LATEST NEWS

DNA रिपोर्ट के आधार पर बंद किया केस, हाईकोर्ट बोला– लापरवाही बर्दाश्त नहीं

भोपाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की एकलपीठ ने डीएनए रिपोर्ट में आरोपी के निर्दोष पाए जाने के बावजूद असली आरोपी की तलाश शुरू न करने पर पुलिस विभाग को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने डीजीपी से पूछा कि क्या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को दोबारा प्रशिक्षण की जरूरत है या आम जनता ऐसे ही पुलिस की कानूनी जानकारी की कमी का खामियाजा भुगतती रहे। बार एंड बेंच में छपी खबर के मुताबिक, मामला बैतूल जिले का है। आरोपी को 10 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था और उसके खिलाफ चालान पेश किया जा चुका था। दिसंबर 2025 में आई डीएनए रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि आरोपी नाबालिग पीड़िता से जन्मे बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके बावजूद पुलिस ने वास्तविक आरोपी की पहचान और गिरफ्तारी के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अदालत की टिप्पणी- पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण की जरूरत 10 फरवरी को जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बैतूल के पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र जैन से पूछा कि डीएनए रिपोर्ट के बाद आगे क्या कार्रवाई की गई। कोर्ट ने पाया कि एसपी संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। आदेश में कहा गया कि यह स्थिति राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करती है। डीएनए जांच में आरोपी को क्लीन चिट कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि दो अन्य दुष्कर्म मामलों में भी शुरुआती तौर पर गिरफ्तार किए गए आरोपी बाद में डीएनए जांच में निर्दोष पाए गए, लेकिन पुलिस ने समय रहते वास्तविक आरोपियों की तलाश में सक्रियता नहीं दिखाई। पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस विभाग अपनी कार्यप्रणाली में सुधार को लेकर गंभीर नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने एसपी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई का आदेश नहीं दिया, बल्कि डीजीपी से यह विचार करने को कहा कि क्या विभाग को सक्षम और विधिक रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता है? कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आगे की जांच ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेकर की जाए, क्योंकि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आगे की जांच के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में निर्धारित है। जमानत अर्जी खारिज कोर्ट ने कहा कि चूंकि बच्चा जीवित है, इसलिए सभी संभावित संदिग्धों के रक्त नमूने लेकर जैविक पिता की पहचान सुनिश्चित की जाए। जहां तक जमानत का सवाल है, कोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता। चूंकि अभी पीड़िता का साक्ष्य दर्ज नहीं हुआ है, इसलिए इस स्तर पर आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती। बता दें कि आरोपी की ओर से अधिवक्ता प्रदीप सिंह चौहान ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता स्वाति जॉर्ज उपस्थित रहीं।

व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग के सबूत मान्य, हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका की खारिज

बिलासपुर. हाईकोर्ट ने पति-पत्नी से संबंधित विवाद के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मंजूर करने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने मामले में पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि परिवार न्यायालय के पास यह विशेष शक्ति है कि मामले के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को बतौर सबूत स्वीकार कर सकते हैं। बता दें कि रायपुर निवासी ने पत्नी से तलाक की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता पति ने पत्नी की अन्य लोगों के साथ व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड में लेने के लिए आवेदन किया था। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया। हालांकि फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका मंजूर कर ली, जिसके खिलाफ पत्नी हाईकोर्ट पहुंची। हाईकोर्ट ने भी परिवार न्यायालय के आदेश पर मुहर लगाते हुए पति को राहत दी है और प्राइवेसी से अहम फेयर ट्रायल को माना है।

उप अभियंताओं को राहत: हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अंतरिम रोक

रायपुर ग्रामीण अभियांत्रिक सेवा की वर्ष 2011 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ में बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। हाईकोर्ट द्वारा 66 उप अभियंताओं (सिविल) की नियुक्तियां नियमों के विरुद्ध बताते हुए रद्द किए जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। दरअसल, इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने अधिवक्ता शाल्विक तिवारी के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 3 फरवरी 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने भर्ती को अवैध करार देते हुए 66 उप अभियंताओं की नियुक्तियां निरस्त कर दी थीं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि भर्ती विज्ञापन के अनुसार अभ्यर्थियों के पास कट-ऑफ तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक योग्यता होना अनिवार्य था, जबकि कई चयनित अभ्यर्थियों ने आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा बाद में प्राप्त किया। ऐसे में उनकी नियुक्तियां प्रारंभ से ही अवैध मानी गईं। कोर्ट ने यह भी पाया कि 275 पदों के लिए जारी विज्ञापन के बावजूद उससे अधिक पदों पर नियुक्तियां की गईं, जो सेवा कानून के सिद्धांतों के विपरीत है। सुनवाई के दौरान नियुक्त उप अभियंताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि वे करीब 14 वर्षों से सेवा दे रहे हैं, इसलिए उनके मामलों में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि लंबी सेवा अवधि किसी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं बना सकती। इसके बाद कोर्ट ने क्वो वारंटो का रिट जारी करते हुए नियुक्तियां रद्द कर दी थीं। हाईकोर्ट के फैसले को दी गई चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए प्रभावित कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली का रुख किया। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 11 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी किया और हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव एवं क्रियान्वयन पर स्थगन आदेश पारित किया है। यह प्रकरण लगभग 60 शासकीय कर्मचारियों की सामूहिक सेवा-समाप्ति से संबंधित है, जिन्हें प्रारंभिक रूप से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में उप अभियंता (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहते हुए उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्देश दिया था कि संबंधित अभ्यर्थियों के पास भर्ती विज्ञापन के अनुसार आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक अर्हता उपलब्ध नहीं थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश के अनुसार, संबंधित कर्मचारियों की सेवा की निरंतरता अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित विशेष अनुमति याचिका (SLP) के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। मामले में याचिकाकर्ताओं एवं निजी प्रत्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, परमेश्वर के. तथा गौरव अग्रवाल ने पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता हर्षवर्धन परगनिहा, चंद्रशेखर ए. चकलाब्बी (AOR) और सुधांशु प्रकाश (AOR) भी उपस्थित रहे।

रजनीकांत की फिल्म को लेकर हाईकोर्ट का सख्त फैसला, 12 साल बाद क्यों लगा ₹2.52 करोड़ का जुर्माना?

मद्रास रजनीकांत और दीपिका पादुकोण की 2014 में रिलीज तमिल फिल्‍म ‘कोचादाइयां’ अचानक चर्चा में आ गई है। मद्रास हाई कोर्ट ने फिल्‍म के प्रोड्यूसर जे मुरली मनोहर और उनके प्रोडक्शन हाउस, मीडियावन ग्लोबल एंटरटेनमेंट लिमिटेड पर ₹2.52 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। यही नहीं, कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि मेकर्स या तो चार हफ्ते के अंदर यह जुर्माना चुकाएं या फिर छह महीने जेल की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाएं। यकीनन, आप भी यही सोच रहे होंगे कि आख‍िर 12 साल बाद ऐसा क्‍या हो गया, तो आइए इस पूरे मामले को तफ्तील से समझाते हैं। Kochadaiiyaan को रजीनकांत की बेटी सौंदर्या रजनीकांत ने डायरेक्‍ट किया है। फिल्‍म में रजनीकांत और दीपिका पादुकोण के अलावा जैकी श्रॉफ भी थे। यह फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी। लेकिन रजनीकांत के कारण इसने खूब चर्चा बटोरी थी। हाई कोर्ट का यह मामला असल में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी को मुआवजा देने और चेक बाउंस होने से जुड़ा है। आइए, पहले जानते हैं कि कोर्ट में क्‍या हुआ। 2021 और 2023 में भी सुनाई गई थी सजा मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस सुंदर मोहन ने फिल्‍म के प्रोड्यूसर जे मुरली मनोहर और उनकी प्रोडक्शन कंपनी द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिवीजन केस को कुछ हद तक मंजूरी दी है। यह केस 2021 में एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा उन्हें दी गई सजा और 2023 में एक सिटी सिविल कोर्ट द्वारा कन्फर्म किए जाने के खिलाफ दायर किया गया था। करोड़ों का कर्ज, नहीं चुकाए बकाया पैसे हाई कोर्ट ने मनोहर को 4 हफ्ते के अंदर एडवरटाइजिंग एजेंसी, ‘एडब्यूरो एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड’ को ₹2.52 करोड़ देने या 6 महीने जेल की सजा भुगतने का निर्देश दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और गड़बड़ियों पर सवाल उठाने के बाद, फैसला सुनाया कि ऐड एजेंसी ने सिर्फ ₹10 करोड़ उधार दिए थे और उसे ₹8.74 करोड़ चुका दिए गए थे, जिससे ₹1.26 करोड़ का बैलेंस रह गया। इसलिए सजा को बदलकर ₹2.52 करोड़ का जुर्माना कर दिया गया, जो उस पर बकाया रकम से दोगुना था। 2014 में प्रोडक्‍शन हाउस ने लिया था 20 करोड़ रुपये का कर्ज ‘द हिंदू’ ने इससे पहले एक रिपोर्ट में बताया कि एडब्यूरो एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड के अबीरचंद नाहर ने प्रोड्यूसर मोहन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कहा गया कि उनकी फर्म ने 25 अप्रैल, 2014 को मीडियावन ग्लोबल एंटरटेनमेंट के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) किया था। उन्होंने फोटोरियलिस्टिक मोशन-कैप्चर मूवी के पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए प्रोडक्शन हाउस को ₹20 करोड़ का कर्ज दिया था। प्रोडक्शन हाउस ने फाइनेंसर को बताया था कि ‘कोचादाइयां’ के लीज राइट्स की बिक्री से कम से कम ₹20 करोड़ मिलेंगे। ऐड एजेंसी ने किया था गारंटी मुनाफा का वादा, चेक हुआ बाउंस ऐड एजेंसी ने अपनी शिकायत में कहा कि किसी तीसरे पक्ष को राइट्स बेचने से पहले उसे बिक्री से होने वाली कमाई का 20% या कम से कम ₹2.40 करोड़ के गारंटी मुनाफे का वादा किया गया था। ऐड एजेंसी ने 28 अप्रैल, 2014 को प्रोडक्शन हाउस के बैंक अकाउंट में ₹10 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। लेकिन दिसंबर 2014 में, प्रोडक्शन हाउस की तरफ से एजेंसी को जारी किया गया चेक बाउंस हो गया। 2021 में कोर्ट ने प्रोड्यूसर मोहन को माना दोषी दिसंबर 2021 में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मोहन को दोषी ठहराया और उन्‍हें छह महीने जेल की सजा सुनाई। उन्‍हें तब ₹7.70 करोड़ देने या छह महीने की और जेल की सजा भुगतने का भी आदेश दिया गया। फिर अगस्त 2023 में, एक सिविल कोर्ट ने सजा को जारी रखा। लेकिन प्रोड्यूसर ने ₹12.75 करोड़ चुकाने का दावा किया। उसने ऐड एजेंसी पर बाद में दिए गए चेक को गारंटी के तौर पर इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाया। रजनीकांत की पत्‍नी लता का भी धोखाधड़ी केस में आया नाम मामले में एक और ट्व‍िस्‍ट तब आया, जब ऐड एजेंसी ने 2016 में रजनीकांत की पत्नी लता के खिलाफ भी धोखाधड़ी का केस किया था। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के राइट्स बेचने के बारे में तब उन्हें नोटिस जारी किया था। साल 2018 में, सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने उन्हें ₹6.20 करोड़ देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: मुस्लिम व्यक्ति संपत्ति पूरी वसीयत नहीं कर सकता, वारिसों की सहमति अनिवार्य

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए किसी को नहीं दे सकता। जब तक कि बाकी वैध वारिस अपनी सहमति न दें। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा एक मूल सिद्धांत है। यह फैसला कोरबा जिले से जुड़े एक मामले में आया है। जहां एक विधवा को उसके पति की संपत्ति में हिस्सा देने से निचली अदालतों ने इनकार कर दिया था। जानिए पूरा मामला दरअसल, 64 साल की जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की जायदाद पर हक मांगते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। उन्होंने कोरबा के द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उनके केस को 2015 और 2016 में खारिज कर दिया था। जैबुननिशा के पति की 2004 में मौत हो गई थी। जिसके बाद भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने एक वसीयत पेश की, जिसमें दावा किया गया कि सारी जायदाद उसे मिलेगी। सिकंदर ने खुद को ‘’पालक बेटा’ बताया था। जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह उनकी सहमति के बिना बनाई गई थी। लोअर कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील जैबुननिशा ने पहले निचली अदालतों में मुकदमा दायर किया था, लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालतों के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतें विधवा के वैध कानूनी अधिकार की रक्षा करने में असफल रही थी। मुस्लिम लॉ एक्ट में है यह प्रावधान हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत के जरिए जायदाद देने की एक सीमा है। मुस्लिम व्यक्ति अपनी जायदाद का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। अगर इससे ज्यादा जायदाद वसीयत की जाती है, या किसी वारिस को दी जाती है, तो उसके लिए बाकी वारिसों की सहमति जरूरी है। जस्टिस बीडी गुरु ने यह भी कहा कि निचली अदालतों ने गलती की कि उन्होंने विधवा पर वसीयत को गलत साबित करने का बोझ डाल दिया। असल में यह सिकंदर की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे कि जैबुननिशा ने पति की मौत के बाद अपनी मर्जी से और पूरी समझदारी से वसीयत के लिए सहमति दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ चुप रहने या केस दायर करने में देरी करने को रजामंदी नहीं माना जा सकता। इस मामले में कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर पाया कि जैबुननिशा ने पूरी जायदाद वसीयत करने की इजाजत दी थी। हाईकोर्ट ने निरस्त किया लोअर कोर्ट का आदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सिकंदर की वसीयत असली भी होती, तब भी वह जायदाद का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा नहीं मांग सकता था। हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और इस बात पर जोर दिया है कि वारिसों के हक की हिफाजत मुस्लिम कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है। कोर्ट ने कहा, ‘कानूनी एक तिहाई से ज्यादा की वसीयत वारिसों की मौत के बाद की रजामंदी के बिना प्रभावी नहीं हो सकती।

SC/ST ऐक्ट पर हाईकोर्ट की स्पष्ट राय: हर अपमानजनक शब्द से नहीं बनता मामला

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को ‘नीच’ जैसे सामान्य अपमानजनक शब्द कह देने मात्र से एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) ऐक्ट अपने-आप लागू नहीं होता। जस्टिस वीरेन्द्र कुमार ने स्पष्ट किया कि यह ऐक्ट तभी लगाया जा सकता है, जब यह साबित हो कि अपमान खास तौर पर जाति के आधार पर किया गया था और आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी थी।   क्या है मामला यह मामला वर्ष 2011 में आईआईटी जोधपुर से जुड़े एक विवाद से संबंधित है। उस समय सरकारी अधिकारी अतिक्रमण की जांच के लिए मौके पर पहुंचे थे। जांच के दौरान कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कथित रूप से अधिकारियों को ‘नीच’ और ‘भिखारी’ जैसे शब्द कहे। अधिकारियों ने इसे जातिगत अपमान मानते हुए एफआईआर दर्ज करवाई और एससी/एसटी ऐक्ट की धारा के साथ आईपीसी की धाराएं भी जोड़ी गईं। आरोपियों की क्या दलील आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका देते हुए कहा कि उन्हें अधिकारियों की जाति के बारे में जानकारी नहीं थी और बोले गए शब्द जाति का संकेत नहीं देते। उन्होंने यह भी कहा कि घटना के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था, इसलिए इसे जातिगत अपमान नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस्तेमाल किए गए शब्द किसी विशेष जाति की ओर संकेत नहीं करते और ना ही ऐसा कोई प्रमाण है कि आरोपियों को अधिकारियों की जाति के बारे में जानकारी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी ऐक्ट लगाने के लिए जाति-आधारित अपमान का स्पष्ट और ठोस प्रमाण होना आवश्यक है। इस आधार पर कोर्ट ने एससी/एसटी ऐक्ट के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया। हालांकि, सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी से रोकने और उनसे धक्का-मुक्की से संबंधित आईपीसी की धाराएं बनी रहेंगी और इन्हीं धाराओं पर मामला आगे चलेगा।  

हाईकोर्ट का अहम फैसला, धारा 500 की कार्रवाई रद्द, कानूनी अधिकार से की गई शिकायत मानहानि नहीं

जबलपुर  हाईकोर्ट ने अपने अहम आदेश में कहा है कि कानूनी अधिकार के तहत आपराधिक शिकायत सक्षम प्राधिकरण के समक्ष करना मानहानि की श्रेणी में नहीं आता है। हाईकोर्ट जस्टिस बी पी शर्मा ने अपने आदेश में कहा है कि यह धारा 498 अपवाद 8 के सुरक्षा कवच के अंदर आता है। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ तलाश पूर्व पत्नी की शिकायत पर भोपाल न्यायालय द्वारा मानहानि तहत धारा 500 के तहत प्रारंभ की गयी आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने के आदेश जारी किये हैं।  भोपाल निवासी सैयद राशिद अली की तरफ से तलाकशुदा पत्नी की तरफ से दायर आवेदन पर भोपाल न्यायालय द्वारा मानहानि के तहत प्रारंभ किये गये आपराधिक प्रकरण को निरस्त किये जाने की राहत चाही गयी थी। याचिका में कहा गया था कि शादी के बाद झगड़ा होने पर पत्नी ने उसके खिलाफ धारा 498 ए के तहत प्रकरण दर्ज करवाया था। न्यायालय ने उसे एक साल की सजा से दंडित किया था परंतु अपीलीय न्यायालय ने उसे दोषमुक्त कर दिया था। दोषमुक्ति के खिलाफ अनावेदिका ने हाईकोर्ट के अपील की है, जो लंबित है। शिकायतकर्ता अनावेदिका का कहना है कि धारा 498 ए के तहत प्रकरण दर्ज करवाने के बाद आवेदक ने मुस्लिम कानून के तहत लिखित तलाक-ए-बैन दिया। इसके बाद आवेदन ने शिकायतकर्ता तलाकशुदा पत्नी तथा उसके रिश्तेदारों के खिलाफ धारा खिलाफ धारा 420, 467, 468, 471, 477, 494 और 149 के तहत अपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। जिसकी सुनवाई करते हुए न्यायालय ने 14 अक्टूबर 2023 को उसकी तलाकशुदा पत्नी और अन्य को दोषमुक्त कर दिया था। तलाकशुदा पत्नी ने उसके खिलाफ धारा 499 और 500 के तहत यह शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उसके तथा रिश्तेदारों के खिलाफ झूठे और मनगढ़ंत आरोपों लगाते हुए अपराधिक कार्रवाई प्रारंभ की थी, जिसके उसके मानसिक तकलीफ हो। इसके अलावा समाज में उसकी बदनामी करना और लंबित अपराधिक प्रकरण वापस लेने के दबाव बनाना है। तलाकशुदा पत्नी तथा उसके पिता के बयान के आधार पर भोपाल जिला न्यायालय के जेएफएमसी ने उसके खिलाफ धारा 500 के तहत अपराधिक कार्रवाई प्रारंभ करने के निर्देश जारी किये हैं, जिसमें सजा का प्रावधान है। याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने आपराधिक शिकायत कानूनी अधिकार रखने वाली प्राधिकरण के समक्ष की थी। धारा 499 के सेक्शन 8 के तहत कानूनी अधिकार रखने वाले किसी व्यक्ति के द्वारा अच्छी नीयत से आपराधिक शिकायत में आरोप लगाना मानहानि नहीं है। एकलपीठ ने मामला धारा 499 के सेक्शन 8 के तहत आता है, इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ मानहानि का कोई अपराध नहीं बनता है। याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 500 के तहत भोपाल की अदालत में चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द किया जाता है।  

हाईकोर्ट ने कहा: याचिकाओं को आधार से जोड़ने का मसला अब प्रशासनिक कमेटी के समक्ष

जबलपुर  हाईकोर्ट में दायर होने वाली याचिकाओं को आधार कार्ड से लिंक करने की मांग करते हुए जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि इससे वर्षों से लंबित अनुपयोगी याचिकाओं का जल्द निराकरण होगा और लंबित प्रकरणों की संख्या में कमी आएगी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने याचिका पर आदेश सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के सुझाव को अभ्यावेदन मानकर रजिस्ट्रार जनरल प्रशासनिक कमेटी के समक्ष रखा जाए। याचिका जबलपुर निवासी अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा की तरफ से दायर की गई थी। इसमें कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी हाईकोर्ट को डिजिटलीकरण के संबंध में आदेश जारी किए थे। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया कि डिजिटलीकरण के दौरान नेशनल प्रिजन पोर्टल से हाईकोर्ट को भी जोड़ा जाए, ताकि जेल में सजा काट रहे कैदियों के रिकॉर्ड देखे जा सकें। याचिका में यह भी बताया गया कि कई मामलों में कैदियों की सजा पूरी होने के बावजूद उनके द्वारा दायर अपील हाईकोर्ट में लंबित रहती है। इसी तरह जिला न्यायालय में आपसी समझौता होने के बावजूद उच्च न्यायालय में दायर याचिका लंबित रहती है। सुझाव में यह भी कहा गया कि डिजिटलीकरण के दौरान याचिकाओं को आधार कार्ड से जोड़ा जाए। कई मामलों में याचिकाकर्ता की मृत्यु होने के बावजूद याचिका लंबित रहती है, जिससे न्यायालय का कीमती समय बर्बाद होता है। इसके अलावा फाइलिंग और आवेदन पेश करने के संबंध में भी कई सुझाव दिए गए थे। युगलपीठ ने याचिका में दिए गए सभी सुझावों को उचित मानते हुए आदेश जारी किया। याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष स्वयं रखा।

UP शिक्षा व्यवस्था पर HC की निगाह: सभी सहायक शिक्षकों की नियुक्तियां जांच के दायरे में

इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के भीतर जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। एक ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि पूरे उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की व्यापक जांच की जाए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हथियाने वाले शिक्षकों को न केवल बर्खास्त किया जाए, बल्कि उनसे अब तक ली गई सैलरी की वसूली भी की जाए। 6 महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि पूरी जांच प्रक्रिया को छह महीने के भीतर पूरा किया जाए। हाईकोर्ट ने उन अधिकारियों को भी कड़ी चेतावनी दी है जिनकी मिलीभगत या लापरवाही की वजह से ऐसे फर्जी शिक्षक सिस्टम में बने रहे। अदालत ने आदेश दिया है कि जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। 15 साल की सेवा के बाद खुली पोल यह पूरा मामला गरिमा सिंह नाम की एक शिक्षिका की याचिका से शुरू हुआ। गरिमा सिंह को जुलाई 2010 में देवरिया जिले के सलेमपुर विकास खंड के एक उच्चतर प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था। वह लगभग 15 वर्षों से अपनी सेवा दे रही थीं। 2025 में एक शिकायत के आधार पर हुई जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और अन्य संबंधित अधिकारियों की जांच में पाया गया कि गरिमा सिंह ने जिन शैक्षिक दस्तावेजों और निवास प्रमाण पत्र का उपयोग किया था, वे फर्जी थे। असल में वे दस्तावेज किसी अन्य व्यक्ति के थे, जिनके नाम का सहारा लेकर उन्होंने धोखाधड़ी से नौकरी हासिल की थी। इसके बाद अगस्त 2025 में बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) देवरिया ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी थी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए जताई चिंता गरिमा सिंह ने अपनी बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनके वकील का तर्क था कि वह 15 साल से निष्कलंक सेवा दे रही हैं और नियुक्ति के समय उनके दस्तावेजों का वेरिफिकेशन हो चुका था। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति चौहान ने टिप्पणी की कि “धोखाधड़ी से प्राप्त लाभ का लाभ उठाने वाला व्यक्ति किसी भी तरह की रियायत या जांच का हकदार नहीं है।” अदालत ने उत्तर प्रदेश की शिक्षा प्रणाली में फर्जी प्रमाण पत्रों के बढ़ते पैटर्न पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि कई सहायक अध्यापक फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बरसों से नौकरी कर रहे हैं और यह सब प्रबंधन या शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। छात्रों का भविष्य सबसे ऊपर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता न केवल धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नींव पर प्रहार करती है। अदालत के अनुसार, छात्रों का हित सर्वोपरि है और अयोग्य शिक्षकों द्वारा बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।  

पेंशन विवाद पर हाईकोर्ट की कड़ी कार्रवाई, CMPF आयुक्त को चेतावनी, हाजिरी न देने पर गिरफ्तारी तय

जबलपुर  हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने कोल माइंस प्राविडेंट फंड (सीएमपीएफ) के क्षेत्रीय आयुक्त, जबलपुर को 11 फरवरी को हाजिर होने के निर्देश दिए हैं। यदि वे हाजिर नहीं हुए तो उनके विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी करने की चेतावनी दी गई है। मामला एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के परिवार से जुड़ा है, जो 14 साल से लंबित पेंशन मामले का दंश भोग रहा है। प्रकरण मूलतरू लिपिकीय त्रुटि से दोहरे प्राविडेंट फंड खाते से जुड़ा है। शहडोल जिला अंतर्गत धनपुरी निवासी 57 वर्षीय विमला बाई के पति स्व. संपत द्वारा मूल रूप से याचिका दायर की गई थी, जिनका निधन याचिका की सुनवाई दौरान हो गया था। विमला बाई अब उनकी कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में मामला लड़ रही हैं। याचिका के अनुसार मृतक संपत ने वर्ष 1972 को साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) में शहडोल जिले के धनपुरी खदान में स्वीपर के पद पर नियुक्ति पाई थी और वर्ष 2012 को 40 वर्ष से अधिक सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए थे। किन्तु याचिकाकर्ता को वर्ष 1972 से 1981 के दौरान का प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ नहीं दिए गए। मामले का मूल कारण साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) की एक लिपिकीय त्रुटि बताई गई है। कर्मचारी संपत के लिए गलती से दो सीएमपीएफ खाते (1972 और 1981) खोल दिए गए। 1981 वाले खाते को मुख्य मान लिए जाने के कारण 1974 से 1981 तक के उनके सीएमपीएफ अंशदान योगदान की गणना नहीं की गई। इस मामले में 23 फरवरी, 2022 को भी हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई थी। उस समय सीएमपीएफ ने कोर्ट को बताया था कि उनका जवाब तो 2013 में ही दाखिल हो गया था, जबकि अन्य पक्षों (एसईसीएल आदि) के 2019 में जवाब दाखिल करने के बाद ही उन्हें पता चला कि याचिकाकर्ता के दो पीएफ खाते हैं। मार्च 1974 से मार्च 1981 की अवधि के दौरान कटने वाला सीएमपीएफ अंशदान, जो मूल खाता संख्या से संबद्ध था, अद्यतन नहीं हो सका। इस कारण इसी त्रुटि के कारण 1972 से 1982 की अवधि के लाभ का भुगतान नहीं हो पाया था। याचिकाकर्ता के अनुसार इस त्रुटि के कारण न केवल भविष्य निधि का पूर्ण भुगतान बाधित हुआ, बल्कि पेंशन की गणना भी अधूरी रह गई, जिससे याचिकाकर्ता को भारी आर्थिक क्षति हुई। तब कोर्ट ने सीएमपीएफ को चार सप्ताह का समय देते हुए आदेश दिया था कि वह याचिकाकर्ता को बकाया लाभ का भुगतान करे और यह दर्शाता हलफनामा दाखिल करे। हाई कोर्ट ने ताजा सुनवाई में पाया कि 2022 का आदेश आज तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ है।  

सोशल मीडिया पर विवादित टिप्पणी करने वाली महिला प्रोफेसर को हाईकोर्ट ने दी जमानत …

जबलपुर  एमपी हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला प्रोफेसर को जमानत दे दी है। प्रोफेसर पर सोशल मीडिया में धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणी करने का आरोप है। जस्टिस ए के सिंह की एकलपीठ ने कहा कि आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने महिला प्रोफेसर को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है। प्रोफेसर ने व्हाट्सअप ग्रुप में एक विवादित वीडियो और मैसेज पोस्ट किया था। माता सीता को लेकर की थी टिप्पणी डिंडौरी में अतिथि प्रोफेसर के तौर पर काम करने वाली डॉ. नसीम बानो ने यह पोस्ट किया था। उन्होंने सीता माता के अपहरण का एक कार्टून वीडियो व्हाट्सअप ग्रुप में डाला था। इसके साथ ही, उन्होंने पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र भी किया था। उन्होंने लिखा था कि आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर गोली मारना और जय श्री राम के नारे लगाकर मारना, दोनों में कोई अंतर नहीं है। इन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा डिंडौरी कोतवाली पुलिस ने डॉ. नसीम बानो के खिलाफ B.N.S., 2023 की धारा 196, 299 और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस ने उन पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया था। 28 अप्रैल से जेल में थी प्रोफेसर हाईकोर्ट में जस्टिस ए के सिंह की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि महिला प्रोफेसर 28 अप्रैल 2025 से जेल में हैं। ट्रायल कोर्ट ने 30 अप्रैल 2025 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट को यह भी पता चला कि उनके खिलाफ कोई और आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक शिक्षित व्यक्ति और कॉलेज में प्रोफेसर होने के नाते, डॉ. बानो को व्हाट्सअप पर मैसेज भेजने में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले मैसेज या वीडियो भेजने के आधार पर किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने दी सशर्त जमानत कोर्ट ने डॉ. नसीम बानो को सशर्त जमानत दी है। इसका मतलब है कि उन्हें कुछ शर्तों का पालन करना होगा। अगर वे इन शर्तों का पालन नहीं करती हैं, तो उनकी जमानत रद्द भी हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले की जांच जारी रहेगी और ट्रायल कोर्ट अपना काम करेगी।

केवल उन्हीं छात्रों को कक्षा 10वीं और 12वीं में प्रवेश मिलेगा जिन्होंने कक्षा 9वीं अथवा 11वीं संस्कृत बोर्ड से सम्बद्ध विद्यालयों से उत्तीर्ण की हो: हाईकोर्ट

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान (पूर्व में संस्कृत बोर्ड) के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें यह शर्त जोड़ी गई थी कि केवल उन्हीं छात्रों को कक्षा 10वीं और 12वीं में प्रवेश मिलेगा जिन्होंने कक्षा 9वीं अथवा 11वीं संस्कृत बोर्ड से सम्बद्ध विद्यालयों से उत्तीर्ण की हो। आदेश के विरुद्ध आधा दर्जन स्कूलों द्वारा याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि इस संशोधित प्रवेश नीति के कारण मध्य प्रदेश बोर्ड या सीबीएसई से अध्ययनरत छात्रों के परीक्षा फार्म अस्वीकार किए जा रहे हैं, जिससे वे कक्षा 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं से वंचित हो रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृत रूपराह ने दलील दी कि यह निर्णय न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि समानता के अधिकार का उल्लंघन भी है। याचिका में यह भी कहा गया कि मप्र बोर्ड, सीबीएसई और संस्कृत बोर्ड सभी सरकारी संस्थाएं हैं, इसलिए उनके बीच इस प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक और मनमाना है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने छात्रों को राहत देते हुए संस्कृत बोर्ड के संशोधित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और बोर्ड को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता छात्रों के परीक्षा फॉर्म स्वीकार किए जाएं और उन्हें आगामी परीक्षाओं में सम्मिलित किया जाए। कोर्ट ने अनावेदकों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। याचिका की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। यह आदेश उन सैकड़ों छात्रों के लिए राहत लेकर आया है, जो नियमों में अचानक किए गए बदलाव से परीक्षा देने से वंचित हो रहे थे।

गांधी मेडिकल कॉलेज में नियुक्तियों पर हाईकोर्ट सख्त, दोषियों पर हो कार्रवाई

भोपाल गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल में लैब असिस्टेंट और तकनीशियन पदों पर हुई नियुक्तियों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने गठित जांच कमेटी को 6 सप्ताह में जांच पूरी करने के आदेश जारी किये हैं. युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जांच रिपोर्ट में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. ‘नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियां’ भोपाल निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट वीर सिंह लोधी ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. यह जनहित याचिका गांधी मेडिकल कॉलेज में हुई नियुक्तियों को लेकर है. जिसमें आरोप लगाते हुए कहा गया है कि “गांधी मेडिकल कॉलेज में साल 2021 में लैब असिस्टेंट और तकनीशियन पदों पर नियमों को ताक में रखकर नियुक्तियां की गई थीं.” ‘जांच कमेटी ने नहीं की कोई कार्रवाई’ याचिका की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता वीर सिंह लोधी की तरफ से बताया गया कि “नियुक्तियों पर सवाल उठने और शिकायत होने पर जांच के लिए 1 मई 2024 और 19 सितंबर 2024 को पारित आदेश के बाद डॉ संजय जैन के नेतृत्व में 3 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था. जांच कमेटी गठित होने के बावजूद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.” ‘6 सप्ताह में जांच कमेटी पेश करे अपनी रिपोर्ट’ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए अपने आदेश में कहा है कि “6 सप्ताह में कमेटी अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करे. रिपोर्ट पेश होने के 3 दिनों की अवधि में उसकी प्रति याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए. रिपोर्ट के आधार पर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता अक्षांश श्रीवास्तव ने पैरवी की.”

जब न्याय में देरी होती है तो समाज में असंतोष पैदा होता है : हाईकोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ ने कहा है कि अदालती प्रक्रिया को ई प्रक्रिया के साथ डिजिटल बनाएं। कोर्ट रूम को कार्य स्थल के साथ-साथ कर्म स्थल भी बनाएं। जज, वकीलों की सरल, सुगम, सस्ता न्याय दिलाने में अहम भूमिका होती है। जब न्याय में देरी होती है तो समाज में असंतोष पैदा होता है, अतः न्याय में देरी ना करें। जस्टिस कैथ ने यह विचार जिले के मालथौन में 12 करोड़ से अधिक में तैयार किए गए सिविल कोर्ट भवन का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी के कारण समाज में असंतोष पैदा होता है। असंतोष पैदा ना हो इसलिए सभी जजो और वकील तत्काल कार्रवाई करते हुए शीघ्रता से मुकदमों का निराकरण करें। उन्होंने कहा कि अदालती प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम लागू करें, जिससे कि सभी काम जल्द से जल्द से किए जा सकें। उन्होंने कहा कि अदालत में बार एवं बेंच का सामान होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की सरकार के द्वारा न्यायालय के संसाधनों के लिए पर्याप्त बजट प्रदान किया गया है। इस बजट के माध्यम से अदालतों में सभी आवश्यकताएं पूरी की जाएंगी। उन्होंने कहा कि सागर एक खूबसूरत शहर है, इसी प्रकार यह भवन भी खूबसूरत है। आप सभी अपने काम को भी खूबसूरत बनाएं। उन्होंने कहा कि यह भवन मात्र पत्थरों की संरचना नहीं है, इस संरचना में न्याय की देवी के माध्यम से समाज को न्याय मिलता है। हाईकोर्ट के जस्टिस एवं सागर जिले के पोर्टफोलियो जज संजय द्विवेदी ने कहा कि भवन निर्जीव होता है, जिसे सजीव बनाने के लिए आप सभी का सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह भवन समय पर बना है, इसके लिए जिला प्रशासन के कार्य को धन्यवाद देते हैं। इसी प्रकार तुरंत न्याय करने के लिए जज एवं वकील काम करें। इस अवसर पर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश महेश कुमार शर्मा ने स्वागत भाषण देते हुए सागर जिले एवं नवनिर्मित भवन के संबंध में विस्तृत जानकारी दी।

जबलपुर में फ्लाईओवर निर्माण को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर 3 हफ्ते में मांगा जवाब

 जबलपुर जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जबलपुर के हाईकोर्ट चौराहा से रद्दी चौकी-आधारताल तक बन रहे फ्लाईओवर निर्माण को लेकर जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते के अंदर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। जबलपुर निवासी अधिवक्ता मुनीश सिंह की ओर से दायर इस याचिका की प्रारंभिक सुनवाई हाईकोर्ट चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत एवं जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बैंच ने की। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि आधारताल रोड पर प्रतिदिन जाम की स्थिति बनती है, जिसके कारण आए दिन दुर्घटनाएं भी हो रही हैं। जाम का खामियाजा अस्पताल जाने वाले मरीजों को भी भुगतना पड़ता है। स्कूल जाने या घर लौटने वाले बच्चों को भी परेशानी होती है। ऐसे में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यह मामला जनसुविधा और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, और इसमें टालमटोल अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने पक्ष रखते हुए सभी तथ्यों से कोर्ट को अवगत कराया। एडिशनल एडवोकेट जनरल ने जताई आपत्ति राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल भरत सिंह ठाकुर ने याचिका पर आपत्ति जताते हुए इसे “सुनवाई के योग्य नहीं” बताया। उनका तर्क था कि यह एक प्रशासनिक विषय है और इसके लिए सरकार को बाध्य करना न्यायालय का कार्यक्षेत्र नहीं है। उन्होंने कहा कि जबलपुर से ही लोक निर्माण विभाग के मंत्री हैं, जिनसे जनता संपर्क कर सकती है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि इस याचिका को ‘कष्टकारक’ मानते हुए निरस्त कर दिया जाए। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद जबलपुर के नागरिकों को उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी है। वर्षों से लोग इस रूट पर ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहे हैं, आपको बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर के ठीक बाहर मुख्य सड़क पर यह आलम होता है कि अधिवक्ताओं सहित मुवक्किलों के वाहन खड़े करने के लिए भी जगह नहीं है, जिसके कारण लगभग आधी सड़क पार्किंग की तरह इस्तेमाल होती है। लेकिन अब तक इस पर कोई स्थायी समाधान नहीं आया। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप से अब उम्मीद है कि प्रशासन इस दिशा में ठोस और समयबद्ध कदम उठाएगा।

हाईकोर्ट का आदेश, 90 लाख रुपए जमा करने पर मिलेगी जामनत

जबलपुर करीब एक साल पहले हुए 90 लाख रुपये के गबन के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी लक्ष्मीदास उर्फ रीना रघुवंशी की जमानत याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि जब तक आरोपी पूरी राशि जमा नहीं करता उसे जमानत नहीं दी जाएगी। आरोपी लक्ष्मीदास पर आरोप है कि उसने ऑनलाइन दस्तावेजों के जरिए फर्जीवाड़ा कर 90 लाख रुपये निकाले। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, लेकिन जमानत के लिए तय शर्तें पूरी न करने के कारण उसे राहत नहीं मिल सकी। हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बिना पूरी राशि जमा किए जमानत संभव नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत आरोपी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसमें उसने दावा किया कि उसके वकील ने बिना अनुमति के 90 लाख रुपये जमा करने की बात कही थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का मामला बताते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया। इस मामले में आरोपी के भाई हर्ष रघुवंशी को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। हाईकोर्ट ने अब उसकी जमानत भी रद्द कर दी है, जबकि लक्ष्मीदास के मामले में फैसला सुरक्षित रखा गया है। पुलिस जांच और बरामदगी पुलिस ने इस गबन के मामले में लक्ष्मीदास, उसके भाई हर्ष रघुवंशी, मनीष सोनी और सागर को आरोपी बनाया है। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी द्वारा इस्तेमाल की गई एमजी हेक्टर कार भी जब्त कर ली है। अब सभी की नजर इस पर टिकी है कि क्या आरोपी अदालत की शर्तें पूरी कर पाएगा या नहीं। अगर वह 90 लाख रुपये जमा नहीं करता, तो उसे जमानत मिलना मुश्किल होगा।

प्रदेश के थाना परिसरों में मंदिर निर्माण का रास्ता साफ, हाईकोर्ट ने खारिज की चुनौती देने वाली याचिका

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जबलपुर सहित प्रदेश के पुलिस थाना परिसरों में हनुमान मंदिर निर्माण को चुनौती देने वाली जनहित याचिका निरस्त कर दी। इसके साथ ही प्रदेश के थाना परिसरों में मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने साफ किया कि पूर्व की एक जनहित याचिका के आदेश का पालन न होने के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका के साथ इस बिंदु को सम्मिलित कर विरोध किया जा सकता है। पृथक से सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। बहरहाल, जबलपुर के अधिवक्ता ओपी यादव की जनहित याचिका निरस्त होने के साथ ही थाना परिसरों में हनुमान मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है।   एसएएफ डीजीपी व एडीजीपी आदेश का पालन कर दें रिपोर्ट हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) के डीजीपी कैलाश मकवाना व एडीजीपी इरशाद वली को निर्देश दिए हैं कि पूर्व आदेश का पालन कर उसकी रिपोर्ट पेश करें। न्यायमूर्ति अचल कुमार पालीवाल की एकलपीठ ने डीजीपी को निर्देश दिए हैं कि विभिन्न संवर्गों के स्थानांतरण के संबंध में सक्षम अधिकारी को उचित दिशा निर्देश दें। कोर्ट ने 30 दिन के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता को इस आदेश की प्रति डीजीपी को प्रेषित करने कहा ताकि इसका पालन सुनिश्चित किया जा सके। याचिकाकर्ता छठवीं वाहिनी में पदस्थ आरक्षक कृष्ण कुमार शर्मा की ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, संजय कुमार शर्मा, रोहिणी शर्मा व विनीत टेहेनगुरिया ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता का विगत वर्ष दसवीं वाहिनी, विसबल सागर से छठवीं वाहिनी जबलपुर स्थानांतरण हुआ था। जिसके विरुद्ध याचिका दायर की गई थी।  

छिंदवाड़ा : महंत के 90 लाख रुपये हड़पने वाली शिष्या साध्वी लक्ष्मी को जमानत, CJM Court में जमा करने होंगे सारे पैसे

छिंदवाड़ा नोनिकला के श्री राम जानकी मंदिर के महंत स्व. कनक बिहारी दास जी महाराज के खाते से फर्जी नॉमिनी बनकर 90 लाख रुपए निकालने वाली कथित साध्वी को सीजेएम कोर्ट में 90 लाख रुपये जमा कराने होंगे, तब उसको जमानत मिलेगी। दरअसल हाईकोर्ट ने श्रीराम जानकी मंदिर आश्रम छिंदवाड़ा के महंत की राशि के गबन के मामले में आरोपी साध्वी लक्ष्मी दास को 90 लाख रुपये सीजेएम कोर्ट में जमा कराने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा आवेदिका राशि जमा करने के बाद उसकी रसीद जांच अधिकारी को दें। रसीद सौंपने के बाद आवेदिका को अग्रिम जमानत देने के निर्देश दिए। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने इस मामले में बनाए एक अन्य आरोपी हर्ष रघुवंशी को भी उक्त राशि जमा कराने की शर्त पर जमानत का लाभ दे दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत के दौरान आरोपी देश छोड़कर नहीं जाएंगे। भोपाल निवासी साध्वी लक्ष्मी दास और हर्ष रघुवंशी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने पैरवी की। वहीं, आपत्तिकर्ता श्याम सिंह रघुवंशी की ओर से अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने पक्ष रखा। मामले के अनुसार उक्त आश्रम के महंत कनकदास महाराज ने अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण के बाद 2121 यज्ञ करने का संकल्प लिया था। इसके लिए उन्होंने समाज से दान के माध्यम से 90 लाख रुपये की राशि एकत्रित की थी। एक सड़क दुर्घटना में 17 अप्रैल 2023 को महंत की मृत्यु हो गई। आरोप है कि उनकी मृत्यु के बाद स्वयं को शिष्या बताते हुए साध्वी ने महंत का मोबाइल नंबर अपने नाम करा लिया और उक्त राशि का गबन कर लिया। साध्वी ने उसमें से कुछ राशि अपने भाई हर्ष और एक मित्र मनीष सोनी को ट्रांसफर कर दी। इसके बाद छिंदवाड़ा के चौरई पुलिस थाने में आवेदकों के खिलाफ धोखाधड़ी और अन्य धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। भाई हुआ था गिरफ्तार, जब्त हुई थी कार दरअसल साध्वी का भाई हर्ष रघुवंशी पिछले दिनों भोपाल से गिरफ्तार हो गया था। उसके पास से लग्जरी कार बरामद की गई थी। इसे सारे मामले में हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण फैसला दिया है।  

पांच आईएएस को थमाया अवमानना का नोटिस, छत्तीसगढ़-बिलासपुर में संयुक्त पंजीयक को दूसरा विवाह करने पर नहीं किया निलंबित!

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ राज्य सहकारिता विभाग के संयुक्त पंजीयक द्वारा एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने के मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर भी कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने इस संदर्भ में दायर अवमानना याचिका पर विभाग के पांच आईएएस अफसरों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया है। बता दें कि 25 अक्तूबर 2020 को बिलासपुर निवासी विनय शुक्ला ने सहकारिता विभाग से शिकायत की थी कि बिलासपुर संभाग के तत्कालीन संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं सुनील तिवारी द्वारा सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 22 का उल्लंघन करते हुए एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह बिना शासन के मंजूरी के किया गया है। दूसरी पत्नी से उसका पुत्र भी है। यह भारतीय दण्ड विधान की धारा 166, 420, 34 एवं अन्य धाराओं के तहत अपराध है। अतः अपचारी अधिकारी को निलंबित किया जाए, विभागीय जांच कर उसे बर्खास्त कर, उसके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराया जाए। शिकायत पर संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्रवाई न करने पर 27 जुलाई 2021 को शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 29 सितंबर 2023 को कोर्ट ने संयुक्त पंजीयक के विरुद्ध इस मामले की 6 माह के भीतर जांच किए जाने के आदेश दिये। इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर 12 सितंबर 2024 को संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने हिमशिखर गुप्ता तत्कालीन सचिव सहकारिता, सीआर प्रसन्ना वर्तमान सचिव सहकारिता, रमेश शर्मा तत्कालीन पंजीयक सहकारिता, दीपक सोनी तत्कालीन पंजीयक सहकारिता और कुलदीप शर्मा वर्तमान पंजीयक सहकारिता को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

हाई कोर्ट ने शासन से पूछा कि अन्य पिछड़ा वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया

जबलपुर हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन से पूछा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है। इस सिलसिले में सरकार को जवाब पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। एडवोकेट यूनियन फार डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस संस्था ने जनहित याचिका दायर कर ओबीसी वर्ग को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह व राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह व अमित सेठ ने पक्ष रखा। 10 दिन के स्थान पर एक माह का समय दिया शुक्रवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने सरकार से पूछा कि क्यों न ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का अंतरिम आदेश देकर समस्त याचिकाओं पर अंतिम फैसला इसके अधीन कर दिया जाए। इस पर सरकार की ओर से आपत्ति पेश की गई और कहा गया कि इन मामलों में सालिसिटर जरल तुषार मेहता पक्ष रखेंगे। पांच भागों में बांटें प्रकरण मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को निर्देश दिए कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी मामलों को पांच भागों में वर्गीकृत करें। पहली वो याचिकाएं जो ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के विरोध में हैं और दूसरी वो जो इसके समर्थन में हैं। एक वर्ग में उन मामलों को रखा जाए जिसमें सामान्य प्रशासन विभाग तथा महाधिवक्ता के अभिमत के अनुसार 87:13 प्रतिशत फार्मूले को चुनौती दी गई है। एक वर्ग में उन याचिकाओं को रखा जाए जिनमें अभ्यर्थियों की नियुक्ति होल्ड करने को चुनौती दी गई है। वहीं पांचवें वर्ग में ओबीसी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग वाला याचिकाओं को शामिल किया जाए। मंदिर की भूमि बेचने पर 20 दिसंबर तक मांगा जवाब हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने मंदिर की भूमि बेचे जाने के रवैये पर जवाब-तलब कर लिया है। इस सिलसिले में राज्य शासन, प्रमुख सचिव, टीकमगढ़ के कलेक्टर, एसडीएम व व टीआई सहित अन्य को नोटिस जारी किए गए हैं। अगली सुनवाई 20 दिसंबर को नियत की गई है। जनहित याचिकाकर्ता खेमचंद अहिरवार की ओर से पक्ष रखा गया। दलील दी गई कि ग्राम बगौरा जिला टीकमगढ़ में ग्रामवासियों के सहयोग से हनुमान मंदिर की स्थापना की गई थी। हनुमान मंदिर शासकीय जमीन पर बनाया गया था। मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक है और बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने आते हैं।

मानदंड पर सवाल उठाने वाली याचिकाएं खारिज, छत्तीसगढ़-हाईकोर्ट में सिविल जज मुख्य परीक्षा 2023 के मूल्यांकन को चुनौती

बिलासपुर. बिलासपुर हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) द्वारा आयोजित सिविल जज (प्रवेश स्तर) मुख्य परीक्षा 2023 के मूल्यांकन मानदंड को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि उम्मीदवार परीक्षा पैटर्न की पूर्व सूचना के हकदार नहीं हैं और परीक्षा पुस्तिका में दिए गए निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। दरअसल, सिविल जज भर्ती प्रक्रिया 7 जून 2023 को 49 रिक्तियों की घोषणा के साथ शुरू हुई। 3 सितंबर 2023 को प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद उम्मीदवारों को 25 अगस्त 2024 को मुख्य परीक्षा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। परिणाम 8 अक्तूबर 2024 को घोषित किए गए, जिसमें 151 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया। इसमें कई उम्मीदवारों को इस आधार पर अयोग्य ठहराया गया कि उनके उत्तर अनिवार्य अनुक्रमिक प्रारूप का पालन नहीं करते थे। इस पर याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें आरोप लगाया गया कि CGPSC ने प्रक्रिया के दौरान “नियमों को बदल दिया,” जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओ ने तर्क दिया कि उन्हें परीक्षा प्रक्रिया में बदलाव के कारण मनमाने ढंग से अयोग्य घोषित कर दिया गया। मामला इस बात पर केंद्रित था कि CGPSC ने उम्मीदवारों को प्रश्न-उत्तर पुस्तिका में दिए गए स्थानों में अनुक्रमिक क्रम में उत्तर लिखने की आवश्यकता के बारे में सूचित नहीं किया।

पुलिस के 5967 पदों पर होगी भर्ती, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट ने हटाई रोक

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ में 5967 पदों पर आरक्षक भर्ती प्रक्रिया पर लगी रोक हट गई है। मामले में हाई कोर्ट में हुई आज सुनवाई हुई। कोर्ट ने प्रक्रिया जारी रखने के लिए निर्देश दिया है, जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की बेंच में  सुनवाई हुई है। इसमें पुलिस कर्मियों के बच्चों को मिलने वाली छूट को हटाया गया है, शहीद पुलिस कर्मियों के बच्चों को मिलने वाली छूट यथावत रहेगी। नक्सल प्रभावित सुरक्षा कर जवानों के बच्चों को भी छूट मिलेगी, सभी पुलिसकर्मियों के बच्चों को छूट को माना गया गलत। पुलिस कर्मियों के परिजनों की छूट को कोर्ट ने माना आर्टिकल 14  और 16 का उल्लंघन। अब फिजिकल टेस्ट के बाद आगे बढ़ेगी भर्ती की प्रक्रिया।

पत्नी के बार-बार आत्महत्या के प्रयास और धमकी को माना क्रूरता, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी

बिलासपुर. बिलासपुर हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा आत्महत्या करने की बार-बार धमकी देने और प्रयास करने को क्रूरता माना है। इस आधार पर पति को तलाक की अनुमति देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में कोई भी जीवनसाथी शांति से नहीं रह सकता। पति द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि पत्नी बार-बार आत्महत्या की धमकी देती थी। दुर्ग जिला निवासी याचिकाकर्ता युवक की 28 दिसंबर 2015 को बालोद निवासी युवती के साथ चर्च में शादी हुई। पत्नी शादी के बाद निजी कॉलेज में जॉब करने लगी। उसे 22 हजार रुपये वेतन मिलता था, इसमें से 10 हजार रुपये अपने माता-पिता को भेजती थी। पति ने इस पर कभी आपत्ति नहीं की। पत्नी ने कुछ दिन अपने भाई को भी साथ रखा। भाई किसी कारण से वापस चला गया। इसके बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया। बात-बात में वह आत्महत्या करने की धमकियां देने लगी। कभी नशीला सिरप पीया तो कभी छत से कूदी। पहली बार उसने रसोई में घुस कर दरवाजा बंद कर गैस चालू कर जल मरने की धमकी दी। दूसरी बार अत्यधिक मात्रा में नशीला कफ सिरफ पीकर खुदकुशी की कोशिश की। इसके बाद एक बार उसने छत से कूद कर आत्महत्या का प्रयास किया। इस पर पति ने परिवार न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दिया। न्यायालय से आवेदन खारिज होने पर पति ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की। वहीं पत्नी ने भी वैवाहिक अधिकार की बहाली के लिए याचिका प्रस्तुत की। दोनों की याचिका पर जस्टिस रजनी दुबे एवं संजय कुमार जायसवाल की डीबी में सुनवाई हुई। सुनवाई उपरांत कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बार-बार आत्महत्या करने की धमकी देना क्रूरता के समान है।साथ ही अगर यह आशंका पैदा हो जाए कि दूसरे पक्ष के साथ रहना उसके लिए हानिकारक होगा तो साथ रहना मुश्किल है। फरवरी 2018 से दोनों अलग अलग रह रहे हैं। पत्नी के आचरण को देखते हुए मानसिक दबाव में पति का उसके साथ रहना सम्भव नहीं है। कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पति के तलाक की याचिका को स्वीकार किया। कोर्ट ने पति को दो माह के अंदर पत्नी को 5 लाख रुपए स्थाई गुजारा भत्ता एक मुश्त देने का निर्देश भी दिया है।

हाईकोर्ट ने ओंकारेश्वर बांध के डूब प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने के मामले में सरकार को निर्देशित किया

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओंकारेश्वर बांध के डूब प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने के मामले में सरकार को निर्देशित किया है। जस्टिस विशाल मिश्रा और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने इस पर विचार करने के लिए सरकार को दो माह का समय दिया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से दायर याचिका पर 7 जून 2013 को हाईकोर्ट ने सरकार को डूब प्रभावितों के लिए विशेष पैकेज प्रदान करने का आदेश दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने आवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि सरकार ने विस्थापितों को पैकेज पर 15% का लाभ तो दिया, लेकिन इसे सभी पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंचाया गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को विशेष पैकेज का लाभ नहीं दिया गया, जबकि वे इसके पात्र थे। यह कार्रवाई न केवल अवैधानिक है, बल्कि न्यायालय के आदेश का उल्लंघन भी है। न्यायालय का आदेश युगलपीठ ने सुनवाई के बाद पाया कि प्रभावित किसानों के बालिग बेटों को मुआवजा देने में सरकार ने लापरवाही बरती है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह इन बालिग बेटों को भी विशेष पैकेज का लाभ प्रदान करने पर विचार करे। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज शर्मा ने पैरवी की। कोर्ट ने इस मामले में न्यायालयीन प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने के लिए सरकार को दो माह की मोहलत दी है।

30 साल बाद हाईकोर्ट से मिली राहत, छत्तीसगढ़-रायपुर के प्रोफेसर दम्पति को बीमा कंपनी दे 6% ब्याज सहित डेढ़-डेढ़ लाख रूपए

बिलासपुर। 30 साल पहले मिनी बस से यात्रा के दौरान घायल हुए दंपती को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत मिली है। कोर्ट ने दोषी वाहन चालक और बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वे तीन माह के अंदर प्रत्येक घायल को 6 प्रतिशत ब्याज सहित डेढ़-डेढ़ लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि दें। जस्टिस राधा किशन अग्रवाल की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई। जानकारी के मुताबिक, 16 अगस्त साल 1994 को रायपुर निवासी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के भौतिक विभाग के हेड डॉ. विठ्ठल कुमार अग्रवाल अपनी पत्नी सरला अग्रवाल के साथ मिनी बस से कोरबा से चांपा जा रहे थे। इस दौरान रास्ते में एक लापरवाह ट्रक चालक ने बस को टक्कर मारी। दुर्घटना में डॉ. अग्रवाल और उनकी पत्नी को गंभीर चोट आई। दोनों को गंभीर चोट आने पर चांपा के अस्पताल में प्रारंभिक उपचार के बाद बेहतर उपचार के लिए उन्हें नागपुर ले जाया गया था। दंपती ने उपचार में आए खर्च और क्षतिपूर्ति के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में वाद प्रस्तुत किया था, लेकिन अधिकरण से वाद खारिज हो गया. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने घटना में प्रत्येक को लगी चोटों के लिए 1 लाख 50 हजार रुपये क्षतिपूर्ति और मुआवजे की राशि पर 6 प्रतिशत की दर से ब्याज देने के निर्देश दिए हैं।

चुनाव में संपत्ति की दी गलत जानकारी, राजस्थान-जोधपुर हाईकोर्ट ने विश्वराज-महिमा कुमारी और दीप्ति माहेश्वरी को दिया नोटिस

जोधपुर. जोधपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने राजसमंद के लोकसभा चुनाव को लेकर निर्दलीय प्रत्याशी की ओर से पेश चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जस्टिस मदन गोपाल व्यास की बेंच में जितेन्द्र कुमार खटीक की याचिका पर राजसमंद सांसद महिमा कुमारी मेवाड़, नाथद्वारा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़, राजसमंद विधायक दिप्ती माहेश्वरी सहित अन्य को नोटिस जारी किया है। याचिका पर जस्टिस मदन गोपाल व्यास की बेंच ने मंगलवार को 16 दिसंबर सुनवाई की तारीख तय की। निर्दलीय प्रत्याशी एवं अधिवक्ता जितेन्द्र कुमार खटीक ने चुनाव याचिका पेश की। याचिका में लोकसभा चुनाव में गड़बड़ी के आरोप और नामांकन गलत तरीके से स्वीकार करने को लेकर एवं गलत शपथ पत्र पेश करने और चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को प्रलोभन अन्य अवैध तरीके से विधि विरुद्ध चुनाव जीतने का आरोप लगाते हुए याचिका में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद याचिका में सभी पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए 16 दिसम्बर को जवाब तलब किया है। महाराणा प्रताप के वंशज विश्वराज सिंह मेवाड़ के राजतिलक के बाद से परेशानी बढ़ी हुई है। पारिवारिक विवाद के बाद हंगामा मच हुआ है। भाई के नोटिस का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अब चुनाव में गड़बड़ी के आरोप के चलते हाईकोर्ट ने भी नोटिस थमा दिया है। ये है मामला राजसमंद के एडवोकेट जितेंद्र खटीक ने 8 जुलाई 2024 को यह याचिका दाखिल की थी, जिसे 23 जुलाई को स्वीकार किया गया। याचिका में सांसद महिमा कुमारी मेवाड़, उनके पति नाथद्वारा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ और राजसमंद विधायक दीप्ति माहेश्वरी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संपत्ति और शपथ पत्र में विसंगतियां खटीक ने आरोप लगाया कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान महिमा कुमारी और उनके पति विश्वराज सिंह द्वारा पेश किए गए शपथ पत्रों में संपत्ति संबंधी जानकारियां अलग-अलग थीं। महिमा कुमारी ने अपने शपथ पत्र में 5 पैन कार्ड की जानकारी दी, जबकि विश्वराज सिंह ने केवल 4 पैन कार्ड अंकित किए। यह विसंगति चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है। दोहरा वोटर कार्ड का विवाद राजसमंद विधायक दीप्ति माहेश्वरी पर आरोप है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान राजसमंद का वोटर कार्ड नामांकन के साथ पेश किया, जबकि इससे पहले हुए उपचुनावों में उन्होंने उदयपुर का वोटर कार्ड प्रस्तुत किया था। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि एक व्यक्ति के पास दो अलग-अलग जगहों के वोटर कार्ड कैसे हो सकते हैं। मतदाताओं को लुभाने का आरोप चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए राजसमंद में वी-मार्ट मॉल का कथित रूप से इस्तेमाल किया गया। याचिका के अनुसार, मॉल के माध्यम से मतदाताओं को सामान और फ्रीबीज दिए गए, जिससे चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन हुआ।

सरकार से मांगा जवाब, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट में ध्वनि प्रदूषण पर लगी जनहित याचिका

बिलासपुर। हाईकोर्ट में डीजे और साउंड बॉक्स के शोर से लोगों को होने वाली परेशानियों को लेकर जनहित याचिका पर आज सुनवाई हुई. इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से इस ध्वनि प्रदूषण को अल्ट्रा वायरस घोषित करने की मांग की गई. इस पर सरकार की ओर से कहा गया कि मामले में लगातार कार्रवाई हो रही है. याचिकाकर्ता ने कहा कि कोलाहल अधिनियम में इतने कड़े नियम है ही नहीं. एक या दो बार 500-1000 रुपये पेनाल्टी लगाकर छोड़ दिया जाता है. ना सामान की जब्ती होती है और ना ही कोई कड़े नियम बनाए गए है. कोर्ट ने मामले में सरकार को जवाब पेश करने कहा है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी डीजे के साथ लेजर और बीम लाइट से होने वाली परेशानियों पर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि डीजे से हार्ट के साथ ऐसे लेजर लाइट से आम लोगों की आंखों को खतरा है. इसे रोकने के लिए राज्य सरकार को प्रयास करने चाहिए.

निर्विरोध जीत गए 3000 लोग, न्यायालय ने असंतुष्ट उम्मीदवारों को चुनाव याचिका दायर करने की अनुमति दी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को ‘बहुत विचित्र’ बताया कि पंजाब में हाल में हुए चुनावों में 13,000 पंचायत पदाधिकारियों में से 3,000 निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। न्यायालय ने असंतुष्ट उम्मीदवारों को चुनाव याचिका दायर करने की अनुमति दे दी। प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों को खारिज करने और अन्य चुनावी अनियमितता का आरोप लगाने संबंधी याचिका पर पहले नोटिस जारी किए थे। पीठ ने कहा कि पीड़ित व्यक्ति निर्वाचन आयोग के समक्ष चुनाव याचिका दायर कर सकते हैं और आयोग को छह महीने में उन पर फैसला करना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि जिन उम्मीदवारों के नामांकन पत्र खारिज कर दिए गए या फाड़ दिए गए, वे भी अपनी शिकायतें लेकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि उनकी याचिकाओं को सीमा अवधि के उल्लंघन के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाओं को गुण-दोष के आधार पर निपटाया जाना चाहिए। आदेश में कहा गया है, ‘हम याचिकाकर्ता को चुनाव याचिका दायर करने की अनुमति देते हैं। राज्य निर्वाचन आयोग छह महीने में याचिकाओं पर फैसला करेगा, देरी होने पर याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय जा सकते हैं।’ आदेश में कहा गया है, ‘जिन लोगों के नामांकन खारिज कर दिए गए या कागजात फाड़ दिए गए, वे कानून के अनुसार उच्च न्यायालय के समक्ष समीक्षा याचिका दायर कर सकते हैं… यदि उच्च न्यायालय में उनकी याचिका खारिज कर दी जाती है तो याचिकाकर्ताओं को इस अदालत में आने का अधिकार है।’ संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, जब न्यायालय को बताया गया कि पंचायत के 13,000 से अधिक पदों में से 3,000 पर उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं, तो प्रधान न्यायाधीश ने आश्चर्य व्यक्त किया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘यह बहुत अजीब है! मैंने ऐसे आंकड़े कभी नहीं देखे… यह बहुत बड़ी संख्या है।’ एक वकील ने दावा किया कि चुनाव के दौरान एक उम्मीदवार का चुनाव चिह्न हटा दिया गया था। शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि उच्च न्यायालय ने सैकड़ों याचिकाओं को प्रभावित पक्षों का पक्ष उचित तरीके से सुने बिना खारिज कर दिया। पीठ ने 18 अक्टूबर को सुनीता रानी और अन्य द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें 15 अक्टूबर को हुए पंचायत चुनावों में अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था।

हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को नोटिस देकर मांगा जवाब, छत्तीसगढ़ में स्कूलों के पास बिक रहे तंबाकू उत्पाद

बिलासपुर. बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रदेश में स्कूलों के पास तंबाकू उत्पादों की बिक्री का संज्ञान लिया है और राज्य सरकार की तरफ से मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर इस मुद्दे पर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की युगलपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की है और इसे गंभीर चिंता का विषय बताया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा की बेंच ने चिंता जताते हुए कहा कि बच्चे ड्रग एडिक्ट हो जाएंगे तो क्या होगा..? उन्होंने कहा की कोटपा कानून है तो उसका पालन होना चाहिए कि नहीं? दरअसल 15 नवंबर 2024 को शुक्रवार को छुट्टी के दिन भी उच्च न्यायालय की बैठक हुई। मुख्य न्यायाधीश ने रजिस्ट्रार जनरल को मीडिया रिपोर्टों के आधार पर मामले को जनहित याचिका (पीआईएल) के रूप में पंजीकृत करने का निर्देश दिया था। मीडिया में आई रिपोर्टों से पता चला है कि बिलासपुर में सरकारी और निजी स्कूलों के पास सड़क के स्टॉल पर तंबाकू उत्पाद खुलेआम बेचे जा रहे हैं। इन रिपोर्टों ने बताया कि कैसे इस तरह की गतिविधियाँ स्कूलों के आसपास के वातावरण को खराब कर रही हैं और छात्रों पर इसका नकारात्मक प्रभाव हो है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिकारियों से जवाब मांगा है, जिसका उद्देश्य स्कूलों के पास तंबाकू उत्पादों की बिक्री और छात्रों तथा सार्वजनिक व्यवस्था पर इसके प्रभाव का समाधान करना है। महाधिवक्ता ने सोमवार की सुनवाई में शासन का पक्ष रखते हुए शपथ पत्र में जानकारी दी कि 15 नवंबर 2024 के आदेश का परिपालन करते हुए  बिलासपुर जिला प्रशासन द्वारा कोटपा अधिनियम का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों पर पेनल्टी और अन्य कार्रवाई की गई है और गंभीरता से कोटपा कानून का पालन कराया जा रहा है। चीफ जस्टिस की डबल बेंच ने इस पूरे मामले में मुख्य सचिव और बिलासपुर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की तरफ से शपथ पत्र के साथ जवाब तलब किया है। मामले में अगली सुनवाई आगामी पांच दिसंबर को तय की गई है।

हाईकोर्ट ने CPS कानून को किया निरस्त, सरकार को झटका, 6 मुख्य संसदीय सचिव हटाए गए

शिमला हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बनाए मुख्य संसदीय सचिव अब नहीं रहेंगे। हाईकोर्ट ने सरकार के इन सभी संसदीय सचिवों को तुरंत प्रभाव से पद से हटाने के आदेश दिए हैं। इस फैसले के बाद वर्तमान सरकार में कार्य कर रहे छह मुख्य संसदीय सचिवों को अपना पद व सुविधाएं छोड़नी होंगी। जस्टिस विवेक ठाकुर और बीसी नेगी की हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिया कि इन सीपीएस की सभी सुविधाएं और विशेषाधिकार तत्काल प्रभाव से वापस ले लिए जाएं। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ता, शक्तियां, विशेषाधिकार और संशोधन) अधिनियम, 2006 को शून्य घोषित कर दिया। सार्वजनिक संपत्ति पर किया कब्जा जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ये पद सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा करते हैं और सभी सुविधाएं तत्काल प्रभाव से वापस ली जानी चाहिए।मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 8 जनवरी, 2023 को कैबिनेट विस्तार से पहले छह सीपीएस-अर्की विधानसभा से संजय अवस्थी, कुल्लू से सुंदर सिंह, दून से राम कुमार, रोहड़ू से मोहन लाल बराकटा, पालमपुर से आशीष बुटेल और बैजनाथ से किशोरी लाल को नियुक्त किया था। ये भर्ती 2006 के अधिनियम के अनुसार की गई: बीजेपी एडवोकेट मुख्य संसदीय सचिवों की भर्ती पर हाईकोर्ट के आदेश पर भाजपा के वकील एडवोकेट वीरबहादुर वर्मा ने कहा कि सतपाल सती के नेतृत्व में 10 भाजपा विधायकों ने सीपीएस की भर्ती को कोर्ट में चुनौती दी थी। यह भर्ती 2006 के अधिनियम के अनुसार की गई थी। कोर्ट ने माना है कि 2006 का अधिनियम असंवैधानिक था। हाईकोर्ट ने सीपीएस सुविधाओं को तुरंत वापस लेने का भी आदेश दिया है। अगर दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला करता है, तो उन्हें वहां भी कोई राहत नहीं मिलेगी, अधिनियम निरस्त कर दिया गया है। जयराम ठाकुर ने दी प्रतिक्रिया सीपीएस के फैसले पर नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। भारतीय जनता पार्टी पहले दिन से ही सीपीएस बनाने के फैसले के खिलाफ थी क्योंकि यह असंवैधानिक था और यह संविधान के विरुद्ध निर्णय था। उन्होंने कहा कि जब 2017 में हम सरकार में थे तो हमारे समय भी यह प्रश्न आया था। तो हमने इसे पूर्णतया असंवैधानिक बताते हुए सीपीएस की नियुक्ति नहीं की थी। आज हाईकोर्ट द्वारा फिर से सरकार के तानाशाही पूर्ण और असंवैधानिक फैसले को खारिज कर दिया। हम मांग करते हैं कि इस पद का लाभ लेने वाले सभी विधायकों की सदस्यता भी समाप्त हो।

आंगनबाड़ी में फल-दूध न मिलने पर लिया संज्ञान, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला-बाल विकास विभाग से मांगा जवाब

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने आंगनबाड़ी में बच्चों को फल, दूध आदि नहीं दिए जाने पर स्वतः संज्ञान लिया है. मामले की जनहित याचिका के रूप में सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट से सचिव महिला बाल विकास विभाग के शपथ पत्र का तुलनात्मक मिलान करने को कहा है. मामले में अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी. बता दें कि दुर्ग जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को फल और दूध नहीं दिए जाने की खबर मीडिया में आई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर सुनवाई शुरू की. चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डीबी ने इसके लिए एडवोकेट अमिय कांत तिवारी , सिध्दार्थ दुबे, आशीष बेक, ईशान वर्मा को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया. कोर्ट कमिश्नरों ने इन केन्द्रों में जाकर रिपोर्ट कोर्ट में पेश की. कोर्ट कमिश्नरों को सबंधित अधिकारियों ने बताया कि फल दूध की जगह पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है. रिपोर्ट आने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य शासन के संबंधित प्राधिकारी से शपथपत्र के साथ जवाब मांगा था. मामले में राज्य के मुख्य सचिव और अन्य अफसरों को पक्षकार बनाया गया. इसके कुछ समय बाद सूरजपुर, कवर्धा और बस्तर से भी यही मामला सामने आया. इन जगहों पर जाकर भी कमिश्नरों ने निरीक्षण कर फिर अपनी रिपोर्ट तैयार की. इस बीच सचिव महिला बाल विकास ने कोर्ट में शपथपत्र प्रस्तुत किया. आज मंगलवार को चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच में सुनवाई के दौरान उपस्थित कोर्ट कमिश्नर से कोर्ट ने कहा कि वे अपनी रिपोर्ट से इस शपथपत्र को तुलना कर लें ताकि मालूम हो सके कि अदालत के आदेश का पालन हुआ है या नहीं.

MP हाईकोर्ट ने कहा धार कार्ड में लिखी उम्र नहीं मानी जाएगी सही, आयु नहीं पहचान का दस्तावेज है कार्ड

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जीएस आहलूवालिया की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि आधारकार्ड आयु नहीं बल्कि पहचान का दस्तावेज है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने आदेश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजने की व्यवस्था दे दी। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मुख्य सचिव सभी जिला कलेक्टरों को इस संबंध में अवगत करा दें। यह मामला नरसिंहपुर अंतर्गत सिंहपुर पंचायत निवासी सुनीता बाई साहू की याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके पति मोहनलाल साहू की करंट लगने से मृत्यु हो गई थी। लिहाजा, शासकीय योजना अंतर्गत आर्थिक सहायता के लिए आवेदन किया गया था। किंतु वह आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि दिवंगत पति की आयु 64 वर्ष से अधिक थी। जबकि आधार कार्ड में दर्ज आयु के अनुसार मृत्यु के समय पति की आयु 64 वर्ष से कम थी। राज्य शासन की ओर से स्पष्ट किया गया कि जनपद पंचायत ने संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पाया था कि मृतक की आयु 64 वर्ष से अधिक थी। इसके अलावा 2023 में जारी एक परिपत्र में भी यह साफ किया गया था कि आधार कार्ड का उपयोग पहचान के लिए किया जाना चाहिए न कि जन्मतिथि सत्यापन के लिए। ऐसा इसलिए क्योंकि वह जन्मतिथि का प्रमाण-पत्र नहीं है। मप्र हाई कोर्ट सहित देश के अन्य हाई कोर्ट भी अपने पूर्व आदेशों में यह रेखांकित कर चुके हैं कि आधार कार्ड पहचान पत्र है न कि जन्मतिथि का प्रमाण पत्र। चेक-कैंट बोर्ड वार्षिक वेतनवृद्धि के लाभ पर निर्णय ले : हाई कोर्ट हाई कोर्ट ने कैंट बोर्ड, जबलपुर को निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता कर्मी को वार्षिक वेतनवृद्धि का लाभ प्रदान करने पर निर्णय लें। न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को 10 दिन के भीतर कैंट सीईओ को फ्रेश अभ्यावेदन प्रस्तुत करने कहा। कोर्ट ने सीईओ को निर्देश दिए हैं कि अभ्यावेदन पर विचार कर 30 दिन के भीतर उचित निर्णय पारित करें। जबलपुर निवासी याचिकाकर्ता सुरेश कुमार डुमार की ओर से अधिवक्ता सौरभ तिवारी व मौसम पासी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता कैंट बोर्ड में सफाई कर्मचारी के रूप में पदस्थ है। याचिकाकर्ता 2001 से वार्षिक वेतनवृद्धि पाने का हकदार है। याचिकाकर्ता को उत्कृष्ट कर्मचारी का अवार्ड भी मिला है। इस संबंध में कैंट बोर्ड में अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया। जब कोई कार्रवाई नहीं की गई तो याचिका दायर की गई।  

‘वन्य जीव और पर्यावरण भी नष्ट हो रहा, अब बचा क्या है?’, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट की फटकार

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वन्य जीव के संरक्षण को लेकर लगी याचिका पर आज सुनवाई हुई। जिसमें प्रदेश में हुई बाघ की मौत को भी संज्ञान में लिया गया। वन्यजीवों के मौत के मामले में मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को अहम माना जा रहा है। दरअसल छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा की डीबी में सुनवाई हुई जिसमें कोर्ट ने वन्यजीवों की मौत और पर्यावरण की अनदेखी पर बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वन्य जीव नष्ट हो रहे हैं, पर्यावरण भी नष्ट हो रहे हैं अब बचा क्या? मुख्य न्यायाधीश की डीबी ने कहा कि वन्य जीव नहीं बचा पाएंगे और जंगल नहीं बच पाएंगे तो कैसे चलेगा? वन्यजीव है तो जंगल हैं, छत्तीसगढ़ में कम से कम यही सब है। जिसके जवाब में महाधिवक्ता ने कहा कि मामले में कड़ी कार्रवाई की जा रही है। कोर्ट ने बाघ की मौत को लेकर भी टिप्पणी की है। कहा यह दूसरी मौत है, टाइगर हिंदुस्तान में जल्दी मिलता नहीं, यहां है तो संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल 8 नवंबर 2024 को सरगुजा के कोरिया वन मंडल के पास खनखोपड़ नाला के किनारे बाघ का शव मिला, जिसे वन विभाग ने आधिकारिक तौर पर जहर खुरानी की घटना बताया है, जिसकी जांच जारी है। हाईकोर्ट ने एफिडेविट के माध्यम से कार्रवाई के बारे में पूछा। जिस पर शासन का पक्ष महाधिवक्ता ने रखा। हाईकोर्ट ने APCCF को नोटिस जारी कर व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र का जवाब तलब किया है। कोर्ट ने पूछा है कि वन्यजीवों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? मामले में अगली सुनवाई आगामी 21 नवंबर को निर्धारित की है।

हाई कोर्ट ने 12 जजों के स्थानांतरण आदेश जारी किए गए, मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत ने दिया आदेश

जबलपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत के आदेश पर 12 जजों के स्थानांतरण आदेश जारी किए गए हैं। जिला सत्र न्यायाधीश, इंदौर ओमप्रकाश रजक को जिला एवं सत्र न्यायााधीश, पाटन, जबलपुर के रिक्त पद पर स्थानांतरित किया गया है। लीगल सर्विस अथार्टी, खंडवा के सचिव यशवंत मालवीय को ओमप्रकाश रजक के स्थान पर इंदौर में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में स्थानांतरित किया गया है।इसी प्रकार प्रधान जिला सत्र न्यायाधीश सतना अजय श्रीवास्तव को इंदौर में भगवती प्रसाद शर्मा के स्थान पर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में स्थानांतरित कियाा गया है। मप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के सदस्य सचिव रत्नेश चंद्र बिसेन को प्रधान जिला सत्र न्यायाधीश, सतना अजय श्रीवास्तव के स्थान पर ट्रांसफर किया गया है। अतुल कुमार खंडेलवाल , प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, सागर को प्रधान न्यायाधीश फैमिली कोर्ट, भोपाल में भौरेलाल प्रजापति के स्थान पर ट्रांसफर किया गया है। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल धरमिंदर सिंह के अनुसार सात सिविल जज, सीनियर डिवीजन को भी स्थानांतरित किया गया है, इसमें शिवराज सिंह गवाली पन्ना से इंदौर, मोहम्मद नियामत हुसैन रिजवी आस्टा-सीहोर से ग्वालियर, द्वारका प्रसाद रतलाम से जबलपुर, निधि शाक्यवार पन्ना से इंदौर, अमरीश भारद्वाज इंदौर से सिवनी, श्वेता खरे ग्वालियर से जबलपुर और जगमोहन सिंह परासिया-छिंदवाड़ा से जबलपुर स्थानांतरित किए गए हैं।

हाई कोर्ट ने कहा- पुरुष को कमाने-पढ़ने का मौका और महिला को नहीं, यह गलत बात

प्रयागराज महिला और पुरुष की शादी की न्यूनतम उम्र में अंतर होना पितृसत्तात्मक व्यवस्था की एक निशानी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक केस की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारत में पुरुष के लिए शादी की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है और महिला के लिए यह 18 वर्ष है। यह कुछ और नहीं बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था की एक निशानी है। जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस डी. रमेश की बेंच ने कहा कि पुरुषों को शादी के लिए तीन वर्ष का अतिरिक्त समय इसलिए दिया गया है क्योंकि वे पढ़ाई कर सकें और आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कर पाएं। अदालत ने कहा कि महिलाओं के लिए स्थिति उलट है और उन्हें इस तरह का कोई अवसर नहीं मिलता है। बेंच ने कहा, ‘पुरुषों को शादी के लिए न्यूनतम आयु में तीन वर्ष का अधिक समय देना और महिलाओं को इससे इनकार करना समानता के विपरीत है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की निशानी है और मौजूदा कानून भी इसे ही आगे बढ़ा रहे हैं। इस व्यवस्था में यह मान लिया गया है कि पुरुष को आयु में बड़ा होना चाहिए और वह ही परिवार की आर्थिक व्यवस्था देखे। वहीं महिलाओं को लेकर माना गया है कि वे सेकेंड पार्टी रहें और उन्हें पहले के जितना दर्जा न मिले। यह वयवस्था किसी भी मायने में बराबरी वाली नहीं है।’ अदालत ने यह टिप्पणियां एक केस की सुनवाई के दौरान की, जिसमें शश्स ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी। परिवार न्यायालय ने उस व्यक्ति की शादी को खारिज करने से इनकार कर दिया था। शख्स का कहना था कि उसका बाल विवाह हुआ था और वह इस शादी से सहमत नहीं है। उसका कहना था कि 2004 में विवाह हुआ था और तब उसकी आयु महज 12 साल ही थी, जबकि पत्नी की आयु 9 साल थी। 2013 में शख्स ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत शादी को खारिज करने की मांग की थी। शख्स ने जब केस दाखिल किया था, तब भी उसकी आयु 10 साल, 10 महीने और 28 दिन ही थी। क्या कहता है बाल विवाह को लेकर बना कानून इस प्रावाधन के तहत यदि बाल विवाह हुआ तो उसमें शामिल दो में से कोई भी एक सदस्य शादी खारिज करने की मांग कर सकता है। यही नहीं इसके अनुसार यदि बाल विवाह वाले दोनों सदस्य बालिग होने के दो वर्ष बाद भी ऐसी अपील करते हैं तो उसे माना जा सकता है। इसी मामले में जब पति अदालत पहुंचा तो उसकी पत्नी ने विरोध किया। उसका कहना था कि पति ने जब अपनी शादी को खारिज कराने की मांग की तो वह बालिग था। उसकी उम्र 18 साल से अधिक हो चुकी थी। वह 2010 में ही बालिग हो गया था। यही तर्क जब उसने हाई कोर्ट में दिया तो अदालत ने पुरुष और स्त्री की शादी की न्यूनतम उम्र में अंतर होने पर सवाल उठाया।

विद्युत एमडी से माँगा जवाब, छत्तीसगढ़-रायगढ़ में हाथियों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त

बिलासपुर. बिजली करंट की चपेट में आने से हाथियों की मौत के मामले को हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। सचिव ऊर्जा विभाग और छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर को होगी। दरअसल रायगढ़ के घरघोड़ा वनक्षेत्र में बिजली के करंट की चपेट में आने से हाथियों की मौत हुई थी मौत। अखबार में प्रकाशित खबर का हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया था। तमनार वन परिक्षेत्र के सामारुमा कम्पाटमेंट 856 पीएफ, घरघोड़ा उप वन मंडल चुहकीमार जंगल में सनसनीखेज घटना सामने आया है। जिसमें 11 केवी धारा प्रवाहित करंट की चपेट में आने से एक हाथी का बच्चा, 1 मादा एवं एक युवा हाथी दर्दनाक मौत हो गई। जब तड़के सुबह जब ग्रामीण जन जंगल की ओर गए तब उन्हें हाथी एक दूसरे के इर्दगिर्द में मृत अवस्था मे मिले।

हाईकोर्ट ने आयुक्त से मांगा शपथ पत्र, छत्तीसगढ़-बिलासपुर के व्यापार विहार में कचरा डंप

बिलासपुर. बिलासापुर के व्यापार विहार में कचरा डंप करने के मामले में हाईकोर्ट ने संज्ञान लेकर नगर निगम से जवाब मांगा है। सोमवार को चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच में निगम की ओर से बताया गया कि कचरा उठवाकर अधिकांश क्षेत्र को साफ कर लिया गया है। ठेका कंपनी को भी चेतावनी दी गई है। कोर्ट ने निगम आयुक्त को संबंधित दस्तावेज के साथ शपथ पत्र पर जानकारी प्रस्तुत करने कहा है। बता दें कि निगम ने व्यापार विहार तारामंडल के पीछे दो करोड़ रुपये की लागत से ऑक्सीजोन का निर्माण कराया था। यहां पर्याप्त पेड़-पौधे लगातार लोगों को प्रदूषण मुक्त वातावरण देने की योजना थी, लेकिन यहां नगर निगम द्वारा कचरा डंप किया जाने लगा। डोर-टू-डोर कचरा जमा करने वाली रामके कंपनी के लिए यह एरिया डंपिंग जोन बनता जा रहा था। तिफरा, सिरगिट्टी, व्यापार विहार और अन्य क्षेत्रों का लाखों टन कचरा यहां की लगभग 10 एकड़ जमीन पर डंप हो रहा था। आज मामले में सुनवाई के दौरान निगम की ओर से बताया गया कि कचरा साफ करने के लिए अभियान चलाया गया है और लगभग 50 हाइवा कचरा उठा लिया गया है। पूरा क्षेत्र लगभग साफ हो गया है। हाईकोर्ट ने निगम के जवाब से संतुष्टि जताई और आयुक्त को मामले में शपथ पत्र प्रस्तुत करने कहा। उल्लेखनीय है कि शहर से कचरा उठाने का ठेका नगर निगम ने हैदराबाद की रामके कंपनी को दे रखा है। कंपनी को शहर से कचरा उठाकर 15 किलोमीटर दूर ग्राम कछार ले जाकर अपशिष्ट प्रबंधन करना है,लेकिन इसमें ज्यादा खर्च होने की वजह से कंपनी कचरा यहीं व्यापार विहार में ही डंप कर रही है।

कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग पर MP हाईकोर्ट की रोक, सरकारों, यूट्यूब, X को जारी किया नोटिस

 भोपाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग यानी सीधा प्रसारण वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अवैध रूप से साझा करने, एडिट करने, इस्तेमाल करने और बदलाव करने पर सोमवार को रोक लगा दी। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से ऐसे वीडियो हटाने के अनुरोध वाली एक याचिका पर केंद्र और राज्य सरकारों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी नोटिस जारी किया। क्या दी दलील? दमोह के एक कारोबारी डॉ. विजय बजाज ने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अवैध रूप से साझा करने, एडिट करने और उसे प्रसारित करने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। विजय बजाज की पैरवी करने वाले वकील उत्कर्ष अग्रवाल ने कहा कि यह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की कार्यवाही के सीधा प्रसारण से संबंधी नियमों का उल्लंघन है। कमाई करने वालों से वसूली जाए रकम याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अवैध रूप से साझा करके इन वीडियो पर मिली व्यूवरशिप (देखने वाले लोगों की संख्या) के जरिये धन कमाने वालों से उक्त धन की वसूली के लिए भी निर्देश जारी किया जाए। कॉपीराइट का उल्लंघन करके अवैध रूप से अपलोड किए गए कुछ वीडियो विशेष रूप से प्रस्तुत किए गए। यूट्यूब और एक्स को नोटिस मुख्य न्यायाधीश एसके कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। वकील उत्कर्ष अग्रवाल ने बताया कि याचिका की सुनवाई के दौरान यूट्यूब और एक्स को नोटिस जारी किया गया है। अग्रवाल ने कहा कि याचिका की सुनवाई के दौरान इसने मेटा प्लेटफॉर्म इंक, यूट्यूब और ट्विटर को नोटिस जारी किए। विस्तृत आदेश के अपलोड होने का इंतजार है। हाई कोर्ट के पास लाइव स्ट्रीमिंग की कॉपीराइट इन नियमों में स्पष्ट प्रविधान है कि लाइव स्ट्रीमिंग के सभी कापीराइट हाई कोर्ट के पास हैं। इन नियमों के अंतर्गत किसी भी प्लेटफार्म पर लाइव स्ट्रीमिंग का मनमाना उपयोग, शेयर, ट्रांसमिट या अपलोड करना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद निर्धारित नियमों का उल्लंघन करते हुए कई सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लाइव स्ट्रीमिंग की क्लिपिंग को एडिट करके अपलोड करके आर्थिक लाभ उठाया जा रहा है। हाई कोर्ट के सुनवाइयों की मीम्स, शार्ट्स यही नहीं हाई कोर्ट के आदेशों के मीम्स, शार्ट बनाए जाते हैं और न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं व शासकीय अधिकारियों पर अभद्र व आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाती हैं। अब तक जिन भी लोगों ने हाई कोर्ट लाइव स्ट्रीमिंग का दुरुपयाेग कर सोशल मीडिया के माध्यम से धनार्जन किया है, उनसे वसूली की जाए। अभी तक जितनी भी क्लिपिंग सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपलोड की गई हैं, उन्हें डिलीट करने का भी आदेश पारित किया जाए।

बेकसूर होने के बावजूद जेल में काटे 14 साल, हाईकोर्ट ने पुलिस जांच की निंदा करते हुए कहा…

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साल 2008 में एक शख्स की हत्या के मामले में दो महिलाओं को बरी कर दिया। हालांकि इन दो महिलाओं में से एक सूरज बाई को 14 साल तक जेल काटनी पड़ी। इसके साथी न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की खंडपीठ ने निचली अदालत से अभियोजन पक्ष के गवाहों के खिलाफ झूठी गवाही और साक्ष्य देने के लिए कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया। सूरज बाई पर अपनी रिश्तेदार भूरी बाई की मदद से अपने देवर की हत्या करने और शव को पेड़ से लटकाकर घटना को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश का आरोप लगाया गया था। अदालत ने उन्हें पिछले हफ्ते राहत दी। अदालत ने 16 अक्टूबर को दोषसिद्धि के खिलाफ उनकी अपील को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में सूरज बाई को जेल से तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। हालांकि भूरी बाई पहले से ही जमानत पर बाहर थीं। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने मामले को बेहद लापरवाही से लिया। निचली अदालत को यह समझना चाहिए कि वह किसी के जीवन और उसकी आजादी के बारे में फैसला कर रही है। किसी को भी कानून के ठोस सिद्धांतों के बिना सजा नहीं दी जानी चाहिए। खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों को आंख मूंदकर स्वीकार करना सबूतों को परखने का उचित तरीका नहीं है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस विशाल मिश्रा की अदालत ने कहा- इस मामले में एक महिला 14 साल से जेल में है। यही नहीं दूसरी को अपने नाबालिग बच्चों के साथ जेल में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है। गवाहों ने जानबूझकर गलत बयान दिया। पुलिस ने मामले की ठीक से जांच भी नहीं की। इससे अभियोजन पक्ष के गवाहों को याचिकाकर्ता महिलाओं को फंसाने का मौका मिल गया।

स्टेट बार और सदस्य की ओर से जवाब प्रस्तुत नहीं, हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई, कॉस्ट लगाने की चेतावनी दी

जबलपुर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने एमपी स्टेट बार काउंसिल के चैंबर आवंटन प्रकरण को गंभीरता से लिया है। हाईकोर्ट ने स्टेट बार और सदस्य जगन्नाथ त्रिपाठी को चेतावनी दी है कि यदि दो सप्ताह में जवाब पेश नहीं किया गया तो 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। जुर्माना राशि जमा करने पर ही जवाब स्वीकार किया जाएगा। जुर्माना एमपी लीगल एड के कोष में जमा करनी होगी। प्रकरण की अगली सुनवाई 18 नवंबर वाले सप्ताह में होगी। याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी अधिवक्ता ग्रीष्म जैन की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि स्टेट बार के सदस्य जगन्नाथ त्रिपाठी ने मनमाने तरीके से आवंटित चैंबर का 54 माह तक लाभ उठाया है। इस अवधि के बिजली बिल का भी उनके द्वारा भुगतान नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने नियम विरुद्ध आवंटन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके बावजूद, दिवंगत हो चुके या जज बन चुके वकीलों के रिश्तेदारों को चैंबर आवंटित कर दिए गए हैं। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि चार माह गुजर चुके हैं, लेकिन स्टेट बार और सदस्य जगन्नाथ त्रिपाठी की ओर से अब तक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई और उपरोक्त आदेश जारी किए।  

मस्जिद में राम नाम के नारे लगाने वाले आरोपियों के खिलाफ केस खारिज, Karnataka HC ने की टिप्पणी

बेंगलुरु कर्नाटक हाईकोर्ट ने मस्जिद के अंदर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के आरोप में दो लोगों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इससे किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंची है। आपको बता दें कि कोर्ट का यह यह आदेश पिछले महीने पारित किया गया था।  वेबसाइट पर अपलोड किया गया। शिकायत के अनुसार, दक्षिण कन्नड़ जिले के दो लोग पिछले साल सितंबर में एक रात एक स्थानीय मस्जिद में घुस गए और “जय श्री राम” के नारे लगाए। इसके बाद स्थानीय पुलिस ने उन पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। दोनों के खिलाफ धारा 295 ए (धार्मिक विश्वासों को ठेस पहुंचाना), 447 (आपराधिक अतिक्रमण) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपियों ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को खारिज करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील ने तर्क दिया कि मस्जिद एक सार्वजनिक स्थान है और इसलिए इसमें अपराध का कोई मामला नहीं बनता है। वकील ने यह भी तर्क दिया कि ‘जय श्री राम’ का नारा लगाना आईपीसी की धारा 295 ए के तहत परिभाषित अपराध की आवश्यकता को पूरा नहीं करता है। ‘बार एंड बेंच’ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा, “कोर्ट ने कहा कि यह समझ में आता है कि अगर कोई ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाता है तो इससे किसी वर्ग की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचेगी। जब शिकायतकर्ता खुद कहता है कि इलाके में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के साथ रह रहे हैं तो इस घटना का किसी भी तरह से कोई नतीजा नहीं निकल सकता।” क र्नाटक सरकार ने याचिकाकर्ताओं की याचिका का विरोध किया और उनकी हिरासत की मांग करते हुए कहा कि मामले में आगे की जांच की जरूरत है। हालांकि अदालत ने माना कि अपराध का सार्वजनिक व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। कोर्ट ने कहा, “सर्वोच्च न्यायालय का मानना ​​है कि कोई भी कार्य आईपीसी की धारा 295 ए के तहत तब तक अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक कि उससे शांति स्थापित करने या सार्वजनिक व्यवस्था को नष्ट करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसा नहीं होता है तो उन्हें आईपीसी की धारा 295 ए के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।”

भूपेश बघेल के करीबी को बड़ा झटका, छत्तीसगढ़-बिलासपुर हाईकोर्ट से केके श्रीवास्तव की जमानत याचिका ख़ारिज

बिलासपुर. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी रहे केके श्रीवास्तव को बिलासपुर हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 15 करोड़ के धोखाधड़ी मामले में चीफ जस्टिस की अदालत ने श्रीवास्तव की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज कर दी है। बता दें कि, फरार चल रहे श्रीवास्तव को पुलिस ने भगोड़ा करार दे दिया है। श्रीवास्तव पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत 500 करोड़ रुपये का ठेका दिलाने का झांसा दिया था। इस वादे के एवज में रावत एसोसिएट्स के मालिक अर्जुन रावत ने 10 से 17 जुलाई 2023 के बीच 15 करोड़ रुपये श्रीवास्तव को दिए थे। हालांकि कंपनी को कोई काम नहीं मिला, जिससे ठगी का मामला सामने आया। इसके बाद कंपनी की ओर से तेलीबांधा थाने में धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया गया। तब से पुलिस श्रीवास्तव और उनकी पत्नी कंचन श्रीवास्तव की तलाश कर रही है। केके श्रीवास्तव गिरफ्तारी से बचने के लिए, हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। श्रीवास्तव की याचिका पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने पिछले दिनों सुनवाई करते हुए इस पर कड़ी टिप्पणी की थी। चीफ जस्टिस ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए इसे ‘बहुत बड़ी ठगी’ ( ह्यूज फ्राड) करार दिया था। आज केके श्रीवास्तव की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस मुरलीधरन ने पैरवी की।

करंट से हाथियों की मौत पर जारी की है गाइड लाइन, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वन विभाग का शपथ पत्र

बिलासपुर. हाथियों की बिजली करंट से हो रही मौत को लेकर दूसरी बार दायर की गई जनहित याचिका पर वन विभाग ने हाईकोर्ट में शपथपत्र दिया है। इसमें कहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी अब भारत सरकार द्वारा हाथियों को बिजली करंट से बचाने के लिए कार्य करेगी। इसके लिए बिजली कंपनी ने निर्देश भी जारी किये हैं। सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने याचिका निराकृत करते हुए निर्देश दिए कि केंद्र सरकार की गाइडलाइंस का शब्दतः और मूल भावना में पालन किया जाये। रायपुर के नितिन सिंघवी ने इस मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की थी। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार की वर्ष 2016 की गाइडलाइंस के अनुसार हाथी जैसे वन्य प्राणियों को बिजली करंट से बचाने के लिए हाथी की सूंड जहां तक जा सकती है, उससे ऊंचाई तक विद्युत लाइन रखनी है। गौरतलब है कि पीछे के पांव पर खड़े होने पर और सूंड ऊपर उठाने पर एक व्यस्क हाथी की लंबाई 20 फीट तक हो सकती है। विद्युत लाइन की ऊंचाई 20 फीट करने के साथ और भी कई कार्य गाइडलाइंस के अनुसार बिजली कंपनी हाथियों के मूवमेंट वाले वन क्षेत्र में विद्युत लाइन की ऊंचाई 20 फीट करने और विद्युत तारों को कवर्ड कंडक्टर में बदलने या अंडरग्राउंड केबल बिछाने के लिए कार्य करेगी। कंपनी समय-समय पर झुकी हुई बिजली की लाइनों और बिजली के खंभों को ठीक करने के साथ 3 से 4 मीटर तक बारबेट वायर लगाएगी ताकि वन्य प्राणी सुरक्षित रहें। हाथी विचरण क्षेत्र में बिजली कंपनी जंगली जानवरों के शिकार के लिए फैलाए जाने वाले स्थान एवं फसलों और घरों की सुरक्षा के लिए बनाए गए घेरे में करंट, अस्थाई पंप और अवैध विद्युत कनेक्शन की जांच करेगी। प्रोटेक्टेड एरिया अर्थात नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व, अभयारण्य, एलिफेंट कॉरिडोर में वन विभाग के साथ वर्ष में दो बार संयुक्त सर्वे किया जाएगा। अपर वन मुख्य सचिव एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की बैठक 26 जून 2024 को अपर मुख्य सचिव वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की अध्यक्षता में ऊर्जा विभाग, विद्युत वितरण कंपनी और वन विभाग के अधिकारियों की बैठक में निर्णय लिया गया कि हाथियों को बिजली करंट से बचाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर जारी गाइडलाइंस का पालन किया जाएगा। बैठक में निर्देश दिए गए कि ऊर्जा विभाग बिजली के 11 केवी, 33 केवी लाइन एवं एलटी लाइन के झुके हुए तारों को कसने का काम, तार की ऊंचाई बढ़ाने का काम तथा वन क्षेत्र, हाथी रहवास, हाथी विचरण क्षेत्र में भूमिगत बिजली की लाइन बिछाने अथवा इंसुलेटेड केबल लगाने का कार्य करेंगे। इसके बाद प्रधान मुख्य संरक्षक (वन्यप्राणी) द्वारा सितम्बर में ली गई बैठक में बिजली कंपनी ने बताया कि पंप कनेक्शन के लिए केबल कार्य लगाने का कार्य जारी है।

हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका, छत्तीसगढ़-शराब घोटाला में त्रिपाठी और ढिल्लन को जमानत नहीं

बिलासपुर। हाई कोर्ट ने शराब घोटाला मामले में आरोपी अरुणपति त्रिपाठी और त्रिलोक सिंह ढिल्लन की ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया है. आरोपियों ने ईओडब्लू द्वारा शराब घोटाला मामले में दर्ज एफआइआर को लेकर जमानत याचिका दायर थी, जिस पर जस्टिस अरविंद वर्मा की कोर्ट में सुनवाई हुई, दोनों पक्षों को सुन बीते माह हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिस पर ऑर्डर जारी किया गया है. दरअसल, ईडी ने शराब घोटाले मामले में मई 2023 में आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और शराब वितरण कंपनी सीएसएमसीएल के पूर्व एमडी अरुण पति त्रिपाठी को गिरफ्तार किया था. पूछताछ कर ईडी की विशेष अदालत ने जेल भेज दिया था. उन्होंने विशेष अदालत में जमानत अर्जी लगाई, जहां अर्जी खारिज होने पर हाईकोर्ट में जमानत अर्जी लगाई. हाईकोर्ट ने पहली बार जमानत खारिज कर दिया, लेकिन दूसरी बार में बेल दे दिया था. इसी दौरान EOW ने शराब घोटाले और नकली होलोग्राम पर केस दर्ज कर जांच शुरू की, जिसके तहत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई. EOW की गिरफ्तारी के बाद एपी त्रिपाठी और कारोबारी त्रिलोक ढिल्लन ने हाईकोर्ट में अलग अलग जमानत अर्जी लगाई. याचिकाकर्ताओं ने ईडी और एसीबी की कार्रवाई को झूठा बताते हुए कहा, कि इस केस में उन्हें पहले से बेल मिल गई है. अब उसी केस पर EOW ने दूसरी FIR किया है, जो अवैधानिक है. मामले में सुनवाई के दौरान ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए कोर्ट में तर्क दिया गया था, कि यह गंभीर आर्थिक अपराध है, राज्य के साथ सीधा छल है. सरकारी रेवेन्यू सरकार के ख़ज़ाने में जमा होने के बजाय सिंडिकेट की जेब में गया, यह एक संगठित अपराध गिरोह है.

शंभू बॉर्डर खुलवाने के लिए हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिये गए: हाईकोर्ट

चंडीगढ़ किसान आंदोलन के कारण 5 महीने से बंद शंभू बॉर्डर के मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को बॉर्डर से बैरिकेड हटाने के आदेश दिए हैं और एक हफ्ते के भीतर शंभू बॉर्डर खोलने को कहा है। शंभू बॉर्डर खुलवाने के लिए हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिये गए। इसके साथ ही अदालत ने हरियाणा सरकार से कहा है कि वह किसानों को दिल्ली की तरफ जाने दें। लोकतंत्र में किसानों को हरियाणा में घुसने या घेराव करने से नहीं रोका जा सकता हाईकोर्ट ने कहा कि शंभू बॉर्डर पर स्थिति शांतिपूर्ण है। किसानों की मांग केंद्र सरकार से है इसलिए उन्हें दिल्ली की तरफ जाने की छूट दे देनी चाहिए। सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने कहा कि अगर वे शंभू बॉर्डर से बैरिकेड हटा देते हैं तो किसान अंबाला में घुस जाएंगे और एसपी ऑफिस का घेराव करेंगे क्योंकि उन्होंने ऐसी घोषणा कर रखी है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि वर्दी वालों को घबराना नहीं चाहिए। लोकतंत्र में किसानों को हरियाणा में घुसने या घेराव करने से नहीं रोका जा सकता। किसान नेताओं ने कियाफैसले का स्वागत वहीं हाई कोर्ट के इस फैसले का किसानों ने स्वागत किया है। किसान नेता मनजीत राय ने कहा कि हमें अभी आदेश की कॉपी नहीं मिली, लेकिन इस फैसले का स्वागत करते हैं। हम बार-बार पूछ रहे हैं कि किस संविधान और कानून के तहत सड़क पर दीवारें बनाई गईं। सरकार ने लोकतंत्र को दरकिनार कर यह सड़कें बंद की थी। यह आम जनता, किसानों और व्यापारियों की राजधानी जाने की भावनाओं की जीत है। उन्होंने कहा कि हम यहां नहीं बैठना चाहते, हम दिल्ली जाना चाहते हैं। हम इस बारे में मीटिंग कर अगली रणनीति तय करेंगे। भुखमरी के कगार पर आ गए दुकानदार, व्यापारी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट वासु रंजन शांडिल्य ने हाईकोर्ट में शंभू बॉर्डर खुलवाने को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। शांडिल्य ने जनहित याचिका में बताया कि 5 महीने से नेशनल हाईवे 44 बंद पड़ा है। अंबाला के दुकानदार, व्यापारी, रेहड़ी फड़ी वाले भुखमरी के कगार पर आ गए हैं। शंभू बॉर्डर बंद होने के कारण सरकारी बसों को रूट डायवर्ट किया हुआ है, जिससे तेल का खर्च बढ़ रहा है। अंबाला व शंभू के आसपास के मरीज बॉर्डर बंद होने के कारण दिक्कत में है। एंबुलेंस के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अंबाला व पटियाला जिला का छोटा बड़ा काम बंद हो चुका है। यह हाईवे पंजाब हिमाचल, जम्मू कश्मीर को जोड़ता है। इसके बंद होने से न सरकारों को भी नुकसान हो रहा है। याचिका में पंजाब व हरियाणा सरकार सहित किसान नेता स्वर्ण सिंह पंढेर व जगजीत सिंह डल्लेवाल को भी पार्टी बनाया था। 

हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को बताया जवाबदेह, छत्तीसगढ़-बिलासपुर में हाइटेन्शन तारों से आ रहा करेंट

बिलासपुर. बिलासपुर के रतनपुर क्षेत्र के गांवों के खेतों में करंट आने के मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि किसी भी कंपनी को सिर्फ लाइसेंस देकर आप जवाबदेही से बच नहीं सकते। कोर्ट ने शासन को शपथपत्र में जवाब देने के निर्देश देते हुए बुधवार 10 जुलाई को अगली सुनवाई निर्धारित की है। हाईटेंशन बिजली तार के कारण कई गांवों में ग्रामीणों और मवेशियों की जान को खतरा है। भयभीत ग्रामीणों ने हजारों एकड़ में इसके चलते खेती बंद कर दी है। प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के तौर पर इसकी सुनवाई शुरू की है। सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश ने हाईटेंशन तार बिछाने वाली सरकारी कंपनी पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन, यहां इस काम को पूरा करने वाली जबलपुर ट्रांसपोर्टेशन कंपनी से इन जगहों पर इंजीनियरों को भेजकर पूरी जांच कराने का निर्देश दिया था। इसकी रिपोर्ट व्यक्तिगत शपथपत्र पर कोर्ट में प्रस्तुत करने का भी आदेश कोर्ट ने दिया था। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रविन्द्र अग्रवाल की डीबी में केंद्र शासन की ओर से कहा गया कि, हमने पावर ग्रिड को सिर्फ लाइसेंस दिया है। उन्होंने अगर कहा होता तो हम इस जगह पर पहले सर्वे कराकर जांच रिपोर्ट जारी करते। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि, आप सिर्फ लाइसेंस देकर जवाबदेही से बच नहीं हो सकते। साथ ही कहा कि जानकारी दें कि हाईटेंशन विद्युत लाइन होने के चलते रतनपुर क्षेत्र के लगभग आठ गांवों के खेतों में हाईटेंशन तार के नीचे और टॉवरों के आसपास करंट के झटके महसूस किए जा रहे हैं। बचने के लिए लोग रबड़ के बूट, जूते पहन रहे हैं, इसके बावजूद हर रोज ग्रामीणों को करंट लग रहा है। मवेशियों और बच्चों को इससे ज्यादा खतरा है। इस समस्या से कछार, लोफंदी, भरारी, अमतरा, मोहतराई, लछनपुर, नवगंवा, मदनपुर अधिक प्रभावित हैं। इन गांवों में 20 से अधिक टावर होने की वजह से जमीन में करंट दौड़ रहा है। यहां के किसानों का मुख्य व्यवसाय सब्जी की खेती है। हाईटेंशन लाइन के कारण बार-बार करंट लगता है। यही वजह है कि अधिकांश किसानों ने टॉवर वाली जमीन पर खेती करना छोड़ दिया है।

हाईकोर्ट ने DDA के अतिक्रमण हटाओ अभियान का किया सपोर्ट, कहा दिल्ली अपनी जड़ों को खो रही

नई दिल्ली  दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण करने वालों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने शुक्रवार को कहा कि दिल्ली अपनी जड़ों को खो रही। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में आने वाली बाढ़ मानव निर्मित है, क्योंकि यमुना के मैदानी इलाकों पर बड़ी संख्या में लोग अवैध निर्माण कर रहे हैं। इस वजह से पानी के निकलने का रास्ता बंद हो गया है और शहर में बाढ़ आ रही है। हाईकोर्ट मयूर विहार में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से अतिक्रमण हटाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि कृपया मगरमच्छ के आंसू न बहाएं। दिल्ली में बाढ़ को लेकर हाईकोर्ट सख्त अदालत ने कहा कि DDA ने दशकों पहले यमुना नदी के रास्ते को साफ करने और अतिक्रमण करने वालों को हटाने की मुहिम तेज की थी। हालांकि, अतिक्रमणकारी वहां से हटने को तैयार नहीं हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेड़ेला की पीठ ने कहा कि यह शहर अपनी जड़ों को ही खो रहा है। यह कैसे हो सकता है कि कोई विवेकशील व्यक्ति यमुना के मैदानों पर भी कब्जा कर ले। आखिर पानी कहां जाएगा? उसे तो जगह चाहिए। आज इस शहर के सभी नाले, जिनसे होकर पानी बहता है, अवैध निर्माण के कारण बंद हैं। इससे कानून का पालन करने वाला एक आम नागरिक ही परेशान हो रहा है। अतिक्रमण की वजह से डूब रहे घर- कोर्ट अदालत ने यमुना खादर स्लम यूनियन के वकील से कहा, ‘अतिक्रमण की वजह से उन लोगों के घर डूब रहे, जिन्होंने अधिकृत क्षेत्रों में निर्माण किया है। जिन्हें घर बनाने को लेकर सभी तरह की अनुमति मिली हैं। उनके घर डूब रहे हैं। ऐसा उन लोगों की वजह से हो रहा जिन्होंने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और यमुना के पानी बहाव वाले एरिया पर कब्जा कर अवैध निर्माण किया है। मगरमच्छ के आंसू न बहाएं, कोर्ट की दो टूक यमुना खादर स्लम यूनियन के वकील ने दावा किया कि वे वैकल्पिक आवास की मांग कर रहे हैं। वो यमुना खादर पर रहने की अनुमति नहीं मांग रहे। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि उन्होंने पहले ही बेदखली के खिलाफ अंतरिम रोक हासिल कर ली है। पीठ ने कहा, ‘कृपया मगरमच्छ के आंसू न बहाएं। यह भूमि अधिग्रहण यमुना नदी के चैनलाइजेशन के लिए था। अब कानून का पालन करने वाले नागरिक पीड़ित हैं क्योंकि उनके घरों में बाढ़ आ गई है। आप एक कब्जाधारक हैं। अदालत पहले ही एक फैसला सुना चुकी है। कब्जाधारक अदालत में आ रहे हैं और छह साल के लिए रोक आदेश प्राप्त कर रहे हैं।’ अदालत ने इस दौरान एकल पीठ के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया जिसने DDA अभियान के लिए रास्ता साफ कर दिया था। पीठ ने DDA की ओर से किए गए उस सैटेलाइट इमेजरी का जिक्र किया जिसमें अतिक्रमण दिखाया गया था। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वैकल्पिक भूमि पर पुनर्वास के तर्कों का जवाब देते हुए कहा कि यह दावा कि आपके मुवक्किल 1970 के दशक से वहां रह रहे हैं, बकवास है। यह सब कल्पना की उपज है, सब झूठ का पुलिंदा है। जब DUSIB पुनर्वास के लिए कॉलोनियों को मान्यता दे रहा है, तो वह आपकी कॉलोनी को क्यों छोड़ेगा? कोर्ट ने आदेश में क्या कहा याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और कहा था कि वे बेघर हैं और खादर क्षेत्र में रैन बसेरों और झुग्गियों में रह रहे। DDA ने कहा कि वे यमुना में बाढ़ के मैदान पर अवैध रूप से रह रहे हैं। सिंगल जज ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर किए गए दस्तावेजों में 2006 की कटऑफ डेट्स से पहले स्लम और जेजे क्लस्टर्स के निरंतर अस्तित्व का पता नहीं चलता है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर किए गए कुछ दस्तावेजों में स्लम और जेजे क्लस्टर्स का अस्तित्व नहीं दिखाया गया है जो उन्हें पुनर्वास के हकदार बनाते हैं। इसमें कहा गया है कि केवल वे ग्रुप जिन्हें दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की ओर से पहचाना गया है, वे ही पुनर्वास के हकदार हैं।  

14 जुलाई को सिर्फ चार घंटे के लिए धरना-प्रदर्शन किया जा सकता, नेता प्रतिपक्ष अधिकारी को मिली अनुमति: हाईकोर्ट

कोलकाता कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुवेंदु अधिकारी को चुनाव के बाद हुई हिंसा के खिलाफ राजभवन के सामने प्रदर्शन करने की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की एकल पीठ ने अनुमति देते हुए कहा कि 14 जुलाई को सिर्फ चार घंटे के लिए धरना-प्रदर्शन किया जा सकता है। आदेश के अनुसार, प्रदर्शन में बिना किसी हथियार के अधिकतम 300 लोग शामिल हो सकतेे हैं। प्रदर्शन सुबह 10 से दोपहर 2 बजे तक होगा। कार्यक्रम स्थल से कोई भड़काऊ बयान नहीं दिया जाएगा। इस दौरान इस बात का ध्यान रखना होगा कि प्रदूषण न फैले। बुधवार को राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि प्रशासन को प्रदर्शन पर कोई आपत्ति नहीं है।

बीवी से मार खाने वाला खुशनसीब, देवी होती है पत्नी, मार खाओ : जज रोहित आर्या

One who gets beaten by his wife is lucky, wife is a goddess, get beaten: Judge Rohit Arya भारत में न्यायपालिका हो काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. कोर्ट में भारत के हर नागरिक के साथ हुए अन्याय के लिए इंसाफ दिया जाता है. हालाँकि. भारत की न्यायपालिका अपनी लेट-लतीफी की वजह से बदनाम भी है. ऐसे कई मामले हैं, जो कई सालों से कोर्ट में अटकी पड़ी है. तारीख पर तारीख का कांसेप्ट इसी कोर्ट रुम से आया है. फैसलों में देरी की वजह से अपराधी अपराध करने से हिचकते नहीं है. कोर्ट में जज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. किसी मामले पर वकीलों के दलील को सुनने के बाद जज साहब अपना फैसला सुनाते हैं. जज की जिम्मेदारी है कि वो मामले पर न्याय कर सके. भारत के संविधान में भी कहा गया है कि भले ही सौ बेगुनाह छूट जाए लेकिन एक मासूम को सजा नहीं मिलनी चाहिए. जज को काफी होशियारी और जिम्मेदारी से फैसले लेने होते हैं. इस बीच सोशल मीडिया पर बीते कुछ समय से मध्यप्रदेश के जज श्री रोहित आर्या के वीडियोज शेयर किये जा रहे थे. अब श्री रोहित आर्या रिटायर हो चुके हैं. पति को कही थी ऐसी बातरिटायरमेंट के दौरान श्री रोहित आर्या को काफी भावुक विदाई दी गई. जज साहब अपने बयानों के लिए जाने जाते हैं. सोशल मीडिया पर उनके एक हियरिंग का वीडियो शेयर किया गया, जो वायरल हो रहा है. इस मामले में एक पति ने अपनी पत्नी की पिटाई से तंग आकर न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया था. इस मामले पर जज साहब ने कहा कि बीवी से मार खाने वाला पति धन्य हो जाता है. देवी होती है बीवीक्लिप में जज साहब को और भी काफी कुछ कहते हुए देखा गया. उन्होंने आगे कहा कि पत्नी देवी होती है. उससे मार खाना गलत कहां है? हालांकि, लोगों को जज साहब का ये चुटीला अंदाज कुछ ख़ास पसंद नहीं आया. कई लोगों ने कमेंट में लिखा कि अगर यही एक पति ने किया तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है. कई लोगों ने इसे भारतीय न्याय व्यवस्था का पतन बताया. आपको बता दें कि श्री रोहित आर्या अपने इस तरह के फैसलों के लिए सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. अब उनके रिटायरमेंट के बाद कई लोगों ने इन वीडियोज को फिर से शेयर करना शुरू किया है.

‘संसदीय विशेषाधिकार नहीं है रिश्वतखोरी’, ‘वोट के बदले नोट’ फैसले में CJI ने की अहम टिप्पणियां

‘Bribery is not a parliamentary privilege’, CJI made important comments in the ‘note for vote’ decision वोट के बदले नोट लेने के मामले में अभियोजन (मुकदमे) से छूट देने का फैसला सुनाया था। चीफ जस्टिस ने कहा कि ‘माननीयों को मिली छूट यह साबित करने में विफल रही है कि माननीयों को अपने विधायी कार्यों में इस छूट की अनिवार्यता है।’ सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में रिश्वत लेकर वोट देने वाले माननीयों को अभियोजन से राहत देने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में पीवी नरसिम्हा राव के मामले में दिए अपने पिछले फैसले को पलट दिया। सात जजों की संविधान पीठ ने कहा कि संसदीय विशेषाधिकार के तहत रिश्वतखोरी की छूट नहीं दी जा सकती। जानिए क्या बोले सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘पीठ के सभी जज इस मुद्दे पर एकमत हैं कि पीवी नरसिम्हा राव मामले मे दिए फैसले से हम असहमत हैं।’ नरसिम्हा राव मामले में अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों-विधायकों को वोट के बदले नोट लेने के मामले में अभियोजन (मुकदमे) से छूट देने का फैसला सुनाया था। चीफ जस्टिस ने कहा कि ‘माननीयों को मिली छूट यह साबित करने में विफल रही है कि माननीयों को अपने विधायी कार्यों में इस छूट की अनिवार्यता है।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 में रिश्वत से छूट का प्रावधान नहीं है क्योंकि रिश्वतखोरी आपराधिक कृत्य है और ये सदन में भाषण देने या वोट देने के लिए जरूरी नहीं है। पीवी नरसिम्हा राव मामले में दिए फैसले की जो व्याख्या की गई है, वो संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के विपरीत है।’ ‘माननीयों के भ्रष्टाचार से तबाह हो जाएगा संसदीय लोकतंत्र’मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम मानते हैं कि रिश्वतखोरी, संसदीय विशेषाधिकार नहीं है। माननीयों द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारत के संसदीय लोकतंत्र को तबाह कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि जो विधायक राज्यसभा चुनाव के लिए रिश्वत ले रहे हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार रोधी कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि आज सात जजों की पीठ ने कहा है कि अगर सांसद पैसे लेकर सदन में सवाल पूछते हैं या वोट करते हैं, तो वे विशेषाधिकार का तर्क देकर अभियोजन से छूट का दावा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैसे लेकर वोट देने या सवाल पूछने से भारत का संसदीय लोकतंत्र तबाह हो जाएगा।

वकील ने भरी अदालत में जज पर फेंका जूता, वकालत नामा फाड़ने का प्रयास

Lawyer throws shoe at judge in full court, attempts to tear law deed बाद में जज ने स्थानीय पुलिस को घटना की जानकारी दी और नितिन अटल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। आगर मालवा ! मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिला न्यायालय के जज पर जूता फेंकने का मामला सामने आया है। पूरे मामले में विभिन्न धाराओं के तहत पुलिस ने आरोपी वकील खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।जानकारी अनुसार एक मामले की सुनवाई के दौरान वकील नितिन अटल और जज प्रदीप दुबे में बहस हो गई और बहस इतनी बिगड़ गई की वकील ने अपना जूता उतार कर जज की तरफ उछाल दिया। जज की शिकायत पर आरोपी वकील नितिन अटल के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हो गया है। एसडीओपी मोतीलाल कुशवाह के अनुसार, आगर मालवा जिला न्यायालय में पदस्थ प्रथम जिला एवं अतिरिक्त न्यायाधीश प्रदीप दुबे ने पुलिस को शिकायत दी और बताया कि न्यायालय में केस की सुनवाई में बहस के दौरान आगर मालवा के वकील नितिन अटल ने उनके हाथ से वकालतनामा छीनने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, विवाद बढ़ने पर वकील नितिन अटल ने उनके ऊपर जूता भी उछाल दिया। साथ ही जज ने बताया कि कोई कुछ समझता उसके पहले ही वकील वहां भाग गया।जज प्रदीप दुबे की शिकायत पर पुलिस ने वकील अटल पर शासकीय कार्य में बाधा और अभद्र व्यवहार समेत आईपीसी की तमाम धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है। पूरे घटनाक्रम का नितिन अटल ने भी एक वीडियो जारी किया है, जिसमें बताया की आगर मे पदस्थ न्यायाधीश प्रदीप दुबे के खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय मे शिकायते की हुई है। जिसी के चलते वे शिकायते वापस लेने का उनपर दबाव भी बनाया जा रहा है। यह पूरा घटनाक्रम भी एक सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है।

पांच हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश

Recommendation for appointment of Chief Justices in five High Courts, Collegium suggested names of these judges. राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति शील नागू, गौहाटी हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और झारखंड हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति बीआर सारंगी के नाम की सिफारिश की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने राजस्थान हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट समेत पांच उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए पांच न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी है। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति शील नागू, गौहाटी हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और झारखंड हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति बीआर सारंगी के नामों की अनुशंसा की गई है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में जस्टिस संजीव खन्ना और बीआर गवई सदस्य हैं। जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हो गया था। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव को राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की है। एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मनींद्र मोहन श्रीवास्तव के नाम पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (जो उनका मूल उच्च न्यायालय है) का देश के उच्च न्यायालयों में कोई मुख्य न्यायाधीश नहीं है। 27 दिसंबर को जारी प्रस्ताव में न्यायमूर्ति नागू के संबंध में कॉलेजियम ने कहा कि वह एक योग्य न्यायाधीश हैं और उनमें उच्च न्यायिक पद पर आसीन होने के लिए जरूरी उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा और आचरण है। न्यायमूर्ति नागू के नाम की अनुशंसा करते समय कॉलेजियम इस तथ्य पर विचार किया कि न्यायमूर्ति शील नागू पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए सभी मानकों पर फिट और उपयुक्त हैं। न्यायमूर्ति बिश्नोई की अनुशंसा के संबंध में कॉलेजियम ने कहा कि उन्होंने बार और बेंच में पेशेवर नैतिकता का उच्च स्तर बनाए रखा है और उनका आचरण और सत्यनिष्ठा पर कोई दाग नहीं है। कॉलेजियम ने कहा कि न्यायमूर्ति भंसाली ने राजस्थान हाईकोर्ट में न्याय देने का व्यापक अनुभव हासिल किया है।

slot server thailand super gacor

spaceman slot gacor

slot gacor 777

slot gacor

Nexus Slot Engine

bonus new member

olympus

situs slot bet 200

slot gacor

slot qris

link alternatif ceriabet

slot kamboja

slot 10 ribu

https://mediatamanews.com/

slot88 resmi

slot777

https://sandcastlefunco.com/

slot bet 100

situs judi bola

slot depo 10k

slot88

slot 777

spaceman slot pragmatic

slot bonus

slot gacor deposit pulsa

rtp slot pragmatic tertinggi hari ini

slot mahjong gacor

slot deposit 5000 tanpa potongan

mahjong

spaceman slot

https://www.deschutesjunctionpizzagrill.com/

spbo terlengkap

cmd368

368bet

roulette

ibcbet

clickbet88

clickbet88

clickbet88

bonus new member 100

slot777

https://bit.ly/m/clickbet88

https://vir.jp/clickbet88_login

https://heylink.me/daftar_clickbet88

https://lynk.id/clickbet88_slot

clickbet88

clickbet88

https://www.burgermoods.com/online-ordering/

https://www.wastenotrecycledart.com/cubes/

https://dryogipatelpi.com/contact-us/

spaceman slot gacor

ceriabet link alternatif

ceriabet rtp

ceriabet

ceriabet link alternatif

ceriabet link alternatif

ceriabet login

ceriabet login

cmd368

sicbo online live

Ceriabet Login