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ऑयल क्राइसिस से बचाव: पहाड़ी गुफाओं में सुरक्षित रखे गए भारत के रणनीतिक तेल भंडार

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नईदिल्ली 
मिडिल ईस्ट में ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर खतरे की खबरों के बीच पूरी दुनिया की नजर तेल सप्लाई पर टिक गई है. ऐसे में भारत को लेकर भी एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि अगर वैश्विक सप्लाई अचानक रुक जाए तो देश कितने दिनों तक अपने भंडार के भरोसे चल सकता है. बहुत कम लोगों को पता है कि भारत ने इस तरह की आपात स्थिति के लिए बेहद खास इंतजाम कर रखे हैं. देश ने पहाड़ों की मजबूत चट्टानों के भीतर विशाल गुफाओं जैसी संरचनाओं में कच्चे तेल का भंडार छिपाकर रखा है. ये गुफाएं दरअसल भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व हैं. इन्हें युद्ध, आपदा या वैश्विक सप्लाई रुकने जैसी स्थिति में इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया है.

दरअसल इस पूरी योजना की शुरुआत अचानक नहीं हुई थी. इसकी कहानी 1991 के उस आर्थिक संकट से जुड़ी है जब गल्फ वॉर के दौरान भारत के सामने गंभीर ऊर्जा संकट खड़ा हो गया था. उस समय ऐसी खबरें सामने आई थीं कि देश के पास तेल का स्टॉक बेहद सीमित रह गया था. कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि भारत के पास सिर्फ तीन दिनों का तेल बचा था, जबकि कुछ में इसे एक सप्ताह या दस दिन बताया गया. असल समस्या यह थी कि तेल खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खत्म हो रहा था. उस संकट ने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना जरूरी है.

1991 के संकट ने क्यों बदली भारत की सोच

    1991 के समय भारत के पास जो तेल स्टॉक था वह असल में तेल कंपनियों का कमर्शियल भंडार था. यानी वह रोजमर्रा की सप्लाई के लिए रखा जाता था. सरकार के पास अलग से ऐसा कोई रणनीतिक भंडार नहीं था जिसे सिर्फ आपात स्थिति में इस्तेमाल किया जा सके. हालांकि उस समय भी तेल कंपनियां सरकारी नियंत्रण में ही थीं, लेकिन फिर भी संकट के समय अलग से सुरक्षित रिजर्व होना जरूरी समझा गया.

    दुनिया के कई बड़े देशों ने पहले से ही अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बना रखे थे. इनका मकसद यही होता है कि अगर युद्ध, वैश्विक संकट या प्राकृतिक आपदा की वजह से तेल सप्लाई रुक जाए तो देश कुछ समय तक अपने भंडार के सहारे चल सके. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे पुराने स्कूटरों में पेट्रोल टैंक में एक रिजर्व सिस्टम होता था. जब टैंक का पेट्रोल खत्म हो जाता था तो रिजर्व खोलकर नजदीकी पेट्रोल पंप तक पहुंचा जा सकता था. उसी तरह यह सरकारी रिजर्व होता है जिसे सिर्फ संकट की स्थिति में ही खोला जाता है.

    तेल कंपनियों के कमर्शियल भंडार आम तौर पर बड़े-बड़े तेल टैंकों या डिपो में रखे जाते हैं. लेकिन रणनीतिक भंडार के लिए ऐसी जगह चाहिए होती है जहां युद्ध या हमले का असर कम से कम हो. अगर कोई दुश्मन देश तेल डिपो को निशाना बना दे या किसी आपदा में डिपो नष्ट हो जाए तो संकट और बढ़ सकता है. इसलिए तय किया गया कि रणनीतिक भंडार जमीन के ऊपर नहीं बल्कि चट्टानों के भीतर बनाए जाएं.
    इसके लिए कई भौगोलिक मानकों पर विचार किया गया. पहली शर्त थी कि वहां मजबूत चट्टानें हों, जिनमें बड़ी गुफाएं बनाई जा सकें. दूसरी शर्त यह थी कि उन चट्टानों से तेल रिसना नहीं चाहिए. तीसरी शर्त थी कि उस इलाके में भूकंप का खतरा कम हो. चौथी शर्त यह थी कि समुद्री बंदरगाह पास हो, ताकि जहाजों से तेल आसानी से लाया जा सके. और पांचवीं शर्त यह थी कि रिफाइनरी भी ज्यादा दूर न हो, ताकि पाइपलाइन से तेल पहुंचाया जा सके.

भारत के पास तेल भंडारों की स्थिति:

  •     भारत के पास करीब 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) है.
  •     यह भंडार आपात स्थिति में लगभग 9 से 10 दिनों की तेल जरूरत पूरी कर सकता है.
  •     भारत ने ये रणनीतिक तेल भंडार पहाड़ों की चट्टानों के भीतर गुफाओं जैसी संरचनाओं में बनाए हैं.
  •     देश में फिलहाल तीन प्रमुख स्थानों पर ये भंडार मौजूद हैं- विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पडूर.
  •     इन भंडारों का इस्तेमाल युद्ध, वैश्विक तेल संकट, प्राकृतिक आपदा या सप्लाई रुकने जैसी स्थिति में किया जाता है.
  •     भारत सरकार इन्हें इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL) के जरिए संचालित करती है.
  •     भारत अब दूसरे चरण में ओडिशा के चंडीखोल और पडूर विस्तार के जरिए इस क्षमता को और बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है.

पहले चरण में तीन जगहों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता के भंडार बनाने का फैसला हुआ.

भारत ने कहां बनाए रणनीतिक तेल भंडार

    सभी मानकों को देखते हुए दक्षिण भारत के तटीय इलाकों को चुना गया. सरकार ने इस काम के लिए एक अलग कंपनी बनाई इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL). इस कंपनी को जिम्मेदारी दी गई कि वह देश के लिए रणनीतिक तेल भंडार तैयार करे.
    पहले चरण में तीन जगहों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता के भंडार बनाने का फैसला हुआ. पहला भंडार आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में बनाया गया जिसकी क्षमता 1.33 मिलियन मीट्रिक टन है. दूसरा कर्नाटक के मंगलुरु में 1.5 मिलियन मीट्रिक टन का भंडार बनाया गया. तीसरा कर्नाटक के ही पडूर (उडुपी के पास) में 2.5 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का बनाया गया.

    इन तीनों भंडारों को पहाड़ों की मजबूत चट्टानों के भीतर गुफाओं की तरह बनाया गया है. विशाखापत्तनम में ग्रेनाइट चट्टानों के भीतर सुरंग जैसी संरचनाएं बनाई गई हैं. यह स्थान इसलिए चुना गया क्योंकि यहां भूकंप का खतरा कम है और पास में बंदरगाह तथा HPCL की रिफाइनरी मौजूद है. यह भंडार 2015 में तैयार हुआ और इसमें इराक से लाकर तेल भरा गया.

    मंगलुरु में बने भंडार को बसाल्ट चट्टानों के भीतर बनाया गया है. यह 2016 में तैयार हुआ और इसमें अबू धाबी से तेल लाकर रखा गया. तीसरा भंडार पडूर में बनाया गया जो 2018 में पूरा हुआ. यहां भी बसाल्ट चट्टानों का इस्तेमाल किया गया. इन सभी भंडारों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि युद्ध, हमले या बड़ी आपदा के दौरान भी इनमें रखा तेल सुरक्षित रह सके.

दूसरे चरण में बढ़ाया जा रहा है भंडार

भारत अब रणनीतिक तेल भंडार को और बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है. दूसरे चरण में ओडिशा के चंडीखोल में एक नया भंडार बनाया जा रहा है. इसके अलावा पडूर में पहले से मौजूद भंडार की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है. सरकार का लक्ष्य है कि भविष्य में भारत के पास अधिक दिनों तक चलने वाला रणनीतिक तेल भंडार मौजूद रहे.

भारत के पास करीब 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) है. 

    रणनीतिक भंडार और कमर्शियल भंडार में बड़ा फर्क होता है. कमर्शियल भंडार तेल कंपनियों के पास होते हैं और उनका इस्तेमाल रोजमर्रा की सप्लाई के लिए किया जाता है. जबकि रणनीतिक भंडार सिर्फ राष्ट्रीय आपात स्थिति के लिए होते हैं और इन्हें सरकार नियंत्रित करती है. इनका इस्तेमाल सामान्य परिस्थितियों में नहीं किया जाता.

    दुनिया की ऊर्जा संस्था इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का मानना है कि हर देश को कम से कम 90 दिनों की जरूरत जितना तेल रणनीतिक भंडार में रखना चाहिए. लेकिन भारत के मामले में यह आंकड़ा अभी काफी कम है. फिलहाल भारत के पास केवल लगभग 9.5 दिनों का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है.

    हालांकि अगर तेल कंपनियों के कमर्शियल भंडार को भी जोड़ दिया जाए तो कुल स्टोरेज क्षमता करीब 74 दिनों की जरूरत के बराबर हो जाती है. फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक संकट की स्थिति में यह पर्याप्त नहीं माना जाएगा.

    दूसरे देशों से तुलना करें तो कई देश इस मामले में काफी आगे हैं. अमेरिका ने लगभग 40 दिनों का स्ट्रैटेजिक तेल भंडार बना रखा है. दक्षिण कोरिया के पास लगभग 90 दिनों का रणनीतिक भंडार है. चीन ने तो इससे भी आगे जाकर करीब 130 दिनों का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व तैयार कर लिया है.

सबसे दिलचस्प उदाहरण जापान का है. जापान को अक्सर भूकंप और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा उसे उत्तर कोरिया और चीन जैसे पड़ोसी देशों से सुरक्षा चिंताएं भी रहती हैं. इसलिए जापान ने लगभग 8 महीनों की जरूरत जितना रणनीतिक तेल भंडार तैयार कर रखा है. यानी अगर लंबे समय तक तेल सप्लाई बंद हो जाए तब भी जापान अपनी अर्थव्यवस्था को सामान्य रूप से चला सकता है.

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