खेतों से मुफ्त बटोर रहे गन्ने की पत्तियां,भूमि को नहीं मिल पाएगी जैविक खाद ।
Sugarcane leaves are being collected for free from the fields, the land will not be able to get organic manure. हरिप्रसाद गोहेआमला/बैतूल ! एक तरफ सरकार खेतों में नरवाई जलाने पर पाबंदी लगाकर किसानों को फसल के अवशेष से जैविक खाद बनाने और भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है, वहीं दूसरी ओर बैतूल जिले में एक कंपनी के द्वारा किसानों के खेतों से गन्ने की सूखी पत्तियां बटोरने का काम किया जा रहा है। इससे खेतों में सूखी पत्तियां ही शेष नहीं रहती हैं जिससे न तो जैविक खाद बन पाएगी और न ही जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी। हद तो यह है कि कृषि विभाग का अमला इसकी जानकारी होने के बाद भी आंखे बंद किए बैठा नजर आ रहा है। उन्नत किसानों की मानें तो किसान गन्ने की सूखी पत्तियों को मल्चर की मदद से बारीक कर मिट्टी में मिला देते थे जिससे वह सड़ने के बाद जैविक खाद में बदल जाती थी और किसानों को फसलों से बेहतर पैदावार मिल जाती थी। अब निजी कंपनी के द्वारा किसानों को मुफ्त में खेत साफ कर देने का लालच दिखाकर गन्ने की पत्तियों को बटोरकर बंडल बनाने का काम किया जा रहा है।कंपनी के द्वारा जिले के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यह कार्य प्रारंभ किया गया है और जगह-जगह गन्ने की पत्तियों के बंडल जमा कर रखे गए हैं।बारूद का काम कर रहे इन बंडलों में आग लगने की घटनाएं भी होने लगी हैं। गत दिवस मुलताई तहसील के ग्राम साईंखेड़ा में राहुल साहू के खेत में तथा गोलू मांकोड़े के घर के समीप रखे सूखी पत्तियों के बंडल में आग लग गई। घटना को लेकर ग्रामीणों ने प्रशासन को आवेदन देकर शिकायत दर्ज कराई है और भविष्य में बड़ी अनहोनी की आशंका जताई है। बताया जा रहा है गन्ने का कचरा एक कंपनी द्वारा स्टाक किया गया था। हैरानी की बात यह रही कि घटना के बाद कंपनी का कोई भी कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। आग इतनी तेजी से फैल रही थी कि आसपास के घरों और खेतों को नुकसान पहुंचने का खतरा बन गया था। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि यदि कोई कंपनी गांव या निजी भूमि पर ज्वलनशील कचरा या डस्ट रखती है, तो उसकी सुरक्षा, निगरानी और नियमित निरीक्षण की पूरी जिम्मेदारी कंपनी की हो। शुगर मिल के प्रयास से सुधर रहीं जमीनें:जिले में गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में शुगर मिलों के प्रबंधन की ओर से अनुदान पर गन्ने की सूखी पत्तियों को मल्चिंग करने वाले उपकरण दिलाए गए हैं। इनसे किसान और युवाओं को नया राेजगार भी मिल रहा है वहीं किसानों को खेतों में आग लगाने की बजाय मल्चिंग कराने पर शुगर मिलों के द्वारा किराए में 50 प्रतिशत की छूट भी दी जाती है। इसका ही नतीजा है कि पिछले करीब पांच वर्ष से जिले के गन्ना उत्पादक किसान कटाई के बाद गन्ने के खेतों में अवशेषों को अाग के हवाले न करते हुए मल्चिंग कर जैविक खाद के लिए बिखरा रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता, नमी संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिल रही है। जागरूक किसानों का कहना है कि निजी कंपनियों के द्वारा गन्ने की सूखी पत्ती का संग्रह किया जाना न केवल किसानों के हितों के विरुद्ध है, बल्कि शासन द्वारा प्रोत्साहित सतत कृषि और पर्यावरण संरक्षण प्रयासों को भी सीधी क्षति पहुंचा रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता, जैविक कार्बन स्तर और जल संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित कंपनियों व एजेंसियों की गतिविधियों की तत्काल जांच कराई जाए, बिना वैधानिक अनुमति फसल अवशेष संग्रह पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाए और किसानों को क्षति पहुंचाने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए आवश्यक प्रशासनिक आदेश जारी किए जाएं। गन्ने की पत्ती से एक हेक्टेयर में बनती है पांच टन जैविक खाद:जिले में जैविक खेती कर गन्ने की फसल लगाने वाले किसानों का मानना है कि एक हेक्टेयर खेत से 7.5-10 टन सूखे पत्ते उपलब्ध होते हैं। इन्हें मल्चिंग कर खेत की मिट्टी में मिलाने से 5 टन के करीब जैविक खाद प्राप्त होता है।इससे फसल में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती है और पैदावार भी बढ़ती है।