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सागौन तस्करों पर शिकंजा, वन विभाग ने दो ठिकानों से 5 लाख से अधिक की लकड़ी की जब्ती

 कांकेर  उत्तर बस्तर कांकेर जिले के कापसी वनपरिक्षेत्र में वन विभाग ने अवैध लकड़ी तस्करी के खिलाफ अब तक की बड़ी कार्रवाई की है. विभाग की टीम ने ग्राम पिपली में छापेमारी कर भारी मात्रा में अवैध सागौन की लकड़ी बरामद की है. इस कार्रवाई से इलाके के लकड़ी माफियाओं में हड़कंप मच गया है. वन विभाग को सूचना मिली थी कि ग्राम पिपली में सागौन की लकड़ी का अवैध भंडारण किया गया है. सूचना के आधार पर कापसी वनपरिक्षेत्र की टीम ने दो संदिग्ध आरोपियों के ठिकानों पर दबिश दी. तलाशी के दौरान भारी मात्रा में सागौन चिरान और सागौन लट्ठा बरामद किया गया. वन विभाग ने कुल 254 नग सागौन जब्त किया है, जिसका कुल आयतन 7.549 घन मीटर आंका गया है. बाजार में 5 लाख से ज्यादा है कीमत अधिकारियों के मुताबिक, जब्त की गई इस सागौन लकड़ी का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग 5 लाख 13 हजार रुपये है. मौके पर लकड़ी परिवहन में उपयोग किए जाने वाले साधनों की भी बारीकी से जांच की गई. इस मामले में वन विभाग ने दोनों आरोपियों के खिलाफ वन अपराध प्रकरण दर्ज कर लिया है. कड़ी कानूनी कार्रवाई और चेतावनी वन विभाग ने बताया कि आरोपियों के विरुद्ध वन अधिनियम 1927 और छत्तीसगढ़ वन उपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969 के तहत सख्त कार्रवाई की जा रही है. विभाग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जंगलों की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा. प्रशासन ने आगे भी इसी तरह की छापेमारी और निगरानी जारी रखने की बात कही है.

सीसीएफ पी.एन. मिश्रा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल — अवैध लकड़ी परिवहन से उत्खनन तक फाइलों में दबी कार्रवाई

Serious questions arise about the working style of CCF P.N. Mishra – actions ranging from illegal timber transportation to excavation remain buried in files. इंदौर। इंदौर वृत का वन विभाग इन दिनों सवालों के कटघरे में है। मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) पी.एन. मिश्रा के कार्यभार संभालने के बाद क्षेत्र में अवैध लकड़ी परिवहन,फर्जी टीपी,उत्खनन और अन्य वन अपराधों पर ठोस कार्रवाई न होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह गहराया है। आरोप है कि पिछले कई महीनों में न तो बड़ी कार्रवाई हुई और न ही आरोपियों पर वह सख्ती दिखाई दी,जो लगातार बढ़ते वन अपराधों को रोक सके। फर्जी टीपी,पकड़ी गई गाड़ियां और गायब कार्रवाई! एक शिकायतकर्ता के अनुसार,इंदौर स्थित संदीप इंटरप्राइजेस के परिसर में फर्जी ट्रांजिट पास के जरिए दो वाहन अवैध लकड़ी खाली करते पकड़े गए,लेकिन आज तक विभाग यह तय नहीं कर पाया कि आरोपी कौन थे। गाड़ियां कैसे छोड़ दी गईं और आरा मशीन क्यों नहीं सील की गई— इन सवालों पर विभाग मौन है। मामला दबाने की कोशिश होने का आरोप भी सामने आया है। धार से आलीराजपुर तक नेटवर्क सक्रिय — फिर भी हल्की कार्रवाई! धार,पीथमपुर,सागौर कुटी,बदनावर,झाबुआ, आलीराजपुर, धामनोद, पेटलावद,मानपुर, मनावर और कुक्षी सहित इंदौर वृत क्षेत्रों में अवैध लकड़ी परिवहन और उत्खनन में शामिल वाहनों को पकड़ा गया, जिन्हें नियमों के अनुसार राजसात किया जाना चाहिए था। पर आरोप है कि सीसीएफ मिश्रा ने अपने अधिकार क्षेत्र में सुमोटो कार्रवाई करते हुए गाड़ियों को मामूली दंड लगाकर छोड़ दिया, जिससे वन माफियाओं के हौसले और बुलंद हुए। ‘नेता के पट्ठे’ के दबाव में काम करने के आरोप विशेष सूत्रों का दावा है कि सीसीएफ मिश्रा एक प्रभावशाली नेता के इशारे पर फैसले ले रहे हैं,जो लगातार सरकार की आलोचना करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। आरोप यह भी कि भोपाल के कुछ शीर्ष अधिकारी भी इसी प्रभाव में विभागीय तबादलों और निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। सत्ता पक्ष में बढ़ती नाराज़गी — “अधिकारियों ने काम रोका तो चुनाव में पड़ेगी मार” सत्ता पक्ष के कई नेता विभाग की इस कार्यवाहीहीनता से बेहद नाराज़ हैं। उनका कहना है कि“सरकार हमारी है लेकिन अधिकारी उन्हीं लोगों के इशारे पर काम कर रहे हैं जो सरकार पर सवाल उठाते हैं।” कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि“अगर जनता के काम नहीं होंगे तो वोट मांगने जाएंगे कैसे? इस ढीले रवैये का असर आगामी चुनाव तक पड़ेगा।” इंदौर वृत में लगातार बढ़ते वन अपराधों और विभाग की कमजोर कार्रवाई को लेकर अब माहौल तेज होता दिख रहा है। मामला जल्द ही बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले सकता है।

नलखेड़ा के जंगलों में वन विभाग की लापरवाही: रात में हो रही अवैध पेड़ कटाई और लकड़ी तस्करी बेखौफ जारी

Forest department negligence in Nalkheda forests: Illegal tree felling and timber smuggling continue unabated at night चंदा कुशवाह  नलखेड़ा । क्षेत्र के जंगलों में इन दिनों अवैध पेड़ कटाई और लकड़ी तस्करी के मामले गंभीर रूप ले चुके हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, वन विभाग के नाक के नीचे लगातार पेड़ों पर कुल्हाड़ी चल रही है, लेकिन विभाग की ओर से न तो किसी तरह की निगरानी बढ़ाई गई है और न ही कोई ठोस कार्रवाई की गई है। ग्रामीण बताते हैं कि रात के समय जंगलों में ट्रैक्टर, पिकअप और ट्रॉलियां घूमती दिखाई देती हैं, जिनमें सागौन, बबूल और अन्य मूल्यवान लकड़ी को भरकर बाहर ले जाया जाता है। कई लोगों ने रात में चेनसॉ से पेड़ काटने की आवाजें भी सुनी हैं, जिससे साफ होता है कि यह पूरा काम संगठित तरीके से चल रहा है। एक समय घने पेड़ों से आच्छादित यह क्षेत्र अब धीरे-धीरे उजाड़ होता जा रहा है। कई जगहों पर कटे हुए ठूंठ साफ दिखाई देते हैं, जिससे पता चलता है कि यहां बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सब बिना किसी आंतरिक सहयोग के संभव नहीं है। उनका आरोप है कि कुछ वनकर्मी तस्करों से मिलकर काम कर रहे हैं, जिसकी वजह से तस्करी रात में बेरोक-टोक जारी रहती है और दिन में इस पूरे मुद्दे पर सन्नाटा पसरा रहता है। लोगों में यह भी चर्चा है कि केवल लकड़ी ही नहीं, बल्कि अन्य जंगली उत्पादों और संसाधनों की भी तस्करी की आशंका है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है। ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने कई बार विभाग और प्रशासन को इस बारे में सूचित किया, परंतु अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर यह पूरा अवैध नेटवर्क किसकी शह पर चल रहा है। क्या वन विभाग को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं है या यह जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है। यदि नहीं, तो इतने समय से हो रही पेड़ कटाई और तस्करी पर कार्रवाई अभी तक क्यों नहीं हुई। ग्रामीणों ने मांग की है कि जंगलों में रात के गश्त को बढ़ाया जाए, संदिग्ध वाहनों की जांच की जाए, वन विभाग के कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्यवाही की जाए और जंगलों में सुरक्षा के उपायों को मजबूत किया जाए। उनका कहना है कि यदि इस अवैध कटाई पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले वर्षों में नलखेड़ा का पर्यावरण गंभीर संकट का सामना करेगा और क्षेत्र की हरियाली हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।

लालबर्रा में बाघिन की संदिग्ध मौत: एसडीओ होंगे निलंबित- डीएफओ हटेंगे

Suspicious death of tigress in Lalbarra: SDO will be suspended – DFO will be removed भोपाल। बालाघाट के लालबर्रा रेंज में बाघिन की मौत का रहस्य बरकरार है। स्टेट टाइगर फोर्स बाघिन की मौत पर जांच कर रहीं है पर अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी। मंत्रालय सूत्रों के अनुसार जहां एसडीओ बी सिरसम को निलंबित किया जा रहा है वहीं डीएफओ अधर गुप्ता को दक्षिण बालाघाट सामान्य वन मंडल से हटाए जाने का प्रस्ताव विचाराधीन है। स्पीच सोमवार को कांग्रेस विधायक अनुभा मुंजारे अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल से मुलाकात कर डीएफओ के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की पुनः मांग की है। स्टेट टाइगर फोर्स द्वारा की जा रही जांच का सप्ताह भर बीत गया पर बाघिन की मौत की गुत्थी नहीं सुलझी। यह जरूर है कि वन विभाग का पूरा अमला बंदर की तरह उछल कूद कर रहा है। एक माह का समय बीत गया पर अभी तक न शिकारी पकड़ में आए और न ही दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। हां, वन्य प्राणी शाखा द्वारा भेजा गया एसडीओ बीआर सिरसाम के निलंबन का प्रस्ताव मंत्रालय के गलियारों में मूव कर रहा है। सूत्रों ने बताया कि एसडीओ के साथ-साथ डीएफओ अधर गुप्ता पर भी कड़ी कार्रवाई के संकेत मिले हैं। बालाघाट की सक्रिय महिला विधायक अनुभा मुंजारे ने बाघिन की संदिग्ध मौत और उसकी जलाने की प्रक्रिया को लेकर विधानसभा से लेकर मंत्रालय के गलियारों तक न केवल सवाल उठाए बल्कि डीएफओ के खिलाफ कार्रवाई करवाने के लिए अब तक सक्रिय हैं। कांग्रेस विधायकों की एक ही मांग है कि डीएफओ गुप्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाए। जंगल महकमे मे यह चर्चा है कि बांधवगढ़ में हाथियों की मौत पर तुरंत एक्शन लेने वाले एसीएस अशोक वर्णवाल दक्षिण बालाघाट डीएफओ अधर गुप्ता पर मेहरबान क्यों है ?विधायकों की मांग अधर गुप्ता हटाएमंगलवार को महिला विधायक अनुभा मुंजारे नेतृत्व में विधायक संजय उइके, विक्की पटेल और मधु भगत के अलावा शत्रुघ्न असाटी ने अधर गुप्ता को दक्षिण वन मंडल से तत्काल हटाने की मांग की है। बातचीत के दौरान महिला विधायक अनुभा मुंजारे ने उन्हें अधर गुप्ता की शहडोल में हुई पोस्टिंग के दौरान तत्कालीन संभाग आयुक्त राजीव शर्मा की उस रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें उन्हें मद्यपान का आदि होने के साथ-साथ फील्ड में मदद न करने का उल्लेख किया था।

बालाघाट बाघिन मौत : जांच कर रहे एसडीओ पर गिरी गाज, डीएफओ को बचाने की कोशिश

Balaghat tigress death: SDO investigating the case was punished, attempt was made to save DFO भोपाल। दक्षिण बालाघाट वन मंडल के लालबर्रा परिक्षेत्र में एक टाइगर की संदिग्ध मौत के मामले में जांच कर रहे एसडीओ बीआर सिरसाम को निलंबित किया जा रहा है। निलंबन का प्रस्ताव गुरुवार तक जारी हो जाएंगे। इस पूरे मामले सबसे बड़े कसूरवार डीएफओ अधर गुप्ता को बचाया जा रहा है। हालांकि एपीसीसीएफ वन्य प्राणी एल कृष्णमूर्ति बताते हैं कि जांच अब स्टेट टाइगर टास्क फोर्स (एसटीएफ) करेगी। एसटीएफ की रिपोर्ट आने के बाद यदि डीएफओ कसूरवार पाया जाता है तो उसके खिलाफ की कार्रवाई की जाएगी। जबकि बालाघाट के चारों विधायकों दक्षिण बालाघाट के लिए अधर गुप्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की है। बालाघाट से भोपाल आ रही सूचना के अनुसार बाघिन की संदिग्ध मौत के मामले में सीएफ कार्यालय की उड़न दस्ता टीम ने कथित शिकारी को पकड़कर जांच कर रहे एसडीओ बीआर सिरसाम टीम को सौंप दिया था। लेकिन पूछताछ के दौरान ही एसडीओ बीआर सिरसाम टीम के चंगुल से शिकारी फरार हो गया। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सीएफ बालाघाट गौरव चौधरी ने एसडीओ बीआर सिरसाम के निलंबन का प्रस्ताव मुख्यालय को भेजा है। सीएफ के प्रस्ताव पर मुख्यालय ने एसडीओ को निलंबित करने का प्रस्ताव शासन को भेज दिया है। गुरुवार शाम तक निलंबन आदेश जारी होने की संभावना है। बालाघाट के फील्ड स्टाफ से मिली जानकारी के अनुसार दक्षिण बालाघाट डीएफओ गुप्ता ना तो ऑफिस में नजर आ रहे हैं और ना ही जांच में कोई सहयोग कर रहे हैं। क्यों होनी चाहिए डीएफओ पर कार्यवाही..?बाघ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 अंतर्गत शेड्यूल -1 वन्य प्राणी है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर अनुसार शेड्यूल 1 के वन्य प्राणियों का दाह संस्कार वन्य प्राणी विशेषज्ञों और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के सदस्य, टाइगर फाउंडेशन सोसाइटी के सदस्य एवं संबंधित मुख्य वन संरक्षक की उपस्थिति में पोस्टमार्टम उपरांत समस्त स्पेसिमेन कलेक्शन के बाद दाह संस्कार के निर्देश दिए गए हैं। डीएफओ अधर गुप्ता और उनकी टीम ने इसका पालन नहीं किया। यहां तक कि सीएफ से भी घटना की जानकारी छुपाई। इसे वन बल प्रमुख वीएन अंबाड़े और पीसीसीएफ वन्य प्राणी भी मानते है कि गंभीर लापरवाही प्रत्येक स्तर पर बरती गई है। प्रकरण में लापरवाही का सीधा संबंध वनमंडल अधिकारी एवं वन संरक्षक से है। डीएफओ गुप्ता न ऑफिस में रहते हैं न फील्ड परवन्यजीव प्रेमी अजय दुबे ने वन बल प्रमुख वीएन अंबाड़े और एनटीसीए के सदस्य को पत्र लिखकर कहा है कि संवेदनशील कान्हा – पेंच कॉरिडोर में स्थित बालाघाट साउथ के सोनवानी वन क्षेत्र के कंपार्टमेंट 443 में बाघ के क्रूर शिकार के लिए अज्ञात दोषियों के साथ मृत बाघ के शरीर को नष्ट करने में वन कर्मियों का शामिल होना दुर्भाग्यपूर्ण है। पत्र में उल्लेख किया कि प्रस्तावित सोनेवानी कंजर्वेशन रिजर्व में 60 से अधिक बाघों की उपस्थिति है। लेकिन बालाघाट साउथ डिवीजन के डीएफओ अधर गुप्ता न ऑफिस में उपस्थित रहते हैं न फील्ड पर भ्रमण करते हैं। बाघ के शिकार की सूचना स्थानीय लोगों में दिनांक 27 july 2025 से फैल गई थी लेकिन CCF से वन रक्षक तक के वन अफसर /कर्मचारी निष्क्रिय रहे। इसका प्रमाण है कि वर्तमान में डीएफओ की ऑफिस में उपस्थिति न होने से ऑनलाइन TP बड़ी संख्या में लंबित है और बांस परिवहन करने वाले ढेरों वाहन बालाघाट में खड़े हैं।

वन विभाग में खरीदनी थी फोर व्हील ड्राइव खरीद ली टू व्हील ड्राइव….!

I had to buy a four wheel drive from the forest department but bought a two wheel drive…! भोपाल। जंगल महकमे में 26 करोड़ के 214 वाहनों की खरीदी को लेकर उठे सवाल थम ही नहीं रहे हैं। अब इसकी अनुगूंज विधानसभा के मानसून सत्र में सुनाई देगी। कांग्रेस विधायक ध्यानाकर्षण के जरिए यह मुद्दा उठाने जा रहे हैं। सूचना अधिकार के तहत मिले दस्तावेज के अनुसार डॉ दिलीप कुमार की अध्यक्षता वाली क्रय समिति ने फोर व्हील ड्राइव वाहन खरीदने की अनुशंसा की थी किंतु कतिपय शीर्ष अधिकारियों के निजी हितार्थ के चलते टू व्हील ड्राइव वाहनों की खरीदी की गई। चिंता जनक पहलू यह है कि टू व्हील ड्राइव वाली वाहन महंगी कीमत पर खरीदे गए।सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेज वाहन क्रय करने के लिए तीन कमेटियां इसलिए बनाई गई, ताकि वाहन खरीदी में गड़बड़ करने की मंशा से अधिकारी अपनी मनमर्जी कर सके। यही वजह रही की तीन बार क्रय समिति का गठन करना पड़ा। जबकि पहले क्रय समिति के अध्यक्ष रहे डॉ दिलीप कुमार कमेटी ने फोर व्हील (4wD) वाहन खरीदने की अनुशंसा की थी। इस सवाल का जवाब वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों के पास नहीं है कि जब फोर व्हील ड्राइव स्कार्पियो-एन 15.84 लाख कीमत पर मिल रही थी तो फिर टू व्हील ड्राइव स्कार्पियो 18.24 कुल लागत में क्यों खरीदी ? वन विभाग के लिए 4wD वाहन की रिक्वारमेंट थी, क्योंकि जब शहर और गांवों की रोड समाप्त होते है तब वन विभाग की सीमा आरंभ होती है। कच्चे, रेतीले, गिट्टो, और पहाड़ों पर वन विभाग का वाहन चलता है। ऐसी जगह पर 4wD वाहन की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार वाहन खरीदते समय अधिक ग्राउंड क्लीयरेंस का ध्यान भी नहीं रखा गया। डॉ दिलीप कुमार के रिटायर्ड होने के बाद यूके सुबुद्धि और उसके बाद सुदीप सिंह अध्यक्षता वाली कमेटियां बनाई गई। समिति में विशेषज्ञ को जगह नहीं दी गई थी। इन कमेटियों को भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन कर वाहन स्पेसिफिकेशन और दरों का तुलनात्मक पत्रक नहीं बनाया। यानि कम से कम दो अलग-अलग कंपनियों के वाहन मॉडल तय करना था पर एक ही कंपनी को परचेज ऑर्डर जारी कर दिए गए। यानी पूर्व से ही या तय कर लिया गया था कि महिंद्रा एन्ड महिंद्रा कंपनी के विशेष वाहन खरीदने हैं।वित्त विभाग के परिपत्र की अनदेखीवाहन क्रय समिति वित्त विभाग के सर्कुलर की अनदेखी की। यानि एसीएस और वन बल प्रमुख को भी गुमराह किया। वित्त विभाग के परिपत्र के अनुसार अफसर के लिए वाहन पे-स्केल के आधार पर खरीदने का प्रावधान है। यदि पात्रता से अधिक कीमत ( स्कॉर्पियो और इनोवा जैसी अधिक कीमत वाली वाहन) की वाहन खरीदना था तब संबंधित प्रस्ताव पर कैबिनेट के मंजूरी लेना चाहिए थी।राइट ऑफ वाहन की सूची में गड़बड़ी15 वर्ष पुराने वाहनों को राइट ऑफ किए जाने के एवज में नए वाहन खरीदने की बात कही जा रही है। राइट ऑफ वाहनों की सूची में भी गड़बड़ी प्रकाश में आई है। दस्तावेज के आधार पर आरटीआई एक्टिविस्ट पुनीत टंडन ने दावा किया है कि सूची में दिए गए वाहनों के नंबरों का मिलन परिवहन विभाग की बेवसाइट पर मिलान किया तब 5 वाहन के नंबर एम्बुलेंस के बताए जा रहें हैं। एक वाहन का नंबर तो इंदौर आरटीओ का है जो फाइनेंस पर ली गई है।

एमपी में फॉरेस्ट टीम पर जानलेवा हमला, लाठी-डंडों से जमकर पीटा, 2 डिप्टी रेंजर समेत 5 घायल

Deadly attack on forest team in MP, beaten with sticks, 5 injured including 2 deputy rangers Attack On Forest Team :मध्य प्रदेश के कटनी जिले में वनकर्मियों पर जानलेवा हमला करने का हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि, विभाग की टीम पर ग्रामीणों ने लाठी-डंडों से हमला कर बेरहमी से मारपीट की गई है। हमले में 2 डिप्टी रेंजरों के साथ 3 वन रक्षक घायल हुए हैं। मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग की टीम गांव में अतिक्रमण हटाने पहुंची थी, जिससे खफा होकर ग्रामीणों ने उनपर हमला कर दिया। जैसे-तैसे वो ग्रामीणों से जान बचाकर गांव से बचकर निकले हैं। फिलहाल, टीम की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर धरपकड़ शुरु कर दी है। बता दें कि, जिले की ढीमरखेड़ा इलाके के अंतर्गत आने वाले ग्राम बिहरिया से सटी वनभूमि पर अतिक्रमण कर हल बैल से जुताई कर खेती की तैयारी कर ली गई थी। वन भूमि पर कब्जे की शिकायत पर वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। इस दौरान अतिक्रमणकारियों ने पहले तो विरोध करते हुए वन्य टीम से जमकर गाली-गलौज की। इसपर भी उन्होंने बस नहीं किया और टीम पर लाठी-डंडों से जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में दो डिप्टी रेंजरों और तीन वनरक्षक घायल हो गए। टीम से मारपीट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल होने लगा है।

धार वन मंडल में टेंडर प्रक्रिया को लेकर हुई गड़बड़झाला

There was a mess in the tender process in Dhar forest division भोपाल। इंदौर सर्किल के अंतर्गत वन विभाग एक बार फिर विवादों के घेरे में है। धार वन मंडल में टेंडर प्रक्रिया को लेकर हुई गड़बड़ियों की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल और वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव सहित वरिष्ठ अधिकारियों को की गई है। आरोप है कि अफसरों और सप्लायर्स के गठजोड़ (नेक्सस) के चलते निविदाएं नियमों को ताक पर रखकर जारी की गईं, जिससे खास सप्लायर्स को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके।धार वन मंडल की संदिग्ध निविदाएंशिकायतकर्ता हितेंद्र भावसार ने बताया कि धार वन मंडल अधिकारी द्वारा 3 जुलाई को पांच निविदाएं जेम पोर्टल पर प्रकाशित की गईं। इनके क्रमांक इस प्रकार हैं —GEM/2025/B/6413130GEM/2025/B/6411838GEM/2025/B/6412580GEM/2025/B/6412737GEM/2025/B/6413223ये निविदाएं महज एक दिन के भीतर यानी 4 और 5 जुलाई को पूर्ण भी कर दी गईं। आरोप है कि इस प्रक्रिया में क्रय भंडार नियमों और वन बल प्रमुख द्वारा निर्धारित मानकों की खुलेआम अनदेखी की गई है। यह भी कहा गया है कि जिन वस्तुओं के लिए निविदाएं निकाली गईं, उन्हें पहले भी तीन बार प्रकाशित किया गया था, लेकिन हर बार उन्हें बिना कारण बताए निरस्त कर दिया गया। वन मुख्यालय से नहीं ली गई अनुमतिमध्यप्रदेश के वन नियमों के अनुसार, किसी भी निविदा को निर्धारित समय से पूर्व निरस्त करने के लिए वन मुख्यालय से पूर्वानुमति लेना आवश्यक होता है। मगर धार वन मंडल अधिकारी ने यह जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई। इस मामले में संदेह जताया जा रहा है कि इंदौर सर्किल के प्रभावशाली अधिकारियों और एक खास सप्लायर के बीच सांठगांठ है और उसी को लाभ पहुंचाने के लिए पूरी निविदा प्रक्रिया को मनमर्जी से चलाया गया। हॉफ के दिशा-निर्देशों की अवहेलनायह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब यह देखा जाए कि वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव ने सप्लायर्स और अधिकारियों के इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए ‘उत्तम शर्मा कमेटी’ बनाई थी। इस कमेटी ने प्रदेश के लिए統一ित (एकजाई) निविदा नियम तय किए थे। इसके तहत निर्देश दिए गए थे कि सभी निविदाएं केवल जेम पोर्टल पर ही नहीं बल्कि विभाग की वेबसाइट पर भी अपलोड की जाएं ताकि प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।हालांकि धार वन मंडल में न तो विभागीय पोर्टल पर जानकारी दी गई और न ही पारदर्शिता के नियमों का पालन किया गया। यह सीधे तौर पर विभागीय दिशा-निर्देशों की अवहेलना है। आईटी शाखा की रिपोर्ट भी हुई नजरअंदाजपूर्व में वन विभाग की आईटी शाखा द्वारा विभाग के हॉफ (हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स) को एक रिपोर्ट भेजी गई थी, जिसमें ऐसे मामलों में लगातार नियमों की अनदेखी और नेक्सस की गतिविधियों को उजागर किया गया था। लेकिन उस रिपोर्ट पर भी किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभागीय प्रमुख स्तर पर भी ऐसी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायतअब जबकि यह शिकायत सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंच चुकी है, विभागीय हलकों में हलचल बढ़ गई है। हितेंद्र भावसार ने अपने पत्र में मांग की है कि धार वन मंडल में हुई निविदा प्रक्रिया की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए। पृष्ठभूमि: क्यों जरूरी है पारदर्शितामध्यप्रदेश वन विभाग में बीते कुछ वर्षों में कई टेंडर प्रक्रियाओं पर सवाल उठे हैं। सप्लायर्स और अधिकारियों के बीच बने अपारदर्शी गठजोड़ के कारण विभाग की छवि लगातार धूमिल हो रही है। यह मामला इस बात की एक और बानगी है कि कैसे विभागीय आदेशों को दरकिनार कर कुछ चहेते सप्लायर्स को फायदा पहुंचाया जा रहा है।

29 करोड़ के वाहन खरीदी में गड़बड़झाला होने की चर्चा, बिना वाहन प्राप्त किए ही कर दिया पूरा भुगतान

There is talk of irregularities in the purchase of vehicles worth Rs 29 crores, full payment was made without receiving the vehicles भोपाल । 29 करोड़ के वाहनों की खरीदी में नियम-प्रक्रिया और पारदर्शिता का पालन नहीं होने पर गड़बड़झाला की आशंका को बल मिल रहा है। वह भी तब जब वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव गिनती बिरादरी में ईमानदार अफसर की है। अब वाहनों की खरीदी पर शिकवे-शिकायतों का दौर शुरू हो गया है और मांग की जा रही है कि एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित कर जांच कराई जाए। भंडार क्रय नियम की अनदेखी कर वाहन प्राप्त किए बिना ही पूरा भुगतान कर दिया।वन विभाग ने 29 करोड़ में गाडियों की खरीदी की गई। जिसमें लगभग 108 बुलोरों नियों, 27 बुलेरों, 65 स्कार्पियों, 4 सियाज, 10 ट्रक की खरीदी की गई। खरीदी की नियत पर शंका इसलिए पैदा हो रही है, क्योंकि खरीदी Gem से हुई है, परन्तु बिना निविदा बुलाए। यदि नियत ठीक थी तो निविदा क्यों नहीं आमंत्रित किया गया। बिना संचालक के आए बैठक संपन्न कर ली गई। इसके पहले लघु वनोपज संघ में एमडी रहे सेवानिवृत वन बल प्रमुख जव्वाद हसन और पुष्कर सिंह के कार्यकाल में क्रमशः 145 करोड़ और 200 करोड़ की कीमत के जूते-चप्पल, छाते और पानी बोतल की खरीदी हुई पर भंडार क्रय नियमों और गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा गया। यही वजह रही कि खरीदी पर कभी सवाल नहीं उठे। जबकि पूर्व विभाग प्रमुख स्वर्गीय आरडी शर्मा के कार्यकाल में वायरलेस की खरीदी हुई जिस पर खूब बवाल मचा। विधानसभा में प्रश्नों की झड़ी लग गई। वैसे तो स्वर्गीय शर्मा की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा रहा था किंतु उनके स्टेनों की कलाकारी से विवाद शुरू हुआ। यहां भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। न तो एक्सपर्ट कमेटी की राय ली गई और न ही शाखा प्रमुखों से उनकी रिटायरमेंट पूछी गई। शाखा प्रमुखों के लिए खरीदी गए वहां में जो एसेसरी चाहिए थी वह भी नहीं उपलब्ध कराए गए। मोटर साइकिल, कार जिप्सी के बदले में luxury वाहन खरीदेवन विभाग के विजिलेंस शाखा में आईटीआई कार्यकर्ता पुनीत टंडन ने शिकायत दर्ज कराई है कि वाहनों की खरीदी में गड़बड़ी की गई है। अपनी शिकायत में ठंडन ने कहा है कि अपलिखित वाहनों के बदले क्रय की स्वीकृति मिली हैं। इसमें 50 वाहनों 15 वर्ष पुराने हैं तथा 60 अपलिखित होकर नीलाम हुऐ हैं, तो स्वीकृति 110 वाहन की मिलनी थी। यह भी ज्ञात हुआ है कि चालू गाडियों को नीलाम बताकर अधिक गाडियों की खरीदी की है। शिकायत के प्रमुख बिन्दू

अनिल शुक्ला होंगे ग्वालियर सर्किल के सीएफ

Anil Shukla will be CF of Gwalior Circle भोपाल। वन विभाग ने सर्किल में रिक्त पद के नई पदस्थापना करने के प्रस्ताव मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिए हैं। सूत्रों ने बताया कि रंग पंचमी के बाद पदस्थापना के आदेश जारी हो जाएंगे। सूत्रों का कहना है कि अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ग्वालियर सागर और सिवनी सर्किल में अपने पसंदीदा अफसरों को पदस्थ कराना चाह रहें हैं। बताया जाता है कि होशंगाबाद सर्किल से 6 महीने पहले हटाए गए एसीएस वन वर्णवाल ने अनिल शुक्ला को पहले वन विकास निगम में पदस्थ किया अब उन्हें ग्वालियर सर्किल में पदस्थ करने का प्रस्ताव भेजा है। इसी प्रकार क्षेत्रीय महाप्रबंधक जबलपुर पदस्थ बृजेंद्र झा को सिवनी और मुख्यालय में पदस्थ रिपुदमन सिंह को सागर सर्किल में वन संरक्षक के पद पर पदस्थ करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री सचिवालय में अनुमोदन के लिए लंबित है। सवाल यह उठता है कि 6 महीने पहले जिन अधिकारियों को फील्ड से हटाकर मुख्यालय अटैच किया गया उन्हें एसीएस पुनः फील्ड में पोस्टिंग करने जा रहे हैं।

वन विहार के वाइल्ड कैफ़े के विवादित टेंडर पर डायरेक्टर अवधेश मीना पर गाज गिरने की संभावना

Director Awadhesh Meena is likely to face action over the controversial tender of Wild Cafe of Van Vihar भोपाल। वन विहार राष्ट्रीय उद्यान के डायरेक्टर अवधेश मीना अपनी पहली ही पोस्टिंग में विवादों से घिर गए हैं। यही नहीं, अब उन पर कार्यवाही की गाज भी गिरने की संभावना है। पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ शुभरंजन सेन ने वन विहार राष्ट्रीय उद्यान डायरेक्टर के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा करते हुए फाइल पीसीसीएफ प्रशासन-एक के विवेक जैन को भेज दी है। जैन के यहां फाइल लंबित है। वैसे वाइल्डलाइफ कैफे के संचालन से संबंधित विवाद हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। हाई कोर्ट ने पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ कार्यालय से 7 दिनों के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए है।  वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में वाइल्ड कैफे चलाने के लिए निविदाएं आमंत्रित करने के लिए एक विज्ञापन जारी किया गया था। शीर्ष अधिकारियों के दबाव में वन विहार डायरेक्टर मीना ने  विज्ञापन में एक शर्त ऐसी जोड़ी थी कि जिसमें उल्लेख था कि मौजूदा वाइल्ड कैफे संचालक यदि एल-1 फर्म के बराबर बोली की रकम अदा करता है, तो उसे पुनः संचालन का अधिकार दिया जा सकता है। कैफे के लिए जारी विज्ञापन में वर्तमान वाइल्ड कैफे के संचालक अश्वनी कुमार रिछारिया  समेत चार फर्म मैसर्स प्रज्ञा एसोसिएट्स छतरपुर, दौलत राम इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ओबेदुल्लागंज और श्रुति जैन शिव शक्ति दाल मिल कृषि उपज मंडी भोपाल ने हिस्सा लिया। निविदा समिति ने दो फर्म मैसर्स प्रज्ञा एसोसिएट्स छतरपुर और दौलत राम इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ओबेदुल्लागंज को दस्तावेज में कमी बताते हुए दौड़ से बाहर कर दिया। श्रुति जैन शिव शक्ति दाल मिल कृषि उपज मंडी भोपाल ने वाइल्ड कैफे के संचालन के लिए सबसे अधिक बोली 21 लाख एक रूपये की लगाई। यानि एल-1 श्रुति जैन शिव शक्ति दाल मिल कृषि उपज मंडी भोपाल को कैफे के संचालन के वर्क ऑर्डर भी वन विहार डायरेक्टर अवधेश मीना ने जारी कर दिए। श्रुति जैन शिव शक्ति दाल मिल कृषि उपज मंडी भोपाल को कैफे के संचालन कि सच के अनुसार 21 लाख ₹1 का बैंक ड्राफ्ट भी जमा कर दिया। इस दौरान शीर्ष अधिकारियों के दबाव में डायरेक्टर मीना ने एल -1 का टेंडर निरस्त करते हुए वर्तमान में संचालित कर रहे फर्म को ही कैफे संचालक के आदेश जारी कर दिए। बस यहीं से विवाद शुरू हो गया।  दोनों ही पार्टी पहुंची हाई कोर्ट  संचालन को लेकर दो पार्टियों में जंग शुरू हो गई। पहले एल-1 फर्म शक्ति दाल मिल हाई कोर्ट में वन विहार डायरेक्टर पर अनुबंध तोड़ने का आरोप लगाते हुए याचिका दाखिल की। याचिकाकर्ता श्रुति जैन की ओर से अधिवक्ता ने तर्क रखा कि भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में वाइल्ड कैफे चलाने के लिए निविदाएं आमंत्रित करने के लिए एक विज्ञापन जारी किया गया था। याचिकाकर्ता ने भाग लिया और सफल घोषित किया गया। सभी अधिकार और अधिकार वन विहार राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक में निहित हैं, लेकिन मनमाने ढंग से प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) के कार्यालय ने मनमाने ढंग से और अवैध तरीके से निविदा को रद्द दिया। याचिका की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ कार्यालय 7 दिनों के भीतर जवाब दाखिल कर सकता है। शीर्ष अफसर कर रहें है प्रताड़ित  श्रुति जैन, शिव शक्ति दाल मिल ने मुख्य सचिव अनुराग जैन को पत्र लिखकर वन विभाग के एसीएस अशोक वर्णवाल और कुछ सरकारी अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न और अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है। मुख्य सचिव को लिखिए पत्र में उल्लेख है कि 28 जनवरी 25 को हमने वन विहार के साथ पांच वर्षों के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए और उस पर वन विहार के निदेशक द्वारा मुहर और हस्ताक्षर किए गए। 31 जनवरी को हमें पता चला कि वन विहार के निदेशक पर इस टेंडर को रद्द करने का दबाव डाला है। इस मामले में एसीएस वर्णवाल सहित फारेस्ट के शीर्ष अधिकारी शामिल हैं, जो इस टेंडर को रद्द करने पर जोर दे रहे हैं ताकि किसी अन्य पार्टी को फायदा पहुंचाया जा सके। सत्ता का दुरुपयोग न केवल पीड़ितों को नुकसान पहुंचाता है बल्कि प्रशासन और कानून के शासन में जनता का विश्वास भी कम करता है। इनका कहना  वाइल्डलाइफ कैफे के संचालन को लेकर विवाद हाईकोर्ट में लंबित है। मैं मानता हूं कि डायरेक्टर ने गलत शर्त जोड़ी है। इस वजह से उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और मैंने प्रस्ताव पीसीसीएफ प्रशासन-एक विवेक जैन को भेज दिया है।   शुभ रंजन सेन, पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ

छिंदवाड़ा वन मंडल में चहेतों के लिए टेंडर में गड़बड़झाला

Tender irregularities for favourites in Chhindwara forest division भोपाल। ऑनलाइन टेंडर के नाम पर वन विभाग में बड़ा खेल खेला गया है। चहेते ठेकेदार को करोड़ो की सप्लाई देने के लिए दस्तावेजों का गोलमाल किया गया है। टेंडर प्रक्रिया का यह मामला अब तक भले ही कम्पयुटरों में कैद था लेकिन बाहर आने के बाद दस्तावेज मुहैया कराने में अफसरों की सांसे फूल रही है। खास बात यह कि इस मामले में शिकवा शिकायतों का दौर शुरू होने के बाद भी अफसरों ने टेंडर निरस्त करने के स्थान पर बिना सप्लाई के ही सप्लायर को एक बड़ी राशि का भुगतान भी कर दिया है। दरअसल यह पूरा मामला पूर्व वनमंडल और दक्षिण वनमंडल से जुड़ा है जिसमें चार निविदाकारों में उस फर्म को ठेका दिया गया है जिसने निविदा के नियम और शर्तों का पालन तक नहीं किया है। सूत्रों की माने तो मंडला जिले की इस फर्म को केवल इस बिना पर टेंडर दिया गया है कि वह एक विभागीय अधिकारी से करीबी रखता है जिसके कारण टेंडर प्रक्रिया में उपयोगी दस्तावेजों की कमी को भी नजर अंदाज किया गया और उसे संबंधित फर्म को टेंडर दे दिया गया।  लैब टेस्ट कराने फीस ली कैश निविदा शर्तों के तहत टेंडर भरने वाले निविदाकार को सप्लाई की जाने वाली सामग्री का पहले सेम्पल देना होता है। सेम्पल की गुणवत्ता को परखने केलिए इंदौर की लैब में भेजा जाता है। इसके लिए निविदाकार से ऑन लाइन ही राशि जमा कराई जाती है। लेकिन टेंडर प्रक्रिया में गोलमाल का चक्रव्यूह रचने वालों ने राशि कैश में जमा करा ली। जबकि यह बात अन्य किसी भी निविदा कार को पता नहीं हैकि किस लैब में जांच की गई और उसकी रिपोर्ट वया है। 6 टेंडरों में एक ही शपथ पत्र अलग-अलग तिथि और माह में एक ही फर्म को दिए गए टेंडरों में ऑनलाइन अपलोड होने वाले शपथ फत्र में एक ही शपथ पत्र को सभी टेंडरों में अपलोड किया गया है। इसे भी दबाए रखने का काफी प्रयास किया गया लेकिन जब आरटीआई के माध्यम से दस्तावेजों की मांग की गई तो विभागीय अधिकारियों द्वारा टेंडर से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी आरटीआईकर्ता को समय सीमा के बाद भी जानकारी नहीं दी प्रदान की गई जिसके बाद जानकारी के लिए प्रथम अपील लगाई गई है।

वन विभाग के दागी अफसरों पर मेहरबान है शीर्ष अफसर

The top officers are kind to the tainted officers of the forest department उदिता नारायण  भोपाल। जंगल महकमे के शीर्ष अधिकारी कुछ चहेते अत- फसरों को बचाने के लिए पूरी ताकत लगाते आ रहें है। शीर्ष अधिकारी गंभीर वित्तीय मामले में घिरे आईएफएस अधिकारियों को बचाने के लिए आरोप पत्र  जारी करने के बजाय शो कॉज थमा कर उन्हें बचाया जा रहा हैं। विभाग के रसूखदार आईएफएस अजय पाण्डेय, गौरव चौधरी, अनुराग कुमार, प्रशांत कुमार, अमित निकम समेत एक दर्जन के खिलाफ आरोप पत्र जारी भी कर दिए गए हैं, किन्तु उनके विरुद्ध आगे की कार्यवाही पेंडिंग कर दी गई है। विभाग के शीर्ष अधिकारियों की ढुलमुल रवैया के कारण आरोपित अधिकारी प्राइम पोस्टिंग पार्टी जा रहे हैं और इनमें से कुछ अधिकारी धीरे-धीरे रिटायर भी होते जा रहें है। इसी कड़ी में पीसीसीएफ संरक्षण डॉक्टर दिलीप कुमार के खिलाफ 22 लाख रुपए की रिकवरी है और वह रिटायर हो गए हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि विभाग सेवानिवृत्त अधिकारियों पर सद्भावना दिखाते हुए पेंशन भी स्वीकृत कर रहा है। मसलन, एम काली दुर्रई, देवेंद्र कुमार पालीवाल, प्रभात कुमार वर्मा जांच कार्यवाही के लंबित रहते हुए सेवानिवृत्त हो गए और अब उनके समस्त देयकों के भुगतान करने पर उदारता बरती गई । दागी अफसरों को बचाने के लिए शीर्ष अधिकारियों ने क्यों उदारता बरती, शोध का विषय है। इन अफसरों को अभयदान देने के प्रयास एपीएस सेंगर: बालाघाट सर्किल में पदस्थ सीएफ एपीएस सेंगर के खिलाफ 24 अगस्त 2022 को आरोप पत्र जारी हुआ। मामला तब का है, जब वे टीकमगढ़ के डीएफओ हुआ करते थे। इन पर आरोप है कि भंडार क्रय नियमों का पालन नहीं किया। खरीदी में गड़बड़ी हुई। इनके खिलाफ आरोपपत्र भी बन गया परंतु  प्रशासन-1 शाखा ने उदारता दिखाते हुए शो कॉज नोटिस जारी कर उन्हें न केवल बालाघाट सर्किल में प्राइम पोस्टिंग दे दी, बल्कि क्लीनचिट भी दे दी। दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि विभाग ने इनके खिलाफ कार्रवाई करने की अद्यतन स्थिति से शासन को अवगत नहीं कराया है। बृजेंद्र श्रीवास्तव: छिंदवाड़ा पूर्व में पदस्थ डीएफओ बृजेंद्र श्रीवास्तव के खिलाफ 21 जुलाई 2022 को नियम दस के तहत आरोप पत्र जारी किया गया था। इन पर आरोप है कि स्थानांतरण नीति के विरुद्ध जाकर कर्मचारियों के तबादले किए। आरोप पत्र का जवाब अभी तक नहीं दिया गया है।  भारत सिंह बघेल: भोपाल मुख्यालय में पदस्थ भारत सिंह बघेल को आरोप पत्र 22 मई 2006 को जारी किया गया था। बघेल ने अपने प्रभाव अवधि के दौरान पूर्व लांजी क्षेत्र में प्रभार अवधि में राहत कार्य अंतर्गत कार्यों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की थी। इनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा कर मामला संघ लोक सेवा आयोग को भेजा गया है। शासन को संघ लोक सेवा आयोग के उत्तर की अपेक्षा है। नवीन गर्ग: बहुउद्देशीय परियोजना के डूब क्षेत्र में आई वन भूमि के बदले में गैर वनभूमि और बिगड़े वन में पौधारोपण कराने में करोड़ों के वनीकरण क्षतिपूर्ति घोटाले में शामिल आईएफएस नवीन गर्ग को डीएफओ दक्षिण सागर (सामान्य) वनमंडल से मप्र ईको टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया है। यही नहीं, ट्रांसफर के बाद भी उन्हें दक्षिण सागर वन मंडल से कई महीनों तक हटाया नहीं गया था। दिलचस्प पहलू यह है कि वन मंत्री विजय शाह ने बीते विधानसभा सत्र में दक्षिण सागर डीएफओ रहे नवीन गर्ग को निलंबित करके ईओडब्ल्यू से जांच कराने की घोषणा की थी। सदन में की गई घोषणा हवा हो गई. उनकी पोस्टिंग इको पर्यटन बोर्ड में है किंतु वह वन्य प्राणी शाखा में काम कर रहे हैं। प्रशांत कुमार: खंडवा में डीएफओ के पद पर पदस्थ प्रशांत कुमार को आरोप पत्र 4 सितंबर 2020 को जारी किया गया था। प्रशांत कुमार डीएफओ पश्चिम बैतूल वन मंडल में अनियमितता के मामले में जांच हुई थी जिसमें उन्हें दोषी पाया गया। विभाग ने एक वेतन वृद्धि असंचयी प्रभाव से रोके जाने का दंड आरोपित कर अंतिम निर्णय के लिए संघ लोक सेवा आयोग भेजा है। आयोग से अभी तक अभिमत नहीं आ पाया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस गड़बड़ी में तत्कालीन उप वन मंडल अधिकारी आईएस गडरिया संलिप्त रहे हैं। आरपी राय: खंडवा सर्किल में पदस्थ सीसीएफ आर पी राय के खिलाफ 10 जून 2019 को आरोप पत्र जारी हुआ था। आरोप था कि वन मंडल इंदौर के अंतर्गत वन परीक्षेत्र चोरल में बड़े पैमाने पर अवैध कटाई हुई थी। जांच के दौरान राय अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असफल रहे। इसके कारण 6 लाख 93 हजार 361 रुपए की राजस्व हानि हुई थी। अभी इनसे वसूली नहीं हुई है। मामला विभाग में ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। राय अगले मई महीने सेवानिवृत्त हो गए। यही नहीं, विभागीय मंत्री की विशेष कृपा होने के कारण इनसे छह लाख 93 हजार की वसूली नहीं हो पाई। एम काली दुर्रई:  1996 बैच के आईएफएस अधिकारी एम काली दुर्रई प्रतिनियुक्ति पर हॉर्टिकल्चर में पदस्थ रहे। यहां पदस्थ रहते हुए दुर्रई ने किसानों की सब्सिडी देने के मामले में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की। इसके चलते उन्हें कमिश्नर हॉर्टिकल्चर पद से हटाया गया। मूल विभाग वन विभाग में लौटते ही उनके खिलाफ  विभागीय जांच शुरू की गई। प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के जांच अफसर सीके पाटिल को जांच के लिए 2 साल का पर्याप्त समय मिलने के बाद भी विभागीय जांच कंप्लीट नहीं कर पाए और वे रिटायर हो गए। राजनीतिक दबाव के चलते विभाग के अफसर उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही नहीं कर पाए। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले देयकों का भुगतान भी उदारता से किया जा रहा है।  डीके पालीवाल: सीसीएफ शिवपुरी के पद से रिटायर हुए हैं। इनके पेंशन के भुगतान पर आपत्ति की गई है, क्योंकि धार और फिर गुना डीएफओ पद रहते हुए आर्थिक गड़बड़ी कर शासन को नुकसान पहुंचाया है। धार में पदस्थ रहते हुए पालीवाल ने एक रेंजर का समयमान वेतनमान का फिक्सेशन अधिक कर दिया। जब मामला संज्ञान में आया, तब तक पालीवाल वहां से स्थानांतरित हो गए थे। विभाग ने अतिरिक्त भुगतान के गए राशि वसूलने के नोटिस सेवानिवृत्त रेंजर को भेजा तो कोर्ट ने उस के पक्ष में फैसला देते हुए फिक्सेशन करने वाले अफसर पालीवाल से ₹300000 की वसूली करने … Read more

अतिक्रमणकारियों का मुकाबला फ्रंट में नहीं बल्कि समुदाय विरुद्ध समुदाय के जरिए करें

Confront the encroachers not from the front but through community against community भोपाल। आईएफएस अफसरों की दो दिन चली मंथन का समापन शनिवार को हो गया। मंथन में अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल ने फील्ड के अवसरों को दो मूल मंत्र बताएं। पहला यह कि अतिक्रमणकारियों का मुकाबला फ्रंट में रहकर नहीं करे, बल्कि उसे समुदाय वर्सेस समुदाय को आगे कर करें। जंगल बचाने वाले समुदाय का सपोर्ट करें और उन्हें ताकतवर बनाएं। दूसरा मंत्र टीम भावना से काम करने का दिया।  अपैक्स भवन में दो दिन चली मैराथन मंथन में फील्ड के अफसरों ने जितने भी प्रेजेंटेशन दिए, वे सभी प्रस्तुति एसीएस वर्णवाल के मानक पर खरे नहीं उतरे। शनिवार को सतना डीएफओ मयंक चांडीवाल ने वन अधिकार अधिनियम को लेकर प्रेजेंटेशन प्रस्तुत किया। चांडीवाल ने बताया कि अधिनियम में दो गवाह के आधार मानकर पट्टा देने की अनुशंसा कर दिया जाता है। जबकि दो साक्ष्य के आधार पर हो, जिसमें एक सैटलाइट इमेजरी होना चाहिए। इस पर एसीएस वर्णवाल बोले कि आप अपने ढंग से अधिनियम के प्रावधानों का प्रजेंटेशन करेंगे। अधिनियम का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से ना करें। वर्णवाल ने यह भी कहा कि यदि आप सहमत नहीं है तो अपनी आपत्ति लिखित में कलेक्टर के समक्ष दर्ज कराएं। आपकी आपत्ति को कलेक्टर इग्नोर नहीं कर सकता। इसी मसले पर एपीसीसीएफ भी कुछ कहना चाहते थे किन्तु एसीएस ने उन्हें बोलने नहीं दिया। पन्ना नेशनल पार्क की फील्ड डायरेक्टर अंजना तिर्की ने एसीएस के समक्ष जानवर मुआवजा का अधिकार फॉरेस्ट अफसर को देने की बात रखी। इस पर वर्णवाल ने कहा कि राजस्व अधिकारी को अधिकार इसलिए दिया गया है क्योंकि उनके पास मुआवजा आकलन करने का अनुभव है। उन्होंने यह भी कहा कि शाजापुर जैसे वन मंडलों में स्टाफ की कमी होती है तो मुआवजा का काम कैसे कर पाएंगे।  टीम भावना से करें काम एसीएस वर्णवाल ने दो दशक पहले देवास जिले के मेहंदीखेड़ा में हुई गोलीचालन को लेकर एक रिपोर्ट केस स्टडी के रूप में फॉरेस्ट अफसर के बीच वितरित की। तब वर्णवाल देवास के कलेक्टर थे। फॉरेस्ट के अफसर से सवाल किया कि इसमें आप बताएं क्या किया जा सकता था? इसके बाद उन्होंने अफसर के समक्ष कहा कि इस गोलीचालन में चार लोगों की मौत हुई थी। इसकी मजिस्टिकल जांच हुई थी। तब देवास में डीएफओ महेंद्र धाकड़ थे। उन्होंने बताया कि मजिस्ट्रियल जांच में कलेक्टर एसपी और डीएफओ के बयान एक जैसे ही थे। हम लोगों ने टीम भावना के साथ घटना और मजिस्ट्रियल जांच का सामना किया। इसलिए डीएफओ कलेक्टर और एसपी के साथ मिलकर काम करें।  नए अफसरों को परोसा झूठ एसीएस वर्णवाल ने देवास के मेहंदीखेड़ा गोलीकांड के मामले में कुछ झूठ भी परोसा है। बड़वाल ने एनजीओ तक का नाम नहीं बताया जबकि आदिवासी मुक्ति संगठन के नाम से जनता को वर्ग लाया जा रहा था और इसके संचालक राहुल बनर्जी और माधुरी बेन थे, जो आज भी सक्रिय है। वर्णवाल ने फील्ड से आए अफसर से यह बताया कि इस घटना को लेकर विधानसभा क्वेश्चन तक नहीं हुई। जबकि गोली कांड को लेकर सदन में खूब हंगामा हुआ स्थगन लाये गए थे और विधानसभा की कार्रवाई बाधित भी हुई। इसके चलते सरकार को कलेक्टर, एसपी और डीएफओ को हटाना भी पड़ा था। इस पूरी घटना को लेकर तत्कालीन पीसीसीएफ आरडी शर्मा के कहने पर मैंने ग्राउंड रिपोर्टिंग भी की थी। मैंने दैनिक नई दुनिया में तीन दिन तक रिपोर्टिंग का एपिसोड चलाया। अपनी रिपोर्टिंग में मैंने यह  स्पष्ट कर दिया था कि तत्कालीन प्रमुख सचिव वन बनर्जी और एनजीओ संचालक कर्ता राहुल बनर्जी के बीच दोस्ताना संबंध रहे और उनमें टेलिफोनिक बातचीत भी होती रही। राहुल पुलिस की नजरों में फरार था पर वल्लभ भवन में अधिकारियों से मिलता जुलता रहा। मेरे द्वारा खबर प्रकाशित करने के बाद वन विभाग प्रमुख सचिव से बनर्जी को हटा दिया गया था। तत्कालीन पीसीएफ आरडी शर्मा आज भी जीवित है।

मप्र में 7 साल बाद भी कैंपा प्राधिकरण का गठन नहीं, केंद्र को दिखाया ठेंगा

Even after 7 years, CAMPA authority has not been formed in Madhya Pradesh, showing contempt to the Centre. भोपाल। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय ने अगस्त 2018 को सभी राज्यों में प्रतिपूरक वनीकरण कोष एवं योजना प्राधिकरण कैपा गठन के निर्देश दिए थे। 7 साल बीत जाने के बाद भी मप्र में कैंपा प्राधिकरण का गठन नहीं हो पाया। जबकि केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के आधार पर प्राधिकरण के गठन के आदेश दिए थे। यानी मप्र में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन की भी हो रही है।प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय के निर्देश पर देश के अन्य राज्यों में कैंपा प्राधिकरण का गठन हो गया है। जबकि मप्र में अभी तक पीसीसीएफ का एक पद बचाने के लिए गठन नहीं किया गया। मौजूदा काल में राज्य कैडर में पीसीसीएफ के पद भी कम हो गए हैं। बावजूद इसके प्राधिकरण का गठन करने को लेकर शीर्ष अफसरों द्वारा न केवल आना-कानी की जा रही है, बल्कि मुख्य सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक गलत तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं। विभाग में स्थितियां है कि पीसीसीएफ कैंपा का पद हथियाने के लिए वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं। अब तक जितने भी पीसीसीएफ कैंपा के पद पर पदस्थ रहे आईएफएस अफसरों की मुख्यमंत्री हाउस तक सीधी पहुंच रही है। फिलहाल मौजूदा स्थिति में पीसीसीएफ कैम्पा पद पर पीके सिंह है, जो 31 जनवरी को सेवामुक्त हो रहें हैं। अब तो बना दिया जाना चाहिए कैंपा प्राधिकरण लंबे समय तक केंद्र में अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाने वाले अनुराग जैन के मुख्य सचिव बनने के बाद कैंपा प्राधिकरण के गठन की संभावनाएं बढ़ गई है। कैंपा प्राधिकरण के गठन होने पर पीसीसीएफ कैंपा का पद समाप्त हो जाएगा, क्योंकि इसमें मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) पद का प्रावधान है। इस पद पर एवीसीसीएफ स्तर के अधिकारी को ही सीईओ पदस्थ जा सकता है। नाथ सरकार ने नहीं दिया प्राधिकरण पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार के कार्यकाल bमें तत्कालीन अपर मुख्य सचिव एपी श्रीवास्तव ने केंद्र के निर्देश पर राज्य में कैथा प्राधिकरण के गठन की पहल शुरू की। प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया शुरू होते ही तत्कालीन पीसीसीएफ पद पर विराजे एबी गुप्ता छिंदवाड़ा की दौड़ लगा दीथी। तत्कालीन मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल ने गुप्ता की मुलाकात कमलनाथ से कराई। इस मुलाकात में कैंपा पीसीसीएफ गुप्ता के बाद नाथ के निर्देश पर कैंपा प्राधिकरण के गठन पर विराम लग गया। कमलनाथ के बाद शिवराज सरकार ने भी प्राधिकरण के गठन पर पहल नहीं की। इसकी वजह भी स्पष्ट थी कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपने करीबी रिश्तेदार महेंद्र सिंह धाकड़ को पीसीसीएफ कैंपा के पद पर उपकृत करना था। केंद्र से नहीं मिली कैंपा पीसीसीएफ की मंजूरी केंद्र सरकार ने कैपा पीसीसीएफ का पद अस्थाई तौर पर 3 साल के लिए स्वीकृत किया था, जिसकी मियाद जनवरी 2019 को समाप्त हो गई। यानी 2019 के बाद से अब तक पीसीसीएफ कैंपा का पद कैडर में स्वीकृत न होने के बाद भी पोस्टिंग होती चली आ रही है। अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल कैंपा प्राधिकरण संबंधित प्रस्ताव को मुख्यमंत्री के समक्ष मूव करना चाहिए। मौजूदा मुख्यमंत्री मोहन यादव के अधीन वन विभाग भी है। यानी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन और केंद्र सरकार केंद्र सरकार के निर्देश के 7 साल बाद तो मप्र प्राधिकरण का गठन कर दिया जाना चाहिए। फैक्ट फाइल

6 जनवरी एफआईआर दर्ज, 7 को एपीसीसीएफ मीना एक और शाखा का प्रभार

FIR registered on 6th January, charge of another branch of APCCF Meena on 7th भोपाल। जंगल महकमे के इतिहास में यह पहला प्रकरण है कि महिला प्रताड़ना को लेकर जिस एपीसीसीएफ मोहन मीणा के विरुद्ध उसी अफसर को अगले दिन 7 जनवरी को अनुसंधान विस्तार एवं लोकवानिकी शाखा का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया। मौजूदा तौर पर मीणा नीति विश्लेषण मूल्यांकन शाखा में पदस्थ है। पीसीसीएफ प्रशासन एक विवेक जैन के आदेश पर महकमे के अधिकारी हतप्रभ हैं।विभाग में एपीसीसीएफ स्तर के अधिकारियों के कमी के चलते प्रभार दिया जा रहा है। ऐसे में एपीसीसीएफ मीणा को भी नीति विश्लेषण मूल्यांकन शाखा के अलावा अनुसंधान विस्तार एवं लोकवानिकी शाखा का अतिरिक्त प्रभार देने का आदेश पीसीसीएफ विवेक जैन ने जारी कर दिया है। पीसीसीएफ जैन के आदेश जारी करने की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं। आखिरकार फिर दर्ज होने के पहले तक मीणा को प्रभार क्यों नहीं दिया गया? तब भी कैंपा सहित अन्य शाखाओं के प्रभार अन्य एपीसीसीएफ को प्रभार दिए गए थे। पीसीसीएफ जैन के आदेश पर विभाग के शीर्ष अधिकारियों से बातचीत की। बातचीत के दौरान नाम न छापने की शर्त पर अपने – अपने कमैंट्स दिए। किसी ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने पर उनके हौसले को बरकरार रखने के लिए अतिरिक्त प्रभार दिया गया। अन्यथा लंबे समय से विभाग में मीणा की उपेक्षा की जा रही थी। उन्हें पहले भी दिया जा सकता था। एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि समझ से परे है। एक अधिकारी ने कहा कि पुलिस प्रशासन को चुनौती है और महिलाओं के प्रति उनकी संवेदनहीनता को दर्शाता है। एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती है। इस कहावत के पीछे उनकी धारणा है कि पीसीसीएफ पी धीमान और एपीसीसीएफ मोहन मीणा के बीच 36 का आंकड़ा है। काम करने में उनमें टकराहट की खबरें सुनाई देने लगेंगे। एक अफसर ने व्यंग्य कसते हुए कहा कि योग्यता के आधार पर प्रभार दिया गया है। उल्लेखनीय है कि 6 जनवरी को बैतूल के गंज पुलिस स्टेशन में कार्यस्थल पर महिला प्रताड़ना को लेकर एपीसीसीएफ मीणा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। एफआईआर दर्ज करने से पहले जिला न्यायालय के प्रथम व्यवहार न्यायधीश के समक्ष पीड़ता ने 164 में बयान दर्ज कराए। यह मामला 2021 का है। तब एपीसीसीएफ मोहन मीणा बैतूल वन वृत में पदेन सीसीएफ के रूप में पदस्थ थे।

कूनो नेशनल पार्क के अंदर घुसे बंदूकधारी शिकारी, चली गोलियां, चीतों को खतरा?

Hunters with guns entered Kuno National Park, bullets were fired, danger to leopards? श्योपुर ! कूनो नेशनल पार्क के मोरावन क्षेत्र में फायरिंग और कुछ शिकारियों के घुसने की खबर सामने आई है. पार्क प्रबंधन के मुताबिक मोरावन क्षेत्र में मंगलवार को गश्ती दल ने फायरिंग की आवाज सुनी थी. इसके बाद तुरंत सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया तो तीन बंदूकधारी नजर आए. हालांकि, पार्क प्रबंधन ने शुक्रवार को घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि तीन बंदूकधारी शिकारी छिपकर भाग निकलने में कामयाब रहे. वहीं डीएफओ ने चीतों के सुरक्षित होने की बात कही है. डीएफओ ने की कूनो में घुसपैठ की पुष्टि इस पूरी घटना को लेकर जब श्योपुर DFO आर थिरुकुरल से बात की गई तो उन्होंने SAHARA SAMACHAAR को बताया, ” दो-तीन दिन पहले एक पॉइंट मिला था कि कुछ शिकारी पार्क के कुछ इलाकों से घुसने का प्रयास कर सकते हैं. इसके आधार पर लगातार कॉम्बिंग टीमों द्वारा गश्त की जा रही थी. इसी दौरान मंगलवार को अचानक वन क्षेत्र में गोली चलने की आवाज सुनाई दी, तो गश्ती दल तुरंत मौके पर पहुंचे लेकिन शिकारियों को इस बात का आभास हो गया और वे मौके से फरार हो गए.” पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन जारी DFO के मुताबिक कूनो नेशनल पार्क के कुछ संवेदनशील पॉइंट हैं, जहां से 2-3 शिकारियों के घुसने की आशंका है. हालांकि, गश्ती दल के सक्रिय होने से संभवत: शिकारी किसी घटना को अंजाम नहीं दे सके. एहतियातन कूनो नेशनल पार्क के प्रबंधन ने पार्क के अंदर गश्त बढ़ा दी है और अन्य संवेदनशील इलाकों पर नजर रखी जा रही है. पार्क में लगे कैमरों की मदद से भी शिकारियों का पता लगाया जा रहा है. खुले में घूम रहे हैं दो चीते गौरतलब है कि कूनो नेशनल पार्क अपने विदेशी चीतों के लिए अक्सर सुर्खियों में रहता है. यहां चीतों को फिर से बसाने के लिए सरकार का एक बड़ा प्रोजेक्ट जारी है. इस प्रोजेक्ट के चलते श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से कई चीते लाए गए थे. इन्हीं में से दो चीते खुले जंगल में घूम रहे हैं. ऐसे में बंदूकधारी शिकारियों का यहां घुसना कई तरह के सवाल पैदा कर रहा है. पहली बार नहीं घुसे शिकारी हालांकि, यह पहली घटना नहीं है जब कूनो नेशनल पार्क में शिकारियों की घुसपैठ की कोशिश हुई हो. पिछले साल 12 जून को भी ऐसे ही तीन शिकारियों को पार्क में गश्ती दल ने पकड़ा था. ऐसी घटनाएं कूनो नेशनल पार्क और खासतौर पर यहां लाए गए विदेशी चीतों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर रही हैं.

शावकों के शव क्षत-विक्षत कैसे हुए, 36 घंटे बाद भी फारेस्ट नहीं ढूंढ पा रहें है जवाब

How did the bodies of the cubs get mutilated, the forest is not able to find the answer even after 36 hours उदित नारायणभोपाल। कूनो नेशनल पार्क से जन्मे दोनों शावकों की मौत पर प्रबंधन पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शावकों के शव क्षत-विक्षत कैसे हुए..? क्या बाड़े में कोई और वन्य प्राणी पहुंचे थे या फिर मां स्वयं ही अपने शावकों पर हमला करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया..? मौत के चार दिन बाद भी वन विभाग द्वारा अधिकृत जवाब नहीं आया है। सबसे बड़ा सवाल लिया है कि प्रधानमंत्री की ड्रीम प्रोजेक्ट में इतनी बड़ी लापरवाही के लिए कौन अफसर जवाबदेह है।श्योपुर के कूनो नेशनल पार्क में चीतों के वंश वृद्धि की कड़ी में 22 नवंबर को चीता निर्वा ने शावकों को जन्म दिया था। जन्म के 2 दिन बाद यानि 25 को दोनों शावकों की मौत हो गई। डीएफओ कुनो के अधिकृत प्रेस नोट में दोनों मृत शावकों के शव को क्षति-विक्षिप्त बताया। अर्थात शावकों की मौत किन जानवरों के हमले से हुई? इस सवाल का उत्तर खोजा जा रहा है। हालांकि सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा ने आशंका व्यक्त की है कि निर्वा पहली बार मां बनी है, इसलिए वहीं हमले कर सकती है। बिल्ली प्रजाति के एनिमल का यह स्वभाव भी होता है। इसके बावजूद भी आखिरकार कुनो पार्क के प्रबंधन पर सवाल उठना लाजमी है। 24 घंटे की मॉनिटरिंग कैसे की जा रही थी? सभी चीता को कॉलर आईडी से मीनिंग हो रही है तो फिर निर्वा के मूवमेंट पर नजर क्यों नहीं रखी गई..? यदि निर्वाह पर नजर रखी जाती तो उसके हमले से शावकों को बचाया जा सकता था।

वन विभाग में बड़े ट्रांसफर, प्रधान मुख्य वन संरक्षक को हटाया

Major transfers in the forest department, Principal Chief Forest Conservator removed भोपाल। मध्यप्रदेश शासन ने गुरुवार रात वन विभाग के दो बड़े अधिकारियों का तबादला कर दिया है. इस ट्रांसफर ऑर्डर को भी बांधवगढ़ मामले से जाेड़कर देखा जा रहा है. दरअसल, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 10 हाथियों की मौत के मामले के बाद लगातार अधिकारियों के तबादले हो रहे हैं. वहीं अब मोहन यादव सरकार ने भारतीय वन सेवा के दो अधिकारियों को प्रशासकीय हित का हवाला देते हुए स्थानांतरित किया है. किन IFS के हुए ट्रांसफर मध्य प्रदेश शासन ने गुरुवार को एक आदेश जारी किया है, जिसमें प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) मुख्यालय भोपाल वीएन अम्बाड़े का ट्रांसफर कर दिया गया है. उनकी जगह वित्त एवं बजट शाखा के प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभरंजन सेन को प्रदेश का नया प्रधान मुख्य वन संरक्षक नियुक्त किया गया है. वहीं वीएन अम्बाड़े को वन राज विकास निगम भोपाल में प्रबंध संचालक बनाकर भेजा गया गया है. हाथियों की मौत के बाद प्रशासनिक सर्जरी गौरतलब है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व कुछ दिन पहले एक-एक करके 11 हाथियों की मौत हो गई थी. घटना के कुछ समय बाद ही बांधवगढ़ के दो अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया था. वहीं अब वाइल्डलाइफ वार्डन को भी हटा दिया गया है, और उन्हें नई जिम्मेदारी सौंप दी गई है.

जंगलों में अतिक्रमण रोकने पर वन माफिया का कहर, वन अमले पर जानलेवा हमला फिर भी पुलिस ने नहीं किया मामला दर्ज

Forest mafia wreaked havoc on forest encroachment, deadly attack on forest staff but police did not register a case मध्य प्रदेश में जंगलों में अतिक्रमण करने वाले वन माफिया के हौसले अब इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे उन्हें रोकने की कोशिश करने वाले वन अमले पर भी हमला करने से बाज नहीं आ रहे हैं। प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र से वन अमले पर इसी तरह से कई प्राण घातक हमले करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। ताजा मामला निमाड़ के ही खंडवा जिले के गुड़ी वन परीक्षेत्र का है, जहां जंगल में किये जा रहे अतिक्रमण की जानकारी मिलते ही वन अमला हरकत में आया और उसे रोकने पहुंचा था। इस दौरान जंगल की जमीन पर जुताई कर रहा एक ट्रैक्टर चालक वन अमले को देख, उसका कल्टीवेटर जंगल में ही छोड़कर फरार हो गया। वहीं जब वन अमला उस कल्टीवेटर को जब्त कर वापस लौट रहा था। इस बीच करीब 30 से 35 महिलाओं के झुंड ने वन अमले पर लाठी, पत्थरों और डंडों से हमला कर दिया और उन्हें वहां से भाग जानें, नहीं तो जान से मार देने की धमकियां देने लगा। यही नहीं, कुछ महिलाओं ने तो वन अमले के साथ झूमा झटकी कर वन कर्मचारियों की वर्दी तक फाड़ दी। हालांकि इसकी नामजद शिकायत पिपलोद थाना में शुक्रवार को करने के बावजूद भी पुलिस ने इसपर कोई एक्शन नहीं लिया। निमाड़ के जंगलों में लगातार अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है और यहां की बेशकीमती वन संपदा का अतिक्रमणकारी जमकर दोहन कर प्रकृति के साथ ही शासन को आर्थिक नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। इन वन माफियाओं के खिलाफ पुलिस की पुख्ता कार्रवाई नहीं होने के चलते अब इस तरह की घटनाओं में लगातार इजाफा होते जा रहा है। ऐसा ही मामला गुडी वन परिक्षेत्र में बीते गुरुवार को सामने आया, जब सभी दीपावली पर्व की खुशियां मना रहे थे, तब जिले के गुड़ी रेंज के रेंजर नरेंद्र सिंह और उनकी टीम सूचना मिलने पर अतिक्रमण रोकने बीट भिलाईखेड़ा के कक्ष क्रमांक 749 में नवाड की भूमि पर पहुंची थी। यहां टीम को देख मौके से जुताई कर रहा ट्रैक्टर चालक उसका कल्टीवेटर निकालकर भाग गया। टीम ने मौके से कल्टीवेटर को जब्त कर इस मामले में वन अपराध का प्रकरण दर्ज किया। वन अमले पर इस तरह हुआ हमला बताया गया कि जब्ती कार्रवाई के बाद जब वन अमला दो दलों में वापस लौट रहा था। इस बीच दोपहर करीब 2 बजे सरपंच टांडे की लगभग 30-35 महिलाओं ने पीछे रह गए वन स्टॉफ के परिक्षेत्र सहायक सरमेश्वर के शांतिलाल चौहान, परिक्षेत्र सहायक कोठा के पंजावराव पंडाग्रे, परिक्षेत्र सहायक आराखेडा के कैलाश लोवंशी सहित वन रक्षकों जितेन्द्र पगारे, मनोज तंवर और भरत भूषण मिश्र एवं सुरक्षा श्रमिक गनिया को घेर लिया। यही नहीं, इन महिलाओं के झुंड ने इस वन अमले के साथ मारपीट की एवं धमकी देते हुए कहने लगी कि यहां से भाग जाओ नहीं तो जान से मार देंगे। इस दौरान महिलाओं के हाथों में दराती, पत्थर एवं लाठी डंडे भी थे। महिलाओं ने वन स्टाफ को डंडे से पीटा और वर्दी तक फाड़ दी। इस हमले में जितेन्द्र पगारे वन रक्षक की पीठ पर डंडे से पिटाई के निशान थे, तो वहीं मनोज तंवर के गले मे नाखून के निशान थे, जिसके फोटोग्राफ भी लिए गये। वन अमले ने की थी नामजद शिकायत वहीं इस पूरे मामले में गुड़ी रेंजर नरेंद्र पटेल ने बताया कि अतिक्रमणकारियों को रोकने पहुंचे वन अमले के साथ 31 अक्तूबर को हुई इस घटना की जानकारी एक शिकायत पत्र के जरिए उसी दिन संबंधित पिपलोद थाना पर दी गई थी। इसके बाद अगले दिन वन अमला एक बार फिर से हमला करने वाली महिलाओं की पहचान करने उस जगह पहुंचा था, जहां से कुछ महिलाओं के नाम मालूम चलने पर 1 तारीख को थाने पर उन महिलाओं के नाम बताते हुए इसकी लिखित शिकायत की गई थी। साथ ही पीड़ित स्टाफ के चोट के निशान एवं फटी वर्दी भी थाना प्रभारी पिपलोद को दिखाई गयी थी। जांच के बाद ही हो सकेगा मामला दर्ज इधर पिपलोद थाना प्रभारी एसएन पांडे का कहना है कि वन अमले के साथ महिलाओं के द्वारा मारपीट करने और वर्दी फाड़ने जैसी शिकायत को लेकर उन्हें आवेदन तो मिला है, जोकि अभी जांच में है। इसलिए अब तक इस मामले में किसी तरह की एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। हालांकि जब उनसे पूछा गया कि शासकीय कर्मचारियों के साथ हुई मारपीट को लेकर तीन दिन बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं करने का क्या कारण रहा? तब उन्होंने बताया कि अभी जांच जारी है, जिसके बाद ही मामला दर्ज हो पाएगा। वहीं इसको लेकर खंडवा डीएसपी अनिल चौहान ने बताया कि जानकारी मिली है कि फॉरेस्ट टीम पर हमला करने को लेकर शिकायत की गई है। इस मामले में पिपलोद थाने के द्वारा जांच की जा रही है।

डी-नोटिफिकेशन के बाद भी चम्बल अभयारण्य क्षेत्र में नहीं होगा रेत खनन

Sand mining will not happen in Chambal sanctuary area even after de-notification उदित नारायणभोपाल। राज्य सरकार द्वारा 31 जनवरी 2023 को मुरैना वनमंडल में स्थित राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य का 207.049 हेक्टेयर क्षेत्र स्थानीय निवासियों को उनकी आजीविका हेतु रेत आपूर्ति हेतु डिनोटिफाई किया गया था, परन्तु अब इस डिनोटिफिकेशन को निरस्त किया जायेगा। अब यह मामला राज्य शासन स्तर पर है जहां वन मंत्री रामनिवास रावत से डिनोटिफिकेशन की सूचना निरस्त करने का प्रशासकीय अनुमोदन मांगा गया है।दरअसल सुप्रीम कोर्ट एवं एनजीटी ने इस डिनोटिफिकेशन की प्रक्रिया कोरह रहे घड़ियालों, डाल्फिन एवं कछुओं के रहवास के प्रतिकूल माना है। मप्र के स्टेट वाईल्ड लाईफ बोर्ड की 11 जून 2024 को हुई बैठक में यह प्रकरण आया था जिसमें निर्णय लिया गया था कि राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य के अंतर्गत स्थानीय लोगों की रेत आपूर्ति हेतु किये गये डिनोटिफाई क्षेत्र के संबंध में सुप्रीम कोर्ट एवं एनजीटी द्वारा रेत आपूर्ति के संबंध में चम्बल अभयारण्य की नदी में दिये गये निर्णय के परिप्रेक्ष्य में प्रस्ताव का पुनः परीक्षण कर आवश्यक कार्यवाही की जाये। इस पर राज्य के वन मुख्यालय की वन्यप्राणी शाखा ने प्रस्ताव का परीक्षण कर अब रिपोर्ट दी है कि डिनोटिफिकेशन की सूचना निरस्त किया जाये। शुरु से ही हुई गड़बड़ी दरअसल स्थानीय लोगों को रेत की आपूर्ति हेतु हेतु 31 जनवरी 2023 को चम्बल नदी का 207.049 हेक्टेयर क्षेत्र डिनोटिफाई किया गया था। इसके बाद मुरैना डीएफओ ने आपत्ति ली कि डिनोटिफिकेशन क्षेत्र इको सेंसेटिव जोन में आता है जहां रेत की आपूर्ति नदी से नहीं हो सकती है। इस पर इको सेंसेटिव जोन को खत्म करने का प्रस्ताव लाया गया परन्तु सुप्रीम कोर्ट एवं एनजीटी ने इस प्रक्रिया को गलत माना। अब डिनोटिफिकेशन निरस्त करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। साल भर पहले एनजीटी ने भी दिया निर्देश नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (एनसीएस) में अवैध खनन को नियंत्रित करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों से रेत खनन संबंधी दिशा-निर्देशों को भी लागू करने को कहा है। यह निर्देश न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने दिया है। इस मामले में कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, एसपीसीबी के साथ भिंड, मुरैना, ग्वालियर, आगरा, इटावा, झांसी, धौलपुर और भरतपुर के पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट से अवैध खनन को नियंत्रित करने, उस पर निगरानी रखने और तीन महीनों के भीतर इस मामले में क्या कार्रवाई की गई, उस पर रिपोर्ट सबमिट करने को कहा था किन्तु आज तक उत्तर प्रदेश राजस्थान और मध्य प्रदेश के डीजीपी ने अपनी रिपोर्ट सबमिट नहीं की। पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने भी उठाया था मामला कांग्रेस के कद्दावर नेता एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने भी चंबल अपहरण क्षेत्र में हो रहे रेट उत्खनन को लेकर एक अभियान चलाया था। डॉक्टर सिंह ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को पत्र लिखा था पर उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। यहां तक कि डॉ सिंह विधानसभा से लेकर सड़क तक जल जीवों की सुरक्षा को लेकर आवाज बुलंद किया था।

बहोरीबंद क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन: वन विभाग ने जंगल में तस्करी से बंधे गोवंश को बचाया

Search operation in Bahoriband area: Forest department rescued cattle tied up in the forest for smuggling कटनी, बहोरीबंद। गौवंश की तस्करी का एक बड़ा मामला सामने आया हैं। जानकारी के मुताविक बहोरीबंद वन परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 190 गोरहा-रक्सेहा के जंगल से वन विभाग की टीम ने 59 नग गौवंश एवं लगभग 10 हजार की कीमत का सागौन तस्करों से जप्त किया है। बहोरीबंद परिक्षेत्र के रेंजन ब्रज मीणा ने बताया कि मुखबिरों ने सूचना दी कि जंगल में बड़ी संख्या में गौवंश को बांध कर रखा गया है और तस्कर मौका पाकर ये गोवंश दूसरे शहर में ले जाकर बेचने की फिराक में है। सूचना के बाद विभाग के वरिष्ट अधिकारियों के मार्गदर्शन में वन विभाग की टीम ने कल रात पूरे जंगल मे सर्च अभियान चलाया। करीब 7 से 8 घंटे चले सर्चिंग अभियान में कटनी-दमोह के बीच रक्सेहा-सलैया के जंगल से लगभग 59 नग गौ वंश बरामद किया गया। इस दौरान एक तस्कर भी वन विभाग की गिरफ्त में आया, जिस ने अपना नाम विनय गोंड बताया।बाकी तीन भाग गए। तस्करों के पास से लगभग 7 हजार कीमत की सागौन की बल्ली एवं दो मोटरसाइकिल भी बरामद की गई है। पकड़े गए विनय गौड़ ने पूछताछ में बताया कि स्थानीय निवासी राजू पटेल व अन्य पारधी मिलकर गोवंश को जंगल लाते हैं फिर मौका पाकर इन्हें ट्रकों में भरकर अन्य शहर में भेज दिया जाता है। रेंजर मीणा ने बताया कि पूरे गौवंश को जंगल से सुरक्षित लाकर बाकल थाने के सुपुर्द किया जा रहा हैं। इस पूरे मामले में गौवंश अधिनियम के तहत आगे की कार्यवाही पुलिस करेगी।इस दौरान इनके पास से जप्त की गई सागौन को बल्लियों को राजसात कर लिया गया है। पिछले साल भी यहीं से इन्ही पारधियों के रिश्तेदार के द्वारा गौवंश की तस्करी का मामला सामने आया था। पिछले साल दिसंबर माह में पेंगुलिन भी इन्ही तस्करों से बरामद किया गया हैं।

MP NEWS: 29 सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्रपालों का तबादला

MP NEWS: Transfer of 29 assistant forest conservators and forest rangers

MP NEWS: Transfer of 29 assistant forest conservators and forest rangers भोपाल । राज्य शासन ने आज 29 सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्रपालों का तबादला किया है। इस संबंध में शाम को आदेश जारी किए गए हैं।

तीन वित्तीय वर्षों के भीतर 17 वन मंडलों में कैंपा फंड में 364 करोड़ का गड़बड़झाला

Misappropriation of Rs 364 crore in CAMPA fund in 17 forest divisions within three financial years

Misappropriation of Rs 364 crore in CAMPA fund in 17 forest divisions within three financial years गणेश पाण्डेयभोपाल। कैग ने जंगल महकमे में पिछले वित्तीय वर्ष में विभाग के 17 वन मंडलों में 364 करोड़ से अधिक गड़बड़झाला होने की पुष्टि की है। यह गड़बड़ी 63 वनमंडलों में से केवल 17 वन मंडलों में हुई ऑडिट रिपोर्ट से उजागर हुई है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैंपा फंड से कितने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो सकती है ? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मौजूदा पीसीसीएफ कैंपा ने संरक्षण शाखा के हिस्से के वित्तीय अधिकार पर बलात कब्जा कर लिया है। जबकि परंपरा यह रही है कि फॉरेस्ट प्रोटक्शन से संबंधित व्यय करने वाली राशि का फंड संरक्षण शाखा द्वारा किया जाता रहा है।भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में कैंपा फंड की राशि में हुई गड़बड़ियों को लेकर विस्तार से ब्यूरोक्रेट का ध्यान आकर्षित कराया गया है। कैग ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट तौर से उल्लेख किया है कि क्षतिपूर्ति वनीकरण के क्रियान्वयन में अनियमितता की गई है। कैग ने वित्तीय वर्ष 2017 से लेकर 2019-20 में 17 वनमंडल अनूपपुर, पूर्वी छिंदवाड़ा, खरगोन, खंडवा, इंदौर, रतलाम, भोपाल, सिंगरौली, दक्षिण शहडोल, उत्तर सागर दक्षिण सागर, नौरादेही होशंगाबाद, ग्वालियर, छतरपुर उत्तर बैतूल और वन विकास निगम में क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए कैंपा फंड से 839.88 करोड़ के लगभग खर्च किए गए। कैंपा फंड से खर्च किए गए राशि का विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट केवल 17 वन मंडलों में की। यानी कैग ने कुल 63 वन मंडलों में से केवल 17 वन मण्डलों में किए गए ऑडिट में 364.83 करोड़ रुपए की उपयोगिता पर सवाल खड़े किए हैं। गंभीर जनक पहलू यह है कि वनीकरण क्षतिपूर्ति के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद वर्ष 2017 और 2019 के बीच प्रदेश में वन घनत्व घटा और खुले वन आवरण क्षेत्र में 1.3% की वृद्धि हुई है। क्षतिपूर्ति वनीकरण के नाम पर हुए पौधारोपण के लिए स्थल के चयन से लेकर वृक्षारोपण तक में गड़बड़ी की गई। रोपित किए गए पौधों की जीवितता का प्रतिशत 75% होना चाहिए था। जबकि कैग ने अपने रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि वनीकरण क्षतिपूर्ति के नाम पर हुए पौधारोपण की जीवतता का प्रतिशत 6 से 60 फीसदी से भी कम पाए गए हैं।वनीकरण के लिए त्रुटिपूर्ण स्थल का चयनप्रतिपूरक वनीकरण के लिए अधिकारियों ने त्रुटिपूर्ण स्थल का चयन किया गया। प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए अनूपपुर, सिंगरौली, होशंगाबाद और दक्षिण शहडोल मैं 18 विभिन्न स्थलों की 875 हेक्टेयर वन भूमि का चयन किया गया। प्रतिवेदन के अनुसार चयनित स्थलों में कैनोपी का घनत्व 40% से अधिक था। जबकि चयनित वृक्षारोपण स्थल की कैनोपी घनत्व 0.1 से 0.4 होनी चाहिए थी। अपने प्रतिवेदन में कैग ने यह भी उल्लेख किया है कि सिंगरौली वन मंडल में 16.40 करोड़ की लागत से आठ स्थानों पर वृक्षारोपण के लिए स्वीकृति दी गई थी। चयनित स्थान में या तो घने जंगल थे या अन्य योजनाओं के तहत वृक्षारोपण किया गया था। यानी 17 करोड़ से अधिक राशि का निष्फल व्यय किए गए। यानी राजस्व हानि हुई है।लक्ष्य के विरुद्ध वृक्षारोपण में कमीप्रतिवेदन में यह अभी कहा है कि ऑडिट टीम ने पाया कि तीन मंडलों में 5 का परियोजनाओं में 201.08 हेक्टयर के क्षेत्र में वृक्षारोपण के लिए डीपीआर तैयार किए गए थे। मानकों के अनुसार न्यूनतम 3,02,363 रुपए जाने थे जबकि वन मंडलों ने केवल 2 लाख 31 हजार 90 पौधे रोपे। यानी 71273 पौधों कम रोपे गए। यह महज एक उदाहरण है। लेखा परीक्षा ने पाया कि अनूपपुर उत्तर सागर और ग्वालियर वन मंडलों में प्रतिपूरक वनीकरण की पांच वृक्षारोपण स्थलों का 2010 11 से 2014-15 के बीच शुरू किया गया था। रोपे गए 2,79, 790 में से केवल 1 लाख 2 हजार 320 ही बच पाए।कैम्पा के तहत अपात्र गतिविधियों पर व्ययलेखा परीक्षा ने कैंपा के अभिलेखों में पाया कि 163.83 करोड़ की धनराशि विभिन्न गतिविधियों के लिए स्वीकृत की गई थी, जिसमें से 53.29 करोड़ की राशि अप्रैल 17 से मार्च 2020 की अवधि में अपात्र गतिविधियों पर खर्च कर दी गई। जबकि इस पर खर्च नहीं किया जाना था। कैग ने सरकार की उत्तर को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह कैंपा फंड के संबंध में जारी किए गए दिशा- निर्देशों की अवहेलना है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में अनुभूति कार्यक्रम पर 5.88 करोड़, वन भवन निर्माण के लिए 20 करोड़, कृषि समृद्धि योजना पर 20 करोड़, रेंजर और राज्य वन सेवा के अधिकारियों के प्रशिक्षण पर 5.94 करोड़, वन स्टाफ के प्रशिक्षण पर 4.87 करोड़, और एस एफआरआई के अनुसंधान गतिविधि पर खर्च किए गए 4 करोड़ 59 लख रुपए को अनियमित बताया। यानी कैम्पा फंड में पदस्थ रहे पीसीसीएफ एमके सपरा और एबी गुप्ता ने अंधा बांटे रेवड़ी चिन्ह -चिन्ह कर देत,की तर्ज पर फंड वितरित किए। मौजूदा पीसीसीएफ कैम्पा महेंद्र सिंह धाकड़ भी इसी तर्ज पर फंड रिलीज करते आ रहे हैं।

वन विभाग टीम को मिली बड़ी कामयाबी: ट्रक में ले जा रहे थे अवैध लकड़ी, जब्त

Forest department team got big success: Illegal wood was being transported in truck, seized

Forest department team got big success: Illegal wood was being transported in truck, seized सोनकच्छ । वन विभाग ने बुधवार शाम देवास-भोपाल स्टेट हाइवे पर अवैध लकड़ी का परिवहन करते हुए एक ट्रक जब्त किया है। वन विभाग के परिक्षेत्र सहायक सुनील मालवीय ने बताया कि मुखबिर की सूचना पर बुधवार शाम करीब 5.30 बजे देवास-भोपाल हाइवे पर कराड़िया फाटे के पास खड़े ट्रक (एमपी-15, जी-1926) की तलाशी लेने पर उसमें गिली लकड़ी भरी हुई थी। चालक से जब लकड़ी परिवहन के दस्तावेज मांगे तो उसके पास कोई दस्तावेज नहीं थे और न ही उसने कोई जानकारी दी। इसके बाद ट्रक को दौलतपुर रेस्ट हाऊस ले जाकर खड़ा किया। परिक्षेत्र सहायक मालवीय ने ट्रक की तिरपाल हटाकर देखा तो उसमें ऊपर के हिस्से में गिली लकड़ी के गुटके भरे दिखे। ट्रक चालक व मालिक सद्धाम पिता मुबारिक निवासी देवास को हिरासत में लिया। लकड़ी से भरा ट्रक जब्त कर पंचनामा बनाया गया है। इधर, मामले में कुछ लकड़ी माफिया ने ले-देकर मामले को रफादफा करना चाहा था, लेकिन मीडिया के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई की गई। कार्रवाई में वन विभाग के गोपालसिंह सैंधव, कृष्ण भूरिया आदि का सहयोग रहा। सूत्रों के मुताबिक जब्त लकड़ी देवास के फिरोज खान की बताई जा रही है। अब देखना यह है कि नियम विरुद्ध जब्त वाहन व अवैध लकड़ी के परिवहन को लेकर वरिष्ठ अधिकारी कोई सख्त कार्रवाई करेंगे या फिर हमेशा की तरह ले-देकर मामले को रफादफा कर देंगे।

पक्षियों को मौसम की मार से बचाने जबलपुर में वन विभाग घर-घर रखवाएगा ‘घरौंदा’

Forest Department will arrange 'Gharaunda' in every house in Jabalpur to protect the birds from the weather.

Forest Department will arrange ‘Gharaunda’ in every house in Jabalpur to protect the birds from the weather. जीतेन्द्र श्रीवास्तव ( विशेष संवाददाता )जबलपुर । गर्मी, सर्दी और वर्षा, तूफान का मौसम बेजुबान पक्षियों के लिए खतरा बन जाते हैं। वर्तमान में वर्षा का मौसम है ऐसे में पक्षियों के घरौंदे सुरक्षित नहीं है। घरौंदा बनवाने जबलपुर आरा मिल एसोसिएशन का सहयोग लिया है, जो लकड़ी के ऐसे घरौंदे बनवा कर वन विभाग को मुहैया करवा रहा जो घरों में आसानी से वृक्षों में टांगे जा सके। वन मंडल अधिकारी की पहलजबलपुर वन मंडल अधिकारी की इस पहल को ‘घरौंदा’ अभियान का नाम दिया गया है। पहले चरण में तीन हजार घरौंदे घरों में रखवाएं जाएंगे और ये कारगार साबित हुआ तो अगले चरण में सभी घरों में रखवाए जाएंगे। फिलहाल वन विभाग ने ऐसे 200 घरौंदे नागरिकों को वितरित भी किए हैं। अक्सर उजड़ जाते हैं आशियानेपक्षियों के लिए घरौंदा बनाने और निश्शुल्क वितरण के इस नवाचार पर वन मंडल अधिकरी जबलपुर ऋषि मिश्रा बताते हैं कि अक्सर देखा गया है कि पक्षी बड़ी मेहनत से घरौंदे बनाते हैं जो ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाते अक्सर उजड़ जाते है या उजाड़ दिए जाते हैं। लोग अज्ञानवता वश उन्हें हटा देते हैंपक्षी बिजली के पोल, ट्रांसफार्मर, घरों में एयर कंडिशनर के बाहर लगे केबल व उपकरणों सहित अन्य जगहों पर घरौंदा बना लेते हैं, कई लोग अज्ञानवता वश उन्हें हटा देते हैं। कई बार घरौंदों में पक्षियों के अंडे और चूजे भी गिरकर नष्ट हो जाते हैं। पक्षी नहीं कर पाते अपना संरक्षरणइंसान तो हर मौसम परिस्थितियों में अपना संरक्षरण कर सकता है पर बेजुबान पक्षी नहीं कर पाते। इसे ध्यान में रखते हुए पक्षियों के लिए घरौंदा अभियान शुरू करने का विचार आया और कार्ययोजना तैयार कर आरामिल एसोसिएशन के पदाधिकारियों से चर्चा की गई। घरौंदा बनाकर उपलब्ध कराने का निर्णयकार्ययोजना का स्वीकार कर घरौंदा बनाकर उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। अब तक 200 से ज्यादा घरौंदे बनाकर नागरिकों को निश्शुल्क वितरित किए जा चुके है। उद्देश्य तीन हजार घरौंदे वितरण का है। तो उन्होंने घरौंदों के निर्माण का प्रस्ताव मजबूत है लकड़ी के घरौंदेआरामिल एसोसिएशन द्वारा जो घरौंदे वन विभाग को तैयार कर दिए गए हैं वे प्लाइबोर्ड या प्लास्टिक के नहीं हैं, बल्कि ठोस लकड़ी से बने हैं और दो प्रकार की आकृतियों में हैं। पहली आकृति त्रिकोण है और दूसरी आकृति चौकोर। जो काफी मजबूत है। दाना-पानी देने किया जा रहा प्रेरितवन विभाग के कर्मचारियों द्वारा शहर व आस-पासके क्षेत्रों में पक्षियों के संरक्षण के लिए न सिर्फ घरौंदों का वितरण कर उन्हें घरों में सुरक्षित जगह रखवाया जा रहा बल्कि नागरिकों से घरौंदों में पक्षियों के लिए दाना-पानी भी उपलब्ध कराने के लिए जागरूक व प्रेरित किया जा रहा है। यदि प्रयास सफल रहा तो वन मंडल परिक्षेत्रों में अन्य संगठनों के सहयोग से ऐसे घरौंदे बनवाएं और रखवाएं जाएंगे।

एक दशक से सक्रिय सिंडीकेट पर वन बल प्रमुख का चोट, पूर्व में किए गए टेंडर निरस्त करने के आदेश

Forest Force chief hits out at syndicate active for a decade, orders to cancel tenders made earlier

Forest Force chief hits out at syndicate active for a decade, orders to cancel tenders made earlier उदित नारायण भोपाल। वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव ने डीएफओ-सीएफ और सप्लायर्स के बीच बने सिंडीकेट को तोड़ने की मंशा से कड़ा फैसला लिया है। वन बल प्रमुख ने बुधवार को एक आदेश जारी कर फील्ड के अफसरों को सख्त निर्देश दिए हैं कि टेंडर की नई शर्ते बनने तक पूर्व में किए गए खरीदी संबंधित निविदाएं निरस्त किए जाएं। यही नहीं, विभाग के मुखिया ने खरीदी के कारोबार में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की मंशा से पूरे प्रदेश में एक समान शर्तें लागू करने के लिए कमेटी बना दी है। इसके पहले भी श्रीवास्तव ने एक आदेश जारी कर सभी टेंडर विभागीय वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि इस निर्देश का पालन कई डीएफओ नहीं कर रहे हैं।  जंगल महकमेमें एक दशक से अधिक समय से फील्ड के अफसरों और सप्लायर्स के बीच एक सिंडीकेट बना हुआ है। इस सिंडीकेट को अभी तक कोई तोड़ नहीं पाया। सिंडीकेट से जुड़े 10 -12 बड़े सप्लाययर्स ही वन विभाग में हर वित्तीय वर्ष में 90-100 करोड़ के करोड़ के कारोबार करते आएं है। उनके इस कारोबारी साम्राज्य में कोई और घुसपैठ न कर सके, इसके लिए फील्ड के अफसर से खरीदी संबंधित निविदाओं में नई-नई शर्तों जुड़वाते आ रहे थे। इन निविदाओं की जानकारी भी उन्हें ही लगती थी, जो सिंडीकेट से जुड़े होते हैं। वन बल प्रमुख बनने के बाद से असीम श्रीवास्तव को लगातार शिकायतें मिल रही थी कि टेरिटोरियल में बैठे डीएफओ और सीएफ कमीशन बाजी का खेल खेलने के लिए मनमानी शर्तें जोड़ रहे हैं। इसके कारण मध्य और लघु कारोबारी प्रतिस्पर्धा से बाहर होते जा रहे हैं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए सबसे पहले वन बल प्रमुख ने एक आदेश जारी किया जिसमें सभी को निर्देशित किया है कि निविदा चाहे जेम (Gem) के जरिये हो या फिर अखबार में प्रकाशित की गई हो, उन्हें विभाग के साइट पर भी अपलोड कराया जाएं। हालांकि इस आदेश के बाद मॉनिटरिंग की व्यवस्था मुख्यालय स्तर पर नहीं की गई है जिसके कारण डीएफओ और सीएफ अभी भी नफरमानी कर रहे हैं। लेकिन 14 अगस्त को जारी आदेश से सिंडीकेट से जुड़े अधिकारियों और सप्लायर्स में हड़कंप है।  क्या क्या खरीदी होती है वन विभाग में हर साल चैनलिंक, वायरवेड, टिम्बर पोल्स, रूट ट्रेनर्स, मिट्टी, गोबर एवं रासायनिक खाद की खरीदी में बड़े पैमाने पर खरीदी होती है। सबसे अधिक खरीदी कैंपा फंड से की जा रही है। इसके अलावा विकास और सामाजिक वानिकी (अनुसंधान एवं विस्तार ) शाखा से भी खरीदी होती है। विभाग के उच्च स्तरीय सूत्रों की माने तो कुल रिलीज बजट की 18 से 20% धनराशि कमीशन के रूप में टॉप -टू – बॉटम बंटती है। यानि सप्लायर्स को हर साल लगभग 10-12 करोड़ कमीशन में बांटने पड़ते हैं।  चहेती फर्म को उपकृत करने जोड़ देते हैं ये शर्तें राजनीतिक दबाव में बदल दी जाती है शर्तें मैनेजमेंट कोटे से फील्ड में पदस्थ हुए आईएफएस अधिकारी राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाते हैं। इसके बाद सिंडीकेट से जुड़े आईएफएस अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए सप्लायर्स के अनुसार शर्तें जोड़-घटा कर कमीशनबाजी के खेल से जुड़ हैं। इस खेल में उन्हें तब अफसोस होने लगता है जब उनके खिलाफ जांच शुरू होने हो जाती है। इसी खेल से जुड़े तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान अवर सचिव वन अनुराग कुमार के खिलाफ लोकायुक्त संगठन कर रहा है। बालाघाट मुख्य वन संरक्षक अरविंद प्रताप सिंह सेंगर के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है। सूत्रों की माने तो एक दर्जन से अधिक डीएफओ के खिलाफ शिकायतें विभागीय विजिलेंस में लंबित है।  सीनियर अधिकारियों ने की है तारीफ  वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव द्वारा बुधवार को किए गए आदेश की तारीफ की है। एक सीनियर अधिकारी ने कहा है कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और लघु एवं मध्यम कारोबारी भी प्रतिस्पर्धा से जुड़ जाएंगे। यही राज्य शासन की भी मंशा है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के एक अधिकारी का कहना है कि फील्ड के अधिकारी अनावश्यक जांच और सप्लायर्स के  दबाव से मुक्त रहेंगे।

वन भवन की अनोखी पहल, बनाया बीज बैंक

A unique initiative of Van Bhavan, created a seed bank

A unique initiative of Van Bhavan, created a seed bank उदित नारायण बीज बैंक स्थापना एक ऐतिहासिक पहल है. वन विभाग के समस्त स्टाफ तक एक मैसेज पास कर देंगे तो बहुत बड़ा काम हो जाएगा.  इस तरह है वन भवन में स्थापित बीज बैंक में करोडो बीज जुटाने में सफल हो जायेंगे  कृपया  वन भवन  स्टाफ अपने घरों में आने वाले सभी फलों के बिजों को गुठलियों को कचरे में ना फेंके उन्हें धोकर सुखाकर पॉलिथीन में पैक करके वन भवन में बीज बैंक के बॉक्स में दान करें.  सांसें हो रही हैं कम आओ वृक्ष लगाएं हम

चैनलिंक, बारवेड वायर और पोल्स की 60 करोड़ की खरीदारी में कमीशनबाजी बंट जाते हैं 12 करोड़

12 crore commission is divided in the purchase of 60 crores of chainlink, barbed wire and poles.

12 crore commission is divided in the purchase of 60 crores of chainlink, barbed wire and poles. उदित नारायणभोपाल ! चालू वित्त वर्ष में जंगल महकमे में करीब 50 से 60 करोड़ रूपए की चैनलिंक, बारवेड वायर और टिम्बर पोल्स की खरीदी में बड़े पैमाने पर कमीशन बाजी का खेल खेला जा रहा है। सबसे अधिक खरीदी कैंपा फंड से की जा रही है। इसके अलावा विकास और सामाजिक वानिकी (अनुसंधान एवं विस्तार ) शाखा से भी खरीदी होती है। विभाग के उच्च स्तरीय सूत्रों की माने तो कुल रिलीज बजट की 18 से 20% धनराशि कमीशन के रूप में टॉप -टू – बॉटम बंटती है। यानि सप्लायर्स को हर साल लगभग 10-12 करोड़ कमीशन में बांटने पड़ते हैं। दिलचस्प पहलू यह है कमीशन में अधिक हिस्सेदारी न बढ़े, इसके लिए प्रोटेक्शन शाखा से बंटने वाली राशि भी अब कैंपा शाखा से बंटने लगी है। जबकि पूर्व में विभाग में परम्परा रही है कि फायर लाइन से लेकर मोबाइल, वायरलेस, वाहन आदि से समन्धित बजट प्रोटेक्शन शाखा से बंटता रहा है।मुख्यालय से सबसे अधिक फंड कैंपा शाखा से रिलीज किया जाता है। इसके बाद सामाजिक वानिकी और विकास शाखा से भी करोड़ों की धनराशि वन मंडलों को दिया जाता है। तीनों शाखाओं को मिलाकर हर वन मंडल को 5 से 7 करोड़ रूपए की राशि हर साल खरीदी के लिए रिलीज किया जा रहा है। चैनलिंक जाली, बारवेड वायर, टिम्बर पोल्स, रूट ट्रेनर्स, मिट्टी और गोबर एवं रासायनिक खाद वगैरह की खरीदी की जाती है। इस खरीदी में 15 से 18 फीसदी तक राशि कमीशन बाजी में बंटती है। इस खेल को रोकने के लिए पूर्व वन मंत्री विजय शाह ने ग्लोबल टेंडर बुलाने की पहल की थी किंतु मैदानी अफसरों के विरोध के चलते वे अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाए थे। इसकी मुख्य वजह यह है कि मुख्यालय से लेकर मैदानी अमले का नेक्सस से सीधा रिश्ता है। गौरतलब यह भी है कि मुख्यालय से विभिन्न शाखों द्वारा फंड रिलीज करने का कोई निर्धारित मापदंड नहीं है। चेहरा देखकर फंड वितरित किया जा रहा है। इस फार्मूले का उपयोग सबसे अधिक कैम्पा फंड में किया जा रहा है। अनूपपुर वन मंडल में तीन रेंज है जहां कैंपा फंड से फायर प्रोटक्शन के 24 लाख रुपए रिलीज किए गए। वहीं उत्तर शहडोल वन मंडल में बड़े जंगल हैं, उसके लिए कैम्पा शाखा से मात्र 14 लाख रूपये दिए गए। इसी प्रकार सिंगरौली में तीन रेंज है वहां 36 लाख और नरसिंहपुर वन मंडल के लिए मात्र ₹1200000 दिए। यह असमानता इसलिए है कि कैंपा पीसीसीएफ अपनी मनमर्जी के अनुसार डीएफओ को फंड डिलीट कर रहे हैं। जबकि संरक्षण शाखा फायर प्रोटक्शन के लिए वार्षिक एप्सन प्लान तैयार करता है। पीसीसीएफ डॉ दिलीप कुमार का कहना है कि कैंपा से फंड संरक्षण शाखा को ट्रांसफर होनी चाहिए और उसके बाद संरक्षण शाखा ही डीएफओ को अपने एक्शन प्लान के अनुसार बजट रिलीज करें।इसके कारण गड़बड़ी की आशंका बढ़ती जा रही है। सरकार के निर्देशों की अवहेलना राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश है कि वायरवेट, चैनलिंक और पोल की खरीदी में लघु उद्योग निगम को प्राथमिकता दें किंतु 95% खरीदी जेम्स और ई टेंडर से हो रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लघु उद्योग निगम की दर और जेम (GEM) की दरों में डेढ़ गुना अंतर है। यानी लघु उद्योग निगम में वायरवेट कि दर 83 रुपए से लेकर 85 रुपए तक निर्धारित की गई है। जबकि जेम (GEM) में ₹150 तक है। सरकार की मंशा यह भी है कि लघु और मध्यम उद्यमियों को इस कारोबार से जोड़ा जाए। मुख्यालय से लेकर फील्ड के अफसर टेंडर की शर्तों में ऐसी शर्ते जुडवा देते हैं जिसके चलते लघु और मध्यम उद्यमी प्रतिस्पर्धा की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। सरकार के अन्य विभाग में टेंडर विभागीय वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाती है किंतु वन विभाग में या परंपरा नहीं है। प्रतिस्पर्धियों का कहना है कि सभी डीएफओ को अपने वन मंडल के प्रत्येक टेंडर विभागीय वेबसाइट पर अपलोड करें। चहेती फर्म को उपकृत करने जोड़ देते हैं नई शर्तें फंड बंटवारे को लेकर दो अफसर भिड़ चुके विभाग में फंड बंटवारे को लेकर दो सीनियर अधिकारी भिड़ चुके हैं। पीसीसीएफ कैंपा महेंद्र सिंह धाकड़ की पदस्थापना के पहले तक फॉरेस्ट प्रोटक्शन को लेकर कैंपा से फंड संरक्षण शाखा को रिलीज किया जाता था और फिर संरक्षण शाखा डीएफओ की मांग के आधार पर वितरित करता था। धाकड़ ने इस परंपरा को बदल दिया। अब वह प्रोटेक्शन की राशि भी स्वयं जारी करते हैं। पूर्व में पीसीसीएफ प्रोटेक्शन रहे अजीत श्रीवास्तव ने इसका पुरजोर विरोध किया था और तीखा पत्र भी लिखा था, लेकिन बात नहीं बनी। मुद्दे को लेकर एक बैठक में तो दोनों के बीच तीखी बहस भी हुई पर तत्कालीन वन बल प्रमुख आरके गुप्ता ने पीसीसीएफ कैंपा धाकड़ का साथ दिया। हालांकि अजीत श्रीवास्तव जल्द ही रिटायर हो गए। मौजूदा पीसीसीएफ प्रोटेक्शन डॉ दिलीप कुमार किंकर्तव्यविमुढ़ की स्थिति में है और वह सेवानिवृत्ति के दिन गिन रहे हैं। विभाग में चर्चा है कि पीसीसीएफ कैंपा महेन्द्र धाकड़ फाइनेंस कंपनी की तरह फंड रिलीज़ करते हैं। वे तो एक उच्च स्तरीय बैठक में यहां तक कह चुके हैं कि कैम्पा शाखा स्वायत्त संस्था है। ब्लैक लिस्ट फर्म कर रही हैं अभी भी धंधा वन विभाग में अलग-अलग वन मंडलों में कई फर्म को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया है। इसके बाद भी ब्लैक लिस्ट फर्म अपने राजनीतिक रसूख के दम पर सामग्री की सप्लाई कर रही हैं। इसकी वजह भी साफ है कि वन विभाग में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है, जहां ब्लैक लिस्ट की गई फर्म को अन्य वन मंडलों में मैसेज कर धंधा करने से रोका जाए। वैसे पीडब्ल्यूडी जल संसाधन और अन्य विभागों में ऐसी व्यवस्था है कि ब्लैक लिस्ट फर्म की सूची बनाकर मैदानी अफसरों को भेजा जाता है और उन्हें निर्देशित किया जाता है कि इनसे कोई भी वर्क आर्डर न दिया जाए। कमीशन बाजी के खेल में प्रमुख संस्थाएं प्रखर इंटरप्राइजेज इंदौर, तिरुपति इंजीनियरिंग वर्क बालाघाट, जबलपुर वायरस जबलपुर, श्री विनायक स्टील इंदौर, राजपूत फेसिंग पोल भोपाल, अरिहंत मेटल (नाहटा), लकी इंडस्ट्रीज इंदौर, आकांक्षा इंडस्ट्रीज विदिशा, नवकार … Read more

पन्ना के किशनगढ़ बफर में मिश्रित वृक्षारोपण के पहले ही वर्ष गायब होने लगे पौधे

Plants started disappearing in the very first year of mixed plantation in Panna's Kishangarh buffer.

Plants started disappearing in the very first year of mixed plantation in Panna’s Kishangarh buffer. भोपाल। पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन की किशनगढ़ रेंज के तहत 50 हैक्टेयर रकबा में 25 हजार पौधों का रोपण किया गया है। इस पौध रोपण पर प्रति एकड़ करीब 2 लाख रुपए खर्च किए जा रहा हैं। इसमें पहले साल के लिए स्वीकृत राशि खर्च कर दी गई है। इसके बावजूद रोपे गए ज्यादातर पौधे एक साल में ही गायब हो गए हैं।बफर जोन की किशनगढ़ रेंज के तहत राईपुरा बीट के कक्ष क्रमांक पी- 454 के तहत 50 हैक्टेयर में पौधरोपण किया जा रहा है। मि​श्रित वृ​क्षारोपण योजना के तहत वर्ष 2023-24 में गड्‌ढा करके 25 हजार पौधों का रोपण किया गया है। स्वीकृत परियोजना के तहत इन पौधों के रखरखाव के नाम पर 10 सालों तक राशि खर्च की जाना है, लेकिन इनमें से ज्यादातर पौधे पहले साल में ही खराब हो गए हैं। तार फेंसिंग निकालकर खकरी बनाने के नाम पर राशि का दुरुपयोग :जिस स्थान पर प्लांटेशन को मंजूर किया गया है। उस स्थान पर विभाग ने अन्य प्रोजेक्ट के तहत तार फेंसिंग करके राशि को खर्च किया। इसके बाद उसी स्थान पर अब पत्थरों की नई खकरी बना दी गई है। इस कारण तार फेंसिंग को निकालकर फेंक दिया गया है अब भी तार मौके पर पड़े हुए हैं। 600 मीटर लंबाई में खकरी बनाकर राशि को बर्बाद किया गया है। इनका कहना 25000 गड्‌ढों की गिनती करने के बाद पौधों का रोपण किया गया है। परियोजना में तार फेंसिंग और पत्थरों की खकरी दोनों स्वीकृत हैं। इसी कारण पुरानी तार फेंसिंग को हटाकर पत्थरों की खकरी को बनाया गया है।प्रतीक अग्रवाल, रेंजर बफर जोन किशनगढ़ रेंज राईपुरा बीट की परियोजना 10 साल के लिए स्वीकृत है। पहले साल में 20 फीसदी पौध सूख सकते हैं। इसके लिए दूसरे साल में बजट रखा गया है। पौधों की गिनती कराई जाएगी। इसमें बड़बड़ी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।अंजना सुचिता तिर्की, फील्ड डायरेक्टर, पन्ना टाइगर रिजर्व

कटनी के झिन्ना की खदान का वन भूमि प्रकरण में कंसोटिया के आदेश को वर्णवाल ने बदला

Varnwal changed the order of Consotiya in the forest land issue of Jhinna mine of Katni.

Varnwal changed the order of Consotiya in the forest land issue of Jhinna mine of Katni. भोपाल। अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल ने पूर्व एसीएस वन जेएन कंसोटिया के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें कटनी जिले की तहसील ढीमरखेड़ा के ग्राम झिन्ना की खदान के मामले में सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस लेने का आदेश दिया था। अपने आदेश को तत्काल अमल में लाने के लिए कंसोटिया ने बाकायदा डीएफओ कटनी को कारण बताओं नोटिस की तलब किया था। यहां यह भी तथ्य उल्लेखनीय है कि जब वर्णवाल प्रमुख सचिव वन थे तब उन्होंने भी एसएलपी वापस लेने का आदेश जारी किया था। अब वही बता सकते है कि वे तब सही थे या फिर अब..? गत दिवस वन विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने वन मुख्यालय को निर्देश दिये हैं कि यदि यह केस अब तक वापस नहीं लिया गया है तो केस वापस लेने की कार्रवाई आगामी आदेश तक रोक दी जाये। वर्णवाल के आदेश के बाद जंगल महकमे में लाख टके का सवाल उठ रहा है कि आखिर किस अदृश्य शक्ति के दबाव में आकर पूर्व एसीएस कंसोटिया ने एसएलपी वापस लेने का आदेश जारी किया था। एसएलपी वापस लेने संबंधित आदेश जारी करने के पूर्व 13 अक्टूबर 23 को अपर मुख्य सचिव वन कंसोटिया की अध्यक्षता में एक विशेष बैठक बुलाई गई थी। बैठक में अतुल कुमार मिश्रा सचिव वन, अशोक कुमार पदेन सचिव, आरके गुप्ता तत्कालीन वन बल प्रमुख, अतुल कुमार श्रीवास्तव तत्कालीन पीसीसीएफ वर्किंग प्लान और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक भू अभिलेख डॉ वीएस अन्नागिरी भी उपस्थित थे। यह बैठक में ग्राम झिन्ना एवं हरैया तहसील ढीमरखेड़ा जिला कटनी में स्वीकृत खनिज पट्टे विवाह के निराकरण के लिए बुलाई गई थी। उल्लेखनीय है कि उक्त खदान के वन भूमि में आने के कारण इस पर रोक लगाई गई थी परन्तु खदान स्वामी हाईकोर्ट से जीत गया था जिस पर वन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में 2017 से लंबित है मामला क्या है मामला-शिकायती पत्र के मुताबिक, कटनी के खनन कारोबारी आनंद गोयनका मेसर्स सुखदेव प्रसाद गोयनका को मध्य प्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सरकार के कार्यकाल में 1994 से 2014 तक की अवधि के लिए 48.562 हेक्टेयर भूमि पर खनिज करने का पट्टा मिला था। खनिज पट्टा आवंटित होने की पीछे भी बहुत कुछ छिपा है। दरअसल मध्य प्रदेश शासन ने ग्राम झिन्ना तहसील ढीमरखेड़ा जिला कटनी के वन क्षेत्र की 48.562 हेक्टेयर भूमि पुराना खसरा नम्बर 310, 311, 313, 314/1, 314/2, 315, 316, 317, 318, 265, 320 में खनिज के लिए एक अप्रैल 1991 में 1994 से लेकर 2014 तक की अवधि के लिए निमेष बजाज के पक्ष में खनिज पट्टा स्वीकृत किया था। जिसे वर्ष 1999 में मध्य प्रदेश शासन के खनिज विभाग के आदेश से 13 जनवरी 1999 को उक्त खनिज पट्टा मेसर्स सुखदेव प्रसाद गोयनका प्रोप्राइटर आनंद गोयनका के पक्ष में हस्तांतरित किया गया। लेकिन साल 2000 में वन मंडल अधिकारी कटनी के पत्र के आधार पर कलेक्टर कटनी ने आदेश पारित कर लेटेराइट फायर क्ले और अन्य खनिज के खनन पर रोक लगा दी थी। वन भूमि का इतिहास-ग्राम झिन्ना की भूमि जमींदारी उन्मूलन के बाद वन विभाग को वर्ष 1955 में 774.05 एकड़ भूमि प्रबंधन में मिली थी। जो वर्ष 1908-09 से 1948-49 तक जमींदार रायबहादुर खजांची, बिहारी लाल व अन्य के नाम दर्ज थी जिसे 10 जुलाई 1958 की सूचना और एक अगस्त 1958 की प्रकाशन तिथि से संरक्षित वन घोषित किया गया। इसके बाद भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 4 की अधिसूचना क्रमांक डी-3390-3415-07-दस-3 दिनांक 24 सितम्बर 2007 प्रकाशन दिनांक 14 दिसम्बर 2007 से वनमंडल झिन्ना के अंतर्गत ग्राम झिन्ना के खसरा नम्बर 304, 333, 320 में कुल रकबा 153.60 एकड़ क्षेत्र अधिसूचित कर एसडीएम ढीमरखेड़ा को वन व्यवस्थापन अधिकारी नियुक्त किया गया जो कि वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है। वर्ष 2019-19 में एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा राजस्व प्रकरण क्रमांक /01अ-19(4)/2018-19 में पारित आदेश दिनांक 18-9-2019 के अंतर्गत उल्लेख किया गया कि वादग्रस्त भूमि खसरा नम्बर 320 वर्ष 1906 से 1951 तक मालगुजारी की जमीन नहीं थी। एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेश दिनांक 18-07-2008, 18-10-2011 और 18-09-2019 को पारित प्रत्येक आदेश में उक्त भूमि को वन भूमि मानने से इंकार किया। जिसे कलेक्टर कटनी द्वारा अपने आदेश दिनांक 4-मार्च 2010, 19-मार्च -2013 और 19-दिसम्बर -2019 के माध्यम से एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेशों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई गई है।

कूनों में बच्चों संग बारिश का आनंद लेती दिखी चीता गामिनी, केंद्रीय मंत्री ने शेयर किया वीडियो

Cheetah Gamini was seen enjoying the rain with children in the pond, Union Minister shared the video

Cheetah Gamini was seen enjoying the rain with children in the pond, Union Minister shared the video

मंत्री ने ठेकेदारी प्रथा जुलाई तक स्थगित करने  लिखी नोटशीट, एसीएस लागू करने पर अड़े

Minister wrote a note sheet to suspend the contracting system till July

Minister wrote a note sheet to suspend the contracting system till July, but is adamant on implementing ACS भोपाल। वन मंत्री नागर सिंह चौहान ने अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया के ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश को 31 जुलाई तक स्थगित करने के लिए नोटशीट लिखी है। यानी ठेकेदारी प्रथा को लेकर मंत्री और विभागीय अफसर एक तरफ हो गए हैं और एसीएस अकेले पड़ते दिखाई दे रहें है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने वन विभाग में चली आ रही परंपरा के अनुसार ही कराई जाने की वकालत करते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखा है।  वृक्षारोपण के कार्य निकट आ गए हैं। इस बात को लेकर की वानिकी कार्य ठेके से कराए जाएंगे अथवा वन विभाग करेगा, इसको लेकर अभी असमंजस की स्थिति है। जंगल महकमे के मुख्यालय में पदस्थ सीनियर आईएफएस अधिकारी से लेकर मैदानी अमला तक अपने मंत्री के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है। दरअसल, मंत्री चौहान ने अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया के ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश को वन मंत्री नागर सिंह चौहान ने 31 जुलाई तक स्थगित करने के लिए नोटशीट लिखी है। वन विभाग के सीनियर अधिकारियों का एक ग्रुप अपने मंत्री से मुलाक़ात कर ठेके से वानिकी कार्य कराए जाने के दुष्परिणामों से अवगत कराएगा। साथ ही उनसे यह भी मांग करेगा कि  जिन राज्यों में यह प्रथा लागू है, वहां का अध्ययन करने के बाद ही इस पर निर्णय ले। यदि जरुरी हो तो उसे पहले पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ वन मण्डलों में किया जाय। उसके बाद गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाय।  जंगलों में ठेकेदारी प्रथा लागू न करने का आग्रह  वन विभाग के कर्मचारी संगठन लगातार एक्स कि उसे फरमान का विरोध करते आ रहे हैं, जिसमें वानिकी कार्य ठेके पर कराने का आदेश जारी किया गया। लोकसभा चुनाव के दौरान लखनादौन के चुनावी सभा में पांच समितियों के पदाधिकारी जनप्रतिनिधियों ने भी मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर जंगल में ठेकेदारी प्रथा लागू न करने का आग्रह किया है। बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने समितियां के पदाधिकार को आश्वासन भी दिया था। इसके अलावा पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने भी मुख्यमंत्री मोहन यादव को जंगल में ठेकेदारी प्रथा लागू नहीं करने का आग्रह किया है। डॉ सिंह ने आशंका की है कि एक्स के आदेश का अच्छा सा पालन किया जाता है तो आवेश शिकार और जंगलों की कटाई संबंधित अपराध बढ़ जाएंगे।  अभी तक नहीं बन पाए नियम और शर्तें ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास) यूके सुबुद्धि को नियम और शर्तें बनानी थी। समाचार लिखे जाने तक नियम और सरसों का ड्राफ्ट नहीं बन पाया है। ऐसी स्थिति इसलिए भी निर्मित हुई, क्योंकि अधिकारियों को वन मंत्री चौहान की मंशा का पता चला कि वह भी वानिकी कार्य ठेके पर कराए जाने के पक्ष में नहीं है। मंत्री ने एसीएस के आदेश को जुलाई तक  स्थगित करने के लिए कहा है। क्या है एसीएस का फरमान  वन विभाग ने 27 मार्च को एक आदेश जारी कर समस्त वनमंडलों एवं वन्यप्राणी क्षेत्रों में (कोर क्षेत्र छोड़कर) फेंसिंग कार्य, वायरवैड फेंसिंग, चेनलिंक फेंसिंग, पशु अवरोधक खंती एवं पशु अवरोधक दीवार का निर्माण कार्य ठेके पर कराने के निर्देश दिए हैं। आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि 2 लाख से अधिक लागत के समस्त भवन निर्माण एवं मरम्मत कार्य निविदा के जरिए कराया जाए। इसके अलावा नर्सरी में क्षेत्र तैयारी/गढ्‌ढा खुदाई कार्य पौधा रोपण लगवाई एवं अधोसंरचना विकास अंतर्गत पॉली हाउस/मिस्ट चेम्बर का निर्माण के कार्य भी ठेके से कराया जाय।   अधिकारी भी जता चुके है विरोध  प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारियों तक ने एक स्वर में विरोध जताया है। अफसरों का तर्क है कि यह सामुदायिक संसाधन है। स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त होता है और उनका जंगलों से जुड़ाव रहता है। ठेकेदारी लागू होने से वन विभाग में स्थापित इकोसिस्टम ध्वस्त हो जाएगा। विरोध करने वाले अधिकारियों का मानना है ठेकेदार समयबद्धता के साथ काम नहीं कर पाएगा। जंगल महकमा वनग्रामों में रह रहे वनवासियों को रोजगार उपलब्ध कराता है। सुदूर जंगल और नक्सलाइट एरिया में ठेकेदार कैसे काम करेगा, वहां तो विभाग के लोगों से ही काम कराना होगा।  वन ग्रामों से होगा आदिवासियों का पलायन  वन विभाग के नए आदेश के लागू होने पर जंगल क्षेत्र के आसपास रहने वाले गरीब मजदूरों और आदिवासियों खासतौर पर वन ग्रामों के रहवासियों के पलायन की संभावना बढ़ जायगी। इसके अलावा वन विभाग में जो भी काम होते हैं वो एक निश्चित समय-सीमा में स्थानीय मजदूरों और वन क्षेत्र में रहने वाले ट्राइब्स से उनके तकनीकी और कौशलीय ज्ञान और एक्सपीरियंस के आधार पर कराए जाते हैं। ठेके से कराए जाने पर जहां समय-सीमा पर कार्य नहीं हो पाएंगे, वही ठेकेदार अपने मजदूरों और मशीनों से काम कराएगा,  न कि स्थानीय लेबर को रोजगार देगा। इसके अलावा ठेकेदारी प्रथा से लागत बढ़ेगी क्योंकि इसमें ठेकेदार का कमीशन भी जुड़ेगा।  कई सवालों में उलझा है शासन का आदेश  शासन का आदेश गफलत भरा है। इस आदेश मे ब्यापक रूप से त्रुटिंया है। मसलन, आदेश में कहीं उल्लेख नहीं है कि वन विभाग के क्षेत्रिय अमले की क्या भूमिका होगी? वन विभाग इन कार्यो की मनीटरिंग कैसे करेगा ? निविदा से क्रय समग्री का भौतिक सत्यापन कौन करेगा ? निविदा से क्रय सामग्री की क्या गारंटी है कि सामग्री मानकों के आधार पर निविदकार द्धारा प्रदान की गयी सामग्री का तकनीकी परीक्षण किसके द्धारा किया जावेगा ? यदि क्रय सामग्री अमानक स्तर की है तो उसके लिये किसे दोषी ठहराया जायेगा ?  निविदाकार द्धारा प्रदाय की गयी सामग्री पर स्वीकृत आदेश के अनुपात मे नहीं होने पर निविदाकार के बिरूद्ध  इस आर्थिक अनिमियतता के लिये क्या विभागीय कार्यवाही की जावेगी ? उसकी आमानत राशि जप्त की जायेगी या नहीं ?

मनोज अग्रवाल से प्रशासन छिना, अब सचिव द्विवेदी देखेंगे

Administration snatched from Manoj Aggarwal, now Secretary Dwivedi will look after it भोपाल। लघु वनोपज संघ में मंगलवार को बड़ा उलटफेर हुआ। संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने अपर प्रबंध संचालक मनोज अग्रवाल से प्रशासन शाखा ले लिया है। प्रबंध संचालक ठाकुर ने प्रशासन का कार्य सचिव सहकारिता के के द्विवेदी को सौंप दिया है। अब अग्रवाल प्रशासन की जगह एएमडी व्यापार, विधि, समन्वय के साथ आंतरिक अंकेक्षण का कार्य देखेंगे। अभी तक आंतरिक अंकेक्षण का कार्य मुख्य वन संरक्षक एवं कार्यकारी संचालक प्रफुल्ल फुलझेले देखते थे। सूत्रों ने बताया कि पिछले लंबे समय से एएमडी मनोज अग्रवाल ने प्रशासन शाखा से जुड़े कार्य देखना बंद कर दिया था और हर मसले और मुद्दों को एमडी के पास धकेल दिया करते थे। सूत्रों ने यह भी बताया कि अग्रवाल ने फेडरेशन से वन विभाग में लिए जाने का अनुरोध भी किया है।

ओएसडी वन कुमार के खिलाफ जांच से संबंधित दस्तावेज नहीं दे रहे हैं डीएफओ छतरपुर

DFO Chhatarpur is not giving documents related to investigation against OSD Van Kumar भोपाल। तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान ओएसडी वन अनुराग कुमार के खिलाफ वायरबेड और चैनलिंक खरीदी सहित आधा दर्जन से अधिक शिकायतों से संबंधित जांच थम सी गई है। जांच अधिकारी सीएफ कार्य आयोजना अजय कुमार पाण्डेय छतरपुर और वन संरक्षक छतरपुर संजीव झा के बार-बार पत्र लिखने के बावजूद भी मौजूदा डीएफओ छतरपुर दस्तावेज उपलब्ध नहीं दे रहे हैं। कमोवेश ऐसी ही शिकायत लोकायुक्त एसपी सागर की भी है। इसके कारण अनुराग कुमार के विरुद्ध की गई शिकायतों की अब तक शुरू नहीं हो सकी है।जांच अधिकारी एवं वन संरक्षक छतरपुर वर्किंग प्लान अजय कुमार पांडेय ने 27 मार्च को पत्र लिखकर तत्कालीन डीएफओ छतरपुर अनुराग कुमार के खिलाफ कोई विभिन्न शिकायतों से संबंधित दस्तावेज मांगे। पांडेय के पत्र के बाद वन संरक्षक छतरपुर संजीव झा ने अर्थशास्त्र की पत्र लिखकर जांच अधिकारी को समस्त दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए एक से अधिक पत्र लिख चुके हैं किंतु वर्तमान डीएफओ ने उन पत्रों का जवाब देना उचित नहीं समझा है। अनुराग कुमार के खिलाफ शिकायत करने वालों में सेवानिवृत्ति एसडीओ केबी गुप्ता, रुद्र प्रताप सिंह, कर्मचारी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष मुनेंद्र सिंह परिहार समेत 8 लोगों ने शिकायत की है। ये मांगे गए दस्तावेज लोकायुक्त में मामला दर्ज लोकायुक्त संगठन तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान अवर सचिव वन अनुराग कुमार के खिलाफ वायरबेड और चैनलिंक खरीदी में अनियमित किए जाने पर प्रकरण पंजी दर्ज कर लिया है। जांच की जिम्मेदारी एसपी सागर लोकायुक्त को दी गई है। लोकायुक्त संगठन ने वन विभाग को पत्र लिखकर खरीदी से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के बार-बार निर्देश दिए जा रहे है किन्तु विभाग दस्तावेज उपलब्ध कराने में टालमटोल कर रहा है। आईएफएस को बचाने एसडीओ को फंसाया वन विभाग ने मंत्रालय में पदस्थ ओएसडी अनुराग कुमार को बचाने के लिए एसडीओ डॉ कल्पना तिवारी को बलि बकरा बना दिया। यही नहीं, विभाग के शीर्षस्थ अफसरों ने उसको आरोप पत्र जारी कर आईएफएस की दौड़ से बाहर कर दिया गया। मामला तब का है जब वे टीकमगढ़ के प्रभारी डीएफओ हुआ करते थे। चैन लिंक और वायरवेड की खरीदी में प्रमाणकों पर एसडीओ कल्पना तिवारी के हस्ताक्षर बिना डीएफओ अनुराग कुमार ने भुगतान कर दिया था। जब कुमार के खिलाफ गड़बड़ियों को लेकर शिकंजा कसा गया तब कुमार ने डिलीवरी चालान में हस्ताक्षर करने का आधार बनाकर डॉ कल्पना तिवारी को ही आरोपों के कठघरे में खड़ा कर दिया। जबकि प्रमाणक पर एसडीओ के हस्ताक्षर ही नहीं है।

वन बल प्रमुख ने निजी संस्थानों से वर्मी कम्पोस्ट खरीदने पर लगाई रोक

Forest Force Chief bans purchase of vermicompost from private institutions भोपाल। वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव ने वनमंडलों के डीएफओ द्वारा निजी संस्थानों से खरीदे जा रहे वर्मी कम्पोस्ट पर रोक लगा दी है। उन्होंने इस संबंध में निर्देश जारी कर दिये हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि कैंपा फंड से हर वित्तीय वर्ष में 50-60 करोड़ रुपए की अकेले वर्मी कम्पोस्ट, मिट्टी और गोबर खाद की खरीदी निजी फर्मो से खरीदी जाती है। इस खरीदी में 12 से 15% राशि का बंदरबांट किया जाता है। किसी को रोकने के लिए पहली बार वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने यह कदम उठाया है।श्रीवास्तव ने अपने निर्देश में कहा गया है कि कैम्पा मद के अंतर्गत वृक्षारोपणों में वर्मी कम्पोस्ट खाद के उपयोग एवं मिट्टी के क्रय के संबंध में निर्देश जारी किये गये थे। अन्य विभागीय योजनाओं में कुछ वनमंडलाधिकारियों द्वारा क्षेत्र तैयारी के अंतर्गत भारी मात्रा में खाद एवं मिट्टी बदलने का कार्य कराया जा रहा है। साथ ही वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली का भी उपयोग किया जा रहा है। इसलिये अब कैम्पा मद के साथ-साथ विभाग की अन्य योजनाओं के अंतर्गत किये जाने वाले वृक्षारोपण हेतु अच्छी मृदा वाले क्षेत्रों का ही चयन किया जाये, जिससे कि गढ्ढों में मृदा परिर्वतन एवं गोबर खाद मिलाने पर होने वाले बड़े व्यय से बचा जा सके। पूरे वन मण्डल में उपजाऊ मृदा वाले वन क्षेत्र रोपण हेतु उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में ही अन्य क्षेत्र अंतिम विकल्प के रूप में लिया जाये। वन मण्डलाधिकारी स्वयं क्षेत्र का सघन भ्रमण कर यह प्रमाणित करेंगे कि चयनित वन क्षेत्र वृक्षारोपण हेतु उपयुक्त है एवं यह कि यहां खोदे जाने वाले गड्ढों में मिलाने के लिये गोबर खाद क्रय एवं उपजाऊ मिट्टी संग्रहण आवश्यक है। गढ्ढों की जितनी मात्रा में गोबर खाद एवं मिट्टी मिलाना आवश्यक है उसका उल्लेख वन मण्डलाधिकारी प्रमाण पत्र में करेंगे। सीसीएफ से अनुमति होगी अनिवार्य निर्देश में आगे कहा गया है कि यदि गोबर / मिट्टी का क्रय / संग्रहण करना अति आवश्यक हो तो गोबर / मिट्टी क्रय / संग्रहण करने के पूर्व वृत्त के वन सरंक्षक मुख्य वन सरंक्षक से लिखित स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होगा तथा क्रय / संग्रहण पूर्व मुख्यालय को सूचित करना अनिवार्य होगा। अगर वन सरंक्षक / मुख्य वन संरक्षक के पूर्व स्वीकृति तथा मुख्यालय को सूचित किए बिना क्रय / संग्रहण किया जाता है तो यह अनियमितता के श्रेणी में आएगा तथा अनुशासनात्मक कार्यवाही की जावेगी। खाद एवं मिट्टी का संग्रहण मप्र भण्डार कय एवं सेवा उपार्जन नियम के प्रावधानों के अंतर्गत पूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया अपनाकर किया जाये। यह भी विशेष रूप से निर्देशित किया गया है कि सामाजिक वानिकी वृत्तों में वर्मी कम्पोस्ट उपलब्ध हो तो सभी प्रकार के वृक्षारोपण लिए उन्हीं से वर्मी कम्पोस्ट प्राप्त किया जावे, निजी संस्थानों से वर्मी कम्पोस्ट का क्रय कदापि नहीं किया जावे। हाजिरी देने पर मिलती मेंटेनेंस राशि कुछ मैदानी अफसर की शिकायत है कि कैंपा फंड से जारी होने वाली मेंटेनेंस राशि तब तक नहीं मिलती, जब तक कि अधिकारी वन मुख्यालय में हाजिरी देने नहीं आते है। ऐसी शिकायत करने वाले अफसरों का कहना है कि सामाजिक वानिकी शाखा से समय पर मेंटेनेंस राशि जारी हो रही है। इसके लिए फील्ड में पदस्थ अनुसंधान एवं विस्तार के अधिकारियों को बड़े अधिकारियों की परिक्रमा किए बिना ही मेंटेनेंस राशि जारी की जा रही है।

रानी दुर्गावती टाईगर रिजर्व में कल से शुरू होगी गिद्ध गणना

Vulture census will start from tomorrow in Rani Durgavati Tiger Reserve, many species were found in the month of February. वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में सेकेंड फेज के तहत सोमवार से गिद्ध गणना शुरू हो रही है। बता दें कि इसी साल फरवरी माह में गिद्ध गणना हुई थी। यह गणना विश्व व्यापी रूप में हुई थी। जिसमें गिद्धों की प्रजाति के साथ सामन्य वन और अभयारण्य में भी गणना हुई थी। दमोह : प्रदेश के सबसे बड़े वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में सेकेंड फेज के तहत सोमवार से गिद्ध गणना शुरू हो रही है। जबकि फरवरी माह में एक गणना हो चुकी है, जिसमें पिछली गणना की अपेक्षा पांच गुना ज्यादा गिद्ध मिले थे और कल से शुरू हो रही गणना में इनकी संख्या काफी अधिक बड़ने के आसार हैं। इसी साल फरवरी माह में गिद्ध गणना हुई थी। यह गणना विश्व व्यापी रूप में हुई थी। जिसमें गिद्धों की प्रजाति के साथ सामन्य वन और अभयारण्य में भी गणना हुई थी। दोनों मंडलों में तीन दिन गणना के बाद परिणाम अच्छे निकलकर आये थे। यह गणना दो वर्ष बाद हुई थी, इससे पूर्व 2021 में हुई थी। उस समय नौरादेही में गिद्धों की संख्या 300 थी जबकि फरवरी माह में हुई गणना में यह सख्या 1500 से अधिक पहुंच गई थी जो दो साल में पांच गुनी बड़ी थी। यही आलम दमोह के सामन्य वनों में देखने मिला था। सामान्य वन में भी गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी हुई थी। जिस पर वन विभाग के अधिकारियों ने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत से विलुप्त प्रजाति गिद्ध यहां अपना आशियाना बना रही है। बलचर रेस्टोरेंट की होनी थी शुरूआतगिद्ध प्रजाति के बचाव के लिए वन विभाग अनेक तरह के उपाय खोज रहा है। लगभग दो से तीन माह पूर्व नौरादेही के डीएफओ ने एक प्रस्ताव उच्च अधिकारियों को भेजा था, जिसका उद्देश्य विलुप्त प्रजाति गिद्धों की संख्या को नौरादेही में बढ़ाने के लिए बलचर रेस्टोरेंट चालू करने का हवाला दिया गया था और यह वल्चर रेस्टोरेंट नौरादेही की दो रेंज में खोले जाने थे, जिसकी शुरूआत अप्रैल माह से होनी थी। इस वल्चर रेस्टोरेंट का उद्देश्य था कि वल्चर रेस्टोरेंट में गिद्धों को एकत्र किया जाएगा, उनके लिए भोजन दिया जाएगा। जिससे प्रजाति में वृद्धि हो सके और रहवासी गिद्ध दूसरे क्षेत्रों में ना जा सकें। यह बलचर रेस्टोरेंट डोगरगांव और मुहली रेंज में चालू होने की जानकारी मिली थी, लेकिन यह कार्य अभी चालू नहीं हो पाया है। इसलिए हो रही गणनामुहली रेंजर नीरज बिसेन ने बताया कि ग्रीष्मकालीन गणना पहली बार हो रही है। इस गणना का उदेश्य है जो रहवासी गिद्ध हैं वह गर्मियों में यही रह जाते हैं, लेकिन प्रवासी गिद्ध इन दिनों यहां से प्रवास कर जाते हैं। विभाग की यह मंशा है कि जो गिद्ध स्थाई रूप से रहने वाले हैं उनकी प्रजाति और संख्या की गणना की जाये। गिद्ध गणना लगातार तीन दिन तक जारी रहेगी और उसमें रहवासी गिद्ध और प्रवासी गिद्धों की जानकारी एकत्रित की जायेगी। उन्होंने बताया कि बल्चर रेस्टोरेंट शुरू होने थे उनके प्रस्ताव भेजे गये थे, लेकिन अभी मंजूरी नहीं आई है। जिसके कारण बल्चर रेस्टोरेंट का कार्य अभी आरंभ नहीं हुआ है। आदेश आने के बाद शुरूआत होगी।

जंगल महकमे में प्रभार का खेल: मंत्री ने नोटशीट लिख पूछा क्या है नियम…?

Game of charge in the forest department: The minister wrote a notesheet and asked what are the rules…? भोपाल। जल संसाधन, लोक निर्माण और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग की तरह जंगल महकमे में भी प्रभार का खेल शुरू हो गया है। वन विभाग के आला अफसरों द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी के आधार पर अपने चहेतों को दो-दो प्राइम पदों का प्रभार दिए जाने का खेल खूब चल रहा है। दिलचस्प पहलू यह है कि प्रभार के खेल में मंत्री को विश्वास में नहीं लिया जा रहा है। यही वजह रही कि विभागीय मंत्री नागर सिंह चौहान ने एक नोटशीट लिखकर विभाग से जानना चाहा कि प्रभार के नियम क्या है और दूसरे राज्यों में क्या व्यवस्था है..? हालांकि उनकी यह नोटशीट महीने भर से अधिक समय से प्रशासन-एक शाखा में धूल खा रही है। वन विभाग में सर्किल प्रमुख, वन संरक्षक सामाजिक वानिकी, डीएफओ और एसडीओ के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। इन पदों को नियमित रूप से भरने के लिए अपर मुख्य सचिव से लेकर वन बल प्रमुख प्रमुखता से पहल नहीं कर रहें है। इसके बदले वे अपने चहेते अफसरों को एक से अधिक पदों का प्राइम प्रभार देकर उन्हें उपकृत कर रहें हैं। यही नहीं, उन्हें बाकायदा विकास और कैम्पा मद से अधिक फंडिंग भी दे रहें है। वन मंत्री नागर सिंह चौहान को प्रभार के खेल का फंडा उनके विश्वसनीय अधिकारी ने समझाया। यही नहीं, इसके लिए वन मंत्री चौहान के थिंक टैंक अफसर ने नोट शीट लिखकर विभाग के मुखिया से प्रभार देने के नियम और दूसरे राज्यों में व्यवस्था की जानकारी मांगी है। हालांकि उनकी नोटशीट को लेकर विभाग के अफसर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। यही वजह है कि एक महीने से उनकी नोटशीट धूल खा रही है। मुख्यालय में एपीसीसीएफ ग्रीन इंडिया मिशन से लेकर एपीसीसीएफ सामाजिक वानिकी जैसी महत्वपूर्ण शाखाएं प्रभार पर संचालित की जा रही है। इसके अलावा टीकमगढ़, दक्षिण सिवनी, अनूपपुर और दतिया बरमंडल प्रभाव में संचालित हो रहे हैं। एफडी बांधव टाइगर रिजर्व, बैतूल सर्किल, सामाजिक वानिकी रीवा और सामाजिक वानिकी सागर सर्किल, बालाघाट और खंडवा उत्पादन वन मंडल भी प्रभार में संचालित हो रहे हैं। मैहर के रेंजर को रीवा में दो-दो एसडीओ का प्रभारप्रभार के खेल का ताजा उदाहरण रीवा सर्किल का है। मुख्य वन संरक्षक रीवा राजेश राय ने 70 किलोमीटर दूर मैहर में पदस्थ प्रभारी एसडीओ और रेंजर यशपाल मेहरा को रीवा एसडीओ का प्रभार सौंपा है। राय यही नहीं रुके बल्कि मेहरा पर और उदारता बढ़ाते हुए उन्हें एसडीओ मऊगंज का भी प्रभार दे दिया है। जबकि रीवा में दो-दो वरिष्ठ एसडीओ कार्यरत है। रीवा में पदस्थ दोनों एसडीओ पर राय ने विश्वास नहीं जताया। सवाल यह उठता है कि 70 किलोमीटर दूर मैहर में पदस्थ प्रभारी एसडीओ मेहरा रीवा और मऊगंज का प्रभार की जिम्मेदारी कैसे संभालेंगे..? सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रभारी एसडीओ राजसात की कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है तो फिर यह करवाई कौन करेगा..? रेंजर मेहरा मैहर एसडीओ प्रभार के रूप में काम कर रहे हैं और उन्हें दो और प्रभारी एसडीओ का दायित्व सौंपने के पहले वन बल प्रमुख को विश्वास में नहीं लिया गया। यही वजह है कि प्रभार के आदेश की प्रतिलिपि वन बल प्रमुख को नहीं सौंपी। इसी प्रकार अनूपपुर वन मंडल में तो एक डिप्टी रेंजर को तीन-तीन रेंज के प्रभार दिए गए हैं। चर्चा है कि जंगल महकमे में ऊंचे पदों के प्रभार लेने के लिए पॉवर के साथ-साथ पैसे भी खर्च करने पड़ते हैं। इसी के दम पर वन विभाग में कई बड़े पद प्रभार में चल रहे है। मंडला, सहित आधा दर्जन से अधिक वन मण्डलों में प्रभार के खेल खूब फूल-फल रहा है।

10 लाख रुपए तक की खरीदी एमएफपी पार्क के सीईओ कर सकेंगे

CEO of MFP Park will be able to purchase up to Rs 10 lakh भोपाल। लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने वनोपज प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र (एमएफपी पार्क) गड़बड़झाला पर नकेल कसने की कवायत तेज कर दी है। अब बिना टेंडर कोई भी निर्माण कार्य अथवा खरीदी नहीं की जाएंगी। इसके लिए ठाकुर ने वित्तीय अधिकारों में संशोधन करते हुए पार्क के सीईओ को ₹5लाख से बढ़कर अब 10 लाख रुपए कर दिए गए हैं।संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने बताया कि अब एमएफपी पार्क के सीईओ को टुकड़ों-टुकड़ों में कार्य नहीं कराने की सख्त हिदायत दी गई है। अब अगर किसी एक ही कार्य को टुकड़े-टुकड़े में कराए जाएंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। उन्होंने बताया कि 10 लाख रुपए से अधिक और 20 लाख रुपए तक खरीदी अथवा निर्माण कार्य कराने की अनुमति संघ के प्रबंध संचालक दे सकेंगे. इसी प्रकार 20 लाख रुपए से अधिक तक वित्तीय अनुमतियां संघ के प्रशासक एवं अपर मुख्य सचिव जेएन कंसोटिया के पास है। समितियों से खरीदी करने पर जोर संघ के एमडी ठाकुर ने एमएफपी पार्क के सीईओ अर्चना पटेल को निर्देशित किया है कि अब कोई भी रॉ मटेरियल प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों की एनओसी के बगैर निजी फर्म से नहीं खरीदे जाएंगे। यानि खरीदी में सबसे पहली प्राथमिकता वन उपज सहकारी समितियां को देना होगी। समितियां के इनकार के बाद ही टेंडर के जरिए निजी फर्म से खरीदी हो सकेगी। करीब 1000 वनौपज समितियां रजिस्टर्ड है। संघ ने एक पुस्तक तैयार की है जिसमें उल्लेख है कि कौन-कौन सी वनोपज कितनी मात्रा में एकत्रित की जाती है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में खासतौर से महुआ और बहेड़ा की खरीदी वनोपज सहकारी समितियों से ही की जाएगी। खरीदी के पहले ही उत्पादन प्रबंधन की अध्यक्षता वाली कमेटी एक सूची तैयार करेगी कि किन-किन औषधीय के लिए कौन-कौन से रॉ मैटेरियल कितनी मात्रा में खरीदी जाना है। इनमें से कौन-कौन से रॉ मैटेरियल किन-किन वनोपज समितियों में उपलब्ध है।

डीएफओ के गलत जवाब-दावा देने पर वन बल प्रमुख को हाईकोर्ट में मांगनी पड़ी माफ़ी

Forest Force Chief had to apologize in High Court after DFO gave wrong answer-claim भोपाल। डीएफओ के निरंकुश और बेलगाम कार्यशैली के कारण वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव को हाई कोर्ट जबलपुर के जस्टिस विवेक अग्रवाल की भरी अदालत में माफी मांगनी पड़ी। वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने विभाग की गलती स्वीकारते हुए उसे दुरुस्त करने के लिए एक माह का समय मांगा था पर हाई कोर्ट ने उन्हें 15 दिन की मोहलत दी है। उच्च न्यायालय जबलपुर में पदोन्नति को लेकर सेवानिवृत्ति रेंजर शीतल प्रसाद पांडेय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश विवेक अग्रवाल ने वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव को वताया कि उत्तर बालाघाट वन मंडल के सेवानिवृत्ति एवं तत्कालीन वन मंडलाधिकारी आरबीएस बघेल द्वारा जवाब – दावा में गलत दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। जस्टिस अग्रवाल ने विभाग की खिंचाई करते हुए कहा कि किसी ने भी मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर अपना दिमाग लगाने की जहमत नहीं उठाई। यहां तक ​​कि सरकार द्वारा जो रिकॉर्ड भी पेश किया गया है वह याचिकाकर्ता के डिप्टी के पद पर पदोन्नति के मामले पर विचार के संबंध में है। रेंजर और रेंजर के पद पर नहीं। इस पर वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने 16 अप्रैल 24 को जस्टिस विवेक अग्रवाल की अदालत में यह स्वीकार किया कि उत्तर दाखिल करने में विभाग की ओर से कुछ गलतियां हुई हैं। वह इसके लिए बिना शर्त माफी मांगते हैं। उनका कहना है कि गलती सुधारने और उचित कदम उठाने के लिए उन्हें कुछ समय दिया जाए। विभाग के मुखिया के आग्रह पर जस्टिस अग्रवाल ने गलती को सुधारने और याचिकाकर्ता के दावों को देखने के लिए 15 दिन का समय दिया। क्या था मामला याचिकाकर्ता शीतल प्रसाद पांडेय फॉरेस्ट गार्ड के रूप में वन विभाग में भर्ती हुए थे। 1976 -77 में उनके साथियों को डिप्टी रेंजर पद पर पदोन्नति दे दी गई किंतु शीतल प्रसाद पांडेय इससे महरूम हो गए, क्योंकि उनका एसीआर क प्लस नहीं था। इसी प्रकार 1994 को उनके बैच के कर्मचारियों को डिप्टी से रेंजर के पद पर पदोन्नति कर दिया गया। पदोन्नति से वंचित शीतल प्रसाद पांडेय ने राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण के समक्ष एक मामला दायर किया था जिसे ओए के रूप में पंजीकृत किया गया था। क्रमांक 1355/1995, जो उच्च न्यायालय में स्थानांतरित होने पर डब्ल्यूपी के रूप में पंजीकृत किया गया था। इस मामले में उच्च न्यायालय ने 14 नवंबर 06 को आदेश पारित किया था जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक द्वारा कहा कि याचिकाकर्ता का मामला अपने कनिष्ठों को वरीयता देते हुए पदोन्नति पर विचार करने का हकदार है। एसडीओ कल्पना के मामले में भी हो सकती है वन बल प्रमुख की सिंचाई 16 अप्रैल को हाईकोर्ट में वन बल प्रमुख द्वारा माफी मांगने के बाद अब चर्चा है कि कहीं डॉ असीम श्रीवास्तव को पन्ना दक्षिण में पदस्थ एसडीओ कल्पना तिवारी के मामले में भी उच्च न्यायालय की फटकार सुनना न पड़ जाय ? पन्ना दक्षिण वन मंडल में पदस्थ एसडीओ कल्पना तिवारी ने जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया उच्च न्यायालय जबलपुर में 12 दिसंबर 23 को रिट पिटीशन (WP/30843/2023) दायर की। उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा 21 दिसम्बर 2023 को सुनवाई करते हुए को 45 दिनों में निर्णय लिये जाने हेतु आदेश पारित किया। 5 महीने बाद भी विभाग ने उच्च न्यायालय द्वारा पारित किये गये निर्णय का पालन नहीं किया। न्यायालय के आदेश के बाद भी विभाग द्वारा निर्णय नहीं लिए जाने के कारण जहां विभाग के मुखिया को एक बार फिर न्यायालय की अवमानना का सामना करना पड़ सकता है वहीं एसडीओ कल्पना तिवारी आईएफएस की दौड़ से बाहर हो गई है। सूत्रों का कहना है कि जिस प्रकरण को लेकर कल्पना तिवारी ने हाई कोर्ट जबलपुर में दस्तक दी है उसमें वन विभाग के ओएसडी अनुराग कुमार और बालाघाट सीसीएफ एकेएस सेंगर मुख्यत: दोषी है और दो आईएफएस को बचाने के लिए एसडीओ कल्पना तिवारी को बलि का बकरा बनाया गया है। संक्षेप में मामला यह है कि टीकमगढ़ वन मंडल में हुई चैनलिंक फेंसिंग और वायरवेड खरीदी में गड़बड़ी के मुख्य जिम्मेदार तत्कालीन डीएफओ एकेएस सेंगर और तत्कालीन प्रभारी डीएफओ एवं वर्तमान ओएसडी वन विभाग अनुराग कुमार है। सेंगर ने निर्धारित प्रक्रिया एवं मापदंड के अनुसार खरीदी नहीं की और अनुराग कुमार ने भौतिक सत्यापन कराए बिना चालान के आधार पर भुगतान कर दिया है। यह मामला लोकायुक्त में लंबित है।

वित्त विभाग से गैर हाजिर होकर वन मंत्री के लिए ओएसडी के रूप में काम करने वाले चौहान को निलंबित करने मुख्य सचिव को लिखा पूर्व विधायक ने पत्र

The former MLA wrote a letter to the Chief Secretary to suspend Chauhan who was working as OSD for the Forest Minister while being absent from the Finance Department भोपाल। पूर्व विधायक एवं संयुक्त क्रांति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष किशोर समरीते ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वित्तीय सेवा के अधिकारी रणजीत सिंह चौहान को निलंबित कर जांच करने की मांग की। पूर्व विधायक समरीते ने पत्र लिखा है कि चौहान वित्त विभाग से गैरहाजिर होकर वन मंत्री नागर सिंह चौहान के लिए अनाधिकृत तौर पर ओएसडी के रूप में काम कर रहे हैं। चौहान स्वयं को ओएसडी बता कर  विभाग के सीनियर आईएफएस अधिकारियों से लेकर डीएफओ तक पर दबाव डालकर अपनी मनमर्जी से काम करवा रहे हैं।  पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री को लेकर पत्र में कहा है कि  रणजीत सिंह चौहान वित्तीय सेवा अधिकारी जिसकी सेवाएं प्रमुख सचिव वित्त विभाग द्वारा  अभी तक विधिवत तौर पर प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग को स्थानांतरित नहीं की है। दिलचस्प पहलू यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने भी इनके द्वारा वन मंत्री के जरिए भिजवाई गई ओएसडी बनाने संबंधित नोटशीट को भी वापस कर दी गई है। इन सबके विपरीत रणजीत सिंह चौहान वित्त अधिकारी, अनाधिकृत तौर पर विशेष कर्तव्य अधिकारी, वन मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह मामला पद एवं अधिकारों के दुरूपयोग एवं कदाचरण  का है तथा गंभीर जांच का विषय है।  पूर्व में भी इनके खिलाफ की गई थी शिकायतें  पूर्व में  इनके विरूद्ध श्रीनिवास मूर्ति सदस्य सचिव जैव विविधता बोर्ड की शिकायत पर भी शासन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। अपर मुख्य सचिव केके सिंह के वित्तीय सलाहकार रहते हुये इनके द्वारा अपने लिये लग्जरी कार की मांग एवं अतिरिक्त वित्तीय लाभ लेने के कारण हटाये गये थे। बीजनेस रूल का हवाला देते हुये गलत तरीके से शासन में बैठे अधिकारियों के बीच कार्य विभाजन करवाने के पीछे भी चौहान ही मुख्य सूत्रधार थे। इस मुद्दे पर तत्कालीन वन मंत्री उमंग सिंघार और अतिरिक्त मुख्य सचिव एपी श्रीवास्तव के बीच विवाद ब्यूरोक्रेसी में खूब उछला था और मामला अभी भी जांच के लिये लंबित है।   पूर्व विधायक ने लगाए कथित रूप से पैसे लेने का आरोप  अपने पत्र में पूर्व विधायक ने सिवनी सीसीएफ  एवं भारतीय वन सेवा के अधिकारी एसएस उद्दे की प्रमाणित शिकायत पर जांच को प्रभावित करने तथा निलंबन नहीं करने में 20 लाख रूपये लिये गये। इसी तरह बालाघाट के प्रभारी मुख्य वन संरक्षक सेंगर को टीकमगढ़ में वन मण्डलाधिकारी रहते हुये चैन लिंक (बारवेड) एवं अन्य खरीदी में निलंबन से बचाने 50 लाख रूपये लिये तथा उसे बालाघाट में प्रभारी मुख्य वन संरक्षक बना दिया गया। बालाघाट डीएफओ  अभिनव पल्लव वन मण्डलाधिकारी उत्तर वन मण्डल सामान्य के विरूद्ध शिकायत में सप्लाई तथा खरीदी में लाखों के फर्जी भुगतान में निलंबन से बचाने के लिए  रिश्वत के रूप लाखों रुपए लिये गये। यह अत्यंत गंभीर मामला है। अंत में समरीते ने मुख्य सचिव से अनुरोध किया है कि आप इस मामले की जांच करवाकर विशेष कर्तव्य अधिकारी रणजीत सिंह चौहान को तत्काल निलंबित कर इसकी सेवायें वित्त विभाग को वापिस करने तथा इसकी सम्पत्ति की जांच करवाएं।

930 रुपए किलो का गुग्गल 1700 रूपये किलो में खरीदा, 30 लाख से अधिक का गड़बड़झाला

Guggal worth Rs 930 per kg bought for Rs 1700 per kg, fraud worth more than Rs 30 lakh भोपाल। अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया का संरक्षण होने की बदौलत ही लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक बिभास ठाकुर भी एमएफपी पार्क बरखेड़ा पठानी में रॉ मटेरियल खरीदी में गड़बड़झाला को नहीं रोक पा रहे हैं। ताजा मामला गुग्गल खरीदी का प्रकाश में आया है। प्रभारी एसडीओ एवं उत्पादन प्रबंधक ने टेंडर की दर से न खरीदकर आर्यन फार्मेसी से ₹1700 किलो की दर से खरीदी की है। सूत्रों ने बताया कि एमएसपी पार्क के प्रबंधक ने गूग्गल सहित प्रष्टपर्णी, काली मिर्च, हींग, पुनर्नवा आदि रॉ मैटेरियल की खरीदी के लिए टेंडर किया था। टेंडर में गुग्गल के लिए हर्बल ऑटोमेशन हरिद्वार का रेट 930 रूपये प्रति किलोग्राम था। एसपी पार्क के कर्ताधर्ता ने हर्बल ऑटोमेशन हरिद्वार से खरीदी ना करके आर्यन फार्मेसी से ₹1700 की कीमत पर 4000 किलो खरीदी की। हर्बल ऑटोमेशन हरिद्वार फर्म से न तो वर्क आर्डर दिया गया और न किसी प्रकार का पत्राचार किया गया। आर्यन से खरीदी से संघ को 30 लाख 80000 रुपए का अधिक भुगतान करना पड़ा है। प्रभारी एसडीओ एवं उत्पादन प्रबंधक ⁠सुनीता अहीरवार के कार्यकाल में 6 करोड़ों की govt सप्लाई में 3 करोड़ से अधिक की रॉ -मटेरियल ख़रीदी के भुगतान किये गये है, जिसमें 2 करोड़ के बिल तो आर्यन फ़ार्मेसी के थे। इसके अलावा 30-35 लाख के मरम्मत के भुगतान किये जा चुके है।लघु वनोपज प्रसंस्करण केंद्र बरखेड़ा पठानी के सीईओ प्रसन्ना फुलझले हटने के बाद से प्रभारी एसडीओ सुनीता अहीरवार मनमानी बढ़ गई है। यहां तक कि फुलझले की जगह प्रमोट आईएफएस अर्चना पटेल को डमी के रूप में सीईओ बनाया गया है। पार्क के अधिकारी और कर्मचारी इसकी मुख्य वजह भी एसीएस से मिल रहे हैं संरक्षण को बताया जा रहा है। एमडी के आदेश का ही नहीं हो रहा पालन लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक ठाकुर ने भंडारण की जांच के लिए एसीएफ मणि शंकर मिश्र को 7 दिन में जांच का रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे किंतु 15 दिन से अधिक का समय बीत गया, अभी तक जांच शुरू नहीं हुई। मिश्रा को भंडारण से संबंधित दस्तावेज उत्पादन प्रबंधन द्वारा नहीं दिए जा रहे हैं। दस्तावेज मांगने के लिए अभी तक मिश्रा ने करीब चार रिमाइंडर सुनीता अहिरवार को भेज चुके हैं। इसकी जानकारी भी एमडी को भेजी गई है किंतु वहां से भी किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है। यही नहीं विद्या निनारे को भंडार में रा मटेरियल जाँच करने के मौखिक निर्देश प्रबंध संचालक और सीईओ ने मीटिंग में सबके सामने दिये थे। उस मीटिंग में सुनीता अहीरवार भी मौजूद थी फिर भी अपने भ्रष्टाचार को छुपाने और एसीएस वन से जानपहचान की धुन में नियमों को भी धता बता रही है। नरेंद्र नागर पर क्यों मेहरबान है केंद्र के अफसर एमएसपी पार्क बरखेड़ा पठानी के सीईओ से लेकर प्रबंधक तक उन पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। पिछले एक दशक से एमएसपी पार्क बरखेड़ा पठानी में कंस्ट्रक्शन, फेब्रिकेशन, पुताई कार्य से लेकर दवाइयां के रॉ मैटेरियल प्रदाय करने का ठेका तक के वर्क आर्डर नरेंद्र नागर को दिया जाता है। जबकि उनका मूल काम कंस्ट्रक्शन का है। नियमों की अनदेखी कर नरेंद्र नागर के कंस्ट्रक्शन फर्म को बिना टेंडर कोटेशनों के आधार पर लाखों रुपए के कार्य दिए जा रहे हैं। वर्तमान में उनके द्वारा मेंटेनेंस का कार्य किया गया है, जो कि लगभग 30 से 35 लाख रुपए की बिलिंग हो चुकी है। चर्चा है कि अधिक कमीशन पर उन्हें काम दिए जा रहे हैं। हद तो तब है जब विंध्या हर्बल में कंस्ट्रक्शन वर्क हो या पुताई का कार्य या फिर फेब्रिकेशन के कार्य कोई भी अन्य एजेंसी ही क्यों न करें लेकिन बिल नागर के फर्मो के नाम पर ही बनता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कैलाश रघुवंशी की होती है। आर्यन फार्मेसी का एकाधिकार पिछले एक दशक में एमएसपी पार्क में आर्यन फार्मेसी अथवा सिस्टर कंसर्न का एकाधिकार रहा है। दवाइयां को बनाने के लिए जो भी संबंधित रॉ मटेरियल खरीदे जाते हैं, उसमें 70 से 80% रॉ मैटेरियल आर्यन फार्मेसी के ही होते हैं। हालांकि फेडरेशन के एमडी ठाकुर दावा कर रहे हैं कि वह व्यवस्था को बदलने में जुटे हैं। यानी उनके अनुसार अब भविष्य में गड़बड़ियों की गुंजाइश बहुत कम रहेगी। बावजूद इसके, जांच के नाम पर फेडरेशन के एमडी को सिर्फ खाली गुमराह किया जा रहा है।

1479 करोड़ के बजट के बंटवारे का अधिकार हाथ से छीनने के भय से ठेके पर देने में वन विभाग कर रहा है ना-नुकुर

The Forest Department is reluctant to give the right to distribute the budget of Rs 1479 crore on contract due to the fear of snatching it away. भोपाल। राज्य शासन को अपने एक आदेश का पालन कराने के लिए अब तक एक के बाद एक, चार आदेश जारी करना पड़े। इसके बाद भी उस पर क्रियान्वयन होने में 6 महीने का समय और लग सकता है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि वन विभाग के कैंपा शाखा और विकास शाखा में पदस्थ पीसीसीएफ नहीं चाहते हैं कि रिटायरमेंट के पहले ही बजट बांटने का अधिकार उनके हाथ से निकल जाए। यही वजह है कि मैन्युअल और शर्तों के निर्धारण की आड़ में पीसीसीएफ द्वय टेंडर प्रक्रिया से वानिकी कार्य कराने संबंधित आदेश का क्रियान्वयन अक्टूबर-नवंबर तक टालने की उधेड़बुन में लगे हैं। अक्टूबर में पीसीसीएफ महेंद्र सिंह धाकड़ (कैम्पा) और नवंबर में पीसीसीएफ (विकास) उत्तम कुमार सुबुद्धि सेवानिवृत होने जा रहे हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि अंधा बांटे रेवड़ी….की तर्ज पर कैंपा शाखा 959 करोड़ और विकास शाखा 520 करोड रुपए का बंदरबांट किया जाता है। प्रदेश में वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ जंगलों की सुरक्षा और बढ़ते अपराध पर रोकने की दिशा में पूरा अमला मुस्तैद रहे। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए राज्य शासन ने वन विभाग में अधोसंरचना निर्माण कार्य, पशु अवरोधक दीवार से लेकर वारवेड वायर एवं चैनलिंक फेंसिंग और पॉलीहाउस आदि के कार्य निविदा बुलाकर कराने का पहला आदेश 29 मई 23 को प्रसारित किया था। जबकि इसकी स्क्रिप्ट 29 अप्रैल 22 को लिखी गई थी। तत्कालीन वन मंत्री डॉ विजय शाह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विभाग के सभी अधिकारियों को निविदा बुलाकर वानिकी कार्य करने के निर्देश दिए थे। यहीं नहीं, शाह ने विकास शाखा के तत्कालीन प्रमुख चितरंजन त्यागी को इसके लिए नियम और शर्तें बनाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। चूंकि त्यागी अक्टूबर 22 में रिटायर होने वाले थे, इसलिए नियम बनाने में टालमटोल करते रहे। उनके सेवानिवृत्ति के बाद मामला ठंडे बस्ते में पड़ गया। जब एसीएस जेएन कंसोटिया ने वन विभाग का दायित्व संभाला तब फिर से निविदा बुलाकर कार्य करने संबंधित फाइल मंत्रालय में मूव होने लगी। 29 मई 23 को शासन ने पहला आदेश जारी किया कि 2 लाख के कार्य विभागीय रूप से किया जाएगा। विभागीय अधोसंरचना निर्माण कार्य ग्रामीण यांत्रिकीय विभाग के निर्माण कार्यों की दरों के आधार पर वन विभाग अपने मैन्युअल के आधार पर कराए। 31 दिसंबर तक निविदा प्रक्रिया के स्थान पर विभाग में पुरानी व्यवस्था अनुसार निर्माण कार्यों की अनुमति दी जाती है। 1 जनवरी 24 से जो भी कार्य प्रारंभ हो, उन्हें निविदा प्रक्रिया के उपरांत कराए जाएं। विभागीय अफसरों ने नहीं दिखाई रुचि वन बल प्रमुख से लेकर कैंपा शाखा और विकास शाखा के प्रमुख तक शासन के आदेश के क्रियान्वयन में कोई रुचि नहीं दिखाई। 31 दिसंबर 23 तक पूर्व वन बल प्रमुख आरके गुप्ता चाहते थे कि उनके सेवानिवृत होने के बाद इस पर क्रियान्वयन हो। यही वजह रही कि शासन के 29 में 23, 17 अगस्त 23 और 19 अक्टूबर 23 को जारी आदेश का क्रियान्वयन नहीं हो पाया। इस बीच सभी पीसीसीएफ स्तर के अधिकारियों ने एक प्रेजेंटेशन बनाकर अपर मुख्य सचिव कंसोटिया को सौपा। इसमें निविदा से कार्य करने की तमाम सारी विसंगतियां बताई गई थी। बताते हैं कि कंसोटिया भी विभाग के शीर्ष अधिकारियों के तर्क पर सहमत हो गए थे। निविदा से कार्य करने का मामला ठंडा पड़ चुका था। अचानक 7 मार्च 24 को कंसोटिया ने फिर से आदेश जारी करने का हुक्म अपने मातहत को दिया। आदेश जारी होते वन भवन से फील्ड तक में हड़कंप मच गया। वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव और उनके सिपहसालार पीसीसीएफ सक्रिय हुए। वन बल प्रमुख ने आनन-फानन में पीसीसीएफ स्तर के अधिकारियों की बैठक बुलाई। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि इसके लिए वन विभाग एक मैन्युअल और शर्ते बनाए। ऐसा करने में 6 महीने का समय निकल जाएगा और तब तक 1479 करोड़ रुपए का 30% बजट पहले त्रेमासिक के लिए पुरानी व्यवस्था के आधार पर चहेते डीएफओ को अपने मन माफिक बजट आवंटित कर दिया जाएगा। बैठक में ही उपस्थित एक सीनियर आईएफएस अधिकारी का कहना है कि मैन्युअल और शर्ते बनाने में अधिक से अधिक 1 महीने का समय लग सकता है। प्रदेश में आचार संहिता लागू है। ऐसे में अफसर चाहे तो 15-20 दिन में ही मैन्युअल और निविदा की शर्ते से बना सकते है। चर्चा है कि कैंपा और विकास शाखा में पदस्थ से पीसीसीएफ नहीं चाहते हैं कि उनके रिटायरमेंट के पहले शासन के आदेश पर क्रियान्वयन हो।

लघु प्रसंस्करण और अनुसंधान केंद्र के लेखों में गड़बड़झाला, प्रबंधक को फटकार, अकाउंटेंट की वेतन वृद्धि रोकी

Irregularities in accounts of Small Processing and Research Center, manager reprimanded, increment of accountant stopped भोपाल। लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक विभाष ठाकुर ने प्रसंस्करण केंद्र बरखेड़ा पठानी के लेखा-जोखा में गड़बड़झाला और भंडार क्रय नियमों के घोर उल्लंघन किए जाने पर जहां उत्पादन प्रबंधको को फटकार लगाई वहीं लेखा प्रभारी नंदलाल कुशवाहा की एक वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश दिये।संघ के पूर्णकालिक प्रबंध संचालक बनने के बाद से ही विभाष ठाकुर एक्शन मूड में नजर आने लगे हैं। सूत्रों ने बताया कि एमडी ठाकुर ने शुक्रवार को प्रशासन केंद्र पहुंचे और निरीक्षण के दौरान केंद्र में टुकड़ों -टुकड़ों में ख़रीदी के बिल वाउचर की जांच करते हुए गड़बड़ी पकड़ी। यह बात अलग है कि एमडी प्रशासन मनोज अग्रवाल के पत्र में उठाए गए गड़बड़ियों की जांच की शुरुआत नहीं हो पाई है। केंद्र में जांच के नाम पर समिति दर समितियां का गठन किया जा रहा है। इन समितियां में भी ऐसे लोगों को शामिल किया जा रहा जो खुद ही संदेह के दायरे में है। जैसे रॉ मैटेरियल समिति में जिस डॉ संजय शर्मा को शामिल किया गया है, वह स्वयं रॉ मटेरियल के मुख्य सप्लायर आर्यन फ़ार्मेसी डायरेक्टर का सहयोगी है। जबकि जांच भी आर्यन फ़ार्मेसी प्रदाय किए गए रॉ मटेरियल की होनी है। ऐसे में समितियां का गठन और जांच केवल रस्म अदाएगी तक सीमित रह जाएगी। उल्लेखनीय बात ये है कि विगत कई वर्षों का उत्पादन रिकॉर्ड और गुणवत्ता जांच रिकॉर्ड की ज़िम्मेदारी डॉ संजय शर्मा और डॉ विजय सिंह और उत्पादन प्रबंधक की थी वो रिकॉर्ड ग़ायब है या बनाये ही नहीं गये। इस पर 28 मार्च को मीटिंग में एसीएस जेएन कंसोटिया ने भी गंभीर आपत्ति ली और जांच कर संबंधित पर कार्यवाही करने के निर्देश दिये थे। लेकिन इसके उलट, जो जांच के दायरे में है, उन्हें ही समितियों में शामिल किया जा रहा है।उत्पादन प्रबंधन को लगाई फटकारसंघ के प्रबंध संचालक ठाकुर ने प्रसंस्करण केंद्र बरखेड़ा पठानी की कार्यप्रणाली को लेकर शुक्रवार को बैठक ली। बैठक उन्होंने केंद्र के आय-व्यय और ख़रीदी प्रक्रिया के अलावा उत्पादन प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न उठाये तथा उत्पादन प्रबंधक सुनीता अहीरवार को फटकार लगाई। उत्पादन प्रक्रिया में सुधार लाने के लिये सख़्त निर्देश दिये है। ठाकुर ने उत्पादन प्रक्रिया में सुधार लाने के लिये स्टोर वेरिफिकेशन समिति और कार्य आवंटन को लेकर सख़्त निर्देश केंद्र के सीईओ पीएल फूलजले को दिये है।जांच अधिकारी मिश्रा को नहीं दिए जा रहे हैं दस्तावेजकेंद्र में हुई गड़बड़ियों की जांच कर रहे दागी एसीएफ मणि शंकर मिश्रा को प्रभारी उत्पादन प्रबंधक सुनीता अहिरवार जान से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कर रहीं है। दस्तावेज मिलने की प्रत्याशा में जांच प्रक्रिया तक शुरू नहीं हो पाई है। प्रभारी उत्पादन प्रबंधक अहिरवार को पत्र लिखकर से मिश्रा ने बिंदुवार जानकारियां मांगी है। कय किये गये दूध, लहसुन, अदरक, निबू आदि कय किये गये सामग्री की राशि व सभी वाउचरों की छायाप्रति प्रस्तुत करें।

प्रदेश में आदिवासियों और वन समिति से छीना वानिकी कार्य, अब ठेके पर देने की तैयारी

Forestry work taken away from tribals and forest committee in the state, now preparations to give it on contract ठेके से काम करने पर वन क्षेत्र से सटे गांवों में आदिवासियों और वन विकास समिति से रोजगार छिन जाएगा। भोपाल। मध्य प्रदेश में वन विभाग के समस्त वानिकी, क्षेत्रीय और तकनीकी कार्य ठेका पद्धति अर्थात निविदा के माध्यम से कराए जाने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए वन विभाग ने सभी डीएफओ को निर्देश भी जारी कर दिए है। ठेके से काम करने पर वन क्षेत्र से सटे गांवों में आदिवासियों और वन विकास समिति से रोजगार छिन जाएगा। वानिकी कार्य में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था थी, जिससे वे रोजगार के लिए अन्य शहर या राज्य में पलायन न करें, लेकिन ठेका व्यवस्था होने से आदिवासियों के सामने रोजगार का संकट खड़ा होगा। मध्य प्रदेश रेंजर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष शिशुपाल अहिरवार का कहना है कि मध्य प्रदेश वन विभाग द्वारा अभी तक जो भी उपलब्धि चाहे वो वन क्षेत्र के घनत्व में उन्नति की हो, मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट, तेंदुआ स्टेट, घड़ियाल स्टेट, चीता स्टेट और राजस्व दिलाने में नंबर एक स्टेट बनाने की हो। ये सभी उपलब्धियां केवल वर्दीधारी वन अमले और उनके साथ 24 घंटे रात दिन हर मौसम में साथ देने वाले स्थानीय वन समिति के सदस्य और वन क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों के कारण ही संभव हो सका है, लेकिन वानिकी, क्षेत्रीय और तकनीकी कार्य ठेका पद्धति पर कराने से वन क्षेत्र के आस पास रहने वाले आदिवासियों के लिए रोजगार का संकट होगा। अहिरवार का कहना है कि वन क्षेत्र में जो भी काम होते हैं वो एक निश्चित समय में स्थानीय मजदूरों से कराए जाते हैँ। वन के समीप निवास करने के कारण यह जंगल को भलिभांति जानते और समझते हैं। लेकिन निविदा प्रक्रिया वन विभाग में लागू होती है तो निश्चित ही वन क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों के अधिकारों का हनन होगा। इस तानाशाही पूर्ण निर्णय को तत्काल प्रभाव से वापस लेेने के साथ ही रेंजर एसोसिएशन इसकी घोर निंदा करता है और इस व्यवस्था का विरोध करेंगे।

चैनलिंक, बारवेड वायर और पोल्स की खरीदारी में करोड़ों की कमीशनबाजी का खेल

Crores of rupees of commission game in the purchase of Chainlink, Barbed Wire and Poles भोपाल। चालू वित्त वर्ष में जंगल महकमे में करीब 50 से 60 करोड़ रूपए की चैनलिंक, बारवेड वायर और टिम्बर पोल्स की खरीदी में बड़े पैमाने पर कमीशन बाजी का खेल खेला जा रहा है। सबसे अधिक खरीदी कैंपा फंड से की जा रही है। इसके अलावा विकास और सामाजिक वानिकी (अनुसंधान एवं विस्तार ) शाखा से भी खरीदी होती है। विभाग के उच्च स्तरीय सूत्रों की माने तो कुल रिलीज बजट के 18 से 20% धनराशि कमीशन कमीशन के रूप में टॉप -टू – बॉटम बंटती है। कई सालों से एक सिंडिकेट कम कर रहा है, जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ सका है। इस सिंडिकेट की जड़े काफी मजबूत है।  मुख्यालय से सबसे अधिक फंड कैंपा शाखा से रिलीज किया जाता है। इसके बाद सामाजिक वानिकी और विकास शाखा से करोड़ों की धनराशि वन मंडलों को दिया जाता है। तीनों शाखों को मिलाकर हर वन मंडल को 5 से 7 करोड़ रूपए की राशि हर साल खरीदी के लिए रिलीज किया जा रहा है। चैनलिंक जाली, बारवेड वायर, टिम्बर पोल्स, रूट ट्रेनर्स, मिट्टी और गोबर एवं रासायनिक खाद वगैरह की खरीदी की जाती है. इस खरीदी में 15 से 18 फीसदी राशि कमीशन बाजी में बंटती है। इस खेल को रोकने के लिए  वन मंत्री विजय शाह ने ग्लोबल टेंडर बुलाने की पहल की थी किंतु मैदानी अफसरों के विरोध के चलते वे अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाए थे। गौरतलब यह भी है कि मुख्यालय से विभिन्न शाखों द्वारा फंड रिलीज करने का कोई निर्धारित मापदंड नहीं है। चेहरा देखकर फंड वितरित किया जा रहा है। इसके कारण गड़बड़ी की आशंका बढ़ती जा रही है।  सरकार के निर्देशों की अवहेलना  राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश है कि वायरवेट, चैनलिंक और पोल की खरीदी में लघु उद्योग निगम को प्राथमिकता दें किंतु 95% खरीदी जेम्स और ई टेंडर से हो रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लघु उद्योग निगम की दर और जेम (GEM) की दरों में डेढ़ गुना अंतर है। यानी लघु उद्योग निगम में वायरवेट किधर 83 रुपए से लेकर 85 रुपए तक निर्धारित की गई है। जबकि जेम (GEM) में ₹150 तक है। सरकार की मंशा यह भी है कि लघु और मध्यम उद्यमियों को इस कारोबार से जोड़ा जाए। मुख्यालय से लेकर फील्ड के अफसर टेंडर की शर्तों में ऐसी शर्ते जुडवा देते हैं जिसके चलते लघु और मध्यम उद्यमी प्रतिस्पर्धा के रहस्य बाहर हो जाते हैं।   चहेती फर्म को उपकृत करने जोड़ देते हैं नई शर्तें  फंड बंटवारे को लेकर दो अफसर भिड़ चुके  विभाग में फंड बंटवारे को लेकर दो सीनियर अधिकारी भिड़ चुके हैं। पीसीसीएफ कैंपा महेंद्र सिंह धाकड़ की पदस्थापना के पहले तक फॉरेस्ट प्रोटक्शन को लेकर कैंपा से फंड संरक्षण शाखा को रिलीज किया जाता था और फिर संरक्षण शाखा डीएफओ की मांग के आधार पर वितरित करता था। धाकड़ ने इस परंपरा को बदल दिया। अब वह प्रोटेक्शन की राशि भी स्वयं जारी करते हैं। पूर्व में पीसीसीएफ प्रोटेक्शन रहे अजीत श्रीवास्तव ने इसका पुरजोर विरोध किया था और तीखा पत्र भी लिखा था, लेकिन बात नहीं बनी। मुद्दे को लेकर एक बैठक में तो दोनों के बीच अच्छी बहस भी हुई पर तत्कालीन वन बल प्रमुख आरके गुप्ता ने पीसीसीएफ कैंपा धाकड़ का साथ दिया। हालांकि अजीत श्रीवास्तव जल्द ही रिटायर हो गए। मौजूदा पीसीएफ प्रोटेक्शन डॉ दिलीप कुमार किम कर्तव्यविमुढ़ की स्थिति में है और वह सेवानिवृत्ति के दिन गिन रहे हैं। ब्लैक लिस्ट फर्म कर रही हैं अभी भी धंधा  वन विभाग में अलग-अलग वन मंडलों में कई फर्म को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया है. इसके बाद भी ब्लैक लिस्ट फर्म अपने राजनीतिक रसूख के दम पर सामग्री की सप्लाई कर रही हैं. इसकी वजह भी साफ है कि वन विभाग में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है, जहां ब्लैक लिस्ट की गई फर्म को अन्य वन मंडलों में मैसेज कर धंधा करने से रोका जाए. वैसे पीडब्ल्यूडी जल संसाधन और अन्य विभागों में ऐसी व्यवस्था है कि ब्लैक लिस्ट फर्म की सूची बनाकर मैदानी अफसरों को भेजा जाता है और उन्हें निर्देशित किया जाता है कि इनसे कोई भी वर्क आर्डर न दिया जाए. कमीशन बाजी के खेल में प्रमुख संस्थाएं तिरुपति इंजीनियरिंग वर्क बालाघाट, जबलपुर वायरस जबलपुर, श्री विनायक स्टील इंदौर, राजपूत फेसिंग पोल भोपाल, अरिहंत मेटल (नाहटा), लकी इंडस्ट्रीज इंदौर, आकांक्षा इंडस्ट्रीज विदिशा, नवकार ग्रेनाइट मंदसौर, बीएम मार्केटिंग वर्कर्स इंदौर, शारदा बारबेड  वायर एंड स्टील प्रोडक्ट मंडला, कृष्णा इंटरप्राइजेज छिंदवाड़ा, शारदा सीमेंट पाइप मंडला, ताप्ती एक्वा इंडस्ट्रीज बैतूल, शिल्पा कूलर छिंदवाड़ा, अपहरि प्लास्टिक बिलासपुर और गुरु माया इंडस्ट्रीज इटारसी.  इनका कहना  अगले वित्तीय वर्ष से टेंडर की शर्तें मुख्यालय से निर्धारित की जाएगी, ताकि उसकी एकरूपता बनी रहे। डीएफओ अपनी मनमानी शर्ते नहीं जोड़ पाएंगे. यूके सुबुद्धि पीसीसीएफ विकास

कांग्रेस नेता के परिजन को उपकृत करने एक दर्जन डीएफओ ने पहली बार जोड़ी नई शर्तें

To oblige Congress leader’s family, a dozen DFO added new conditions for the first time भोपाल। भाजपा सरकार में भी अफसर कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदारों की फर्म पर मेहरबान है। इसी कड़ी में जंगल महकमे में एक दर्जन डीएफओ ने चैन लिंक और वायरबेड खरीदी की निविदा में ऐसी शर्त जोड़ दी, जिसे केवल कांग्रेस नेता के रिश्तेदार की फर्म को ही वर्क आर्डर मिल सके। बैतूल और बालाघाट समेत एक दर्जन डीएफओ ने चैनलिंक और वायरबेड खरीदी के लिए निविदा आमंत्रित की थी। इस निविदा में यह शर्त भी जोड़ दी कि भारत मानक ब्यूरो से मान्यता प्राप्त फर्म ही निविदा में हिस्सा ले सकेंगी। यह शर्त पहली बार जोड़ी गई। इस शर्त के कारण तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गई। मप्र में भारतीय मानक ब्यूरो से लाइसेंस प्राप्त दो फर्म ही रजिस्टर्ड हैं। यह दोनों फर्म ही कांग्रेस नेता के रिश्तेदार की है। यानी कांग्रेस नेता के रिश्तेदार को उपकृत करने के लिए प्रदेश के एक दर्जन डीएफओ ने पहली बार यह शर्त निविदा में जोड़ दी है। यह बात अलग है कि प्रतिस्पर्धा से बाहर हुई संस्थाओं ने शिकवे-शिकायतें शुरू कर दी हैं। जानकारों का कहना है कि मंत्री के यहां अनाधिकृत रूप से सक्रिय अपर संचालक स्तर के एक अधिकारी के कहने पर फील्ड के अफसरों ने निविदा में भारतीय मानक ब्यूरो की शर्त जोड़ी है। बताया जाता है कि अफसर पर दबाव बनाने वाले अनाधिकृत काम देख रहे अधिकारी का कांग्रेस नेताओं से पुराने संबंध रहे हैं।

12 साल से एचआरडी शाखा में जमीं प्रभारी पर लगने लगी गंभीर वित्तीय अनियमितता के आरोप

Allegations of serious financial irregularities started being leveled against the ground in-charge of HRD branch for the last 12 years. भोपाल। शासकीय अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट कौशल पांडेय ने वन मंत्री से लेकर पीसीसीएफ एवं एपीसीसीएफ विजिलेंस को पत्र लिखकर वन विभाग के मानव संसाधन विकास शाखा में 12 साल से पदस्थ सहायक ग्रेड-2 एवं कार्यालय प्रभारी अधीक्षक विनीता फांसिस विल्सन और उनके मददगार सेवा निवृत्त कर्मचारी कृष्णन पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगाते हुए बर्खास्त करने की मांग की है। इसके अलावा शासकीय अधिवक्ता ने सीनियर अधिकारी से निष्पक्ष जांच का भी आग्रह किया है। वन मंत्री और सीनियर अधिकारियों को संबोधित पत्र में शासकीय अधिवक्ता पांडे ने लिखा है कि विनीता फांसिस विल्सन सहायक ग्रेड-2 कार्यालय प्रभारी अधीक्षक के पास बजट आवंटन, भंडार कक्ष, भारतीय वन सेवा प्रशिक्षण, राज्य वन सेवा प्रशिक्षण, रेजर प्रशिक्षण, उपवन क्षेत्रपाल और वनरक्षक प्रशिक्षण का प्रभार है। अपने पद का दुरूपयोग करते हुए विनीता फॉसिस विल्सन ने 65 वर्षीय सेवा निवृत्त कर्मचारी कृष्णन एवं एक अन्य महिला रिश्तेदार को जॉबदार पर कार्य पर रखा है। यही नहीं, प्रभारी अधीक्षक ने अपने घर का काम कराने के लिए एक काम वाली एक सर्वेंट को रखा है, जिसका वेतन भुगतान वनरक्षक प्रशिक्षण स्कूल के माध्यम से किया जाता है। पत्र में कथित रूप से आरोप लगाया गया है कि प्रतिमाह स्टेशनरी कय/कम्प्यूटर-प्रिंटर मरम्मत के फर्जी बिल तैयार कर भण्डार कय नियमों का उल्लघंन कर नियम विरूद्ध भुगतान किया जा रहा है। विल्सन प्रभारी अधीक्षक द्वारा एसी/ कुलर/वलफेन/हिटर/फोटो कापी मशीन / कम्प्यूटर/पिंटर/आलमरी अन्य कीमती समान सतपुड़ा भवन से वन भवन शिफ्टिंग के दौरान हेराफेरी की गई है। प्रशिक्षु रेंजर और एसीएफ से भी स्टाइफंड की राशि रिलीज़ करने सहित अन्य मसलों की आड़ में धन वसूले जाते हैं।हटाए जाने के बाद कृष्णन क्यों बैठते अधीक्षक कक्ष में..?एचआरडी शाखा में 35 साल तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत हुए कृष्णन आज भी शाखा में बैठकर काम करते नजर आएंगे। हटाए जाने के बाद कृष्णन क्यों बैठते अधीक्षक कक्ष में..? यह सवाल वन भवन में अधिकारी एवं कर्मचारियों के बीच यक्ष प्रश्न बना हुआ है। जबकि शाखा के पीसीसीएफ बिभाष ठाकुर ने साफ तौर पर कहा है कि कृष्णन एचआरडी शाखा में ना तो संविधान नियुक्ति है और न ही उनको दैनिक वेतन भत्ते पर रखा गया है। ठाकुर ने तो यहां तक कह दिया है कि हमने उसे मना कर दिया है। इसके बाद भी कृष्णन आज भी एचआरडी शाखा के अधीक्षक कक्ष पर बैठा नजर आता है। कृष्णन पर नए रेंजर/ डिप्टी रेंजर और ट्रेनिंग स्कूलों को फंड रिलीज करने एवज में कमीशन बाजी के काम में लिप्त होने का आरोप है। इसके अलावा वह विभागीय रेंजरों की परीक्षा के पेपर की सेटिंग और परीक्षा कॉपी की डि-कोडिंग का काम करते हैं।

11 घंटे का समर तय कर त्रिदेव नामक हाथी पहुंचा कान्हा टाइगर रिजर्व

Elephant named Tridev reached Kanha Tiger Reserve after traveling 11 hours त्रिदेव हाथी को सकुशल पहुंचाने दौरान पूरे रास्ते में पुलिस दल,वनविभाग के अधिकारी/कर्मचारी मौजूद रहे। अनूपपुर। जिले के वन परिक्षेत्र जैतहरी अंतर्गत गोबरी बीट के ठाकुरबाबा के पास गोबरी गांव में विगत डेढ़ माह से निरंतर विचरण कर रहे त्रिदेव नामक हाथी को कान्हा टाइगर रिजर्व में स्थित हाथी ठहराव स्थल पर पहुंचा दिया गया है। कुचल दिया था एक व्‍यक्ति को त्रिदेव नामक हाथी ने एक व्यक्ति को कुचल दिया था। इसके बाद उपजे आक्रोश के बाद बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की रेस्क्यू टीम द्वारा रेस्क्यू आपरेशन चलाया गया। सफलतापूर्वक ट्रेंकुलाइज किया इसके बाद तीस वर्षीय त्रिदेव नामक हाथी काे सफलतापूर्वक ट्रेंकुलाइज करने बाद ट्रक में पिंजरे में रखकर सड़क मार्ग से गोबरी से राजेन्द्रग्राम डिंडोरी, मण्डला होकर 11 घंटे का सफर तय करते हुए रविवार की रात नौ बजे मंडला जिले के कान्हा टाइगर रिजर्व स्थित हाथी ठहराव स्थल पर पहुंचा द‍िया गया। अधिकारी, कर्मचारी साथ थे त्रिदेव हाथी को सकुशल पहुंचाने दौरान पूरे रास्ते में पुलिस दल,वनविभाग के अधिकारी/कर्मचारी मौजूद रहे। बीच-बीच में बांधवगढ़ एवं संजय टाइगर रिजर्व सीधी के डाक्टर नितिन गुप्ता,डाक्टर सेंगर के साथ मंडला जिले में प्रवेश करते ही मंडला जिले के कान्हा टाइगर रिजर्व के वन अधिकारी,पार्क के डाक्टर द्वारा समय-समय पर स्वास्थ्य का परीक्षण किया गया जिसमें वह स्वस्थ पाया गया। अब ग्रामीणों ने ली चैन की सांस आक्रामक हाथी के सुरक्षित रेस्क्यू एवं जिले से बाहर कान्हा पहुंचाये जाने के बाद जैतहरी एवं अनूपपुर तहसील के विभिन्न ग्रामीण अंचलों के ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है। बताया गया अब त्रिदेव को यहां रखा जाएगा और प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि इसका स्वभाव भी शांत हो जाए।

बांधवगढ़ में लगातार बाघों की मौत फिर भी सरकार मौन क्यों?

Continuous death of tigers in Bandhavgarh, yet why is the government silent? उमरिया । विश्व प्रसिद्ध और बाघ दर्शन के लिए मशहूर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक बार फिर वन्य प्राणी प्रेमियों के लिए बुरी खबर सामने आई है। जिसमें एक नर बाघ शावक की मौत हो जाने की जानकारी मिली है। प्रबंधन के द्वारा मृत बाघ शावक का पीएम आदि कराकर टाइगर रिजर्व की वरिष्ठ अधिकारियों और डॉक्टरों की मौजूदगी में एनटीसीए की गाइडलाइन के तहत उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया है। दरअसल बांधवगढ़ में लगातार बाघों की मौत से जहां प्रबंधन कटघरे में है।वहीं बीते दिसंबर माह में दर्जन भर बाघों की असमय मौत हो जाना प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। इस बार भी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के धमोखर बफर परिक्षेत्र अंतर्गत बरबसपुर बीट के कक्ष क्रमांक 125 में एक नर बाघ शावक मृत अवस्था में गश्ती दल को मिला है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के प्रबंधन की ओर से जानकारी दी गई है कि अमृत न भाग सावन के आसपास एक दूसरे बैग की पगमार्क मिले हैं इसके अलावा मृत शावक को घसीटने के भी निशान दिखाई दे रहे हैं। मृत शावक के शरीर के सभी अंग मौजूद हैं। इसके बाद मृत शावक का डॉक्टर नितिन गुप्ता और बी बी एस मार्को के द्वारा पोस्टमार्टम कर जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजने सैंपल एकत्रित किए गए हैं। मृत शावक का पीएम उपरांत बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की वरिष्ठ अधिकारियों एनटीसीए के मेम्बर की मौजूदगी और एनटीसीए गाइडलाइन के तहत अंतिम संस्कार किया गया है। बताया गया कि नर बाघ शावक की मौत प्रथम दृष्ट्या किसी दूसरे बाघ से आपसी संघर्ष के कारण होना प्रतीत होता है।

कूनो में चीते की मौत नामीबिया से लाए एक और चीते ने तोड़ा दम

भोपाल। मॉनीटरिंग टीम को चीता शौर्य अचेत अवस्था में मिला था। कूनो में अब तक दस चीतों की मौत हो चुकी है, इनमें सात चीते और तीन शावक शामिल हैं। लॉयन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर ने बताया कि आज करीब सवा तीन बजे चीता शौर्य की मौत हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद मौत का खुलासा होगा। अब तक 7 चीते और 3 शावक की मौत कूनो में अब तक चीते और शावक को मिलाकर यह 10वीं मौत है। इनमें 7 चीते और 3 शावक हैं। प्रोजेक्ट चीता में सितंबर 2022 में आठ चीतों को नामीबिया से लाया गया था। इसके बाद फरवरी 2023 में 12 और चीतों को दक्षिण अफ्रीका से लाया गया था। नामीबिया से लाया गया चीता शौर्य अपने सगे भाई गौरव के साथ आया था। दोनों हमेशा एकसाथ रहते थे, साथ शिकार करते थे। कुछ समय पहने दोनों की अग्नि और वायु चीते से भिड़ंत हुई थी। वे दोनों भी सगे भाई थे। इसमें अग्नि चीता गंभीर रूप से घायल हो गया था। इसके बार चीतों को बाड़े में बंद कर दिया था। + कब-कैसे हुई चीतों की मौत… 26 मार्च 2023: साशा की किडनी इंफेक्शन से मौत  नामीबिया से लाई गई 4 साल की मादा चीता साशा की किडनी इंफेक्शन से मौत हो गई। वन विभाग ने बताया कि 15 अगस्त 2022 को नामीबिया में साशा का ब्लड टेस्ट किया गया था, जिसमें क्रियेटिनिन का स्तर 400 से ज्यादा था। इससे ये पुष्टि होती है कि साशा को किडनी की बीमारी भारत में लाने से पहले ही थी। साशा की मौत के बाद चीतों की संख्या घटकर 19 रह गई। 27 मार्च : ज्वाला ने चार शावकों को जन्म दिया साशा की मौत के अगले ही दिन मादा चीता ज्वाला ने चार शावकों को जन्म दिया। ज्वाला को नामीबिया से यहां लाया गया था। कूनो नेशनल पार्क में इन शावकों को मिलाकर चीतों की कुल संख्या 23 हो  गई। 23 अप्रैल : उदय की दिल के दौरे से मौत साउथ अफ्रीका से लाए गए चीते उदय की मौत हो गई। शॉर्ट पीएम रिपोर्ट में बताया गया कि उदय की मौत कार्डियक आर्टरी फेल होने से हुई। मध्यप्रदेश के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन जेएस चौहान ने बताया कि हृदय धमनी में रक्त संचार रुकने के कारण चीते क्की मौत हुई। यह भी एक प्रकार का हार्ट अटैक है। इसके बाद कूनो में शावकों सहित चीतों की संख्या 22 रह गई।  9 मई : दक्षा की मेटिंग के दौरान मौत दक्षा को दक्षिण अफ्रीका से कूनो लाया गया था। जेएस चौहान ने बताया कि मेल चीते को दक्षा के बाड़े में मेटिंग के लिए भेजा गया था। मेटिंग के दौरान ही दोनों में हिंसक इंटरेक्शन हो गया। मेल चीते ने पंजा मारकर दक्षा को घायल कर दिया था। बाद में उसकी मौत हो गई। इसके बाद कूनो में शावकों सहित चीतों की संख्या 21 रह गई। 23 मई : ज्वाला के एक शावक की मौत मादा चीते ज्वाला के एक शावक की मौत हो गई। जिएस चौहान ने बताया कि ये शावक जंगली 31 परिस्थितियों में रह रहे थे। 23 मई को श्योपुर में भीषण गर्मी थी। तापमान 46-47 डिग्री सेल्सियस था। दिनभर गर्म हवा और लू चलती रही। ऐसे में ज्यादा गर्मी, डिहाइड्रेशन और कमजोरी इनकी मौत की वजह हो सकती है। इसके बाद कूनो में शावकों सहित चीतों की संख्या 20 रह गई। 25 मई : ज्वाला के दो और शावकों की मौत पहले शावक की मौत के बाद तीन अन्य को चिकित्सकों की देखरेख में रखा गया था। इनमें से दो और शावकों की मौत हो गई। अधिक तापमान होने और लू के चलते इनकी तबीयत खराब होने की बात आमने सामने आई थी। इसके बाद कूनो में एक शावक सहित 18 चीते बचे। 11 : मेल चीता तेजस की मौत चीते तेजस की गर्दन पर घाव था, जिसे देखकर अनुमान लगाया गया कि चीतों के आपसी संघर्ष में उसकी जान गई है। इस मौत के बाद कूनो में 17 चीते बचे थे। 14 जुलाई : मेल चीता सूरज की मौत चीते सूरज की गर्दन पर भी घाव मिला। कूनो प्रबंधन का अनुमान है कि चीतों के आपसी संघर्ष में ही सूरज की जान गई है। इससे नेशनल पार्क में चीतों की संख्या घटकर 16 रह गई थी। 2 अगस्त : मादा चीता धात्री की मौत कूनो परिसर में ही मादा चीता धात्री का शव मिला था। पोस्टमॉर्टम में इंफेक्शन से मौत की वजह सामने आई थी। धात्री की मौत होने के बाद चीतों की संख्या 15 रह गई थी। 03 जनवरी : आशा ने तीन शावक जन्मे इसी साल 03 जनवरी को श्योपुर जिले के कूनो बेशनल पार्क से बड़ी खुशखबरी आई। मादा चीता आशा ने तीन शावकों को जन्म दिया। कूनो में अब 4 शावक समेत कुल 18 चीते हो गए थे। नामीबिया से कूनो नेशनल पार्क लाई गई मादा चीता आशा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह नाम दिया था।  16 जनवरी 2024: नर चीते शौर्य की मौत नामीबिया से 17 सितंबर 2022 को कूनो नेशनल पार्क लाए गए नर चीते शौर्य ने दम तोड़ा। अब यहां 4 शावक समेत 17 चीते बचे हैं।

कलेक्टर-एसपी और सेना अफसरों के लिए निशुल्क सफारी करने नियमों में करें प्रावधान

Make provision in the rules for free safari for Collector-SP and Army officers भोपाल। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1974 के नियम 34 में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है। इसी कड़ी में विभाग ने टाइगर रिजर्व के सभी फील्ड डायरेक्टरों से सुझाव मांगे गए हैं। पन्ना नेशनल पार्क के क्षेत्र संचालक विजेंद्र झा ने सुझाव दिया है कि कलेक्टर-एसपी, न्यायालयीन अधिकारियों और सेना के अफसरों को टाइगर रिजर्व में निशुल्क सफारी करने के लिए नियम 34 में प्रावधान किया जाए। प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी को लिखे पत्र में फील्ड डायरेक्टर विजेंद्र झा ने कहा है कि पार्क सफारी में आने वाले न्यायालयीन अधिकारी, सेना के अधिकारी, जिला प्रशासन एवं पुलिस अधिकारी निःशुल्क प्रवेश की अपेक्षा रखते हैं, इस सम्बन्ध में भी नियमों में प्रवाधान किया जाना आवश्यक है। झा ने पीसीसीएफ (वाइल्डलाइफ) को स्मरण करवाया है कि टाइगर फाउण्डेशन सोसायटी की बैठक के दौरान माननीय वन मंत्री द्वारा जन प्रतिनिधियों को रियायती पास दिये जाने की घोषणा की गई थी, इसका उल्लेख भी नियमों के उल्लेख किये जाने का कष्ट करें। पांडवफॉल के लिए ₹50 शुल्क करें झा ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि नवीन नियम प्रारूप में पन्ना टाइगर रिजर्व के विशिष्ट स्थल पाण्डवफाल हेतु दर निर्धारित नहीं की गई है। प्रारूप नियम की तालिका 02 के वर्ग 03(ग) में दर्शायी शुल्क रु० 100/- अधिक प्रतीत होती है। वर्ष 2021 में जारी अधिसूचना में प्रवेश दर रु0 25/- थी। अतः पाण्डवफाल हेतु प्रतिव्यक्ति प्रवेश शुल्क की राशि रु० 50/- किये जाने का सुझाव है।

वनविभाग नहीं कर रहा मजदूरी का भुगतान,रेंजर और एसडीएफओ को सुनाई अपनी पीड़ा

वनविभाग ने मजदूरों से खुदाए चोपनी बिट में गड्डे भुगतान के लिए लगा रहे विभाग के चक्कर Forest department is not paying wages भैंसदेही ! दक्षिण (सामान्य) उप वन मंडल भैंसदेही के मजारवनी एवम चोपनी क्षेत्र में मजदूरी करने वाले मजदूर अपनी समस्या लेकर मुख्यालय के वन विभाग पहुंचे जहा उन्होंने रेंजर अमित चौहान को मजदूरी का भुगतान नहीं होने से आ रही समस्या से अवगत कराया। उपस्थित मजदूरों ने बताया की उनके द्वारा चोपनी बिट में बिट अधिकारी के कहने पर गड्ढा खुदाई का काम किया गया। परंतु उन्हें लगभग 2 से 3 माह हो चुके है मजदूरी का भुगतान नहीं मिल पाया है। एसडीएफओ कार्यालय से महीनो आगे नहीं बढ़ती फाइलें….?मांजरवानी चौपनी ग्राम के मजदूर विभाग पहुंचकर एसडीएफओ पांडे जी से भी अपनी मजदूरी की समस्या को लेकर मिले मजदूरों ने बताया की काफी इंतजार के बाद साहब अपने सरकारी क्वाटर से बाहर आए उसके बाद हम मजदूरों ने उनको भी अपनी मजदूरी की समस्याएं से अवगत कराया। उन्होंने हमे जल्द भुगतान कराने का आश्वासन दिया। तो वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी में सामने आया की दक्षिण (सामान्य) उप वन मंडल का कोई भी भुगतान संबंधित या अन्य कार्य एसडीएफओ कार्यालय से होकर ही जिले को जाता है। जानकारी में यह भी सामने आया की एसडीएफओ कार्यालय में महीनो फाइलों को रोककर रखा जाता है। आगे उच्च विभाग में नहीं भेजी जाती। अब क्यों नही भेजी जाती , कितनी पेंडेंसी एसडीएफओ कार्यालय में पढ़ी है। क्या इन मजदूरों की फाइल भी एसडीएफओ कार्यालय में पेंडिंग है । प्राप्त जानकारी में कितनी सत्यता है जिसकी पुष्टि के लिए जब दक्षिण (सामान्य) उप वन मंडल भैंसदेही परिक्षेत्र अधिकारी एसडीएफओ देवानंद पांडे को जब कॉल पर संपर्क कर जानकारी की पुष्टि करनी चाही तो महोदयजी ने फोन रिसीव नहीं किया। और न ही खबर का समय होते तक कॉल बैक कर संपर्क किया। बता दे की पूर्व वन परिक्षेत्र अधिकारी श्री बसोड़ द्वारा हमेशा जब भी कार्य में व्यस्त होने के चलते यदि कोई कॉल रिसीव नहीं किया जाता था तो वह जिम्मेदारी से कॉल बैक कर संपर्क साधा करते थे। जब तक वह मुख्यालय पर रहे हमेशा उन्होंने एक जिम्मेदार अधिकारी होने का परिचय दिया है। इनका कहना हैचोपानी बिट में पौधा रोपण के लिए गद्दे खोदने और तार फिनिशिंग का कार्य किया है, दो माह से भुगतान नहीं मिला बड़ी समस्याएं आ रही है। 50 से अधिक मजदूरों ने मजदूरी का काम किया है। इसलिए हम सभी मजदूर भैंसदेही आए है,साहब से मिलने। गुड्डू कास्देकरमजदूर साहब के कहने पर चोपनी में गड्डे खोदने के काम पर गए थे, दो महीने हो गए पैसे नही मिले। साहब से उसके बारे में ही पूछने आए है। घर चलाने में बहुत परेशानी हो रही है। रामरती बाईमजदूर मांजरवानी मजारवानी,चोपनी ग्राम के मजदूर अपनी मजदूरी की समस्या लेकर आए थे। हमारे द्वारा समय पर उनके भुगतान के लिए 28 दिसंबर 2023 को ही समस्त बिल बाउचर बना कर उच्च अधिकारियों को भेज दिए थे।अब भुगतान क्यों नही हुआ उसकी जानकारी फिलाल मुझे नही है।मैं अपने उच्च अधिकारियों को इन ग्रामीण मजदूरों की समस्या से अवगत कराकर मजदूरों को जल्द भुगतान हो उसके लिए प्रयास करूंगा। अमित चौहानरेंजर दक्षिण (सामान्य) उप वन मंडल भैंसदेही

गांधी सागर अभयारण्य में विदेश से आएंगे चीते.

In Gandhi Sagar Wildlife Sanctuary, cheetahs will be brought from abroad. गांधी सागर अभयारण्य में विदेश से आएंगे चीते, 28 किमी क्षेत्र में फेंसिंग का काम पूरा करने में जुटा वन विभाग – फरवरी में चीतों के लिए अभयारण्य पूरी तरह तैयार हो जाएगा, जल्द निर्णय करेगी केंद्र सरकार  उदित नारायण भोपाल। गांधी सागर अभयारण्य में 64 किमी को बाड़ा तैयार कर लिया गया है। यहां पर करीब 28 किमी की फेंसिंग का काम करीब करीब पूरा हो गया है। इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 17 से 18 करोड़ के आसपास है। अगले माह यानी फरवरी में चीतों के लिए अभयारण्य पूरी तरह तैयार हो जाएगा। इसके बाद चीतों को लाने का निर्णय होगा। केंद्र सरकार की किसी अफ्रीकी देश से चीते लाने को लेकर चर्चा चल रही है। गांधी सागर अभयारण्य का क्षेत्र छोटा है। इसलिए यहां पर 5 से 6 चीतों को ही लाकर रखा जाएगा।  बता दें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर सबसे पहले 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से लाए गए आठ चीते श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क में छोड़े गए थे। इसके बाद 18 फरवरी को 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते कूनो नेशनल पार्क में लाकर छोड़े गए। कूनो के जंगल में कुल 20 चीते लाए गए। इनमें से छह चीतों की मौत हो गई है। कूनो में अभी 14 बड़े चीते हैं और एक शावक है। वहीं, तीन नए शावकों ने अभी जन्म लिया है। कूनो नेशनल पार्क में एक-एक कर चीतों को खुले जंगल में छोड़ा जा रहा है। अब तक दो को ही खुले में छोड़ा गया है। कूनो नेशनल पार्क में चीता सफारी की भी शुरूआत कर दी गई। कूनो से शिफ्ट नहीं होंगे चीते – प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) असीम श्रीवास्तव ने बताया कि गांधी सागर अभयारण्य में कूना से चीते शिफ्ट नहीं किए जाएंगे। वहां विदेश से नए चीते लाए जाएंगे। इसका निर्णय केंद्र सरकार करेगी। अभयारण्य में तैयारी अंतिम दौर में है।

जांच एजेंसियां की सुस्त रफ्तार के चलते दागी अफसरों की पदोन्नत

Promotion of tainted officers due to slow pace of investigation agencies भोपाल ! भ्रष्टाचार के जीरो टॉलरेंस की भाजपा सरकार की नीति को प्रदेश की जांच एजेंसियां लोकायुक्त एवं ईओडब्ल्यू गंभीरता से नहीं ले रही है। जांच एजेंसियां की सुस्त रफ्तार के चलते दागी अफसरों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है, वहीं वे प्रमोशन और प्राइम पोस्टिंग से उपकृत किए जा रहें हैं। हाल ही में वन विभाग में जिस आईएफएस के खिलाफ लोकायुक्त संगठन में दो प्रकरण दर्ज है, उसे डीएफओ से वन संरक्षक के पद पर पदोन्नति दे दी गई। जबकि उनकी सुनवाई के दौरान लोकायुक्त विभाग द्वारा कोई कारवाई नहीं किए जाने पर अफसरों को फटकार लगा चुका है। इस मामले में अब नए वन मंत्री नागर सिंह चौहान ने प्रकरण की फाइल तलब की है।पिछले दिनों वन विभाग में ने 2010 बैच के आईएफएस अफसरों को डीएफओ से सीएफ के पद पर प्रमोट किया गया। प्रमोशन पाने वालों में शहडोल उत्तर में कार्यरत आईएफएस गौरव चौधरी भी है. अधिकृत जानकारी के अनुसार चौधरी के खिलाफ लोकायुक्त संगठन में आर-क्रमांक 216/16 और आर -क्रमांक 218/18 प्रकरण की सुनवाई चल रही है। लंबित प्रकरण होते हुए भी वन संरक्षक के पद पदोन्नत कर दिया गया। पदोन्नति करने के पहले विभागीय विजिलेंस शाखा ने गौरव चौधरी के खिलाफ आर्थिक गड़बड़ी एवं कदाचरण से समन्धित पूरी कुंडली बनाकर विभागीय पदोन्नति कमेटी के भेजा। बावजूद इसके, सीनियर अफसरों ने कमेटी को गुमराह करते हुए गौरव चौधरी को पदोन्नत करने की सिफारिश कर दी। इस आधार पर दाग़दार होने के बाद उन्हें प्रमोट कर दिया गया।लघु वनोपज में भी लंबित हैं मामलासीधी में पदस्थापना के दौरान लोकायुक्त की जांच झेल रहे उत्तर शहडोल के डीएफओ गौरव चौधरी एक बार फिर विवादों से घिर गए हैं। डीएफओ चौधरी ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे फर्म को भुगतान कर दिया गया। प्रधानमंत्री वन धन विकास योजना के अंतर्गत स्व सहायता समूह का गठन किया गया था। इस योजना के अंतर्गत कोई भी भुगतान इसी समूह के माध्यम से किया जाना था किंतु गौरव चौधरी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए बाबू सतीश त्रिपाठी और रेंजर के जरिए मैकल ट्रेडिशनल ऑर्गेनिक फार्मर शहडोल और केके मेमोरियल समिति शाहपुरा को सीधे भुगतान कर दिया गया। इसी प्रकार डीएफओ द्वारा तेंदूपत्ता लाभांश राशि से कराए गए वृक्षारोपण का भुगतान भी समितियों के माध्यम से न कराकर रेंजर के माध्यम से कराया गया।

वन विहार उपचार हेतु लाये गये तेंदुआ शावक की मृत्यु.

Death of leopard cub brought for treatment in forest parkभोपाल। सामान्य वनमंडल अलीराजपुर की परिक्षेत्र जोबट के ग्राम छोटा उण्डवा से रेस्क्यू कर उपचार के लिए लाए गए तेंदुआ शावक की 28 एवं 29 दिसम्बर 2023 की दरम्यानी रात में उक्त तेंदुआ शावक की मृत्यु हो गई। प्रथम दृष्टया मृत्यु का कारण निमोनिया परिलक्षित हुआ है। मृत तेंदुआ शावक का सेम्पल एकत्रित कर परीक्षण हेतु स्कूल आफ वाईल्डलाईफ फॉरेंसिक हैल्थ जबलपुर भेजे गये है। पोस्टमार्टम उपरांत मृत नर तेंदुआ शावक का नियमानुसार वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में वन विहार के अधिकारियों तथा उपस्थित कर्मचारियों के समक्ष दाह संस्कार किया गया।वन विहार राष्ट्रीय उद्यान के वन्यप्राणी चिकित्सक डॉ. अतुल गुप्ता वन विहार एवं वन्यप्राणी चिकित्सक, वाईल्ड लाईफ एस.ओ.एस. डॉ. रजत कुलकर्णी, द्वारा संयुक्त रूप से पोस्टमार्टम किया गया। उल्लेखनीय है कि तेंदुआ शावक मां से बिछड़ गया था। मां से अलग होने के बाद रेस्क्यू कर अलीराजपुर डिपो परिसर में रखा गया। शावक की अत्यंत कमजोर स्थिति को देखते हुये वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशानुसार इसे को दिनांक 23.08.2023 को वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में उपचार एवं रखरखाव हेतु लाया गया था। तत्समय उक्त तेंदुआ शावक को क्वेरेंटाईन बाड़े में रखा जाकर उसका उपचार एवं रखरखाव किया गया। क्वेंरेटाईन अवधि पूर्ण होने के पश्चात उक्त शावक को स्वस्थ्य हालत में तेंदुआ हाउसिंग में स्थानांतरित किया गया था।

अग्रवाल और सुबुद्धि को नए साल में प्रमोट करने विभाग ने मांगे पी.पी.सी.एफ के चार नए पद.

The department to promote Agarwal and Subuddhi has sought four new positions for the PPCF in the New Year. उदित नारायणभोपाल। वन विभाग ने सेवानिवृत होने से पहले दो वरिष्ठ आईएफएस अधिकारियों को प्रमोशन देने के लिए राज्य शासन से पीसीसीएफ के चार पद मांगे है। इस आशय का प्रस्ताव मंत्रालय वल्लभ भवन में भेज दिया गया है। राज्य शासन 6 महीने के लिए अस्थाई तौर पर पीसीसीएफ के चार पद स्वीकृत कर सकता है। पीसीसीएफ के चार पद की मंजूरी मिलने के बाद 1991 बैच के दो अपर प्रधान मुख्यमंत्री वन संरक्षक (वन्य प्राणी) और एपीसीसीएफ (वित्त एवं बजट) पंकज अग्रवाल के अलावा 1992 बैच के एपीसीसीएफ (विकास) यूके सुबुद्धि तथा वन विकास निगम में पदस्थ एपीसीसीएफ सुदीप सिंह पीसीसीएफ के पद पर प्रमोट हो जाएंगे। विभाग ने प्रस्ताव बनाकर शासन को मंजूरी के लिए भेज दी है। 1991 बैच के एपीसीसीएफ पंकज अग्रवाल मार्च 24 में और 1992 बैच के यूके सुबुद्धि नवम्बर 24 में रिटायर हो जाएंगे। यहां यह भी उल्लेखनीय है केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय के अनुसार राज्य में पीसीसीएफ के निर्धारित मापदंड (2%) से अधिक पद पर कार्य कर रहें है। इसके पहले भी वन विभाग ने रिटायरमेंट के पहले के रमन को पीसीसीएफ पद पर प्रमोशन देने की मंशा से राज्य शासन ने पद मांगे थे, जिसे तत्कालीन मुख्य सचिव इक़बाल सिंह बैस ने ख़ारिज कर दिया था।आईएफएस के लिए डीपीसी टलीराज्य सरकार के गठन की प्रक्रिया के चलते 13 राज्य वन सेवा से आईएफएस अवार्ड के लिए 22 दिसंबर को प्रस्तावित पदोन्नति कमेटी की बैठक टल गई है। इस बैठक में 2009 बैच के राज्य वन सेवा के अधिकारी रामकुमार अवधिया को आईएफएस पद पर प्रमोट करने के लिए हरी झंडी मिलने की संभावना थी। कमेटी 2011 बैच के आशीष बांसोड़, विद्याभूषण सिंह, गौरव कुमार मिश्रा, तरुणा वर्मा, हेमंत यादव, सुरेश कोड़ापे, प्रीति अहिरवार, लोकेश निरापुरे, राजाराम परमार, करण सिंह रंधा और माधव सिंह मौर्य को आईएफएस अवार्ड के लिए हरी झंडी दे सकती है। गड़बड़ियों में उलझे रहने की वजह से 2011 बैच की डॉ कल्पना तिवारी और राजबेंद्र मिश्रा के नाम विचार नहीं किया जाएगा। हालांकि 13 अधिकारियों को आईएफएस अवार्ड देने के लिए 2011 बैच से 2013 बैच के करीब राज्य वन सेवा के 39 अफसरों के नाम पर मंथन होना था।

वन विभाग ने वनों की सुरक्षा के लिए मांगी एस.ए.एफ की तीन अतिरिक्त कंपनियां

The Forest Department requested three additional companies of the Special Armed Forces (S.A.F.) for the protection of forests. उदित नारायण भोपाल। राज्य के वन विभाग ने मंत्रालय में दिये एक उच्च स्तरीय प्रेजेन्टेशन में एसएएफ की तीन अतिरित कंपनियां मांगी हैं। वर्तमान में एसएएफ की तीन कंपनियां क्रमशः आठवीं वाहिनी छिन्दवाड़ा, 15 वीं वाहिनी इंदौर एवं 26 वीं वाहिनी गुना के 221 सशस्त्र अधिकारी एवं कर्मचारी वन क्षेत्र में पदस्थ हैं जिन्हें 14 संवेदनशील वनमंडलों में संलग्न किया गया है। चूंकि वनकर्मियों को बंदूक चलाने का अधिकार नहीं दिया गया है, इसलिये वन विभाग ने एसएएफ की तीन अतिरिक्त कंपनियों को देने की और मांग की है। इसी प्रकार, प्रेजेन्टेशन में वन अधिकारियों को पुलिस की तरह वाहनों में बीकन लाईन लाइट लगाने, वन्य प्राणी के हमले में जनहानि होने पर 12 लाख रुपये हर्जाना देने, वन कर्मचारियों को पुलिस की तरह 13 माह का वेतन देने, पौष्टिक आहार भत्ता देने एवं नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पदस्थी पर पुलिस की तरह नक्सल भत्ता देने की भी मांग की है जिससे वन कर्मियों का मनोबल बढ़ सके।

नए साल में पाटिल होंगे वन विभाग के नए मुखिया

Patil will be the new head of forest department in the new year डीपीसी कमेटी ने लगाई उनके नाम पर मुहर उदित नारायणभोपाल ! वन विकास निगम के प्रबंध संचालक अभय कुमार पाटिल जंगल महकमे के नए मुखिया होंगे। उनका कार्यकाल एक महीने का ही होगा। फरवरी में वन विभाग के नए मुखिया असीम श्रीवास्तव हो बनेंगे।मुख्य सचिव वीणा राणा की अध्यक्षता में शुक्रवार को डीपीसी की बैठक हुई। बैठक में उत्तर प्रदेश के वन बल प्रमुख सुधीर शर्मा विशेष रूप से उपस्थित थे। इसी बैठक में पहली बार वन बल प्रमुख के लिए डीपीसी कमेटी ने 1986 बैच के अभय कुमार पाटिल और 1988 बैच के असीम श्रीवास्तव के नाम पर अपनी मुहर लगाई। ऐसा इसलिए किया, क्योंकि अगले वन बल प्रमुख पाटिल का कार्यकाल एक महीने का ही है। यानि फरवरी में हॉफ पद के लिए दोबारा डीपीसी न करनी पड़े। फरवरी में बनने वाले वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव का कार्यकल जुलाई 2025 तक रहेगा। कमेटी ने बैठक में 1990 बैच के बिभाष ठाकुर और विवेक जैन को एपीपीसीएफ से पीसीसीएफ पद पर प्रमोट करने पर मुहर लगाई है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा वन बल प्रमुख आरके गुप्ता और लघु वनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह दिसम्बर में सेवानिवृत होने जा रहें है। नए साल में होंगे बदलाववन विभाग में कई नए बदलाव होने जा रहें है। ये सभी बदलाव नई सरकार के गठन के बाद होने की संभावना है। लघु वन वनोपज संघ एमडी पुष्कर सिंह के रिटायरमेंट के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ अतुल कुमार श्रीवास्तव नए एमडी होंगे। वर्तमान में डॉक्टर श्रीवास्तव वर्किंग प्लान शाखा के प्रमुख हैं। गौरतलब यह है कि अभी तक विभाग में हुई पदस्थापना के दौरान डॉक्टर श्रीवास्तव की वरिष्ठता की अनदेखी की गई। इसी कारण यह संभावना जताई जा रही है कि नई सरकार में उनकी पदस्थापना वरिष्ठता के आधार पर होगी। निगम के मौजूदा एमडी पाटिल के वन बल प्रमुख बनने पर पीसीसीएफ प्रशासन -एक के आरके यादव को निगम में एमडी के पद पर पदस्थ किए जाने की संभावना है। कैडर में पीसीसीएफ का पद प्रशासन-एक का नहीं है। कैडर में यह पद अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी के लिए निर्धारित है। डॉ श्रीवास्तव के संघ में चले जाने पर वर्किंग प्लान शाखा का प्रभार पीसीसीएफ जेएफएम पीके सिंह को दिया जा सकता है। फरवरी में अम्बाडे होंगे पीसीसीएफ वन्य प्राणीपाटिल के जनवरी में रिटायर होने पर पीसीसीएफ वन्य प्राणी असीम श्रीवास्तव वन बल प्रमुख बनेंगे और उनकी जगह पर 88 बैच के आईएफएस विजय एन अम्बाडे पीसीसीएफ वन्य प्राणी होंगे. विभाग में अम्बाडे की छवि वन्य प्राणी विशेष के रूप में बनी हुई है।

हरे भरे वृक्षों की कटाई जारी, विभाग अंजान, जिम्मेदार चुप.

Continued Cutting of green trees, department unaware, responsible parties silent. कटनी । वन विभाग की लचर कार्य प्रणाली के चलते जंगल काटे जा रहे हैं हरे-भरे वृक्षों को ऊजाडा रहा है जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है लेकिन विभाग के द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है जिसे सवाल खड़े हो रहे हैं यह बात जिम्मेदार अधिकारियों तक भी है लेकिन मामले को दबाया जा रहा है जानकारी के अनुसार बरही रेंज सुधरने का नाम नहीं ले रहा है अभी हाल ही में बंजर बरेला और सलैया सिहोरा में हज़ारों क्विंटल लकड़ी हर रोज काटी जा रही हैं फ़ोटो मे तुरन्त की कटान स्पश्ट दिखाई दे रही है जी पी एस के साथ फोटो खींची गईं हैं ताकि विभाग राजस्व की ज़मीन न बता सके सारी तस्वीर जी पी एस के साथ हैं जब भी कोई बात आती है तभी किसी न किसी बहाने से जांच को भटकाया जाता है ताकि संलिप्त कर्मचारियों को बचाया जा सके और जंगल ऐसे ही कटते और लुटते रहें। और आरोपी पर्दे के पीछे रहें। किन्तु अब वन विभाग की बेशर्मी की हद हो गई कार्यालय में बैठकर ही काम किया जा रहा है पूरी तरह फील्ड में जाने से अधिकारी गुरेज कर रहे हैं मजे की बात तो यह है कि जंगल को सुरक्षित रखने का विभाग वन विभाग का होता है लेकिन कर्मचारियों के द्वारा ही जिम्मेदारी से काम नहीं किया जाता है

अपर सचिव वन के खिलाफ लोकायुक्त में मामला दर्ज.

A case has been filed against the Deputy Secretary of Forests in the Lokayukta. लोकायुक्त संगठन तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान अवर सचिव वन अनुराग कुमार के खिलाफ वायरबेड और चैनलिंक खरीदी में अनियमित किए जाने पर प्रकरण पंजी बात कर लिया है। जांच की जिम्मेदारी एसपी सागर लोकायुक्त को दी गई है। लोकायुक्त संगठन ने वन विभाग को पत्र लिखकर खरीदी से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के बार-बार निर्देश दिए जा रहे है किन्तु विभाग दस्तावेज उपलब्ध कराने में टालमटोल कर रहा है। उज्जैन एसपी लोकायुक्त ने 3 साल पहले एपीसीसी सत्यानंद के खिलाफ प्रकरण पंजीबद किया था। इसके बाद से सत्यानंद से संबंधित जांच आगे नहीं बढ़ पाई। इसके अलावा खरगोन डीएफओ प्रशांत कुमार, इको टूरिज्म बोर्ड में पदस्थ साहिल गर्ग सहित आधा दर्जन आईएफएस अधिकारियों के खिलाफ जांच लंबित है किंतु फैसला अभी तक नहीं लिया जा सका है। मैं इस मामले को दिखवाता हूं। कमल अरोरा सीसीएफ जबलपुर

वन विभाग में कमीशन का खेल: चहेते सप्लायर को उपकृत करने मार्केट से हो रही है खरीदी.

The Game of Commission in Forest Department. उदित नारायण भोपाल। वन विभाग में कमीशनबाजी का खेल बदस्तूर जारी है। निर्वतमान वन मंत्री विजय शाह ने अपने कार्यकाल में कमीशनबाजी के खेल पर रोक लगाने की मंशा से प्रदेश स्तर पर एकजाई टेंडर करने के आदेश जारी किए थे। अफसरों ने उनके आदेश को धुंआ में उड़ाते वनमंडल स्तर पर खरीदी का क्रम जारी रखा है। ताज़ा मामला मंडला पूर्व और मंडला पश्चिम का है। दोनों ही वनमंडल की कमान एक ही अफसर के हाथ में है. यही वजह है कि डीएफओ ने अपने चहेते सप्लायर्स जैन बंदुओं को बिल्डिंग मैटेरियल्स और नीमखली गोबर खाद और उपजाऊ मिट्टी प्राय करने का वर्क आर्डर जारी कर दिया। सूत्रों के अनुसार डीएफओ को खरीदारी की इतनी जल्दबाजी थी कि वर्क आर्डर पहले जारी कर दिया और टेंडर बाद में बुलाई। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यालय से आदेश जारी है कि वर्मी खाद और नीमखली अनुसंधान एवं विस्तार शाखा से ही खरीदा जाए किंतु विभाग की शाखा से खरीदने पर कमीशन बाजी का खेल नहीं हो पता, इसलिए निविदा कर मार्केट से खरीदी की जा रही है, वह भी डीएफओ के पसंदीदा गगन जैन के फर्म से खरीदने का फरमान है। डीएफओ ने निविदा 15 दिसंबर को बुलवाई और वर्क आर्डर 14 दिसंबर को ही कर दिया। बिल्डिंग मैटेरियल सप्लाई का ऑर्डर भी अचल जैन की फर्म को दिया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि पौधारोपण के कार्य अनुसंधान एवं विस्तार शाखा के द्वारा किया जाता है। मंडल वन मंडल में यह कार्य टेरिटोरियल डीएफओ कर रहे हैं. डीएफओ नित्यानंद ने पश्चिमी वन मंडल के लिए नीम खली गोबर खाद और उपजाऊ मिट्टी सप्लायर का ठेका गगन जैन की फर्म को दिया है। इन सामग्रियों की खरीदी मार्केट दर से कई गुना अधिक है। पश्चिमी वन मंडल में खरीदी का लेखा-जोखा नीम खली 7350 कुंटल गोबर खाद 881 कुंटल उपजाऊ मिट्टी 1742 कुंटल

बाघ एवं कछुओं की अंतर्राज्यीय तस्करी करने वाला गिरफ्तार.

Caught the international poacher involved in tiger and turtle smuggling. भोपाल। स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स भोपाल ने अलग अलग स्थानों पर कार्यवाही करते हुये! डिण्डोरी एवं राज्य के बाहर अयोध्या उप्र से बाघ के अंगों एवं दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की तस्करी करने वाले 2 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।कछुआ तस्करी में विगत 3 माह से फरार एक आरोपी को अयोध्या उप्र से गिरफ्तार कर न्यायालय नर्मदापुरम के समक्ष पेश किया गया। वहीं वन्यप्राणी बाघ के शिकार एवं उसके अवयवों की अंतराज्जीय तस्करी के प्रकरण में संगठित बावरिया गिरोह के 1 अन्य आरोपी को केन्द्रीय जेल चन्द्रपुर महाराष्ट्र से प्रोडक्शन वारंट पर न्यायालय नर्मदापुरम के समक्ष पेश किये जाने उपरांत रिमांड पर लिया जाकर बाघ के शिकार एवं उससे अवयवों में लिप्त गिरोह के अन्य सदस्यों के संबंध मे विस्तृत पूछताछ की गई एवं आरोपी को तमिलनाडू राज्य में बाघ के शिकार वाले स्थान पर ले जाकर आवश्यक कार्यवाही की गई। उक्त प्रकरण में पूर्व में कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय तस्कर कल्ला बावरिया को गिरफ्तार किया था। जिसके विरूद्ध भारत एवं नेपाल राष्ट्र में बाघ के शिकार एवं उसके अवयवों की तस्करी के कई प्रकरण दर्ज हैं।

वन एवं पर्यावरण स्वीकृति हुई आसान, केंद्र ने किया वन एवं पर्यावरण नियमों में संशोधन.

Approval for forest and environment became easier as the central government made amendments to the forest and environmental regulations. उदित नारायण,    भोपाल। केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों को सरल कर दिया है ताकि बड़े प्रोजेक्ट के क्लीयरेंस जल्द से जल्द मिल सके। नए संशोधन के तहत अब कंसलटेंट वन और पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए सीधे तकनीकी कमेटी को फॉरेस्ट और पर्यावरण  के लिए अपना प्रस्ताव भेज सकेंगे। यानी अब सिया कमेटी की भूमिका को निष्प्रभावी बना दिया गया है।  केंद्र सरकार ने वैज्ञानिक डेटा संचालित तरीके से हितधारकों और तकनीकी मूल्यांकन को और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए, मंत्रालय ने जीआईएस, एडवांस डेटा एनालिटिक्स आदि जैसी उभरती तकनीकी परिवेश के दायरे का विस्तार किया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के नियमों में संशोधन करते हुए कठिन और जटिल प्रक्रियाओं को सरल बनाने की कोशिश की है। अब से, सभी नए प्रस्ताव चाहे किसी भी प्रकार के हों, प्रारंभिक जांच के लिए सदस्य सचिव (एमएस), एसईएसी ( स्टेट  एक्सपर्ट अप्रैज़ल कमेटी ) को प्रस्तुत किए जाएंगे। परिवेश पोर्टल पर ही संबंधित एसईआईएए को स्पष्ट सिफारिशें करने के लिए विशेषज्ञ समिति (एसईएसी) द्वारा जांच और आगे विचार किया जाएगा। नए संस्करण ने अब एमएस, एसईएसी को उपरोक्त ओएम में उल्लिखित प्रक्रिया के अनुसार मानक टीओआर जारी करने में सक्षम बना दिया है। क्या थी पुरानी व्यवस्था संशोधन के पहले तक व्यवस्था यह थी कि प्रोजेक्ट के कंसलटेंट को अपने प्रस्ताव को पहले सिया कमेटी के किंतु-परंतु बिंदुओं के सवालों जवाबों से गुजरना पड़ता था। इसके कारण प्रस्ताव को वन और पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए काफी समय तक इंतजार करना पड़ता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि सरकारी प्रोजेक्ट भी सिया कमेटी के समक्ष ही महीना और वर्षों तक लंबित रहे। इन समस्याओं को लेकर कई बार भारत सरकार केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को शिकायत भी कई गई और इस शिकायत के आधार पर नया संशोधन आदेश जारी किया गया है।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के अंदर प्रबंधन का जीपीएस बघीरा एप्प बना खिलौना.

The GPS Bagheera app has become a tool for management within the Bandhavgarh Tiger Reserve. भारत सरकार के कई लाखो की राशियों से खरीदा गया घटिया मोबाईल जीपीएस, प्रतिबंधित संरक्षित क्षेत्र में नियम विरुद्ध तरीके से प्रवेश वाहनों पर वाहन चालकों पर व गाइडो पर जीपीएस बघीरा एप्प लोकेशन अनुशार प्रबंधन कार्यवाही करने में हों रहा है नाकाम.बांधवगढ़ जंगल सफ़ारी में निर्धारित गति के नियमों की उड़ रही धज्जिया पर्यटको हेतु प्रतिबंधित संरक्षित क्षेत्र में भी प्रवेश कर रही है खुले आम पर्यटक वाहन फुल डे सफारी वाहन चालक व गाइड पर्यटक मिलकर वन्य जीव के रहवासी स्थल में पैदा करते हैं खलल. विश्व विख्यात पर्यटक स्थल बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अपनी छवि का मोहताज नही है किंतु कुछ वाहन चालक गाइड वह पर्यटक अपने निजीगत लाभ प्राप्त करने के लिए विश्व विख्यात पर्यटक स्थल बांधवगढ़ की छवि धूमिल करने में पीछे नहीं है उपरोक्त मामला जब प्रकाश में आया की स्थानीय कुछ वाहन चालक व गाइडों का कहना है की प्रबंधन द्वारा दिए जा रहे गाइड च्वाइस सुविधा जिसका आदेश किसी भी राज्य पत्र व कोई ऐसी टाइगर रिजर्व की पॉलिसी में नहीं है उपरोक्त मामला पूर्व के क्षेत्र संचालक व प्रबंधन की जानकारी में लाई गई थी जिस पर क्षेत्र संचालक द्वारा मनपसंद गाइड को ले जाने पर रोक भी लगाया गया था किंतु कुछ ऐसे फोटो ग्राफर्स है जो नार्मल सफारी के वापस पार्क से आने के बाद करप्शन के रूप में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों के पास काफी नजदीक लेकर ले जाकर फोटोग्राफी करना चाहते हैं व साथ में रोड में अथवा रोड के पास में सोए हुए बाघों को जगाने का प्रयास कर फोटो ग्राफी करते हैं उपरोक्त कार्य में हर गाइड सम्मिलित होने से मना कर देता है तो फीर पर्यटक ऐशे कार्य वाले गाइड वाहन चालक को तलाशता है और उपरोक् कार्यो को अंजाम देने के लिए ऊपर के रसूख दारो से पर्यटक द्वारा दवाब वनवाया गया जिसके कारण बड़े ऐसे फोटोग्राफरों के व् रसूखदार के दबाव में आकर प्रबंधन ने यह कहते हुए की उपरोक्त मामला राजपत्र या एल ए सी में पारित करवाया जाएगा तब तक के लिए वैकल्पिक गाइड व्यवस्था चालू किया जाए किन्तु आज दिनाक तक कोई ऐशा क़ानून पारित नही किया गया जिसका खुलेआम दुरुपयोग देखने को मिल रहा है औए यह भी देखा गया की कुछ वाहन चालक व गाइड चंद पैसों के लिए सभी नियम कानून को रौंदते हुए वन्य जीव व बाघ के राहवास में खलल पैदा करते है जिस पर वन्य प्राणियों के जीवन यापन पर असर पड़ रहा है जिस पर राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण विभाग ने भारत सरकार राजपत्र में नियम पारित करते हुए 20 की स्पीड नियंत्रण व् वाहन से से वाहन की दूरी 50 मी किसी भी जानवर के पास 15 से 20 मिनट से अधिक न रुकने का और किसी भी वन्य प्राणी से वाहन की दूरी 20 मी पर वाहन रोकने का निर्देश जारी किया है और बाघ के मेटिंग पीरियड के दौरान व शिकार पर खाने के दौरान पूर्णतः प्रतिबंध हुआ है लेकिन बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में देखा गया कि सबसे अधिक वाहन तेज गति में उपरोक्त स्थान पर ही पहुंचाते हैं और उपरोक्त स्थान पर ही काफी देरी तक काफी नजदीक पर खड़े रहते हैं और यह सब नजारा प्रबंधन की आंखों के सामने ही होता होता है निर्धारित गति के नियमों की उड़ रही धज्जियाजहा बाघों के गढ़ की सफारी में लगे वाहन जंगलों के अंदर तय गति सीमा की धज्जियां उड़ा रहे हैं, लेकिन प्रबन्धन उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं मध्य प्रदेश। बाघों के गढ़ की सफारी में लगे वाहन जंगलों के अंदर तय गति सीमा की धज्जियां उड़ा रहे हैं जिस पर की राज्य सरकार व भारत सरकार द्वारा पार्क में चल रहे पर्यटक वाहनों में स्पीड गति नियंत्रण हेतु जीपीएस बगीरा एप्प हेतु अभी हाल में ही कई लाख रु का बजट संचालन हेतु दिया है किंतु प्रबंधन द्वारा उपरोक्त राशि का वारा न्यारा कर दिया गया ,और प्रबन्धन उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं। बाघ क्षेत्रों में सफारी ने न सिर्फ तय नियम और कायदों की धज्जियां उड़ाने में जुटे है, बल्कि सरकार के राजपत्र की अवमानना भी कर रहे हैं, लेकिन बाघ सहित अन्य वन्य प्राणियों के सरोकारता का दम भरने वाला बांधवगढ़ प्रबन्धन चिर निंद्रा में लीन है। बाघ सफारी के लिए सफारी हेतु जिन जिप्सियों का उपयोग किया जाता है, उन जिप्सियों की गति सीमा एनटीसी निर्धारित की गई है, जिसमें अचानक वन्यप्राणियों या बाघ के आने पर वाहन नियंत्रित हो सके, तो वहीं बाघों के फ़ोटोग्राफी और विडियोग्राफी के लिए भी दूरियां तय की गई हैं फिर भी पार प्रबंधक के आंखों के सामने सभी नियम कानूनों को जिप्सी संचालको व गाइडों द्वारा रौंदते हुए फोटोग्राफी बाघों के पास वाहन लगा कर शोरगुल कराते हुए वन्य जीव के विचरण क्षेत्र में खलल पैदा किया जा रहा है। पहले हो चुकी है घटनाबावजूद इसके नियम बीटीआर में दम तोड़ रहे हैं, खबर है कि इन सबकी जानकारी बीटीआर फील्ड डायरेक्टर व प्रबंधन के अमला को भलीभांति है, लेकिन उनके द्वारा कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा है। विदित हो कि पूर्व में फोटोग्राफी व मोबाइल फोन के फेर में एक पर्यटक वाहन तेज गति में अपना नियंत्रण खो दिया था, जिसमें कई पर्यटक घायल हो गए थे। बावजूद इसके पार्क प्रबन्धन नियमों का पालन कराने और न ही सफारी वाहन संचालकों द्वारा नियमों का पालन कराने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, बल्कि उदासीन रवैया घटना की पुनरावृत्ति के ताक में बैठा है। फोटोग्राफी पर लगा प्रतिबंधपार्क क्षेत्र में हुई दुर्घटनाओं को देखते हुए 29 मई 2018 के राजपत्र में पर्यटक भ्रमण के दौरान वाहन चालकों के फोटोग्राफी पर प्रतिबंध लगा दिया गया, किंतु कुछ वाहन चालक सरेआम राजपत्र की धज्जियां उड़ाते हुए खुलेआम फोटोग्राफी कर रहे हैं और तो और वन्यप्राणियों के अधिकतम पास वाहनों को सटाकर फोटोग्राफी करते और कराते हैं, जो भारत राजपत्र व एनटीसीए के नियमों के विपरीत है। पार्क प्रबंधन ने बंद की आंखेंबांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सफ़ारी के दौरान पर्यटक वाहनों के शोरगुल के दबाव में आकर संरक्षित क्षेत्र के बाघ अपना क्षेत्र छोड़ बफर क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं, जिसके बाद उनकी … Read more

नए साल में पाटिल होंगे वन विभाग के नए मुखिया, दिसंबर में हो रही है गुप्ता की विदाई.

In the new year, Patil will be the new chief of the Forest Department, and Gupta’s farewell is scheduled for December. डॉ श्रीवास्तव लघु वनोपज संघ और यादव होंगे वन विकास निगम नए एमडी उदित नारायणभोपाल. नए साल में वन विभाग में कई नए बदलाव होने जा रहें है। ये सभी बदलाव नई सरकार के गठन के बाद होने की संभावना है। मौजूदा वन बल प्रमुख आरके गुप्ता और लघु वनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह दिसम्बर में सेवानिवृत होने जा रहें है। सूत्रों के अनुसार वर्तमान वन विभाग के हॉफ गुप्ता के सेवानिवृत्ति के बाद वन विकास निगम के एमडी एके पाटिल वन बल प्रमुख होंगे। हालांकि उनका कार्यकाल एक महीने का ही होगा। इसी प्रकार लघु वन वनोपज संघ एमडी पुष्कर सिंह के रिटायरमेंट के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ अतुल कुमार श्रीवास्तव नए एमडी होंगे। वर्तमान में डॉक्टर श्रीवास्तव वर्किंग प्लान शाखा के प्रमुख हैं। गौरतलब यह है कि अभी तक विभाग में हुई पदस्थापना के दौरान डॉक्टर श्रीवास्तव की वरिष्ठता अनदेखी की गई। इसी कारण संभावना जताई जा रही है की नई सरकार में उनकी पदस्थापना वरिष्ठता के आधार पर होगी। निगम के मौजूदा एमडी पाटिल के वन बल प्रमुख बनने पर पीसीसीएफ प्रशासन -एक के आरके यादव को निगम में एमडी के पद पर पदस्थ किए जाने की संभावना है। कैडर में पीसीसीएफ का पद प्रशासन-एक का नहीं है। कैडर में यह पद अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी के लिए निर्धारित है। डॉ श्रीवास्तव के संघ में चले जाने पर वर्किंग प्लान शाखा का प्रभार पीसीसीएफ जेएफएम पीके सिंह को दिया जा सकता है। फरवरी में अम्बाडे होंगे पीसीसीएफ वन्य प्राणीपाटिल के जनवरी में रिटायर होने पर पीसीसीएफ वन्य प्राणी असीम श्रीवास्तव वन बल प्रमुख बनेंगे और उनकी जगह पर 88 बैच के आईएफएस विजय एन अम्बाडे पीसीसीएफ वन्य प्राणी होंगे. विभाग में अम्बाडे की छवि वन्य प्राणी विशेष के रूप में बनी हुई है। अनूपपुर डीएफओ पर गिर सकती है गाजअनूपपुर डीएफओ सुशील प्रजापत पर गाज गिरने की संभावना प्रबल हो गई है। महिला कर्मचारियों के साथ बदसलूकी और खरीदी में गड़बड़ी संबंधित जांच रिपोर्ट प्रशासन-एक को मिल गई है। पीसीसीएफ प्रशासन एक शाखा ने आरोप पत्र तैयार कर लिए है। शीघ्र ही उन्हें जारी किया जा रहा है। डीएफओ प्रजापत के खिलाफ जांच वन संरक्षक शैलेंद्र गुप्ता ने की थी। सूत्रों ने बताया कि जांच प्रतिवेदन में उन्हें दोषी करार दिया गया है। इस बीच डीएफओ द्वारा वन अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बदसलूकी का सिलसिला जारी है।

वन विभाग में चल रहा जंगलराज – हरियाली बढ़ाने के बजाय 10 हजार पौधों को फेंका.

Jungle Raj is prevailing in the Forest Department – instead of promoting greenery, 10 thousand saplings were thrown away. जेसीबी से मिट्टी और खाद नालों में डाली, एसडीओ ने रिपोर्ट में दस्तावेज और फोटो दिए, फिर भी डीएफओ ने कोई एक्शन नहीं लियाThe Soil and Fertilizers were added, and the SDO provided documentation and photos in the report. District Forest Officer (DFO) did not take any action. उदित नारायणभोपाल। मध्य प्रदेश में वन विभाग के अंदर जंगलराज पूरी तरह से फैल चुका है। हरियाली को बढ़ाने के लिए लाए गए करीब दस हजार पौधों जंगल में फेंकने का कारनामा उजागर हुआ है। जूनियर अधिकारी की रिपोर्ट के बाद भी वृक्षारोपण में बरती गई। इस लापरवाही पर कोई एक्शन नहीं हुआ है। ताजा मामला खरगोन जिले के भीकनगांव का है। खरगोन के इस मामले में भी बार-बार एसडीओ की रिपोर्ट पर डीएफओ ने अब तक कार्रवाई नहीं की है। एसडीओ ने अपनी रिपोर्ट में दस्तावेज और फोटो संलग्न किए हैं, बावजूद इसके डीएफओ ने कोई एक्शन नहीं लिया है। वृक्षारोपण में गड़बड़ी का मामला खरगोन वन मंडल के भीकनगांव रेंज का है। एसडीओ ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि 10 हजार से अधिक पौधे जंगल में फेंक दिए गए जिनका प्लांटेशन नहीं किया गया। यही नहीं प्लांटेशन के लिए खोदे गए गड्ढे के पास खाद और मिट्टी का ढेर लगा हुआ है। इसकी तस्वीर भी एसडीओ ने अपनी जांच रिपोर्ट में डीएफओ को भेजी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फर्जी और घटिया काम के प्रमाणकों को पास करने के लिए दबाव बनाया जाता है। वृक्षारोपण के लिए गड्ढों में मिट्टी परिवर्तन और खाद भी नहीं डाला गया है। जेसीबी से मिट्टी और खाद नालों में फेंके गए हैं। इस मुद्दे को लेकर वन विभाग के अफसरों ने चुप्पी साध ली। सूत्रों का कहना है कि खरगोन डीएफओ प्रशांत कुमार जब सागर दक्षिण में पदस्थित है तब वनीकरण क्षतिपूर्ति के तहत किए गए वृक्षारोपण में भी इसी तरीके की धांधली पाई गई थी। ऐसी गड़बड़ी के चलते उनके खिलाफ विभाग की जांच अभी भी चल रही है। इसके बाद भी खरगोन में वृक्षारोपण की गड़बड़ी पर उनकी लापरवाही बनी हुई है।

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