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सोशल मीडिया पर विवादित टिप्पणी करने वाली महिला प्रोफेसर को हाईकोर्ट ने दी जमानत …

जबलपुर  एमपी हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला प्रोफेसर को जमानत दे दी है। प्रोफेसर पर सोशल मीडिया में धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणी करने का आरोप है। जस्टिस ए के सिंह की एकलपीठ ने कहा कि आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने महिला प्रोफेसर को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है। प्रोफेसर ने व्हाट्सअप ग्रुप में एक विवादित वीडियो और मैसेज पोस्ट किया था। माता सीता को लेकर की थी टिप्पणी डिंडौरी में अतिथि प्रोफेसर के तौर पर काम करने वाली डॉ. नसीम बानो ने यह पोस्ट किया था। उन्होंने सीता माता के अपहरण का एक कार्टून वीडियो व्हाट्सअप ग्रुप में डाला था। इसके साथ ही, उन्होंने पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र भी किया था। उन्होंने लिखा था कि आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर गोली मारना और जय श्री राम के नारे लगाकर मारना, दोनों में कोई अंतर नहीं है। इन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा डिंडौरी कोतवाली पुलिस ने डॉ. नसीम बानो के खिलाफ B.N.S., 2023 की धारा 196, 299 और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस ने उन पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया था। 28 अप्रैल से जेल में थी प्रोफेसर हाईकोर्ट में जस्टिस ए के सिंह की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि महिला प्रोफेसर 28 अप्रैल 2025 से जेल में हैं। ट्रायल कोर्ट ने 30 अप्रैल 2025 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट को यह भी पता चला कि उनके खिलाफ कोई और आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक शिक्षित व्यक्ति और कॉलेज में प्रोफेसर होने के नाते, डॉ. बानो को व्हाट्सअप पर मैसेज भेजने में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले मैसेज या वीडियो भेजने के आधार पर किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने दी सशर्त जमानत कोर्ट ने डॉ. नसीम बानो को सशर्त जमानत दी है। इसका मतलब है कि उन्हें कुछ शर्तों का पालन करना होगा। अगर वे इन शर्तों का पालन नहीं करती हैं, तो उनकी जमानत रद्द भी हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले की जांच जारी रहेगी और ट्रायल कोर्ट अपना काम करेगी।

केवल उन्हीं छात्रों को कक्षा 10वीं और 12वीं में प्रवेश मिलेगा जिन्होंने कक्षा 9वीं अथवा 11वीं संस्कृत बोर्ड से सम्बद्ध विद्यालयों से उत्तीर्ण की हो: हाईकोर्ट

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान (पूर्व में संस्कृत बोर्ड) के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें यह शर्त जोड़ी गई थी कि केवल उन्हीं छात्रों को कक्षा 10वीं और 12वीं में प्रवेश मिलेगा जिन्होंने कक्षा 9वीं अथवा 11वीं संस्कृत बोर्ड से सम्बद्ध विद्यालयों से उत्तीर्ण की हो। आदेश के विरुद्ध आधा दर्जन स्कूलों द्वारा याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि इस संशोधित प्रवेश नीति के कारण मध्य प्रदेश बोर्ड या सीबीएसई से अध्ययनरत छात्रों के परीक्षा फार्म अस्वीकार किए जा रहे हैं, जिससे वे कक्षा 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं से वंचित हो रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृत रूपराह ने दलील दी कि यह निर्णय न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि समानता के अधिकार का उल्लंघन भी है। याचिका में यह भी कहा गया कि मप्र बोर्ड, सीबीएसई और संस्कृत बोर्ड सभी सरकारी संस्थाएं हैं, इसलिए उनके बीच इस प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक और मनमाना है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने छात्रों को राहत देते हुए संस्कृत बोर्ड के संशोधित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और बोर्ड को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता छात्रों के परीक्षा फॉर्म स्वीकार किए जाएं और उन्हें आगामी परीक्षाओं में सम्मिलित किया जाए। कोर्ट ने अनावेदकों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। याचिका की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। यह आदेश उन सैकड़ों छात्रों के लिए राहत लेकर आया है, जो नियमों में अचानक किए गए बदलाव से परीक्षा देने से वंचित हो रहे थे।

गांधी मेडिकल कॉलेज में नियुक्तियों पर हाईकोर्ट सख्त, दोषियों पर हो कार्रवाई

भोपाल गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल में लैब असिस्टेंट और तकनीशियन पदों पर हुई नियुक्तियों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने गठित जांच कमेटी को 6 सप्ताह में जांच पूरी करने के आदेश जारी किये हैं. युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जांच रिपोर्ट में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. ‘नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियां’ भोपाल निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट वीर सिंह लोधी ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. यह जनहित याचिका गांधी मेडिकल कॉलेज में हुई नियुक्तियों को लेकर है. जिसमें आरोप लगाते हुए कहा गया है कि “गांधी मेडिकल कॉलेज में साल 2021 में लैब असिस्टेंट और तकनीशियन पदों पर नियमों को ताक में रखकर नियुक्तियां की गई थीं.” ‘जांच कमेटी ने नहीं की कोई कार्रवाई’ याचिका की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता वीर सिंह लोधी की तरफ से बताया गया कि “नियुक्तियों पर सवाल उठने और शिकायत होने पर जांच के लिए 1 मई 2024 और 19 सितंबर 2024 को पारित आदेश के बाद डॉ संजय जैन के नेतृत्व में 3 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था. जांच कमेटी गठित होने के बावजूद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.” ‘6 सप्ताह में जांच कमेटी पेश करे अपनी रिपोर्ट’ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए अपने आदेश में कहा है कि “6 सप्ताह में कमेटी अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करे. रिपोर्ट पेश होने के 3 दिनों की अवधि में उसकी प्रति याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए. रिपोर्ट के आधार पर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता अक्षांश श्रीवास्तव ने पैरवी की.”

जब न्याय में देरी होती है तो समाज में असंतोष पैदा होता है : हाईकोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ ने कहा है कि अदालती प्रक्रिया को ई प्रक्रिया के साथ डिजिटल बनाएं। कोर्ट रूम को कार्य स्थल के साथ-साथ कर्म स्थल भी बनाएं। जज, वकीलों की सरल, सुगम, सस्ता न्याय दिलाने में अहम भूमिका होती है। जब न्याय में देरी होती है तो समाज में असंतोष पैदा होता है, अतः न्याय में देरी ना करें। जस्टिस कैथ ने यह विचार जिले के मालथौन में 12 करोड़ से अधिक में तैयार किए गए सिविल कोर्ट भवन का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी के कारण समाज में असंतोष पैदा होता है। असंतोष पैदा ना हो इसलिए सभी जजो और वकील तत्काल कार्रवाई करते हुए शीघ्रता से मुकदमों का निराकरण करें। उन्होंने कहा कि अदालती प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम लागू करें, जिससे कि सभी काम जल्द से जल्द से किए जा सकें। उन्होंने कहा कि अदालत में बार एवं बेंच का सामान होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की सरकार के द्वारा न्यायालय के संसाधनों के लिए पर्याप्त बजट प्रदान किया गया है। इस बजट के माध्यम से अदालतों में सभी आवश्यकताएं पूरी की जाएंगी। उन्होंने कहा कि सागर एक खूबसूरत शहर है, इसी प्रकार यह भवन भी खूबसूरत है। आप सभी अपने काम को भी खूबसूरत बनाएं। उन्होंने कहा कि यह भवन मात्र पत्थरों की संरचना नहीं है, इस संरचना में न्याय की देवी के माध्यम से समाज को न्याय मिलता है। हाईकोर्ट के जस्टिस एवं सागर जिले के पोर्टफोलियो जज संजय द्विवेदी ने कहा कि भवन निर्जीव होता है, जिसे सजीव बनाने के लिए आप सभी का सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह भवन समय पर बना है, इसके लिए जिला प्रशासन के कार्य को धन्यवाद देते हैं। इसी प्रकार तुरंत न्याय करने के लिए जज एवं वकील काम करें। इस अवसर पर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश महेश कुमार शर्मा ने स्वागत भाषण देते हुए सागर जिले एवं नवनिर्मित भवन के संबंध में विस्तृत जानकारी दी।

जबलपुर में फ्लाईओवर निर्माण को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर 3 हफ्ते में मांगा जवाब

 जबलपुर जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जबलपुर के हाईकोर्ट चौराहा से रद्दी चौकी-आधारताल तक बन रहे फ्लाईओवर निर्माण को लेकर जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते के अंदर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। जबलपुर निवासी अधिवक्ता मुनीश सिंह की ओर से दायर इस याचिका की प्रारंभिक सुनवाई हाईकोर्ट चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत एवं जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बैंच ने की। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि आधारताल रोड पर प्रतिदिन जाम की स्थिति बनती है, जिसके कारण आए दिन दुर्घटनाएं भी हो रही हैं। जाम का खामियाजा अस्पताल जाने वाले मरीजों को भी भुगतना पड़ता है। स्कूल जाने या घर लौटने वाले बच्चों को भी परेशानी होती है। ऐसे में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यह मामला जनसुविधा और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, और इसमें टालमटोल अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने पक्ष रखते हुए सभी तथ्यों से कोर्ट को अवगत कराया। एडिशनल एडवोकेट जनरल ने जताई आपत्ति राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल भरत सिंह ठाकुर ने याचिका पर आपत्ति जताते हुए इसे “सुनवाई के योग्य नहीं” बताया। उनका तर्क था कि यह एक प्रशासनिक विषय है और इसके लिए सरकार को बाध्य करना न्यायालय का कार्यक्षेत्र नहीं है। उन्होंने कहा कि जबलपुर से ही लोक निर्माण विभाग के मंत्री हैं, जिनसे जनता संपर्क कर सकती है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि इस याचिका को ‘कष्टकारक’ मानते हुए निरस्त कर दिया जाए। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद जबलपुर के नागरिकों को उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी है। वर्षों से लोग इस रूट पर ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहे हैं, आपको बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर के ठीक बाहर मुख्य सड़क पर यह आलम होता है कि अधिवक्ताओं सहित मुवक्किलों के वाहन खड़े करने के लिए भी जगह नहीं है, जिसके कारण लगभग आधी सड़क पार्किंग की तरह इस्तेमाल होती है। लेकिन अब तक इस पर कोई स्थायी समाधान नहीं आया। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप से अब उम्मीद है कि प्रशासन इस दिशा में ठोस और समयबद्ध कदम उठाएगा।

हाईकोर्ट का आदेश, 90 लाख रुपए जमा करने पर मिलेगी जामनत

जबलपुर करीब एक साल पहले हुए 90 लाख रुपये के गबन के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी लक्ष्मीदास उर्फ रीना रघुवंशी की जमानत याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि जब तक आरोपी पूरी राशि जमा नहीं करता उसे जमानत नहीं दी जाएगी। आरोपी लक्ष्मीदास पर आरोप है कि उसने ऑनलाइन दस्तावेजों के जरिए फर्जीवाड़ा कर 90 लाख रुपये निकाले। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, लेकिन जमानत के लिए तय शर्तें पूरी न करने के कारण उसे राहत नहीं मिल सकी। हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बिना पूरी राशि जमा किए जमानत संभव नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत आरोपी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसमें उसने दावा किया कि उसके वकील ने बिना अनुमति के 90 लाख रुपये जमा करने की बात कही थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का मामला बताते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया। इस मामले में आरोपी के भाई हर्ष रघुवंशी को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। हाईकोर्ट ने अब उसकी जमानत भी रद्द कर दी है, जबकि लक्ष्मीदास के मामले में फैसला सुरक्षित रखा गया है। पुलिस जांच और बरामदगी पुलिस ने इस गबन के मामले में लक्ष्मीदास, उसके भाई हर्ष रघुवंशी, मनीष सोनी और सागर को आरोपी बनाया है। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी द्वारा इस्तेमाल की गई एमजी हेक्टर कार भी जब्त कर ली है। अब सभी की नजर इस पर टिकी है कि क्या आरोपी अदालत की शर्तें पूरी कर पाएगा या नहीं। अगर वह 90 लाख रुपये जमा नहीं करता, तो उसे जमानत मिलना मुश्किल होगा।

प्रदेश के थाना परिसरों में मंदिर निर्माण का रास्ता साफ, हाईकोर्ट ने खारिज की चुनौती देने वाली याचिका

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जबलपुर सहित प्रदेश के पुलिस थाना परिसरों में हनुमान मंदिर निर्माण को चुनौती देने वाली जनहित याचिका निरस्त कर दी। इसके साथ ही प्रदेश के थाना परिसरों में मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने साफ किया कि पूर्व की एक जनहित याचिका के आदेश का पालन न होने के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका के साथ इस बिंदु को सम्मिलित कर विरोध किया जा सकता है। पृथक से सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। बहरहाल, जबलपुर के अधिवक्ता ओपी यादव की जनहित याचिका निरस्त होने के साथ ही थाना परिसरों में हनुमान मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है।   एसएएफ डीजीपी व एडीजीपी आदेश का पालन कर दें रिपोर्ट हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) के डीजीपी कैलाश मकवाना व एडीजीपी इरशाद वली को निर्देश दिए हैं कि पूर्व आदेश का पालन कर उसकी रिपोर्ट पेश करें। न्यायमूर्ति अचल कुमार पालीवाल की एकलपीठ ने डीजीपी को निर्देश दिए हैं कि विभिन्न संवर्गों के स्थानांतरण के संबंध में सक्षम अधिकारी को उचित दिशा निर्देश दें। कोर्ट ने 30 दिन के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता को इस आदेश की प्रति डीजीपी को प्रेषित करने कहा ताकि इसका पालन सुनिश्चित किया जा सके। याचिकाकर्ता छठवीं वाहिनी में पदस्थ आरक्षक कृष्ण कुमार शर्मा की ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, संजय कुमार शर्मा, रोहिणी शर्मा व विनीत टेहेनगुरिया ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता का विगत वर्ष दसवीं वाहिनी, विसबल सागर से छठवीं वाहिनी जबलपुर स्थानांतरण हुआ था। जिसके विरुद्ध याचिका दायर की गई थी।  

छिंदवाड़ा : महंत के 90 लाख रुपये हड़पने वाली शिष्या साध्वी लक्ष्मी को जमानत, CJM Court में जमा करने होंगे सारे पैसे

छिंदवाड़ा नोनिकला के श्री राम जानकी मंदिर के महंत स्व. कनक बिहारी दास जी महाराज के खाते से फर्जी नॉमिनी बनकर 90 लाख रुपए निकालने वाली कथित साध्वी को सीजेएम कोर्ट में 90 लाख रुपये जमा कराने होंगे, तब उसको जमानत मिलेगी। दरअसल हाईकोर्ट ने श्रीराम जानकी मंदिर आश्रम छिंदवाड़ा के महंत की राशि के गबन के मामले में आरोपी साध्वी लक्ष्मी दास को 90 लाख रुपये सीजेएम कोर्ट में जमा कराने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा आवेदिका राशि जमा करने के बाद उसकी रसीद जांच अधिकारी को दें। रसीद सौंपने के बाद आवेदिका को अग्रिम जमानत देने के निर्देश दिए। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने इस मामले में बनाए एक अन्य आरोपी हर्ष रघुवंशी को भी उक्त राशि जमा कराने की शर्त पर जमानत का लाभ दे दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत के दौरान आरोपी देश छोड़कर नहीं जाएंगे। भोपाल निवासी साध्वी लक्ष्मी दास और हर्ष रघुवंशी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने पैरवी की। वहीं, आपत्तिकर्ता श्याम सिंह रघुवंशी की ओर से अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने पक्ष रखा। मामले के अनुसार उक्त आश्रम के महंत कनकदास महाराज ने अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण के बाद 2121 यज्ञ करने का संकल्प लिया था। इसके लिए उन्होंने समाज से दान के माध्यम से 90 लाख रुपये की राशि एकत्रित की थी। एक सड़क दुर्घटना में 17 अप्रैल 2023 को महंत की मृत्यु हो गई। आरोप है कि उनकी मृत्यु के बाद स्वयं को शिष्या बताते हुए साध्वी ने महंत का मोबाइल नंबर अपने नाम करा लिया और उक्त राशि का गबन कर लिया। साध्वी ने उसमें से कुछ राशि अपने भाई हर्ष और एक मित्र मनीष सोनी को ट्रांसफर कर दी। इसके बाद छिंदवाड़ा के चौरई पुलिस थाने में आवेदकों के खिलाफ धोखाधड़ी और अन्य धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। भाई हुआ था गिरफ्तार, जब्त हुई थी कार दरअसल साध्वी का भाई हर्ष रघुवंशी पिछले दिनों भोपाल से गिरफ्तार हो गया था। उसके पास से लग्जरी कार बरामद की गई थी। इसे सारे मामले में हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण फैसला दिया है।  

पांच आईएएस को थमाया अवमानना का नोटिस, छत्तीसगढ़-बिलासपुर में संयुक्त पंजीयक को दूसरा विवाह करने पर नहीं किया निलंबित!

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ राज्य सहकारिता विभाग के संयुक्त पंजीयक द्वारा एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने के मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर भी कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने इस संदर्भ में दायर अवमानना याचिका पर विभाग के पांच आईएएस अफसरों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया है। बता दें कि 25 अक्तूबर 2020 को बिलासपुर निवासी विनय शुक्ला ने सहकारिता विभाग से शिकायत की थी कि बिलासपुर संभाग के तत्कालीन संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं सुनील तिवारी द्वारा सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 22 का उल्लंघन करते हुए एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह बिना शासन के मंजूरी के किया गया है। दूसरी पत्नी से उसका पुत्र भी है। यह भारतीय दण्ड विधान की धारा 166, 420, 34 एवं अन्य धाराओं के तहत अपराध है। अतः अपचारी अधिकारी को निलंबित किया जाए, विभागीय जांच कर उसे बर्खास्त कर, उसके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराया जाए। शिकायत पर संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्रवाई न करने पर 27 जुलाई 2021 को शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 29 सितंबर 2023 को कोर्ट ने संयुक्त पंजीयक के विरुद्ध इस मामले की 6 माह के भीतर जांच किए जाने के आदेश दिये। इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर 12 सितंबर 2024 को संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने हिमशिखर गुप्ता तत्कालीन सचिव सहकारिता, सीआर प्रसन्ना वर्तमान सचिव सहकारिता, रमेश शर्मा तत्कालीन पंजीयक सहकारिता, दीपक सोनी तत्कालीन पंजीयक सहकारिता और कुलदीप शर्मा वर्तमान पंजीयक सहकारिता को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

हाई कोर्ट ने शासन से पूछा कि अन्य पिछड़ा वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया

जबलपुर हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन से पूछा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है। इस सिलसिले में सरकार को जवाब पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। एडवोकेट यूनियन फार डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस संस्था ने जनहित याचिका दायर कर ओबीसी वर्ग को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह व राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह व अमित सेठ ने पक्ष रखा। 10 दिन के स्थान पर एक माह का समय दिया शुक्रवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने सरकार से पूछा कि क्यों न ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का अंतरिम आदेश देकर समस्त याचिकाओं पर अंतिम फैसला इसके अधीन कर दिया जाए। इस पर सरकार की ओर से आपत्ति पेश की गई और कहा गया कि इन मामलों में सालिसिटर जरल तुषार मेहता पक्ष रखेंगे। पांच भागों में बांटें प्रकरण मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को निर्देश दिए कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी मामलों को पांच भागों में वर्गीकृत करें। पहली वो याचिकाएं जो ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के विरोध में हैं और दूसरी वो जो इसके समर्थन में हैं। एक वर्ग में उन मामलों को रखा जाए जिसमें सामान्य प्रशासन विभाग तथा महाधिवक्ता के अभिमत के अनुसार 87:13 प्रतिशत फार्मूले को चुनौती दी गई है। एक वर्ग में उन याचिकाओं को रखा जाए जिनमें अभ्यर्थियों की नियुक्ति होल्ड करने को चुनौती दी गई है। वहीं पांचवें वर्ग में ओबीसी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग वाला याचिकाओं को शामिल किया जाए। मंदिर की भूमि बेचने पर 20 दिसंबर तक मांगा जवाब हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने मंदिर की भूमि बेचे जाने के रवैये पर जवाब-तलब कर लिया है। इस सिलसिले में राज्य शासन, प्रमुख सचिव, टीकमगढ़ के कलेक्टर, एसडीएम व व टीआई सहित अन्य को नोटिस जारी किए गए हैं। अगली सुनवाई 20 दिसंबर को नियत की गई है। जनहित याचिकाकर्ता खेमचंद अहिरवार की ओर से पक्ष रखा गया। दलील दी गई कि ग्राम बगौरा जिला टीकमगढ़ में ग्रामवासियों के सहयोग से हनुमान मंदिर की स्थापना की गई थी। हनुमान मंदिर शासकीय जमीन पर बनाया गया था। मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक है और बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने आते हैं।

मानदंड पर सवाल उठाने वाली याचिकाएं खारिज, छत्तीसगढ़-हाईकोर्ट में सिविल जज मुख्य परीक्षा 2023 के मूल्यांकन को चुनौती

बिलासपुर. बिलासपुर हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) द्वारा आयोजित सिविल जज (प्रवेश स्तर) मुख्य परीक्षा 2023 के मूल्यांकन मानदंड को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि उम्मीदवार परीक्षा पैटर्न की पूर्व सूचना के हकदार नहीं हैं और परीक्षा पुस्तिका में दिए गए निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। दरअसल, सिविल जज भर्ती प्रक्रिया 7 जून 2023 को 49 रिक्तियों की घोषणा के साथ शुरू हुई। 3 सितंबर 2023 को प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद उम्मीदवारों को 25 अगस्त 2024 को मुख्य परीक्षा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। परिणाम 8 अक्तूबर 2024 को घोषित किए गए, जिसमें 151 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया। इसमें कई उम्मीदवारों को इस आधार पर अयोग्य ठहराया गया कि उनके उत्तर अनिवार्य अनुक्रमिक प्रारूप का पालन नहीं करते थे। इस पर याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें आरोप लगाया गया कि CGPSC ने प्रक्रिया के दौरान “नियमों को बदल दिया,” जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओ ने तर्क दिया कि उन्हें परीक्षा प्रक्रिया में बदलाव के कारण मनमाने ढंग से अयोग्य घोषित कर दिया गया। मामला इस बात पर केंद्रित था कि CGPSC ने उम्मीदवारों को प्रश्न-उत्तर पुस्तिका में दिए गए स्थानों में अनुक्रमिक क्रम में उत्तर लिखने की आवश्यकता के बारे में सूचित नहीं किया।

पुलिस के 5967 पदों पर होगी भर्ती, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट ने हटाई रोक

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ में 5967 पदों पर आरक्षक भर्ती प्रक्रिया पर लगी रोक हट गई है। मामले में हाई कोर्ट में हुई आज सुनवाई हुई। कोर्ट ने प्रक्रिया जारी रखने के लिए निर्देश दिया है, जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की बेंच में  सुनवाई हुई है। इसमें पुलिस कर्मियों के बच्चों को मिलने वाली छूट को हटाया गया है, शहीद पुलिस कर्मियों के बच्चों को मिलने वाली छूट यथावत रहेगी। नक्सल प्रभावित सुरक्षा कर जवानों के बच्चों को भी छूट मिलेगी, सभी पुलिसकर्मियों के बच्चों को छूट को माना गया गलत। पुलिस कर्मियों के परिजनों की छूट को कोर्ट ने माना आर्टिकल 14  और 16 का उल्लंघन। अब फिजिकल टेस्ट के बाद आगे बढ़ेगी भर्ती की प्रक्रिया।

पत्नी के बार-बार आत्महत्या के प्रयास और धमकी को माना क्रूरता, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी

बिलासपुर. बिलासपुर हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा आत्महत्या करने की बार-बार धमकी देने और प्रयास करने को क्रूरता माना है। इस आधार पर पति को तलाक की अनुमति देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में कोई भी जीवनसाथी शांति से नहीं रह सकता। पति द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि पत्नी बार-बार आत्महत्या की धमकी देती थी। दुर्ग जिला निवासी याचिकाकर्ता युवक की 28 दिसंबर 2015 को बालोद निवासी युवती के साथ चर्च में शादी हुई। पत्नी शादी के बाद निजी कॉलेज में जॉब करने लगी। उसे 22 हजार रुपये वेतन मिलता था, इसमें से 10 हजार रुपये अपने माता-पिता को भेजती थी। पति ने इस पर कभी आपत्ति नहीं की। पत्नी ने कुछ दिन अपने भाई को भी साथ रखा। भाई किसी कारण से वापस चला गया। इसके बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया। बात-बात में वह आत्महत्या करने की धमकियां देने लगी। कभी नशीला सिरप पीया तो कभी छत से कूदी। पहली बार उसने रसोई में घुस कर दरवाजा बंद कर गैस चालू कर जल मरने की धमकी दी। दूसरी बार अत्यधिक मात्रा में नशीला कफ सिरफ पीकर खुदकुशी की कोशिश की। इसके बाद एक बार उसने छत से कूद कर आत्महत्या का प्रयास किया। इस पर पति ने परिवार न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दिया। न्यायालय से आवेदन खारिज होने पर पति ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की। वहीं पत्नी ने भी वैवाहिक अधिकार की बहाली के लिए याचिका प्रस्तुत की। दोनों की याचिका पर जस्टिस रजनी दुबे एवं संजय कुमार जायसवाल की डीबी में सुनवाई हुई। सुनवाई उपरांत कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बार-बार आत्महत्या करने की धमकी देना क्रूरता के समान है।साथ ही अगर यह आशंका पैदा हो जाए कि दूसरे पक्ष के साथ रहना उसके लिए हानिकारक होगा तो साथ रहना मुश्किल है। फरवरी 2018 से दोनों अलग अलग रह रहे हैं। पत्नी के आचरण को देखते हुए मानसिक दबाव में पति का उसके साथ रहना सम्भव नहीं है। कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पति के तलाक की याचिका को स्वीकार किया। कोर्ट ने पति को दो माह के अंदर पत्नी को 5 लाख रुपए स्थाई गुजारा भत्ता एक मुश्त देने का निर्देश भी दिया है।

हाईकोर्ट ने ओंकारेश्वर बांध के डूब प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने के मामले में सरकार को निर्देशित किया

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओंकारेश्वर बांध के डूब प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने के मामले में सरकार को निर्देशित किया है। जस्टिस विशाल मिश्रा और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने इस पर विचार करने के लिए सरकार को दो माह का समय दिया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से दायर याचिका पर 7 जून 2013 को हाईकोर्ट ने सरकार को डूब प्रभावितों के लिए विशेष पैकेज प्रदान करने का आदेश दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने आवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि सरकार ने विस्थापितों को पैकेज पर 15% का लाभ तो दिया, लेकिन इसे सभी पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंचाया गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को विशेष पैकेज का लाभ नहीं दिया गया, जबकि वे इसके पात्र थे। यह कार्रवाई न केवल अवैधानिक है, बल्कि न्यायालय के आदेश का उल्लंघन भी है। न्यायालय का आदेश युगलपीठ ने सुनवाई के बाद पाया कि प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने में सरकार ने लापरवाही बरती है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह इन बालिग बेटों को भी विशेष पैकेज का लाभ प्रदान करने पर विचार करे। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज शर्मा ने पैरवी की। कोर्ट ने इस मामले में न्यायालयीन प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने के लिए सरकार को दो माह की मोहलत दी है।

30 साल बाद हाईकोर्ट से मिली राहत, छत्तीसगढ़-रायपुर के प्रोफेसर दम्पति को बीमा कंपनी दे 6% ब्याज सहित डेढ़-डेढ़ लाख रूपए

बिलासपुर। 30 साल पहले मिनी बस से यात्रा के दौरान घायल हुए दंपती को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत मिली है। कोर्ट ने दोषी वाहन चालक और बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वे तीन माह के अंदर प्रत्येक घायल को 6 प्रतिशत ब्याज सहित डेढ़-डेढ़ लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि दें। जस्टिस राधा किशन अग्रवाल की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई। जानकारी के मुताबिक, 16 अगस्त साल 1994 को रायपुर निवासी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के भौतिक विभाग के हेड डॉ. विठ्ठल कुमार अग्रवाल अपनी पत्नी सरला अग्रवाल के साथ मिनी बस से कोरबा से चांपा जा रहे थे। इस दौरान रास्ते में एक लापरवाह ट्रक चालक ने बस को टक्कर मारी। दुर्घटना में डॉ. अग्रवाल और उनकी पत्नी को गंभीर चोट आई। दोनों को गंभीर चोट आने पर चांपा के अस्पताल में प्रारंभिक उपचार के बाद बेहतर उपचार के लिए उन्हें नागपुर ले जाया गया था। दंपती ने उपचार में आए खर्च और क्षतिपूर्ति के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में वाद प्रस्तुत किया था, लेकिन अधिकरण से वाद खारिज हो गया. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने घटना में प्रत्येक को लगी चोटों के लिए 1 लाख 50 हजार रुपये क्षतिपूर्ति और मुआवजे की राशि पर 6 प्रतिशत की दर से ब्याज देने के निर्देश दिए हैं।

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