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छत्तीसगढ़ का छिपा पर्यटन रत्न: जशपुर के चाय बागान और सोगड़ा आश्रम खींच रहे पर्यटकों को

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बिलासपुर                               
                             
चाक पर रखी मिट्टी को सुन्दर सुराही का आकार देने का कार्य एक सिद्धहस्त कुम्हार ही कर सकता  है। मिट्टी से घड़ा बनाने का हुनर सीखते हुए  इस कुम्हार ने न  जाने कितने मिट्टी के घड़े और रोशनी देने वाले दिए तोड़े होंगे लेकिन उसकी भी जिद थी कि मुझे इस चाक पर काम करना है।  लगातार मिट्टी के साथ जुड़े रहकर कुम्हार इतना निपुण हो जाता है कि एक छोटा दिया भी अपनी खूबसूरती के साथ चाक से नीचे उतरने लगता है।  इसी तरह जंगलों पहाड़ों को भगवान मानने वाले आदिवासियों को अपने जंगलों की मिट्टी की पहचान खूब होती है।  पहाड़ों की ढलान पर पथरीली दोमट मिट्टी  की बार-बार खुदाई करके इसे सरस और  भुरभुरी बनाने की जिद ने इसे सोना बना दिया। ऐसी स्थिति में इन मेहनतकश  हाथों को चाय बागानों का  हुनर प्राप्त करने से कौन रोक सकता था। आदिवासी श्रम की पहचान जशपुर की सारुडीह पहाड़ियों के ढलान पर हंसते खिलखिलाते चाय के बगीचे अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा बन चुके हैं।  साल वनों के बीच पहाड़ों की ढलान पर फैली चाय बागान की हरियाली पर्यटकों की अब पसंदीदा जगह बनती जा रही हैं।  इसी बगीचे की सारुडीह चाय और उसके बागान का सौंदर्य  यदि आप भी नजदीक से देखना चाहते हैं, तब आपको उत्तरी छत्तीसगढ़ के पूर्वी प्रवेश द्वार जशपुर की यात्रा करनी होगी।  
                                   
जशपुर छत्तीसगढ़ का एक ऐसा जिला है जो झारखंड के गुमला, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ एवं अंबिकापुर जिले की सीमा को आपस में साझा करता है।  विशाल भारत के मध्य प्रांत छत्तीसगढ़ के उत्तर पूर्व अंचल में बसा जशपुर ब्रिटिश शासन काल मे ब्रिटिश कमिश्नरी रांची का एक हिस्सा था। झारखंड राज्य से छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक वादियों में प्रवेश करने वालों के लिए जशपुर का यह पूर्वी द्वार स्वागत करता है। ऐतिहासिक विरासत के पन्नों में जशपुर की जानकारी स्पष्ट नहीं है लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है वह इतनी रोचक है कि आप इसे जरूर जानना चाहेंगे।  कहते हैं कि 18 वीं सदी में डोम राजवंश का यहां शासन था  जिसे राजा सूर्यवंशी के बड़े बेटे सुजन राय ने हरा कर यहां अपना राज्य स्थापित किया।  विद्वान ज्योतिषी ठीक कहते हैं कि जिसके हाथों की भाग्य रेखा में राजयोग लिखा हो वह सन्यासी बनकर भी राजा बन जाएगा। एक छोटे से राज्य बंसवाड़ा में सुजन राय के पिता राज किया  करते थे।   शिकार के लिए निकले  सुजन राय की अनुपस्थिति में उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। राजा की मृत्यु की सूचना से पहले राजगद्दी सूनी नहीं रहनी चाहिए, ऐसा कह कर वहां के बुजुर्गों ने छोटे भाई को राजगद्दी पर बैठा दिया। शिकार से लौटने के बाद सुजान राय को स्थितियों से अवगत कराया गया और सुजान राय को उनके पिता के राजगद्दी संभालने का प्रस्ताव दिया गया।  सुजन राय ने छोटे भाई को सौंपी सत्ता वापस लेना उचित नहीं है ऐसा सोचकर वे सन्यासी बनकर जंगलों की ओर प्रस्थान कर गए। अपने संन्यासी जीवन में यहां वहां  घूमते हुए वे खुड़िया गांव पहुंचे।  यहां के डोम राजा के कार्यों से वहां के निवासी असंतुष्ट थे और बगावत के लिए पूरी तैयारी कर ली थी।  बगावती लोगों के अनुरोध को मानकर सुजन राय ने इस संगठन का  नेतृत्व करना स्वीकार किया और डोम राजा रायबन को हराकर स्वयं वहां के राजा बन बैठे।  इसी खुड़िया का विस्तार बाद में जशपुर रियासत कहलाया। राज्य और सत्ता का यह खेल समय-समय पर  रियासतों के साथ हमेशा से होता रहा है।  सूजन राय जशपुर रियासत के अंतिम दिनों तक राजा रहे।  1905 तक ब्रिटिश शासन के छोटा नागपुर कमिश्नरी के अधीन रहने वाला जशपुर छत्तीसगढ़ के 14 रियासतों में से एक था।  कुछ छोटी रियासतों के साथ इसे भी सरगुजा ग्रुप में रखा गया था। प्रत्येक रियासत अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार को वार्षिक शुल्क टिकोली, रैयतवाड़ी या खिराज के नाम से देती थी।  यह शुल्क लेकर ब्रिटिश शासन रियासतों को सुरक्षा देने का वादा  करती थी।  अपने रियासत में सत्तारूढ़ रहते हुए स्वतंत्र रूप से राज करने तथा व्यापारियों और किसानों से शुल्क वसूलने की स्वतंत्रता देती थी।
                              
आजादी के बाद मध्य प्रदेश बनने पर जशपुर  रायगढ़ जिले का हिस्सा था और 25 मई 1998 को  नया जिला घोषित किया गया। सघन साल वनों से घिरा लगभग 6200 वर्ग किलोमीटर का जशपुर जिला अपने क्षेत्रफल का लगभग 900 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का जंगल समेटे हुए है।  उत्तर से दक्षिण तक डेढ़ सौ किलोमीटर एवं पूर्व पश्चिम में 85 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ झील और झरनों के पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है। दो भागों में बंटा हुआ जशपुर भौगोलिक रूप से ऊपरी घाट एवं दक्षिणी भाग को नीच घाट के नाम से जाना जाता है ऊपरी घाट पन्डरा पाठ का हिस्सा ज्यादा ठंडा है। इसी घाट से गुजरते हुए  जशपुर से कुनकुरी और कैलाश गुफा (बगीचा) जाने वाले रास्ते का घुमाव "लोरो घाटी"  कहलाता है। घाट की ऊंचाई से नीचे गुजरते हुए बस से देखने पर ऐसा लगता है मानो किसी बच्चे ने अपनी काले स्लेट पर स्लेट पेंसिल से टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींच दी हो। प्रकृति के खींचे गए इस तरह के प्राकृतिक दृश्य और बिम्ब एक सिद्ध हस्त कलाकार की ऐसी पेंटिंग है जो बिरले देखने को मिलती है।
                            
जशपुर के प्राकृतिक स्थलों में रानी दाह झरना, रजपुरी जलप्रपात,  अवधूत भगवान श्री राम का सोगड़ा अघोर आश्रम और सारुडीह चाय बागान जैसे पर्यटन स्थल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं।  विश्व का सबसे बड़ा प्राकृतिक शिवलिंग  "मधेसर पहाड़"  भी जशपुर जिले का हिस्सा है। पर्यटन के क्षेत्र में जशपुर जिला अपनी चाय बागानों के कारण पर्यटको की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है।   जशपुर जिला  मुख्यालय से  साल वनों के बीचसे  गुजरते हुए लगभग तीन किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद सारुडीह  की पहाड़ियों के नीचे हरे भरे चाय के बगीचे आपका ध्यान आकर्षित करते हैं।  छोटे-छोटे टुकड़ों में बॅंटे चाय  बागान तक पहुंचते पहुंचते आपके चेहरे खिलने लगते हैं। प्रसन्न मुद्रा में आप इन पत्तियों को छूकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर पाते हैं। आदिवासी महिला संगठनों के द्वारा वन विभाग के सहयोग से संचालित इस चाय बागानों में महिलाओं का श्रम हरी पत्तियों के चमक के साथ दिखाई पड़ता है। 18 एकड़ क्षेत्र में फैले चाय बागान की पत्तियां तोड़ते हाथों का श्रम यहां के चाय उत्पादन में दिखाई पड़ता है। सारुडीह चाय की यादों को समेटे एक पैकेट चाय खरीदते समय बातचीत करने पर पता चलता है कि 5 किलो हरी पत्तियां तोड़ने के बाद 1 किलो चाय पत्ती की पैकेट में उपलब्ध होती है।  इस क्षेत्र की मिट्टी और आबोहवा को अनुकूल पाकर सर्वेश्वरी समूह के सोगड़ा आश्रम की भूमि पर भी अब चाय की खेती हो रही है जो छत्तीसगढ़ के इस अंचल को दार्जिलिंग और असम के चाय बागानों से जोड़ती है। सारुडीह की चाय अपनी सुगंध के कारण  दार्जिलिंग के सुगंधित चायों के समकक्ष मानी जाती है इसलिए इसके लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है और उत्तर के असम तथा दक्षिण की नीलगिरी  चाय के अब बाद मध्य प्रांत  छत्तीसगढ़  भी आने वाले समय में चाय की खेती और चाय बागानों के लिए जाना जाएगा। 
                
अवधूत बाबा भगवान श्री राम का सोगड़ा में बना अघोर आश्रम अघोर पंथ के अनुयाई शिष्यों का तीर्थ है।  यहां अवधूत बाबा श्री राम का मंदिर है।  जशपुर मुख्यालय से लगभग 18 कि.मी.  दूर इस आश्रम के समीप पहुंचते ही आपको असीम शांति का अनुभव होता है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही उनके शिष्यों का मार्गदर्शन आपको मंदिर परिसर की पूरी जानकारी देते हैं। माता काली के अनन्य भक्त अवधूत बाबा श्री राम के आश्रम में मां काली का मंदिर और उसमें स्थापित प्रतिमा एक जागृत प्रतिमा है। यहां पहुंचकर माता के सामने पहुंचते ही जीवंत ऊर्जा का आभास होता है  ऐसा प्रतीत होता है कि माता अभी बोल पड़ेगी। मंदिरों में इतनी जीवन्त प्रतिमा बहुत कम दिखाई पड़ती है। यह ऊर्जा और आभामंडल बाबा अवधूत श्री राम के तपस्या एवं श्रद्धा का प्रभाव है। प्राकृतिक सुरम्य पहाड़ों की वादियो में बसा यह आश्रम सांस्कृतिक,  आध्यात्मिक  शांति  और  दर्शन का केंद्र है। माता काली का आशीर्वाद लेने श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां नवरात्रि के अवसर पर  पहुंचते हैं। 
                      
पर्यटन की अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के साथ यहां की सांस्कृतिक और साहित्यिक यात्रा भी यहां के आदिवासी जनजीवन को जानने और उनसे जुड़ने के नए अवसर उपलब्ध कराती है।  "छत्तीसगढ़िया क्लाउड"  नाम की साहित्यिक संस्था के साहित्यकार और कलाकार आनंद कुमार पांडे और  शशि मोहन सिंह यहां के पर्यटन के लिए हमारे मार्गदर्शक है। आनंद कुमार पांडे  हमारी मुलाकात यहां के व्यवसायी समर्थ जैन से कराते हैं, जो जैशप्योर नाम की संस्था के प्रमुख है। प्रकृति को देवता मानने वाले आदिवासी जनजीवन के लोगो ने अब तक देसी शराब के लिए प्रसिद्ध महुआ फूल के कैंडी, बिस्किट, लड्डू, जैसे प्रोटीन और लवण युक्त उत्पाद को बनाकर एक नई इबारत लिखना प्रारंभ किया है। आदिवासी महिलाओं के संरक्षण और प्रबंधन में अब इसका व्यापार पूरे भारत में तेजी के साथ फैल रहा है।  समर्थ जैन से बातचीत में पता चला कि  मिलेट्स  अर्थात  कोदो, कुटकी, सांवा,  मेझरी, जैसे मोटे अनाज और देशी बीज सहित सुगंधित देसी चावल और धान को भी यहां संरक्षित और उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। देश के सभी लोगों तक इसके  उत्पाद को उपयोग के लिए  देश-विदेश तक इसे पहुंचने के लिए आधुनिक पैकिंग एवं  शीघ्र प्रेषण की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मोटे अनाज (मिलेट्स)  में उच्च फाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम जैसे पौष्टिक तत्व होते हैं वहीं ग्लूटोन मुक्त तथा एंटीऑक्सीडेंट फाइटोकेमिकल से भरे होते हैं।  यह एक अच्छी पहल है और आदिवासियों को उनकी अर्थव्यवस्था मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम भी है। जैशप्योर नाम से बनने वाले यहां के उत्पाद अब छत्तीसगढ़ का ब्रांड बन चुके हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में जैशप्योर के उत्पाद जशपुर की पहचान बनेंगे।
                           
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पर्यटन को बढ़ावा देने के कई कार्य किया जा रहे हैं इसके अंतर्गत कुछ धरोहरों को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।   अंबिकापुर – जशपुर मार्ग में अंबिकापुर से 80 किलोमीटर दूर जशपुर जिले के बगीचा के पास सांभरबार पहाड़ के प्राकृतिक पहाड़ों को तरास कर कैलाश गुफा को विकसित किया गया है। यह पर्यटन केंद्र आदिवासी संत गहिरा गुरु ने इन पहाड़ियों को तराश कर जहां एक शिव मंदिर का निर्माण किया है वहीं पहाड़ों से प्राकृतिक रूप से बहने वाली छोटी-छोटी जलधारा को एक चौड़ी धारा के रूप में  एकत्र कर   प्राकृतिक जलधारा से केला पपीता और गुलाब की खेती  करने की कोशिश की गई है।  पहाड़ों से झड़ते पानी के उपयोग की यह एक अच्छी पहल है। गहिरा गुरु के शिष्यों के श्रमदान से खेत बनाने और उत्पादन करने की तकनीक समाज को एक नया संदेश देती है। कैलाश गुफा के इस  स्थल मे  गुरुकुल शिक्षा पद्धति से संस्कृत विद्यालय संचालित है जो संभवत: देश का दूसरा गुरुकुल संस्कृत  विद्यालय है। जशपुर से 35 किलोमीटर दूर कुनकुरी ब्लॉक में मनाली गांव के पास पहाड़ों से निकलती कई जलधारा को बांधकर मायली बांध का नाम दिया गया है। इस खूबसूरत बांध के किनारे स्थित मधेसर पहाड़ का प्राकृतिक शिवलिंग जैसी आकृति इसे विश्व की सबसे बड़ी प्राकृतिक शिवलिंग पहाड़ी का दर्जा प्रदान करती है।  इस प्राकृतिक शिवलिंग को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है।

अब छत्तीसगढ़ शासन द्वारा इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है जहां अपनी प्राकृतिक पहचान के साथ यहां पर्यटकों के लिए विश्राम भवन की भी व्यवस्था की गई है। ट्रैकिंग ग्रुप के पड़ाव को बढ़ावा देकर भी इस क्षेत्र के पर्यटन को ज्यादा रोचक बनाया जा सकता है।                   
                        
छत्तीसगढ़ के उत्तर पूर्वी द्वार से आगमन के साथ ही आप झारखंड से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करते हैं। इसलिए हवाई यात्रा में अंबिकापुर एवं रांची हवाई अड्डे  में उतरकर आप जशपुर पहुंच सकते हैं। झारखंड से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने के लिए बस की कई सुविधाएं उपलब्ध है। यदि आप यह यात्रा सड़क मार्ग से अपने निजी वाहन से कर रहे हैं तब राष्ट्रीय राजमार्ग 43  (गुमला – कटनी मार्ग)  छत्तीसगढ़ में आपके प्रवेश के लिए सुगम मार्ग है। अपने पर्यटन सर्किट में आप इस मार्ग से छत्तीसगढ़ के पूर्वी द्वार से प्रवेश कर पश्चिम द्वार पर बसे  मनेन्द्रगढ़ जिला मुख्यालय से बाहर निकल सकते हैं और मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ मार्ग से गुजरते हुए कटनी तक पहुंच सकते हैं। कटनी  पहुंचने के बाद जबलपुर हवाई अड्डे से देश के किसी भी कोने में जाया जा सकता है।
                            
भारतवर्ष के मध्य में बसा छत्तीसगढ़ राज्य का पूर्वी द्वार जशपुर  अपने चाय बागान की खूबसूरती तथा अघोर पंथ का सोगड़ा आश्रम के प्राकृतिक पर्यटन का खूबसूरत स्थल है। यहां मां काली की जीवन्त प्रतिमा की आभा मण्डल से परिचित होने तथा आशीर्वाद लेने का अवसर प्राप्त होता है, और मधेसर पहाड़ के शिव दर्शन प्राप्त कर आप आत्मविभोर होकर अपने आप को धन्य महसूस करते हैं। अपनी पर्यटन यात्रा में छत्तीसगढ़ के पश्चिमी द्वार पर केदारनाथ प्रतिबिंब भगवान भोलेनाथ का सिद्ध बाबा मंदिर और  29 करोड़ वर्ष पुराने गोंडवाना समुद्री जीवाश्म के साथ-साथ मलयागिरी चंदन की सैकड़ो एकड़ में फैली हरियाली और जैव विविधता आपका मन मोह लेती है।  विभिन्न पेड़ पौधों और जीव जंतुओं की शरण स्थली छत्तीसगढ़ की जैव विविधता से भरपूर  यह मार्ग जहां आपको जंगल पहाड़ों में बसने वाले आदिवासियों के  कई  प्रजातियां के जनजीवन एवं संस्कृति से परिचित कराता है वहीं इसके संरक्षण का पाठ भी पढ़ाता है।  यदि आप प्राकृतिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पर्यटन का आनंद साथ-साथ लेना चाहते हैं तब छत्तीसगढ़ का पर्यटन बांहें फैलाए आपको गले लगाने के लिए आतुर है। इस बार के पर्यटन में आप जशपुर को जरूर शामिल करें।  छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक वन संपदा और जैव विविधता का यह  उत्तरी छत्तीसगढ़ क्षेत्र आपका स्वागत करने के लिए हर समय तैयार है।

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