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येदियुरप्पा के खिलाफ मामला राहुल गांधी के मानहानि मुकदमे के प्रतिशोध में रची गयी राजनीतिक साजिश है : भाजपा

बेंगलुरु  कर्नाटक प्रदेश भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आरोप लगाया है कि राज्य की कांग्रेस सरकार पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ पॉक्सो मामले में बदले की राजनीति कर रही है।भाजपा का कहना है कि येदियुरप्पा के खिलाफ मामला कांग्रेस नेता राहुल गांधी के मानहानि मुकदमे के प्रतिशोध में रची गयी राजनीतिक साजिश है। पार्टी अदालत के आदेश का सम्मान करने और इसके पीछे की मंशा को चुनौती देने के लिए प्रतिबद्ध है। पूर्व भाजपा राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर निशाना साधते हुए कहा, “क्या यह बदले की राजनीति नहीं है। उन्होंने (सिद्दारमैया) दावा किया था कि वह इस तरह की चाल नहीं चलेंगे, लेकिन अब वह ठीक वैसा ही कर रहे हैं। राज्य के लोग उन्हें इसके लिए जवाबदेह ठहरायेंगे।” उन्होंने मामला दर्ज होने के बाद सरकार की कार्रवाई में चार महीने के विलंब का उल्लेख किया और गृह मंत्री डॉ. जी परमेश्वर द्वारा मामले को खारिज करने वाले बयान का हवाला दिया। विधानपरिषद सदस्य एवं भाजपा के मुख्य सचेतक एन रविकुमार ने भी मामले को निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि शिकायतकर्ता का अधिकारियों और राजनेताओं के खिलाफ कई मामले दर्ज करने का इतिहास रहा है। विधानसभा परिषद सदस्य चालावाड़ी नारायणस्वामी ने कहा, “चार महीने की निष्क्रियता के बाद कांग्रेस अचानक हरकत में आयी है। येदियुरप्पा के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाना बेहद निंदनीय है।” गौरतलब है कि गुरुवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने नाबालिग के यौन उत्पीड़न के आरोपों के संबंध में येदियुरप्पा के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया।        

महारानी मृणालिनी देवी की 2000 बीघा जमीन अब हो जाएगी सरकार

इंदौर धार राजघराने की महारानी मृणालिनी देवी की जमीन अब सरकारी हो जाएगी। महारानी मृणालिनी देवी का कोई संतान नहीं था। उनका निधन आठ साल पहले हो गया है। वह वडोदरा राजघराने की बेटी थी। इंदौर संभाग के अलग-अलग हिस्सों में उनके 2000 बीघा जमीन हैं लेकिन कोई वारिस नहीं होने की वजह से उनकी जमीन सरकारी हो जाएगी। इस दिशा में आगे की कार्रवाई करने के लिए इंदौर संभाग के कमिश्नर ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। महारानी के निधन के आठ साल बाद चार हेक्टेयर भूमि पर दावेदारी पेश की थी। उनकी चार याचिकाएं खारिज हो गई हैं। कौन थीं महारानी मृणालिनी देवी दरअसल, धार के महाराज आनंदराव पवार की वह पत्नी थी। महाराज से मृणालिनी देवी की शादी 1949 में हुई थी। मृणालिनी देवी वडोदरा की राजकुमारी थी। शादी के बाद धार आईं। उनका जन्म 25 जून 1931 को हुआ था। शादी के एक साल बाद ही महारानी मृणालिनी देवी वड़ोदरा चली गईं। 1980 में महाराज आनंदराव पवार का निधन हो गया। इसके बाद महारानी नियमित रूप से धार आने लगी थीं। 1988 में मृणालिनी देवी महाराज सयाजीराव विश्विविद्यालय की कुलाधिपति बन गईं। उस समय किसी यूनिवर्सिटी की कुलाधिपति बनने वाली वह पहली महिला थीं। 2015 में हो गया निधन वहीं, 02 जनवरी 2015 को महारानी मृणालिनी देवी का निधन हो गया। उनके निधन के आठ साल हो गए हैं। संतान नहीं होने की वजह से कोई वारिस नहीं है। ऐसे में अरबों रुपए की संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन होगा, इसे लेकर साफ नहीं है। न ही इतने दिनों तक उनकी जमीन पर कोई हक जताने आया। आठ साल बाद आए चार लोग दरअसल, इंदौर संभाग के कई जिलों में महारानी की जमीन है। 2022-23 में चार राज्यों के चार परिवारों ने धार जिले की चार हेक्टेयर जमीन पर दावेदारी पेश की है। साथ ही नामांतरण के लिए आवेदन दिया। इसे तहसीलदार ने खारिज कर दिया। ऐसे कर इन लोगों ने कुल चार जगहों पर याचिका लगाई। इंदौर कमिश्नर के यहां से भी इनकी याचिका खारिज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार संभाग में महारानी के नाम पर कुल 2000 बीघा जमीन है लेकिन एक छोटे टुकड़े पर दावेदारी सामने आई है। संभागायुक्त ने दिए निर्देश वहीं, नामांतरण की याचिका खारिज होने के बाद संभागायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। संभागायुक्त दीपक सिंह ने इंदौर और धार कलेक्टर को तुरंत इन जमीनों पर कब्जा लेने के निर्देश दिए हैं। साथ ही एक-एक साल के लिए तीन साल तक पट्टा दें। इतना करने के बावजूद अगर वारिस नहीं मिलते हैं तो इसे लवारिस घोषित कर शासन के पक्ष में करने की कार्रवाई करें। आठ साल बाद इन लोगों ने की थी अपील गौरतलब है कि महारानी मृणालिनी देवी के निधन के आठ साल बाद अलोकिका राजे, कार्तिक घोरपड़े, शिवप्रियाराजे भोगले और गायत्रीदेवी चौगुले हैं। इनलोगों का कहना था कि महारानी ने एक वारिसनामा बनाया था, जिसमें सात लोग थे। उनमें तीन का निधन हो गया है और हम चार बचे हैं। वहीं, इनके अपील में कई खामियां और सही दस्तावेज नहीं होने की वजह संभागायुक्त ने इसे खारिज कर दिया।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अकेले लड़ सकती है बीजेपी

मुंबई 2024 लोकसभा चुनावों के बाद से महाराष्ट्र में उथल-पुथल की अटकलें लग रही है। अब सामने आया है कि लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करने के बाद बीजेपी विधानसभा चुनावों में अकेले चुनाव लड़ सकती है। सूत्रों के अनुसार पार्टी ने राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की संभावनाओं का आकलन करने के लिए एक आंतरिक सर्वेक्षण कर रही है। यह सर्वेक्षण लोकसभा चुनावों में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ मिलकर निराशाजनक प्रदर्शन के बाद हो रहा है। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र में लोकसभा की सीटों की संख्या सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में 80 और महाराष्ट्र में 48 सीटें हैं। इनमें बीजेपी को सिर्फ 9 पर जीत मिली है। बीजेपी के आंतरिक सर्वे करवाने की चर्चा ऐसे वक्त पर सामने आई है जब आरएसएस से जुड़े रहे एक नेता ने अजित पवार से गठजोड़ करने पर सवाल खड़े किए हैं। क्या है बीजेपी की तैयारी? लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने 28 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे। इनमें उसे सिर्फ 9 पर जीत मिली है। राज्य में इस साल अक्टूबर में विधानसभा प्रस्तावित है। ऐसे में पार्टी आगे की रणनीति बनाने में जुटी है। सूत्रों के अनुसार बीजेपी ने 2019 के विधानसभा चुनावों में राज्य की 106 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी ने आगे की रणनीति को तय करने के लिए इन्हीं 106 विधानसभा क्षेत्रों में एक आंतरिक सर्वेक्षण शुरू किया है। सूत्रों की मानें पार्टी ने अभी तक अजित पवार को छोड़ने पर फैसला नहीं किया है, लेकिन पार्टी मौजूदा मूड और सीटों को अकेले ही बरकरार रखने की चुनौतियों का आकलन कर रही है। अगर पार्टी विधानसभा चुनावों में अकेले जाने का फैसला करती है, तो जमीनी हकीकत का अध्ययन करने के लिए जल्द ही शेष 182 विधानसभा क्षेत्रों में भी इसी तरह के सर्वेक्षण शुरू किए जाएंगे। महाराष्ट्र में विधानसभा की कुल 288 सीटें है। सरकार बनाने के लिए 145 सीटें चाहिए। सर्वेक्षण में क्या-क्या है? बीजेपी के एक सूत्र ने कहा कि ये सर्वेक्षण यह पता लगाने के लिए शुरू किए गए हैं कि पार्टी अकेले कैसे बहुमत हासिल करेगी। इसके अलावा सर्वेक्षण में यह भी सामने आए कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन में भाजपा कैसा प्रदर्शन करेगी? सर्वेक्षण यह भी पता लगाएगा कि क्या एनसीपी के साथ गठबंधन जारी रहना चाहिए या फिर नहीं। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें 23 के मुकाबले घटकर 9 पर आ गईं, जबकि शिवसेना ने 7 और एनसीपी ने एक सीट जीती, जिससे महायुति की कुल ताकत 17 हो गई, जबकि महा विकास आघडी को 31 सीटें मिली हैं। सूत्रों कहा कहना है कि यह सर्वेक्षण आरएसएस पत्रिका द ऑर्गनाइजर द्वारा यह सुझाव दिए जाने से बहुत पहले शुरू किए गए थे कि अजीत पवार को एनडीए में शामिल करने के बीजेपी के कदम ने पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित किया है। द ऑर्गनाइजर में प्रकाशित एक लेख में आरएसएस के वरिष्ठ नेता रतन शारदा ने लिखा था कि महाराष्ट्र बीजेपी और एकनाथ शिंदे के पास राज्य में आराम से बहुमत था। उन्होंने लिखा था कि पार्टी ने अजित पवार को साथ लेकर अपनी ब्रैंड वैल्यू खो दी। लेख पर क्या बाेले नेता? महाराष्ट्र भाजपा प्रवक्ता केशव उपाध्याय का कहना है कि द ऑर्गेनाइजर स्वतंत्र विचारों की पत्रिका है। बीजेपी हर अखबार के संपादकीय का सम्मान करती है। बीजेपी हर जीत और हार के बाद मंथन करती है और उसके आधार पर पार्टी आगे की रणनीति तय करती है। उन्होंने विधानसभा चुनाव में बीजेपी के एनसीपी से अलग होने की संभावना पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। अजित पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि यह लेख भाजपा का आधिकारिक रुख नहीं है। इसके किसी भी पदाधिकारी ने कोई बयान नहीं दिया है। यह एक व्यक्तिगत विचार है। हर एक बात पर हमें स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पिछले सप्ताह पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए सरकार से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। तब उन्होंने कहा था कि महायुति को 43.6 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि महा विकास अघाड़ी को 43.9 प्रतिशत वोट मिले हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद उपमुख्यमंत्री बने रहने का फैसला किया था।

वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम रिपोर्ट: भारत में एक ही काम के लिए पुरुषों को 100 तो महिलाओं को 40 रुपये मिलता

नई दिल्ली भारत समेत भारतीय उपमहाद्वीप के कई देशों में बार-बार महिलाओं को समान अधिकार और समान वेतन की बात होती है। लेकिन अभी तक यह सपना ही है। अभी देखिए ना, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम (World Economic Forum) ने बीते दिनों ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (Global Gender Gap Index) के आंकड़े जारी किए। इस रिपोर्ट ने भारत के लिए एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर किया है। इस इंडेक्स में भारत दो पायदान फिसल गया है। इंडेक्स के 146 देशों की सूची में भारत को 129वां स्थान मिला है। पिछले साल भारत इस सूची में 127वें स्थान पर था। इस साल भी आइसलैंड को सूची में पहला स्थान मिला है। वह दशकों से इस स्थान पर काबिज है। बंगलादेश, नेपाल और श्रीलंका भी हमसे आगे महिलाओं को वेतन देने में भारत तो बांग्लादेश (99), नेपाल (111), श्रीलंका (125) और भूटान (124) से भी पीछे छूट गया है। हां, पाकिस्तान जरूर हमसे पीछे है। पाकस्तान का इस सूची में 145वां स्थान है जो कि सूची के सबसे अंतिम पायदान पर स्थान पाए सूडान से सिर्फ एक पायदान ऊपर है। इससे एक स्पष्ट आंकड़ा सामने आया है जो दर्शाता है कि भारतीय महिलाएं पुरुषों द्वारा अर्जित प्रत्येक 100 रुपये पर केवल 40 रुपये कमाती हैं। निम्नतम स्तर वाली अर्थव्यवस्था रिपोर्ट के अनुसार, भारत आर्थिक समानता के निम्नतम स्तर वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसमें अनुमानित अर्जित आय में 30% से कम लैंगिक समानता दर्ज की गई है। इन देशों की सूची में बांग्लादेश, सूडान, ईरान, पाकिस्तान और मोरक्को भी शामिल हैं। इन देशों में श्रम बल भागीदारी दर में लैंगिक समानता का स्तर 50% से भी कम है। इस मामले में हुआ है सुधार WEF की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने साल 2024 में अपने लिंग अंतर gender gap को 64.1% तक कम कर लिया है। लेकिन, पिछले वर्ष के 127वें स्थान से गिरावट का कारण ‘शैक्षिक प्राप्ति’ और ‘राजनीतिक सशक्तीकरण’ मापदंडों में मामूली कमी आई है। डब्ल्यूईएफ ने कहा कि भारत का आर्थिक समता स्कोर पिछले चार वर्षों से ऊपर की ओर बढ़ रहा है। भारत माध्यमिक शिक्षा नामांकन के मामले में भी तरक्की हुई है। तभी तो यह लैंगिक समानता में पहले स्थान पर काबिज है। यह तृतीयक नामांकन (Tertiary enrolment) में 105वें, साक्षरता दर में 124वें और प्राथमिक शिक्षा नामांकन में 89वें स्थान पर है। तभी तो इससे शैक्षिक उपलब्धि उपसूचकांक (Educational attainment subindex) में 26वें से 112वें स्थान पर भारी गिरावट आई है। राजनीति में बढ़ी हैं महिला शक्ति भारत में इस समय हेड ऑफ दि स्टेट यानी राष्ट्रपति के पद पर एक महिला हैं। इसलिए, राजनीतिक सशक्तिकरण उपसूचकांक (Political empowerment subindex) में, भारत ने राज्य प्रमुख संकेतक (Head-of-state indicator) पर अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि, संघीय स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व में भारत अपेक्षाकृत कम स्कोर किया है। भारत को मंत्री पदों पर केवल 6.9% और सांसद में 17.2% का स्कोर मिला है। यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में 65वें स्थान पर है और पिछले 50 वर्षों में महिला/पुरुष राष्ट्राध्यक्षों की संख्या के मामले में यह 10वें स्थान पर है। आर्थिक समता में कोई बदलाव नहीं आर्थिक समता और अवसर उपसूचकांक (Economic parity and opportunity subindex) में यहां कोई बदलाव नहीं हुआ है। भारत साल 2023 के दौरान इस उपसूचकांक में 142 वें स्थान पर था। इस साला भी भारत का स्थान यही है। यह वैश्विक स्तर पर सबसे निचले में से एक है, जो कि शर्मनाम स्थिति को दिखाती है। भारत श्रम-बल भागीदारी दर पर 134वें और समान काम के लिए वेतन समानता पर 120वें स्थान पर है, जो पुरुषों और महिलाओं के बीच कमाई में पर्याप्त असमानताओं को दर्शाता है।

संघ ने लोकसभा चुनाव में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, जो दिख रहा है बात उससे कहीं कुछ ज्यादा है?

Proceedings against 11 forest officers including Devanshu in scam worth Rs 7.5 crores aborted

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पहिए दशकों से एक लय में एक गति से चल रहे हैं. जब नए इलाकों में पैर जमाने की बात आई तो संघ हमेशा आगे रहा. यहां RSS ने पहले जमीन तैयार की, फिर बीजेपी वहां पहुंची और राजनीतिक रूप से स्वयं को समृद्ध किया. अगर दोनों संगठनों के बीच ऐसा सहज समन्वय और सामंजस्य है तो संघ परिवार की ओर से फिर असहमति के स्वर क्यों? ये असंतोष के बुदबुदाहट क्यों? और बुदबुदाहट ही क्यों इंद्रेश कुमार ने तो अब खुली घोषणा कर दी है- अहंकारियों को प्रभु राम ने रोक दिया है.   दरअसल नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के खिलाफ जब टिप्पणी की तो इस फुसफुसाहट के स्वर तेज हो गए और ये राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई. टिप्पणियों का ये सिलसिला यहीं नहीं रुका. मोहन भागवत के बाद संघ के मुखपत्र पांचजन्य में लोकसभा चुनाव में बीजेपी के परफॉर्मेंस पर एक आलोचनात्मक लेख छपी शीर्षक था- लोकसभा चुनाव-2024/NDA: सबक हैं और सफलताएं भी. ‘आर्गनाइजर’ में भी टिप्पणी की गई. इन लेखों पर चर्चा हो ही रही थी कि संघ नेता इंद्रेश कुमार ने सार्वजनिक मंच से कहा कि ‘राम सबके साथ न्याय करते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव को ही देख लीजिए. जिन्होंने राम की भक्ति की, लेकिन उनमें धीरे-धीरे अंहकार आ गया. उस पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया. लेकिन जो उसको पूर्ण हक मिलना चाहिए, जो शक्ति मिलनी चाहिए थी, वो भगवान ने अहंकार के कारण रोक दी.’ भागवत, इंद्रेश कुमार की टिप्पणियां ऐसे समय में आई है जब इस बात पर गहन चर्चा चल रही है कि क्या आरएसएस ने वास्तव में बीजेपी से दूरी बना ली है और 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे दिल से उसका समर्थन नहीं किया है. मोहन भागवत ने आम चुनाव के बाद, जहां बीजेपी बहुमत से 30 सीटें पीछे रह गई थी, अपनी पहली टिप्पणी में प्राथमिकता के आधार पर मणिपुर के संघर्ष को समाप्त करने तथा सरकार और विपक्ष के बीच आम सहमति की आवश्यकता की बात कही थी. मोहन भागवत ने कहा था, “एक सच्चा सेवक मर्यादा बनाए रखता है, वह काम करते समय मर्यादा का पालन करता है. उसमें यह अहंकार नहीं होता कि वह कहे कि ‘मैंने यह काम किया’. केवल वही व्यक्ति सच्चा सेवक कहलाता है.” कुछ लोगों ने उनकी टिप्पणी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के रूप में देखा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने कई अवसरों पर स्वयं को जनता का “प्रधान सेवक” बताया था. मोहन भागवत की हालिया टिप्पणियां, पहले की कई बार की तरह ही अस्पष्ट हैं. भागवत के बाद बोले इंद्रेश कुमार भागवत के बयान का लक्ष्य कौन है? इसका संदेश क्या है इस पर एक्सपर्ट कमेंट आ ही रहे थे कि संघ के बड़े फंक्शनरी इंद्रेश कुमार ने अपने बयान सारा धुंध साफ कर दिया. उन्होंने राजस्थान में एक बयान में स्पष्ट कहा कि अहंकारियों को प्रभु राम ने 241 पर रोक दिया है. अब ये स्पष्ट है कि संघ पब्लिक प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट मैसेज देना चाहता है. इंद्रेश ने बिना लाग-लपेट के कहा, “जिस पार्टी ने (भगवान राम की) भक्ति की, लेकिन अहंकारी हो गई, उसे 241 पर रोक दिया गया, लेकिन उसे सबसे बड़ी पार्टी बना दिया गया…” उन्होंने आगे कहा, “लोकतंत्र में रामराज्य का विधान देखिए, जिन्होंने राम की भक्ति की लेकिन धीरे-धीरे अहंकारी हो गए, वो पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन जो वोट और ताकत मिलनी चाहिए थी, वो भगवान ने उनके अहंकार के कारण रोक दी.” इंद्रेश कुमार के इस बयान का वजन इतना है कि बीजेपी की ओर से कोई भी बड़े नेता ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है. कांग्रेस, शिवसेना जैसे विपक्षी दल और बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने इस पर जरूर अपनी प्रतिक्रिया दी है. लेकिन संघ द्वारा अहंकारी बतलाये जाने के बाद बीजेपी ने अपनी रक्षा में कुछ खास तर्क नहीं दिए हैं. कैसे रहे हैं संघ और बीजेपी के रिश्ते? आरएसएस और बीजेपी के बीच संबंध और संघ किस हद तक इस राजनीतिक पार्टी पर प्रभाव डालता है, यह हमेशा से चर्चा का विषय रहा है. इतना ही नहीं, आरएसएस पर शोधकर लिखी गई किताब के लेखक ने इस मुद्दे को “पुरानी बात” कहकर खारिज कर दिया. लेकिन संघ-बीजेपी के इकोसिस्टम पर नजर रखने वाले लोग कहते हैं कि इस बार बात कुछ अलग है. वे भागवत की टिप्पणियों के समय की ओर इशारा करते हैं, जो एक ऐसे चुनाव के बाद आई है जिसमें भाजपा बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई और प्रधानमंत्री मोदी की बड़े और साहसिक निर्णय लेने की क्षमता को झटका लगा. उनका कहना है कि हाल के वर्षों में नागपुर और अहमदाबाद के बीच पर्सनैलिटी की खींचतान चल रही है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनके चुनावी वादों को पूरा करने के कारण सत्ता का केंद्र अहमदाबाद की ओर खिसक गया है. लेखक और वरिष्ठ पत्रकार दीप हलदर ने इंडियाटुडे.इन से बातचीत में कहते हैं, “आरएसएस यह बात खुलकर नहीं कहने जा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा की प्रभावशाली भूमिका को लेकर संघ परिवार सहज नहीं है.” हालदार कहते हैं, “यह सिर्फ़ बीजेपी की सीटों की संख्या का मामला नहीं था, बल्कि राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे वादे भी थे, जिन्हें पीएम मोदी के कार्यकाल में पूरा किया गया था. खासकर 2019 में कार्यकाल की शुरुआत से ही बीजेपी नेतृत्व संघ से सलाह नहीं ले रहा था.” गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी आरएसएस प्रचारक रहे हैं और संघ की नजरों में वे आदर्श प्रधानमंत्री माने जाते हैं. सच्चाई तो ये है कि आरएसएस ने 2014 के आम चुनाव में उनके लिए अपने सभी सहयोगी संगठनों की ताकत लगा दी थी. हालांकि, आरएसएस-भाजपा तंत्र के करीबी एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर इंडियाटुडे.इन को बताया कि उनका व्यापक आभामंडल और उनका सत्ता का केंद्र बन जाना नागपुर में संघ के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों को पसंद नहीं आया. बता दें कि आरएसएस राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा नहीं करता है. इसका रोल राह दिखाने का है. अपने व्यापक नेटवर्क के जरिए यह भाजपा … Read more

इस देश अबॉर्शन बिल पास हो गया तो बलात्कार के मामले में भी गर्भपात को हत्या के बराबर ही माना जाएगा

रियो डी जेनेरियो  ब्राजील में हजारों लोगों ने  कांग्रेस में बहस के लिए पेश किए गए गर्भपात से जुड़े विधेयक के खिलाफ जोरदार रैली की. यदि यह बिल पास हो गया तो बलात्कार के मामले में भी गर्भपात यानी अबॉर्शन को हत्या के बराबर ही माना जाएगा. तमाम लोग इसका विरोध कर रहे हैं. रियो डी जनेरियो में प्रदर्शनकारियों ने मोमबत्तियां जलाईं और नारे लगाए- एक लड़की मां नहीं होती (A girl is not a mother) हजारों ब्राजीलियाई लोगों ने इस विधेयक के खिलाफ रैली की क्योंकि यदि यह पास हो गया तो 22 सप्ताह के बाद गर्भावस्था को समाप्त करने यानी अबॉर्शन के लिए 20 साल तक की सजा हो सकती है. यह बात रेप के मामलों में भी लागू होती है. यानी रेप के कारण गर्भवती महिला पर भी लागू होती है. वैसे फिलहाल ब्राजीलियाई कानून बलात्कार के मामलों में गर्भपात को दंडित नहीं करता है या पीड़ित कब गर्भपात करवा सकती है, इस पर कोई सीमा फिलहाल नहीं है. जब महिला की जान खतरे में हो या भ्रूण के मस्तिष्क में कोई असामान्यता हो तो गर्भपात भी कानूनी है. इन अपवादों के अलावा गर्भपात कराने पर चार साल तक की जेल की सजा हो सकती है. दरअसल इसका विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि कई बार युवा रेप विक्टिमों को शुरू में यह पता ही नहीं चलता है कि वे गर्भवती हो गई हैं. कई बार वे इस बारे में बात करने की हिम्मत जुटाने में भी नाकाम रहते हैं और इस कारण देरी होती चली जाती है. कांग्रेस के वे सांसद जो शक्तिशाली रूढ़िवादी हैं, ने इस पर चर्चा करनी भी वाजिब नहीं समझी और इसे बुधवार को बिल को सीधे चैंबर ऑफ डेप्युटीज में भेज दिया. इसके बाद प्रगतिशील समूहों ने नाराजगी जताई. चैंबर ऑफ डेप्युटीज में मतदान के लिए अभी तक कोई तारीख फिक्स नहीं की है. बच्ची को रेप के कारण मां बनने पर विवश क्यों करना… सामाजिक कार्यकर्ता विवियन निगरी ने सांसदों पर ‘भ्रूण के अधिकार’ की कीमत पर ‘बच्चे के अधिकारों’ की रक्षा करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा- किसी बच्ची को बलात्कार के चलते गर्भधारण करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. विधेयक पास हुआ तो क्या है कानून में… एक खास प्रभावशाली ग्रुप इस बिल को पुश कर रहा है. वह गर्भावस्था के 22 सप्ताह के बाद किए जाने वाले किसी भी गर्भपात को होमीसाइड यानी मानव वध के रूप में परिभाषित करता है. यदि 22वें सप्ताह के बाद गर्भपात करवाया जाता है तो नए कानून में छह से 20 साल की सजा का प्रावधान है, जो बलात्कारी की सजा से दोगुनी है.

कर्नाटक हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी

बेंगलूरू कर्नाटक हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने उनको राहत देते हुए कहा कि वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। वह कोई आदतन अपराधी नहीं है, जो देश छोड़कर भाग जाएगा। वह टॉम, डिक या हैरी नहीं हैं। कोर्ट ने येदियुरप्पा को निर्देश दिया है कि वह सीआईडी के सामने 17 जून को पेश हो जाएं। दरअसल, सीआईडी की टीम मामले में येदियुरप्पा से पूछताछ करना चाहती थी। उन्होंने सीआईडी के समन का जवाब देते हुए कहा कि वह इस समय दिल्ली में हैं, इसलिए उनको समय दिया जाए। सीआईडी ने फास्ट ट्रैक कोर्ट जाकर येदियुरप्पा के खिलाफ गैर जमानती वारंट की मांग की। बेंगलुरु की एक कोर्ट ने उनकी मांग को स्वीकार करते हुए वारंट जारी कर दिया था। येदियुरप्पा ने चुप रहने को कहा था- पीड़िता की मां नाबालिग लड़की की मां ने एफआईआर में शिकायत की कि येदियुरप्पा की तरफ से कथित तौर उससे चुप रहने को कहा गया था। उसने लड़की के आरोपों पर जब येदियुरप्पा से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह लड़की के आरोपों की जांच कर रहे थे कि सच में रेप हुआ है या नहीं। उन्होंने अपनी हरकत की बाद में माफी मांग ली थी। उन्होंने किसी को भी कुछ भी ना बताने को कहा था। यह है मामला येदियुरप्पा के खिलाफ 17 वर्षीय नाबालिग की लड़की ने छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। उसकी शिकायत पर उनके खिलाफ पोस्को एक्ट का मामला दर्ज हुआ है। लड़की की मां के अनुसार 2 फरवरी 2024 को वह येदियुरप्पा के डॉलर्स कॉलोनी स्थित उनके घर पर बेटी के साथ गई थी। इस दौरान उन्होंने बेटी के साथ छेड़छाड़ की थी। येदियुरप्पा के ऑफिस ने इस दौरान नाबालिग लड़की की मां के खिलाफ दस्तावेज जारी किए, जिसमें उसने अलग-अलग लोगों पर 53 केस किए हैं।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती में महिलाओं को मिलेगा 50 प्रतिशत आरक्षण

जयपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार महिलाओं के सशक्तीकरण एवं उनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री ने संकल्प-पत्र में किए गए एक और महत्वपूर्ण वादे को पूरा किया है। शर्मा ने तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती में महिलाओं के लिए आरक्षण की सीमा 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने के लिए राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की है। मुख्यमंत्री के इस संवेदनशील निर्णय से राज्य में महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलेंगे और वे आत्मनिर्भर होकर और सशक्त बन सकेंगी।

संघ नेताओं के आ रहे बयानों के बीच संघ की समन्वय समिति की केरल में अगस्त-सितंबर में होगी बैठक

नई दिल्ली लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर संघ नेताओं के आ रहे बयानों के बीच संघ की समन्वय समिति की बैठक को लेकर बड़ी खबर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक बड़ी बैठक केरल में होने जा रही है। बताया जा रहा है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा राष्ट्रीय संगठन महासचिव बैठक में शामिल होकर लोकसभा चुनाव को लेकर पार्टी के पक्ष को रख सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय समन्वय समिति की बैठक केरल में अगस्त-सितंबर में होने जा रही है। आरएसएस की महत्वपूर्ण बैठक केरल में 31 अगस्त को शुरू होगी और इसका समापन 2 सितंबर को होगा। संघ की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत और संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले सहित संघ से जुड़े 36 के लगभग विभिन्न संगठनों के मुखिया एवं संगठन महासचिव सहित संघ के अन्य महत्वपूर्ण नेता शामिल होंगे। संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष या राष्ट्रीय संगठन महासचिव बैठक में शामिल होकर अपने-अपने संगठन के कामकाज और उपलब्धियों की जानकारी देंगे। संघ की इस बैठक के दौरान जो भी उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय संगठन महासचिव होंगे, वो बैठक में शामिल होकर भाजपा के कामकाज और उपलब्धियों की जानकारी देंगे। यह भी तय माना जा रहा है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाने के कारणों की जानकारी भी बैठक में देगी। बैठक में वर्तमान राष्ट्रीय और सामाजिक परिदृश्य के साथ ही संघ के कामकाज और संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय को और ज्यादा मजबूत करने के तौर-तरीकों पर भी चर्चा हो सकती है। भविष्य की रणनीति, संगठन के विस्तार और संघ के कामकाज को लेकर भी बैठक में चर्चा हो सकती है। संघ नेताओं की लगातार बयानबाजी और भाजपा के साथ आरएसएस के रिश्तों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच संघ की आगामी बैठक को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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