संगठन शास्त्र की सगुण मूर्ति कुशाभाऊ ठाकरे –सुरेन्द्र शर्मा
Kushabhau Thackeray, the embodiment of organization science – Surendra Sharma जन्मदिवस (श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष)भारतीय जनता पार्टी 18 करोड़ से अधिक सदस्यों के साथ आज भारत ही नहीं विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है लगातार तीसरी बार केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो मध्य प्रदेश सहित देश के 21 राज्यों में भी भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों की सरकार हैं संपूर्ण भारत के कोने-कोने तक आज कमल पुष्पित एवं पल्लवित हो रहा है भारतीय जनता पार्टी रूपी इस विशाल भवन को तैयार करने में जो नींव के पत्थर हैं उनमें शशिकांत सुंदर राव ठाकरे उपाख्य “कुशा भाऊ ठाकरे” अग्रणी हैं।राजा भोज की प्राचीन नगरी धार में 15 अगस्त 1922 को जन्माष्टमी के पावन पर्व पर डॉक्टर सुंदर राव ठाकरे एवं श्रीमती शांताबाई ठाकरे के घर एक बालक ने जन्म लिया जो अपनी प्रतिभा विनय शीलता और राष्ट्र को समर्पित व्यक्तित्व के कारण देश के लाखों कार्यकर्ताओं का चहेता कुशाभाऊ बन गया ।कुशा भाऊ के पिताजी एवं माताजी अपने सादा जीवन उच्च विचार तथा गरीबों की चिकित्सा के लिए विख्यात थे ।अपने अपने छात्र जीवन से ही कुशा भाऊ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिये जीवनदान करने का संकल्प लिया जिससे वह कभी नहीं डिगे ।1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने धार में हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त कर 1939 में ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज (वर्तमान में महारानी लक्ष्मी बाई महाविद्यालय) में प्रवेश लिया ।इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें मेडिकल कॉलेज या संघ कार्य में से एक विकल्प चुनने को कहा गया उन्होंने संघ कार्य को चुना । 5 जुलाई 1942 को डाक्टरी की पढ़ाई का मोह छोड़कर देश सेवा करने के लिए वह संघ के प्रचारक बन गये।ठाकरे जी की उच्च शिक्षा ग्वालियर से हुई उन्होंने नीमच से अपने प्रचारक जीवन की शुरुआत की उसके बाद रतलाम विभाग प्रचारक उज्जैन विभाग प्रचारक रहे 1951 में जनसंघ के गठन के साथ ही उन्हें दक्षिण मध्य भारत के संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया 1956 में जब मध्य प्रदेश बना तो उन्हें संपूर्ण मध्य प्रदेश के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गई 1967 में वह जनसंघ के अखिल भारतीय मंत्री के साथ-साथ उड़ीसा एवं गुजरात के प्रभारी भी बने 1974 में उन्हें अखिल भारतीय संगठन मंत्री बनाया गया 1975 में जब आपातकाल लगा तब अन्य विपक्षी नेताओं के साथ ठाकरे जी को भी जेल में बंद कर दिया गया वह 19 माह तक जेल में बंद रहे उसके बाद 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ और ठाकरे जी मध्य प्रदेश के पहले अध्यक्ष बने 1979 में खंडवा लोकसभा उपचुनाव में पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया और वह विजयी हुये।ठाकरे जी 1980 से 1984 तक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री तथा गुजरात एवं उड़ीसा व मध्य प्रदेश के प्रभारी रहे 1984 से 1986 तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष 1986 से 1992 तक राष्ट्रीय महामंत्री तथा उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के प्रभारी भी रहे 1992 में उन्हें राष्ट्रीय संगठन महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई 1998 में श्री लालकृष्ण आडवाणी ने संगठन के आदर्शों का पालन करते हुए लगातार तीसरी बार अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया तब पार्टी के सामने आडवाणी जी के उत्तराधिकारी का प्रश्न था स्वाभाविक तौर पर सभी को कुशा भाऊ इस जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त लगे और 14 अप्रैल 1998 को उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया ।अपनी पढ़ाई के दौरान ठाकरे जी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए विवेकानंद के साहित्य ने उनकी जीवन धारा में मानवता,उष्मता त्याग, समर्पण,संवेदनशीलता की जो धारा प्रवाहित की वह उनमें जीवन भर अविरल बहती रही ।देश भक्ति ठाकरे जी में कूट-कूट कर भरी हुई थी जब वह ग्वालियर के विक्टोरिया महाविद्यालय (वर्तमान में महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय) में पढ़ाई कर रहे थे उसे समय महाविद्यालय के सभागार में मंच के ऊपर दोनों तरफ यूनियन जैक (ब्रिटिश ध्वज) लगे हुए थे ठाकरे जी एवं उनके मित्रों ने यूनियन जैक हटा दिया इस घटना से सनसनी फैल गई खूब-खोज बीन हुई लेकिन कुछ पता ना चल सका क्योंकि “पूर्व योजना पूर्ण योजना ” ठाकरे जी की कार्यशैली की विशेषता थी इससे उत्साहित होकर ठाकरे जी एवं उनके मित्रों ने कॉलेज लाइब्रेरी से महारानी विक्टोरिया एवं जॉर्ज पंचम के चित्र हटाने का निर्णय लिया निर्धारित योजना अनुसार यह काम भी संपन्न हो गया इस कांड की सख्ती से जांच हुई किंतु सीआईडी भी कुछ पता ना लगा सकी।इस घटना के बाद ठाकरे जी एवं उनके मित्रों ने एक प्रतिज्ञा पत्र लिखा और रक्त से हस्ताक्षर कर देश की स्वतंत्रता के लिए आजीवन लड़ने का संकल्पलिया ।ठाकरे जी के पिताजी उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे घर की आर्थिक स्थिति मेडिकल की पढ़ाई का बोझ उठाने की नहीं थी होल्कर रियासत से छात्रवृत्ति मिल सकती थी किंतु रियासत के अधिकारी की शर्त थी कि अगर रियासत की छात्रवृत्ति चाहिए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को छोड़ना होगा ठाकरे जी ने स्पष्ट उत्तर दिया “श्रीमान जी संघ तो मेरी आस्था का विषय है श्रद्धा का विषय है उसे मैं किसी कीमत पर नहीं छोड़ सकता ” संघ ठाकरे जी की आत्मा थी जिससे उनके साथ तव छूटा जब काया पंचभूत में विलीन हो गई ।व्यक्तिगत सुख सुविधा की दृष्टि से अलग-अलग घरौंदा बनाने की साधारण मानव की अभिलाषा उनके मन को छू भी ना सकी थी मां भारती की गोद यही उनका घर ईश्वर प्रदत्त नील गगन यही उनका छप्पर, भारत के समस्त नर नारी उनके भाई-बहन उनके सहोदर सगे संबंधी देश की एकता अखंडता स्वतंत्रता यही उनके मन की धुन समाज के हर व्यक्ति की खुशहाली के लिए अपना जीवन का हर पल दांव पर लगाना यही उनके मन की एक मात्र इच्छा आकांक्षा थी ।अपनी समग्र प्रतिभा,कर्म चेतना और जीवन का सब कुछ देश को न्योछावर करना यही भावना उनके मन में थी “राष्ट्रकाज कीजे बिना मोहि कहां विश्राम “की धुन उन्हें हमेशा लगी रहती थी ।जिस जिस निरपेक्ष और निस्वार्थ बुद्धि से उन्होंने अपने आप को संगठन के कार्य के लिए समर्पित किया था उसके कारण वह समस्त कार्यकर्ताओं का विश्वास अर्जित करने में सफल हुए थे कि “ठाकरे जी जो कुछ कहेंगे जो कुछ करेंगे वह संगठन हित में ही होगा उनका अपना कुछ है ही नहीं … Read more