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राज्यसभा में MP की 5 सीटों का नंबर गेमः कौन किस पर भारी

The number of seats for Members of Parliament (MP) in the Rajya Sabha is 5. मौजूदा 4 सीटों को बचाने भाजपा को चाहिए 152 विधायक; अप्रैल में खत्म होगा कार्यकाल मध्यप्रदेश में 3 दिसंबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे। इन नतीजों से दो सवालों का जवाब मिलेगा। मध्यप्रदेश में किस पार्टी की सरकार बनेगी?अप्रैल 2024 में खाली हो रही राज्यसभा की 5 सीटों में से कितनी-किस पार्टी के खाते में जाएंगी। एमपी के 11 में से 5 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 2 अप्रैल को खत्म हो रहा है। इनमें से 4 सीटें भाजपा जबकि 1 कांग्रेस के पास है। भाजपा को यदि यह आंकड़ा बरकरार रखना है तो विधानसभा में उसे 152 सीटें जीतना होंगी क्योंकि एक प्रत्याशी को जीतने के लिए न्यूनतम 38 विधायकों के वोट की जरूरत होगी। राज्यसभा सांसद का चुनाव तय फॉर्मूले के तहत होता है। इसके मुताबिक, जिस पार्टी के पास विधायकों की संख्या अधिक होती है, उस पार्टी के उम्मीदवार की जीत तय होती है। पहले जानिए, कैसे होता है राज्यसभा चुनाव राज्यसभा सांसदों के लिए चुनाव की प्रक्रिया अन्य चुनावों से काफी अलग है। राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं यानी जनता नहीं बल्कि विधायक इन्हें चुनते हैं। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कितने वोटों की जरूरत होती है, ये पहले से ही तय होता है। वोटों की संख्या का कैलकुलेशन कुल विधायकों की संख्या और राज्यसभा सीटों की संख्या के आधार पर होता है। इसमें एक विधायक की वोट की वैल्यू 100 होती है। व्हिप के उल्लंघन से खत्म हो सकती है सदस्यता राज्यसभा चुनाव में लोकसभा और विधानसभा की तरह गुप्त मतदान नहीं होता है। राज्यसभा सांसद के नाम के आगे एक से चार तक का नंबर लिखा होता है। विधायकों को वरीयता के आधार पर वोट देना होता है। राज्यसभा सदस्य के चुनाव के लिए राजनीतिक दल रिक्त सीटों पर प्रत्याशी घोषित करने के साथ अपने विधायकों के लिए व्हिप जारी करते हैं। यदि किसी विधायक ने व्हिप का उल्लंघन कर पार्टी प्रत्याशी को वोट नहीं दिया तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है। नियमानुसार पार्टी विधानसभा सचिवालय को ऐसे विधायक की लिखित शिकायत करती है तो जांच के बाद उसकी विधानसभा सदस्यता भी समाप्त हो सकती है। किस फॉर्मूले से तय होती है जीत? राज्यसभा चुनाव के लिए एक फॉर्मूले का उपयोग किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्य में जितनी राज्यसभा की सीटें हैं, उसमें एक जोड़ कर भाग दिया जाता है। इसके बाद कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। फिर अंत में जो संख्या निकलती है, वह जीत का आंकड़ा होता है। 2020 में भाजपा ने ऐसे पलट दिया था नंबर गेम 19 जून 2020 को राज्यसभा की 3 सीटों के लिए चुनाव हुआ था। भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को प्रत्याशी बनाया था जबकि दिग्विजय सिंह और फूल सिंह बरैया ने कांग्रेस की तरफ से नामांकन भरा था। इस चुनाव से तीन महीने पहले सिंधिया समर्थक 22 विधायकों ने 10 मार्च 2020 को विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में मौजूदा विधायकों की कुल संख्या 206 रह गई थी क्योंकि 2 विधानसभा सीटें मुरैना जिले की जौरा और आगर-मालवा की आगर सीट विधायकों के निधन के बाद खाली थी।इस हिसाब से राज्यसभा के एक प्रत्याशी को कम से कम 52 वोट चाहिए थे। विधायकों की संख्या के आधार पर भाजपा के दो उम्मीदवार- ज्योतिरादित्य सिंधिया (56 वोट) और डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी (55 वोट) जीतने में कामयाब हुए थे। कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह (57 वोट) ही जीत दर्ज कर सके थे। दूसरे प्रत्याशी फूल सिंह बरैया को केवल 38 वोट मिले थे। 5 विधायकों ने भी बदल लिया था पाला 2018 विधानसभा चुनाव के बाद बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से कमलनाथ सरकार ने बहुमत का आंकड़ा पार किया था। इस चुनाव में कांग्रेस को 114 और भाजपा को 109 सीटें मिली थीं लेकिन 19 जून 2020 को राज्यसभा की 3 सीटों पर हुए चुनाव से ठीक पहले बसपा के दो, सपा का एक और 2 निर्दलीय विधायकों ने पाला बदल लिया था। जिसका फायदा भाजपा को हुआ था। दिग्विजय को तीन वोट ज्यादा मिले थे 3 सीटों के चुनाव में भाजपा को दो वोटों का नुकसान हुआ था। गुना से भाजपा विधायक गोपीलाल जाटव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह क्रॉस वोटिंग की थी। सुमेर सिंह सोलंकी के पक्ष में दिया गया भाजपा विधायक जुगल किशोर बागरी का वोट निरस्त हो गया था। 3 सीटों पर चुनाव से ठीक एक दिन पहले 18 जून 2020 को कमलनाथ के निवास पर एक बैठक हुई थी। इसमें तय किया गया था कि दिग्विजय सिंह को 54 विधायक वोट देंगे लेकिन उन्हें 57 वोट मिले। यानी जिन तीन विधायकों को दूसरे प्रत्याशी फूल सिंह बरैया को वोट देना था, उन्होंने दिग्विजय सिंह को वोट दे दिया था। से ओबीसी, दलित और महिला वर्ग को साधा था। दरअसल, राज्यसभा चुनाव से पहले एमपी की राजनीति में ओबीसी एक बड़ा मुद्दा बन गया था। ओबीसी आरक्षण की वजह से पंचायत और निकाय चुनाव टल गए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। कोर्ट के दखल के बाद निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण का रास्ता साफ हुआ था। प्रदेश में ओबीसी वोटरों की आबादी 50 फीसदी से अधिक है। बीजेपी ने कविता पाटीदार के नाम की घोषणा कर एक बड़ा ओबीसी कार्ड खेला था। इसी तरह सुमित्रा वाल्मीकि को राज्यसभा में भेजकर दलित वर्ग को साधने की कोशिश की थी। जानकार कहते हैं कि यदि भाजपा फिर दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलती है तो उसे मिशन 2024 में भी बड़ा फायदा होगा।

खाद की किल्लत की वजह, सरकार की फेल पालिसी- फेडरेशन और सोसायटी के बजाय व्यापारियों को कमीशन के लिए दिया ठेका : गोविंद सिंह

Reason for the fertilizer scarcity is the government’s failed policy, as instead of relying on federations and societies, contracts were given to businessmen for commissions: Govind Singh वीडी शर्मा पर आरोप- अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं, ऐसे नेताओं को ज्यादा लंबा राजनीतिक भविष्य नहीं होता. भोपाल। मध्य प्रदेश के कई इलाकों में खाद की कमी से किस जूझ रहे हैं। किसानों की समस्या को लेकर नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह ने सरकार पर सवाल खड़े किए। गोविंद सिंह ने कहा कि सरकार की नीतियों की वजह से ही किसान परेशान है। कांग्रेस के समय सोसाइटी में 80 फीसदी खाद दिया जाता था। अब सोसाइटियों के बजाय व्यापारियों को खाद वितरण के लिए जिम्मेदारी दे दी गई है। व्यापारी कालाबाजारी करते हैं और महंगे दाम पर किसानों को खाद लेना पड़ रहा है। पहले व्यवस्था थी कि फेडरेशन बनाकर सरकार 4 महीने के लिए उन्हें लोन देती थी। जिसे खाद की खरीदी हो जाए और 10 प्रतिशत अधिक डिमांड से ज्यादा जिलों में खाद भेजी जाती थी। अब यह व्यवस्था पूरी तरीके से सरकार ने खत्म कर दी है। जिस वजह से जनता परेशान हो रही है। वही गोविंद सिंह ने आशंका जताई कि मतदान के दिन भाजपा के एजेंट बने अधिकारी गड़बड़ी कर सकते हैं। इसलिए कमलनाथ ने मतगणना स्थल पर मौजूद रहने वाले एजेंट को प्रशिक्षण देने के लिए कहा है। साथ ही प्रत्याशी भी आएंगे। उनसे भी चर्चा की जाएगी। गोविंद सिंह ने कहा कि पूरे चुनाव के दौरान कुछ ईमानदार अधिकारियों ने अच्छा काम किया है। कई बेईमान अधिकारी जो भ्रष्ट थे पैसा कमाने में लगे हुए थे। उन्होंने भाजपा के एजेंट के तौर पर काम किए हैं। वहीं राजनगर की घटना में कांग्रेस प्रत्याशी पर मामला दर्ज किए जाने पर कहा की वीडी शर्मा अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं। ऐसे नेताओं को ज्यादा लंबा राजनीतिक भविष्य नहीं होता है।

कांग्रेस की सरकार बनेगी या नहीं, अब चर्चा डिप्टी सीएम बनाने की.

Whether the Congress will form the government or not is now under discussion, focusing on the appointment of the Deputy Chief Minister. कर्नाटक और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर एमपी में भी कांग्रेस कर सकती है प्रयोग उदित नारायणभोपाल – मध्य प्रदेश में सरकार आखिर किसकी बनेगी। यह फैसला 3 दिसंबर के बाद ही होगा। इस बीच कांग्रेस के अंदर डिप्टी सीएम बनाए जाने का जिन निकलकर सामने आ गया है। कांग्रेस के अंदर चर्चा है कि छत्तीसगढ़, कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में भी डिप्टी सीएम बनाए जाने को लेकर कवायद चल रही है। कांग्रेस की शुरूआत से ही अपने कम फीस के तौर पर कमलनाथ को प्रेजेंट किया है। अब डिप्टी सीएम कौन बनेगा या फिर बनाया जाएगा। यह मामला केंद्रीय आलाकमान ही तय करेगा। कांग्रेस के सीनियर लीडर और पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह का कहना है कि मध्य प्रदेश में डिप्टी सीएम बनाए जाने को लेकर फैसला सेंट्रल लीडरशिप करेगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिका अर्जुन खरगे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का फैसला होगा। अगर डिप्टी सीएम बनाया जाता है तो कमलनाथ को भी भरोसे में लिया जाएगा। केंद्रीय लीडर से जो भी तय करेगी, वह मध्य प्रदेश में भी होगा। यानी कि केंद्रीय गला कमान की मंजूरी होती है तो कांग्रेस मध्य प्रदेश में भी डिप्टी सीएम बन सकती है। हालांकि अभी इसके लिए लंबा कांग्रेस का इंतजार करना पड़ेगा लेकिन कांग्रेस पूरे भरोसे में है कि सरकार बनने जा रही है।

नए साल में पाटिल होंगे वन विभाग के नए मुखिया, दिसंबर में हो रही है गुप्ता की विदाई.

In the new year, Patil will be the new chief of the Forest Department, and Gupta’s farewell is scheduled for December. डॉ श्रीवास्तव लघु वनोपज संघ और यादव होंगे वन विकास निगम नए एमडी उदित नारायणभोपाल. नए साल में वन विभाग में कई नए बदलाव होने जा रहें है। ये सभी बदलाव नई सरकार के गठन के बाद होने की संभावना है। मौजूदा वन बल प्रमुख आरके गुप्ता और लघु वनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह दिसम्बर में सेवानिवृत होने जा रहें है। सूत्रों के अनुसार वर्तमान वन विभाग के हॉफ गुप्ता के सेवानिवृत्ति के बाद वन विकास निगम के एमडी एके पाटिल वन बल प्रमुख होंगे। हालांकि उनका कार्यकाल एक महीने का ही होगा। इसी प्रकार लघु वन वनोपज संघ एमडी पुष्कर सिंह के रिटायरमेंट के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ अतुल कुमार श्रीवास्तव नए एमडी होंगे। वर्तमान में डॉक्टर श्रीवास्तव वर्किंग प्लान शाखा के प्रमुख हैं। गौरतलब यह है कि अभी तक विभाग में हुई पदस्थापना के दौरान डॉक्टर श्रीवास्तव की वरिष्ठता अनदेखी की गई। इसी कारण संभावना जताई जा रही है की नई सरकार में उनकी पदस्थापना वरिष्ठता के आधार पर होगी। निगम के मौजूदा एमडी पाटिल के वन बल प्रमुख बनने पर पीसीसीएफ प्रशासन -एक के आरके यादव को निगम में एमडी के पद पर पदस्थ किए जाने की संभावना है। कैडर में पीसीसीएफ का पद प्रशासन-एक का नहीं है। कैडर में यह पद अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी के लिए निर्धारित है। डॉ श्रीवास्तव के संघ में चले जाने पर वर्किंग प्लान शाखा का प्रभार पीसीसीएफ जेएफएम पीके सिंह को दिया जा सकता है। फरवरी में अम्बाडे होंगे पीसीसीएफ वन्य प्राणीपाटिल के जनवरी में रिटायर होने पर पीसीसीएफ वन्य प्राणी असीम श्रीवास्तव वन बल प्रमुख बनेंगे और उनकी जगह पर 88 बैच के आईएफएस विजय एन अम्बाडे पीसीसीएफ वन्य प्राणी होंगे. विभाग में अम्बाडे की छवि वन्य प्राणी विशेष के रूप में बनी हुई है। अनूपपुर डीएफओ पर गिर सकती है गाजअनूपपुर डीएफओ सुशील प्रजापत पर गाज गिरने की संभावना प्रबल हो गई है। महिला कर्मचारियों के साथ बदसलूकी और खरीदी में गड़बड़ी संबंधित जांच रिपोर्ट प्रशासन-एक को मिल गई है। पीसीसीएफ प्रशासन एक शाखा ने आरोप पत्र तैयार कर लिए है। शीघ्र ही उन्हें जारी किया जा रहा है। डीएफओ प्रजापत के खिलाफ जांच वन संरक्षक शैलेंद्र गुप्ता ने की थी। सूत्रों ने बताया कि जांच प्रतिवेदन में उन्हें दोषी करार दिया गया है। इस बीच डीएफओ द्वारा वन अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बदसलूकी का सिलसिला जारी है।

सरकारी विभागों में आम नागरिक को नहीं मिल पाती सुविधा, छोटे-छोटे कामों के लिए होना पड़ता है परेशान.

Citizens often face difficulties in availing government services for minor tasks 3 तारीख को मतगणना के बाद बनने वाली सरकार क्या दे पाएगी आम नागरिक को सुविधा अलताफ खानविदिशा, सिरोंज का आम नागरिक सरकारी विभागों से संतुष्ट नहीं रहता छोटे-छोटे कामों के लिए आम नागरिक को कई बार चक्कर लगाना पड़ते हैं अगर बात की जाए तो आम नागरिक का सबसे ज्यादा काम नगर पालिका से पड़ता है या ग्रामीण क्षेत्र के नागरिक का काम जनपद से पड़ता है लेकिन दोनों ही विभागों में आम नागरिक को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए कई चक्कर लगाना पड़ते हैं यहां तक के कुछ कर्मचारी अधिकारी आम नागरिक से सीधे तौर पर बात भी नहीं करते वहीं कई बार सरकारी योजनाओं का लाभ आम नागरिक नहीं उठा पाता हालांकि जिसकी जिम्मेदारी जिस विभाग का जो अधिकारी है उसकी और विभाग के कर्मचारियों की रहती है कि वह सरकार द्वारा दी गई योजनाओं को आम नागरिक तक पहुंचाएं लेकिन यहां तो आमनागरिक तक योजना पहुंचना तो बहुत दूर की बात है छोटे कामों के लिए विभागों द्वारा आम जनता को परेशान किया जाता है बात यहां नगर पालिका या जनपद की नहीं है इनके अलावा भी जिन विभागों में आम नागरिक को अपने कामों के लिए जाना होता है चाहे वह बिजली विभाग हो तहसील कार्यालय हो शासकीय अस्पताल हो या कोई अन्य विभाग हर जगह जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है अब जनता इसके बाद सबसे ज्यादा विश्वास उस व्यक्ति पर करती है जिस व्यक्ति को जनता ने अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि चुना हो और जिस सरकार का सोच के जनता ने वोट दिया हो आम जनता अपने वोट के आधार के दम पर विभागों में अपने छोटे काम करने के लिए चक्कर लगाना नहीं चाहती बार-बार परेशान नहीं होना चाहती इस बार आम जनता चाहती है कि सरकार जिसकी भी बने वह सरकारी विभागों पर मजबूती से अपनी पकड़ रखे ताकि आम नागरिक को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए बार-बार परेशान ना होना पड़े योजनाओं के लाभ हो या कोई आम नागरिक के दस्तावेजों का काम यह सब आसानी के साथ हो सके

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