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कलकत्ता हाईकोर्ट के 25000 नियुक्तियों को रद्द करने वाले फैसले को एसी ने रखा बरकरार

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें 2016 की शिक्षक और गैर-शिक्षक भर्ती में हुई करीब 25000 नियुक्तियों को रद्द कर दिया गया था। यह मामला बहुचर्चित ‘स्कूल जॉब्स फॉर कैश’ घोटाले से जुड़ा है, जिसमें भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेरफेर और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति पीवी संजीव कुमार की पीठ ने कहा कि पूरी भर्ती प्रक्रिया धांधली और फर्जीवाड़े से दूषित थी, जिससे इसकी वैधता और विश्वसनीयता खत्म हो गई। अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा, “हमने मामले के तथ्य देखे हैं। पूरी चयन प्रक्रिया हेरफेर और धोखाधड़ी से दूषित है। कोई कारण नहीं है कि हम इसमें हस्तक्षेप करें। जो उम्मीदवार इस प्रक्रिया के तहत भर्ती हुए थे, उन्हें हटाया जाना चाहिए क्योंकि यह नियुक्तियां धोखाधड़ी के माध्यम से हुई थीं।” नियुक्त कर्मियों को अब तक मिले वेतन की वापसी नहीं करनी होगी हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक नियुक्त हुए उम्मीदवारों को अपने वेतन को लौटाने की जरूरत नहीं होगी। शीर्ष अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर नई भर्ती प्रक्रिया पूरी की जाए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “नई चयन प्रक्रिया में उन उम्मीदवारों के लिए कुछ छूट दी जा सकती है जो इस घोटाले से अछूते हैं।” क्या है ‘स्कूल जॉब्स फॉर कैश’ घोटाला? यह घोटाला पश्चिम बंगाल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 2016 में हुई भर्ती से जुड़ा है। इस परीक्षा में 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने भाग लिया था, लेकिन बाद में यह आरोप लगा कि OMR शीट्स का गलत मूल्यांकन किया गया और कई अपात्र उम्मीदवारों को गलत तरीके से नौकरी दी गई। कलकत्ता हाईकोर्ट ने अप्रैल 2024 में इन सभी 25,000 नियुक्तियों को अवैध ठहराते हुए उन्हें रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि यह स्पष्ट नहीं है कि 23 लाख उत्तर पुस्तिकाओं में से किन-किन की जांच सही तरीके से की गई थी, इसलिए सभी की दोबारा जांच होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने सभी नियुक्त कर्मचारियों को अब तक मिले वेतन को लौटाने का आदेश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं 126 अपीलें इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कुल 126 अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें से एक पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से थी। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने केवल मौखिक दलीलों के आधार पर, बिना किसी हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिए, नियुक्तियों को रद्द कर दिया। सरकार ने कहा था कि यह फैसला स्कूलों में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की कमी को जन्म देगा। घोटाले में शामिल नेताओं और अधिकारियों की गिरफ्तारी इस भर्ती घोटाले में कई बड़े नाम फंसे हुए हैं। इसमें पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक माणिक भट्टाचार्य और जीवन कृष्ण साहा को गिरफ्तार किया गया है। इनके अलावा निलंबित टीएमसी नेता शांतनु कुंडू और कुन्तल घोष भी इस घोटाले में जेल में हैं। CBI जारी रखेगी जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) आगे भी जारी रखेगा। अदालत के इस फैसले से पश्चिम बंगाल सरकार की बड़ी किरकिरी हुई है और भर्ती घोटाले से जुड़े हजारों उम्मीदवारों के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल हुआ पास, पक्ष में 288; विरोध में 232 वोट पड़े

नई दिल्ली बुधवार को देर रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने लोकसभा में सफलतापूर्वक वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 को पारित करा लिया। आज इसे राज्यसभा में पारित कराने के लिए पेश किया जाएगा। 543 सदस्यों वाले लोकसभा में बिल के पक्ष में 288 मत पड़े। वहीं, इसके विरोध में 233 वोट डाले गए। इसके बाद सदन ने दोनों ही बिल को मंजूरी दे दी। राज्यसभा की जहां तक बात है तो यहां कुल 236 सदस्य हैं। बिल को पास कराने के लिए डाले गए मतों में से सर्वाधिक मतों की आवश्यकता होगी। इन दिनों भाजपा यहां सबसे बड़ी पार्टी है। उसके पास कुल 98 सांसद हैं। एनडीए की जहां तक बात करें तो उसके पास 125 सांसद हैं। भाजपा के अलावा जेडीयू के 4, अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के 3 और टीडीपी के 2 सांसद शामिल हैं। नंबर गेम को देखते हुए एनडीए को इस सदन में भी इस बहुचर्चित संशोधन विधेयक को पारित कराने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि एनडीए ने लोकसभा में एकजुटता दिखाया है। राज्यसभा में क्या है नंबर गेम? संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा की बात करें तो यहां सदन की मौजदा स्ट्रेंथ 236 सदस्यों की है. इसमें बीजेपी का संख्याबल 98 है. गठबंधन के लिहाज से देखें तो एनडीए के सदस्यों की संख्या 115 के करीब है. छह मनोनीत सदस्यों को भी जोड़ लें जो आमतौर पर सरकार के पक्ष में ही मतदान करते हैं तो नंबरगेम में एनडीए 121 तक पहुंच जा रहा है जो विधेयक पारित कराने के लिए जरूरी 119 से दो अधिक है. कांग्रेस के 27 और इंडिया ब्लॉक के अन्य घटक दलों के 58 सदस्य राज्यसभा में हैं. कुल मिलाकर विपक्ष के पास 85 सांसद हैं. वाईएसआर कांग्रेस के नौ, बीजेडी के सात और एआईएडीएमके के चार सदस्य राज्यसभा में हैं. छोटे दलों और निर्दलीय मिलाकर तीन सदस्य हैं जो न तो सत्ताधारी गठबंधन में हैं और ना ही विपक्षी गठबंधन में. किरेन रिजिजू ने 8 अगस्त 2024 को ये बिल लोकसभा में पेश किया था, जिसे विपक्ष के हंगामे के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया था. जगदंबिका पाल की अगुवाई वाली जेपीसी की रिपोर्ट के बाद इससे संबंधित संशोधित बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी थी. सत्तापक्ष का कहना है कि वक्फ संशोधन बिल के माध्यम से इसकी संपत्तियों से संबंधित विवादों के निपटारे का अधिकार मिलेगा. वक्फ की संपत्ति का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा और इससे मुस्लिम समाज की महिलाओं को भी मदद मिल सकेगी. बता दें कि इससे पहले वक्फ संशोधन बिल लोकसभा से पारित हो गया है. वक्फ संशोधन बिल पर लोकसभा में वोटिंग हुई, जिसमें 464 कुल वोटों में से 288 पक्ष में और 232 विरोध में रहे. लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पर 12 घंटे से ज्यादा समय तक बहस चली. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और विपक्ष के सांसदों ने अपने-अपने पक्ष रखे. अब यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाएगा और फिर राष्ट्रपति के पास अप्रूवल के लिए भेजा जाएगा. इससे पहलो केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए सरकार के इस कदम को मुस्लिम विरोधी बताने के कई विपक्षी सदस्यों के दावों को खारिज करते हुए कहा कि इस विधेयक को मुसलमानों को बांटने वाला बताया जा रहा है, जबकि सरकार इसके जरिए शिया, सुन्नी समेत समुदाय के सभी वर्गों को एक साथ ला रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार तो देश में सबसे छोटे अल्पसंख्यक समुदाय पारसी को भी बचाने के लिए प्रयास कर रही है। रिजिजू ने कहा, ‘‘विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकता है, लेकिन यह कहना कि हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है, सही नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं खुद अल्पसंख्यक हूं और कह सकता हूं कि भारत से ज्यादा अल्पसंख्यक कहीं सुरक्षित नहीं हैं। हर अल्पसंख्यक समुदाय शान से इस देश में जीवन जीता है।’’ उन्होंने विपक्षी सदस्यों को आड़े हाथ लेते हुए कहा, ‘‘सदन में इस तरह देश को बदनाम करना….आने वाली पीढ़ियां आपको माफ नहीं करेंगी।’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि विधेयक के पारित होने के बाद देश के करोड़ों मुसलमान प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देंगे। रिजिजू के जवाब के बाद सदन ने अनेक विपक्षी सदस्यों के संशोधनों को खारिज करते हुए 232 के मुकाबले 288 मतों से वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को पारित किया। सदन ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 को भी ध्वनिमत से मंजूरी दे दी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल भाजपा के सहयोगी दलों जदयू, तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), जनसेना और जनता दल (सेक्यूलर) ने वक्फ (संशोधन) विधेयक का समर्थन किया। झारखंड में भाजपा की सहयोगी आजसू ने भी विधेयक का समर्थन किया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक एवं अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक को असंवैधानिक और मुसलमानों की जमीन हड़पने वाला बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया। ऐसे में ये भी सवाल हैं कि क्या एक बिल से मोदी सरकार ने देश में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का गणित बदल दिया? क्या एक बिल से मोदी सरकार ने दिखाया कि मुस्लिमों को डराकर वोट की सियासत नहीं चलेगी? क्या एक बिल ने बता दिया कि मुस्लिमों के हित में बदलाव का मतलब सेक्युरिज्म का विरोध नहीं होता? क्या सरकार ने दिखा दिया कि सीटें घटने से संसद में आक्रामक फैसले लेने की गति नहीं घटी है? क्या वक्फ बिल पर मुहर के साथ अब देश में सियासत की नई सेक्युलरिज्म देखी जाएगी? फैसला लेने में पीएम मोदी का कोई सानी नहीं विपक्ष को ये लगता रहा होगा कि बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के सांसदों के भरोसे चलती सरकार वक्फ पर फैसला लेने में हिचकिचाएगी, लेकिन 240 सीट के साथ भी संसद में बीजेपी वैसी ही दिखी जैसे 303 सीट के साथ रही थी. 2019 में जब मोदी सरकार दूसरी बार सत्ता में आई तो 6 महीने के भीतर सरकार ने तीन तलाक, आर्टिकल 370 से आजादी और CAA कानून तीनों को पास करा दिया. तब बीजेपी के पास अपने दम पर 303 सीट का बहुमत था. अबकी बार जब … Read more

बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अलग देश की चर्चा ने जोर पकड़ा, हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों को संरक्षण मिलेगा

ढाका बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं हालिया समय में लगातार बढ़ी हैं। मोहम्मद यूनुस की सरकार में खासतौर से बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा भारत और विश्व के लिए मुद्दा बन रही है। इस समस्या से निपटने के लिए बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अलग देश की चर्चा ने जोर पकड़ा है। इससे एक ओर बांग्लादेशी हिंदुओं को नया देश मिल जाएगा तो वहीं भारत के सामने पूर्वोत्तर में सुरक्षा की चुनौती कम हो जाएगी। इस योजना में बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन और चटगांव डिवीजन को अलग करने का प्रस्ताव है। मोहम्मद यूनुस ने हाल ही में एक बयान में चिकन नेक के भारत की कमजोर कड़ी होने की ओर भी इशारा किया है। स्वराज्य वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में इस संभावना पर बात की है। स्वराज्य वेबसाइट के मुताबिक, रंगपुर और चटगांव को अलग करने से बांग्लादेश के हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों के लिए सुरक्षित घर बनाया जा सकता है। साथ ही पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर की समस्या भी हल हो जाएगी। इस योजना के स अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए आंदोलन को प्रोत्साहित करने और सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार रहने की बात कही गई है। इस योजना के बारे में कहा गया है कि यह विचार भले ही अभी काल्पनिक लगे लेकिन 1971 में बांग्लादेश बन सकता है तो ये भी संभव हो सकता है। पूर्वोत्तर की समस्या और बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत के सात राज्य गंभीर भौगोलिक चुनौती का सामना करते रहे हैं। यह क्षेत्र देश के बाकी हिस्सों से एक पतली पट्टी से जुड़ा हुआ है, जिसे ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर कहा जाता है। यह कॉरिडोर लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा है, जो बांग्लादेश, नेपाल और भूटान से घिरा हुआ है। चीन के कब्जे वाला तिब्बत भी इसके करीब है। ऐसे में ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर की सुरक्षा चिंता का विषय रही है। बांग्लादेश के कट्टरपंथी भी चिकननेक पर कब्जे की बात कहते रहे हैं। बांग्लादेश में हालिया महीनों में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अल्पसंख्यकों के पास देश छोड़ने या इस्लाम में परिवर्तित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। इन समस्याओं का समाधान बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए एक अलग घर बनाना है। बांग्लादेश में 1.3 करोड़ हिंदू हैं, जो अपने लिए एक अलग घर की मांग कर रहे हैं। बांग्लादेशी हिंदुओं की समस्या का हल बांग्लादेश के अल्पसंख्यक शरण के लिए भारत का रुख करते रहे हैं। हालांकि भारत में प्रवास समाधान नहीं है। ये समाधान बांग्लादेश से काटकर उनके लिए एक अलग घर बनाना है। बांग्लादेश के दो प्रांत- उत्तरी रंगपुर डिवीजन और इसके दक्षिणपूर्वी चटगांव डिवीजन का एक बड़ा हिस्सा देश के उत्पीड़ित हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आदर्श घर होगा। रंगपुर के पश्चिम में बंगाल के उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर जिले हैं। उत्तर-पश्चिम में दार्जिलिंग जिले का सिलीगुड़ी उप-मंडल है। उत्तर में जलपाईगुड़ी और कूचबिहार जिले हैं और पूर्व में असम के धुबरी और दक्षिण सालमारा जिले हैं। साथ ही मेघालय के पश्चिम और दक्षिण पश्चिम गारो हिल्स हैं। यह तीन तरफ से भारतीय क्षेत्र से घिरा हुआ है। रंगपुर को भारत में शामिल करने से ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर से उत्पन्न चुनौतियों का समाधान हो जाएगा। इससे यह कॉरिडोर कम से कम 150 किलोमीटर चौड़ा हो जाएगा। इसी तरह चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (CHT) जिसमें चटगांव डिवीजन के तीन जिले खगराछड़ी, रंगमती और बंदरबन हैं। ये त्रिपुरा और मिजोरम की सीमा से लगे हैं।

सिलक्यारा सुरंग की खुदाई का कार्य अंतिम चरण में, सब कुछ योजना के अनुसार चला तो मात्र पंद्रह दिनों में सुरंग आर-पार हो जाएगी

बड़कोट बहुचर्चित सिलक्यारा सुरंग की खुदाई का कार्य अंतिम चरण में है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चला तो मात्र पंद्रह दिनों में सुरंग आर-पार हो जाएगी। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, बुधवार को लोहे की सरिया पोल गांव से सिल्क्यारा की दिशा में आर-पार हो चुकी है। इससे यह संभावना बढ़ गई है कि 15 अप्रैल तक सुरंग पूरी तरह से आरपार हो जाएगी। बता दें कि केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण चारधाम सड़क परियोजना में निर्माणाधीन 4.5 किमी लंबी सिल्क्यारा-पोलगांव सुरंग वर्ष 2023 में भूस्खलन के कारण सुर्खियों में रही थी। उस दौरान सुरंग के सिलक्यारा मुहाने के पास भूस्खलन से 41 श्रमिक सुरंग के फंस गए थे, जिन्हें 17 दिनों तक चले कठिन रेस्क्यू आपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला गया था।   ढाई से तीन महीने तक ठप रहा था काम इस हादसे के बाद सुरंग निर्माण कार्य लगभग ढाई से तीन महीने तक पूरी तरह ठप रहा। गत वर्ष 23 जनवरी 2024 को केंद्र सरकार ने कार्यदायी संस्था एनएचआईडीसीएल (राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड) को सुरंग का निर्माण दोबारा शुरू करने के निर्देश दिए। निर्माण एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, बड़कोट छोर से बुधवार को सरिया पूरी तरह आर-पार हो चुकी है। अब 15 से 20 अप्रैल के बीच सुरंग पूरी तरह से आर-पार होने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, सुरंग की फिनिशिंग और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा करने में लगभग डेढ़ से दो वर्ष का समय लग सकता है।  इन कार्यों में सुरंग के अंदर मध्य में बनाई जा रही दीवार का निर्माण, सिल्क्यारा छोर पर पुल और दीवार निर्माण, तथा दोनों छोरों पर कंट्रोल रूम का निर्माण शामिल है। 150 करोड़ की लागत से होंगे इलेक्ट्रो मैकेनिकल कार्य सुरंग में लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से इलेक्ट्रो-मैकेनिकल कार्य किए जाएंगे। इनमें इटली से मंगवाया गया फायर सप्रेशन सिस्टम भी लगाया जाएगा। यह सिस्टम हजारों नोजल से लैस होगा, जो सेंसर के माध्यम से तापमान में वृद्धि या आग लगने की स्थिति में स्वतः सक्रिय होकर पानी की फुहारों से आग को फैलने से रोकेगा। साथ ही, सुरंग के दोनों किनारों पर बनाए जा रहे कंट्रोल रूम से ट्रैफिक, कैमरे, सेंसर और फायर सप्रेशन सिस्टम को स्काडा (पर्यवेक्षी नियंत्रण और डेटा अधिग्रहण तकनीक) के माध्यम से नियंत्रित किया जाएगा।

देश धर्मशाला नहीं तो जेल भी नहीं है, बीते 10 साल से देश के लोगों को एक तरह से जेल में रखा गया है: संजय राउत

नई दिल्ली राज्यसभा में इमीग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल (आप्रवास और विदेशियों विषयक विधेयक)-2025 को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बुधवार को सदन के समक्ष विचार के लिए रखा। विधेयक पर बोलते हुए शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा कि देश को धर्मशाला बनाना किसी का मकसद नहीं है, लेकिन अगर यह देश धर्मशाला नहीं है तो यह देश जेल भी नहीं है। बीते 10 साल से देश के लोगों को एक तरह से जेल में रखा गया है। अब जो विदेश से लोग आएंगे, वह भी वैध वीजा और पासपोर्ट पर, यह कानून उन्हें भी शायद जेल में रखना चाहता है। संजय राउत ने कहा कि जिस तरह से इस विधेयक में बहुत से प्रावधान हैं, उससे धीरे-धीरे टूरिस्ट भी भारत में आना बंद करेंगे। हम नहीं चाहते कि कोई भी देश में अवैध तरीके से रहे, चाहे वह बांग्लादेशी हो, रोहिंग्या हो, या फिर अमेरिकन और यूरोपियन। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में अवैध तरीके से रह रहे भारतीयों को सेना के विमान में हाथों-पैरों में बेड़िया लगाकर वापस भेजा। यदि कोई अमेरिकी भारत में अवैध तरीके से रह रहा हो, तो उसे भी इसी तरह से बेड़िया लगाकर वापस भेजा जाए। पूरे देश में तीन करोड़ से ज्यादा बांग्लादेशी और रोहिंग्या हैं, उन्हें निकालना जरूरी है। यह मुहिम सबसे पहले मुंबई में हमने शुरू की थी। इस विधेयक का सेक्शन 7 यह कहता है कि जो विदेशी यहां आएगा, केंद्र सरकार यह तय करेगी कि वह किस होटल में ठहरेगा, कहां घूमेगा, कहां जाएगा। राउत ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा लाया गया यह विधेयक ऐसा है, जिसके तहत यदि कोई विदेशी डेलिगेशन, जर्नलिस्ट या डिप्लोमेट भारत आता है और वह देश में किसी प्रमुख नेता से मिलना चाहता है, सोनिया गांधी से, राहुल गांधी से, उद्धव ठाकरे से मिलना चाहता है, तो सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी। यदि सरकार अनुमति देती है, तो मुलाकात कर सकेंगे और यदि अनुमति नहीं मिली, तो यह मुलाकात नहीं हो सकेगी। उन्होंने सदन में कहा कि देश में जो आतंकवादी आए हैं, वे किसी वैध पासपोर्ट पर नहीं आए हैं। कसाब किसी वैध पासपोर्ट पर नहीं आया था। कसाब और उसके साथ जो टेररिस्ट आए थे, वे समुद्र मार्ग से अवैध तरीके से आए और किसी को पता भी नहीं चला। कानून को यदि आप मजबूत करना चाहते हैं, तो कीजिए, लेकिन इस विधेयक को स्थाई समिति के पास वापस भेजकर इस पर चर्चा की जानी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा ने कहा कि पुराने आव्रजन कानूनों के तहत देश की सीमाओं की रक्षा करने में, देश में घुसपैठ को रोकने में काफी बाधाएं आती थीं। देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। नए विधेयक में प्रमुख रूप से भारत में प्रवेश, प्रवास के लिए यात्रा दस्तावेज, वैध वीजा की अनिवार्य आवश्यकता, प्रवेश से इनकार आदि विधेयक का एक हिस्सा हैं। भारत को चिकित्सा, शैक्षणिक और विनिर्माण गतिविधियों का केंद्र बनाने, सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों के अनुरूप विभिन्न गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु, सही उद्देश्य के लिए विदेशियों की भारत यात्रा को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। इसका प्रावधान इस विधेयक में किया गया है। भारत ने 169 देशों के नागरिकों के लिए ई-वीजा की शुरुआत की है। इस संबंध में आवश्यक है कि अधिकारियों को विदेश से आ रहे लोगों के दस्तावेज की जांच करने का अधिकार दिया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा होने पर अधिकारियों को अधिकार दिया गया है कि वे विदेशियों को देश में प्रवेश से वंचित कर सकें।

सर्वे में अधिकांश यूक्रेनवासियों की राय- ट्रंप शासन यूक्रेन के लिए नकारात्मक

कीव यूक्रेनवासियों का मानना ​​है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल का यूक्रेन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जारी एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग तीन चौथाई (73 प्रतिशत) यूक्रेनी नागरिकों ने यह जानकारी जारी की। कीव इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशियोलॉजी की ओर से यह सर्वे कराया गया। सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 19 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने ट्रंप के राष्ट्रपति बनने को यूक्रेन के लिए लाभकारी माना। बाकी बचे उत्तरदाता इस मुद्दे पर कोई राय नहीं रखते थे। जब पूछा गया कि क्या ट्रंप के शासनकाल की सहायता से यूक्रेन न्यायपूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है, तो 55 फीसदी लोगों ने नकारात्मक उत्तर दिया, 18 ने सकारात्मक। 21 प्रतिशत ने कहा कि उनका मानना ​​है कि कोई भी शांति समझौता केवल आंशिक रूप से ही न्यायपूर्ण होगा। यह सर्वे 12 से 22 मार्च तक 1,326 वयस्कों के साथ टेलीफोन इंटरव्यू के माध्यम से आयोजित किया गया था। यह सर्वेक्षण दिसंबर 2024 में हुए इसी प्रकार के सर्वेक्षण की तुलना में जनता की राय में बदलाव को दर्शाता है। उसमें सामने आया था कि कि 54 प्रतिशत यूक्रेनवासी ट्रंप के आगामी राष्ट्रपति बनने के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे, 21 प्रतिशत लोग इसे नकारात्मक रूप से देखते थे, जबकि 25 प्रतिशत लोग कोई राय नहीं रखते थे। 20 जनवरी 2025 को राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप लगातार यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बात कर रहे हैं। हालांकि उनका रुख कीव के प्रति कठोर जबकि मॉस्को के प्रति काफी नरम रहा है। उनके इस रुख ने कीव और यूरोपीय देशों को चिंतित कर दिया है। अमेरिका ने 25 मार्च को यूक्रेन और रूस के साथ समुद्र में और ऊर्जा लक्ष्यों पर हमले रोकने के लिए अलग-अलग समझौते किए। वाशिंगटन ने मॉस्को के खिलाफ कुछ प्रतिबंधों को हटाने के लिए दबाव बनाने पर सहमति व्यक्त की। वाशिंगटन ने कहा समझौतों की घोषणा करते हुए कहा कि सभी पक्ष, ‘स्थायी शांति’ की दिशा में काम करना जारी रखेंगे। व्हाइट हाउस ने कहा कि उन्होंने एक-दूसरे के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमला करने पर पहले से सहमत प्रतिबंध को लागू करने के ‘तरीके विकसित करने’ की भी प्रतिबद्धता जताई।

दिशा सालियान मामला : बॉम्बे हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिका की अनुशंसित बेंच समीक्षा करे

मुंबई बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को सेलिब्रिटी मैनेजर दिवंगत दिशा सालियान की मौत से संबंधित मामले को लेकर रजिस्ट्री स्पेशल बेंच को सौंपने का निर्देश दिया। बुधवार को दिशा के पिता की दायर रिट याचिका पर सुनवाई होनी थी। याचिका में उनकी बेटी की मौत की सीबीआई जांच और विधायक आदित्य ठाकरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। सुनवाई जस्टिस रेवती और मोहिते ढेरे के समक्ष होनी थी, लेकिन अब मामला दूसरी बेंच के पास जाएगा। दिशा सालियान की कानूनी टीम ने जोर देकर कहा कि यह मामला महिलाओं के खिलाफ अपराध के अंतर्गत आता है, इसलिए जस्टिस सारंग कोतवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के समक्ष जाना चाहिए। इसके बाद कोर्ट ने रजिस्ट्री को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिका की अनुशंसित बेंच समीक्षा करे। मामले को लेकर दिशा सालियान के वकील नीलेश ओझा ने बताया, “कोर्ट ने कहा है कि मामला महिलाओं के खिलाफ अपराध के अंतर्गत आता है, इसकी सुनवाई जस्टिस सारंग कोतवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के सामने होनी चाहिए। हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को उचित बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत की ओर से अगली सुनवाई के लिए कोई तारीख नहीं दी गई है।” दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की दायर याचिका में बेटी की मौत की नए सिरे से जांच और कुछ पावरफुल लोगों से पूछताछ की मांग शामिल है। याचिका में उन्होंने दावा किया था कि दिशा का बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। खास बात यह है कि सतीश सालियान ने पांच साल पहले जोर देकर कहा था कि उनकी बेटी का ना तो बलात्कार किया गया और ना हत्या हुई। जब मीडिया ने इस बारे में सवाल किया, तो सतीश सालियान के वकील नीलेश ओझा ने कहा, “कुछ राजनीतिक नेताओं और पुलिस ने परेशान पिता को बरगलाया, जो एक प्रमुख राजनेता के बेटे को बचाना चाहते थे।” नीलेश ओझा ने 25 मार्च को दिशा की मौत के मामले में एक नई एफआईआर दर्ज करवाई थी। ओझा ने कहा था कि पुलिस कमिश्नर के पास लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है और एफआईआर में आदित्य ठाकरे, डिनो मोरिया और सूरज पंचोली का नाम दर्ज है। ओझा के मुताबिक, “आदित्य ठाकरे, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली और उनके बॉडीगार्ड परमबीर सिंह, सचिन वाजे और रिया चक्रवर्ती भी एफआईआर में आरोपी हैं।” उन्होंने दावा किया था कि परमबीर सिंह इस मामले को छिपाने के मुख्य मास्टरमाइंड हैं। परमबीर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और आदित्य ठाकरे को बचाने के लिए झूठ गढ़ा।

रूस और यूक्रेन के बीच जारी बीते तीन साल से जंग जारी, रूसी सैनिक की पत्नी ने पति को दी थी सलाह, कोर्ट ने सुनाई सजा

रूस रूस और यूक्रेन के बीच जारी बीते तीन साल से जंग जारी है। इस युद्ध के दौरान दोनों पक्षों के हजारों लोगों की मौत हो चुकी है वहीं लाखों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। जहां एक तरफ पूरी दुनिया जहां इस जंग के खत्म होने की राह देख रही है वहीं दूसरी तरफ रूस की एक महिला पर अपने ही सैनिक पति को क्रूरता के लिए उकसाने के आरोप लगे हैं। इस महिला ने कथित तौर पर सरहद पर तैनात अपने पति को यूक्रेनी औरतों के साथ बलात्कार की इजाजत दी। इतना ही नहीं महिला ने पति को इसके लिए उकसाया भी। जानकारी के मुताबिक अप्रैल 2022 में यूक्रेन की सुरक्षा सेवा (SSU) ने एक रूसी सैनिक और उसकी पत्नी के बीच एक इंटरसेप्ट की गई बातचीत का ऑडियो जारी किया था। इसमें महिला को अपने पति को यूक्रेनी महिलाओं से बलात्कार करने के लिए प्रोत्साहित करते सुना गया। महिला ने अपने पति से कहा कि वह उन औरतों का बलात्कार कर सकता है बशर्ते वह प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करे। रेडियो लिबर्टी की यूक्रेनी और रूसी सेवाओं के पत्रकारों ने दंपति की पहचान ओल्गा और रोमन बाइकोवस्की के रूप में की। मामला सामने आने के बाद रूसी महिला को युद्ध के कानूनों का उल्लंघन करने के संदेह का नोटिस दिया गया। उसे अंतरराष्ट्रीय सूची में वांटेड की लिस्ट में भी डाल दिया गया। यूक्रेनी कानून प्रवर्तन अधिकारियों की जांच के बाद दिसंबर 2022 में अदालत में ओल्गा बाइकोव्स्काया के खिलाफ मामला दायर किया गया। अब महिला को युद्ध के कानूनों का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया है और कोर्ट ने उसे 5 साल की जेल की सजा सुनाई है।

मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट ने बताया कि मंदिर की कुल आय 133 करोड़ तक पहुंची, तोड़े सारे रिकॉर्ड

मुंबई मुंबई का प्रसिद्ध श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक कमाई को लेकर चर्चा में है। मंदिर ट्रस्ट ने बताया कि हाल ही में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष 2024-25 में मंदिर की कुल आय 133 करोड़ तक पहुंच गई, जो पिछले वित्तीय वर्ष (2023-24) की तुलना में 16% अधिक है। मंदिर की कमाई में सबसे बड़ा योगदान श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान और चढ़ावे का रहा। इसके अलावा, पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों से 20 करोड़ की आय हुई। मंदिर को विभिन्न स्रोतों से आय प्राप्त होती है, जिनमें दान पेटियां, ऑनलाइन भुगतान, धार्मिक अनुष्ठान, प्रसाद बिक्री और सोना-चांदी की नीलामी शामिल हैं। ट्रस्ट के एक अधिकारी के अनुसार, पिछले वर्ष की तुलना में प्रसाद में इस्तेमाल होने वाले लड्डू और नारियल वड़ी की बिक्री में 32% की वृद्धि दर्ज की गई। मंदिर प्रशासन रोजाना करीब 10,000 लड्डू भक्तों को वितरित करता है। गुड़ी पड़वा पर सोना-चांदी से रिकॉर्ड कमाई ट्रस्ट के अनुसार, इस वर्ष गुड़ी पड़वा के अवसर पर सोना-चांदी की नीलामी से रिकॉर्ड 1.33 करोड़ की कमाई हुई, जो पिछले वर्ष के 75 लाख की तुलना में लगभग दोगुनी है। श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर ट्रस्ट की मुख्य कार्यकारी अधिकारी वीणा पाटिल ने बताया कि मंदिर में भक्तों की बढ़ती संख्या और प्रशासनिक सुधारों के कारण आय में यह उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि चालू वित्तीय वर्ष (2025-26) में मंदिर की कुल आय 154 करोड़ तक पहुंच सकती है। दान का समाज कल्याण में उपयोग मंदिर ट्रस्ट अपनी आय का 20% सामाजिक कल्याण कार्यों पर खर्च करता है। इसमें मेडिकल सहायता, डायलिसिस सेंटर का संचालन, 18 प्रकार की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की आर्थिक सहायता जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके अलावा, ट्रस्ट कॉलेज के छात्रों के लिए बुक बैंक सुविधा प्रदान करता है और मंदिर परिसर के पास एक अध्ययन कक्ष भी संचालित करता है। ट्रस्ट उन किसानों के बच्चों की शिक्षा का खर्च भी उठाता है, जिनके परिवार के सदस्य आत्महत्या कर चुके हैं। वीणा पाटिल ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करते हैं कि भक्तों द्वारा दिया गया दान और चढ़ावा समाज के कल्याण के लिए उपयोग किया जाए।” भविष्य में और बढ़ेगी कमाई मंदिर ट्रस्ट को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भक्तों की संख्या में और अधिक वृद्धि होगी, जिससे आय में और भी इजाफा होगा। इसके साथ ही, प्रशासनिक सुधारों और तकनीकी सुविधाओं के विस्तार से मंदिर की सेवाओं को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाया जा रहा है।

भारत सरकार ने गांवों में डिजिटल बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए कदम उठाए

नई दिल्ली भारतनेट परियोजना को देश भर में मांग के आधार पर सभी ग्राम पंचायतों (जीपी) और जीपी से परे गांवों को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वित किया जा रहा है। उपयोगकर्ताओं के लिए गुणवत्ता वाले इंटरनेट को सुनिश्चित करने के लिए एक विश्वसनीय नेटवर्क प्रदान करने के लिए, 04.08.2023 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित संशोधित भारतनेट कार्यक्रम में अन्य बातों के साथ-साथ रिंग आर्किटेक्चर में मौजूदा भारतनेट नेटवर्क को अपग्रेड करने, भारतनेट उद्यमियों के माध्यम से नेटवर्क के उपयोग पर ध्यान केंद्रित करने, सेवा स्तर समझौते (एसएलए), समर्पित नेटवर्क संचालन केंद्र आदि के आधार पर पूरे नेटवर्क के संचालन और रखरखाव के लिए संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत बीएसएनएल को एकल परियोजना प्रबंधन एजेंसी (पीएमए) के रूप में नियुक्त करने के प्रावधान हैं। भारतनेट के अंतर्गत प्रदान किए गए एफटीटीएच कनेक्शनों का राज्य-संघ राज्य क्षेत्रवार विवरण अनुलग्नक-I में संलग्न है। भारत सरकार ने 17 जनवरी, 2025 को राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन 2.0 का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य डिजिटल संचार बुनियादी ढांचे के तेजी से विस्तार को बढ़ावा देना, डिजिटल विभाजन को पाटना और डिजिटल सशक्तिकरण और समावेशन को बढ़ावा देना, सभी के लिए हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड और सार्थक कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने देश भर में 6 करोड़ ग्रामीण परिवारों (प्रति परिवार एक व्यक्ति) में डिजिटल साक्षरता सुनिश्चित करने/प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) शुरू किया। इस योजना को देश भर में ग्राम पंचायत स्तर पर मौजूद कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के माध्यम से CSC ई-गवर्नेंस सर्विसेज इंडिया लिमिटेड द्वारा लागू किया गया था। 6 करोड़ के मुकाबले 6.39 करोड़ व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया गया। योजना के तहत प्रशिक्षण और प्रमाणन आधिकारिक तौर पर 31 मार्च, 2024 को संपन्न हुआ। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की उपलब्धि अनुलग्नक-II में दी गई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने अपने 79वें दौर (जुलाई, 2022 से जून, 2023) में ‘व्यापक वार्षिक मॉड्यूलर सर्वेक्षण’ (सीएएमएस) आयोजित किया। सर्वेक्षण के अनुसार, 15-24 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में से लगभग 78.4 प्रतिशत ने ‘संदेश भेजने (जैसे, ई-मेल, संदेश सेवा, एसएमएस) को संलग्न फ़ाइलों (जैसे, दस्तावेज़, चित्र, वीडियो) के साथ’ के कौशल के निष्पादन की सूचना दी। इसके अलावा, लगभग 94.2 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों और लगभग 97.1 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास टेलीफोन और/या मोबाइल फोन है। उक्त रिपोर्ट से, ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्ट-फोन के उपयोग, इंटरनेट की पहुंच और डिजिटल जुड़ाव में उल्लेखनीय वृद्धि को देखते हुए, योजना के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त किया गया। पीएमजीदिशा (PMGDISHA) योजना का प्रभाव विश्लेषण तीन एजेंसियों अर्थात् आईआईटी दिल्ली, सामाजिक विकास परिषद (सीएसडी) और भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) द्वारा किया गया था। मूल्यांकन रिपोर्ट का सार यह है कि पीएमजीदिशा अपने बड़े पैमाने और दूर से संचालित परीक्षाओं के उपयोग के कारण एक अनूठी योजना है। पीएमजीदिशा के तहत प्रदान किए गए प्रशिक्षण का सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) और डिजिटल मीडिया के अन्य रूपों को अपनाने पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। इसने अपने प्रतिभागियों को विभिन्न उद्देश्यों के लिए सूचना और सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला तक उनकी पहुँच को सक्षम करके लाभान्वित किया है, जिससे देश में समग्र डिजिटल विभाजन को कम करने में मदद मिली है। सरकार ने 17 दिसंबर 2019 को राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन (NBM) की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य डिजिटल संचार अवसंरचना के तेजी से विकास को सक्षम बनाना, डिजिटल सशक्तिकरण और समावेशन के लिए डिजिटल विभाजन को पाटना; और सभी के लिए ब्रॉडबैंड तक सस्ती और सार्वभौमिक पहुँच प्रदान करना है। NBM राइट ऑफ़ वे (RoW) मुद्दों की प्रमुख अड़चन को दूर करता है, जिससे देश भर में दूरसंचार अवसंरचना की तेजी से तैनाती संभव हो पाती है।

1990 के दशक में अमेरिकी वायुसेना ने सच में ऐसा हथियार बनाने पर विचार किया था, इसका नाम था ‘गे बम’: हुआ खुलासा

वाशिंगटन क्या कोई देश अपने दुश्मनों को युद्ध के मैदान में हराने के लिए उनकी यौन प्राथमिकताओं से छेड़छाड़ करने की योजना बना सकता है? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन 1990 के दशक में अमेरिकी वायुसेना ने सच में ऐसा हथियार बनाने पर विचार किया था। इसका नाम था ‘गे बम’। यह एक ऐसा अजीबोगरीब प्रस्ताव था, जिसके तहत दुश्मन सैनिकों को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करने वाला रसायन छिड़ककर उन्हें युद्ध लड़ने के लायक न छोड़ने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, यह योजना कभी हकीकत में नहीं बदली, लेकिन इसके खुलासे ने दुनियाभर में सनसनी मचा दी। आइए जानते हैं, आखिर क्या था यह विवादित सैन्य प्लान और क्यों यह इतिहास के सबसे अजीब हथियारों में से एक माना जाता है। गुप्त अमेरिकी योजना अमेरिकी रक्षा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, उसकी सेना द्वारा दुश्मन सैनिकों को मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए कई रणनीतियाँ अपनाई गई हैं, लेकिन इनमें से एक योजना सबसे अजीबोगरीब थी—‘गे बम’। यह एक ऐसा प्रस्तावित हथियार था, जिसे दुश्मन सैनिकों के बीच यौन आकर्षण बढ़ाकर उन्हें युद्ध के काबिल न छोड़ने के इरादे से बनाया जाना था। यह चौंकाने वाला खुलासा 1994 में आया, जब अमेरिकी वायुसेना के ‘राइट-पैटरसन एयर फ़ोर्स बेस’ के वैज्ञानिकों ने ‘गैर-घातक हथियारों’ की सूची में इस बम का प्रस्ताव रखा था। उनका दावा था कि इस बम में ऐसे रसायन होंगे, जो पुरुष सैनिकों के बीच यौन आकर्षण बढ़ाकर उनके मनोवैज्ञानिक संतुलन को बिगाड़ देंगे। कैसे काम करता Gay Bomb? ‘गे बम’ का विचार यह था कि इसे दुश्मन सेना के शिविरों में गिराकर वहाँ सेक्सुअल फीलिंग्स को उकसाया जाए, जिससे वे युद्ध पर ध्यान देने के बजाय एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाएं। इससे उनका लड़ने का जज़्बा खत्म हो जाता और अमेरिकी सेना को बिना गोली चलाए जीत मिल जाती। वॉशिंगटन पोस्ट और बीबीसी आर्काइव्स के मुताबिक, इस विचार पर अमेरिका की एयर फोर्स Wright Lab ने एक रिपोर्ट भी तैयार की थी, जो 2004 में सनशाइन प्रोजेक्ट नामक एक वैज्ञानिक निगरानी समूह द्वारा उजागर की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इस बम में फेरोमोन्स जैसे रसायन मिलाए जाने थे, जो सैनिकों की यौन प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते थे। सच्चाई या महज अफवाह? हालांकि, अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस बम को कभी विकसित नहीं किया और इसे एक असफल प्रस्ताव के रूप में खारिज कर दिया गया। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी योजना अधूरी वैज्ञानिक समझ और पूर्वाग्रहों पर आधारित थी। आखिर क्यों आई थी यह योजना? अमेरिका की सेना 1990 के दशक में ऐसे हथियारों की तलाश कर रही थी, जो दुश्मन को मारे बिना ही उन्हें युद्ध के अयोग्य बना दें। इसी दौरान न्यूरोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल हथियारों के रूप में ‘गे बम’ का विचार आया था। ‘गे बम’ के सामने आते ही कई मानवाधिकार संगठनों और एलजीबीटीक्यू+ समुदायों ने इसकी आलोचना की। उनका कहना था कि यह विचार वैज्ञानिक रूप से बेतुका और पूर्वाग्रह से ग्रसित था। अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि किसी रसायन के जरिए लोगों की यौन प्राथमिकताएं बदली जा सकती हैं। इसलिए ‘गे बम’ का विचार यथार्थ से परे था।

भारत में UPI डाउन हो गया है और कई यूजर्स यूपीआई से पेमेंट करने में हो रहे परेशान

नई दिल्ली अगर आपको UPI पेमेंट करने में समस्या आ रही है, तो आप अकेले नहीं है। भारत में UPI डाउन हो गया है और कई यूजर्स यूपीआई से पेमेंट करने में परेशान हो रहे हैं। मनीकंट्रोल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पूरे भारत में यूजर यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन समस्या का सामना कर रहे हैं। Google Pay, Paytm और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर पेमेंट फेल होने की रिपोर्ट की गई है। यूजर्स दिनभर से परेशान हो रहे हैं। डाउनडिटेक्टर के अनुसार, पूरे दिन आउटेज की रिपोर्ट में तेजी आई, जो दोपहर और शाम को पीक पर था, जिससे फंड ट्रांसफर, पेमेंट और ऐप का कामकाज प्रभावित हुआ है। आउटेज से प्रभावित हुई ये सर्विसेस नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के यूपीआई सिस्टम में बड़े स्तर पर समस्याएं देखी गई हैं, जिसमें 64% शिकायतें फंड ट्रांसफर से जुड़ी थीं, इसके बाद 28% पेमेंट और 8% ऐप से जुड़ी समस्याओं के लिए थीं। यूपीआई में प्रमुख पार्टनर, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को भी समस्या का सामना करना पड़ा, जिसमें 57% यूजर्स ने फंड ट्रांसफर फेल होने की रिपोर्ट की, 34% को मोबाइल बैंकिंग समस्याओं का सामना करना पड़ा, और 9% को अकाउंट बैलेंस चेक करने में समस्याओं का सामना करना पड़ा। डाउनडिटेक्टर के आउटेज ग्राफ से पता चला कि यूपीआई के लिए दोपहर 1:00 बजे से शाम 5:00 बजे के बीच रिपोर्ट में तेजी आई, जबकि एसबीआई की समस्या पहले पीक पर थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फेल ट्रांजैक्शन, देरी से रिफंड और ऐप क्रैश होने की शिकायतों की बाढ़ आ गई। अभी तक, न तो NPCI और न ही प्रभावित बैंकों और पेमेंट ऐप ने आउटेज का कारण बताते हुए कोई आधिकारिक बयान जारी किया है। हालांकि, शुरुआती रिपोर्ट में तकनीकी गड़बड़ी का हिंट मिलता है, कुछ यूजर्स ने बताया कि काटी गई राशि बाद में “भारत में UPI डाउन” जैसे एरर मैसेज के साथ वापस कर दी गई।

सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद ने वक्फ संशोधन विधेयक को सहिष्णुता और विविधता के खिलाफ बताया

नई दिल्ली सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद ने वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह बिल सहिष्णुता और विविधता के खिलाफ है। इस बिल के जरिए संविधान को कमजोर किया जा रहा है, जो सबको संरक्षण की गारंटी देता है। इमरान मसूद ने वक्फ बिल का विरोध करते हुए काशी विश्वनाथ ट्रस्ट का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड में 22 मेंबर होंगे और उनमें से 10 ही मुसलमान होंगे। इस तरह गैर-मुस्लिम भाइयों का वक्फ बोर्ड में बहुमत होगा। अभी काशी विश्वनाथ ट्रस्ट को लेकर नियम है कि डीएम पदेन अधिकारी होगा। लेकिन यदि मौके पर डीएम कोई मुस्लिम होगा तो उससे नीचे या फिर ऊपर कोई और अधिकारी पदेन अध्यक्ष होगा। इमरान मसूद ने कहा कि भीमराव आंबेडकर के संविधान में सभी नागरिकों के संरक्षण का वादा किया था। उनका कहना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं टिक सकता, जबकि उसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र न हो। संविधान सभी को समानता की गारंटी देता है। वक्फ बिल को जिन लोगों ने ड्राफ्ट किया था, उनमें से ज्यादातर वही थे, जिन्हें उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। 90 फीसदी लोग नहीं बता पाएंगे कि पाकी और नापाकी क्या होता है। यह बात सिर्फ मुसलमान ही बता पाएंगे। मुसलमान ही बता पाएंगे कि उनकी क्या जरूरत है। वक्फ का मैनेजमेंट तो सरकार के ही हाथ में है। वक्फ बिल के एक-एक प्रावधान पर जमकर बोले इमरान मसूद विभिन्न राज्यों के बोर्डों द्वारा बताया गया कि कितनी वक्फ संपत्तियों पर विवाद है। अब जो वक्फ बिल है, उसमें लिखा है कि वही संपत्ति बोर्ड के दायरे में होगी, जो पूरी तरह विवाद से मुक्त हो। यूपी में 11,5000 हेक्टेयर भूमि को सरकारी घोषित कर दिया गया है और विवाद है। अब नए बिल के अनुसार यह संपत्ति वक्फ की नहीं रह जाएगी। वक्फ की संपत्ति के विवादों को सुनने की ताकत अब ट्राइब्यूनल से बाहर की जा रही है। लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि सक्षम अधिकारी कब तक फैसला देंगे। इस तरह से संपत्ति पर जब तक विवाद समाप्त नहीं होगा, तब तक उस पर अधिकार सरकार का होगा। अब जो स्थिति है, उसमें वक्फ संपत्ति पर अतिक्रमण करने वाले लोग भी जाकर दावा कर सकेंगे। इस तरह उनके सामने खुला मैदान होगा कि वे चाहें तो कब्जा ही जमा लें। ‘कोई और ट्रस्ट बताएं, जिसमें दूसरे धर्मों के लोगों की एंट्री हो’ कांग्रेस नेता ने कहा कि आप कोई और दूसरा ट्रस्ट बताइए, जो धर्म के नाम पर हो और उनके साथ ऐसा हो रहा हो। आपकी नजर दूसरे समुदायों की जमीन पर भी है। उन्होंने कहा कि हमें अभी सौगात-ए-मोदी मिली, जिसमें ईद की सेवाइयां थीं। हमें ऐसी सौगात नहीं चाहिए बल्कि वह सौगात दीजिए, जिससे हमारे सीने पर गोलियां न मारी जाएं। हमें समानता का अधिकार मिले। ऐसा कानून लाएं और हमारी रक्षा की जाए।

सेवा में रहने के दौरान उनकी अंतिम यात्रा थी, रिटायरमेंट से कुछ घंटे पहले झारखंड हादसे में दर्दनाक मौत

कोलकाता झारखंड के साहेबगंज जिले में दो मालगाड़ियों के बीच टक्कर में मारे गए एनटीपीसी के लोको पायलट गंगेश्वर मल 1 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने वाले थे और यह सेवा में रहने के दौरान उनकी अंतिम यात्रा थी। लोको पायलट के परिवार की योजना थी कि सेनानिवृत्ति वाले दिन पूरा परिवार साथ में रात्रि भोज करेगा लेकिन अब उनके पास केवल यादें और आंसू हैं। गंगेश्वर मल का परिवार पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में जियागंज स्थित घर में रहता है, उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि उन्होंने काम से लौटने के बाद रात का खाना साथ में खाने का वादा किया था। उनकी बेटी ने बताया कि 1 अप्रैल उनके पिता का आखिरी कार्य दिवस था, जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ अच्छा समय बिताने की योजना बनाई थी। उन्होंने कहा, ‘हमने सुना कि बाबा (पिता) वापसी में सिग्नल प्वाइंट पर इंतजार कर रहे थे, तभी विपरीत दिशा से आ रही एक अन्य मालगाड़ी के इंजन ने उनके इंजन को सामने से टक्कर मार दी।’ मंगलवार को बरहेट थाना क्षेत्र के भोगनाडीह के पास देर रात 3 बजे हुई इस दुर्घटना में एक अन्य लोको पायलट की भी मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए। एनटीपीसी द्वारा संचालित मालगाड़ियां फरक्का में थर्मल पावर प्लांट में कोयला ले जा रही थीं। साहेबगंज के अनुमंडल पुलिस अधिकारी किशोर तिर्की ने बताया, ‘आमने-सामने की टक्कर में दोनों मालगाड़ियों के चालकों की मौत हो गई।’ पूर्वी रेलवे के प्रवक्ता कौशिक मित्रा ने स्पष्ट किया कि यह घटना एनटीपीसी के बुनियादी ढांचे से जुड़ी है। मित्रा ने कहा, ‘मालगाड़ियां और पटरियां एनटीपीसी की हैं। इसका भारतीय रेलवे से कोई लेना-देना नहीं है।’

पीएम मोदी थाईलैंड और श्रीलंका की यात्रा करेंगे, बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में करेंगे शिरकत

नई दिल्ली बंगाल इनिशिएटिव फॉर सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकॉनोमिक कोऑपरेशन (BIMSTEC) का छठा शिखर सम्मेलन 4 अप्रैल को बैंकॉक में आयोजित होने जा रहा है. इस सम्मेलन से पहले दो अप्रैल को वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक और 3 अप्रैल को विदेश मंत्रियों की बैठक होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सम्मेलन में शामिल होने के लिए गुरुवार को बैंकॉक के लिए रवाना होंगे. बैंकॉक में छठा शिखर सम्मेलन कोलंबो में हुए पिछले शिखर सम्मेलन (30 मार्च, 2022) के तीन साल बाद आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का विषय ‘समृद्ध, लचीला और खुला बिम्सटेक’ तय किया गया है, जो क्षेत्रीय एकीकरण और आर्थिक सहयोग के लिए इस मंच की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. एक व्यापक एजेंडे के साथ, शिखर सम्मेलन का मसकद साझा सुरक्षा और विकास संबंधी चुनौतियों को हल करके सात सदस्य देशों, यानी बांग्लादेश, भूटान, भारत, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड के बीच सहयोग को मजबूत करना है. शिखर सम्मेलन की मुख्य विशेषताओं में 6वें बिम्सटेक शिखर सम्मेलन घोषणापत्र को अपनाना शामिल है, जो नेताओं के दृष्टिकोण और निर्देशों को हाईलाइट करेगा. साथ ही ऐतिहासिक बैंकॉक विजन 2030, भविष्य के सहयोग को बढ़ाने के लिए पहला रणनीतिक रोडमैप होगा. क्षेत्रीय संपर्क की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सभी देशों के नेता समुद्री परिवहन सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर करेंगे, जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी में व्यापार और यात्रा का विस्तार करना है. बिम्सटेक का क्या मकसद बढ़ती भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में 6वें बिम्सटेक शिखर सम्मेलन से बंगाल की खाड़ी में सहयोग के लिए प्राथमिक क्षेत्रीय मंच के तौर पर संगठन की भूमिका को मजबूत करने की उम्मीद है. पांच दक्षिण एशियाई और दो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ, बिम्सटेक क्षेत्रीय मामलों में एक अधिक गतिशील और प्रभावशाली खिलाड़ी बनने के लिए तैयार है. साल 1997 में अपनी स्थापना के बाद से बिम्सटेक ने पांच शिखर सम्मेलन आयोजित किए हैं. बैंकॉक (2004), नई दिल्ली (2008), नेपीडॉ (2014), काठमांडू (2018) और कोलंबो (2022). संगठन सात प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है जिनमें कृषि और खाद्य सुरक्षा, कनेक्टिविटी, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, लोगों से लोगों का संपर्क, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, व्यापार और निवेश, साथ ही आठ उप-क्षेत्र, जिनमें ब्लू इकोनॉमी, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य शामिल हैं. भारत सबसे प्रभावशाली सदस्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिम्सटेक का यह शिखर सम्मेलन इसकी रणनीतिक दिशा को आकार देने में मददगार साबित होगा. साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि यह बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में आर्थिक विकास, सुरक्षा सहयोग और सतत विकास के लिए एक यह मंच महत्वपूर्ण ताकत बना रहे. भारत, बिम्सटेक के चार संस्थापक सदस्यों में से एक है, जो सुरक्षा, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन में क्षेत्रीय सहयोग का नेतृत्व करता है. बिम्सटेक सचिवालय के बजट में सबसे बड़ा योगदानकर्ता (32 प्रतिशत) होने के नाते, भारत दो बिम्सटेक केंद्रों की मेजबानी करता है. नोएडा, उत्तर प्रदेश में बिम्सटेक मौसम और जलवायु केंद्र और बेंगलुरु में बिम्सटेक ऊर्जा केंद्र. साथ ही कृषि, आपदा प्रबंधन और समुद्री परिवहन में उत्कृष्टता के तीन और नए केंद्रों का प्रस्ताव दिया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिम्सटेक के पीछे सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति रहे हैं, उन्होंने गोवा में बिम्सटेक नेताओं की रिट्रीट (2016) की मेज़बानी की और संस्थागत क्षमता को मज़बूत करने के लिए 5वें बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में एक मिलियन डॉलर के वित्तीय अनुदान की घोषणा की थी. भारत ने जुलाई 2024 में दूसरे बिम्सटेक विदेश मंत्रियों की रिट्रीट की मेज़बानी की, जिसमें नए केंद्रों, अंतरिक्ष सहयोग और लोगों के बीच आदान-प्रदान को लेकर पहल की गई थी. साथ ही भारत ने न्यूयॉर्क में 79वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में बिम्सटेक विदेश मंत्रियों की अनौपचारिक बैठक की अध्यक्षता भी की. चीन को चुनौती देने की तैयारी नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी, एक्ट ईस्ट पॉलिसी और सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) विजन, बिम्सटेक देशों के साथ भारत के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों को दर्शाते हैं. बंगाल की खाड़ी क्षेत्र एक चौराहे पर खड़ा है, भारत की प्रतिबद्धता यह सुनिश्चित करती है कि बिम्सटेक एक एक्टिव फोरम के तौर पर विकसित हो, जो साझा-समृद्ध भविष्य के लिए संस्कृतियों और अर्थव्यवस्थाओं के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके. भारत ने सार्क को पीछे छोड़ते हुए अब अपना फोकस बिम्सटेक की तरफ मोड़ लिया है. सार्क सदस्यों में पाकिस्तान के शामिल होने की वजह से लगातार बाधाएं पैदा होती थीं और साल 2016 में उरी हमले के बाद सार्क का कोई भी सम्मेलन आयोजित नहीं हुआ है. ऐसे में अब सार्क को एक तरह से निष्क्रिय मंच माना जा रहा है. उधर, बंगाल की खाड़ी से सटे देशों पर चीन का प्रभुत्व खत्म करने और उसके विस्तारवाद को चुनौती देने के मकसद से भी भारत बिम्सटेक को प्राथमिकता दे रहा है. अगर भारत इस मंच का नेतृत्व अच्छी तरह से करता है तो सदस्य देशों को चीन का साथ देने में मुश्किल होगी और ऐसे में भारत न सिर्फ बिम्सटेक बल्कि एशिया का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है. सदस्य देशों के साथ मजबूत संबंध भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और बिम्सटेक में सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है. ऐसे में बिम्सटेक के मंच का इस्तेमाल करके सदस्य देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने से भारत अपनी पूर्वी सीमा से सटे इन देशों के साथ मजबूत संबंध स्थापित कर सकता है जिससे चीन को कड़ी चुनौती मिलेगी. अगर इन देशों के साथ भारत के संबंध मजबूत होंगे तो ये सदस्य देश भी भारत के हितों को चीन से ऊपर रखेंगे और वहां ड्रैगन के किसी प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले अपने रिश्तों के बारे में जरूर विचार करेंगे. 2015 के बाद से मोदी की द्वीप राष्ट्र की चौथी यात्रा 2015 के बाद से यह प्रधानमंत्री मोदी की द्वीप राष्ट्र की चौथी यात्रा होगी। इससे पहले पीएम मोदी ने 2015, 2017 और 2019 में श्रीलंका का दौरा किया था। यह यात्रा ऐसे वक्त हो रही है, जब भारत और श्रींलका के बीच मछुआरों की गिरफ्तारी का मुद्दा गरम है। इस कारण से दोनों देशों के बीच तनातनी चल रही है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कई बार विदेश मत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखकर मुद्दे के स्थायी हल निकालने के लिए काम करने को कह चुके हैं। इस साल करीब 150 से … Read more

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