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शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली, Sensex 1100 पॉइन्ट धड़ाम

मुंबई भारतीय शेयर बाजार में आज यानी 4 नवंबर 2024 (सोमवार) को बड़ी गिरावट के साथ शुरुआत हुई। सोमवारो को शुरुआती कारोबार में दोनों प्रमुख सूचकाक बीएसई सेंसेक्स (BSE Sensex) और एनएसई निफ्टी (NSE Nfity) बुरी तरह फिसल गए। सेंसेक्स 665.27 अंक की गिरावट के साथ 79,058.85 अंक पर खुला। जबकि एनएसई निफ्टी 229.4 अंक टूटकर 24,074.95 अंक पर खुला। लेकिन बाजार खुलने के बाद भी गिरावट जारी रही। और सुबह 10 बजकर 42 मिनट पर सेंसेक्स करीब 1150 से ज्यादा अंक तक गिर गया और 78,550 के आसपास कारोबार कर रहा था। वहीं निफ्टी 50 भी 382 पॉइन्ट गिरकर 23,923 पर आ गया। दिवाली के बाद और महंगा हुआ गोल्ड, दिल्ली-मुंबई में कितना हुआ सोने का भाव? यहां चेक करें अपने शहर का रेट सेंसेक्स में सूचीबद्ध 30 कंपनियों में से सन फार्मा, रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंफोसिस, टाटा मोटर्स, इंफोसिस, टाइटन, मारुति और एनटीपीसी के शेयर में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। महिंद्रा एंड महिंद्रा, टेक महिंद्रा, एचसीएल टेक्नोलॉजीज और इंडसइंड बैंक के शेयरों में तेजी आई। एशियाई बाजारों में दक्षिण कोरिया का कॉस्पी, चीन का शंघाई कम्पोजिट तथा हांगकांग का हैंगसेंग फायदे में रहे। अमेरिकी बाजार शुक्रवार (1 नवंबर 2024) को सकारात्मक रुख के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड 1.49 प्रतिशत की बढ़त के साथ 74.19 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर रहा। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) पिछले कारोबारी सत्र में बिकवाल रहे थे और उन्होंने शुद्ध रूप से 211.93 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। RIL, Adanin Port, sunpharma, Tata Motors जैसे हैवीवेट शेयर 3 फीसदी तक गिर गये. इस क्रम में इंडियन ऑयल के शेयर 5 फीसदी, बजाज ऑटो के शेयर 4.30 फीसदी, हीरोमोटोकॉर्प के शेयर 3.8 फीसदी गिरे हैं.  हिंदुस्‍तान जिंक 4 फीसदी, HPCL के शेयर 3.82 फीसदी और PVR 6%, चेन्‍नई पेट्रो कॉर्प 5.49 फीसदी और ब्‍लू स्‍टार 5 फीसदी गिरे.

भारत से पैसा निकालकर चीन गए विदेशी निवेशक, बाजारों में भी हाल में गिरावट आई से हुए कंगाल

नई दिल्ली  विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने अक्टूबर महीने में भारतीय बाजार में भारी बिकवाली करते हुए 1,13,858 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। यह अब तक किसी एक महीने में की गई सबसे बड़ी बिकवाली है। हालांकि वे इस दौरान प्राइमरी मार्केट में सक्रिय खरीदार बने रहे। सेकंडरी मार्केट मे भारी बिकवाली के उलट उन्होंने प्राइमरी मार्केट में 19,842 करोड़ रुपये का निवेश किया। विदेशी निवेशक भारत में बेचो और चीन में खरीदो की नीति पर चल रहे थे। लेकिन चीन का बाजार एक बार फिर दबाव में लौटता दिख रहा है। चीनी शेयरों में तेजी कम हो रही है। हाल में शंघाई और हैंग सेंग सूचकांकों में गिरावट आई है। एफपीआई के व्यवहार में इस तरह के विरोधाभास के बारे में जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी के विजयकुमार ने कहा कि प्राइमरी मार्केट के इश्यू ज्यादातर उचित मूल्यांकन पर हैं, जबकि बेंचमार्क सूचकांक ऊंचे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं। एफपीआई की लगातार बिकवाली से बेंचमार्क सूचकांकों में पीक से लगभग 8% की गिरावट आई है। एफपीआई आगे भी बिकवाली जारी रख सकते हैं जिससे बाजार में किसी भी संभावित तेजी पर रोक लग सकती है। चीन की निकली हवा लेकिन यह ट्रेंड देखने को मिला है वित्तीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर एफपीआई की बिकवाली के बावजूद यह सेक्टर लचीला बना हुआ है। इससे साफ है कि भारतीय शेयरों का उचित मूल्यांकन हैं क्योंकि बिक्री घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) और व्यक्तिगत निवेशकों ने बिकवाली को एबजॉर्ब किया है। विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालकर चीन में लगा रहे थे। इसकी वजह यह थी कि चीन की सरकार ने भारी-भरकम पैकेज की घोषणा की थी। उसके बाद चीन के बाजारों में कुछ तेजी दिख रही थी। लेकिन अब एक बार फिर चीन के बाजार में दबाव हावी होने लगा है। हाल के दिनों में शंघाई और हैंग सेंग इंडेक्स में गिरावट आई है। वैश्विक मोर्चे पर बाजार आने वाले सप्ताह में कुछ दिनों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों पर प्रतिक्रिया देंगे। उसके बाद अमेरिकी में जीडीपी के आंकड़े, महंगाई और फेड के दर में कटौती जैसे बुनियादी कारक बाजार की चाल को प्रभावित करेंगे।

विदेशी निवेशक भारत में जमकर निवेश कर रहे , अप्रैल से जून में 12.2 अरब डॉलर कमाए

नई दिल्ली  विदेशी निवेशकों के लिए भारत सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बना गया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों, निजी इक्विटी फर्मों और स्थानीय स्तर पर परिचालन करने वाली कंपनियों ने डिविडेंड इनकम, प्रॉफिट और रिइनवेस्टेड अर्निंग्स के रूप में अप्रैल-जून तिमाही में कुल 12.2 अरब डॉलर कमाए। यह वह राशि है जो विदेशी निवेशकों ने तीन महीने के दौरान भारत से निकाली। यह पांच साल पहले की तुलना में दोगुना से भी अधिक है जो भारतीय फाइनेंशियल एसेट्स की मजबूत आय संभावनाओं को रेखांकित करता है। आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चला है कि कुल इनवेस्टमेंट इनकम आउटफ्लो जून तिमाही में दोगुना से ज्यादा बढ़ा है। 2019 की अप्रैल-जून तिमाही में यह $11 अरब था जो इस साल इसी अवधि में $21.6 अरब हो गया है। अमेरिका स्थित कंसल्टेंसी बैन एंड कंपनी की एक रिपोर्ट के अनुसार 2024 की पहली छमाही में निजी इक्विटी से निकासी छह साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। एग्जिट डील वैल्यू में साल-दर-साल 40% की वृद्धि हुई, जो कैलेंडर वर्ष 2023 की पहली छमाही में $9.5 अरब से बढ़कर 2024 की पहली छमाही में $13.3 अरब हो गई। क्या कहते हैं जानकार PwC इंडिया के पार्टनर-रिस्क कंसल्टिंग और लीडर-फाइनेंशियल सर्विसेज और ट्रेजरी रिस्क मैनेजमेंट, कुंतल सूर ने कहा, ‘पिछले कुछ वर्षों में पीई फर्मों ने अच्छा मुनाफा कमाया है। बढ़ते शेयर बाजारों ने उन्हें लिस्टेड फर्मों में उनके निवेश के लिए अच्छा मूल्यांकन दिया। इससे उन्हें निवेशकों को अच्छा रिटर्न देने का मौका मिला। इसके अलावा कई निवेशकों के लिए ब्याज दरें अधिक होने के कारण उनके देशों में पुनर्निवेश के कई अवसर रहे हैं।’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में किए गए निवेश से प्राप्त लाभ और लाभांश भी निवेश आय में परिलक्षित होते हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘इसके दो कारक हैं। पहला, ऐसे समय में समग्र राजस्व में वृद्धि करना जब मंदी के कारण लाभ अस्थिर हो। दूसरा, विनिर्माण के कुछ क्षेत्रों में अतिरिक्त क्षमता को देखते हुए पुनर्निवेश की कम आवश्यकता महसूस की जाती है।’ जानकारों का कहना है कि यह आउटफ्लो चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकता है और बाहरी क्षेत्र के संकेतकों के लिए हानिकारक हो सकता है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह अभी भी चालू खाते के आउटफ्लो का एक छोटा हिस्सा है।

UPI ने फेस्टिव सीजन में तोड़े सारे रिकॉर्ड, 23.5 लाख करोड़ रुपये के हुए लेनदेन

मुंबई भारत में यूपीआई का जिस तेजी से इस्तेमाल हो रहा है वो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनता जा रहा है. इस समय देश में यूपीआई का यूज करना सबसे आसान पेमेंट सिस्टम में से एक है. यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के इस्तेमाल में लगातार बढ़त देखी जा रही है. अक्टूबर में देश में यूपीआई के जरिए 16.58 अरब लेनदेन हुए हैं. इसकी वैल्यू करीब 23.5 लाख करोड़ रुपये थी और शुक्रवार को एनपीसीआई ने यह जानकारी दी है. अप्रैल 2016 में यूपीआई शुरू होने के बाद से अब तक का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है. डेली यूपीआई ट्रांजेक्शन अक्टूबर में रहे 535 मिलियन भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम-नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन (एनपीसीआई) के जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, सितंबर की तुलना में अक्टूबर में लेनदेन की संख्या में 10 फीसदी और मूल्य में 14 फीसदी की वृद्धि देखी गई. अक्टूबर में डेली यूपीआई ट्रांजेक्शन की संख्या 535 मिलियन रही. इस दौरान औसत ट्रांजेक्शन की वैल्यू 75,801 करोड़ रुपये रोजाना रही जबकि सितंबर में औसत दैनिक ट्रांजेक्शन की संख्या 501 मिलियन और मूल्य 68,800 करोड़ रुपये था. IMPS के जरिए 467 मिलियन लेनदेन अक्टूबर में इमीडिएट पेमेंट सर्विस (IMPS) के जरिए 467 मिलियन लेनदेन हुए हैं, जो सितंबर के आंकड़े 430 मिलियन से 9 फीसदी अधिक है. बीते महीने आईएमपीएस से होने वाले लेनदेन की वैल्यू सितंबर के आंकड़े 5.65 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 11 फीसदी बढ़कर 6.29 लाख करोड़ रुपये रही थी. अक्टूबर में फास्टैग के जरिए होने वाले लेनदेन की संख्या 8 फीसदी बढ़कर 345 मिलियन हो गई है. सितंबर में यह आंकड़ा 318 मिलियन था. बीते महीने फास्टैग लेनदेन की वैल्यू 6,115 करोड़ रुपये थी, जो कि सितंबर में 5,620 करोड़ रुपये थी. आधार इनेबिल्ड पेमेंट सिस्टम पर 126 मिलियन लेनदेन एनपीसीआई के डेटा के मुताबिक, अक्टूबर में आधार इनेबिल्ड पेमेंट सिस्टम (AEPS) पर 126 मिलियन लेनदेन हुए, जो सितंबर के 100 मिलियन से 26 फीसदी अधिक है. भारत में डिजिटल भुगतान का चलन तेजी से बढ़ रहा है. मार्च 2021 में कंज्यूमर स्पेंडिंग में डिजिटल लेनदेन की हिस्सेदारी 14 से 19 फीसदी थी, जो कि अब बढ़कर 40 से 48 फीसदी हो गई है. यूपीआई-आधारित लेनदेन की संख्या इस वर्ष की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 52 फीसदी बढ़कर 78.97 अरब हो गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 51.9 अरब थी. वहीं, इस साल के पहले छह महीनों में यूपीआई लेनदेन का मूल्य 40 फीसदी बढ़कर 83.16 लाख करोड़ रुपये से 116.63 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

अडानी कंपनी का बांग्लादेश पर 846 मिलियन डॉलर का बकाया, आधी की सप्लाई!

ढाका  दिवाली के बाद बांग्लादेश की बत्ती गुल होने के आसार बन रहे हैं। दरअसल, अडानी ग्रुप की कंपनी अडानी पावर झारखंड लिमिटेड ने बांग्लादेश को बिजली की सप्लाई आधी कर दी है। सप्लाई रोकने का कारण बिजली के बकाया बिलों का पेमेंट नहीं होना है। यदि मसला हल नहीं हुआ तो हो सकता है कि आने वाले दिनों में बांग्लादेश में अंधेरा छा जाए। 846 मिलियन डॉलर का है बकाया स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अडानी पावर की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी अडानी पावर झारखंड लिमिटेड (APJL ) ने बांग्लादेश को अपनी आधी बिजली की सप्लाई रोक दी है। कंपनी का उसके ऊपर 846 मिलियन डॉलर का बकाया है। द डेली स्टार अखबार के मुताबिक पावर ग्रिड बांग्लादेश पीएलसी के आंकड़ों से पता चला है कि अडानी प्लांट ने गुरुवार रात को आपूर्ति कम कर दी। अखबार ने बताया कि बांग्लादेश ने गुरुवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात को 1,600 मेगावाट (MW) से अधिक की कमी की सूचना दी, क्योंकि 1,496 मेगावाट का प्लांट अब एक यूनिट से 700 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहा है। 30 अक्टूबर तक बकाया भरने को कहा था इससे पहले अडानी कंपनी ने ऊर्जा सचिव को पत्र लिखकर बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (PDB) से 30 अक्टूबर तक बकाया राशि का भुगतान करने को कहा था। 27 अक्टूबर को लिखे पत्र में कहा गया था कि यदि बिलों का भुगतान नहीं किया गया तो कंपनी 31 अक्टूबर को बिजली आपूर्ति बंद कर पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के तहत सुधारात्मक कार्रवाई करने को बाध्य होगी। कंपनी ने कहा कि पीडीबी ने न तो बांग्लादेश कृषि बैंक से 170.03 मिलियन अमरीकी डालर की राशि के लिए लेटर ऑफ क्रेडिट (LC) उपलब्ध कराया है और न ही 846 मिलियन अमरीकी डालर की बकाया राशि का भुगतान किया है। अडानी भेज रहा है ज्यादा बिल? अखबार ने पीडीबी के एक अधिकारी के हवाले से कहा कि उन्होंने पहले पिछले बकाए का एक हिस्सा चुका दिया था, लेकिन जुलाई से अडानी पिछले महीनों की तुलना में अधिक पैसे ले रहा है। उन्होंने कहा कि पीडीबी करीब 18 मिलियन अमरीकी डालर का साप्ताहिक भुगतान कर रहा है, जबकि शुल्क 22 मिलियन डालर से अधिक है। उन्होंने कहा, “इसी कारण से बकाया भुगतान फिर से बढ़ गया है।” बकाया भुगतान का दवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के हटने के बाद जब से नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का कार्यभार संभाला है, तभी से अडानी बकाया भुगतान करने का दबाव बना रहे हैं। अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी ने भी मुख्य सलाहकार यूनुस को इस बारे में पत्र लिखा था।

WWF की रिपोर्ट: भारतीय जिस तरीके से खाते हैं, वो धरती के लिए सबसे अच्छा आहार

नई दिल्ली वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट के अनुसार, भारत के फूड कंजप्शन पैटर्न को G20 अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक टिकाऊ माना गया है. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगर ग्लोबल फूड कंजप्शन भारत के समान हो जाए, तो 2050 तक जलवायु प्रभाव काफी कम हो जाएगा. वहीं, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका टिकाऊ उपभोग के मामले में सबसे खराब स्थान पर हैं. उसके बाद ऑस्ट्रेलिया (6.8), यूएसए (5.5), ब्राजील (5.2), फ्रांस (5), इटली (4.6), कनाडा (4.5) और यूके (3.9) का स्थान है। बेहतर देशों में इंडोनेशिया (0.9) भारत (0.84) के बाद आता है और चीन (1.7), जापान (1.8) और सऊदी अरब (2) से आगे है. भारत का सस्टेनेबल कंजप्शन पैटर्न WWF की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर दुनिया में हर कोई 2050 तक दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मौजूदा खाद्य कंजप्शन पैटर्न को अपना ले, तो हम खाद्य-संबंधित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस जलवायु लक्ष्य को 263 फीसदी तक पार कर जाएंगे और हमें सहारा देने के लिए एक से सात पृथ्वी की आवश्यकता होगी. भारत का बाजरा-केंद्रित खाना एक अपवाद के रूप में सामने आता है, जिसमें देश को स्थिरता के लिए एक मॉडल के रूप में स्थापित किया गया है. अगर सभी देश भारत के कंजप्शन मॉडल को देखें, तो रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि फूड प्रोडक्शन को बनाए रखने के लिए 2050 तक एक पृथ्वी (0.84) से भी कम की आवश्यकता होगी. यह भोजन के लिए ग्रहीय जलवायु सीमा से बेहतर है, यह सुझाव देता है कि भारत की फूड सिस्टम ग्लोबल तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रख सकती है.

रिपोर्ट: वित्त वर्ष 2025 में भारत का सेवा निर्यात 9.8% बढ़कर 180 अरब डॉलर पर पहुंचा

नई दिल्ली भारत के सेवा क्षेत्र ने अच्छा प्रदर्शन जारी रखा है, जिसमें सेवाओं के निर्यात में 9.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 180 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। वहीं, सेवाओं के आयात में भी 9.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 62.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह जानकारी बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिपोर्ट में दी गई है। इस वृद्धि के परिणामस्वरूप, सेवाओं का व्यापार संतुलन 82.6 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में अधिक है। हालांकि, सेवाओं के निर्यात और आयात में क्रमिक वृद्धि मामूली रही है। चालू खाता घाटा (CAD) वित्त वर्ष 2025 (FY25) के लिए चालू खाता घाटा 1 प्रतिशत से 1.2 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है। स्थिर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और मजबूत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) प्रवाह, जो कि अनुकूल ब्याज दरों और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने के लिए नीतियों द्वारा समर्थित हैं, बाहरी खाते का समर्थन करेंगे। निर्यात में संभावित बाधाएं मौद्रिक नीति में ढील के शुरू होने में देरी निर्यात सुधार को बाधित कर सकती है, लेकिन मौलिक अर्थशास्त्रीय कारक व्यापार में मध्यम अवधि में सुधार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ दिखाते हैं। आने वाले महीनों में व्यापार घाटे पर ऊपर की ओर दबाव पड़ सकता है, क्योंकि आयात की वृद्धि निर्यात में धीरे-धीरे सुधार से अधिक हो सकती है। व्यापार घाटे की स्थिति सितंबर में सुधार के बावजूद, वित्त वर्ष 2025 के पहले छह महीनों के लिए व्यापार घाटा अधिक है, जो संभावित चुनौतियों का संकेत देता है। वित्त वर्ष का दूसरा आधा भाग (H2FY25) आमतौर पर मौसमी कारकों के कारण निर्यात गतिविधियों में वृद्धि देखता है, लेकिन पूर्ण सुधार वैश्विक आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करेगा, जो अभी भी अनिश्चित हैं। आयात में कमी इस सुधार का मुख्य कारण सोने के आयात में भारी गिरावट है, जो पिछले महीने 10.1 अरब डॉलर से घटकर 4.4 अरब डॉलर हो गया। हालांकि, वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में (H1FY25) व्यापार घाटा बढ़ता हुआ नजर आ रहा है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 119.2 अरब डॉलर की तुलना में 137.4 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। यह वृद्धि मुख्य रूप से तेजी से बढ़ते आयात के कारण हुई है, जो निर्यात में मामूली सुधार से अधिक है। निर्यात का आंकड़ा अप्रैल से सितंबर की अवधि में निर्यात में केवल 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 213.2 अरब डॉलर तक पहुंचा है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि में 8.9 प्रतिशत की गिरावट के मुकाबले महत्वपूर्ण सुधार है। वृद्धि का नेतृत्व फार्मास्युटिकल्स, इंजीनियरिंग वस्त्र, और रसायनों जैसे क्षेत्रों ने किया है। हालांकि, कृषि और संबंधित उत्पादों के निर्यात महंगाई के दबाव के कारण कमजोर बने रहे हैं। आयात का रुख महत्वपूर्ण गैर-तेल और गैर-सोने के आयात में, गैर-धातु धातुएं, पूंजी वस्तुएं, और इलेक्ट्रॉनिक्स में मजबूत वृद्धि बनी हुई है, जो पूंजी निवेश और उपभोक्ता खर्च की मांग को दर्शाती है। दलहन का आयात भी बढ़ा है, जो घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए है। भविष्य की चुनौतियाँ हालांकि, आयात का मार्ग upward रहने की उम्मीद है, जो औद्योगिक इनपुट और धातुओं की वैश्विक कीमतों में वृद्धि से प्रेरित है। वैश्विक मांग, विशेषकर यूरोजोन और चीन में, नरम बनी हुई है, जबकि तेल की कीमतों में अस्थिरता आयात बिल को और बढ़ा सकती है। महंगाई के दबाव, घरेलू मांग में वृद्धि, और त्योहारों के दौरान सोने की कीमतों में स्थिरता व्यापार संतुलन पर दबाव डाल सकती है। इसके अतिरिक्त, अगर भारतीय रुपया कमजोर रहता है, तो आयातित महंगाई के जोखिम बढ़ सकते हैं।  

अल्ट्राटेक सीमेंट को दूसरी तिमाही में 825 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ

नई दिल्ली अग्रणी सीमेंट उत्पादक कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड का जुलाई-सितंबर तिमाही का एकीकृत शुद्ध लाभ घटकर 825.18 करोड़ रुपये रहा है। आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी ने शेयर बाजार को यह जानकारी दी। एक साल पहले की समान तिमाही में कंपनी ने 1,280.38 करोड़ रुपये का एकीकृत शुद्ध लाभ दर्ज किया था। कंपनी ने कहा कि व्हाइट सीमेंट एंड कंस्ट्रक्शन मैटेरियल्स पीएससी (आरएकेडब्ल्यू) के लिए यूएई स्थित रास अल खालमा कंपनी में हिस्सेदारी बढ़ाकर 54.79 प्रतिशत किए जाने से उसके तिमाही नतीजों की तुलना पिछले वर्ष की समान अवधि के साथ नहीं की जा सकती है। अल्ट्राटेक ने कहा, ‘‘अतिरिक्त हिस्सेदारी के अधिग्रहण से आरएकेडब्ल्यू 10 जुलाई, 2024 से अनुषंगी कंपनी बन गई है। इन परिणामों में आरएकेडब्ल्यू के 10 जुलाई से प्रभावी वित्तीय परिणाम शामिल हैं लिहाजा सितंबर तिमाही और पहली छमाही के आंकड़ों की तुलना पिछले साल की समान अवधि से नहीं की जा सकती है।’’ आलोच्य अवधि में अल्ट्राटेक का परिचालन राजस्व 15,634.73 करोड़ रुपये था जो एक साल पहले इसी अवधि में 16,012.13 करोड़ रुपये था। सितंबर तिमाही में कंपनी का कुल खर्च 14,837.44 करोड़ रुपये रहा। इस अवधि में कंपनी की कुल आय, जिसमें अन्य आय शामिल है, 15,855.46 करोड़ रुपये थी।  

मोदी सरकार की ELI योजना: 500 कंपनियों में युवाओं के लिए मौके

नई दिल्ली मोदी सरकार ने केंद्रीय बजट 2024 में एक नई योजना ‘रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना’ यानी ‘ELI’ लॉन्च की है। इस योजना का मकसद निर्माताओं और निर्यातकों को प्रोत्साहन देकर निर्यात को बढ़ावा देना है। सरकार का मानना है कि इससे भारतीय उत्पादों की मार्केट में अच्छी पकड़ बनेगी, घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी और विदेशी मुद्रा में भी बढ़ोतरी होगी। इस योजना को और बेहतर ढंग से लागू करने के लिए सरकार ने अलग-अलग मंत्रालयों को धन भी आवंटित किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय को 2,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं ताकि 500 कंपनियों में युवाओं के लिए इंटर्नशिप के अवसर बढ़ाए जा सकें। इसी तरह, श्रम मंत्रालय को ELI से जुड़ी बाकी नीतियों को लागू करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये मिले हैं। तीन अलग-अलग योजनाओं का समूह है ELI ELI योजना दरअसल तीन अलग-अलग योजनाओं का एक समूह है। पहली योजना के तहत सरकार नौकरी शुरू करने वाले कर्मचारियों को वेतन का एक हिस्सा देगी। दूसरी योजना का उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। तीसरी योजना के जरिए नियोक्ताओं को आर्थिक मदद मुहैया कराई जाएगी। वेतन सब्सिडी पहली योजना, जिसे ‘वेतन सब्सिडी’ का नाम दिया गया है, के तहत लगभग 1 करोड़ कर्मचारियों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है। यह योजना दो साल तक चलेगी। इसमें उन नए कर्मचारियों को तीन किस्तों में 15,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाएगी जिनका मासिक वेतन 1 लाख रुपये तक है। दूसरी किस्त पाने के लिए उम्मीदवार को ऑनलाइन वित्तीय साक्षरता का एक कोर्स पूरा करना होगा। अगर नौकरी 12 महीने से पहले ही छूट जाती है तो कंपनी को सब्सिडी वापस करनी होगी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार दूसरी योजना ‘मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार’ का उद्देश्य इस सेक्टर में काम करने वाले नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करना है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए नियोक्ताओं का ईपीएफओ में कम से कम तीन साल का ट्रैक रिकॉर्ड होना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें कम से कम 50 गैर-ईपीएफओ कर्मचारियों या पिछले साल के ईपीएफओ कर्मचारियों की संख्या के 25 फीसदी (जो भी कम हो) को नौकरी पर रखना होगा। इस योजना के तहत सब्सिडी का भुगतान चार साल तक किया जाएगा और इसे कर्मचारी और नियोक्ता के बीच बराबर बांटा जाएगा। सब्सिडी की गणना वेतन के आधार पर होगी। नियोक्ता को सपोर्ट तीसरी योजना ‘नियोक्ता को सपोर्ट’ खास तौर पर उन नियोक्ताओं के लिए है जो अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाते हैं। इसके तहत, नियोक्ताओं को ईपीएफओ नियोक्ता अंशदान पर हर महीने 3,000 रुपये तक का रिंबर्समेंट दो साल तक मिलेगा। हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें हैं। जिन नियोक्ताओं के पास 50 से कम कर्मचारी हैं, उन्हें कम से कम दो नए कर्मचारियों को नौकरी पर रखना होगा। जिनके पास 50 या उससे ज्यादा कर्मचारी हैं, उन्हें कम से कम पांच नए कर्मचारियों को नौकरी पर रखना होगा। अगर कोई कंपनी 1000 से ज्यादा नौकरियां पैदा करती है, तो रिबर्समेंट तिमाही आधार पर किया जाएगा। यह रिंबर्समेंट पिछली तिमाही के हिसाब से किया जाएगा। इसमें जो नियोक्ता ‘दूसरी योजना’ का लाभ ले रहे हैं, वे इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते। हालांकि, जो पहली योजना, यानी ‘स्कीम ए’ का लाभ उठा रहे हैं, वे अतिरिक्त लाभ के रूप में इस योजना का फायदा उठा सकते हैं।

शेयर बाजार से चाहतें हैं पैसा कमाना तो इन ट्रेडिंग रणनीतियों है कबीले तारीफ

मुंबई ट्रेडिंग का मतलब सिक्टोरिटीज को खरीदना और बेचना होता है। ट्रेडिंग भी कई प्रकार की होती हैं। एक दिन से लेकर सालों के लंबे अंतराल के लिए भी ट्रेडिंग की जाती है। इसके साथ ही अलग-अलग बाजारों के माहौल और वहां मौजूद जोखिम से जुड़ी विभिन्न ट्रेडिंग रणनीतियां शेयरों में कारोबार करने के समय अपनाई जाती हैं। यहां पर हम कुछ ट्रेडिंग रणनीतियों पर चर्चा कर रहे हैं जो बाकी रणनीतियों में से सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। ये रणनीतियां निवेशकों को तर्कसंगत निवेश निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। इंट्राडे ट्रेडिंग (Intraday Trading) इंट्राडे ट्रेडिंग जिसे डे ट्रेडिंग के रूप में भी जाना जाता है। ये ऐसी ट्रेडिंग रणनीति है जिसमें निवेशक एक ही दिन में शेयरों को खरीदते और बेचते हैं। वे शेयर बाजार के बंद होने के समय से पहले ट्रेडिंग बंद कर देते हैं। एक ही दिन में वे मुनाफा और घाटा बुक करते हैं। निवेशक इन शेयरों में एक दिन में कुछ सेकंड, घंटे के लिए या इसमें दिन भर में कई बार ट्रेड ले सकते हैं। इसलिए इंट्राडे एक अत्यधिक वोलाटाइल ट्रेडिंग रणनीति मानी जाती और इसके लिए तेजी से निर्णय लेना होता है। पोजीशनल ट्रेडिंग (Positional Trading) पोजिशनल ट्रेडिंग एक ऐसी रणनीति है जहां शेयर्स को महीनों या सालों के लंबे समय तक रखा जाता है। ऐसे शेयरों में समय के साथ भाव में बड़ी बढ़त की अपेक्षा के साथ मुनाफा कमाने की उम्मीद की जाती है। निवेशक आमतौर पर फंडामेंटल एनालिसिस के साथ कंपनी का टेक्निकल ग्राउंड देखकर इस शैली को अपनाते हैं। इसलिए इस प्रकार की ट्रेडिंग रणनीति में आमतौर पर बाजार के रुझान और उतार-चढ़ाव जैसी अल्पकालिक जटिलताओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। स्विंग ट्रेडिंग (Swing Trading) स्विंग ट्रेडिंग आमतौर पर एक ऐसी रणनीति है जहां निवेशक शेयरों के भाव में और तेजी की उम्मीद में एक दिन से अधिक समय तक शेयरों को अपने पास रखते हैं। स्विंग ट्रेडर्स आने वाले दिनों में बाजार की गतिविधियों और रुझानों की भविष्यवाणी करने के लिए जाने जाते हैं। इंट्राडे ट्रेडर्स और स्विंग ट्रेडर्स के बीच स्टॉक को अपने पास रखने की समय सीमा में महत्वपूर्ण अंतर होता है। इसलिए कहा जाता है कि ज्यादातर टेक्निकल ट्रेडर्स स्विंग ट्रेडिंग की कैटेगरी में आते हैं। टेक्निकल ट्रे़डिंग (Technical Trading) टेक्निकल ट्रेडिंग में ऐसे निवेशक शामिल हैं जो शेयर बाजार में प्राइस चेंज की भविष्यवाणी करने के लिए अपने तकनीकी विश्लेषण ज्ञान का उपयोग करते हैं। इस ट्रेडिंग शैली में कोई विशेष समय-सीमा नहीं होती है क्योंकि यह एक दिन से लेकर महीनों तक के लिए भी हो सकती है। बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव को निर्धारित करने के लिए अधिकांश ट्रेडर्स अपने टेक्निकल एनालिसिस स्किल्स का उपयोग करते हैं। हालांकि स्टॉक की कीमतों का निर्धारण करते समय सबसे महत्वपूर्ण टेक्निकल एनालिसिस बाजार की परिस्थिति होती है। फंडामेंटल ट्रेडिंग (Fundamental Trading) फंडामेंटल ट्रेडिंग का मतलब स्टॉक में निवेश करना होता है जहां ट्रेडर्स समय के साथ भाव में तेजी की उम्मीद के साथ कंपनी के स्टॉक को खरीदता है। इस तरह की ट्रेडिंग में ‘बाय एंड होल्ड’ रणनीति में विश्वास किया जाता है। इस प्रकार की ट्रेडिंग आमतौर पर कंपनी के फोकस्ड इंवेंट्स में किया जाता है। इसके लिए फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स, नतीजों, ग्रोध और मैनेजमेंट क्वालिटी का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाता है। मिंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक ये ट्रेडिंग रणनीतियाँ बहुत काम की होती हैं और निवेशक को उस ट्रेडिंग शैली पर निर्णय लेने में मदद करती हैं जिसे वे अपनाना चाहते हैं। प्रत्येक प्रकार की ट्रेडिंग रणनीति से जुड़े जोखिम और लागत की गहन समझ के साथ ट्रेडर्स चाहें तो रणनीतियों के संयोजन का उपयोग करके भी शेयरों में खरीद-फरोख्त कर सकते हैं। डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना हेतु दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें।

निवेश की पसंदीदा जगह बना भारत, मैन्यूफैक्चरिंग टेक्नोलाजी के क्षेत्र में विश्व में बन रहा अग्रणी

नई दिल्ली भारत को विदेशी निवेश का पसंदीदा केंद्र बनाने में हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की अहम भूमिका है। पिछले वित्त वर्ष 2022-23 में देश की विकास दर अनुमान से अधिक 7.2 प्रतिशत रही। गत जून में देश में जीएसटी संग्रह, विनिर्माण के लिए पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआइ), यात्री वाहनों की बिक्री और यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआइ) के जरिये हुए लेनदेन में प्रभावी वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे उत्साहवर्द्धक आर्थिक आंकड़ों से दुनियाभर के वित्तीय संगठन और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां चालू वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की विकास दर के छह से 6.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद व्यक्त कर रही हैं। कहा जा रहा है कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था में नई शक्ति प्राप्त कर रहा है। चार वैश्विक रुझान-जनसांख्यिकी, डिजिटलीकरण, डिकार्बोनाइजेशन और डिग्लोबलाइजेशन नए भारत के पक्ष में हैं। साथ ही देश में प्रतिभाशाली नई पीढ़ी की कौशल दक्षता, आउटसोर्सिंग और बढ़ते हुए मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति के कारण विदेशी निवेशक भारत की ओर देखने लगे हैं। मोदी सरकार ने उद्योग-कारोबार को आसान बनाने के लिए विगत नौ वर्षों में करीब 1,500 पुराने कानूनों और 40 हजार अनावश्यक अनुपालन समाप्त किए हैं। इस दौरान आर्थिक क्षेत्र में जीएसटी और दिवालिया कानून जैसे सुधार किए गए हैं। बैंकिंग क्षेत्र में जोरदार सुधार करके मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद की मदद से अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया गया है। कारपोरेट टैक्स को कम किया गया है। भारत के युवाओं ने डिजिटल और उद्यमिता के क्षेत्र में दुनिया भर में दबदबा कायम किया है और 100 से ज्यादा यूनिकार्न बनाए हैं। पिछले नौ साल में एक लाख से ज्यादा स्टार्टअप भी शुरू हुए हैं। कानून के कई प्रविधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने जैसे कदमों से देश में विदेशी निवेश का प्रवाह तेजी से बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। देश के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए सरकार जिन रणनीतियों के साथ आगे बढ़ रही है, उससे देश में विदेशी निवेश बढ़ रहा है। भारत को एक वैश्विक डिजाइन और विनिर्माण केंद्र में बदलने के लिए मेक इन इंडिया 2.0, मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों के लिए तकनीकी समाधान को बढ़ावा देने के लिए उद्योग 4.0, स्टार्टअप संस्कृति को उत्प्रेरित करने के लिए स्टार्टअप इंडिया, मल्टीमाडल कनेक्टिविटी अवसंरचना परियोजना के लिए पीएम गतिशक्ति और उद्योगों को डिजिटल तकनीकी शक्ति प्रदान करने के लिए डिजिटल इंडिया जैसी सफल गतिविधियों के कारण भारत चौथी औद्योगिक क्रांति की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारतीय कंपनियां शोध एवं नवाचार में आगे बढ़ रही हैं। आटोमेशन और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों पर भी उद्योग जगत की ओर से अपेक्षित ध्यान दिया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) स्कीम के तहत 14 उद्योगों को करीब 1.97 लाख करोड़ रुपये का आवंटन सुनिश्चित किया है। अब पीएलआइ स्कीम के सकारात्मक परिणाम आने शुरू भी हो गए है। इसकी बदौलत इस समय एशिया में अधिकांश निवेशकों को भारत से बेहतर कोई नहीं दिख रहा है। भारतीय शेयर बाजार में तेजी की यह भी एक बड़ी वजह है। प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे के बाद उद्योग-कारोबार से संबंधित ऐसा महत्वपूर्ण परिदृश्य उभरकर सामने आ रहा है, जिससे भारत दुनिया का नया मैन्यूफैक्चरिंग हब बनते हुए दिखाई देगा। माइक्रोन, एप्लाइड मैटेरियल्स और लैम रिसर्च जैसी कंपनियों की घोषणाओं से आने वाले दिनों में लाखों की संख्या में नई नौकरियां भी सृजित होंगी। कंप्यूटर चिप बनाने वाली अमेरिकन कंपनी माइक्रोन ने गुजरात में अपने सेमीकंडक्टर असेंबली एवं परीक्षण संयंत्र के परिचालन को वर्ष 2024 के अंत तक शुरू करने की घोषणा की है, जिस पर करीब 2.75 अरब डालर खर्च किए जाएंगे। देश में सेमीकंडक्टर के निर्माण से अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल जाएगी, क्योंकि सेमीकंडक्टर उद्योग स्टील, गैस और रसायन की तरह आधारभूत उद्योग है, जो कई सेक्टर की जरूरतों को पूरा करता है। सेमीकंडक्टर के निर्माण से आटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स एवं रक्षा सेक्टर को काफी लाभ मिलेगा। उम्मीद करें कि भारत नई लाजिस्टिक नीति, गतिशक्ति योजना के कारगर कार्यान्वयन, नीतिगत सुधारों, कारोबार आरंभ करने के लिए सिंगल विंडो मंजूरी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, श्रमिकों को नए दौर के अनुरूप प्रशिक्षण देने के साथ-साथ विभिन्न आर्थिक और वित्तीय सुधारों से अगले वर्ष दुनिया के शीर्ष पांच पसंदीदा एफडीआइ वाले देशों की सूची में दिखाई देगा। इसका देश की आर्थिकी को व्यापक रूप से लाभ मिलेगा। (लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं)

दुनिया का सबसे महंगा क्लब, मार्क जकरबर्ग भी हैं इसके मेंबर

नई दिल्ली आपने दुनिया का सबसे महंगा घर सुना होगा, सबसे महंगी कार सुनी होगी। क्या आपने दुनिया के सबसे महंगे क्लब के बारे में सुना है? यह क्लब अमेरिका में है। येलोस्टोन नाम का यह क्लब दुनिया का सबसे महंगा क्लब है। इस क्लब में दुनियाभर के 800 से ज्यादा अरबपतियों के घर हैं। इसके मेंबर में मार्क जकरबर्ग, बिल गेट्स की पूर्व पत्नी मेलिंडा आदि शामिल हैं। इस क्लब में घूमने-फिरने के साथ खाने-पीने की लग्जरी सुविधाएं मौजूद हैं। इसमें दुनिया का अकेला प्राइवेट स्की और गोल्फ कम्यूनिटी है। कौन-कौन है इसका मेंबर? यह क्लब अमेरिका के मोंटाना राज्य में येलोस्टोन नेशनल पार्क से करीब 80 किमी दूर है। इस क्लब में कुल 885 अरबपतियों के घर हैं। इनकी कुल संपत्ति 24 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। जो अरबपति इस क्लब के मेंबर हैं उनमें फेसबुक के मार्क जकरबर्ग, माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स की पूर्व पत्नी मेलिंडा फ्रेंच गेट्स, गूगल के पूर्व सीईओ एरिक श्मिट, गोप्रो के अरबपति फाउंडर निक वुडमैन, पॉप स्टार जस्टिन टिम्बरलेक टिम्बरलेक आदि शामिल हैं। क्या है इसमें ऐसा खास? इस क्लब को स्की और गोल्फ के लिए जाना जाता है। यहां काफी बड़े-बड़े पहाड़ हैं। इसके अलावा यहां नदियां भी बहती हैं। सर्दी, गर्मी और बरसात के अनुसार यहां अलग-अलग एक्टिविटी होती हैं। यहां बने मकानों में कई अरबपति स्थायी रूप में भी रहते हैं। वहीं कई यहां सिर्फ छुट्टियां मनाने आते हैं। पूल और फिटनेस सेंटर भी इस क्लब में पूल और फिटनेस सेंटर भी बने हुए हैं। यहां शादी, पार्टी, प्रोग्राम या प्राइवेट इवेंट के लिए एक अलग स्पेस है। इसे ‘द बार्न’ नाम दिया गया है। इसका गोल्फ कोर्स एरिया 2800 स्क्वेयर फुट में फैला हुआ है। वहीं स्कीइंग के लिए 2900 से ज्यादा एरिया हैं। इनके अलावा यहां रहने वालों के लिए कई तरह की एडवेंचर एक्टिविटी भी कराई जाती हैं।

घरेलू स्तर पर स्वर्ण भंडार में 102 टन से अधिक की बढ़ोतरी : आरबीआई डेटा

नई दिल्ली भू-राजनीतिक तनावों के बीच सोने की कीमतों में उछाल जारी है, इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास 30 सितंबर तक 854.73 मीट्रिक टन सोना था, जिसमें से 510.46 मीट्रिक टन सोना घरेलू स्तर पर था। इस तरह स्वर्ण भंडार में 102 टन की बढ़ोतरी हुई है। इस वर्ष अप्रैल से सितम्बर के बीच घरेलू स्तर पर रखे गए सोने में 102 टन से अधिक की वृद्धि हुई जबकि मार्च के अंत में यह 408 मीट्रिक टन था। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ‘विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन पर अर्धवार्षिक रिपोर्ट: अप्रैल-सितंबर 2024’ के अनुसार, बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) के पास 324.01 मीट्रिक टन सोना सुरक्षित रखा गया है, जबकि 20.26 मीट्रिक टन सोना जमा के रूप में रखा गया है। मूल्य के संदर्भ में (यूएसडी) कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी मार्च 2024 के अंत तक 8.15 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर अंत तक लगभग 9.32 प्रतिशत हो गई। छमाही के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार मार्च के अंत में 646.42 बिलियन डॉलर से बढ़कर सितम्बर में 705.78 बिलियन डॉलर हो गया। भुगतान संतुलन के आधार पर (मूल्यांकन प्रभावों को छोड़कर), अप्रैल-जून 2024 के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार में 5.2 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई, जबकि अप्रैल-जून 2023 के दौरान इसमें 24.4 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई थी। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार (मूल्यांकन प्रभाव सहित) अप्रैल-जून 2024 के दौरान 5.6 बिलियन डॉलर बढ़ गया, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में 16.6 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई थी। सितम्बर के अंत तक रिजर्व बैंक की शुद्ध अग्रिम परिसंपत्ति (देय) 14.58 बिलियन डॉलर थी। जून 2023 के अंत और जून 2024 के अंत के बीच की अवधि के दौरान, बाह्य परिसंपत्तियों में 108.4 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई और बाह्य देनदारियों में 97.7 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई। केंद्रीय बैंक ने कहा, “जून 2024 के अंत तक शुद्ध अंतरराष्ट्रीय निवेश स्थिति (आईआईपी) 368.3 बिलियन डॉलर पर नकारात्मक थी, जबकि जून 2023 के अंत में 379.0 बिलियन डॉलर का नकारात्मक शुद्ध आईआईपी था, जिसका अर्थ है कि सभी बाहरी देनदारियों का योग दोनों अवधियों में बाहरी परिसंपत्तियों की तुलना में अधिक है। सालाना आधार पर नकारात्मक अंतर में कमी आई है। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (एफसीए) में बहु-मुद्रा परिसंपत्तियां शामिल होती हैं, जिन्हें मौजूदा मानदंडों के अनुसार बहु-परिसंपत्ति पोर्टफोलियो में रखा जाता है, जो इस संबंध में अपनाई जाने वाली सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप हैं। तंबर 2024 के अंत तक, कुल 617.07 बिलियन डॉलर के एफसीए में से 515.30 बिलियन डॉलर प्रतिभूतियों में निवेश किए गए, 60.11 बिलियन डॉलर अन्य केंद्रीय बैंकों और बीआईएस के पास जमा किए गए और शेष 41.66 बिलियन डॉलर विदेशों में वाणिज्यिक बैंकों के पास जमा थे।  

लुलु ग्रुप ला रही है USE का इस साल का सबसे बड़े इश्यू, कंपनी खाड़ी के छह देशों में 240 से अधिक स्टोर चलाती है

नई दिल्ली  हाइपरमार्केट चेन और मॉल ऑपरेटर लुलु ग्रुप इंटरनेशनल के बहुप्रतीक्षित आईपीओ की डेट आ गई है। भारतीय मूल के उद्यमी यूसुफ अली की यह कंपनी यूएई में इस साल का सबसे बड़ा आईपीओ ला रही है और उसकी लिस्टिंग अबू धाबी में होगी। इस ग्रुप का बिजनस कई सेक्टर्स में फैला है। इनमें मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेडिंग, हॉस्पिटैलिटी और रियल एस्टेट बिजनस शामिल है। इसका बिजनस 20 से अधिक देशों में फैला है और सालाना टर्नओवर करीब 8 अरब डॉलर है। कंपनी में 65,000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। भारत में कंपनी ने 20,000 करोड़ रुपये निवेश किए हैं। साल 2025 तक उसकी भारत में 30,000 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना है। 2020 में अबू धाबी के शाही परिवार की निवेश कंपनी ने लुलु ग्रुप में 20 फीसदी हिस्सेदारी करीब एक अरब डॉलर में खरीदी थी। आईपीओ के तहत कंपनी अपनी 25 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है। कंपनी का आईपीओ 28 अक्टूबर को खुलेगा और इस पर 5 नवंबर तक बोली लगाई जा सकती है। शेयरों की लिस्टिंग 14 नवंबर को हो सकती है। माना जा रहा है कि कंपनी इससे 1.8 अरब डॉलर जुटा सकती है। हालांकि कंपनी ने इसकी वैल्यू बताने से इन्कार कर दिया। रिटेल निवेशकों को 10 फीसदी हिस्सा रखा गया है। भारत में बिजनस कंपनी की स्थापना 1974 में भारतीय मूल के यूसुफ अली ने की थी। यह कंपनी खाड़ी के छह देशों में 240 से अधिक स्टोर चलाती है। इनमें 116 हाइपरमार्केट्स, 102 एक्सप्रेस स्टोर्स और 22 मिनी मार्केट्स शामिल हैं। कंपनी के यूएई में 103 स्टोर, सऊदी अरब में 56 स्टोर और दूसर बाजारों में 81 स्टोर शामिल हैं। रिटेल इनवेस्टर्स के लिए मिनिमम सब्सक्रिप्शन 5,000 दिरहम है। गल्फ देशों के ग्रॉसरी बाजार में इस कंपनी की 13.5 फीसदी हिस्सेदारी है। भारत में कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, बेंगलुरु, लखनऊ और कोयंबटूर कंपनी के शॉपिंग मॉल हैं।

जुलाई-सितंबर में दूसरी श्रेणी के शीर्ष 30 शहरों में घरों की बिक्री 13 प्रतिशत घटी: प्रॉपइक्विटी

नई दिल्ली जुलाई-सितंबर, 2024 की तिमाही के दौरान 30 प्रमुख दूसरी श्रेणी के शहरों में घरों की बिक्री 13 प्रतिशत घटकर 41,871 इकाई रह गई। रियल एस्टेट विश्लेषण फर्म प्रॉपइक्विटी के अनुसार उच्च आधार प्रभाव और नई आपूर्ति घटने के कारण यह गिरावट हुई। प्रॉपइक्विटी सूचीबद्ध इकाई पी ई एनालिटिक्स लिमिटेड का हिस्सा है। कंपनी ने सोमवार को शीर्ष 30 दूसरी श्रेणी के शहरों की आवास रिपोर्ट जारी की। इसके मुताबिक, दूसरी श्रेणी के 30 शीर्ष शहरों में घरों की बिक्री जुलाई-सितंबर तिमाही में 13 प्रतिशत घट गई, जबकि नई पेशकश में 34 प्रतिशत की गिरावट आई है। समीक्षाधीन अवधि में आवास बिक्री घटकर 41,871 इकाई रह गई, जो इससे पिछले वर्ष की समान अवधि में 47,985 इकाई थी। जुलाई-सितंबर, 2024 तिमाही में नई पेशकश 28,980 इकाई थी, जो इससे पिछले वर्ष की समान अवधि में 43,748 इकाई थी। अहमदाबाद, वडोदरा, गांधीनगर, सूरत, गोवा, नासिक और नागपुर सहित पश्चिमी क्षेत्र ने कुल बिक्री में 72 प्रतिशत का योगदान दिया। प्रॉपइक्विटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) और संस्थापक समीर जसूजा ने कहा कि उच्च आधार प्रभाव के कारण बिक्री और नई पेशकश में गिरावट हुई है। पूरे भारत के संदर्भ दूसरी श्रेणी के शीर्ष 30 शहरों का प्रदर्शन कमजोर रहा है।  

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