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कटनी के झिन्ना की खदान का वन भूमि प्रकरण में कंसोटिया के आदेश को वर्णवाल ने बदला

Varnwal changed the order of Consotiya in the forest land issue of Jhinna mine of Katni.

Varnwal changed the order of Consotiya in the forest land issue of Jhinna mine of Katni. भोपाल। अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल ने पूर्व एसीएस वन जेएन कंसोटिया के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें कटनी जिले की तहसील ढीमरखेड़ा के ग्राम झिन्ना की खदान के मामले में सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस लेने का आदेश दिया था। अपने आदेश को तत्काल अमल में लाने के लिए कंसोटिया ने बाकायदा डीएफओ कटनी को कारण बताओं नोटिस की तलब किया था। यहां यह भी तथ्य उल्लेखनीय है कि जब वर्णवाल प्रमुख सचिव वन थे तब उन्होंने भी एसएलपी वापस लेने का आदेश जारी किया था। अब वही बता सकते है कि वे तब सही थे या फिर अब..? गत दिवस वन विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने वन मुख्यालय को निर्देश दिये हैं कि यदि यह केस अब तक वापस नहीं लिया गया है तो केस वापस लेने की कार्रवाई आगामी आदेश तक रोक दी जाये। वर्णवाल के आदेश के बाद जंगल महकमे में लाख टके का सवाल उठ रहा है कि आखिर किस अदृश्य शक्ति के दबाव में आकर पूर्व एसीएस कंसोटिया ने एसएलपी वापस लेने का आदेश जारी किया था। एसएलपी वापस लेने संबंधित आदेश जारी करने के पूर्व 13 अक्टूबर 23 को अपर मुख्य सचिव वन कंसोटिया की अध्यक्षता में एक विशेष बैठक बुलाई गई थी। बैठक में अतुल कुमार मिश्रा सचिव वन, अशोक कुमार पदेन सचिव, आरके गुप्ता तत्कालीन वन बल प्रमुख, अतुल कुमार श्रीवास्तव तत्कालीन पीसीसीएफ वर्किंग प्लान और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक भू अभिलेख डॉ वीएस अन्नागिरी भी उपस्थित थे। यह बैठक में ग्राम झिन्ना एवं हरैया तहसील ढीमरखेड़ा जिला कटनी में स्वीकृत खनिज पट्टे विवाह के निराकरण के लिए बुलाई गई थी। उल्लेखनीय है कि उक्त खदान के वन भूमि में आने के कारण इस पर रोक लगाई गई थी परन्तु खदान स्वामी हाईकोर्ट से जीत गया था जिस पर वन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में 2017 से लंबित है मामला क्या है मामला-शिकायती पत्र के मुताबिक, कटनी के खनन कारोबारी आनंद गोयनका मेसर्स सुखदेव प्रसाद गोयनका को मध्य प्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सरकार के कार्यकाल में 1994 से 2014 तक की अवधि के लिए 48.562 हेक्टेयर भूमि पर खनिज करने का पट्टा मिला था। खनिज पट्टा आवंटित होने की पीछे भी बहुत कुछ छिपा है। दरअसल मध्य प्रदेश शासन ने ग्राम झिन्ना तहसील ढीमरखेड़ा जिला कटनी के वन क्षेत्र की 48.562 हेक्टेयर भूमि पुराना खसरा नम्बर 310, 311, 313, 314/1, 314/2, 315, 316, 317, 318, 265, 320 में खनिज के लिए एक अप्रैल 1991 में 1994 से लेकर 2014 तक की अवधि के लिए निमेष बजाज के पक्ष में खनिज पट्टा स्वीकृत किया था। जिसे वर्ष 1999 में मध्य प्रदेश शासन के खनिज विभाग के आदेश से 13 जनवरी 1999 को उक्त खनिज पट्टा मेसर्स सुखदेव प्रसाद गोयनका प्रोप्राइटर आनंद गोयनका के पक्ष में हस्तांतरित किया गया। लेकिन साल 2000 में वन मंडल अधिकारी कटनी के पत्र के आधार पर कलेक्टर कटनी ने आदेश पारित कर लेटेराइट फायर क्ले और अन्य खनिज के खनन पर रोक लगा दी थी। वन भूमि का इतिहास-ग्राम झिन्ना की भूमि जमींदारी उन्मूलन के बाद वन विभाग को वर्ष 1955 में 774.05 एकड़ भूमि प्रबंधन में मिली थी। जो वर्ष 1908-09 से 1948-49 तक जमींदार रायबहादुर खजांची, बिहारी लाल व अन्य के नाम दर्ज थी जिसे 10 जुलाई 1958 की सूचना और एक अगस्त 1958 की प्रकाशन तिथि से संरक्षित वन घोषित किया गया। इसके बाद भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 4 की अधिसूचना क्रमांक डी-3390-3415-07-दस-3 दिनांक 24 सितम्बर 2007 प्रकाशन दिनांक 14 दिसम्बर 2007 से वनमंडल झिन्ना के अंतर्गत ग्राम झिन्ना के खसरा नम्बर 304, 333, 320 में कुल रकबा 153.60 एकड़ क्षेत्र अधिसूचित कर एसडीएम ढीमरखेड़ा को वन व्यवस्थापन अधिकारी नियुक्त किया गया जो कि वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है। वर्ष 2019-19 में एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा राजस्व प्रकरण क्रमांक /01अ-19(4)/2018-19 में पारित आदेश दिनांक 18-9-2019 के अंतर्गत उल्लेख किया गया कि वादग्रस्त भूमि खसरा नम्बर 320 वर्ष 1906 से 1951 तक मालगुजारी की जमीन नहीं थी। एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेश दिनांक 18-07-2008, 18-10-2011 और 18-09-2019 को पारित प्रत्येक आदेश में उक्त भूमि को वन भूमि मानने से इंकार किया। जिसे कलेक्टर कटनी द्वारा अपने आदेश दिनांक 4-मार्च 2010, 19-मार्च -2013 और 19-दिसम्बर -2019 के माध्यम से एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेशों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई गई है।

कूनों में बच्चों संग बारिश का आनंद लेती दिखी चीता गामिनी, केंद्रीय मंत्री ने शेयर किया वीडियो

Cheetah Gamini was seen enjoying the rain with children in the pond, Union Minister shared the video

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मंत्री ने ठेकेदारी प्रथा जुलाई तक स्थगित करने  लिखी नोटशीट, एसीएस लागू करने पर अड़े

Minister wrote a note sheet to suspend the contracting system till July

Minister wrote a note sheet to suspend the contracting system till July, but is adamant on implementing ACS भोपाल। वन मंत्री नागर सिंह चौहान ने अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया के ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश को 31 जुलाई तक स्थगित करने के लिए नोटशीट लिखी है। यानी ठेकेदारी प्रथा को लेकर मंत्री और विभागीय अफसर एक तरफ हो गए हैं और एसीएस अकेले पड़ते दिखाई दे रहें है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने वन विभाग में चली आ रही परंपरा के अनुसार ही कराई जाने की वकालत करते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखा है।  वृक्षारोपण के कार्य निकट आ गए हैं। इस बात को लेकर की वानिकी कार्य ठेके से कराए जाएंगे अथवा वन विभाग करेगा, इसको लेकर अभी असमंजस की स्थिति है। जंगल महकमे के मुख्यालय में पदस्थ सीनियर आईएफएस अधिकारी से लेकर मैदानी अमला तक अपने मंत्री के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है। दरअसल, मंत्री चौहान ने अपर मुख्य सचिव वन जेएन कंसोटिया के ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश को वन मंत्री नागर सिंह चौहान ने 31 जुलाई तक स्थगित करने के लिए नोटशीट लिखी है। वन विभाग के सीनियर अधिकारियों का एक ग्रुप अपने मंत्री से मुलाक़ात कर ठेके से वानिकी कार्य कराए जाने के दुष्परिणामों से अवगत कराएगा। साथ ही उनसे यह भी मांग करेगा कि  जिन राज्यों में यह प्रथा लागू है, वहां का अध्ययन करने के बाद ही इस पर निर्णय ले। यदि जरुरी हो तो उसे पहले पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ वन मण्डलों में किया जाय। उसके बाद गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाय।  जंगलों में ठेकेदारी प्रथा लागू न करने का आग्रह  वन विभाग के कर्मचारी संगठन लगातार एक्स कि उसे फरमान का विरोध करते आ रहे हैं, जिसमें वानिकी कार्य ठेके पर कराने का आदेश जारी किया गया। लोकसभा चुनाव के दौरान लखनादौन के चुनावी सभा में पांच समितियों के पदाधिकारी जनप्रतिनिधियों ने भी मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर जंगल में ठेकेदारी प्रथा लागू न करने का आग्रह किया है। बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने समितियां के पदाधिकार को आश्वासन भी दिया था। इसके अलावा पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने भी मुख्यमंत्री मोहन यादव को जंगल में ठेकेदारी प्रथा लागू नहीं करने का आग्रह किया है। डॉ सिंह ने आशंका की है कि एक्स के आदेश का अच्छा सा पालन किया जाता है तो आवेश शिकार और जंगलों की कटाई संबंधित अपराध बढ़ जाएंगे।  अभी तक नहीं बन पाए नियम और शर्तें ठेके पर वानिकी कार्य कराने जाने संबंधित जारी आदेश के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास) यूके सुबुद्धि को नियम और शर्तें बनानी थी। समाचार लिखे जाने तक नियम और सरसों का ड्राफ्ट नहीं बन पाया है। ऐसी स्थिति इसलिए भी निर्मित हुई, क्योंकि अधिकारियों को वन मंत्री चौहान की मंशा का पता चला कि वह भी वानिकी कार्य ठेके पर कराए जाने के पक्ष में नहीं है। मंत्री ने एसीएस के आदेश को जुलाई तक  स्थगित करने के लिए कहा है। क्या है एसीएस का फरमान  वन विभाग ने 27 मार्च को एक आदेश जारी कर समस्त वनमंडलों एवं वन्यप्राणी क्षेत्रों में (कोर क्षेत्र छोड़कर) फेंसिंग कार्य, वायरवैड फेंसिंग, चेनलिंक फेंसिंग, पशु अवरोधक खंती एवं पशु अवरोधक दीवार का निर्माण कार्य ठेके पर कराने के निर्देश दिए हैं। आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि 2 लाख से अधिक लागत के समस्त भवन निर्माण एवं मरम्मत कार्य निविदा के जरिए कराया जाए। इसके अलावा नर्सरी में क्षेत्र तैयारी/गढ्‌ढा खुदाई कार्य पौधा रोपण लगवाई एवं अधोसंरचना विकास अंतर्गत पॉली हाउस/मिस्ट चेम्बर का निर्माण के कार्य भी ठेके से कराया जाय।   अधिकारी भी जता चुके है विरोध  प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारियों तक ने एक स्वर में विरोध जताया है। अफसरों का तर्क है कि यह सामुदायिक संसाधन है। स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त होता है और उनका जंगलों से जुड़ाव रहता है। ठेकेदारी लागू होने से वन विभाग में स्थापित इकोसिस्टम ध्वस्त हो जाएगा। विरोध करने वाले अधिकारियों का मानना है ठेकेदार समयबद्धता के साथ काम नहीं कर पाएगा। जंगल महकमा वनग्रामों में रह रहे वनवासियों को रोजगार उपलब्ध कराता है। सुदूर जंगल और नक्सलाइट एरिया में ठेकेदार कैसे काम करेगा, वहां तो विभाग के लोगों से ही काम कराना होगा।  वन ग्रामों से होगा आदिवासियों का पलायन  वन विभाग के नए आदेश के लागू होने पर जंगल क्षेत्र के आसपास रहने वाले गरीब मजदूरों और आदिवासियों खासतौर पर वन ग्रामों के रहवासियों के पलायन की संभावना बढ़ जायगी। इसके अलावा वन विभाग में जो भी काम होते हैं वो एक निश्चित समय-सीमा में स्थानीय मजदूरों और वन क्षेत्र में रहने वाले ट्राइब्स से उनके तकनीकी और कौशलीय ज्ञान और एक्सपीरियंस के आधार पर कराए जाते हैं। ठेके से कराए जाने पर जहां समय-सीमा पर कार्य नहीं हो पाएंगे, वही ठेकेदार अपने मजदूरों और मशीनों से काम कराएगा,  न कि स्थानीय लेबर को रोजगार देगा। इसके अलावा ठेकेदारी प्रथा से लागत बढ़ेगी क्योंकि इसमें ठेकेदार का कमीशन भी जुड़ेगा।  कई सवालों में उलझा है शासन का आदेश  शासन का आदेश गफलत भरा है। इस आदेश मे ब्यापक रूप से त्रुटिंया है। मसलन, आदेश में कहीं उल्लेख नहीं है कि वन विभाग के क्षेत्रिय अमले की क्या भूमिका होगी? वन विभाग इन कार्यो की मनीटरिंग कैसे करेगा ? निविदा से क्रय समग्री का भौतिक सत्यापन कौन करेगा ? निविदा से क्रय सामग्री की क्या गारंटी है कि सामग्री मानकों के आधार पर निविदकार द्धारा प्रदान की गयी सामग्री का तकनीकी परीक्षण किसके द्धारा किया जावेगा ? यदि क्रय सामग्री अमानक स्तर की है तो उसके लिये किसे दोषी ठहराया जायेगा ?  निविदाकार द्धारा प्रदाय की गयी सामग्री पर स्वीकृत आदेश के अनुपात मे नहीं होने पर निविदाकार के बिरूद्ध  इस आर्थिक अनिमियतता के लिये क्या विभागीय कार्यवाही की जावेगी ? उसकी आमानत राशि जप्त की जायेगी या नहीं ?

मनोज अग्रवाल से प्रशासन छिना, अब सचिव द्विवेदी देखेंगे

Administration snatched from Manoj Aggarwal, now Secretary Dwivedi will look after it भोपाल। लघु वनोपज संघ में मंगलवार को बड़ा उलटफेर हुआ। संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने अपर प्रबंध संचालक मनोज अग्रवाल से प्रशासन शाखा ले लिया है। प्रबंध संचालक ठाकुर ने प्रशासन का कार्य सचिव सहकारिता के के द्विवेदी को सौंप दिया है। अब अग्रवाल प्रशासन की जगह एएमडी व्यापार, विधि, समन्वय के साथ आंतरिक अंकेक्षण का कार्य देखेंगे। अभी तक आंतरिक अंकेक्षण का कार्य मुख्य वन संरक्षक एवं कार्यकारी संचालक प्रफुल्ल फुलझेले देखते थे। सूत्रों ने बताया कि पिछले लंबे समय से एएमडी मनोज अग्रवाल ने प्रशासन शाखा से जुड़े कार्य देखना बंद कर दिया था और हर मसले और मुद्दों को एमडी के पास धकेल दिया करते थे। सूत्रों ने यह भी बताया कि अग्रवाल ने फेडरेशन से वन विभाग में लिए जाने का अनुरोध भी किया है।

ओएसडी वन कुमार के खिलाफ जांच से संबंधित दस्तावेज नहीं दे रहे हैं डीएफओ छतरपुर

DFO Chhatarpur is not giving documents related to investigation against OSD Van Kumar भोपाल। तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान ओएसडी वन अनुराग कुमार के खिलाफ वायरबेड और चैनलिंक खरीदी सहित आधा दर्जन से अधिक शिकायतों से संबंधित जांच थम सी गई है। जांच अधिकारी सीएफ कार्य आयोजना अजय कुमार पाण्डेय छतरपुर और वन संरक्षक छतरपुर संजीव झा के बार-बार पत्र लिखने के बावजूद भी मौजूदा डीएफओ छतरपुर दस्तावेज उपलब्ध नहीं दे रहे हैं। कमोवेश ऐसी ही शिकायत लोकायुक्त एसपी सागर की भी है। इसके कारण अनुराग कुमार के विरुद्ध की गई शिकायतों की अब तक शुरू नहीं हो सकी है।जांच अधिकारी एवं वन संरक्षक छतरपुर वर्किंग प्लान अजय कुमार पांडेय ने 27 मार्च को पत्र लिखकर तत्कालीन डीएफओ छतरपुर अनुराग कुमार के खिलाफ कोई विभिन्न शिकायतों से संबंधित दस्तावेज मांगे। पांडेय के पत्र के बाद वन संरक्षक छतरपुर संजीव झा ने अर्थशास्त्र की पत्र लिखकर जांच अधिकारी को समस्त दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए एक से अधिक पत्र लिख चुके हैं किंतु वर्तमान डीएफओ ने उन पत्रों का जवाब देना उचित नहीं समझा है। अनुराग कुमार के खिलाफ शिकायत करने वालों में सेवानिवृत्ति एसडीओ केबी गुप्ता, रुद्र प्रताप सिंह, कर्मचारी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष मुनेंद्र सिंह परिहार समेत 8 लोगों ने शिकायत की है। ये मांगे गए दस्तावेज लोकायुक्त में मामला दर्ज लोकायुक्त संगठन तत्कालीन छतरपुर डीएफओ एवं वर्तमान अवर सचिव वन अनुराग कुमार के खिलाफ वायरबेड और चैनलिंक खरीदी में अनियमित किए जाने पर प्रकरण पंजी दर्ज कर लिया है। जांच की जिम्मेदारी एसपी सागर लोकायुक्त को दी गई है। लोकायुक्त संगठन ने वन विभाग को पत्र लिखकर खरीदी से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के बार-बार निर्देश दिए जा रहे है किन्तु विभाग दस्तावेज उपलब्ध कराने में टालमटोल कर रहा है। आईएफएस को बचाने एसडीओ को फंसाया वन विभाग ने मंत्रालय में पदस्थ ओएसडी अनुराग कुमार को बचाने के लिए एसडीओ डॉ कल्पना तिवारी को बलि बकरा बना दिया। यही नहीं, विभाग के शीर्षस्थ अफसरों ने उसको आरोप पत्र जारी कर आईएफएस की दौड़ से बाहर कर दिया गया। मामला तब का है जब वे टीकमगढ़ के प्रभारी डीएफओ हुआ करते थे। चैन लिंक और वायरवेड की खरीदी में प्रमाणकों पर एसडीओ कल्पना तिवारी के हस्ताक्षर बिना डीएफओ अनुराग कुमार ने भुगतान कर दिया था। जब कुमार के खिलाफ गड़बड़ियों को लेकर शिकंजा कसा गया तब कुमार ने डिलीवरी चालान में हस्ताक्षर करने का आधार बनाकर डॉ कल्पना तिवारी को ही आरोपों के कठघरे में खड़ा कर दिया। जबकि प्रमाणक पर एसडीओ के हस्ताक्षर ही नहीं है।

वन बल प्रमुख ने निजी संस्थानों से वर्मी कम्पोस्ट खरीदने पर लगाई रोक

Forest Force Chief bans purchase of vermicompost from private institutions भोपाल। वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव ने वनमंडलों के डीएफओ द्वारा निजी संस्थानों से खरीदे जा रहे वर्मी कम्पोस्ट पर रोक लगा दी है। उन्होंने इस संबंध में निर्देश जारी कर दिये हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि कैंपा फंड से हर वित्तीय वर्ष में 50-60 करोड़ रुपए की अकेले वर्मी कम्पोस्ट, मिट्टी और गोबर खाद की खरीदी निजी फर्मो से खरीदी जाती है। इस खरीदी में 12 से 15% राशि का बंदरबांट किया जाता है। किसी को रोकने के लिए पहली बार वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने यह कदम उठाया है।श्रीवास्तव ने अपने निर्देश में कहा गया है कि कैम्पा मद के अंतर्गत वृक्षारोपणों में वर्मी कम्पोस्ट खाद के उपयोग एवं मिट्टी के क्रय के संबंध में निर्देश जारी किये गये थे। अन्य विभागीय योजनाओं में कुछ वनमंडलाधिकारियों द्वारा क्षेत्र तैयारी के अंतर्गत भारी मात्रा में खाद एवं मिट्टी बदलने का कार्य कराया जा रहा है। साथ ही वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली का भी उपयोग किया जा रहा है। इसलिये अब कैम्पा मद के साथ-साथ विभाग की अन्य योजनाओं के अंतर्गत किये जाने वाले वृक्षारोपण हेतु अच्छी मृदा वाले क्षेत्रों का ही चयन किया जाये, जिससे कि गढ्ढों में मृदा परिर्वतन एवं गोबर खाद मिलाने पर होने वाले बड़े व्यय से बचा जा सके। पूरे वन मण्डल में उपजाऊ मृदा वाले वन क्षेत्र रोपण हेतु उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में ही अन्य क्षेत्र अंतिम विकल्प के रूप में लिया जाये। वन मण्डलाधिकारी स्वयं क्षेत्र का सघन भ्रमण कर यह प्रमाणित करेंगे कि चयनित वन क्षेत्र वृक्षारोपण हेतु उपयुक्त है एवं यह कि यहां खोदे जाने वाले गड्ढों में मिलाने के लिये गोबर खाद क्रय एवं उपजाऊ मिट्टी संग्रहण आवश्यक है। गढ्ढों की जितनी मात्रा में गोबर खाद एवं मिट्टी मिलाना आवश्यक है उसका उल्लेख वन मण्डलाधिकारी प्रमाण पत्र में करेंगे। सीसीएफ से अनुमति होगी अनिवार्य निर्देश में आगे कहा गया है कि यदि गोबर / मिट्टी का क्रय / संग्रहण करना अति आवश्यक हो तो गोबर / मिट्टी क्रय / संग्रहण करने के पूर्व वृत्त के वन सरंक्षक मुख्य वन सरंक्षक से लिखित स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होगा तथा क्रय / संग्रहण पूर्व मुख्यालय को सूचित करना अनिवार्य होगा। अगर वन सरंक्षक / मुख्य वन संरक्षक के पूर्व स्वीकृति तथा मुख्यालय को सूचित किए बिना क्रय / संग्रहण किया जाता है तो यह अनियमितता के श्रेणी में आएगा तथा अनुशासनात्मक कार्यवाही की जावेगी। खाद एवं मिट्टी का संग्रहण मप्र भण्डार कय एवं सेवा उपार्जन नियम के प्रावधानों के अंतर्गत पूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया अपनाकर किया जाये। यह भी विशेष रूप से निर्देशित किया गया है कि सामाजिक वानिकी वृत्तों में वर्मी कम्पोस्ट उपलब्ध हो तो सभी प्रकार के वृक्षारोपण लिए उन्हीं से वर्मी कम्पोस्ट प्राप्त किया जावे, निजी संस्थानों से वर्मी कम्पोस्ट का क्रय कदापि नहीं किया जावे। हाजिरी देने पर मिलती मेंटेनेंस राशि कुछ मैदानी अफसर की शिकायत है कि कैंपा फंड से जारी होने वाली मेंटेनेंस राशि तब तक नहीं मिलती, जब तक कि अधिकारी वन मुख्यालय में हाजिरी देने नहीं आते है। ऐसी शिकायत करने वाले अफसरों का कहना है कि सामाजिक वानिकी शाखा से समय पर मेंटेनेंस राशि जारी हो रही है। इसके लिए फील्ड में पदस्थ अनुसंधान एवं विस्तार के अधिकारियों को बड़े अधिकारियों की परिक्रमा किए बिना ही मेंटेनेंस राशि जारी की जा रही है।

रानी दुर्गावती टाईगर रिजर्व में कल से शुरू होगी गिद्ध गणना

Vulture census will start from tomorrow in Rani Durgavati Tiger Reserve, many species were found in the month of February. वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में सेकेंड फेज के तहत सोमवार से गिद्ध गणना शुरू हो रही है। बता दें कि इसी साल फरवरी माह में गिद्ध गणना हुई थी। यह गणना विश्व व्यापी रूप में हुई थी। जिसमें गिद्धों की प्रजाति के साथ सामन्य वन और अभयारण्य में भी गणना हुई थी। दमोह : प्रदेश के सबसे बड़े वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में सेकेंड फेज के तहत सोमवार से गिद्ध गणना शुरू हो रही है। जबकि फरवरी माह में एक गणना हो चुकी है, जिसमें पिछली गणना की अपेक्षा पांच गुना ज्यादा गिद्ध मिले थे और कल से शुरू हो रही गणना में इनकी संख्या काफी अधिक बड़ने के आसार हैं। इसी साल फरवरी माह में गिद्ध गणना हुई थी। यह गणना विश्व व्यापी रूप में हुई थी। जिसमें गिद्धों की प्रजाति के साथ सामन्य वन और अभयारण्य में भी गणना हुई थी। दोनों मंडलों में तीन दिन गणना के बाद परिणाम अच्छे निकलकर आये थे। यह गणना दो वर्ष बाद हुई थी, इससे पूर्व 2021 में हुई थी। उस समय नौरादेही में गिद्धों की संख्या 300 थी जबकि फरवरी माह में हुई गणना में यह सख्या 1500 से अधिक पहुंच गई थी जो दो साल में पांच गुनी बड़ी थी। यही आलम दमोह के सामन्य वनों में देखने मिला था। सामान्य वन में भी गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी हुई थी। जिस पर वन विभाग के अधिकारियों ने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत से विलुप्त प्रजाति गिद्ध यहां अपना आशियाना बना रही है। बलचर रेस्टोरेंट की होनी थी शुरूआतगिद्ध प्रजाति के बचाव के लिए वन विभाग अनेक तरह के उपाय खोज रहा है। लगभग दो से तीन माह पूर्व नौरादेही के डीएफओ ने एक प्रस्ताव उच्च अधिकारियों को भेजा था, जिसका उद्देश्य विलुप्त प्रजाति गिद्धों की संख्या को नौरादेही में बढ़ाने के लिए बलचर रेस्टोरेंट चालू करने का हवाला दिया गया था और यह वल्चर रेस्टोरेंट नौरादेही की दो रेंज में खोले जाने थे, जिसकी शुरूआत अप्रैल माह से होनी थी। इस वल्चर रेस्टोरेंट का उद्देश्य था कि वल्चर रेस्टोरेंट में गिद्धों को एकत्र किया जाएगा, उनके लिए भोजन दिया जाएगा। जिससे प्रजाति में वृद्धि हो सके और रहवासी गिद्ध दूसरे क्षेत्रों में ना जा सकें। यह बलचर रेस्टोरेंट डोगरगांव और मुहली रेंज में चालू होने की जानकारी मिली थी, लेकिन यह कार्य अभी चालू नहीं हो पाया है। इसलिए हो रही गणनामुहली रेंजर नीरज बिसेन ने बताया कि ग्रीष्मकालीन गणना पहली बार हो रही है। इस गणना का उदेश्य है जो रहवासी गिद्ध हैं वह गर्मियों में यही रह जाते हैं, लेकिन प्रवासी गिद्ध इन दिनों यहां से प्रवास कर जाते हैं। विभाग की यह मंशा है कि जो गिद्ध स्थाई रूप से रहने वाले हैं उनकी प्रजाति और संख्या की गणना की जाये। गिद्ध गणना लगातार तीन दिन तक जारी रहेगी और उसमें रहवासी गिद्ध और प्रवासी गिद्धों की जानकारी एकत्रित की जायेगी। उन्होंने बताया कि बल्चर रेस्टोरेंट शुरू होने थे उनके प्रस्ताव भेजे गये थे, लेकिन अभी मंजूरी नहीं आई है। जिसके कारण बल्चर रेस्टोरेंट का कार्य अभी आरंभ नहीं हुआ है। आदेश आने के बाद शुरूआत होगी।

जंगल महकमे में प्रभार का खेल: मंत्री ने नोटशीट लिख पूछा क्या है नियम…?

Game of charge in the forest department: The minister wrote a notesheet and asked what are the rules…? भोपाल। जल संसाधन, लोक निर्माण और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग की तरह जंगल महकमे में भी प्रभार का खेल शुरू हो गया है। वन विभाग के आला अफसरों द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी के आधार पर अपने चहेतों को दो-दो प्राइम पदों का प्रभार दिए जाने का खेल खूब चल रहा है। दिलचस्प पहलू यह है कि प्रभार के खेल में मंत्री को विश्वास में नहीं लिया जा रहा है। यही वजह रही कि विभागीय मंत्री नागर सिंह चौहान ने एक नोटशीट लिखकर विभाग से जानना चाहा कि प्रभार के नियम क्या है और दूसरे राज्यों में क्या व्यवस्था है..? हालांकि उनकी यह नोटशीट महीने भर से अधिक समय से प्रशासन-एक शाखा में धूल खा रही है। वन विभाग में सर्किल प्रमुख, वन संरक्षक सामाजिक वानिकी, डीएफओ और एसडीओ के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। इन पदों को नियमित रूप से भरने के लिए अपर मुख्य सचिव से लेकर वन बल प्रमुख प्रमुखता से पहल नहीं कर रहें है। इसके बदले वे अपने चहेते अफसरों को एक से अधिक पदों का प्राइम प्रभार देकर उन्हें उपकृत कर रहें हैं। यही नहीं, उन्हें बाकायदा विकास और कैम्पा मद से अधिक फंडिंग भी दे रहें है। वन मंत्री नागर सिंह चौहान को प्रभार के खेल का फंडा उनके विश्वसनीय अधिकारी ने समझाया। यही नहीं, इसके लिए वन मंत्री चौहान के थिंक टैंक अफसर ने नोट शीट लिखकर विभाग के मुखिया से प्रभार देने के नियम और दूसरे राज्यों में व्यवस्था की जानकारी मांगी है। हालांकि उनकी नोटशीट को लेकर विभाग के अफसर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। यही वजह है कि एक महीने से उनकी नोटशीट धूल खा रही है। मुख्यालय में एपीसीसीएफ ग्रीन इंडिया मिशन से लेकर एपीसीसीएफ सामाजिक वानिकी जैसी महत्वपूर्ण शाखाएं प्रभार पर संचालित की जा रही है। इसके अलावा टीकमगढ़, दक्षिण सिवनी, अनूपपुर और दतिया बरमंडल प्रभाव में संचालित हो रहे हैं। एफडी बांधव टाइगर रिजर्व, बैतूल सर्किल, सामाजिक वानिकी रीवा और सामाजिक वानिकी सागर सर्किल, बालाघाट और खंडवा उत्पादन वन मंडल भी प्रभार में संचालित हो रहे हैं। मैहर के रेंजर को रीवा में दो-दो एसडीओ का प्रभारप्रभार के खेल का ताजा उदाहरण रीवा सर्किल का है। मुख्य वन संरक्षक रीवा राजेश राय ने 70 किलोमीटर दूर मैहर में पदस्थ प्रभारी एसडीओ और रेंजर यशपाल मेहरा को रीवा एसडीओ का प्रभार सौंपा है। राय यही नहीं रुके बल्कि मेहरा पर और उदारता बढ़ाते हुए उन्हें एसडीओ मऊगंज का भी प्रभार दे दिया है। जबकि रीवा में दो-दो वरिष्ठ एसडीओ कार्यरत है। रीवा में पदस्थ दोनों एसडीओ पर राय ने विश्वास नहीं जताया। सवाल यह उठता है कि 70 किलोमीटर दूर मैहर में पदस्थ प्रभारी एसडीओ मेहरा रीवा और मऊगंज का प्रभार की जिम्मेदारी कैसे संभालेंगे..? सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रभारी एसडीओ राजसात की कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है तो फिर यह करवाई कौन करेगा..? रेंजर मेहरा मैहर एसडीओ प्रभार के रूप में काम कर रहे हैं और उन्हें दो और प्रभारी एसडीओ का दायित्व सौंपने के पहले वन बल प्रमुख को विश्वास में नहीं लिया गया। यही वजह है कि प्रभार के आदेश की प्रतिलिपि वन बल प्रमुख को नहीं सौंपी। इसी प्रकार अनूपपुर वन मंडल में तो एक डिप्टी रेंजर को तीन-तीन रेंज के प्रभार दिए गए हैं। चर्चा है कि जंगल महकमे में ऊंचे पदों के प्रभार लेने के लिए पॉवर के साथ-साथ पैसे भी खर्च करने पड़ते हैं। इसी के दम पर वन विभाग में कई बड़े पद प्रभार में चल रहे है। मंडला, सहित आधा दर्जन से अधिक वन मण्डलों में प्रभार के खेल खूब फूल-फल रहा है।

10 लाख रुपए तक की खरीदी एमएफपी पार्क के सीईओ कर सकेंगे

CEO of MFP Park will be able to purchase up to Rs 10 lakh भोपाल। लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने वनोपज प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र (एमएफपी पार्क) गड़बड़झाला पर नकेल कसने की कवायत तेज कर दी है। अब बिना टेंडर कोई भी निर्माण कार्य अथवा खरीदी नहीं की जाएंगी। इसके लिए ठाकुर ने वित्तीय अधिकारों में संशोधन करते हुए पार्क के सीईओ को ₹5लाख से बढ़कर अब 10 लाख रुपए कर दिए गए हैं।संघ के प्रबंध संचालक बिभाष ठाकुर ने बताया कि अब एमएफपी पार्क के सीईओ को टुकड़ों-टुकड़ों में कार्य नहीं कराने की सख्त हिदायत दी गई है। अब अगर किसी एक ही कार्य को टुकड़े-टुकड़े में कराए जाएंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। उन्होंने बताया कि 10 लाख रुपए से अधिक और 20 लाख रुपए तक खरीदी अथवा निर्माण कार्य कराने की अनुमति संघ के प्रबंध संचालक दे सकेंगे. इसी प्रकार 20 लाख रुपए से अधिक तक वित्तीय अनुमतियां संघ के प्रशासक एवं अपर मुख्य सचिव जेएन कंसोटिया के पास है। समितियों से खरीदी करने पर जोर संघ के एमडी ठाकुर ने एमएफपी पार्क के सीईओ अर्चना पटेल को निर्देशित किया है कि अब कोई भी रॉ मटेरियल प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों की एनओसी के बगैर निजी फर्म से नहीं खरीदे जाएंगे। यानि खरीदी में सबसे पहली प्राथमिकता वन उपज सहकारी समितियां को देना होगी। समितियां के इनकार के बाद ही टेंडर के जरिए निजी फर्म से खरीदी हो सकेगी। करीब 1000 वनौपज समितियां रजिस्टर्ड है। संघ ने एक पुस्तक तैयार की है जिसमें उल्लेख है कि कौन-कौन सी वनोपज कितनी मात्रा में एकत्रित की जाती है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में खासतौर से महुआ और बहेड़ा की खरीदी वनोपज सहकारी समितियों से ही की जाएगी। खरीदी के पहले ही उत्पादन प्रबंधन की अध्यक्षता वाली कमेटी एक सूची तैयार करेगी कि किन-किन औषधीय के लिए कौन-कौन से रॉ मैटेरियल कितनी मात्रा में खरीदी जाना है। इनमें से कौन-कौन से रॉ मैटेरियल किन-किन वनोपज समितियों में उपलब्ध है।

डीएफओ के गलत जवाब-दावा देने पर वन बल प्रमुख को हाईकोर्ट में मांगनी पड़ी माफ़ी

Forest Force Chief had to apologize in High Court after DFO gave wrong answer-claim भोपाल। डीएफओ के निरंकुश और बेलगाम कार्यशैली के कारण वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव को हाई कोर्ट जबलपुर के जस्टिस विवेक अग्रवाल की भरी अदालत में माफी मांगनी पड़ी। वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने विभाग की गलती स्वीकारते हुए उसे दुरुस्त करने के लिए एक माह का समय मांगा था पर हाई कोर्ट ने उन्हें 15 दिन की मोहलत दी है। उच्च न्यायालय जबलपुर में पदोन्नति को लेकर सेवानिवृत्ति रेंजर शीतल प्रसाद पांडेय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश विवेक अग्रवाल ने वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव को वताया कि उत्तर बालाघाट वन मंडल के सेवानिवृत्ति एवं तत्कालीन वन मंडलाधिकारी आरबीएस बघेल द्वारा जवाब – दावा में गलत दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। जस्टिस अग्रवाल ने विभाग की खिंचाई करते हुए कहा कि किसी ने भी मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर अपना दिमाग लगाने की जहमत नहीं उठाई। यहां तक ​​कि सरकार द्वारा जो रिकॉर्ड भी पेश किया गया है वह याचिकाकर्ता के डिप्टी के पद पर पदोन्नति के मामले पर विचार के संबंध में है। रेंजर और रेंजर के पद पर नहीं। इस पर वन बल प्रमुख श्रीवास्तव ने 16 अप्रैल 24 को जस्टिस विवेक अग्रवाल की अदालत में यह स्वीकार किया कि उत्तर दाखिल करने में विभाग की ओर से कुछ गलतियां हुई हैं। वह इसके लिए बिना शर्त माफी मांगते हैं। उनका कहना है कि गलती सुधारने और उचित कदम उठाने के लिए उन्हें कुछ समय दिया जाए। विभाग के मुखिया के आग्रह पर जस्टिस अग्रवाल ने गलती को सुधारने और याचिकाकर्ता के दावों को देखने के लिए 15 दिन का समय दिया। क्या था मामला याचिकाकर्ता शीतल प्रसाद पांडेय फॉरेस्ट गार्ड के रूप में वन विभाग में भर्ती हुए थे। 1976 -77 में उनके साथियों को डिप्टी रेंजर पद पर पदोन्नति दे दी गई किंतु शीतल प्रसाद पांडेय इससे महरूम हो गए, क्योंकि उनका एसीआर क प्लस नहीं था। इसी प्रकार 1994 को उनके बैच के कर्मचारियों को डिप्टी से रेंजर के पद पर पदोन्नति कर दिया गया। पदोन्नति से वंचित शीतल प्रसाद पांडेय ने राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण के समक्ष एक मामला दायर किया था जिसे ओए के रूप में पंजीकृत किया गया था। क्रमांक 1355/1995, जो उच्च न्यायालय में स्थानांतरित होने पर डब्ल्यूपी के रूप में पंजीकृत किया गया था। इस मामले में उच्च न्यायालय ने 14 नवंबर 06 को आदेश पारित किया था जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक द्वारा कहा कि याचिकाकर्ता का मामला अपने कनिष्ठों को वरीयता देते हुए पदोन्नति पर विचार करने का हकदार है। एसडीओ कल्पना के मामले में भी हो सकती है वन बल प्रमुख की सिंचाई 16 अप्रैल को हाईकोर्ट में वन बल प्रमुख द्वारा माफी मांगने के बाद अब चर्चा है कि कहीं डॉ असीम श्रीवास्तव को पन्ना दक्षिण में पदस्थ एसडीओ कल्पना तिवारी के मामले में भी उच्च न्यायालय की फटकार सुनना न पड़ जाय ? पन्ना दक्षिण वन मंडल में पदस्थ एसडीओ कल्पना तिवारी ने जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया उच्च न्यायालय जबलपुर में 12 दिसंबर 23 को रिट पिटीशन (WP/30843/2023) दायर की। उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा 21 दिसम्बर 2023 को सुनवाई करते हुए को 45 दिनों में निर्णय लिये जाने हेतु आदेश पारित किया। 5 महीने बाद भी विभाग ने उच्च न्यायालय द्वारा पारित किये गये निर्णय का पालन नहीं किया। न्यायालय के आदेश के बाद भी विभाग द्वारा निर्णय नहीं लिए जाने के कारण जहां विभाग के मुखिया को एक बार फिर न्यायालय की अवमानना का सामना करना पड़ सकता है वहीं एसडीओ कल्पना तिवारी आईएफएस की दौड़ से बाहर हो गई है। सूत्रों का कहना है कि जिस प्रकरण को लेकर कल्पना तिवारी ने हाई कोर्ट जबलपुर में दस्तक दी है उसमें वन विभाग के ओएसडी अनुराग कुमार और बालाघाट सीसीएफ एकेएस सेंगर मुख्यत: दोषी है और दो आईएफएस को बचाने के लिए एसडीओ कल्पना तिवारी को बलि का बकरा बनाया गया है। संक्षेप में मामला यह है कि टीकमगढ़ वन मंडल में हुई चैनलिंक फेंसिंग और वायरवेड खरीदी में गड़बड़ी के मुख्य जिम्मेदार तत्कालीन डीएफओ एकेएस सेंगर और तत्कालीन प्रभारी डीएफओ एवं वर्तमान ओएसडी वन विभाग अनुराग कुमार है। सेंगर ने निर्धारित प्रक्रिया एवं मापदंड के अनुसार खरीदी नहीं की और अनुराग कुमार ने भौतिक सत्यापन कराए बिना चालान के आधार पर भुगतान कर दिया है। यह मामला लोकायुक्त में लंबित है।

वित्त विभाग से गैर हाजिर होकर वन मंत्री के लिए ओएसडी के रूप में काम करने वाले चौहान को निलंबित करने मुख्य सचिव को लिखा पूर्व विधायक ने पत्र

The former MLA wrote a letter to the Chief Secretary to suspend Chauhan who was working as OSD for the Forest Minister while being absent from the Finance Department भोपाल। पूर्व विधायक एवं संयुक्त क्रांति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष किशोर समरीते ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वित्तीय सेवा के अधिकारी रणजीत सिंह चौहान को निलंबित कर जांच करने की मांग की। पूर्व विधायक समरीते ने पत्र लिखा है कि चौहान वित्त विभाग से गैरहाजिर होकर वन मंत्री नागर सिंह चौहान के लिए अनाधिकृत तौर पर ओएसडी के रूप में काम कर रहे हैं। चौहान स्वयं को ओएसडी बता कर  विभाग के सीनियर आईएफएस अधिकारियों से लेकर डीएफओ तक पर दबाव डालकर अपनी मनमर्जी से काम करवा रहे हैं।  पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री को लेकर पत्र में कहा है कि  रणजीत सिंह चौहान वित्तीय सेवा अधिकारी जिसकी सेवाएं प्रमुख सचिव वित्त विभाग द्वारा  अभी तक विधिवत तौर पर प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग को स्थानांतरित नहीं की है। दिलचस्प पहलू यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने भी इनके द्वारा वन मंत्री के जरिए भिजवाई गई ओएसडी बनाने संबंधित नोटशीट को भी वापस कर दी गई है। इन सबके विपरीत रणजीत सिंह चौहान वित्त अधिकारी, अनाधिकृत तौर पर विशेष कर्तव्य अधिकारी, वन मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह मामला पद एवं अधिकारों के दुरूपयोग एवं कदाचरण  का है तथा गंभीर जांच का विषय है।  पूर्व में भी इनके खिलाफ की गई थी शिकायतें  पूर्व में  इनके विरूद्ध श्रीनिवास मूर्ति सदस्य सचिव जैव विविधता बोर्ड की शिकायत पर भी शासन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। अपर मुख्य सचिव केके सिंह के वित्तीय सलाहकार रहते हुये इनके द्वारा अपने लिये लग्जरी कार की मांग एवं अतिरिक्त वित्तीय लाभ लेने के कारण हटाये गये थे। बीजनेस रूल का हवाला देते हुये गलत तरीके से शासन में बैठे अधिकारियों के बीच कार्य विभाजन करवाने के पीछे भी चौहान ही मुख्य सूत्रधार थे। इस मुद्दे पर तत्कालीन वन मंत्री उमंग सिंघार और अतिरिक्त मुख्य सचिव एपी श्रीवास्तव के बीच विवाद ब्यूरोक्रेसी में खूब उछला था और मामला अभी भी जांच के लिये लंबित है।   पूर्व विधायक ने लगाए कथित रूप से पैसे लेने का आरोप  अपने पत्र में पूर्व विधायक ने सिवनी सीसीएफ  एवं भारतीय वन सेवा के अधिकारी एसएस उद्दे की प्रमाणित शिकायत पर जांच को प्रभावित करने तथा निलंबन नहीं करने में 20 लाख रूपये लिये गये। इसी तरह बालाघाट के प्रभारी मुख्य वन संरक्षक सेंगर को टीकमगढ़ में वन मण्डलाधिकारी रहते हुये चैन लिंक (बारवेड) एवं अन्य खरीदी में निलंबन से बचाने 50 लाख रूपये लिये तथा उसे बालाघाट में प्रभारी मुख्य वन संरक्षक बना दिया गया। बालाघाट डीएफओ  अभिनव पल्लव वन मण्डलाधिकारी उत्तर वन मण्डल सामान्य के विरूद्ध शिकायत में सप्लाई तथा खरीदी में लाखों के फर्जी भुगतान में निलंबन से बचाने के लिए  रिश्वत के रूप लाखों रुपए लिये गये। यह अत्यंत गंभीर मामला है। अंत में समरीते ने मुख्य सचिव से अनुरोध किया है कि आप इस मामले की जांच करवाकर विशेष कर्तव्य अधिकारी रणजीत सिंह चौहान को तत्काल निलंबित कर इसकी सेवायें वित्त विभाग को वापिस करने तथा इसकी सम्पत्ति की जांच करवाएं।

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