केंद्रीय रेशम बोर्ड ने झारखंड के कुरजुली गांव को बनाया टसर कीट उत्पादन का प्रमुख केंद्र
Central Silk Board made Kurjuli village of Jharkhand the main center of tussar moth production. रांची, रमेश अग्रवाल ! पश्चिमी सिंहभूम के पोड़ाहाट वन क्षेत्र में स्थित झारखंड का कुरजुली गांव, अब टसर सिल्क कीट उत्पादन के लिए देशभर में पहचान बना चुका है। हालांकि गांव में पक्की सड़कों और बिजली जैसी सुविधाओं का अभाव है, लेकिन 300 घरों वाले इस गांव ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। चार साल के भीतर, यहां के सभी परिवार टसर कीट पालन से अपनी जीविका चला रहे हैं और रोजगार के लिए बाहर गए लोग वापस लौट चुके हैं। इस बदलाव के चलते न सिर्फ कुरजुली, बल्कि आसपास के 10 गांवों में भी पलायन 99% तक रुक गया है। 2019-2020 में शुरू हुई थी पहलकेंद्रीय रेशम बोर्ड और वस्त्र मंत्रालय की पहल पर 2019-2020 में गांव के 136 ग्रामीणों ने व्यावसायिक रूप से टसर सिल्क कीट का उत्पादन शुरू किया था। यह गांव अब देश का सबसे बेहतर, उच्च गुणवत्ता और रोगमुक्त टसर कीट का उत्पादन कर रहा है। यहां से उत्पादित कीटों को केंद्रीय रेशम बोर्ड अनुसंधान, रांची और अन्य प्रमुख टसर उत्पादन केंद्रों में भेजा जाता है, जिनसे रेशम के वस्त्र तैयार किए जाते हैं। वस्त्र मंत्रालय ने इस गांव को देश के एकमात्र टसर कीट उत्पादक के रूप में संरक्षित किया है। पहले यहां परंपरागत रूप से टसर सिल्क कोकून की खेती होती थी। गांव के हर परिवार का मुख्य व्यवसाय टसर सिल्क कीट पालनगांव के हर परिवार ने टसर सिल्क कीट पालन को अपना मुख्य व्यवसाय बना लिया है। वैज्ञानिकों और ग्रामीणों के बीच संवाद का परिणाम यह हुआ है कि आज हर परिवार अच्छी आय अर्जित कर रहा है। केंद्रीय रेशम बोर्ड के निदेशक, डॉ. एनबी चौधरी ने इस परियोजना को एक बड़ी सफलता के रूप में देखा है। देश का एकमात्र टसर कीट प्रजनन केंद्रकुरजुली में देश का एकमात्र पी-4 टसर प्रजनन केंद्र भी स्थापित किया गया है। इस क्षेत्र में सखुआ और आसन के पेड़ों की भरमार है, जो रेशम कीट पालन के लिए आदर्श माने जाते हैं। यहां के पर्यावरण की अनुकूलता के कारण कुरजुली अब टसर कीट प्रजनन के क्षेत्र में अग्रणी बन चुका है। कुरजुली बना आत्मनिर्भरता की मिसालपिछले चार सालों में कुरजुली के प्रत्येक परिवार की वार्षिक आय ₹1.25 लाख से अधिक हो गई है। एक समय मजदूरी करने वाले ग्रामीण, अब स्वरोजगार से अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिछले साल मछुवा पूर्ति नामक ग्रामीण ने ₹1.31 लाख की वार्षिक आय अर्जित की। वहीं, महावीर हाईबुरु ने बताया कि अब कोई भी शहरों की ओर पलायन नहीं कर रहा है, क्योंकि गांव में ही उन्हें स्थायी रोजगार मिल रहा है। कुरजुली गांव की यह सफलता, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अन्य गांवों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है।