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भाजपा से जुड़े विज्ञापन केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, जानें पूरा मामला

Hearing in Supreme Court today in advertisement case related to BJP, know the whole matter आज भाजपा की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ सुनवाई करेगी। दरअसल, आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन में तृणमूल कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं के खिलाफ विज्ञापन जारी करने से रोकने के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली भाजपा की याचिका पर शीर्ष अदालत सुनवाई करेगी। हाईकोर्ट ने 20 मई को एक आदेश जारी कर भाजपा को चार जून तक आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को प्रकाशित करने से रोक दिया। लोकसभा चुनाव प्रक्रिया चार जून को समाप्त होगी। हाईकोर्ट ने किया था हस्तक्षेप करने से इनकारभारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एकल पीठ के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट से झटका लगा था। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें भाजपा को लोकसभा चुनाव प्रक्रिया के दौरान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाला कोई भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले में पीठ ने पूछा था कि आप इसे अगली अवकाश पीठ का रुख क्यों नहीं करते हैं। भाजपा की ओर से पेश वकील सौरभ मिश्रा ने बताया था कि हाईकोर्ट ने भाजपा को लोकसभा चुनाव के दौरान चार जून तक विज्ञापन जारी करने से रोक दिया है। वकील ने कहा था कि आप कृपया 27 मई को मामले की सुनवाई करें। इस पर पीठ ने कहा था कि हम देखते हैं। सुनवाई का मौका नहीं देने का लगाया आरोपभाजपा ने यह दावा करते हुए अपील दायर की थी कि एकल पीठ ने उसे कोई सुनवाई का मौका दिए बगैर ही यह आदेश जारी कर दिया। भगवा पार्टी के वकील ने यह भी कहा था कि संविधान में प्रावधान है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए निर्वाचन आयोग उपयुक्त प्राधिकार है। चार जून तक विज्ञापनों को प्रकाशित करने से रोकाहाईकोर्ट ने 20 मई को एक आदेश जारी कर भाजपा को चार जून तक आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को प्रकाशित करने से रोक दिया। लोकसभा चुनाव प्रक्रिया चार जून को समाप्त होगी। अदालत ने आदेश में भाजपा को उन विज्ञापनों को प्रकाशित करने से भी रोक दिया था, जिनका उल्लेख तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अपनी याचिका में किया था। टीएमसी ने विज्ञापन में पार्टी और कार्यकर्ताओं के खिलाफ असत्यापित आरोप लगाए जाने का दावा किया था। अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता टीएमसी द्वारा संलग्न समाचार पत्रों के विज्ञापनों को देखने से पता चलता है कि ये एमसीसी का उल्लंघन हैं। अदालत ने शिकायतों का तुरंत समाधान नहीं करने के लिए निर्वाचन आयोग के प्रति भी अप्रसन्नता जताई थी। टीएमसी की ओर से पेश वकील ने दलील दी थी कि भाजपा कुछ समाचार पत्रों में पार्टी को निशाना बनाकर विज्ञापन प्रकाशित करवा रही है जिसमें एमसीसी और निर्वाचन आयोग द्वारा जारी दिशानिर्देश का उल्लंघन हुआ है।

केजरीवाल के बयान के खिलाफ SC पहुंची ED को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात

SC shocked ED against Kejriwal’s statement, Supreme Court said this दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के एक बयान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची जांच एजेंसी ईडी को झटका लगा है। शीर्ष न्यायालय ने केजरीवाल के बयान के खिलाफ ईडी की आपत्ति पर विचार करने के इनकार कर दिया है। केजरीवाल ने कहा कि अगर लोग मेरी पार्टी को वोट देंगे तो वो फिर जेल नहीं जाएंगे। नई दिल्ली। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के एक बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची ईडी को झटका लगा है। दरअसल, ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने केजरीवाल के एक बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत दर्ज की थी, जिस पर सुनवाई से कोर्ट ने इनकार कर दिया। कोर्ट का आपत्ति पर विचार करने से इनकारSC (सुप्रीम कोर्ट) ने अरविंद केजरीवाल के उस बयान पर की आपत्ति पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर लोग AAP को वोट देंगे, तो वह 2 जून को वापस जेल नहीं जाएंगे। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक को अंतरिम जमानत से संबंधित बयानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केजरीवाल के वकील के दावों और जवाबों पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा, ”हमने किसी के लिए कोई अपवाद नहीं बनाया है, हमने अपने आदेश में वही कहा जो हमें उचित लगा।” पीठ ने कहा कि फैसले का आलोचनात्मक विश्लेषण का ”स्वागत” है। नेताओं की बैठक में दिया था ये बयानकेजरीवाल ने जेल से बाहर आने के बाद अपनी पार्टी नेताओं के साथ बैठक में कहा था कि उन्हें 2 जून को वापस जेल जाना होगा। सीएम ने आगे कहा कि अगर उनके पार्टी के नेता महनत करके 4 जून को इंडी गठबंधन की सरकार बनवा देते हैं तो उन्हें जेल नहीं जाना पड़ेगा। भाजपा पर लगाए सरकार तोड़ने की कोशिश के आरोपकेजरीवाल ने इसी के साथ ये आरोप लगाया कि भाजपा ने उन्हें जानकर जेल भेजा ताकि वो AAP को तोड़ सके और पार्टी के पार्षद को भी अपने साथ ले सकें। दिल्ली सीएम ने कहा कि भाजपा की कोशिश नाकाम हो गई है और हमारी पार्टी और भी संगठित हो गई है। केजरीवाल के बयान पर SC ने कही ये बातईडी की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चुनावी रैलियों में केजरीवाल के भाषणों पर आपत्ति जताई कि अगर लोगों ने आप को वोट दिया, तो उन्हें 2 जून को वापस जेल नहीं जाना पड़ेगा। पीठ ने मेहता से कहा, ”यह उनकी धारणा है, हम कुछ नहीं कह सकते।” शीर्ष अदालत ने 10 मई को कथित दिल्ली शराब घोटाले से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केजरीवाल को अंतरिम जमानत दे दी थी। कोर्ट ने उन्हें 2 जून को सरेंडर करने को कहा है।

‘अदालतें लोकतांत्रिक चर्चा वाली जगहें’, ब्राजील में जे20 सम्मेलन में बोले भारत के CJI चंद्रचूड़

‘Courts are places of democratic discussion’, India’s CJI Chandrachud said at the J20 conference in Brazil. चंद्रचूड़ ने कहा कि हम अपने निर्णय के लिए एसयूवीएएस (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) का उपयोग करते हैं। यह एक मशीन लर्निंग, एआई सक्षम अनुवाद टूल है, तो 16 क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करता है। ब्राजील में जे20 शिखर सम्मेलन में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हुए। उन्होंने इस सम्मेलन को संबोधित भी किया। इस दौरान सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारी अदालतों को आम लोगों पर थोपने के लिए नहीं बनाया गया बल्कि इन्हें लोकतांत्रिक स्थानों के रूप में स्थापित किया गया है। उन्होंने बताया कि कोविड-19 में अदालत प्रणालियों को आगे बढ़ाया है, जिसे रातोरात बदलने के लिए हमें मजबूर होना पड़ा। जे20 शिखर सम्मेलन वह मंच है, जो जी20 सदस्य देशों की सर्वोच्च और संवैधानिक अदालतों के प्रमुखों को अफ्रीकी संघ और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों के साथ लाता है।इस कार्यक्रम में सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और बेहतर न्यायिक क्षमता जैसी महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा का अवसर मिलता है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने किया जे20 सम्मेलन को संबोधितजे20 शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए चंद्रचूड़ ने कहा, “हमारा मानना है कि धूप सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। सही और सुलभ जानकारी दुष्प्रचार का प्रतिकारक है।” उन्होंने आगे कहा, “भारत में जजों के लिए बार से जुड़ना और जवाब पाने के लिए क्रूर वकील की भूमिका निभाना आम बात है। कभी-कभी इसमें गलती हो जाती है। अच्छी बात ये है कि हमारे पास कानूनी पत्रकारों का एक मजबूत नेटवर्क है, जो कार्यवाही की लाइव रिपोर्टिंग करते हैं। इससे दुष्प्रचार को दूर करने में काफी मदद मिलता है।” उन्होंने आगे कहा, “हम अपने निर्णय के लिए एसयूवीएएस (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) का उपयोग करते हैं। यह एक मशीन लर्निंग, एआई सक्षम अनुवाद टूल है, तो 16 क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करता है। अबतक 36,000 से अधिक मामलों का अनुवाद किया गया है। महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों का लाइव स्ट्रीमिंग और यूट्यूब रिकॉर्डिंग भी है।” टेकनोलॉजी सभी सामाजिक असमानताओं के लिए रामबाण इलाज नहीं: सीजेआईचंद्रचूड़ ने बताया कि डिजिटल एससीआर के जरिए सीजेआई ने कहा कि आम लोगों को डिजिटल एससीआर (सुप्रीम कोर्ट रिकॉर्ड्स) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों तक आसान पहुंच प्रदान की जाती है। जहां 30,000 से अधिक पुराने निर्णय मुफ्त में उपलब्ध हैं। सीजेआई ने कहा, “जब हम न्यायिक दक्षता के बारे में बात करते हैं तो हमें न्यायाधीश की दक्षता से परे देखना चाहिए और संपूर्ण रूप से न्यायिक प्रक्रिया के बारे में सोचना चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि टेकनोलॉजी सभी सामाजिक असमानताओं के लिए केवल एक ही रामबाण इलाज नहीं है। एआई प्रोफाइलिंग, गलत सूचना और संवेदनशील जानकारी का प्रदर्शन और एआई में ब्लैक बॉक्स मॉडल की अस्पष्टता जैसे जटिल मुद्दों के खतरों के बारे में विचार विमर्श के साथ इससे निपटना चाहिए।

वकीलों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, अब उपभोक्ता अदालत नहीं जा पाएंगे क्लाइंट

Big relief to lawyers from Supreme Court, now clients will not be able to go to consumer court सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को बड़ी राहत देते हुए उपभोक्ता आयोग का एक 2007 का फैसला रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वकीलों की सेवा उपभोक्ता कानून के दायरे में नहीं आती। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि वकीलों की ‘खराब सेवा’ के लिए उपभोक्ता अदालत में केस नहीं चलाया जा सकता है। वकील उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में नहीं आते हैं। जस्टिस बेला एम त्रवेदी और जस्टिस पंकज मित्तल की बेंच ने कहा कि फीस देकर कोई भी काम करवाने को कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट की ‘सेवा’ के दायरे में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि वकील जो भी सेवा देते हैं वह अपने आप में अलग तरह की है। ऐसे में इस कानून से उन्हें बाहर रखा जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि लीगल प्रोफेशन की तुलना बाकी किसी काम के साथ नहीं की जा सकती। किसी वकील और क्लाइंट के बीच सामंजस्य एक तरह की निजी अनुबंधित सेवा होती है। ऐसे में अगर कोई कमी होती है तो वकील को उपभोक्ता अदालत में नहीं खींचा जा सकता है। हालांकि अगर वकील गड़बड़ करते हैं तो उनके खिलाफ समान्य अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकता है उपभोक्ता आयोग का फैसला रद्द सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के कंज्यूमर कमीशन का फैसला रद्द कर दिया। इस फैसले में कहा गया था कि उपभोक्ता के अधिकारों का ध्यान रखते हुए अगर वकील ठीक से सेवा नहीं देते तो उन्हें उपभोक्ता अदालत में लाया जा सकता है। इस फैसले में कहा गया था कि वकीलों की सेवा भी सेक्शन 2 (1) O के तहत आती है ऐसे में उपभोक्ता अदालत में उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि अप्रैल 2009 में ही सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोग के इस फैसले पर रोक लगा दी थी। बता दें कि इस समय बार काउंसिल ऑफ इंडिया के डेटा के मुताबिक देश में करीब 13 लाख वकील हैं। वकीलों कीई संस्थाओं ने कमीशन के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी। वकीलों का कहना है कि उन्हें अपना काम करने के लिए सुरक्षा और स्वतंत्रता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ऐडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड्स असोसिएशन (SCAORA) का कहना था कि कानूनी सेवा किसी वकील के नियंत्रण में नहीं होती है। वकीलों को एक निर्धारित फ्रेमवर्क में काम करना होता है। फैसला भी वकीलों के अधीन नहीं होता है। ऐसे में किसी केस के रिजल्ट के लिए वकीलों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की वीवीपैट और बैलेट पेपर से जुड़ीं याचिकाएं

Supreme Court rejected petitions related to VVPAT and ballot paper यमूर्ति संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने मामले में दो फैसले सुनाए। फैसला सुनाते हुए जस्टिस खन्ना ने कहा कि कोर्ट ने वीवीपैट से जुड़ीं सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की मांग वाली याचिकाएं भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के वोटों की वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) पर्चियों से 100 फीसदी सत्यापन की मांग वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने बैलेट पेपर से मतदान कराने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने दिए दो बड़े निर्देशसुप्रीम कोर्ट ने दो निर्देश दिए हैं- पहला यह है कि सिंबल लोडिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद सिंबल लोडिंग यूनिट (एसएलयू) को सील कर दिया जाना चाहिए और उन्हें कम से कम 45 दिनों के लिए सहेज कर रखा जाना चाहिए। इसके अलावा दूसरा निर्देश यह है कि उम्मीदवारों के पास परिणामों के एलान के बाद इंजीनियरों की एक टीम की ओर से जांचे जाने वाले ईवीएम के माइक्रोकंट्रोलर प्रोग्राम को पाने का विकल्प होगा। इसके लिए उम्मीदवार को नतीजों के एलान के सात दिनों के अंदर आवेदन करना होगा। इसका खर्च भी उम्मीदवार को खुद को उठाना होगा। इससे पहले दो दिन की लगातार सुनवाई के बाद पीठ ने 18 अप्रैल को याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। हालांकि, बुधवार को शीर्ष कोर्ट ने इस मामले को फिर से सूचीबद्ध किया था। तब शीर्ष कोर्ट ने अदालत से चुनाव आयोग से कुछ बातों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। जिसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। फैसला सुरक्षित रखते हुए शीर्ष कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह चुनाव को नियंत्रित नहीं कर सकता, न ही एक सांविधानिक निकाय के लिए नियंत्रक अथॉरिटी के रूप में कार्य कर सकता है। गलत काम करने वाले के खिलाफ कानून के तहत नतीजे भुगतने के प्रावधान हैं।

आखिर अनुच्छेद 370 क्या था, सरकार ने इसे क्यों हटाया, फैसले के बाद घाटी में क्या बदला?

What is Article 370, Why Government remove article 370, after removal what are the changes in Ghati. धारा 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद था, जो जम्मू-कश्मीर को भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार प्रदान करता था। Article 370 was a special provision in the Indian Constitution that granted specific privileges to the region of Jammu and Kashmir, distinguishing it from other states in India. इसे भारतीय संविधान में अस्थायी और विशेष उपबन्ध के रूप में भाग 21 में शामिल किया गया था। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने के केंद्र सरकार के निर्णय पर आज सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने कहा है कि 5 अगस्त 2019 का निर्णय वैध था और यह जम्मू कश्मीर के एकीकरण के लिए था। बता दें कि 2019 में जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद-370 खत्म कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण चार साल बाद यह अनुच्छेद फिर चर्चा फिर में आ गया है। इससे पहले कोर्ट में अनुच्छेद-370 हटाने को चुनौती दी गई थी। इससे जुड़ी 20 से ज्यादा याचिकाएं कोर्ट में थीं जिसको लेकर सोमवार को फैसला आया है। आइये जानते हैं कि अनुच्छेद 370 क्या है? सरकार ने इसे क्यों हटाया? अनुच्छेद-370 के बारे में5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद-370 खत्म कर दिया था। यह कानून जम्मू-कश्मीर में करीब सात दशक से चला आ रहा था। दरअसल, अक्तूबर 1947 में कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ एक विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें कहा गया कि तीन विषयों के आधार पर यानी विदेश मामले, रक्षा और संचार पर जम्मू और कश्मीर भारत सरकार को अपनी शक्ति हस्तांतरित करेगा। इतिहासकार प्रो. संध्या कहती हैं, ‘मार्च 1948 में, महाराजा ने शेख अब्दुल्ला के साथ प्रधानमंत्री के रूप में राज्य में एक अंतरिम सरकार नियुक्त की। जुलाई 1949 में, शेख अब्दुल्ला और तीन अन्य सहयोगी भारतीय संविधान सभा में शामिल हुए और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति पर बातचीत की, जिससे अनुच्छेद-370 को अपनाया गया।’ अनुच्छेद-370 के प्रावधान क्या थे? जम्मू-कश्मीर का संविधान 17 नवंबर 1956 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1957 को लागू हुआ था। 5 अगस्त 2019 को भारत के राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी करके जम्मू और कश्मीर के संविधान को निष्प्रभावी बना दिया था। इसे ‘संविधान (जम्मू और कश्मीर के लिए आवेदन) आदेश, 2019 (सीओ 272)’ नाम दिया गया था। अनुच्छेद-370 हटने के बाद क्या हालात हैं?2019 में जब अनुच्छेद-370 खत्म किया गया था, तब पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने कुछ हद तक स्थिति बिगाड़ने की कोशिश की थी। घुसपैठ के जरिए हिंसा कराने की खूब कोशिश हुई, लेकिन सुरक्षाबलों ने सभी को नाकाम कर दिया गया। केंद्र सरकार ने विशेष तौर पर जम्मू कश्मीर के विकास पर फोकस करना शुरू कर दिया। अब हर बजट में जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान किए जाते हैं, ताकि यहां के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अनुच्छेद-370 खत्म होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब जम्मू-कश्मीर संयुक्त राष्ट्र के दागी लिस्ट से बाहर हुआ। पिछले कुछ समय में राज्य में पर्यटन में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। जहां घाटी में दशकों बाद सिनेमा खुलने लगे हैं तो, वहीं पत्थरबाजी की घटनाएं और बंद के आव्हान लगभग शून्य हो चुके हैं। राज्य में निवेश की संभवनाएं लगातार बढ़ रही हैं और हर क्षेत्र में विकास के नए द्वार खुल रहे हैं।

चुनावी बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों को मिले चंदे के विवरण की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court of India; CJI; DY Chandrachurna; Sahara Samachaar;

Supreme Court will investigate the details of donations received by political parties through electoral bonds. नई दिल्ली: द वायर हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह चुनावी बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों को मिले चंदे के विवरण की जांच करेगा.2017 में एक वित्त विधेयक के माध्यम से पेश किए गए चुनावी बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों की गुमनाम फंडिंग की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने चुनाव आयोग से 12 अप्रैल 2019 के शीर्ष अदालत के अंतरिम आदेश के अनुसार, राजनीतिक दलों के चुनावी बॉन्ड फंडिंग का विवरण तैयार रखने के लिए कहा है.

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