह 2 लाख करोड़ था, जो 2025-26 (BE): में बढ़कर 11.2 लाख करोड़ हुआ और 2026-27 (प्रस्तावित) में इसको बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ तक कर दिया गया है, यानी 10 साल में सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च कई गुना बढ़ चुका है। सरकार का खास जोर उन शहरों पर रहेगा जिनकी आबादी 5 लाख से ज्यादा है। ये शहर अब सिर्फ छोटे कस्बे नहीं, बल्कि नए ग्रोथ सेंटर्स बन चुके हैं। सरकार का लक्ष्य है कि Tier-2 और Tier-3 शहरों में बेहतर सड़कें हों। इसके साथ ही मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट हो। वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश ट्रस्ट (इन्विट) (Infrastructure Investment Trust -InvIT), रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (Real Estate Investment Trust -REIT) जैसे नए फाइनेंसिंग टूल्स को भी बढ़ावा दिया है, जिससे प्राइवेट निवेश को आकर्षित किया जा सके। इस बढ़े हुए Capex का सीधा असर रोजगार के नए अवसर, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर पर पड़ेगा। छोटे शहरों में बेहतर सुविधाएं होंगी। इसके साथ ही बिजनेस और इंडस्ट्री के लिए आसान कनेक्टिविटी होगी। 

बायो-फार्मा से सेमीकंडक्टर तक बदलेगी तस्वीर, बजट 2026 में ‘औद्योगिक संप्रभुता’ का बड़ा दांव

नई दिल्ली. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए जाने वाले वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार का पूरा जोर भारत को औद्योगिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर है। लगभग ₹54.1 लाख करोड़ के संभावित बजट आकार के बीच, सरकार ने आर्थिक सुधारों को गति देने के लिए ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ का ब्लूप्रिंट पेश किया है। यह पहल प्रधानमंत्री द्वारा 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर की गई घोषणाओं और उसके बाद गठित उच्च स्तरीय समितियों के सुझावों पर आधारित है। केंद्र सरकार अब राज्य सरकारों के साथ मिलकर इन सुधारों को जमीनी स्तर पर उतारने की तैयारी में है। इस ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ के तहत 6 प्रमुख कर्तव्यों और 7 फोकस सेक्टर्स की पहचान की गई है, जिनका उद्देश्य भारत की ‘इंडस्ट्रियल सॉवरेन्टी’  यानी औद्योगिक संप्रभुता को सुनिश्चित करना है। 1. बायो-फार्मा शक्ति: ₹10,000 करोड़ का बूस्टर फार्मास्यूटिकल सेक्टर में भारत को वैश्विक हब बनाने के लिए सरकार ने ‘बायो-फार्मा शक्ति’ की घोषणा की है। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। • उद्देश्य: ज्ञान, टेक्नोलॉजी और नवाचार  के जरिए विकास करना और किफायती दवाएं उपलब्ध कराना। • इंफ्रास्ट्रक्चर: देश में बायो-फार्मा के 3 नए राष्ट्रीय संस्थान बनाए जाएंगे और 7 मौजूदा संस्थानों को अपग्रेड किया जाएगा। • रेगुलेशन: दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ‘सेंट्रल ड्रग कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन’ (CDSCO) का भी आधुनिकीकरण किया जाएगा। 2. सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स: ₹40,000 करोड़ का प्रस्ताव टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए ‘सेमीकंडक्टर मिशन’ को विस्तार दिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्यूफैक्चरिंग स्कीम के तहत तय लक्ष्य से दोगुना हासिल करने के बाद सरकार का उत्साह बढ़ा है। • नया निवेश: इस सेक्टर में 40,000 करोड़ रुपये के खर्च का प्रस्ताव रखा गया है। • फोकस: मुख्य जोर उद्योग आधारित प्रशिक्षण केंद्रों पर होगा, ताकि इस सेक्टर के लिए स्किल्ड वर्कफोर्स तैयार की जा सके। 3. रेयर अर्थ मिशन: आयात निर्भरता घटाने की तैयारी महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन या अन्य देशों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने एक रणनीतिक कदम उठाया है। ‘रेयर अर्थ’ तत्वों के खनन और शोध के लिए देश के चार राज्यों में विशेष कॉरिडोर बनाए जाएंगे। • राज्य: ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु। • लक्ष्य: इन कॉरिडोर्स का मुख्य उद्देश्य आयात निर्भरता  को घटाना और घरेलू स्तर पर इन स्ट्रैटेजिक मिनरल्स की सप्लाई चेन बनाना है। 4. एमएसएमई और शहरी विकास ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ के तहत छोटे उद्योगों यानी एमएसएमई को ‘चैम्पियन’ बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में आर्थिक ढांचे  को मजबूत करने के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं, ताकि शहर विकास के इंजन बन सकें। भविष्य की ओर बढ़ती ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ कुल मिलाकर, ₹54.1 लाख करोड़ के बजट में ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ सरकार की दीर्घकालिक दृष्टि को दर्शाती है। बायो-फार्मा और सेमीकंडक्टर जैसे उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में भारी निवेश और रेयर अर्थ जैसे रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण यह बताता है कि सरकार अब केवल ‘असेंबली’ नहीं, बल्कि ‘मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन’ पर फोकस कर रही है।

50 रुपये महंगा हुआ एलपीजी सिलेंडर, बजट से पहले बड़ा झटका

नई दिल्ली. आज बजट से पहले ही LPG सिलेंडर के उपभोक्ताओं को झटका लगा है। कॉमर्शियल एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) सिलेंडर और घरेलू सिलेंडर के रेट आज 1 फरवरी 2026 अपडेट हुए हैं। कॉमर्शियल सिलेंडर के उपभोक्ताओं को दिल्ली से पटना तक करीब 50 रुपये का तेज झटका लगा है। जबकि, घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दिल्ली में 19 किलो वाला एलपीजी सिलेंडर आज से 1691.50 रुपये की जगह 1740.50 में मिलेगा। कोलकाता में पहले 1795 रुपये का था और अब 1844.50 रुपये का हो गया है। मुंबई में कॉमर्शियल सिलेंडर अब 1642.50 की जगह 1692 रुपये में मिलेगा। चेन्नई में अब आज से कॉमर्शियल सिलेंडर 1899.50 रुपये में मिलेगा पहले यह 1849.50 रुपये का था। घरेलू एलपीजी के रेट भारत में इंडियन ऑयल के डेटा के आधार पर एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) की कीमतों की बात करें तो आज 14.2 किग्रा वाला घरेलू सिलेंडर दिल्ली में ₹853 में मिल रहा है। जबकि, पटना में इसकी कीमत ₹951 है। मुंबई में ₹852.50 और लखनऊ में ₹890.50 में मिल रहा है। कारगिल में ₹985.5, पुलवामा में ₹969, बागेश्वर में ₹890.5 का है। बजट डे पर कैसे रहा है ट्रेंड इंडियन ऑयल की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के मुताबिक पिछले 5 साल में बजट के दिन घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ। जबकि, कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़े और घटे भी हैं। 2022 में बजट डे के दिन 1 फरवरी को कॉमर्शियल सिलेंडर के उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली थी। इस दिन दिल्ली में 19 किलो वाला नीला सिलेंडर 91.50 रुपये, कोलकाता में 89 रुपये, मुंबई में 91.50 रुपये और चेन्नई में 91 रुपये सस्ता हुआ था। 2023 में न तो घरेलू एलपीजी सिलेंडर के रेट बदले और न ही कॉमर्शियल के। 2024 में बजट डे के दिन घरेलू एलपीजी सिलेंडर के उपभोक्ताओं की जेब पर तो कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के उपभोक्ताओं को 18 रुपये तक झटका लगा था। 2025 में बजट डे के दिन कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर उपभोक्ताओं को ऊंट के मुंह में जीरा जितनी राहत मिली। सिलेंडर के दाम महज 6.50 रुपये कम हुए।

सुपरजेट की जगह Su-57? भारत में आने वाला दुनिया का सबसे चर्चित फाइटर जेट, तैयारियों की खबर

नई दिल्ली हाल ही में HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) और रूस की UAC (यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन) के बीच SJ-100 (सुखोई सुपरजेट 100) विमानों के भारत में उत्पादन को लेकर हुए समझौते ने रक्षा गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या नागरिक विमानों के बाद अब ‘खतरनाक’ सुखोई Su-57 लड़ाकू विमान भारतीय वायु सेना (IAF) के बेड़े का हिस्सा बनेंगे? SJ-100 समझौता: एक नया मोड़ भारत और रूस के बीच नागरिक विमानन के क्षेत्र में हुआ यह समझौता ‘मेक इन इंडिया’ की दिशा में एक बड़ा कदम है। SJ-100 एक क्षेत्रीय जेट है, और इसके स्थानीय उत्पादन से भारत में एयरोस्पेस ईकोसिस्टम मजबूत होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी भविष्य के सैन्य समझौतों के लिए एक ‘टेस्ट केस’ साबित हो सकती है। क्या बोले रूसी अधिकारी? खुद रूसी एरोस्पेस कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी ने यह दावा किया कि भारत और रूस पांचवीं पीढ़ी के सुखोई एसयू-57ई लड़ाकू विमान के भारत में संयुक्त उत्पादन की संभावना तलाशने के लिए तकनीकी पहलुओं पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, भारत की ओर से अधिकारी के दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। रूस के यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (यूएसी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) वादिम बदेखा ने हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर विंग्स इंडिया एयर शो से इतर रूसी संवाददाताओं से कहा- हम इस कॉन्ट्रैक्ट पर तकनीकी बातचीत के उन्नत चरण में हैं। हमारे अनुभव को देखते हुए, ऐसे कॉन्ट्रैक्ट होने वाले हैं जो कई दशकों तक हमारे सहयोग की दिशा तय करेंगे हैं।’ रूस ने इस प्रदर्शनी के दौरान अपने नवीनतम क्षेत्रीय परिवहन विमान – इल्यूशिन आईएल-114-300 और सुखोई एसजे-100 – को प्रदर्शित किया था। बदेखा ने दावा किया कि दोनों पक्ष वर्तमान में भारत में एसयू-30 विमानों के उत्पादन के लिए उपयोग की जाने वाली सुविधाओं में एसयू-57 लड़ाकू विमानों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन और इसके लिए भारतीय उद्योग और भारतीय प्रणालियों के अधिकतम उपयोग पर भी चर्चा कर रहे हैं। Su-57 ‘Felon’: रूस का सबसे घातक योद्धा Su-57 रूस का पहला 5वीं पीढ़ी का सटील्थ लड़ाकू विमान है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं इसे खास बनाती हैं। जैसे- स्टेल्थ तकनीक: यह रडार की नजरों से बचने में सक्षम है। सुपरक्रूज: बिना आफ्टरबर्नर के ध्वनि की गति से तेज उड़ने की क्षमता। हथियार: इसके इंटरनल वेपन बे में आधुनिक मिसाइलें छिपी होती हैं, जो इसके स्टेल्थ को बरकरार रखती हैं। भारत और Su-57 का इतिहास (FGFA प्रोग्राम) आपको याद होगा कि भारत पहले रूस के साथ FGFA (Fifth Generation Fighter Aircraft) प्रोग्राम का हिस्सा था, जो Su-57 पर ही आधारित था। लेकिन 2018 में भारत इस प्रोजेक्ट से पीछे हट गया था। इसके मुख्य कारण थे:     इंजन की तकनीक में कमी।     स्टेल्थ फीचर्स पर असंतोष।     लागत और तकनीक हस्तांतरण (ToT) के मुद्दे। क्या अब पासा पलट रहा है? SJ-100 समझौते के बाद Su-57 की चर्चा फिर से शुरू होने के तीन मुख्य कारण हैं-     नया इंजन (AL-51F1)- रूस ने अब Su-57 के लिए नया ‘स्टेज 2’ इंजन विकसित कर लिया है, जो भारत की पुरानी शिकायतों को दूर कर सकता है।     युद्ध का अनुभव- यूक्रेन युद्ध में रूस ने Su-57 का सीमित उपयोग किया है, जिससे इसकी परिचालन क्षमता के वास्तविक आंकड़े सामने आए हैं।     चीन की चुनौती- चीन के पास J-20 जैसे 5वीं पीढ़ी के विमानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए भारतीय वायुसेना को जल्द ही एक सटील्थ फाइटर की जरूरत है। चुनौतियां और ‘आत्मनिर्भर भारत’ भले ही रूस भारत को Su-57 ऑफर कर रहा हो, लेकिन भारत के सामने कुछ कठिन विकल्प हैं। दरअसल भारत अपना स्वदेशी 5वीं पीढ़ी का विमान AMCA विकसित कर रहा है। Su-57 खरीदने से इस स्वदेशी प्रोजेक्ट के बजट और प्राथमिकता पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, रूस से बड़े रक्षा सौदे करने पर अमेरिका के CAATSA प्रतिबंधों का खतरा हमेशा बना रहता है। भारत अब केवल ‘खरीदने’ में नहीं, बल्कि ‘भारत में बनाने’ और ‘पूर्ण तकनीक’ प्राप्त करने में रुचि रखता है। रूस की सरकारी समाचार एजेंसी आरआईए नोवोस्ती के मुताबिक इससे पहले, सरकारी हथियार निर्यातक कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के सीईओ अलेक्जेंडर मिखीव ने घोषणा की थी कि कंपनी नई दिल्ली को नवीनतम पांचवीं पीढ़ी के एसयू-57ई लड़ाकू विमानों की आपूर्ति के साथ-साथ भारत में उनके उत्पादन और स्वदेशी एएमसीए स्टील्थ लड़ाकू विमान के विकास में सहायता की पेशकश कर रही है। कुल मिलाकर SJ-100 समझौता यह दर्शाता है कि भारत और रूस के बीच औद्योगिक संबंध अभी भी गहरे हैं। यदि रूस Su-57 के लिए पूर्ण तकनीक हस्तांतरण (ToT) और स्वदेशी AMCA में सहयोग का प्रस्ताव देता है, तो ‘Felon’ भारत के आकाश की सुरक्षा करते हुए दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, अभी वायु सेना का मुख्य ध्यान राफेल के अगले बैच और स्वदेशी विमानों पर है।

नेतन्याहू भारत आ रहे, दिल्ली में अरब देशों के साथ बैठक तय; जयशंकर का मिडिल ईस्ट गेम चर्चा में

नई दिल्ली इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अगले हफ्ते भारत दौरे पर आ रहे हैं. इससे पहले भारत के EAM एस जयशंकर ने मिडिल ईस्ट को टारगेट करते हुए डबल मास्टरस्ट्रोक चला है. उन्होंने नेतन्याहू के दौरे से पहले अरब देशों को पहले ही दिल्ली बुलाकर एक बड़ा मैसेज दिया है. जयशंकर की गजब की कूटनीति का नतीजा है कि अरब देशों ने भारत को फिलिस्तीन का ‘मसीहा’ मानना शुरू कर दिया है. आगे जानें जयशंकर के बेहतरीन बैलेंसिंग एक्ट की वजह से जियो पॉलिटिक्स में भारत का कद किस तरह बढ़ रहा है? भारत ने आज यानी 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में ‘दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्री बैठक’ (IAFMM) की मेजबानी की है. यह बैठक पूरे 10 साल के लंबे इंतजार के बाद हुई है. इसमें अरब लीग के सभी 22 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. दिलचस्प बात यह है कि यह बैठक जयशंकर की दिसंबर 2025 की इजरायल यात्रा और प्रधानमंत्री नेतन्याहू की प्रस्तावित भारत यात्रा के ठीक बीच में हो रही है. इस बैठक के दौरान भारतीय EAM का एक ऐसा बेहतरीन बैलेंसिंग एक्ट देखने को मिला, जिसकी वजह से जियो पॉलिटिक्स में भारत का कद और भी बढ़ गया है. फिलिस्तीन का ‘मसीहा’ भारत दिल्ली पहुंची फिलिस्तीनी विदेश मंत्री वारसेन अगाबेकियन शाहीन ने सीधा और भावनात्मक कार्ड खेला है. उन्होंने जयशंकर से मुलाकात के बाद सार्वजनिक तौर पर अपील करते हुए कहा है कि ‘भारत ही वह महान देश है जो इजरायल-फिलिस्तीन जंग को रुकवा सकता है. पीएम मोदी की इजरायल से दोस्ती और अरब देशों से रिश्ते उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा ‘मध्यस्थ’ बनाते हैं’. फिलिस्तीन ने भारत से गाजा के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने की मांग की है. इजरायल का जिगरी दोस्त दिसंबर 2025 में जब जयशंकर इजरायल में थे, तो वहां सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के एक हमले में यहूदियों की मौत पर उन्होंने गहरी संवेदना जताई थी. भारत और इजरायल ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को फिर से दोहराया है. भारत और इजरायल के बीच ड्रोन तकनीक और मिसाइल डिफेंस को लेकर एक गुप्त समझौता भी परवान चढ़ रहा है. जयशंकर का बैलेंसिंग एक्ट एक तरफ भारत इजरायल के साथ अत्याधुनिक हथियारों का सौदा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 22 अरब देशों को एक साथ मेज पर बिठाकर अपनी ऊर्जा जरूरतों (Energy Security) को सुरक्षित कर रहा है. जयशंकर ने साबित कर दिया है कि भारत अब दुनिया के उन चंद देशों में से है, जो युद्ध के दो धुर विरोधियों से एक साथ हाथ मिला सकते हैं. ‘मिडिल ईस्ट’ का नया पावर सेंटर: भारत     अरब देशों के साथ बैठक की सह-अध्यक्षता UAE कर रहा है. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत जियो पॉलिटिक्स का एक बड़ा और अहम प्लेयर है.     भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है. जयशंकर इसे ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बना रहे हैं, जहाँ अरब देशों का समर्थन भारत के लिए बहुत जरूरी है.     सिल्क रूट को टक्कर: ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) को फिर से जिंदा करने के लिए अरब देशों का साथ लेना इस बैठक का गुप्त एजेंडा है.  

गोल्ड रेट अपडेट: बजट 2026 के बाद सोना हो सकता है सस्ता, एक्सपर्ट्स ने दिए संकेत

नई दिल्ली 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में यूनियन बजट पेश करेंगी. इस दिन पर सोने की कीमतों पर सबसे ज्यादा नजर रहने वाली है, क्योंकि लोग उम्मीद कर रहे हैं कि बजट में सोने से जुड़ी कोई बड़ी घोषणा हो सकती है. अभी सोने की कीमत एमसीएक्स पर 10 ग्राम 24 कैरेट के लिए करीब 1.49 लाख रुपये के आसपास है. चांदी 2.91 लाख रुपये प्रति किलो है. पिछले बजट से सोना 100 फीसदी और चांदी 250 फीसदी तक महंगा हो चुका है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बजट में सोने पर कस्टम ड्यूटी या इंपोर्ट ड्यूटी में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने की उम्मीद है. पिछले साल बजट में सोने पर कुल कस्टम ड्यूटी 15 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी कर दी गई थी. अब एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सरकार इसे और कम नहीं करेगी क्योंकि आयात बहुत ज्यादा हो रहा है. सोना और चांदी के आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. अगर ड्यूटी बढ़ाई गई तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं लेकिन ऐसा होने की कम संभावना है. बजट में क्या गोल्ड पर आ सकता है बड़ा फैसला? एक्सपर्ट्स की राय है कि इनकम टैक्स रिटर्न में सोने के गहनों या ज्वेलरी की ज्यादा जानकारी देने के नए नियम आ सकते हैं. शेड्यूल एएल में ज्यादा डिटेल मांगी जा सकती है. सेल्फ रिपोर्टिंग का तरीका शुरू हो सकता है, ताकि सोने की होल्डिंग ट्रैक की जा सके. सोने की बिक्री पर टैक्स नियमों में कुछ राहत मिल सकती है. जीएसटी में भी छोटे बदलाव जैसे मेकिंग चार्जेस पर 5 फीसदी जीएसटी या 3 फीसदी जीएसटी में एडजस्टमेंट की बात हो सकती है. लेकिन घर में रखे सोने पर कोई हार्ड लिमिट नहीं लगेगी. पुराना गोल्ड कंट्रोल एक्ट 1990 में खत्म हो चुका है और अब वैध सोर्स से सोना रखने पर कोई सीमा नहीं है. शादीशुदा महिलाओं के लिए 500 ग्राम, अविवाहित के लिए 250 ग्राम और पुरुषों के लिए 100 ग्राम तक डिस्क्रेशनरी तरीके से कोई जब्ती नहीं होती. एक्सपर्ट्स जैसे दीपाश्री शेट्टी और सोनम चंदवानी कहते हैं कि रिपोर्टिंग और डिस्क्लोजर पर फोकस रहेगा न कि घरेलू होल्डिंग पर सख्त नियम. अगर हार्ड लिमिट लगाई गई तो लोगों में डर फैलेगा और ब्लैक मार्केट बढ़ सकता है. इसलिए सरकार सावधानी बरतेगी. क्या बजट पर गिरेगा सोने का भाव? बजट 2026 के दिन पर सोने की कीमत क्या होगी, इसकी भविष्यवाणी मुश्किल है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बजट में अगर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो कीमतें स्थिर रह सकती हैं या छोटी गिरावट आ सकती है. लेकिन अगर ड्यूटी में कटौती की उम्मीद से लोग खरीदारी बढ़ा दें तो रिबाउंड हो सकता है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अगर ड्यूटी 3-5 फीसदी कम हुई तो 10 ग्राम पर 2000 से 4000 रुपये तक गिरावट आ सकती है. लेकिन ऐसा होने की कम संभावना है. बाजार में पहले से ही कीमतें हाई हैं और बजट के बाद सोमवार को ट्रेडिंग में तेज मूवमेंट देखने को मिल सकता है. बजट सोने के लिए ज्यादा बड़ा सरप्राइज नहीं देगा. फोकस रिपोर्टिंग और टैक्स राहत पर रहेगा. सोने की कीमतें ग्लोबल फैक्टर्स जैसे इन्फ्लेशन, जियोपॉलिटिकल टेंशन और सेंट्रल बैंक की खरीदारी से ज्यादा प्रभावित होंगी. भारतीय परिवारों के लिए सोना संपत्ति बनाने का जरिया है इसलिए सरकार बैलेंस बनाए रखेगी. बजट के बाद सोने में इंटरमिटेंट करेक्शन के बाद रिकवरी हो सकती है.

महंगाई का नया वार: 1 फरवरी से पान-मसाला और सिगरेट हुए महंगे, नियम बदले

नई दिल्ली जनवरी का महीना खत्म होने वाला है और कल से नए फरवरी महीने की शुरुआत हो जाएगा. हर महीने की तरह ये महीना भी कई बड़े बदलावों (Rule Change From 1st February) के साथ शुरू होने जा रहा है. इनमें एलपीजी सिलेंडर की कीमतों (LPG Cylinder Price) से लेकर टोल टैक्स पर फास्टैग से जुड़े नियम (FASTag Rule Change) तक शामिल हैं. वहीं सबसे बड़ा शॉक पान-मसाला और सिगरेट के शौकीनों को लगने वाला है. जी हां, 1 फरवरी 2026 से इन तंबाकू प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ (Pan-Masala Cigarette Price Hike) सकती हैं, क्योंकि सरकार इन पर लागू टैक्स में इजाफा करने वाली है.  साल की शुरुआत में की थी तैयारी इस साल की शुरुआत में ही सरकार की ओर से GST क्षतिपूर्ति उपकर के स्थान पर एक नया उत्पाद शुल्क और उपकर अधिसूचित किया गया था. पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके तहत देश में 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों और पान मसाला पर अधिक टैक्स का प्रावधान किया गया है. अधिसूचना को देखें, तो तंबाकू और पान मसाला पर नए शुल्क लागू जीएसटी दरों के अतिरिक्त लगाए जाएंगे. जनवरी की शुरुआत में वित्त मंत्रालय ने चबाने वाले तंबाकू, जर्दा और गुटखा पैकिंग मशीन (क्षमता निर्धारण और शुल्क संग्रह) नियम, 2026 को भी अधिसूचित किया. ये नियम चबाने वाले तंबाकू प्रोडक्ट्स के निर्माताओं से उत्पादन क्षमता का आकलन करने और शुल्क वसूलने की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं. रिपोर्ट की मानें, तो केंद्र सरकार का यह कदम दिसंबर 2025 में संसद द्वारा दो विधेयकों को मंजूरी दिए जाने के बाद आया, जो पान मसाला निर्माण पर नए स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर और तंबाकू उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने की अनुमति देते हैं.   कीमतों पर दिखेगा टैक्स इफेक्ट  सरकार द्वारा संशोधित टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 1 फरवरी से सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने से लंबी, प्रीमियम सिगरेट पर सबसे अधिक वृद्धि देखने को मिलेगी. बदलाव के तहत सिगरेट की लंबाई के आधार पर प्रति 1,000 स्टिक पर 2,050 रुपये से लेकर 8,500 रुपये तक का उत्पाद शुल्क लगाया जाएगा, जो फरवरी  पहली तारीख से प्रभावी होगा. ध्यान रहे कि यह शुल्क 40% जीएसटी से अलग होगा.  टैक्स की मार के चलते इन तंबाकू प्रोडक्ट्स को बनाने वाली कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन प्रभावित होगा और ऐसे में कंपनियां इसकी भरपाई के लिए ग्राहकों पर बोझ बढ़ा सकती हैं. सीधे शब्दों में कहें तो सिगरेट, पान-मसाला, गुटखा महंगे हो जाएंगे और इनके शौकीनों को अब ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ेगी.  Crisil ने इसे लेकर क्या कहा?  क्रिसिल की एक रिपोर्ट को देखें, तो सिगरेट उद्योग को शुल्क में बढ़ोतरी से बिक्री में गिरावट का सामना भी करना पड़ सकता है. वर्तमान में, सिगरेट पर 28 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के क्षतिपूर्ति उपकर भी लगते हैं, लेकिन 1 फरवरी से ये क्षतिपूर्ति उपकर हटा दिया जाएगा और सिगरेट की लंबाई के आधार पर एक अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लागू होगा. क्रिसिल ने Tax Hike से घरेलू सिगरेट उद्योग में अगले वित्तीय वर्ष में 6-8 फीसदी की गिरावट का अनुमान जताया है. 

हाईकोर्ट में जजों की भारी कमी, पेंडिंग मामलों की संख्या 4,80,592; समाधान में 40 साल लग सकते हैं

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है। एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति और उनके समाधान पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का यह दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन यदि न्याय मिलने में दशकों का समय लगे, तो यह संवैधानिक प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। वर्तमान स्थिति इसी ओर संकेत करती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 11 जजों की कमी, बढ़ते मामलों से बढ़ेगी मुश्किल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की बात करें तो यहां 53 स्वीकृत पदों के मुकाबले फिलहाल केवल 42 न्यायाधीश कार्यरत हैं। यानी 11 पद रिक्त, जो कुल स्वीकृत संख्या का करीब 20.75 प्रतिशत है। यह आंकड़ा इसलिए और चिंताजनक हो जाता है, क्योंकि मध्य प्रदेश पहले से ही लंबित मामलों के मामले में देश के बड़े राज्यों में शामिल है। हाईकोर्ट में जजों की यह कमी न केवल मामलों की सुनवाई को धीमा करती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में आम लोगों के भरोसे को भी कमजोर करती है। वकीलों और सामाजिक संगठनों का लंबे समय से कहना रहा है कि जजों की कमी के कारण नियमित सुनवाई संभव नहीं हो पाती और तारीख पर तारीख न्याय व्यवस्था की पहचान बनती जा रही है। केंद्र सरकार ने संसद को यह भी बताया कि जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्ति और पदों का निर्धारण संबंधित राज्य सरकार और हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 1639 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। इनमें से 803 जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं, जो कुल कार्यरत संख्या का 48.99 प्रतिशत है। वहीं, करीब 51 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी अन्य वर्गों से हैं। हालांकि, सरकार ने संसद में जिला-वार रिक्त पदों का कोई अलग-अलग ब्योरा पेश नहीं किया। इससे यह साफ हो जाता है कि मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में निचली अदालतों पर बढ़ते बोझ के बावजूद, जजों की वास्तविक कमी का जिला स्तर पर कोई सार्वजनिक और पारदर्शी आकलन सामने नहीं आया है। जानकारों का मानना है कि अगर जिला-वार आंकड़े सामने आएं, तो स्थिति और भी गंभीर नजर आ सकती है। देशभर की स्थिति: कई हाईकोर्ट में हालात बेहद गंभीर अगर देशभर की तस्वीर पर नजर डालें, तो हालात केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में 94 स्वीकृत पदों में से 14 पद खाली हैं, यानी करीब 14.9 प्रतिशत। दिल्ली हाईकोर्ट में 60 में से 16 पद (26.6 प्रतिशत) और मद्रास हाईकोर्ट में 75 में से 22 पद (29.3 प्रतिशत) रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी 34 स्वीकृत पदों में से एक पद खाली है, जो भले ही प्रतिशत में कम लगे, लेकिन शीर्ष अदालत में हर एक जज की भूमिका बेहद अहम होती है। इलाहाबाद, कलकत्ता और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में सबसे ज्यादा संकट आंकड़ों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की कमी सबसे ज्यादा है। यहां 160 स्वीकृत पदों के मुकाबले 50 पद खाली हैं, यानी 31.25 प्रतिशत। कलकत्ता हाईकोर्ट की स्थिति और भी गंभीर है, जहां 72 में से 29 पद रिक्त हैं, जो 40.3 प्रतिशत बैठता है। वहीं जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख और झारखंड हाईकोर्ट में हालात बेहद चिंताजनक बताए गए हैं, जहां 44 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में न्यायपालिका संसाधनों की भारी कमी से जूझ रही है। मध्य प्रदेश की निचली अदालतों में वर्गवार प्रतिनिधित्व मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों का वर्गवार विवरण भी संसद में पेश किया गया। इसके अनुसार:     अनुसूचित जाति (SC): 263 जज – लगभग 16.05%     अनुसूचित जनजाति (ST): 232 जज – लगभग 14.15%     अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 308 जज – लगभग 18.79%     अन्य वर्ग: 836 जज – लगभग 51.01% कुल मिलाकर 1639 कार्यरत न्यायिक अधिकारियों में से लगभग आधे SC, ST और OBC वर्ग से हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पद ही पर्याप्त नहीं हैं, तो प्रतिनिधित्व के ये आंकड़े न्यायिक बोझ को कितना कम कर पा रहे हैं। भोपाल के एडवोकेट सुनील आदिवासी ने द मूकनायक से बातचीत में न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अदालतों में जजों की कमी तो पहले से ही एक बड़ी समस्या है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दलित और आदिवासी वर्ग से आने वाले जज केवल नाम मात्र के बराबर रह गए हैं। उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की जिस अवधारणा की बात संविधान करता है, वह तब तक अधूरी रहेगी, जब तक न्याय देने वाली व्यवस्था में ही वंचित तबकों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाती। एडवोकेट सुनील आदिवासी ने आगे कहा कि जब न्यायपालिका में दलित-आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित होता है, तो इसका असर फैसलों की संवेदनशीलता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व पर ध्यान नहीं दिया गया, तो न्यायपालिका से आम जनता का भरोसा कमजोर होना तय है। न्याय में देरी और न्याय से वंचित? विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की कमी सीधे-सीधे न्याय में देरी से जुड़ी हुई है। जब एक-एक जज पर हजारों मामलों का बोझ हो, तो त्वरित और प्रभावी न्याय की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक रिक्त पदों को भरने में हो रही देरी पर … Read more

मेडिकल ब्रेकथ्रू: AIIMS दिल्ली ने स्ट्रोक इलाज को बनाया आसान और सस्ता

नई दिल्ली भारत में आज स्ट्रोक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता स्ट्रेस, गलत खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण स्ट्रोक के मामले हर साल लगातार बढ़ रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों भारतीय स्ट्रोक का शिकार होते हैं, जिनमें से कई लोगों की जान चली जाती है. जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ और एक्टर मिथुन चक्रवर्ती, हाल के कुछ सालों में कई जानी-मानी हस्तियां स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी का सामना कर चुकी हैं. इससे साफ है कि यह बीमारी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, बोलने-समझने में परेशानी, चलने-फिरने में दिक्कत और रोजमर्रा के कामों में दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.  AIIMS की नई स्टडी से नई उम्मीद ऐसे में AIIMS दिल्ली की एक नई स्टडी स्ट्रोक के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस स्टडी के अनुसार, रोजाना सिर्फ 30 मिनट धूप में समय बिताना स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों की रिकवरी, नींद और मूड में सुधार कर सकता है. वो भी बिना किसी अधिक खर्च के… एम्स की यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच की गई और इसे संस्थान के पांचवें रिसर्च डे पर पेश किया गया. इसमें पाया गया कि जिन स्ट्रोक मरीजों को नियमित इलाज और फिजियोथेरेपी के साथ सनलाइट थेरेपी दी गई, उनकी जिंदगी की गुणवत्ता उन मरीजों की तुलना में काफी बेहतर रही जिन्हें केवल सामान्य इलाज दिया गया.  कैसे की गई स्टडी? इस स्टडी में 18 से 80 वर्ष के उन मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें पिछले एक महीने के अंदर मिडियम लेवल का स्ट्रोक हुआ था.     200 से ज्यादा मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद 40 मरीजों को चुना गया और फिर उन्हें दो ग्रुप में बांटा गया.      पहला ग्रुप सिर्फ स्टैंडर्ड मेडिकल ट्रीटमेंट और रिहैबिलिटेशन और दूसरा ग्रुप स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट और करीब दो हफ्तों तक हर दूसरे दिन 30 मिनट धूप में बैठना.      धूप की तीव्रता 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखी गई, जो हल्की आउटडोर डे-लाइट के बराबर होती है. सुरक्षा के लिए लक्स मीटर से लगातार निगरानी की गई.     तीन महीने तक मरीजों की शारीरिक क्षमता, मूड, नींद, रोजाना के काम करने की शक्ति और ओवरऑल वेल-बीइंग को देखा गया. स्टडी का नतीजा क्या हुआ? डॉक्टरों के मुताबिक, सनलाइट थेरेपी लेने वाले मरीजों में नींद की क्वालिटी  बेहतर हुई. नींद के साथ मूड और मानसिक स्थिति में सुधार देखा गया और खुद रोजाना के काम में आत्मनिर्भरता बढ़ी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि धूप शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को ठीक करती है, विटामिन D बढ़ाने में मदद करती है और सूजन को कम कर सकती है, जो स्ट्रोक रिकवरी में अहम रोल निभाते हैं.  भारतीयों के लिए क्यों है खास? भारत में स्ट्रोक रिकवरी एक लंबा और महंगा प्रोसेस माना जाता है, जिसकी वजह से कई बार लोग इसको अफोर्ड नहीं कर पाते हैं. कई मरीजों को लंबे समय तक फिजियोथेरेपी और देखभाल की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए पॉसिबल नहीं. ऐसे में 30 मिनट की धूप जैसी फ्री, सुरक्षित और आसानी से मौजूद थेरेपी खासतौर पर गांव के इलाकों और घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों के लिए बेहद  उपयोगी हो सकती है. हालांकि स्टडी का सैंपल साइज छोटा था और यह एक ही सेंटर पर की गई, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर आगे बड़े लेवल पर इस पर रिसर्च होती है, तो सनलाइट थेरेपी पोस्ट-स्ट्रोक केयर का अहम हिस्सा बन सकती है. स्ट्रोक पर क्या कहते हैं ICMR के आंकड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में भारत में करीब 12 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए. इतना ही नहीं, लगभग 94 लाख लोग ऐसे थे जो स्ट्रोक के बाद इसके लंबे समय तक रहने वाले असर जैसे कमजोरी, बोलने में दिक्कत या याददाश्त की समस्या से जूझ रहे थे. ICMR के 2021 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक आज मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह डिसेबिलिटी की छठी सबसे बड़ी वजह भी है, यानी बड़ी संख्या में लोग स्ट्रोक के बाद नॉर्मल जिंदगी नहीं जी पाते हैं. 2023 में लैंसेट जर्नल में पब्लिश एक स्टडी, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ की गई थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक कम और मिडियम इनकम वाले देशों में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत स्ट्रोक की वजह से हो सकती है, और इस खतरे से भारत भी बाहर नहीं है.

दुश्मन के लिए खौफनाक हथियार: राफेल से बड़ी डील, ब्रह्मास्त्र जो पानी में आग लगा सकता है

नई दिल्ली भारत और जर्मनी के बीच करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 70,000 से 72,000 करोड़ रुपये) के प्रोजेक्ट-75(I) पनडुब्बी निर्माण समझौते पर मार्च के अंत तक हस्ताक्षर होने की संभावना है. यह सबमरीन डील अब तक का भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा बन सकता है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा. बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और सूत्रों के मुताबिक इसे हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की जनवरी में भारत यात्रा के दौरान निर्णायक गति मिली. प्रोजेक्ट-75 इंडिया (P-75I) का उद्देश्य इंडियन नेवी के पुराने हो चुके पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को आधुनिक बनाना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा एवं डेटरेंस कैपेबिलिटी (प्रतिरोध की क्षमता) को मजबूत करना है. ऐसे समय में जब चीन और पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, भारत के लिए अल्‍ट्रा मॉडर्न सबमरीन की तैनाती रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है. P-75I प्रोजेक्‍ट के तहत छह उन्नत पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन का निर्माण किया जाएगा. शॉर्टलिस्‍ट किए गए टाइप-214 नेक्स्ट जेनरेशन सबमरीन फ्यूल सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस होंगी, जिससे वे कई हफ्तों तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर रह सकती हैं. इससे उनकी पहचान और ट्रैकिंग का जोखिम काफी कम हो जाता है और नौसेना की सीक्रेट ऑपरेशन क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है. चीन और पाकिस्‍तान ने खासतौर पर अरब सागर के साथ ही हिन्‍द महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को काफी बढ़ावा दिया है. इससे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पेश होने लगी हैं. यही वजह है कि भारत सबमरीन फ्लीट को अपग्रेड करने के साथ ही उसे बढ़ा भी रहा है. क्‍या है सबमरीन डील? oइस परियोजना में जर्मनी की थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ साझेदारी में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) देश में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण करेगी. ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक साझेदारी मॉडल के तहत 45 से 60 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूती मिलेगी. प्रस्तावित समझौते में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी अहम टेक्‍नोलॉजिकल ट्रांसफर का भी प्रावधान होने की संभावना है, जो भारत की लॉन्‍ग टर्म रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए अहम माना जा रहा है. भारतीय नौसेना के पास फिलहाल करीब एक दर्जन रूसी मूल की पनडुब्बियां और छह फ्रांसीसी निर्मित स्कॉर्पीन श्रेणी की आधुनिक पनडुब्बियां हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते सामरिक हालात और क्षेत्रीय चुनौतियों के मद्देनजर भारत को अपनी पनडुब्बी क्षमता में और विस्तार की जरूरत है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर 2014 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने प्रोजेक्ट-75(I) के तहत 6 नई पनडुब्बियों की खरीद को मंजूरी दी थी, जबकि जुलाई 2021 में औपचारिक अनुरोध प्रस्ताव (RFP) जारी किया गया. राफेल फाइटर जेट से भी बड़ी डील यह प्रोजेक्‍ट केवल नेवी की युद्ध क्षमता को ही नहीं बढ़ाएगी, बल्कि देश के जहाज निर्माण और रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी बड़ा प्रोत्साहन देगी. इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए नए अवसर पैदा होंगे और पनडुब्बी प्रणालियों, स्पेयर पार्ट्स तथा उपकरणों के निर्माण से जुड़ा एक व्यापक औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित होगा. जर्मनी के साथ सबमरीन करार भारत के लिए अभी तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील साबित होगी. यह साल 2016 में की गई राफेल फाइटर जेट खरीद समझौते से भी बड़ा है. भारत ने फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट ₹58000 में खरीदा था, जबकि जर्मनी के साथ सबमरीन डील ₹72000 करोड़ की है. नेवी के लिए 51 वॉरशिप सरकार हाल के वर्षों में भारतीय नौसेना के स्वदेशीकरण रोडमैप 2015–2030 को तेजी से लागू कर रही है. इसके तहत देश में 51 बड़े युद्धपोतों का निर्माण जारी है, जिनकी कुल लागत करीब 90,000 करोड़ रुपये है. वर्ष 2014 से अब तक भारतीय शिपयार्ड्स नौसेना को 40 से अधिक स्वदेशी युद्धपोत और पनडुब्बियां सौंप चुके हैं, और बीते एक वर्ष में औसतन हर 40 दिन में एक नया पोत नौसेना में शामिल हुआ है. विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-जर्मनी के बीच होने वाला यह पनडुब्बी सौदा न केवल रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देगा, बल्कि भारत को क्षेत्रीय समुद्री शक्ति संतुलन में और अधिक सशक्त भूमिका निभाने में मदद करेगा.

10 राज्य जो सबसे ज्यादा कर्ज़ में डूबे हैं, पंजाब से पश्चिम बंगाल तक की पूरी लिस्ट

नई दिल्ली भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) की रफ्तार तेज है और ये दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ती हुई इकोनॉमी में बना हुआ है. वर्ल्ड बैंक से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तक ने इसका लोहा माना है. लेकिन तेजी से बढ़ते देश में, क्या आप जानते हैं कि कौन से राज्य सबसे ज्यादा कर्ज में डूबे हुए हैं? तो भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर नजर डाल लें, जिनसे पता चलता है कि कई बड़े राज्यों को कर्ज के बोझ तले दबकर अपने रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा इनके ब्याज के भुगतान में खर्च करना पड़ता है.  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के FY2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि कई बड़े राज्यों में कर्ज के ब्याज का भुगतान उसके अपने टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू का 42% तक हिस्सा ले लेता है. इस तगड़े ब्याज भुगतान की वजह से इन राज्यों के पास सड़क, स्कूल, हेल्थ सर्विसेज और नए प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने के लिए पैसों की कमी हो जाती है. कर्ज की मार झेल रहे भारत के 10 टॉप राज्यों के बारे में बात करें, तो… पश्चिम बंगाल वित्त वर्ष 2025 में पश्चिम बंगाल पर ब्याज भुगतान का बोझ अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा था. राज्य को टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू से 1.09 लाख करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन सिर्फ ब्याज भुगतान पर 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए. इसका मतलब हुआ कि उसके राजस्व का 42% हिस्सा तो ब्याज चुकाने में ही चला गया.  पंजाब-बिहार दूसरे पायदान पर पंजाब रहा, जिसने अर्जित रेवेन्यू का 34% हिस्सा ब्याज भुगतान करने में खर्च कर दिया. Punjab का राजस्व कलेक्शन 70,000 करोड़ रुपये था और इसने कर्ज के ब्याज भुगतान पर करीब 24,000 करोड़ रुपये खर्च किए. इसके बाद तीसरे नंबर पर Bihar का नाम आता है, जिसने 62,000 करोड़ रुपये के रेवेन्यू में से लगभग 21 हजार करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान किया और ये इसका 33% रहा.  केरल-तमिलनाडु केरल द्वारा FY2025 में 1.03 लाख करोड़ रुपये का रेवेन्यू कलेक्शन किया गया था और इसका 28% या करीब 29,000 करोड़ रुपये तो ब्याज के पेमेंट में ही चला गया. पांचवे नंबर पर तमिलनाडु रहा, जिसने अपने कलेक्शन में से 62,000 करोड़ रुपये या 28% का ब्याज पेमेंट किया था. इसके टैक्स रेवेन्यू सबसे अधिक रहा, लेकिन कर्ज की मार से ये राज्य भी बेहाल रहा.  हरियाण-राजस्थान और आंध्र प्रदेश Top-10 कर्ज के तले दबे राज्यों में अगला नंबर हरियाणा का है और इसने 94,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने के बाद इसमें से 27% या करीब 25,000 करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान किया. सातवें पायदान पर राजस्थान था और राज्य ने 1.48 लाख करोड़ रुपये के राजस्व में से 38,000 करोड़ रुपये का ब्याज चुकाया. इसके अलावा आंध्र प्रदेश ने 1.2 लाख करोड़ रुपये के राजस्व पर 29 हजार करोड़ रुपये ब्याज भरा था.  MP-कर्नाटक लिस्ट में नौवें स्थान पर मध्य प्रदेश शामिल हैं और इसका वित्त वर्ष 2025 में टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू 1.23 लाख करोड़ रुपये रहा था, जिसमें से ब्याज के भुगतान पर 27,000 करोड़ रुपये या कुल कलेक्शन का करीब 22% खर्च हुआ. बात दसवें पायदान की करें, तो यहां पर कर्नाटक है, जिसका कलेक्शन 2.03 लाख करोड़ रुपये का था और ब्याज भुगतान 19% यानी 39,000 करोड़ रुपये रहा. 

एमपी के 5 जिलों में हैवी रेन का अलर्ट, 7 डिग्री गिरा पारा, धान की फसल को मिली राहत

भोपाल मध्यप्रदेश में पिछले 24 घंटे के दौरान 27 से ज्यादा जिलों में आंधी-बारिश का दौर जारी रहा। सबसे ज्यादा नर्मदापुरम और मंडला में 2 इंच से ज्यादा पानी गिर गया। अगले कुछ घंटों में गुना, शिवपुरी, श्योपुर, रायसेन, विदिशा और नरसिंहपुर में भारी बारिश होने की संभावना है। अशोकनगर, ग्वालियर, मुरैना, दतिया, सागर, भोपाल, नीमच, मंदसौर, राजगढ़, आगर-मालवा, नर्मदापुरम, छिंदवाड़ा, टीकमगढ़, निवाड़ी, सिवनी, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी, अनूपपुर, शहडोल, कटनी, सतना, मैहर, रीवा, पन्ना, सीधी, उमरिया, सिंगरौली, जबलपुर, दमोह और सीहोर में भी बारिश और आंधी का अलर्ट है। 50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी हवाएं गुरुवार को दिनभर आसमान में बादल छाए रहे और बीच-बीच में हल्की फुहार भी पड़ी। मौसम विभाग ने शुक्रवार और शनिवार को 40 से 50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने की संभावना जताई है। साथ ही जिले में कहीं-कहीं बारिश का पूर्वानुमान भी है। धान की फसल को राहत बारिश से धान की खेती करने वाले किसानों को राहत मिली है। किसानों ने पहले ही धान के गढ़े बना लिए थे और पौध भी तैयार कर ली थी। अब तेज बारिश के साथ धान की रोपाई शुरू हो सकेगी। धान की फसल के लिए आवश्यक पानी की पूर्ति मानसून की बारिश से होगी।     छिंदवाड़ा में 4 घंटे से पानी गिरना जारी है। इससे ठंडक बढ़ गई है।     ग्वालियर में हजीरा इलाके में बारिश के कारण तलघर ढह गया।     सीहोर, नरसिंहपुर और निवाड़ी में सुबह से पानी गिर रहा है।     भोपाल में सुबह 5 बजे से रिमझिम हो रही है, ये 9 बजे के बाद भी जारी है।     मंडला में रातभर में दो इंच बारिश दर्ज की गई है।     ग्वालियर में पूरी रात रिमझिम होती रही। सुबह तक 31.3 मिमी पानी गिर चुका है।     रायसेन में रातभर बारिश जारी रही। जिले में गुरुवार रात 8 बजे मानसूनी बारिश शुरू हुई थी।     नर्मदापुरम में गुरुवार रात 12 बजे से शुरू हुई बारिश सुबह 6 बजे तक चली। करीब 6 घंटे लगातार पानी गिरा। ट्रफ, साइक्लोनिक सकुर्लेशन-लो प्रेशर एरिया एक्टिव सीनियर मौसम वैज्ञानिक डॉ. दिव्या ई. सुरेंद्रन ने बताया कि वर्तमान में लो प्रेशर एरिया, तीन साइक्लोनिक सर्कुलेशन और दो ट्रफ की एक्टिविटी है। एक ट्रफ प्रदेश के पास से गुजर रही है। इन वजहों से प्रदेश में तेज बारिश का दौर जारी है। भोपाल, इंदौर समेत कई जिलों में बारिश, महू में झरना बहा इससे पहले गुरुवार को भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, रतलाम, मंदसौर, नीमच, राजगढ़, अशोकनगर और हरदा समेत कई जिलों में बारिश का दौर जारी रहा। मालवा क्षेत्र में भारी बारिश के चलते नदी नाले उफान पर आ गए। नीमच में उफनती पुलिया पार करने के दौरान दो बाइक सवार बह गए। लोगों ने उन्हें बचा लिया। नीमच में रूपा नदी के किनारे बसे गांव कंजार्डा में सड़क पर पानी भर गया। मंदसौर में सड़कों पर डेढ़ फीट तक पानी भर गया। इंदौर के महू में सूखे पड़े झरनों में पानी आ गया है। गुरुवार को पातालपानी के झरने में पानी बहने लगा। ग्वालियर में चलती कार पर पेड़ गिर गया। इस दौरान बारिश भी हो रही थी। बैंक मैनेजर को राहगीरों ने पेड़ काटकर बाहर निकाला। राजगढ़ जिले के ब्यावरा में लगातार तेज बारिश हुई। जिले के सुठालिया, मलावर, करनवास सहित आसपास के गांवों में भी पानी गिरा। नर्मदापुरम, डिंडौरी में भी बारिश दर्ज की गई। 16 जिलों में बारिश, रतलाम में सवा इंच पानी गिरा प्रदेश के 16 जिलों में गुरुवार को बारिश का दौर रहा। रतलाम में सबसे ज्यादा सवा इंच पानी गिर गया। इंदौर में आधा इंच बारिश हुई। बारिश की वजह से कई शहरों में पारा काफी लुढ़क गया। इंदौर में दिन-रात का तापमान बराबर हो गया है। बुधवार-गुरुवार की रात में तापमान 24.3 डिग्री था, जबकि गुरुवार को यह 25.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह गुरुवार को प्रदेश में सबसे कम तापमान रहा। रतलाम और उज्जैन में दिन-रात के तापमान में सिर्फ 2 डिग्री का अंतर रहा। रतलाम में बुधवार-गुरुवार की रात में पारा 24.2 डिग्री रहा था, जबकि गुरुवार को दिन में तापमान 26.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वहीं, उज्जैन में रात में 25.5 डिग्री और दिन में 27.5 डिग्री दर्ज किया गया। बालाघाट के मलाजखंड, गुना, रायसेन, पचमढ़ी और धार में भी पारा 30 डिग्री से कम रहा। बड़े शहरों में भोपाल में 30 डिग्री, इंदौर में 31.4 डिग्री, ग्वालियर में 33.5 डिग्री और जबलपुर में 32.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। टीकमगढ़ में सबसे ज्यादा 40.5 डिग्री रहा। भिंड जिले में नहीं पहुंचा मानसून इस बार देश में मानसून 8 दिन पहले ही आ गया था। वहीं, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में यह तय समय से पहले पहुंच गया। ऐसे में अनुमान था कि मध्यप्रदेश में यह जून के पहले सप्ताह में ही आ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले 15 दिन से मानसून महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ में एक ही जगह पर ठहरा रहा। इस वजह से एमपी में इसकी एंट्री नहीं हो पाई। 13-14 जून को मानसून आगे बढ़ा। बावजूद यह प्रदेश में 1 दिन लेट हो गया। हालांकि, 3 दिन में ही मानसून ने प्रदेश के 54 जिलों को कवर कर लिया। बाकी बचे एक जिले भिंड में मानसून के गुरुवार को पहुंचने की संभावना थी, लेकिन यह नहीं पहुंचा। मौसम विभाग के अनुसार, शुक्रवार को भिंड को भी मानसून कवर कर लेगा। बता दें कि एमपी में मानसून के प्रवेश की सामान्य तारीख 15 जून ही है। पिछले साल यह 21 जून को एंटर हुआ था।

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